The Mysterious Bell241 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 241: jodne wala mistri hissa 025 ep241-250

158 min read November 5, 2026

चबूतरी तक पहुँचने में मैंने शायद सौ कदम रखे होंगे। पर हर कदम पर मुझे लगा कि गली लंबी होती जा रही है, जैसे रबर की हो और कोई उसे दोनों तरफ़ से खींच रहा हो।

पीपल का पेड़ पास आया, तो हवा भी बदल गई। गर्मी की हवा नहीं थी, बस एक ठंडी सी परत, जैसे किसी पुराने कमरे से आई हो।

चबूतरी पर वो बैठी थी।

सिर पर ओढ़नी थी, मैली सफ़ेद, किनारों से ज़र्द पड़ी हुई। ओढ़नी इतनी बड़ी थी कि उसका पूरा शरीर ढका हुआ था, और पीछे से आती लालटेन की पीली रोशनी उसे एक अलग ही आकार दे रही थी।

उसके हाथ सामने थे।

दोनों हाथ।

और मैंने देखा।

बाएँ हाथ की कलाई पर हरी शीशे की चूड़ी थी। चमक ख़त्म हो चुकी थी। किनारे से एक जगह चूड़ी में दरार भी थी, जैसे कभी गिरी हो और फिर धागे से बाँधकर सँभाल ली गई हो।

मेरे पैर अपने आप रुक गए।

वो उठी नहीं। उसने सिर्फ़ अपना सिर उठाया और मुझे देखा।

चेहरा झुर्रियों से भरा था, पर आँखें… आँखें साफ़ थीं। बहुत साफ़। और उन आँखों में वो नहीं था जो मैंने सोचा था। रोना नहीं। शिकायत नहीं। गुस्सा नहीं।

बस एक चीज़ थी।

इंतज़ार।

इतना लंबा इंतज़ार, जिसका वक़्त नहीं गिना जाता, सिर्फ़ सहा जाता है।

"आ जा।" उसने कहा।

आवाज़ दबी थी, रूखी थी, जैसे कई साल से बिना इस्तेमाल का दरवाज़ा खुला हो।

मैं दो कदम आगे बढ़ा।

"आ जा, शंकर के बेटे।"

मेरे अंदर कुछ हिल गया। मैं बोला नहीं।

"बैठ।" उसने चबूतरी पर जगह दिखाई।

मैं बैठ गया। बैठते ही मेरी जेब से घंटी की धीमी झनक हुई, पर उसने अभी खुद नहीं बजा।

औरत ने अपना हाथ बढ़ाया।

"हाथ दे।"

मैंने अपना दाहिना हाथ बढ़ा दिया।

उसने मेरा हाथ अपनी झुर्रीदार, खुरदुरी उँगलियों में लिया और उसे उलटकर देखा। मेरी उँगलियों के जोड़ों पर ग्रीस के पुराने निशान थे, हथेली के किनारे कीचड़ की पतली लकीर थी, और अँगूठे की जड़ पर एक छोटा सा चीरा पड़ा था।

वो मेरी हथेली को देखती रही।

फिर उसने बीस साल की चुप्पी में पहली बात कही।

"ये हाथ जगदीश के हैं।"

मेरी साँस रुक गई।

"मैंने…" मेरी आवाज़ फँस गई। मैंने गला साफ़ किया। "मैंने दादा को देखा नहीं है।"

"देखा नहीं है।" उसने दोहराया। "पर तेरे हाथ ने देखा है।"

उसने मेरी हथेली पर उँगली रखी।

"जगदीश के हाथ भी ऐसे थे। बड़ी हथेली, छोटी उँगलियाँ। और जब वो पेंच कसता था, तब उसकी कलाई के अंदर की नस उभर जाती थी। ऐसे।"

उसने मेरी कलाई की तरफ़ इशारा किया।

और मैंने अपनी कलाई नीचे देखी।

नस उभरी हुई थी।

मैंने हाथ खींचा, फिर रोक लिया। मैंने उसकी आँखों में देखा।

"आप…"

"मुझसे नाम न पूछ।" उसने तुरंत कहा।

और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ कसा हुआ आया।

"नाम पूछने से पहले…" उसने मेरा हाथ फिर दबाया। "पहले अपने पापा के पास जा।"

मैं जम गया।

"क्या?"

"जो आज रात टूटा है, उसे अकेला मत छोड़।" उसने कहा। "मैं इतनी दूर से आई हूँ, दो दिन पैदल, तेरा चेहरा देखने के लिए। मैं और दो घंटे बैठ सकती हूँ। पर तेरा पापा…"

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"तेरा पापा दो घंटे नहीं सह पाएँगे।"

और ठीक उसी वक़्त, जैसे उसकी बात को किसी ने गली के दूसरे सिरे से झटका देकर सच कर दिया हो, आँगन की तरफ़ से एक चीख आई।

काजल की चीख।

"माँ! माँ, पापा!"

मेरा शरीर पलक झपकने में चबूतरी से उठ गया।

वो औरत मेरी कलाई पकड़े हुई थी।

"जा।" उसने कहा और हाथ छोड़ दिया। "जा, और जब वो होश में आएँ, तो उनसे कह देना कि माँ आई है।"

मैं दौड़ा।

कुछ नहीं सोचा। नाम नहीं पूछा। पीछे मुड़कर यह भी नहीं देखा कि वो उठी या बैठी रही।

मैं बस दौड़ा।

और इस बार घंटी जेब में बजती रही, पूरे रास्ते, तेज़-तेज़, जैसे मेरे साथ दौड़ रही हो।

आँगन में पहुँचा तो देखा कि पापा ज़मीन पर पड़े थे।

मुँह के बल नहीं, करवट। दाहिना हाथ सीने पर, बायाँ फैला हुआ, और वो साँस लेने की कोशिश कर रहे थे, पर साँस उनके शरीर में ठीक से नहीं उतर रही थी। उनका चश्मा नाक पर टेढ़ा लटका था, एक काँच चटका हुआ, टेप खुली हुई।

काजल घुटनों के बल उनके पास बैठी थी और उनका हाथ पकड़े हुए थी।

माँ कुछ दूर खड़ी थीं, और वो हिल नहीं रही थीं। बिल्कुल नहीं। उनका चेहरा पत्थर जैसा था, पर उनके होंठ काँप रहे थे।

"पापा।" मैं घुटनों पर गिरा। "पापा, सुनते हो?"

उनकी आँखें खुली थीं। वो मुझे देख रहे थे।

"अं… अंकुश।" उन्होंने कहा।

आवाज़ इतनी धीमी कि लगा जैसे किसी दूसरे कमरे से आ रही हो।

"मैंने…" उन्होंने साँस खींची। "मैंने ज़ोर से नहीं लगाया था।"

मैं ठंडा हो गया।

"क्या?"

"अंगूठा।" उन्होंने कहा। "मैंने ज़ोर से नहीं लगाया था। मेरा हाथ… मेरा हाथ काँप रहा था। उसने मेरा हाथ पकड़ा था। उसने खुद दबाया था।"

मैंने काजल की तरफ़ देखा। काजल की आँखों में पानी था और वो अपने होंठ काट रही थी।

"भैया।" उसने कहा। "उन्होंने अभी अचानक… अचानक हाथ सीने पर रखा और गिर पड़े।"

"पल्स?" मैंने पूछा।

"चल रही है।" काजल ने कहा। "धीमी है, पर चल रही है। और मुठ्ठी… मुठ्ठी ठंडी हो रही है।"

तभी माँ आगे आईं।

उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मुझे धीरे से खींचकर उठाया।

"अंकुश।" उन्होंने कहा।

उनकी आवाज़ में वो नहीं था जो माँ की आवाज़ में होता है। न डाँट, न घबराहट। बस एक चीज़ थी, जो इतनी साफ़ थी कि मेरी रीढ़ तक उतर गई।

"आज रात।" उन्होंने कहा, और हर शब्द अलग से बोला। "आज रात इस घर में कोई झूठ नहीं सोएगा। कोई नहीं।"

"माँ, पहले उन्हें–"

"मैं जानती हूँ।" उन्होंने मेरी बात काटी। "अस्पताल ले जाओ। पर मैं तुमसे कह रही हूँ, अंकुश — दवा शरीर ठीक करती है। सच घर ठीक करता है। और आज इस घर में दोनों होंगे।"

फिर वो मुड़ीं।

"काजल, चादर ला। टिंकू, डॉक्टर इसरानी को फोन कर। उस्ताद के पास जाकर कहो कि अस्पताल आ जाएँ। मीरा…"

मीरा पहले से गेट पर खड़ी थी। कैमरा उसके हाथ में था, पर बंद था।

"मीरा।" माँ ने कहा। "कैमरा यहीं रख दो। पहले इंसान हो, फिर पत्रकार।"

मीरा ने एक पल माँ को देखा।

फिर उसने कैमरा गेट के किनारे, उस्ताद की सिलाई मशीन वाले बेंच पर रख दिया।

"जी आंटी।" उसने कहा।

हमने पापा को उठाया। नदीम ने पैर उठाए, मैंने और टिंकू ने कंधे। माँ पीछे थीं और काजल उनका हाथ पकड़े हुई थी।

गली में जब हम निकले तो पता चला कि पूरी गली जाग गई है।

शबनम आपा गुमटी का बोर्ड लगा रही थीं और उनके हाथ में चाय वाली केतली थी, जो उन्होंने बिना किसी से कुछ कहे बीच रास्ते रख दी। भोला भाई अपनी दुकान का शटर खोल रहे थे, और उनकी बीवी बैसाखी लेकर दरवाज़े पर खड़ी थी। उस्ताद की दुकान का दरवाज़ा खुला था, पर अंदर कोई नहीं था।

रास्ते में पापा मेरी बाँह पकड़े हुए थे।

और वो बार-बार वही कह रहे थे।

"मैंने ज़ोर से नहीं लगाया।"

"पापा, रहने दीजिए।"

"नहीं, सुन।" उन्होंने मेरी बाँह दबाई। "सुन। उसने मेरा हाथ पकड़ा था। उसके हाथ में… उसके हाथ में ताक़त थी। मेरे हाथ में नहीं थी। मैं रो रहा था। मैं रो रहा था, अंकुश।"

मैं रुक गया।

मैंने अपने पापा को देखा। पचपन साल के आदमी को, जिनकी कमर झुकी हुई थी और जिनका चश्मा कान पर टेप से बँधा था, और जो उस वक़्त बिल्कुल वैसे बोल रहे थे जैसे कोई बच्चा बोलता है — जब उससे कोई चीज़ टूट जाए और उसे लगे कि उसने तोड़ी है।

"पापा।" मैंने कहा। "अब आप चुप रहिए। बस दो मिनट। अस्पताल आ गया।"

अस्पताल के गेट पर डॉक्टर इसरानी पहले से खड़े थे।

उन्होंने अपना टेप लिपटा पुराना स्टेथोस्कोप गले से उतारा और हमारे साथ सीधे नीचे वाले कमरे में चले आए, जहाँ माँ का पलंग था। उसी के बगल में एक खाली पलंग था, पुराना लोहे का, जिसकी चादर धुली हुई थी।

"इन्हें यहाँ लिटाओ।" उन्होंने कहा। "धीरे। कमर न मुड़े।"

हमने पापा को लिटाया।

डॉक्टर इसरानी ने उनकी कलाई पकड़ी, घड़ी देखी, फिर उनका सीना सुनने लगे।

कमरे में सिर्फ़ दवा और फ़िनाइल की गंध थी और दूर कहीं पंखे की धीमी चरचराहट।

"सुशीला जी।" डॉक्टर ने माँ की तरफ़ देखा। "इन्होंने आज कुछ खाया?"

"सुबह चाय।" माँ ने कहा। "और एक रोटी, आधी।"

"ब्लड प्रेशर?" डॉक्टर ने काजल से पूछा।

"दो दिन से नहीं नापा।" काजल ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "मैं… मैंने नहीं नापा, डॉक्टर साहब। मैं उनके पास ही थी, फिर भी–"

"काजल।" डॉक्टर ने रुककर उसकी तरफ़ देखा। "अभी अपने ऊपर इल्ज़ाम मत लगाओ। यह काम बाद में। पहले इनका हाथ पकड़े रहो। इनका हाथ ठंडा है, और जब हाथ ठंडा होता है तो आदमी डर जाता है। तुम गरम हाथ दो।"

काजल ने पापा का हाथ दोनों हाथों में लिया।

डॉक्टर इसरानी ने स्टेथोस्कोप निकाला और मुझे इशारा किया।

"बाहर आओ।"

मैं उनके पीछे गलियारे में आया।

"कुछ गलत है?" मैंने पूछा।

उन्होंने स्टेथोस्कोप अपनी जेब में डाला और मेरी तरफ़ देखा। उनके चश्मे के पीछे आँखें थकी हुई थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।

"दिल ठीक कर रहा है।" उन्होंने कहा।

"तो फिर?"

"यह दिल की बीमारी नहीं है।" उन्होंने कहा। "यह डर का दौरा है, और कमज़ोरी का। शरीर ने अपना काम करना बंद नहीं किया, अंकुश। शरीर ने बस हार मान ली। तुम्हारे पापा पच्चीस साल से एक ही डर को अपने सीने में लेकर चल रहे हैं। आज कुछ ऐसा हुआ कि वो डर उनके हाथ से निकल गया। और जब डर निकलता है, तो पहले वो आदमी को गिराता है, बाद में उठाता है।"

मैंने दीवार को देखा।

"यह ठीक हो जाएगा?"

"आराम से हाँ।" उन्होंने कहा। "पर मैं तुम्हें साफ़ कहता हूँ। इलाज दो चीज़ों से होगा। आराम से, और सच से। जो देर तक चुप रहा है, उसका दर्द चुप्पी की जगह बैठ जाता है। आज रात से उन्हें सच बोलने दो। चाहे सब बिखरे, मेरी तरफ़ से इजाज़त है।"

मैं कुछ कहने ही वाला था कि गलियारे के दूसरे सिरे से पदचाप आई।

तेज़, जल्दी, अनियमित।

मैंने पलटकर देखा।

उस्ताद अली बक्श आ रहे थे।

उनकी दुकान की सिलाई मशीन के पचास साल में वो पहली बार इस तरह आ रहे थे — बिना चश्मा ठीक किए, बिना कान पर पेंसिल खोजे, शर्ट का एक कोना कुर्ते से बाहर निकला हुआ।

उनके हाथ में अपनी छोटी फूल वाली घंटी थी।

वो सीधे मेरे पास आए और रुके। साँस फूल रही थी।

"उस्ताद।" मैंने कहा। "पापा को कोई खतरा नहीं, डॉक्टर कह रहे हैं–"

"अंकुश।" उन्होंने मेरी बात काटी।

उनकी आवाज़ में कुछ था जो मैंने कभी नहीं सुना।

"मेरे साथ आ।"

उन्होंने मेरा कोहनी पकड़ा और मुझे गलियारे के कोने की तरफ़ खींच लिया, जहाँ रोशनी कम थी और दीवार पर पुराना सफेद प्लास्टर झड़ा हुआ था।

"उस्ताद, पापा–"

"तेरे पापा को डॉक्टर देख रहा है।" उन्होंने कहा। "मैं तुझे एक बात कहने आया हूँ, और ये बात अगर आज नहीं कही, तो शायद कभी नहीं कहूँगा।"

उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा।

"मैं पचास साल से एक चीज़ छिपा रहा हूँ।" उन्होंने कहा। "और अब वो छिप नहीं सकती।"

मेरी जेब से घंटी की आवाज़ आई, बहुत धीमी।

"क्यों अब?" मैंने पूछा।

"क्योंकि आज वो औरत पीपल पर बैठी है।" उस्ताद ने कहा।

मैं जम गया।

"आप उसे जानते हैं?"

उस्ताद ने अपनी आँखें बंद कीं और फिर खोलीं।

"अंकुश।" उन्होंने कहा। "ये घंटी जो तेरे पास है, ये मेरे घर से गई थी।"

मेरे हाथ से खून उतर गया।

"क्या?"

"ये घंटी बनी थी।" उन्होंने कहा। "बनी थी, किसी दुकान में नहीं, किसी मशीन से नहीं। बनी थी तीन भाइयों के हाथ से।"

उस वक़्त गलियारे के आख़िरी सिरे पर अस्पताल के मुख्य दरवाज़े की तरफ़ से एक आवाज़ आई।

खाँसी।

लंबी, गीली, सूखी खाँसी, जैसे कोई सालों से बाहर नहीं आया हो।

हम दोनों ने पलटकर देखा।

दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था।

दुबला। बहुत दुबला। उसकी कमीज़ हड्डियों पर लटक रही थी और उसके कंधे अंदर धँसे हुए थे, जैसे कोई बोझ उठाकर आया हो जो अब भी उस पर पड़ा है। उम्र सत्तर के पार। गाल धँसे हुए, आँखें धँसी हुई, और एक हाथ में पुरानी लाठी, जिसका निचला सिरा घिसकर गोल पत्थर जैसा हो गया था।

उसने एक कदम आगे रखा और फिर रुककर खाँसा। खाँसी में उसके पूरे शरीर ने झटका खाया।

और जब वो सीधा हुआ, तो उसने हमारी तरफ़ देखा।

मैंने उसका चेहरा देखा।

और मुझे कुछ अजीब लगा।

उस चेहरे में कुछ जाना-पहचाना था। नाक का ढलान, भौंहों का कोण, आँखों के नीचे की हड्डी…

मैंने उस्ताद अली बक्श की तरफ़ देखा।

और मेरा दिल धक से रह गया।

क्योंकि उस्ताद जैसे खड़े थे, वैसे ही वो आदमी खड़ा था। एक ही तरह से झुकी कमर, एक ही तरह से पकड़ी लाठी, एक ही तरह से साँस खींचते हुए ठुड्डी थोड़ी ऊपर।

दो शरीर। दो उम्रें। पर चेहरा… चेहरा एक ही साँचे से निकला हुआ।

उस्ताद की छोटी फूल वाली घंटी उनके हाथ में काँपी और फिर खामोश हो गई।

मैंने देखा कि उस्ताद का चेहरा बदल रहा है।

धीरे-धीरे।

पहले रंग गया, फिर आँखें, फिर होंठ।

उनका गला सूख गया। उन्होंने एक बार हवा निगली, दूसरी बार, और तीसरी बार।

फिर उनकी आवाज़ निकली।

और वो आवाज़ काँप रही थी।

इतनी काँप रही थी कि मुझे लगा कि किसी ने उनकी ज़ुबान को हाथ में पकड़कर हिला दिया है।

"याकूब।"

वो आदमी रुका।

"याकूब।" उस्ताद ने फिर कहा, और इस बार उनका पूरा शरीर उस नाम के साथ झुक गया।

"तू… तू पचास साल बाद भी मेरा हिस्सा माँगने आया है?"

दरवाज़े पर खड़ा आदमी हिला नहीं।

उसने सिर्फ़ अपना सिर थोड़ा ऊपर उठाया और उस्ताद को देखा।

और उसकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ में एक पुरानी, ठंडी, साफ़ कड़वाहट।

"नहीं, अली।" उसने कहा।

खाँसी दबाकर, साँस खींचकर।

"मैं तेरा हिस्सा नहीं माँगने आया। मैं तेरा हिस्सा लेने आया हूँ।"

मेरी जेब में घंटी ज़ोर से बजी।

एक बार।

और मैंने उसे साफ़ सुना।

"तीन में से एक आ गया।" घंटी ने कहा। "अब बाकी दो को बुलाना पड़ेगा।"

॥

दरवाज़े पर खड़ा वो आदमी एक कदम आगे आया।

फिर रुक गया।

उसने लाठी ज़मीन पर टिकाई और लाठी की नोक से एक छोटी सी टक-टक निकली, जो गलियारे की खाली दीवारों से टकराकर लौटी। गलियारे में जलने वाली पीली बत्ती ने एक बार झपक कर अपनी रोशनी कम की और फिर वापस बढ़ा दी।

मैंने उसका चेहरा फिर देखा।

सत्तर के पार। हड्डियाँ चमड़े के नीचे गिनी जा सकती थीं। कमीज़ जो कभी सफ़ेद रही होगी, अब पीली पड़ चुकी थी और उसके दोनों कोनों पर मोटे धागे से पैबंद लगे थे। एक कंधे पर फटा हुआ मोटा कपड़ा था, जिसे उसने ठुड्डी के नीचे गाँठ मारकर बाँधा हुआ था, जैसे ठंड से बचने की कोई पुरानी आदत हो।

उसके हाथ में एक थैला था।

मोटे कपड़े का पुराना थैला, जिसका रंग उतर गया था। ऊपर से रस्सी बँधी थी और रस्सी की गाँठ पर टेप चिपका था, जो उतर रहा था। थैला उसके हाथ में इतना भारी नहीं दिख रहा था, जितना उसकी कलाई झुकी हुई थी।

वो सीधा हुआ और उसने फिर खाँसा।

इस बार खाँसी छोटी थी, पर उसके साथ उसके सीने से एक आवाज़ आई, जैसे किसी पुरानी अलमारी का दरवाज़ा बंद हो रहा हो।

उस्ताद ने एक कदम पीछे रखा।

मैंने देखा, बस एक कदम। पर वो कदम उनके पूरे पचास साल का था।

"अली।" याकूब ने कहा। "तेरे पास बैठने की जगह है?"

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।

गलियारे के बीच में प्लास्टिक और लोहे की पुरानी कुर्सियाँ पड़ी थीं, जिनमें से एक की टाँग टूटी थी और उसके नीचे ईंट का टुकड़ा रखा था। याकूब ने उस कुर्सी को देखा, फिर उस ईंट को, और फिर बिना कुछ कहे उस पर बैठ गया। बैठते वक़्त उसकी हड्डियों से कोई आवाज़ नहीं आई, पर उसके चेहरे से पता चल रहा था कि बैठना भी उसके लिए कोई आसान काम नहीं था।

थैला उसने घुटनों पर रखा।

और दोनों हाथ उस पर रख दिए, जैसे कोई चीज़ उड़ न जाए।

तुम सोच रहे होगे कि पचास साल बाद दो भाई मिले तो क्या हुआ होगा—गले लगे होंगे, रोए होंगे, कोई पुरानी बात निकली होगी और बात खत्म।

तो सुन लो, कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनमें गले लगने की जगह सिर्फ़ एक मेज़ होती है, और उस मेज़ पर एक काग़ज़, और उस काग़ज़ पर एक अंगूठा।

मैं उस्ताद के पास खड़ा था।

उनके हाथ में उनकी छोटी फूल वाली घंटी थी, जो उन्होंने नदीम के सामने जेब से निकाली थी और तब से पकड़े हुए थे। वो घंटी अब भी चुप थी। बजती नहीं थी, सिर्फ़ सुनती थी, यह बात उस्ताद ने खुद एक बार मुझे बताई थी।

मेरी अपनी घंटी जेब में थी, और वो भी चुप थी।

गलियारे में सिर्फ़ दूर कहीं किसी बच्चे का रोना था, और दवा की खिड़की पर रजिस्टर पलटने की आवाज़ आ रही थी।

फिर उस्ताद बोले।

और उनकी आवाज़ वैसी नहीं थी जैसी उनकी आवाज़ होती थी। उनकी आवाज़ हमेशा तराज़ू में तोलकर निकलती थी। आज वो तराज़ू कहीं गिर गया था।

"तेरे पास बैठने की जगह है।" उस्ताद ने कहा। "हमेशा से थी।"

याकूब ने उनकी तरफ़ देखा।

"झूठ।" उसने कहा।

शब्द छोटा था। पर गलियारा उससे भर गया।

"पचास साल से तेरे पास बैठने की जगह थी?" याकूब ने कहा। "तो बता, अली, मैं कहाँ बैठता? तेरी दुकान में? तेरी मशीन के पास? उस स्टूल पर, जिस पर तू बैठता है?"

उसने अपनी लाठी की नोक फ़र्श पर टिकाई और उसका हाथ कस गया।

"मैं तेरे पास आया था।" उसने कहा। "उस साल। तुझे याद है? बारिश में, पैदल, तेरी दुकान तक। तूने मुझे बाहर खड़ा रखा और कहा कि अंदर मत आ, काम चल रहा है।"

उस्ताद की आँखें झुक गईं।

"मैं बाहर खड़ा रहा।" याकूब ने कहा। "दो घंटे। तेरी मशीन की टिक-टिक सुनता रहा। तेरी दुकान के बोर्ड पर अपना नाम ढूँढता रहा। और बोर्ड पर सिर्फ़ तेरा नाम था।"

उसने अपना थैला कसकर पकड़ा।

"घंटी की आधी मेरी थी।" उसने कहा। "आधी मेरी थी, अली। और तूने उसे बेच दिया।"

मैंने महसूस किया कि मेरी जेब में घंटी गरम हो रही है, जैसे किसी ने उसे मुट्ठी में दबा दिया हो।

"तूने मेरा हिस्सा बेचा।" याकूब ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ फट गई। "और उस पैसे से तूने अपनी दुकान सजाई। और मैं सड़क पर रह गया। मैं, अली। तेरा भाई।"

उस्ताद ने अपना चश्मा उतारा।

उन्होंने उसे अपनी कमीज़ से पोंछा, और फिर पहना। यह उनकी आदत थी—जब वो कुछ सोचते थे, तो चश्मा उतारकर पोंछते थे। पर आज उनके हाथ काँप रहे थे और चश्मा पहनते वक़्त उनकी उँगली कान से टकरा गई।

"मैंने कुछ नहीं बेचा।" उन्होंने कहा।

"झूठ।"

"मैंने कुछ नहीं बेचा, याकूब।" उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ठंडक आ गई जो पचास साल की खामोशी से आती है। "तूने खुद अपना हिस्सा उस आदमी के हाथ रखा था, जिसकी उँगली में काली अंगूठी थी। मैंने तुझे रोका था। तूने मेरी बात नहीं सुनी।"

याकूब का चेहरा बदला।

"तूने मेरा अंगूठा दबाया था।" उसने कहा, बहुत धीमे। "उस काग़ज़ पर। तेरी मशीन के पास। बैठकर। रात को। और मैं कुछ बोल नहीं पाया, क्योंकि तेरे हाथ में मेरा हाथ था।"

गलियारे में हवा रुक गई।

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।

उनका चेहरा सफ़ेद था। बिल्कुल सफ़ेद। जैसे किसी ने उनके चेहरे से खून का आख़िरी कतरा भी खींच लिया हो।

और उस वक़्त मुझे कुछ समझ आया।

पिछले दिनों में मैंने कितने अंगूठे देखे थे। पापा का अंगूठा, जो डर के मारे लगा था। गोविंद भाई के काँपते हाथ, जिन्होंने वो अंगूठा लिया था। नसीमा बाई का अंगूठा, शकील भाई का अंगूठा, भोला भाई का अंगूठा, हबीब चाचा के नाम पर लगा झूठा अंगूठा।

और अब यहाँ, इस गलियारे में, एक और अंगूठा निकल रहा था, पचास साल पुराना, जिसके नीचे एक भाई की ज़िंदगी दबी थी।

मेरी जेब में घंटी बजी।

एक बार।

कमज़ोर, दबी हुई, जैसे किसी ने दूर से किसी चीज़ का नाम लिया हो।

दूर, गलियारे के आख़िर में, टिंकू खड़ा था।

वो पिछले कुछ मिनट से वहीं खड़ा था, दीवार से सटा हुआ, दोनों हाथों में अपना झोला पकड़े हुए। जब याकूब ने पहली बार खाँसा था, तब वो मेरी कमीज़ का कोना पकड़कर मेरे पीछे आ गया था। और जब याकूब ने "मैं तेरा हिस्सा लेने आया हूँ" कहा था, तब मैंने महसूस किया कि उसकी उँगलियाँ मेरी कमीज़ में और गहरी धँस गई थीं।

अब वो पीछे हट गया था।

दो कदम। फिर तीन।

उसका झोला उसके हाथ से फिसलकर ज़मीन पर गिरा और उसने उसे उठाने की कोशिश भी नहीं की।

"उस्ताद…" उसने धीरे से कहा।

दोनों भाइयों ने उसकी तरफ़ नहीं देखा।

"तूने मेरा हिस्सा बेचा।" याकूब ने फिर कहा, जैसे वो एक ही लकीर पर बार-बार चलकर अपनी बात मज़बूत कर रहा हो। "तेरे पास दुकान है, मशीन है, नाम है। और मेरे पास?"

उसने अपने इर्द-गिर्द देखा, जैसे इस गलियारे में उसका सारा सामान रखा हो।

"मेरे पास क्या है, अली?" उसने कहा। "एक थैला। एक लाठी। और एक खाँसी, जो रात भर चलती है।"

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।

और उनके चेहरे पर पहली बार कुछ ऐसा आया जो क्रोध नहीं था, जो गुस्सा नहीं था। कुछ और।

फिर उन्होंने अपनी आवाज़ को सख़्त किया, जैसे कोई फटे हुए कपड़े को जल्दी से सी रहा हो।

"तूने अपना हिस्सा खुद खोया।" उन्होंने कहा। "मैंने तुझे नहीं खोया। तू अपने पैरों से गया।"

"क्योंकि तूने मुझे रहने की जगह नहीं दी!"

"क्योंकि तूने माँ की पेटी खोली थी!"

दोनों चुप हो गए।

उस्ताद ने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया, जैसे उन्होंने कुछ ऐसा कह दिया हो जो उन्हें नहीं कहना था।

याकूब की आँखों में पानी आ गया, पर वो नीचे नहीं गिरा। वो वहीं, पलकों पर रुका रहा, जैसे कोई बच्चा किसी बंद दरवाज़े के बाहर खड़ा हो।

"माँ की पेटी…" उसने कहा।

"मैं यह नहीं कह रहा—"

"तूने कह दिया।" याकूब ने कहा। "कह दिया न। तो अब सुन। उस रात मैं पेटी के पास गया था, हाँ। पर उसे खोलने नहीं। मैं उस पर हाथ रखकर बैठ गया था, अली। बस हाथ रखकर। क्योंकि उस पेटी में माँ की सिलाई की सुई थी और मुझे उसकी गंध आ रही थी। और तू आया और तूने मुझे देखा और तूने सोच लिया कि मैं चोर हूँ।"

उसने लाठी को ज़ोर से पकड़ा।

"तूने मुझसे एक सवाल नहीं पूछा।" उसने कहा। "एक सवाल भी नहीं। तूने मुझे देखा और मुझे दोषी बना दिया। और उसके बाद?"

उसने एक गहरी साँस ली, जो उसके सीने में अटक गई।

"उसके बाद काली अंगूठी वाला आदमी आया।" उसने कहा। "और तूने उसके सामने मेरा नाम मिटा दिया।"

अब उस्ताद भी हिल गए।

"मैंने तेरा नाम नहीं मिटाया।" उन्होंने कहा, बहुत धीमे।

"तूने मेरा अंगूठा दबाया।"

"मैंने तेरा हाथ पकड़ा था, याकूब।" उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। "मैंने तेरा हाथ पकड़ा था। तुझे बचाने के लिए। तू काँप रहा था। तेरी कलम नहीं चल रही थी। तेरा अंगूठा लग ही नहीं रहा था। उस आदमी ने कहा था कि एक अंगूठा और चाहिए, वरना पूरा काम बंद।"

उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

"मैंने तेरा हाथ पकड़ा और मैंने उसे दबाया।" उस्ताद ने कहा। "यह सच है। और यह भी सच है कि मुझे उस वक़्त यह नहीं सोचना चाहिए था। मुझे उस आदमी से लड़ना चाहिए था। पर मैं नहीं लड़ा। मैं डर गया।"

याकूब ने उनकी तरफ़ देखा।

दोनों के बीच में सिर्फ़ चार कदम थे।

और उन चार कदमों में पचास साल की बारिश थी, एक बंद दुकान थी, एक सड़ी हुई मशीन थी, एक थैला था और एक अधूरा नाम था।

तभी पीछे से आवाज़ आई।

"उस्ताद।"

टिंकू की आवाज़।

वो अब भी वहीं खड़ा था, पर उसका चेहरा बदल गया था। डर अब भी उसकी आँखों में था, पर उसके नीचे कुछ और था।

"उस्ताद, ये पानी…"

मैंने देखा कि उसके हाथ में स्टील का एक गिलास है, जो आधा पानी से भरा है और उसके हाथ काँप रहे हैं, इसलिए पानी गिलास के किनारे से टपक कर ज़मीन पर गिर रहा है।

वो पानी कहाँ से लाया?

फिर मैंने देखा—गलियारे के कोने पर दवा की खिड़की के पास एक नल है, जहाँ कर्मचारी हाथ धोते हैं। टिंकू वहीं गया था, जब मैं दोनों भाइयों की बात सुन रहा था।

वो आगे आया।

धीरे-धीरे। एक कदम, फिर दूसरा। उसके घुटने पर बँधी पट्टी धूल से भरी थी और उसके जूते से चप्पल की खड़खड़ आ रही थी।

वो दोनों भाइयों के बीच पहुँचा।

उसने गिलास उनके बीच में, उस टूटी कुर्सी के पास, लोहे की छोटी मेज़ पर रख दिया—वो मेज़ जिस पर अक्सर लोग चाय रखकर भूल जाते थे और जिस पर अब सिर्फ़ धूल थी।

फिर उसने बिना पीछे हटे, दोनों की तरफ़ बारी-बारी देखा।

और उसने कहा—

"पहले पानी पिएँ।"

गलियारा एक पल के लिए रुक गया।

"फिर लड़ें।"

उसकी आवाज़ छोटी थी, पर साफ़ थी। और उसमें वो डर भी था जो तेरह साल का लड़का छिपा नहीं सकता था, और वो ज़िद भी थी जो उसे मेरे पास खड़े रहने की आदत से मिली थी।

याकूब ने उसे देखा।

उस्ताद ने भी।

और फिर, कहीं पीछे, कमरे के दरवाज़े के पास, काजल हँस पड़ी।

वो एक छोटी सी हँसी थी, जो पहले एक सिसकी जैसी शुरू हुई और फिर हँसी बन गई। वो अपने हाथ से अपना मुँह दबाए हुए थी और उसकी आँखें भरी हुई थीं और वो हँस रही थी।

पिछले कुछ दिनों में मैंने काजल को बहुत कुछ होते देखा था। रोते, चुप होते, झूठ बोलते, ज़िद करते। पर हँसते नहीं देखा था।

और उस हँसी के साथ गलियारे की हवा थोड़ी ढीली हुई।

उस्ताद ने टिंकू की तरफ़ देखा और उनके चेहरे पर कुछ पिघला।

"ये किसका लड़का है?" याकूब ने धीरे से पूछा।

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।

मैंने कहा—

"गली का है।"

याकूब ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे पहली बार मुझे देखा हो।

"और तू?"

"मैं अंकुश।" मैंने कहा। "शंकर यादव का बेटा। जगदीश यादव का पोता।"

याकूब की आँखें एक पल के लिए बड़ी हुईं।

उसने उस्ताद की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। फिर उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

"जगदीश का…" उसने धीरे से कहा।

उस्ताद ने अपना सिर हल्का ऊपर किया।

"हाँ।" उन्होंने कहा। "जगदीश का पोता। और वो घंटी जिसका तू हिस्सा माँगने आया है, इस वक़्त इसकी जेब में है।"

याकूब ने मेरी जेब की तरफ़ देखा।

मेरी जेब से घंटी की आवाज़ आई। बहुत धीमी, बहुत छोटी, जैसे किसी ने नींद में कुछ कहा हो।

"दो आ गए।" घंटी ने कहा।

मैंने गिलास उठाया और याकूब की तरफ़ बढ़ा दिया।

"पहले पानी।" मैंने कहा। "लड़ाई बाद में। लड़ाई भागेगी नहीं। ये गली में रहने वाली चीज़ है, ये हमारे यहाँ देर तक टिकती है।"

याकूब ने गिलास देखा।

फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया और उसे लिया। उसकी उँगलियाँ सूखी थीं, चमड़ी काग़ज़ जैसी पतली। उसने गिलास मुँह से लगाया और धीरे-धीरे पिया। पीते वक़्त उसका गला ऊपर-नीचे हुआ और एक बूँद उसकी ठुड्डी से कमीज़ पर गिरी।

पीने के बाद उसने गिलास नीचे किया और एक लंबी साँस ली।

"पचास साल बाद कोई पानी देने वाला मिला।" उसने कहा।

उसकी आवाज़ में कड़वाहट अब भी थी, पर उसमें एक धागा सा नरम भी जुड़ गया था।

मैंने गिलास उस्ताद की तरफ़ बढ़ाया।

उन्होंने देखा। फिर उन्होंने गिलास लिया और दो घूँट पिए। उनके हाथ में गिलास थोड़ा काँपा, और उन्होंने दूसरे हाथ से उसे सँभाला।

कमरे के दरवाज़े से पापा की आवाज़ आई।

बहुत धीमी आवाज़। इतनी धीमी कि मुझे लगा कि ये कमरे के अंदर से नहीं, किसी पुराने कमरे से आ रही है।

"भाई का हिसाब…" पापा ने कहा।

हम सबने अंदर देखा।

पापा पलंग पर अधलेटे थे। उनकी आँखें आधी बंद थीं, पर वो जाग रहे थे। उनका एक हाथ काजल के हाथ में था और दूसरा चादर पर रखा था, जिसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे चादर की सिलाई को छू रही थीं।

"भाई का हिसाब सबसे भारी होता है।" पापा ने कहा, और बोलते वक़्त उनकी साँस बीच में रुकी। "क्योंकि उसमें पैसा नहीं जुड़ता।"

उन्होंने आँखें खोलीं।

"उसमें यादें जुड़ती हैं।" उन्होंने कहा। "और यादें… यादें तौलने में नहीं आतीं।"

याकूब ने पलंग की तरफ़ देखा।

"ये शंकर है?" उसने पूछा।

उस्ताद ने सिर हिलाया।

"शंकर यादव।" उन्होंने कहा। "जगदीश का बेटा।"

याकूब ने पापा को देखा। फिर उसने धीरे से लाठी टिकाई और अपना सिर थोड़ा झुकाया—वो झुकाव जो बड़े लोग छोटे को देते हैं, या जो एक आदमी दूसरे आदमी के दर्द के सामने देता है।

"तेरे बाप ने मेरे लिए एक बार दो रुपये दिए थे।" याकूब ने कहा। "उस रात। जब मैं दुकान से निकला था। वो खुद उस वक़्त जवान था। उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा कि भाई, रास्ता लंबा है, कुछ खा ले।"

वो रुक गया।

"मैंने वो पैसे नहीं खाए।" उसने कहा। "मैंने उन्हें संदूक में रख लिया।"

डॉक्टर इसरानी उस वक़्त अपने कमरे से बाहर आए।

उनके हाथ में उनका पुराना स्टेथोस्कोप था, जिसकी रबर की नली पर टेप लिपटा हुआ था। उन्होंने गलियारे में खड़े लोगों को देखा—मैं, उस्ताद, याकूब, काजल दरवाज़े पर, टिंकू मेज़ के पास, और पीछे दीवार के सहारे खड़े नदीम को।

"ये अस्पताल है।" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो साठ साल की डॉक्टरी के बाद आती है। "यहाँ लोग मरने से बचने आते हैं, लड़ने नहीं।"

उन्होंने याकूब की तरफ़ देखा।

"तुम बैठे हो, यह ठीक है। पर तुम्हारी साँस में आवाज़ है। तुम्हें जाँच की ज़रूरत है।"

याकूब ने हाथ उठाया।

"मैं यहाँ इलाज के लिए नहीं आया।"

"तुम यहाँ किस लिए आए हो, वो मुझे नहीं पता।" इसरानी ने कहा। "पर मेरे अस्पताल में जो भी आता है, वो पहले मरीज़ होता है, फिर कुछ और।"

फिर उन्होंने उस्ताद की तरफ़ देखा।

"अली, तुम मेरे यहाँ पहले भी आए हो। तब तुम इस तरह खड़े नहीं थे।"

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।

इसरानी ने अपना स्टेथोस्कोप जेब में रखा।

"मैं तुम दोनों को बाहर भेज रहा हूँ।" उन्होंने कहा। "अस्पताल के बाहर, गली में, जहाँ तुम्हारा झगड़ा किसी मरीज़ की नींद न तोड़े।"

मैंने आगे कदम रखा।

"डॉक्टर साहब।" मैंने कहा।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"ये झगड़ा बाहर नहीं जाएगा।"

"बेटा—"

"ये झगड़ा अस्पताल से बाहर भी नहीं जाएगा।" मैंने कहा। "क्योंकि ये झगड़ा किसी कमरे का नहीं है। ये इस गली का है। और ये सिर्फ़ यहीं खत्म होगा—जहाँ पापा लेटे हैं, जहाँ काजल खड़ी है, जहाँ ये दोनों एक-दूसरे को देख सकते हैं।"

मैंने दोनों भाइयों की तरफ़ देखा।

"मैंने पिछले कुछ दिनों में बहुत अंगूठे देखे हैं।" मैंने कहा। "किसी ने डर के मारे लगाए, किसी ने लालच में, किसी ने इसलिए कि उसके बच्चे का इलाज चल रहा था, किसी ने इसलिए कि उसकी दुकान बच जाए।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।

"और हर बार वो अंगूठा एक रिश्ता तोड़कर गया।" मैंने कहा। "पचास साल पुराना अंगूठा भी वही कर रहा है, आज भी। वो अभी भी इन दोनों के बीच खड़ा है। और मुझे नहीं लगता कि वो अकेले जाएगा।"

मैंने अपनी जेब पर हाथ रखा।

"इसे यहीं खत्म करना पड़ेगा।"

याकूब ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू कौन है, बेटा?" उसने पूछा। "जो मेरे और मेरे भाई के बीच में खड़ा है?"

मैंने कहा—

"मैं वो हूँ जिसके पास वो घंटी है, जिसका हिस्सा आप माँगने आए हैं।"

याकूब एक पल चुप रहा।

फिर वो धीरे से हँसा। वो हँसी भी खाँसी जैसी थी।

"जगदीश के खून में यही बात थी।" उसने कहा। "सीधा मुँह पर।"

फिर उसने अपना थैला उठाया।

और उसने उसे खोला।

अंदर से पहले एक पुराना कपड़ा निकला, जिसे उसने गोद में रखा। फिर एक छोटा डिब्बा, जिसका ढक्कन उतर गया था। फिर एक पुरानी किताब जैसी चीज़, जिसकी जिल्द टूट रही थी। और फिर—सबसे नीचे से—एक काग़ज़।

नहीं, काग़ज़ नहीं।

एक तस्वीर।

उसने उसे दोनों हाथों से पकड़कर बाहर निकाला और अपनी गोद पर रख दिया।

मैं उसके पास गया और झुककर देखा।

काली-सफ़ेद तस्वीर थी। कोने मुड़े हुए, किनारों पर पानी के निशान, और बीच में एक सीधी सी लकीर, जैसे तस्वीर को कभी बीच से मोड़कर रखा गया हो और बाद में फिर खोल दिया गया हो।

तस्वीर में दो जवान लड़के खड़े थे।

दोनों के बाल घने, दोनों के चेहरे पर वो उम्र थी जिसमें आदमी अपने आप पर यक़ीन करता है। एक के हाथ में औज़ार था—छोटा हथौड़ा जैसा कुछ। दूसरे के गले में नापने का फीता लटक रहा था, जैसे अभी-अभी मशीन से उठा हो।

और दोनों के बीच में, तस्वीर के ठीक बीच में, एक कील से लटकी हुई…

…घंटी।

मेरी घंटी।

मैंने उसे पहचाना। फूल का निशान, घुमावदार किनारा, वो छोटा सा डंडा जो आज भी मेरे साइकिल के हैंडल पर है।

मेरी जेब में घंटी ज़ोर से बजी।

एक बार।

और मैंने महसूस किया कि मेरी जेब गरम हो रही है, जैसे घंटी अंदर से धक्का दे रही हो।

"ये…" मैंने कहा। "ये वही घंटी है।"

"हाँ।" याकूब ने कहा।

उसने उँगली तस्वीर पर रखी।

"ये मैं हूँ।" उसने बाएँ वाले लड़के पर उँगली रखी। "और ये अली है।"

उस्ताद ने तस्वीर की तरफ़ देखा और उनका चेहरा टूट गया।

"ये मेरी दुकान के पीछे वाले कमरे की तस्वीर है।" उन्होंने धीरे से कहा। "ये दीवार… ये वही दीवार है।"

"हाँ।" याकूब ने कहा। "वही दीवार।"

उसने तस्वीर को पलट दिया।

पीछे की तरफ़, पुरानी नीली स्याही से, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में कुछ लिखा था। स्याही फीकी पड़ चुकी थी, कुछ अक्षर घिस गए थे, पर शब्द पढ़े जा सकते थे।

वो चार शब्द थे।

आधी मेरी, आधी तेरी।

मैंने उसे पढ़ा।

फिर मैंने दोबारा पढ़ा।

गलियारे में कोई नहीं बोला।

उस्ताद ने अपना हाथ बढ़ाया, जैसे तस्वीर छूना चाहते हों, पर उन्होंने उसे नहीं छुआ। उनका हाथ हवा में ही रुक गया।

"ये लिखाई…" उन्होंने कहा।

उनकी आवाज़ अचानक बहुत धीमी हो गई।

उन्होंने तस्वीर के पीछे झुककर देखा। उन्होंने अपनी उँगली उन अक्षरों के पास ले जाकर रखी, बिना छुए।

फिर उन्होंने अपना सिर उठाया और याकूब की तरफ़ देखा।

और उनके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने उनके चेहरे पर कभी नहीं देखा था।

डर।

डर, जो किसी बीमारी का नहीं था। डर, जो किसी और चीज़ का था।

"याकूब।" उस्ताद ने कहा।

"क्या?"

"ये लिखाई मेरी नहीं है।"

याकूब ने कुछ कहना चाहा, पर उस्ताद ने उसे रोक दिया।

"और ये तेरी भी नहीं है।"

याकूब ने उनकी तरफ़ देखा।

फिर उसने तस्वीर की तरफ़ देखा।

फिर उसने उसे अपने हाथ में उठाया, नज़दीक लाया, और उन चार शब्दों को देखा, जैसे वो अपनी पूरी ज़िंदगी में पहली बार उन्हें पढ़ रहा हो।

"अली।" उसने कहा, और उसकी आवाज़ फट गई। "अगर ये मेरी लिखाई नहीं है, और तेरी भी नहीं…"

वो रुक गया।

उसके हाथ काँपने लगे, और तस्वीर उसके हाथ में हिलने लगी, और मुझे लगा कि वो अभी उसके हाथ से गिर जाएगी।

उस्ताद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

दोनों भाइयों के हाथ एक ही तस्वीर पर थे।

"…तो ये किसकी है?" याकूब ने पूछा।

मेरी जेब में घंटी फिर बजी।

इस बार दो बार।

और मैंने उसे साफ़ सुना।

"आधी मेरी, आधी तेरी।" घंटी ने कहा।

मैंने उसे धीरे से निकाला और हथेली पर रखा।

वो गरम थी।

"लेकिन तीसरा कौन है?" मैंने उससे धीरे से पूछा। "तीन भाई थे। तीन में से एक आ गया, तूने कहा। तो बाकी दो कौन हैं?"

घंटी एक पल चुप रही।

गलियारे की बत्ती फिर झपकी।

"गिनती अभी पूरी नहीं।" घंटी ने कहा।

और चुप हो गई।

मैंने तस्वीर को देखा।

दो जवान लड़के। एक घंटी। और चार शब्द, जिन्हें किसी तीसरे हाथ ने लिखा था।

और मुझे लगा कि उस गलियारे की हवा अब पहले जैसी नहीं है।

याकूब ने तस्वीर अपने सीने से लगा ली।

उस्ताद ने उसका हाथ नहीं छोड़ा।

॥

उस्ताद ने याकूब का हाथ नहीं छोड़ा। उनकी उँगलियाँ याकूब की कलाई पर ऐसी बैठी थीं, जैसे कोई पुराना ताला किसी पुरानी कुंडी को पकड़ ले — न खुद खुलता है, न सामने वाले को जाने देता है।

गलियारे की बत्ती फिर झपकी। दूर कहीं बाल्टी गिरने की आवाज़ आई, फिर किसी ने धीरे से कुछ कहा और चुप हो गया। अस्पताल की हवा में दवा, फिनाइल और पुराने काग़ज़ों की गंध मिली हुई थी।

मैंने तस्वीर देखी। दो जवान लड़के, बीच में घंटी, और पीछे चार शब्द — आधी मेरी, आधी तेरी।

मेरी जेब में घंटी अब भी गरम थी।

उस्ताद ने बहुत देर बाद अपना हाथ छोड़ा। उन्होंने याकूब की तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने दीवार की तरफ़ देखा, जैसे दीवार पर कुछ लिखा हो और वो उसे पढ़ रहे हों।

फिर उन्होंने कहा, "ये जगह नहीं है।"

"क्या?" याकूब ने कहा।

"ये जगह इस बात के लिए नहीं है।" उस्ताद ने कहा। "अस्पताल है। नीचे शंकर भाई लेटे हैं। ऊपर मरीज़ हैं। यहाँ हमारी पुरानी बात नहीं उठेगी।"

याकूब ने गला साफ़ किया। "तो कहाँ उठेगी?"

उस्ताद ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा।

"मेरे साथ चल।"

हम लोग अस्पताल के गेट से बाहर निकले।

धूप अब ढल रही थी और गली की मिट्टी में वो पीली रोशनी फैल रही थी, जो हर शाम को चीज़ों को पुरानी और अच्छी दिखाने लगती है। पीपल के नीचे चबूतरी खाली थी। किसी ने चबूतरी पर एक रोटी रख दी थी और दो कौवे उसके ऊपर बैठे थे।

टिंकू मेरे पीछे-पीछे चल रहा था। उसने दो बार मुझे खींचा और दोनों बार मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा, "चुप, चल।"

तीसरी बार उसने खुद ही कहा, "उस्ताद, मैं चुप हूँ। पर मैं अंदर आऊँगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तू अंदर नहीं आएगा," मैंने कहा।

"मैं पानी रखूँगा," उसने कहा। "बाहर। दरवाज़े पर। अगर कोई रोए तो पानी दे दूँगा।"

मेरे अंदर कुछ हिला।

"ठीक है," मैंने कहा। "पानी लेकर आ।"

उस्ताद की पुरानी दुकान पीछे की गली में थी।

नीला दरवाज़ा। रंग उतरा हुआ। ऊपर की तरफ़ लकड़ी फूल गई थी और नीचे से पानी चढ़कर उसने एक नक्शा सा बना दिया था। दरवाज़े पर ज़ंग लगा ताला लटक रहा था।

उस्ताद ने जेब से चाबी निकाली। उनके हाथ काँप रहे थे। चाबी दो बार छेद से फिसल गई।

मैंने आगे बढ़कर कहा, "मैं खोल दूँ?"

"ना," उन्होंने कहा। "ये ताला मैं खुद खोलूँगा। ये मेरा पचास साल से लगा हुआ है। इसे मैंने लगाया था।"

तीसरी बार में चाबी घूमी।

ताला खुला, और जैसे ही दरवाज़ा खिसका, अंदर से एक हवा बाहर आई।

और वो हवा लंबी थी।

उसमें पुराने कपड़े की गंध थी, मशीन के तेल की गंध थी, और कुछ ऐसी गंध थी जो सिर्फ़ बंद कमरों में रखी चीज़ों से आती है — जैसे घर छोड़कर गए किसी आदमी की कमीज़ में।

टिंकू ने पीछे से कहा, "इसमें हवा नहीं है। इसमें… इसमें साँस नहीं ले रही हवा है।"

"चुप," मैंने कहा, पर मेरी आवाज़ भी धीमी थी।

अंदर घुसा।

कमरा छोटा था। चार-पाँच कदम में पूरा। बाईं तरफ़ दीवार से सटी सिलाई मशीन थी, सफ़ेद कपड़े से ढकी हुई। सामने वाले कोने में पुराना ट्रंक खुला पड़ा था। ट्रंक के पीछे किसी चीज़ पर कपड़ा डाला हुआ था — लंबा, ऊँचा। मुझे पता था वो क्या था। वो वही काली साइकिल थी जिसके हैंडल पर खाली लकड़ी का ब्रैकेट था।

दीवारों पर कपड़ों के रंग के धब्बे थे। एक तरफ़ टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में किसी की नाप लिखी थी। खिड़की बंद थी और उसकी जाली पर धूल की ऐसी परत जमी थी, जैसे कोई सालों से छू नहीं रहा हो।

और मशीन से आवाज़ आ रही थी।

टिक।

टिक।

टिक।

मैं हैरान हुआ। मशीन बंद थी, कपड़ा ढका था, कोई बैठा नहीं था। फिर भी आवाज़ आ रही थी — धीमी, बराबर, जैसे कोई धागे को नीचे खींच रहा हो।

टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ी।

"उसने… उसने मुझे आवाज़ दी," वो फुसफुसाया।

"मशीन बंद है," मैंने कहा।

"तो फिर?"

उस्ताद ने कपड़ा उठाकर एक तरफ़ किया। मशीन वही पुरानी, हाथ से चलाने वाली, पीतल के खूँटों वाली थी। उस्ताद ने उसके चक्के को हल्का सा छुआ, और वो एक चौथाई घूमा, फिर रुका।

"ये पचास साल से जवाब नहीं दे रही," उन्होंने कहा। "फिर अब क्या हुआ है?"

घंटी ने मेरी जेब में एक बार बजकर कहा, "दरवाज़ा बंद कर।"

मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया।

उस्ताद मशीन के पास रखी लकड़ी की छोटी स्टूल पर बैठ गए — वही स्टूल जिस पर वो रोज़ अपनी दुकान में बैठते थे। याकूब ने कमरे में एक चक्कर लगाया, जैसे जगह नाप रहा हो, फिर ट्रंक के किनारे पर बैठ गया।

टिंकू दरवाज़े के पास फ़र्श पर बैठ गया, उसने अपनी पानी की बोतल सामने रख दी और अपने दोनों घुटनों को पकड़ लिया।

और मैं? मैं खड़ा रहा। कुछ चीज़ें खड़े होकर ही सुननी पड़ती हैं।

उस्ताद ने मशीन को ढकने वाला कपड़ा अपनी जाँघ पर रखा और कुछ देर चुप रहे। फिर बोले।

"पचास साल पहले," उन्होंने कहा, "इस गली में दो भाई थे।" उन्होंने याकूब की तरफ़ देखा। "और एक घंटी थी।"

याकूब ने कुछ नहीं कहा।

"उस वक़्त ये घंटी किसी की दुकान पर नहीं टँगी थी। ये हम तीनों के हाथ से बनी थी।"

"तीन?" मैंने कहा।

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखें एक पल के लिए रुकीं।

"तीन," उन्होंने कहा। "तीसरे का नाम तू अभी मत पूछ। मैं उसका नाम नहीं ले सकता। और ये याकूब भी नहीं ले सकता।"

मैंने याकूब की तरफ़ देखा। उसने नज़र नीचे कर ली। वो नाम न लेने की हाँ में सिर हिला रहा था — हिला नहीं रहा था, वो जानता था जो उस्ताद जानते थे, और दोनों एक ही दरवाज़े के सामने चुप बैठे थे।

"ठीक है," मैंने कहा। "नाम नहीं। काम बताइए।"

उस्ताद की आवाज़ बदली। वो धीमी हो गई, पर साफ़ हो गई — जैसे कोई पुरानी फ़िल्म चलने लगे।

"उस वक़्त इस घंटी में जो था," उन्होंने कहा, "वो आज जैसा नहीं था। छोटा था। छोटा, धीमा, और ईमानदार। हम दोनों मिलकर इसे बजाते थे और जो टूटा होता था, वो जुड़ जाता था।"

"क्या-क्या जुड़ता था?" टिंकू ने पूछा।

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।

"छोटी चीज़ें, बेटा," उन्होंने कहा। "किसी की चप्पल, किसी का ताला। एक बार एक औरत का चूल्हा जुड़ गया था — उसका चूल्हा तीन दिन से नहीं जल रहा था और उसके बच्चे भूखे थे। पता नहीं क्या टूटा था, पर जुड़ गया।"

"वो कैसे —"

"इसलिए जुड़ा," उस्ताद ने कहा, "कि उस औरत ने अपनी ननद को माफ़ कर दिया था। सच में माफ़ किया था। बोलकर नहीं, अंदर से। और घंटी ने बदले में तीन अंक दिए थे। तीन। आज तेरे पास जो है, उसके सामने तीन कुछ भी नहीं है। पर उस वक़्त हम दोनों उन तीन अंकों को रात भर देखते रहते थे, जैसे कोई खज़ाना मिल गया हो।"

मैं मुस्कुराया।

"और क्या?" मैंने कहा।

"और उसके अगले दिन एक बूढ़े का छाता जुड़ गया। उसके बाद एक स्कूल का ताला। हम दोनों सोचते थे कि हम दुनिया बदल रहे हैं।" उन्होंने एक गहरी साँस ली। "दुनिया नहीं बदली। हम दो बदले।"

कमरा चुप हुआ।

मशीन ने टिक किया।

याकूब ने ट्रंक का ढक्कन उठाया और उसके अंदर से एक छोटा डिब्बा निकाला। उसका ढक्कन ढीला था। उसने उसे खोला, अंदर से कुछ निकाला और अपनी हथेली पर रखकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

दो रुपये।

पुराने, घिसे, धूल से भरे दो सिक्के।

"ये तेरे दादा जगदीश ने मुझे मज़दूरी में दिए थे," याकूब ने कहा। "मैंने खर्च नहीं किए। ब्याह में लगाने का मन था, फिर सोचा रख लूँ। पचास साल रख लिए।"

मेरे गले में कुछ अटका।

उस्ताद ने उन सिक्कों को देखा और उनकी आँखें भर आईं।

"ये तो तूने आज तक नहीं बताया," उन्होंने कहा।

"क्यों बताता?" याकूब ने कहा। "तूने पूछा ही नहीं। तूने कब पूछा कि याकूब, तेरे पास क्या रखा है?"

और उसके बाद वो बात आई जो उस्ताद कहने आए थे।

उस्ताद ने सिक्के याकूब की हथेली पर ही छोड़ दिए और मशीन की तरफ़ देखकर बोले।

"उस साल एक औरत आई थी। गली में सब उसे बड़ी बी कहते थे। उसका आदमी मर गया था और उसके पास दो काग़ज़ थे — एक दुकान का, एक उसके देवर के कर्ज़ का।"

उन्होंने रुककर कमरे की हवा में साँस ली।

"वो आई और बोली, अली भाई, तुम्हारे भाई ने मेरे काग़ज़ बदल दिए।"

कमरा चुप हुआ। टिंकू की पकड़ अपने घुटनों पर कस गई।

"उसने ये नहीं कहा कि याकूब ने कुछ चुराया," उस्ताद ने कहा। "उसने बस ये कहा कि मेरे काग़ज़ बदल गए और जब मैंने इन्हें पढ़ने को दिया था, तब इन्होंने पढ़े थे। उसकी आँखों में ऐसा डर था, अंकुश। ऐसा डर।"

"और आपने उसका यकीन कर लिया," मैंने कहा।

"मैंने पूछा नहीं," उस्ताद ने कहा। "मैंने पूछा नहीं, याकूब। यही मेरी सबसे बड़ी गलती है। मैं उस औरत का यकीन करके तेरे पास आया, यह नहीं सोचा कि तू पहले क्या कहेगा।"

याकूब ने सिक्के डिब्बे में वापस रखे। उसके हाथ काँप रहे थे।

"और मैंने क्या किया?" याकूब ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो पचास साल से दबी हुई थी और अब दबाने से बाहर आ रही थी। "मैंने क्या किया, अली? मैंने कहा था — भाई, मैंने उसके काग़ज़ नहीं छुए। मैंने कहा था, तू उससे पूछ, कि उसने किसके सामने काग़ज़ खोले थे। मैंने कहा था, उस दिन उसके घर पर कोई और भी था।"

"मुझे याद है," उस्ताद ने कहा।

"नहीं, तुझे याद नहीं है," याकूब ने कहा। "तूने मेरी बात सुनी और सुनकर भी नहीं सुनी। तू उस औरत के आँसुओं में इतना डूब गया था कि मेरी आवाज़ तक नहीं पहुँची। और फिर तूने क्या किया?"

उस्ताद चुप रहे।

"बता," याकूब ने कहा। "या मैं बता दूँ?"

"बता," उस्ताद ने कहा, बहुत धीमी आवाज़ में।

याकूब उठ खड़ा हुआ।

वो ट्रंक के पास से उठा, कमरे में दो कदम चला, फिर रुक गया। उसकी लाठी दीवार से टिकी थी। उसने उसे नहीं उठाया।

"उसके बाद," उसने कहा, "घंटी अलग हो गई। और मेरा हिस्सा — आधी घंटी — जो मेरे हाथ में थी, वो गई।"

"वो तूने दी थी," उस्ताद ने कहा।

"मैंने दी थी?" याकूब ने कहा। "मैंने दी थी?"

"तूने दी थी," उस्ताद ने कहा। "तू गुस्से में था। तूने उसे उसी आदमी को दिया जिसके हाथ में काली अंगूठी थी। मैंने देखा था। मैंने तुझे रोका था — तूने मेरी बात नहीं सुनी।"

"मैंने किसी को कुछ नहीं दिया," याकूब ने कहा। "मैं उस रात घर से निकला था और किसी को कुछ नहीं दिया।"

"तो फिर उसके हाथ में कहाँ से आई?" उस्ताद ने कहा, और इस बार उनकी आवाज़ ऊँची हो गई। "मुझे बता, याकूब। तेरी आधी घंटी उस आदमी के पास कैसे पहुँची?"

याकूब ने कुछ कहा, पर शब्द नहीं बने।

"क्योंकि मैंने बेची नहीं," उस्ताद ने कहा। "मुझ पर इल्ज़ाम है कि मैंने तेरा हिस्सा बेच दिया। मैंने नहीं बेचा। मैंने एक चीज़ नहीं बेची। मैंने दुकान नहीं बेची, मशीन नहीं बेची, माँ की पेटी नहीं बेची, और तेरा हिस्सा तो मैं कभी नहीं बेच सकता, क्योंकि वो मेरा था ही नहीं।"

याकूब ने उनकी तरफ़ देखा।

फिर उसने धीरे से कहा, "बेचा नहीं… तो किसी को दिया क्यों?"

कमरे में हवा रुक गई।

मशीन ने टिक किया।

उस्ताद ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"ये सवाल तूने पचास साल पहले पूछा होता," उन्होंने कहा, "तो बात और होती।"

"मैंने पूछा था," याकूब ने कहा। "तूने सुना नहीं था।"

मैं बीच में आया।

मुझे नहीं पता कि मुझमें वो हिम्मत कहाँ से आई, पर मैं दोनों के बीच खड़ा हो गया — बिल्कुल वैसे जैसे गली में दो आदमी आमने-सामने होते हैं और कोई बीच में आ जाता है।

"रुकिए," मैंने कहा।

दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

"दोनों की बातें सच जैसी लग रही हैं," मैंने कहा। "उस्ताद कहते हैं उन्होंने कुछ नहीं बेचा और सच में नहीं बेचा। याकूब चाचा कहते हैं उन्होंने कुछ किसी को नहीं दिया और सच में नहीं दिया।"

मैंने एक पल रुककर साँस ली।

"पर सच जैसा लगना सच होना नहीं होता।"

याकूब ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे मैंने उसके हाथ से कुछ छीन लिया हो।

"मैंने यह अपनी दुकान पर सीखा है," मैंने कहा। "मेरे पास रोज़ ऐसे लोग आते हैं जो कहते हैं — मेरी गाड़ी की आवाज़ ऐसी है। और जब मैं खोलकर देखता हूँ, तो आवाज़ किसी और चीज़ से आ रही होती है। बोलने वाला झूठ नहीं बोलता, वो बस जानता नहीं कि आवाज़ कहाँ से आ रही है।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।

"तो तेरा मतलब क्या है?" उन्होंने कहा।

"मेरा मतलब है," मैंने कहा, "कि दोनों सच बोल रहे हैं और दोनों के हाथ में एक ही कहानी का आधा टुकड़ा है। और बाकी आधा — जो तीसरे के पास था।"

कमरा फिर चुप हुआ।

और इस चुप्पी में मशीन का टिक पहले से तेज़ लगा।

याकूब ने मुँह खोला, कुछ कहने के लिए — और फिर उसके अंदर से एक आवाज़ निकली जो शब्द नहीं थी।

खाँसी।

पहले एक बार। फिर दो बार। फिर ऐसी कि उसका पूरा शरीर झुक गया और उसने अपनी छाती को दोनों हाथों से पकड़ लिया। उसने ट्रंक का किनारा पकड़ा, फिर छोड़ दिया, और फिर घुटनों के बल कमरे के बीच में बैठ गया।

टिंकू उछलकर उठा। "पानी —"

"ले आ," मैंने कहा।

टिंकू दरवाज़े की तरफ़ भागा।

उस्ताद उठे और याकूब के पास गए।

"याकूब," उन्होंने कहा। "याकूब, मेरी तरफ़ देख।"

मैंने याकूब की मुट्ठी पकड़ी। उसकी उँगलियाँ कसी हुई थीं। मैंने उन्हें धीरे से खोला।

उसकी हथेली पर छोटा सा कट था — या कट नहीं था। पता नहीं क्या था। एक पतली, लाल लकीर उसकी हथेली के बीच से निकली हुई थी, जैसे किसी ने सुई से खींच दी हो।

टिंकू पानी लेकर आया।

"गिलास पकड़," मैंने कहा।

याकूब ने काँपते हाथ से गिलास लिया। आधा पानी पीया, और आधा उसकी गोद में गिर गया।

उस्ताद उसके बगल में घुटनों के बल बैठ गए और उसके कंधे पर हाथ रख दिया।

"तू ये कब से छिपा रहा है?" उन्होंने कहा।

याकूब ने हाँफते हुए कहा, "उस दिन से।"

"कौन सा दिन?"

याकूब ने कोई जवाब नहीं दिया।

उस्ताद ने याकूब को उठाकर ट्रंक पर बैठा दिया। फिर उन्होंने मशीन के पास की अलमारी से एक फटा तौलिया निकाला और याकूब के हाथ पर लपेट दिया।

मैं वहीं बैठ गया। मेरे घुटने फ़र्श पर थे और हवा में मशीन का टिक-टिक था और कमरे में कपड़ों की पुरानी गंध थी।

याकूब ने बहुत देर तक साँस ली।

फिर उसने अपना सिर उठाया।

उसके होठों के किनारे पर पानी था और उसकी आँखें लाल थीं। वो उस्ताद की तरफ़ देख रहा था, पर ऐसे देख रहा था जैसे कोई पाँच दशक पहले की गली में खड़ा हो।

मेरी जेब में घंटी एक बार बजी।

बहुत हल्की।

जैसे किसी ने बहुत दूर से किसी को याद किया हो।

याकूब ने अपनी एक उँगली उठाई।

"अली," उसने कहा।

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।

"मुझे घंटी नहीं चाहिए।" उसकी आवाज़ टूट रही थी। हर शब्द के बीच में साँस थी, और हर साँस में काँपन। "घंटी रख। हिस्सा रख। दुकान रख। सब रख। काग़ज़ रख।"

उसने उस्ताद की आँखों में देखा।

"मुझे यह बता —" और उसकी आवाज़ फट गई। "उस दिन तूने मेरी बात क्यों नहीं मानी?"

॥

"उस दिन तूने मेरी बात क्यों नहीं मानी?"

यह सवाल कमरे में गिरा और कमरे ने उसे निगल नहीं लिया। वो वहीं पड़ा रहा, फ़र्श की धूल पर, मशीन के टिक-टिक के बीच, जैसे कोई भारी चीज़ गिरी हो और कोई उसे उठाने को तैयार न हो।

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उनकी नज़र याकूब के हाथ पर थी — उस फटे तौलिए पर, जो उन्होंने खुद लपेटा था और जिसके किनारे से खून की पतली लकीर बाहर आ रही थी, जैसे तौलिया भी इस सवाल का जवाब नहीं जानता।

मेरी जेब में घंटी बजी। हल्की, एक बार। जैसे किसी ने दूर से किसी का नाम लिया हो और फिर भूल गया हो।

मैं उठा।

"यह जवाब मेरा नहीं है," मैंने कहा। "और मैं इस जवाब को तेरे और मेरे बीच नहीं रखूँगा।"

याकूब ने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था और गुस्सा भी, और दोनों एक ही जगह बैठे थे, जैसे दो आदमी एक ही चौकी पर।

मैं दरवाज़े तक गया और शटर को एक हाथ जितना ऊपर किया। बाहर सुबह की धूप खड़ी थी, पीली और ठंडी, और उसी धूप में टिंकू गिलास लिए खड़ा था, और उसके पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — चारों एक-दूसरे के पीछे छिपकर ऐसे झाँक रहे थे जैसे यहाँ कोई सर्कस चल रहा हो।

"टिंकू," मैंने कहा।

"हाँ उस्ताद।"

"दुकान के पीछे से दो चौकियाँ उठा के ला। वो पुरानी लकड़ी वाली। जिनमें से एक की टाँग हिलती है।"

"दो चौकी?" उसने कहा। "किसके लिए?"

"बैठने के लिए," मैंने कहा। "आज कोई खड़ा नहीं बोलेगा।"

टिंकू गिलास मेरे हाथ में देकर भागा और भागते-भागते रुका और बोला, "उस्ताद, मैं एक चीज़ बेच सकता हूँ?"

"क्या?"

"एक सच की चाय," उसने कहा, बड़ी गंभीर शक्ल बनाकर। "दो रुपये कप। जो सच बोलेगा उसके लिए मुफ़्त।"

"तेरा कान खींचूँगा," सानिया ने कहा और सच में कान खींच लिया।

"अरे अरे अरे —"

"चल हट," सानिया ने कहा। "उस्ताद के पास काम है।"

मैंने शटर आधा ही खुला रहने दिया। मैंने सोचा — अगर यह सच आज बाहर आने वाला है, तो इसे गली सुने। सच सुनने से कोई छोटा नहीं होता।

मैं अंदर लौटा और गिलास याकूब की तरफ़ बढ़ाया। उसने नहीं लिया। उसने बस उस्ताद को देखा।

टिंकू दो चौकियाँ ले आया। एक में से खट-खट आवाज़ आ रही थी। मैंने अपना रूमाल निकाला और दोनों चौकियों पर धूल पोंछी, फिर उन्हें कमरे के बीच आमने-सामने रखा — बस इतनी दूर कि दोनों के घुटने एक-दूसरे को छू जाएँ, अगर कोई आगे झुके।

"उस्ताद," मैंने कहा, "यहाँ बैठिए।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चश्मे के पीछे कुछ ऐसा था जो मैंने पचास साल में नहीं देखा — न घबराहट, न गुस्सा। एक तरह की थकान, जैसे कोई बहुत लंबी सीढ़ी चढ़कर ऊपर पहुँचा हो और देखे कि दरवाज़ा बंद है।

"तू जानता है तू क्या कर रहा है?" उन्होंने कहा।

"नहीं," मैंने सच कहा। "मुझे नहीं पता। पर मुझे यह पता है कि अगर आज यह सवाल यहाँ नहीं बैठा, तो यह सवाल इस गली में कभी नहीं बैठेगा। और फिर यही सवाल हम सबको किसी और के मुँह से सुनना पड़ेगा। उस आदमी के मुँह से, जो कल सुबह सात बजे मशीन लेकर आएगा।"

उस्ताद ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर वे आगे बढ़े और एक चौकी पर बैठ गए। जब वे बैठे, तो चौकी की वो हिलती टाँग बोली — खट। और कमरे में जैसे कोई हिसाब बंद हुआ।

याकूब ने दूसरी चौकी पर बैठने से पहले उस्ताद को देखा। फिर वह बैठ गया। उसने अपनी लाठी चौकी के सहारे रखी और थैला अपने पैरों के पास रख दिया।

मैंने ट्रंक का ढक्कन उठाया और उस पर नीचे बैठ गया — उन दोनों से नीचे। मैंने यह जान-बूझकर किया। आज मैं जज नहीं था। आज मैं सिर्फ़ वो आदमी था जिसने दुकान खोली थी।

मेरी जेब में घंटी फिर बजी। इस बार दो बार। फिर आवाज़ आई, बहुत छोटी —

"काग़ज़ नहीं।"

"नहीं," मैंने धीरे से कहा। "आज काग़ज़ नहीं।"

"बोल।"

मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को उँगलियों के बीच दबा लिया। वो गरम थी। और मैंने उसे कसकर पकड़ा, जैसे कोई नाव में बैठकर रस्सी पकड़ता है।

"मेरी एक बात पहले," मैंने कहा। "आज इस कमरे में कोई काग़ज़ नहीं है, कोई वकील नहीं है, कोई मुहर नहीं है, कोई तारीख़ नहीं है। आज यहाँ दो चौकी हैं, दो भाई हैं, और एक सच है। जिसके पास सच है वो बोले। जिसके पास सच नहीं है, वो चुप बैठे — पर चुप्पी भी सच है, यह मत भूलिए।"

"और तू?" याकूब ने कहा। उसकी आवाज़ रूखी थी, जैसे सुबह का गला। "तू क्या बोलेगा?"

"मैं वो बोलूँगा जो मुझे पता है," मैंने कहा। "और वो कम है। इसलिए ज़्यादा सुनूँगा।"

उस्ताद ने अपना चश्मा उतारा। उन्होंने उसे अपनी कमीज़ के पल्लू से पोंछा और फिर से पहना। यह काम उन्होंने बहुत धीरे किया, जैसे वक़्त खरीद रहे हों।

"पचास साल में पहली बार," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ सामान्य से भारी थी। "मैं किसी से सच माँग रहा हूँ।"

उन्होंने अपनी जेब से कुछ निकाला — छोटी सी, मैली, पुरानी अँगूठी। पीतल की, जिस पर फूल खुदा था, पर फूल की पंखुड़ियाँ घिस गई थीं। उन्होंने उसे हथेली पर रखा और देर तक देखा।

"यह मेरी माँ की अँगूठी है," उन्होंने कहा। "जिस रात यह घंटी टूटी, उस रात के बाद मैंने इसे कभी नहीं पहना। मैंने इसे एक डिब्बे में रख दिया था, एक कपड़े में लपेटकर, और फिर उस डिब्बे को मैंने दोबारा नहीं खोला। पचास साल। पचास साल तक मैंने इस अँगूठी से बात नहीं की।"

उन्होंने अँगूठी दोनों चौकियों के बीच, फ़र्श पर रख दी।

"आज सुबह मैंने उस डिब्बे को खोला," उन्होंने कहा। "क्योंकि तेरा सवाल आया और मेरे पास इसके सिवा कोई जवाब नहीं था।"

याकूब ने अँगूठी की तरफ़ देखा और फिर उसने अपना मुँह फेर लिया।

"तेरे पास जवाब है," उसने कहा। "तू बस बोलता नहीं।"

"हाँ," उस्ताद ने कहा। "वो सच है।"

कमरा चुप हुआ।

बाहर शटर के पीछे फुसफुसाहट हुई। सानिया की आवाज़ आई — "हट, तेरा सिर आ रहा है।" और चिंटू ने कहा — "मेरा सिर नहीं, मेरा कान है।" और गुड्डू ने कहा — "चुप करो, सुनाई नहीं देगा।"

मैं नहीं हँसा। पर अंदर कहीं मैं चाहता था कि यह हँसी बनी रहे। क्योंकि यह कमरा पिछले कुछ दिनों में बहुत भारी हो गया था।

उस्ताद ने अपने दोनों हाथ घुटनों पर रखे।

"मैंने तुझे ढूँढा था," उन्होंने कहा।

याकूब ने सिर उठाया।

"चार बार," उस्ताद ने कहा। "चार बार मैं तेरी गली के मोड़ तक आया। पहली बार उसी साल, जब तू वहाँ रहने लगा था। तेरी गली के मोड़ पर एक चरखे वाला बैठता था, उसकी दुकान के सामने मैं खड़ा रहा और मैंने सोचा कि आज बोल दूँगा। फिर मैंने सोचा कि क्या बोलूँगा। फिर मैंने सोचा कि अगर तूने पूछ लिया कि तूने बिना पूछे क्यों यकीन किया, तो मैं क्या कहूँगा। और मैं लौट आया।"

याकूब ने कुछ नहीं कहा।

"दूसरी बार बरसात में," उस्ताद ने कहा। "मैं तेरे दरवाज़े के सामने वाले नीम के नीचे खड़ा था। तेरा साया दरवाज़े पर दिखा। मैंने सोचा कि अब जाकर खटखटाऊँगा। फिर मैंने सोचा कि तू दरवाज़ा खोलेगा, मुझे देखेगा और कुछ नहीं कहेगा — और वो मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा। इसलिए मैं चला आया।"

"तीसरी बार?" याकूब ने कहा। उसकी आवाज़ में कुछ था जो काँटा नहीं था, बस थकान।

"तीसरी बार तेरे बेटे की शादी की खबर सुनी," उस्ताद ने कहा। "मैंने सोचा कि शादी में चला जाऊँ, भीड़ में खड़ा रहूँ, तुझे देख लूँ, और चुपचाप लौट आऊँ। मैं गया भी। मैंने गेट से झाँका। फिर तेरे भाई का बेटा बाहर आया और मुझे देखकर रुक गया। मैंने उससे कहा — मैं रास्ता भूल गया हूँ। और मैं लौट आया।"

"और चौथी बार?" याकूब ने कहा।

उस्ताद ने अपनी आँखें बंद कीं।

"चौथी बार मैं तेरे मोहल्ले से गुज़रा और मैंने तुझे दुकान पर बैठे देखा," उन्होंने कहा। "तू अपनी मशीन के नीचे झुका था। तेरे हाथ में एक पेंच था। मैं रुका। मैं खिड़की के पास खड़ा था और तू मुझे नहीं देख सका। मैंने देखा कि तेरे बाल सफ़ेद हो गए हैं और मेरे भी। और मैं सोचने लगा — अगर मैं आज भी नहीं बोला, तो फिर कब। और फिर मैं चला आया।"

कमरे में मशीन टिक कर रही थी। उसका टिक अब धीमा लग रहा था, जैसे वो भी सुन रही हो।

"तूने पहल नहीं की," याकूब ने कहा।

"नहीं की।"

"पचास साल में एक बार भी नहीं।"

"नहीं।"

"क्यों?"

उस्ताद ने अपनी अँगूठी की तरफ़ देखा। फिर उन्होंने कुछ ऐसा कहा जो मैंने उनके मुँह से कभी नहीं सुना था। उनकी आवाज़ धीमी थी और वो किसी इंसान से नहीं, अपने ही हाथों से बोल रहे थे।

"क्योंकि मुझे डर था," उन्होंने कहा। "यह नहीं कि तू माफ़ नहीं करेगा। मुझे यह डर था कि तू माफ़ कर देगा।"

याकूब का साँस रुका।

"अगर तू माफ़ कर देता," उस्ताद ने कहा, "तो सब हल्का हो जाता। और मैं उस हल्केपन के लायक नहीं था। मैं सालों से उस दिन को उठाए फिर रहा था। वो भारी था, पर वो मेरा था। मैं उसे खोना नहीं चाहता था, क्योंकि अगर मैं उसे खो देता तो मेरे पास उस दिन का कोई सबूत नहीं बचता — कि मैंने कुछ गलत किया था।"

मेरी जेब में घंटी बहुत धीरे बजी। जैसे किसी ने बहुत दूर, किसी दूसरे कमरे में, किसी दूसरे शहर में एक बार माथा टेका हो।

"उस्ताद," मैंने कहा।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"यह सच है।"

"तू कैसे जानता है?"

"क्योंकि मैं भी वही करता हूँ," मैंने कहा। "जब माँ अस्पताल में थीं और मुझे कोई रास्ता नहीं दिख रहा था, तब मैंने भी कुछ चीज़ें ऐसी उठाई थीं जिन्हें उठाना ज़रूरी नहीं था। क्योंकि उन्हें उठाने से लगता था कि मैं कुछ कर रहा हूँ।"

याकूब ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं और उसका हाथ तौलिए में था और वो धीरे-धीरे साँस ले रहा था।

"मैंने भी एक सच छुपाया है," उसने कहा।

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।

"पचास साल से," याकूब ने कहा। "और मैंने इसे किसी से नहीं कहा, इसलिए नहीं कि मैं डरता था। मैंने इसलिए नहीं कहा क्योंकि मुझे यह लगता था कि यह सच कह देने से मेरा गुस्सा छोटा हो जाएगा। और मेरा गुस्सा ही मेरा खाना था, मेरा पानी था, मेरी रात थी।"

उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।

"यह सच मेरे सीने में पत्थर जैसा बैठा है," उसने कहा। "और पत्थर कोई साथी नहीं होता। पत्थर सिर्फ़ बोझ होता है।"

मैं उठा और दरवाज़े तक गया और शटर से बाहर झाँका। गली में सुबह की धूप फैल रही थी और दूर, अस्पताल की तरफ़, कोई ट्रक धीरे से आकर रुका। चार बच्चे शटर के साथ चिपके खड़े थे और मेरे आते ही सब सीधे हो गए, जैसे उन्होंने ज़िंदगी में कभी कोई बात नहीं सुनी।

"टिंकू," मैंने कहा।

"हाँ उस्ताद।"

"तुम लोग चले जाओ।"

"उस्ताद —"

"सुनो," मैंने कहा। "यहाँ जो बोला जा रहा है, वो किसी की ज़िंदगी का पचास साल है। उसे तमाशा मत बनाओ।"

टिंकू ने कुछ सोचा और फिर उसने अपना सिर हिलाया।

"ठीक है," उसने कहा। फिर वो रुका और बोला, "पर उस्ताद, मैं दरवाज़े के बाहर बैठूँगा। अगर पानी चाहिए, या कुछ — मैं बाहर हूँ। और कोई आए, तो मैं कह दूँगा कि उस्ताद काम में है।"

"बैठ," मैंने कहा।

वो गया। सानिया ने जाते-जाते मेरी तरफ़ देखा और उसकी नज़र में एक सवाल था। मैंने सिर हिलाया — सब ठीक है। वो चली गई।

मैं लौटा और ट्रंक पर बैठ गया।

"याकूब चाचा," मैंने कहा। "एक बात कहनी है और मैं इसे साफ़ कहूँगा। आज जो हो रहा है, वो मरम्मत है। और मरम्मत का एक ही नियम है — इस कमरे में जो बोला जाएगा, वो सच होगा। अगर मैं झूठ बोलूँगा, तो जो भी जुड़ेगा, वो नहीं जुड़ेगा। गिनती शून्य हो जाएगी। और मैं आप दोनों से यह नहीं कहूँगा कि आप सच बोलिए, क्योंकि आप सच बोलेंगे या नहीं, वो आपका काम है। मेरा काम यह है कि मैं अपनी तरफ़ साफ़ रहूँ।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू किसी चीज़ की कीमत नहीं लगवा रहा?" उन्होंने कहा।

"कीमत?" मैंने कहा।

"घंटी से।"

मैंने जेब में घंटी को एक बार और दबाया।

"आज मैंने कोई परत नहीं खोली," मैंने कहा। "आज मैंने कोई शक्ति नहीं खरीदी। आज मैंने तीन दिन से एक भी अंक नहीं खर्च किया। मैं बस बैठा हूँ, उस्ताद। और मैं आपको बताता हूँ कि यह मेरे लिए सबसे मुश्किल काम है। क्योंकि जब मैं कुछ खरीदता हूँ, तो मुझे लगता है कि मैं कुछ कर रहा हूँ।"

उस्ताद ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उनके होठों पर कुछ आया जो मुस्कान नहीं थी, पर मुस्कान के बहुत करीब थी।

"तू अपने दादा की तरह बोलता है," उन्होंने कहा।

"कैसे बोलते थे?"

"वो भी ऐसे ही कहते थे," उस्ताद ने कहा। "कि जो आदमी हर बात में अपना फ़ायदा देखता है, वो आख़िर में अपना नुक़सान भी नहीं देख पाता।"

याकूब ने अचानक कहा, "तू मुझे उस दिन बोलने नहीं देता।"

कमरा फिर चुप हुआ।

"मैं आज भी नहीं बोल पा रहा," याकूब ने कहा। उसकी आवाज़ में एक झुरझुरी थी। "क्योंकि मैं जानता हूँ कि जब मैं यह बोलूँगा, तो सब कुछ बदल जाएगा। और मैं पचास साल से इसी कमरे में बैठा हूँ, इसी सोच में — कि क्या बोलूँ और क्या न बोलूँ।"

"तो पहले मैं पूरा बोल दूँ," उस्ताद ने कहा।

उन्होंने अँगूठी उठाई और उसे अपनी उँगली पर पहन लिया। वो उनकी उँगली में ढीली थी, पर वो चढ़ गई।

"उस दिन," उस्ताद ने कहा, "मैंने तुझसे बिना पूछे यकीन किया, यह सच है। पर सच सिर्फ़ इतना नहीं है। सच यह भी है कि मैंने तुझसे पूछना चाहा भी नहीं। मैंने सोचा — अगर मैं पूछूँगा, तो तेरे पास कहने को कुछ होगा। और अगर तेरे पास कहने को कुछ हुआ, तो मुझे उस पर सोचना पड़ेगा। और मुझे उस वक़्त सोचने की ज़रूरत नहीं थी। मुझे उस वक़्त सिर्फ़ यह चाहिए था कि किसी को दोषी ठहरा दूँ और मैं अपनी दुकान बंद कर दूँ।"

उसने अपनी आँखें उठाईं।

"मैंने तुझे दोषी नहीं ठहराया था, याकूब," उन्होंने कहा। "मैंने खुद को बचाने के लिए तुझे दोषी मान लिया था। और यह मैंने पहली बार आज बोला है।"

याकूब ने अपने दोनों हाथ अपने चेहरे पर रख लिए और उसके कंधे हिलने लगे। वो रो नहीं रहा था। वो बस ऐसे बैठा था जैसे कोई बहुत लंबा बोझ रखकर सीधा हो रहा हो, और शरीर उस बोझ के बिना सीधा नहीं रह पा रहा हो।

मैंने उसे देखा और मुझे अपना घुटना याद आया जो फटी जीन्स से बाहर था, और मुझे अपनी माँ याद आईं, और मुझे वो रोटी याद आई जो मैंने उस रात नहीं खाई थी। और मैंने सोचा कि इस गली में हर आदमी अपने सीने में एक पत्थर रखकर चल रहा है और हम सब यही सोचते हैं कि हमारा पत्थर सबसे भारी है।

फिर याकूब ने हाथ नीचे किए। उसका चेहरा भीगा था और उसकी आवाज़ साफ़ थी, बिना काँपन।

"मैंने भी कुछ बेचा था," उसने कहा।

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।

"क्या?"

"मैंने उस दिन कुछ देखा था," याकूब ने कहा। "और मैं उसे लेकर तेरे पास आया था। यही कहने आया था। हिस्सा माँगने नहीं आया था। हिस्सा तो मैंने तेरे गुस्से में एक तरह से छोड़ दिया था, क्योंकि मुझे लगा कि जो चीज़ मुझे तू दे रहा है, वो मैं इस तरह लूँगा नहीं।"

"तो क्या देखा था?" उस्ताद ने कहा।

याकूब ने अँगूठी, तस्वीर, सिक्के और पीतल के टुकड़े को देखा। उसकी नज़र उस तस्वीर पर रुकी जिस पर पीछे नीली स्याही में लिखा था — आधी मेरी, आधी तेरी।

उसने एक लंबी साँस ली। उसका हाथ उस हथेली पर गया जिस पर लाल लकीर थी और फिर वो उठ गया।

"तू पहले मेरा एक सवाल सह ले," उसने कहा। "फिर मैं अपना सच बोलूँगा। और वो सच मैं ऐसे नहीं बोलूँगा कि तू उसको टाल सके।"

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो कठोरता नहीं थी जो मैंने कई बार देखी थी। एक अजीब सी खुली हुई आँख थी, जैसे कोई बंद किवाड़ हिल गया हो।

"पूछ," उस्ताद ने कहा।

याकूब ने अपनी लाठी उठाई और उसे दोनों चौकियों के बीच रख दिया, जैसे कोई लकीर खींच रहा हो।

"तूने वो टुकड़ा, वो आधी घंटी," उसने धीरे से कहा। "उस रात के बाद मैंने वो किसी को नहीं दी। मैंने उसे तेरे ही हाथ में रखा था, अपनी आँखों के सामने। तूने उसे कमीज़ के अंदर छिपाया और बाहर आकर किसी से कुछ नहीं कहा।"

उसने उस्ताद की आँखों में देखा।

"तो," याकूब ने कहा, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मशीन का टिक भी उससे ज़्यादा ऊँचा लग रहा था, "तूने वो घंटी बेची किसको थी?"

उस्ताद का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

और मेरी जेब में घंटी बजी — इतनी तेज़ कि मेरी उँगलियाँ जल गईं।

॥

मेरी जेब में घंटी ऐसे बजी जैसे किसी ने उसे चिमटी से पकड़कर हिलाया हो। मैंने हाथ जेब में डाला तो पीतल गरम था, इतना गरम कि मेरी उँगलियाँ झटके से बाहर आ गईं। मैंने हाथ झटका और उस्ताद की तरफ़ देखा।

उस्ताद का चेहरा सफ़ेद था। सिर्फ़ सफ़ेद नहीं, ऐसा सफ़ेद जैसे दीवार पर पुराना चूना जम जाए और उस पर कोई उँगली फेर दे। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उनका हाथ धीरे-धीरे आगे बढ़ा और सिलाई मशीन के लोहे के पाए पर जा टिका। उँगलियों की गाँठें सफ़ेद हो गईं। मशीन अब भी टिक-टिक कर रही थी, बिना सुई, बिना धागा, बिना चले। और उस्ताद उसी पाए को ऐसे पकड़े थे जैसे कोई डूबता आदमी किनारा पकड़ता है।

याकूब ने अपनी लाठी दोनों चौकियों के बीच रखी हुई थी। उसने उस्ताद को देखा और उसकी आवाज़ आई, धीमी पर पत्थर जैसी।

"बोल।"

उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं।

"मैंने नहीं बेची," उन्होंने कहा।

कमरे में कुछ नहीं हिला। टिंकू बाहर दरवाज़े पर था, उसकी परछाईं शटर की दरार में आ-जा रही थी। मशीन की टिक-टिक अचानक तेज़ हुई और फिर रुक गई।

"क्या कहा?" याकूब ने कहा।

"मैंने नहीं बेची," उस्ताद ने दोहराया। इस बार आवाज़ में काँपन था, पर छुपाने की कोशिश नहीं। "मैंने उसे ट्रंक में रख दिया। कपड़े में लपेटकर। तीन गाँठ बाँधकर। और ऊपर से अपनी पुरानी किताबें रख दीं, ताकि कोई उसे खोले तो पहले किताबें गिरें और मुझे पता चल जाए।"

याकूब की उँगलियाँ लाठी पर कस गईं।

"तो तूने मुझसे झूठ बोला," उसने कहा। "पचास साल। पचास साल तूने मुझे यह यकीन दिलाया कि तूने मेरा हिस्सा बेच दिया। तूने मेरे सामने दुकान बंद की, गली छोड़ी, और मैं सालों तक यही सोचता रहा कि मेरा हिस्सा किसी और के हाथ में है।"

"हाँ," उस्ताद ने कहा। "मैंने झूठ बोला।"

मैं ट्रंक पर बैठा था और मेरा घुटना दुख रहा था। फटी जीन्स का किनारा उस जगह से खिसक गया था जहाँ बचपन में साइकिल की चेन ने माँस नोचा था। मैंने हाथ जेब में रखा, घंटी अब भी गरम थी, पर जल नहीं रही थी। जैसे वो सुन रही हो। जैसे वो इंतज़ार कर रही हो कि कोई क्या बोलता है।

"क्यों?" याकूब ने कहा। और उसका "क्यों" किसी सवाल जैसा नहीं, किसी चीज़ के टूटने की आवाज़ जैसा था।

उस्ताद ने हाथ मशीन से हटाया और अपने चश्मे को उतारकर मेज़ पर रख दिया। चश्मे के बिना उनका चेहरा अजीब लग रहा था। छोटा। थका हुआ। बूढ़ा।

"उस रात के बाद," उन्होंने कहा, "तू बदल गया था। मैंने तुझे देखा था। तू उस काग़ज़ के झगड़े के बाद तीन दिन तक कुछ नहीं बोला, और चौथे दिन तूने अपनी बीवी को ऐसे देखा जैसे उससे कोई सवाल पूछ रहा हो जिसका जवाब उसे नहीं आता। मैंने सोचा, अगर यह घंटी तेरे हाथ में रही, तो एक दिन तू इसे गुस्से में बजाएगा। और तू जानता है गुस्से में बजी घंटी क्या करती है।"

याकूब ने कुछ कहना चाहा, पर उस्ताद ने हाथ उठा दिया।

"मैंने सोचा," उन्होंने कहा, "कि तू अपनी ही चीज़ें जोड़ने लगेगा। अपना ही घर। अपनी ही ज़ुबान। और जब तंत्र तुझसे कहेगा कि किसी को माफ़ कर, तो तू उससे वो माफ़ी माँगेगा जो तू मुझसे नहीं माँग सकता। और जब वो नहीं होगा, तो तू खुद को खत्म कर देगा।"

उन्होंने याकूब की तरफ़ देखा।

"मैंने तुझे घंटी से बचाया ऐसा नहीं कहूँगा," उन्होंने कहा। "मैंने खुद को बचाया। क्योंकि अगर तू उस घंटी से कुछ करता और वो तेरे हाथ में फँस जाती, तो सबसे पहले मेरा नाम आता। और उस वक़्त मेरे पास अपने नाम के सिवा कुछ नहीं था।"

कमरे में सन्नाटा था। बाहर से कोई गाड़ी गुज़री, उसका हॉर्न दूर तक गया और फिर गली की आवाज़ों में घुल गया। मशीन के पास रखी लकड़ी की स्टूल पर चाय का पुराना छल्ला था। मैंने उसे देखा और सोचा कि इस दुकान में पचास साल से कोई न कोई चाय रखकर जाता रहा है और कोई न कोई छोड़कर जाता रहा है।

याकूब बहुत धीरे से उठा। लाठी उसने नहीं उठाई, वो चौकियों के बीच पड़ी रही। उसने दो कदम लिए और उस्ताद के सामने खड़ा हो गया। उसका शरीर दुबला था, पर उस वक़्त वो कमरे से बड़ा लग रहा था।

"तूने मुझे चोर बना दिया," उसने कहा। आवाज़ ऊँची नहीं थी। "मैं पचास साल अपने ही घर में, अपने ही बेटे के सामने यह सोचता रहा कि मेरे भाई ने मेरा हिस्सा खा लिया। मेरी बीवी मरते वक़्त तक मुझसे यही पूछती रही कि तेरा भाई कभी लौटेगा या नहीं। मैंने उसे हर बार झूठ बोला। मैंने कहा, लौटेगा। और लौटकर वो मुझसे हिसाब माँगेगा।"

उसकी आवाज़ अब काँपने लगी थी।

"मैंने तेरे नाम पर अपनी दुकान बंद कर दी थी," उसने कहा। "मैंने अपने बेटे को यह सिखाया कि उस्ताद अली बक्श से कोई लेना-देना नहीं। मैंने तेरा नाम ऐसे उच्चारण किया जैसे कोई गंदा शब्द हो। और अब तू कह रहा है कि तूने बेचा ही नहीं था?"

उस्ताद ने सिर झुकाया।

"हाँ," उन्होंने कहा।

"तो तूने मुझे क्या दिया?" याकूब ने कहा। उसकी आवाज़ टूट गई। "तूने मुझे पचास साल का गुस्सा दिया। पचास साल का यह भरोसा दिया कि मेरा भाई मेरा दुश्मन है। और मैं उसी पर जीता रहा।"

फिर वो चुप हो गया। और उसका चेहरा जो अभी गुस्से से कसा था, धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगा, और उसकी आँखें भर आईं। उसने अपनी आस्तीन से चेहरा पोंछा पर आँसू उसकी हथेली पर गिर चुके थे, उसी हथेली पर जिस पर पतली लाल लकीर थी, जो उस्ताद ने फटे तौलिये से बाँधी थी।

"घंटी नहीं चाहिए थी मुझे," उसने धीरे से कहा। "मैं उस दिन तेरे पास हिस्सा लेने नहीं आया था। मैं तेरे पास यह कहने आया था कि मेरी बीवी बीमार है और मुझे डर लग रहा है। बस इतना। मुझे यह कहना था कि भाई, आज रात साथ बैठ। मेरे पास कहने को कुछ है।"

उसने उस्ताद की तरफ़ देखा।

"घंटी तो बहाना थी," उसने कहा। "घंटी तो मैंने सिर्फ़ इसलिए उठाई थी कि तू मेरी तरफ़ देखे। ताकि तू पूछे कि यह क्या है, और मैं कहूँ कि बैठ, बताता हूँ। और तू बैठ जाए। भाई की तरह।"

उस्ताद ने अपना सिर उठाया। उनके चेहरे पर वो भाव था जो बूढ़े लोगों के चेहरे पर बहुत कम आता है। वो भाव जो छोटे बच्चों के चेहरे पर होता है जब उन्हें कोई बहुत पुरानी चोट याद आ जाए, ऐसी चोट जिसका ज़ख़्म भर गया पर निशान नहीं गया।

उस्ताद ने अपना हाथ अपनी उँगली की तरफ़ ले जाया। उनकी माँ की घिसी पीतल की अँगूठी उनकी उँगली पर थी, पीली और मैली, जैसे पचास साल से किसी डिब्बे में साँस ले रही हो। उन्होंने उसे धीरे से उतारा। और फिर उन्होंने याकूब का हाथ बढ़ाया।

याकूब ने पहले तो हाथ नहीं बढ़ाया। उसने उस्ताद को देखा, फिर उस अँगूठी को देखा। फिर बहुत धीरे से अपनी हथेली खोली।

उस्ताद ने अँगूटी उसकी हथेली पर रख दी। उसकी उँगलियाँ याकूब की हथेली से छू गईं।

मैंने उस वक़्त अपनी साँस रोक ली थी, पता नहीं क्यों। दो बूढ़े आदमियों की उँगलियाँ छू रही थीं, बस इतना ही तो था। पर वो छू जाना पचास साल का पहला छू जाना था। और मुझे लगा कि इस कमरे की हवा जो अभी तक भारी थी, थोड़ी हल्की हो गई है।

याकूब की उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने अँगूठी को अपनी हथेली में उठाया और उसे देखने लगा। उसका मुँह हिला, पर आवाज़ नहीं आई। फिर उसने कुछ बड़बड़ाया, कुछ ऐसा जो मैं नहीं सुन पाया, और उसने अँगूठी अपने सीने से लगा ली।

"यह तेरी माँ की थी," वो बोला, आवाज़ में पुरानी घर की गंध थी।

"हाँ," उस्ताद ने कहा। "और अब यह तेरे पास रहेगी।"

तभी मेरी जेब में घंटी बजी।

नहीं, "बजी" कहना ग़लत है। उससे तो कभी बजती है, उसके पास ज़ुबान होती है, वो बोलती है। पर इस बार वो अलग थी। इस बार आवाज़ मेरी जेब से नहीं आई, आवाज़ मेरी हड्डी से आई, मेरी उँगली के जोड़ से आई, मेरे दाँतों की जड़ से आई।

घंटी गरम हुई और बजी और मेरे हाथ ने अपने आप जेब पकड़ ली।

दुकान की हवा में हल्की कंपन हुई। धूल अलमारी के ऊपर से उठी और फिर अपनी जगह पर बैठ गई। सिलाई मशीन का पाया, जिसे उस्ताद ने अभी छोड़ा था, धीरे से खड़खड़ाया। बाहर टिंकू की परछाईं रुक गई।

और घंटी बोली।

पहले वो टुकड़ों में बोली। जैसे कोई बहुत पुराना छत का पंखा चलने की कोशिश करे और हर पंख एक अलग आवाज़ करे।

"घर… नहीं…"

मैंने उसे जेब में दबाया। पर वो चुप नहीं हुई। मेरी उँगलियों के नीचे वो काँप रही थी, जैसे कोई बूढ़ी औरत बैठी बात कर रही हो और उसका स्वर काँप रहा हो।

"तेरे घर से नहीं…"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर फिर से वो सफ़ेदी आ गई थी, पर इस बार अलग सफ़ेदी थी। इस बार डर नहीं था, इस बार कोई पुरानी चीज़ जाग रही थी।

"अंकुश," उन्होंने कहा। "बाहर निकाल।"

मैंने घंटी निकाली। मेरी हथेली में वो लाल थी, इतनी लाल जैसे कोई उसे बहुत देर तक तवे पर रखता रहा हो। पर जल नहीं रही थी। वो बस ज़ुबान पकड़े हुए थी और बोल रही थी।

"मैं तुम्हारे घर से नहीं आई," उसने कहा। इस बार पूरा वाक्य था। टूटा हुआ, पर पूरा। "मैं तुम्हारे पुरखों की अधूरी मरम्मत से आई हूँ।"

कमरे में जो हवा थी, वो एक पल के लिए रुक गई।

मैंने उस्ताद को देखा। उस्ताद ने याकूब को देखा। याकूब ने अपनी हथेली में रखी अँगूठी को देखा और उसकी उँगलियाँ उस पर बंद हो गईं।

"क्या बोली?" उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी, जैसे पुराना काग़ज़ मुड़े तो चटके।

"वो कह रही है कि वो मेरे घर से नहीं आई," मैंने कहा। मेरी आवाज़ भारी थी और मुझे अपनी ही आवाज़ अजनबी लग रही थी। "वो कह रही है कि वो…"

मैंने घंटी को देखा। वो मेरी हथेली पर पड़ी थी और उसका पीतल अब भी काँप रहा था, जैसे अंदर कोई चीज़ खुद को सँभाल रही हो।

"मैं तुम्हारे पुरखों की अधूरी मरम्मत से आई हूँ," घंटी ने दोहराया। और अब वो धीमी थी, जैसे कहने के बाद थक गई हो। "जो तुमने आधी की, बाक़ी मुझमें बंद है।"

याकूब ने एक कदम पीछे लिया। उसकी लाठी चौकियों के बीच से गिरी और फ़र्श पर ऐसी आवाज़ हुई जैसे कुछ टूट गया हो।

"यह आवाज़," उसने धीरे से कहा। "यह आवाज़ मैंने सुनी है।"

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।

"कब?"

याकूब का चेहरा अजीब सा हो गया, जैसे वो पचास साल पीछे जा रहा हो और रास्ते में कुछ खो रहा हो। उसने अँगूठी अपनी मुट्ठी में कस ली।

"उस रात," उसने कहा। "उस रात जब घंटी बनी थी। हम तीन थे। तू, मैं और…"

वो रुक गया। उसका मुँह खुला रह गया, और उसकी आँखें उस्ताद के ऊपर से ऐसे गुज़रीं जैसे किसी ऐसी चीज़ को ढूँढ रही हों जो वहाँ नहीं है।

"तीसरा कौन था, उस्ताद?" याकूब ने कहा। और इस बार उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, सिर्फ़ एक खौफ था। "हम दो थे, या तीन?"

उस्ताद की गर्दन ऐसे हिली जैसे बोझा उठाते वक़्त हिलती है।

"तीन," उन्होंने कहा। "पर तीसरे का नाम…"

"ता-ता-ता।"

वो आवाज़ मेरी हथेली से नहीं आई। वो आवाज़ मशीन से आई।

नहीं, मशीन से नहीं। मशीन के नीचे कुछ था। मैंने ट्रंक से उठकर झुककर देखा, और मशीन के नीचे की लकड़ी के पाए की दरार में कुछ चमक रहा था। पीतल की पतली लकीर, या धागा, या…

"टिंकू," मैंने बाहर आवाज़ दी। "अंदर आ जा। और दरवाज़ा बंद कर दे।"

शटर गिरा और मैंने अपने कानों को अपने हाथों से एक पल के लिए दबाया, क्योंकि शटर की आवाज़ गली भर में गई और मुझे लगा कि शायद पूरी गली सुन रही है।

टिंकू ने अंदर आकर शटर की आख़िरी कड़ी ऊपर कर दी और फिर उसने मेरी हथेली में घंटी देखी। उसकी आँखें बड़ी हो गईं, पर वो कुछ नहीं बोला।

"कुछ सुना तूने?" मैंने पूछा।

टिंकू ने सिर हिलाया।

"बाहर से," उसने कहा, "एक आवाज़ आई थी। पर मुझे लगा कोई बोल रहा है।"

"क्या बोली?"

"मैं समझा नहीं," टिंकू ने कहा। "पर वो तुम्हारी आवाज़ नहीं थी, उस्ताद।"

उस्ताद ने टिंकू को देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा। उन्होंने अपना चश्मा फिर पहना, और उनकी आँखें अब साफ़ थीं।

"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनका लहजा मुझे किसी पुराने ज़माने की क़िताब जैसा लगा। "तू अभी घंटी को जेब में रख। और चुप रह।"

"क्यों?"

"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, और उन्होंने याकूब की तरफ़ देखा, "वो जो बोली, वो घंटी की बात नहीं थी। वो तंत्र की बात थी। और तंत्र जब पूरी बात कहता है, तो वो बात उसकी नहीं होती। वो उस काम की होती है जो हमने अधूरा छोड़ा था।"

याकूब ने लाठी उठाई और अपनी चौकी पर वापस बैठ गया। उसके हाथ में अँगूठी थी और वो उसे खोलकर देख रहा था, जैसे उस चीज़ पर कोई नाम लिखा हो।

"तीन लोग थे," उसने धीरे से कहा। "हम दो भाई और…"

वो फिर रुक गया। उसने उस्ताद की तरफ़ देखा।

"तूने मुझसे पचास साल झूठ बोला," उसने कहा। "पर अब मैं तुझसे झूठ नहीं बोलूँगा। अगर तू इसे बोलेगा तो मैं इसे सबके सामने बोलूँगा।"

उस्ताद ने अपना हाथ याकूब के हाथ पर रखा। दोनों बूढ़े हाथ, दोनों काँपते हुए, और उनके बीच अँगूठी।

"तो फिर बोल," उस्ताद ने कहा। "क्योंकि मैंने सुन लिया है। घंटी ने कह दिया है। और अब तू जो कहेगा, वो सच होगा।"

मैंने घंटी जेब में रख दी। वो अब भी गरम थी, पर बोल नहीं रही थी। बाहर से मशीन की आवाज़ आ रही थी, सात बजे की मशीन, जिसके बारे में रणवीर ने कहा था। गली में कहीं कोई पानी डाल रहा था, पानी की आवाज़ दिवार से आकर टूट रही थी।

और मैं वहीं ट्रंक पर बैठा था, अपने ही शहर में, अपनी ही गली में, अपनी ही घंटी की आवाज़ से डरा हुआ, और मुझे यह समझ आ रहा था कि आज तक मैंने जो भी जोड़ा था, वो सब किसी और की अधूरी मरम्मत के ऊपर जोड़ा था।

"बोल याकूब," मैंने कहा। "और सच बोल। मेरे पास सुनने का वक़्त है, पर सहने का नहीं।"

याकूब ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो बहुत पुराना था — जैसे कोई चीज़ जो पचास साल से सीने में चुप बैठी हो और अब खुद को बाहर निकलने की इजाज़त मिल गई हो।

"तो सुन," उसने कहा।

॥

"तो सुन," याकूब ने कहा।

पर उसने कुछ बोलना शुरू नहीं किया। उसने बस अपनी लाठी घुटनों के बीच खड़ी की और उसकी नोक से फ़र्श की धूल पर एक छोटा गोल घेरा बनाने लगा, जैसे कोई बच्चा मिट्टी में उँगली से नाम लिखता है, फिर मिटा देता है, फिर फिर लिखता है।

उस्ताद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"याकूब," उन्होंने कहा, "इससे पहले कि तू बोले, मुझे एक बात बोलनी है। ये बात मैंने पचास साल किसी से नहीं कही। न तुझसे, न अपने आप से।"

याकूब ने उनकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो पुराना गुस्सा अब भी था, पर उसके नीचे कुछ और भी था। थकान। बहुत पुरानी थकान।

उस्ताद ने अपना चश्मा उतारा, उसे कमीज़ के पल्लू से पोंछा और फिर मशीन के ऊपर रख दिया। उनकी आवाज़ धीमी थी, जैसे कोई पुरानी तिजोरी खोल रहा हो और डर रहा हो कि अंदर से कहीं धूल ही न निकले।

"ये घंटी," उन्होंने कहा और मेरी जेब की तरफ़ देखा, "ये किसी एक की चीज़ नहीं थी। न मेरी, न तेरी, न इस लड़के की। ये दो आदमी के वादे की चीज़ थी।"

"कौन दो?" मैंने पूछा।

"शिवनारायण यादव," उस्ताद ने कहा, "और इलाही बक्श।"

कमरे में एक पल के लिए सब चुप हो गया। बाहर मशीन की आवाज़ आ रही थी, वो मशीन जो रणवीर ने सात बजे के लिए बुलाई थी, और उसके नीचे कहीं पानी डालने की आवाज़, जैसे कोई धूल बैठा रहा हो।

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

"शिवनारायण यादव," मैंने धीरे से दोहराया। "ये… ये दादा के पिता थे?"

उस्ताद ने सिर हिलाया।

"तेरे परदादा," उन्होंने कहा। "और इलाही बक्श याकूब के पिता। दोनों पुराने मिस्त्री थे। साइकिल के मिस्त्री नहीं, सुन — साइकिल के मिस्त्री भी थे, पर उससे बड़ी चीज़ थे। दोनों के हाथ में वो बात थी जो हर आदमी के हाथ में नहीं होती।"

"कौन सी बात?" टिंकू ने पूछा। वो दरवाज़े के पास खड़ा था, शटर बंद कर चुका था, और उसकी आवाज़ में वो भूख थी जो सवालों में ढल जाती है।

"ये बात," उस्ताद ने कहा, "कि टूटी चीज़ सिर्फ़ औज़ार से नहीं जुड़ती। टूटी साइकिल जुड़ती है रिंच से। पर टूटा रिश्ता? वो रिंच से नहीं जुड़ता। वो सिर्फ़ तब जुड़ता है जब दो आदमी अपनी मर्ज़ी से एक-दूसरे के सामने सच बोल दें।"

मैंने घंटी जेब में महसूस की। वो अब ठंडी थी, पर उसका वज़न बदल गया था। जैसे कोई चीज़ जो पहले सिर्फ़ पीतल थी, अब नाम हो गई हो।

"दोनों शहर के अलग-अलग कोनों से थे," उस्ताद बोलते रहे। "शिवनारायण यादव की दुकान पुराने बाज़ार में थी, बिजलीघर के पीछे। इलाही बक्श की दुकान यहीं, इसी गली में। दोनों की लड़ाई कभी ज़मीन की नहीं हुई, न पैसे की। दोनों की लड़ाई बस एक बात पर हुई — कौन पहले किसी की टूटी चीज़ जोड़ेगा। और यही लड़ाई उन्हें दोस्त बना गई।"

"लड़ाई से दोस्ती?" टिंकू ने कहा।

"हाँ," उस्ताद ने कहा। "कुछ लोग लड़कर ही दोस्त होते हैं। जो हर बात पर हाँ-हाँ करते हैं, वो दोस्त नहीं होते, वो गवाह होते हैं।"

मैं हँसा। बहुत ज़ोर से नहीं, बस इतना कि कमरे की सीलन टूट जाए।

"तो घंटी?" मैंने कहा। "घंटी कहाँ से आई?"

उस्ताद ने मशीन पर हाथ रखा। मशीन की टिक-टिक, जो अब तक धीमी थी, एक पल को रुकी और फिर फिर चली।

"घंटी उन्होंने मिलकर बनाई थी," उन्होंने कहा। "शिवनारायण ने पीतल का साँचा बनाया, इलाही ने उसमें फूल खोदा। और फिर दोनों ने उसे अपने बीच टाँग दिया, जैसे कोई दीवार पर तस्वीर टाँगता है। बोले — जिस दिन हमारे बीच भरोसा टूटेगा, इस घंटी की जीभ टूट जाएगी। और जिस दिन हम दोनों अपनी मर्ज़ी से सच बोलकर फिर जुड़ेंगे, ये अपने आप बजेगी।"

मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे मशीन पर रख दिया। उस्ताद ने उसे नहीं छुआ। उन्होंने बस उसे देखा, जैसे कोई बूढ़ा अपने बचपन की तस्वीर देखता है और उसमें खुद को पहचानने की कोशिश करता है।

"और फिर टूट गया," याकूब ने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे किसी ने उसके गले से पानी निकाल दिया हो।

"हाँ," उस्ताद ने कहा। "फिर टूट गया।"

"कैसे?" मैंने पूछा।

उस्ताद ने सिर उठाया। उनकी आँखें छोटी थीं, पर उनमें वो चीज़ थी जो बूढ़े लोगों की आँखों में तभी आती है जब वो कोई बहुत पुराना ज़ख्म खोल रहे हों।

"उस शहर में आग लगी थी," उन्होंने कहा। "पचास साल पहले। पुराने बाज़ार की आधी गली जल गई। तेरे परदादा की दुकान जली, याकूब के पिता की दुकान बच गई। और उस रात के बाद किसी ने कहा — इलाही बक्श ने काग़ज़ बदल दिए। किसी ने कहा उसने ज़मीन के काग़ज़ अपनी तरफ़ कर लिए। किसी ने कहा उसने उस रात जान-बूझकर आग लगाई।"

"किसने कहा?" मैंने पूछा।

"किसी ने," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़वाहट आई जो आज तक नहीं उतरी थी। "किसी का नाम नहीं था। बस एक बात थी, जो एक मुँह से निकली और सौ मुँह तक पहुँच गई। और तेरे परदादा ने उसे पूछा नहीं। उसने सीधे इलाही बक्श का हाथ पकड़ लिया।"

"हाथ पकड़ लिया?" टिंकू ने कहा।

"यानी इल्ज़ाम मान लिया," मैंने कहा।

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू समझता है," उन्होंने कहा। "अच्छा है। क्योंकि मैंने भी वही किया था। पचास साल बाद, उसी गलती को दोहराया। याकूब ने मुझसे कुछ कहा और मैंने जाँचा नहीं।"

याकूब ने उस्ताद की तरफ़ देखा और उसके चेहरे पर वो चीज़ आई जो सिर्फ़ बहुत पुराने दोस्तों के चेहरे पर आती है — हल्की सी हँसी, जो गुस्से से निकलकर आई हो।

"तू भी वही गलती करता है," याकूब ने कहा। "ये खून की गलती है। हमारे बाप ने की, हमने की।"

"तो अब तोड़ेंगे," मैंने कहा।

दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

"क्यों?" याकूब ने पूछा।

"क्योंकि आप दोनों बैठे हैं," मैंने कहा। "और बैठे हुए दो आदमी अगर एक-दूसरे की तरफ़ देख रहे हैं, तो उनके बीच जो टूटा है, उसका सबसे बड़ा दुश्मन यही पल है।"

कमरे में फिर चुप्पी आई। और उस चुप्पी में मुझे कुछ सुनाई दिया — दरवाज़े के बाहर किसी के पैरों की आहट, फिर दो हल्की खटखट।

टिंकू दौड़ा और दरवाज़े की दरार से झाँका।

"उस्ताद," उसने कहा, "हकीम साहब का पोता है। नदीम भाई।"

"खोल दे," मैंने कहा।

नदीम अंदर आया तो उसके चेहरे पर पसीना था और उसके हाथ में वो काला चमड़े का बैग था। उसने बिना कुछ पूछे बैग खोला, और उसमें से एक काली जिल्द वाली डायरी निकाली — वो वाली जिसे उसके दादा हकीम अली ने मरने से दस दिन पहले उसे दी थी।

"मैं बाहर खड़ा था," नदीम ने कहा। "मैंने सब सुना।"

"तो तू जासूसी कर रहा था?" याकूब ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी कड़वाहट फिर आई।

"नहीं," नदीम ने कहा। "मैं इंतज़ार कर रहा था। मेरे दादा ने कहा था — जिस दिन घंटी वाले घर में सच बोला जाए, उस दिन ये डायरी खोलना। आज घंटी बोली। और मैंने डायरी खोल ली।"

उसने डायरी को मशीन पर रख दिया और उसे धीरे से खोला। पन्ने पीले थे, किनारे उखड़े हुए, और स्याही हर जगह नीली-भूरी हो चुकी थी। वो मशीन के पास ही एक पन्ने पर रुका और उँगली रख दी।

"देखो," उसने कहा।

हम सब पास झुके। उस पन्ने पर कुछ लिखाई थी, और उसके नीचे एक निशान बना हुआ था — दो मुड़ी लकीरें और बीच में एक छोटा बिंदु।

मेरा हाथ अपने आप गले की तरफ़ गया। फिर जेब में पड़ी उस काली चाबी की तरफ़।

वही निशान। बिल्कुल वही।

और जब मैंने घंटी उठाई, तो उसके छल्ले पर भी वही निशान खुदा था — दो लकीरें, एक बिंदु। वो निशान जो मैंने पहले कई बार देखा था और हर बार सोचा था कि बस कोई पुराना खरोंच है।

"ये किसका निशान है?" मैंने पूछा।

"तीन लोगों का," नदीम ने कहा। "मेरे दादा ने लिखा है — जो चीज़ तीन हाथों से बने, उस पर तीन लोगों का निशान होता है। पर यहाँ दो लकीरें हैं और एक बिंदु। मतलब दो नाम आ चुके, तीसरा आना बाकी है। तीसरा आ जाएगा तो बिंदु की जगह तीसरी लकीर बन जाएगी।"

टिंकू ने अपनी आँखें सिकोड़कर देखा।

"मतलब," उसने कहा, "ये निशान अधूरा है?"

"हर चीज़ अधूरी है," नदीम ने कहा। "जो पूरी हो गई, वो मर गई।"

बाहर मशीन की आवाज़ और तेज़ हुई। किसी ने कुछ कहा, फिर एक आवाज़ आई — "ज़रा वो रस्सी खींच, ओए", और फिर भारी धातु किसी पत्थर से टकराई। मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उनका चेहरा सपाट था, पर उनका हाथ मशीन पर कस गया था।

"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने कहा कि घंटी शिवनारायण यादव और इलाही बक्श का वादा थी। पर याकूब चाचा कहते हैं कि घंटी बनते वक़्त तीन लोग थे।"

"तीन थे," उस्ताद ने कहा। "पर तीसरे का नाम मैं नहीं लूँगा। वो नाम मेरे पास नहीं है, वो नाम मुझसे छिन गया है। और जो नाम इंसान से छिन जाए, उसे ज़बरदस्ती नहीं लेना चाहिए।"

"तो वो नाम किसके पास है?" मैंने पूछा।

याकूब ने अपनी लाठी फ़र्श पर टिकाई और उसकी आवाज़ में अचानक कुछ ऐसा आया जो पचास साल से दबा हुआ था।

"मेरे पास," उसने कहा।

सब उसकी तरफ़ देखने लगे।

"मेरे पिता," याकूब ने धीरे से कहा, "मरने से पहले एक लिफ़ाफ़ा छोड़ गए थे। बंद लिफ़ाफ़ा। ऊपर सिर्फ़ इतना लिखा था — जो मेरा हिस्सा है, वो इसके अंदर है।"

"और तूने खोला नहीं?" उस्ताद ने पूछा।

याकूब ने सिर नीचा कर लिया।

"पचास साल से सीने पर रखा है," उसने कहा। "कभी खोला नहीं। डर था कि अंदर मेरे बाप की माफ़ी निकलेगी और मैं उसे सह नहीं पाऊँगा।"

मेरे भीतर कुछ हिला। मैं उस आदमी को देख रहा था जो पचास साल से एक बंद लिफ़ाफ़े को अपने सीने पर रखकर जी रहा था, जैसे कोई अपने ज़ख्म पर पट्टी बाँधकर उसे कभी नहीं खोलता, क्योंकि डर है कि पट्टी के नीचे क्या दिखेगा।

"ये बात है," मैंने कहा। "और मैंने सोचा था कि मेरे घर में सबसे भारी चीज़ पापा का डर है।"

"तेरे घर में सबसे भारी चीज़," उस्ताद ने कहा, "वो नाम है जो किसी ने नहीं लिया। बाकी सब उसके आगे हल्का है।"

तभी शटर के बाहर कुछ खड़खड़ाया और टिंकू एक झटके में दरवाज़े की तरफ़ भागा। उसने दरार से झाँका और फिर उसका चेहरा खुल गया। वो दरवाज़ा खोलकर बाहर गया और दो पल में लौट आया, हाथ में काग़ज़ की पुड़िया लिए, जिससे भाप निकल रही थी।

"शबनम आपा ने भेजे हैं," उसने कहा और पुड़िया मशीन पर रख दी। "कह रही हैं — अंदर बैठे हो तो भूखे मत मरो। मशीन वाले बाहर खड़े हैं और तुम लोग अंदर बैठकर कहानी सुना रहे हो।"

मैंने पुड़िया खोली। चार समोसे, गरम, तेल की महक और हरी मिर्च की खुशबू जो पूरे कमरे में फैल गई। टिंकू ने एक उठाया और उसे फूँकने लगा।

"उस्ताद," उसने कहा, मुँह में समोसा डालते हुए, "मुझे एक बात समझ आई।"

"क्या?"

"इतिहास भी इन समोसों जैसा है," उसने कहा। "गरम रहता है तब तक खुला रहता है, बात करता है। ठंडा होते-होते वो चिपक जाता है। और फिर दो हिस्से हो ही नहीं सकते।"

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।

और फिर मीरा हँसी।

नहीं, हँसी नहीं। वो ज़ोर से हँसी। वो हँसी जो पेट से निकलती है और जिसे रोकना नामुमकिन होता है। मैंने मीरा को इससे पहले कभी इतना ज़ोर से हँसते नहीं देखा था। वो दरवाज़े के पास खड़ी थी, कैमरा कंधे पर, बाल बिखरे हुए, और वो हँस रही थी, और उसकी आँखों में पानी था।

"अरे," मैंने कहा, "क्या हुआ?"

"कुछ नहीं," मीरा ने कहा, हँसते हुए। "बस… मैं पाँच साल से ऐसी जगहों पर जा रही हूँ जहाँ लोग चिल्लाते हैं, काग़ज़ फाड़ते हैं, एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाते हैं। और आज एक तेरह साल का लड़का समोसे खाते हुए मुझे इतिहास समझा गया, और वो बात सही थी। बिल्कुल सही।"

उसने आँखें पोंछीं और कैमरा नीचे रख दिया।

"मैं इसे रिकॉर्ड नहीं करूँगी," उसने कहा। "ये वाला पल मेरा है।"

याकूब ने उसकी तरफ़ देखा और उसके चेहरे पर पहली बार कुछ नरम आया।

"तेरे हाथ में क्या है?" उसने पूछा।

मीरा ने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला, पीला, किनारे से फटा हुआ।

"यही," उसने कहा। "रमा मैडम के लिए पाँच साल पहले लिखी चिट्ठी। डाक में नहीं डाली। आज भी जेब में रखी है। मैं सोचती थी कि जब सब ठीक हो जाएगा तब दूँगी। पर सब ठीक कभी नहीं होता। इसलिए अब मैं सोच रही हूँ कि सीधे जाकर दे दूँ।"

"तो दे दे," उस्ताद ने कहा। "जो चीज़ पाँच साल जेब में रह गई, वो सिर्फ़ काग़ज़ हो जाती है।"

मीरा ने काग़ज़ को फिर मोड़ा और अपनी जेब में रख लिया। उसका चेहरा अब शांत था।

"अच्छा," मैंने कहा और उस्ताद की तरफ़ मुड़ा, "तो बात आगे बढ़ाएँ। उस्ताद, आपने कहा था कि उस आग के बाद किसी ने कहा कि इलाही बक्श ने काग़ज़ बदले। उस बात को किसने फैलाया?"

उस्ताद चुप रहे।

"किसने?" मैंने फिर पूछा।

"उस रात के बाद," उस्ताद ने धीरे से कहा, "बाज़ार में एक आदमी घूमा था। सफ़ेद कुर्ता, नए जूते, और हाथ में काग़ज़ों का बंडल। उसने हर दुकान पर जाकर कहा कि इलाही बक्श ने काग़ज़ बदले। किसी ने उसका नाम नहीं पूछा। सबने बात पूछी, नाम नहीं।"

"और वो आदमी?" मैंने पूछा।

"वो आदमी," उस्ताद ने कहा, "उस रात के बाद कभी नहीं दिखा। पर उसके जूते आज भी किसी न किसी के पैरों में चमकते हैं। तूने रणवीर को देखा है? उसके जूतों पर धूल नहीं लगती। आज रात बिजलीघर में भी नहीं लगी थी। ऐसा आदमी कभी गली की मिट्टी में नहीं चलता। वो हमेशा ऊपर चलता है, हमारी मिट्टी के ऊपर।"

मैंने घंटी उठाई। वो मेरे हाथ में ठंडी थी, पर जैसे ही मैंने उसे कान के पास लाया, उसमें एक हल्की सी गूँज थी — जैसे दूर किसी कमरे में कोई बंद दरवाज़ा हिला हो और फिर रुक गया हो।

"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने कहा कि तीन लोग थे। दो नाम पता हैं — शिवनारायण यादव और इलाही बक्श। तीसरा नाम आप नहीं बताएँगे। याकूब चाचा कहते हैं कि उनके पास लिफ़ाफ़ा है। नदीम के पास डायरी है जिसमें दो लकीरें और बिंदु हैं। और अब मैं देख रहा हूँ कि ये बिंदु किसी की तरफ़ इशारा कर रहा है।"

"किसकी तरफ़?" टिंकू ने कहा।

"किसी औरत की तरफ़," मैंने कहा। "क्योंकि घंटी ने आज कहा था — दो। और उस पर दो गोले उभरे थे।"

याकूब का हाथ, जो अब तक लाठी पर था, अचानक उसके सीने पर चला गया। उसने अपनी उँगलियाँ उस बंद लिफ़ाफ़े पर रख दीं जो उसके कुर्ते के नीचे किसी पुराने कपड़े में सिला हुआ था, ठीक दिल के ऊपर।

"अंकुश," उसने कहा और उसकी आवाज़ काँप रही थी, "एक बात है।"

"क्या?"

"मेरे पास," याकूब ने कहा और उसने उँगलियाँ सीने पर दबा दीं, "उस वादे की एक चीज़ है। जो मैंने पचास साल किसी को नहीं दिखाई। न अपने बेटे को, न अपनी बीवी को, न किसी मौलवी को, न किसी को।"

कमरे में सब चुप हो गए। बाहर मशीन का शोर था, गली में किसी का पानी डालना, दूर किसी बच्चे का रोना।

"मेरे बाप ने मरने से पहले जो लिफ़ाफ़ा दिया," याकूब ने कहा, "उसके साथ एक और चीज़ दी थी। कहा था — इसे तभी खोलना जब कोई तीन बार सच बोले। पचास साल में कोई तीन बार सच नहीं बोला।"

उसने कुर्ते के ऊपर से हाथ नहीं हटाया।

"आज," उसने कहा, "मैंने उस्ताद को सच बोलते सुना। फिर अपने आप को सच बोलते सुना। और अब…"

वो मेरी तरफ़ देखने लगा।

"अब तू बोल," उसने कहा। "अगर तूने भी एक सच बोला, तो ये खुलेगा।"

मैंने घंटी को अपनी हथेली पर रखा और उसे देखा।

"मेरा सच," मैंने धीरे से कहा, "यही है कि मैं डरता हूँ। मैं सुबह से डर रहा हूँ कि सात बजे की मशीन जब आएगी, तब मेरी गली में कोई नहीं खड़ा होगा। और मैं अकेला खड़ा रह जाऊँगा।"

कमरा चुप था।

फिर याकूब ने अपने कुर्ते के बटन खोले। एक, दो, तीन। और उसके सीने पर, ठीक दिल के ऊपर, एक छोटी सी पोटली बँधी थी — मैली रस्सी, पुराना कपड़ा, और उस कपड़े के ऊपर वही निशान: दो लकीरें और एक बिंदु।

उसने रस्सी खोली।

"ये," उसने कहा, "उस वादे की चीज़ है।"

और जैसे ही उसका हाथ आगे बढ़ा, मेरी हथेली में रखी घंटी अपने आप बज उठी।

॥

घंटी बजी और कमरे में हवा रुक गई।

वो ऐसे बजी जैसे किसी ने बाहर से दरवाज़ा खटखटाया हो — एक बार, छोटी सी, साफ़, और फिर चुप। मेरी हथेली पर रखी घंटी ठंडी नहीं थी। गरम भी नहीं थी। वो बस काँप रही थी, जैसे किसी बूढ़े आदमी के हाथ में पुराना सिक्का काँपता है।

याकूब चाचा का हाथ हवा में रुका रहा। रस्सी खुल चुकी थी, कपड़ा ढीला पड़ गया था, पर उसने अंदर की चीज़ बाहर नहीं निकाली। वो मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखों में वो डर था जो पचास साल पुराना हो, तो भी नया ही लगता है।

"घंटी ने कहा था," उस्ताद ने धीरे से कहा, "तीन बार सच। तो अब खोल।"

"उस्ताद," याकूब ने कहा, "अगर अंदर कुछ ऐसा निकला जो मेरे बाप ने मुझसे छिपाया, तो?"

"तो भी खोल।" उस्ताद की आवाज़ सपाट थी। "छिपी चीज़ सड़ती है। खुली चीज़ चुभती है, पर सड़ती नहीं।"

याकूब ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने कपड़ा खोला।

अंदर कुछ बड़ा नहीं था। कोई खज़ाना नहीं, कोई सोना नहीं, कोई काग़ज़ों का बंडल नहीं। सिर्फ़ एक छोटा सा पीतल का टुकड़ा था, नाखून से थोड़ा बड़ा, किनारों से घिसा हुआ, और ऊपर की सतह पर पुरानी खुदाई।

मैंने आगे झुककर देखा।

उस टुकड़े पर आधा नाम खुदा था। आधा, इसलिए कि टुकड़ा बीच से टूटा हुआ था और नाम का बाक़ी हिस्सा उस टूटे किनारे के साथ कहीं और चला गया था। जो बचा था, वो दो अक्षर थे — और उनके नीचे वही निशान: दो लकीरें, और बीच में एक छोटा सा बिंदु।

टिंकू ने मेरे कंधे के ऊपर से झाँका और साँस रोक ली।

"ये वही निशान है," उसने फुसफुसाया। "उस्ताद की घंटी के छल्ले पर भी यही है। और बिजलीघर के बक्से की दीवार पर भी यही था।"

"हाँ," मैंने कहा। "और चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े की लकड़ी पर भी।"

याकूब ने टुकड़ा उठाकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। मैंने उसे उँगलियों में लिया। वो ठंडा नहीं था। पीतल ठंडा कब का हो चुका था, पर उस टुकड़े में एक हल्की गरमाहट थी, जैसे अभी किसी की जेब से निकला हो।

"ये मेरे बाप ने दिया था," याकूब ने कहा। "लिफ़ाफ़े के साथ। कहा था — जिस दिन तुझे कोई तीन बार सच बोलता दिखे, उस दिन ये किसी ऐसे को देना जो इसका हक़दार हो। मैंने आज तक नहीं दिया।"

उस्ताद ने हाथ बढ़ाया।

उनका हाथ काँप रहा था। मैंने उस्ताद को इतने सालों में कई बार देखा था — गुस्से में, चुप में, थकान में। पर ऐसा नहीं देखा था। उन्होंने टुकड़ा अपनी हथेली पर रखा, उसे उलटा किया, फिर सीधा किया, फिर अपने मोटे चश्मे के पीछे से उसे इतनी देर तक देखा जितनी देर में कोई एक पूरी कहानी पढ़ लेता है।

"ये," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ फट गई, "ये मेरी माँ की अँगूठी का निशान है।"

कमरे में कोई नहीं बोला।

"मेरी माँ के पास पीतल की एक मोटी अँगूठी थी," उस्ताद ने कहा। "सादी सी। ऊपर कुछ नहीं, सिर्फ़ यही निशान — दो लकीरें और एक बिंदु। उस अँगूठी से वो चीज़ें सील करती थीं। छोटी पुड़िया, मिठाई का डिब्बा, और…"

वो रुके। उन्होंने चश्मा उतारा और उसे अपनी कमीज़ से पोंछा, पर पोंछते-पोंछते हाथ रुक गया।

"और पुराने ताले की चाबी।" उन्होंने कहा। "हमारे घर में एक लोहे का संदूक था। उसकी चाबी पीतल की थी, और उस चाबी के छल्ले पर यही निशान माँ ने खुद अपने हाथ से खोदा था। कहती थीं — जो चीज़ घर की हो, उस पर घर का निशान होना चाहिए।"

मेरी जेब में एक चाबी थी। गले में, पुराने धागे में, बचपन से। पापा ने मुझे पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दी थी और कहा था कि ये किस चीज़ की है, मत पूछना। मैंने पचास बार पूछा, पचास बार वो चुप रहे।

मैंने धागा गले से उतारा।

चाबी मेरी हथेली पर आई — पुरानी, भारी, दाँते घिसे हुए, छल्ले पर ज़ंग की पतली परत। मैंने उसे याकूब के पीतल के टुकड़े के पास रखा।

दोनों एक साथ थे, पर मिल नहीं रहे थे।

टुकड़े का टूटा किनारा चाबी के छल्ले के मोड़ से बैठता नहीं था। मैंने एक बार घुमाकर देखा, दूसरी बार उलटकर देखा, तीसरी बार ज़ोर लगाया। कुछ नहीं हुआ। दोनों चीज़ें एक-दूसरे को देख रही थीं, जैसे दो लोग जो एक ही बात कहना चाहते हों, पर एक ही ज़ुबान में नहीं कह पाते।

"नहीं मिल रहा," मैंने कहा।

"मिलेगा," उस्ताद ने कहा। "पर तेरी जल्दी से नहीं।"

तभी घंटी फिर हिली। इस बार उसने ज़ोर से नहीं बजाया। बस एक हल्की सी आवाज़ आई, जैसे किसी ने दूर से किसी को टोका हो। और उस आवाज़ में दो शब्द थे।

"जल्दबाज़ी मरम्मत नहीं होती।"

मैंने चाबी और टुकड़ा दोनों मेज़ पर रख दिए।

"अच्छा," मैंने कहा। "तो क्या करें?"

"पहले दोनों को देखो," उस्ताद ने कहा। "फिर सोचो कि इन्हें किसने तोड़ा। मरम्मत वहाँ से शुरू होती है जहाँ टूटन हुई हो, वहाँ से नहीं जहाँ जल्दी हो।"

मीरा पहले से ही अपना कैमरा निकाल चुकी थी। उसने पीतल के टुकड़े को सफ़ेद काग़ज़ पर रखा, ऊपर से रोशनी की, और तीन तस्वीरें लीं — एक सीधी, एक उलटी, एक बगल से। फिर उसने चाबी की भी उतारी।

"अंकुश," उसने कहा, "ये चीज़ मुझे रणवीर के काग़ज़ों से जोड़कर देखनी होगी।"

नदीम, जो अब तक कोने में अपनी डायरी सीने से लगाए बैठा था, उठ आया।

"कैसे जोड़ेंगे?" उसने पूछा।

मीरा ने अपनी छोटी स्याही की डिब्बी खोली और काग़ज़ पर टुकड़े की शक्ल उतारने लगी।

"मेरे पास पाँच साल पुराना एक काग़ज़ है," उसने कहा, "जिस पर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की मोहर है और एक निशान है जिसे मैं तब धब्बा समझती रही। आज मैंने उसे शीशे से देखा। उसमें भी दो लकीरें थीं।"

"तो?" नदीम ने कहा।

"तो ये मतलब है," मीरा ने कहा, "कि ये निशान सिर्फ़ पुराना घर का नहीं है। ये निशान आज भी किसी के दफ़्तर में ज़िंदा है।"

नदीम ने अपनी काली जिल्द वाली डायरी खोली। काग़ज़ की परतें, पुरानी स्याही की गंध, और बीच में वो पन्ना जिस पर हकीम अली ने अपनी झुकी लिखाई में कुछ लिखा था। उसने उसे घुमाया और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

"यही दो लकीरें," उसने कहा। "और यही बिंदु। दादा ने नीचे लिखा है कि तीन हाथों वाली चीज़ पर तीसरा नाम आना बाक़ी है।"

"और तीसरे नाम की जगह?" मैंने पूछा।

"खाली है।" नदीम ने कहा। "दादा ने जान-बूझकर खाली छोड़ी है। जैसे वो जानते थे कि नाम बाद में आएगा, और जब आएगा, तब किसी का घर हिलेगा।"

मैंने याकूब की तरफ़ देखा। वो अपनी लाठी पर झुका बैठा था, पर उसकी आँखें सामने दीवार पर टँगी उस पुरानी तस्वीर पर थीं — दो जवान लड़के, बीच में घंटी, और पीछे नीली स्याही में लिखा — आधी मेरी, आधी तेरी।

"याकूब चाचा," मैंने कहा, "ये टुकड़ा आपके पास कब से है?"

"मेरे बाप की मौत के बाद से।" उसने कहा। "उन्होंने मरने से पहले मुझे बुलाया, अपनी जेब से लिफ़ाफ़ा निकाला, और ये टुकड़ा मेरी हथेली पर रख दिया। बोले — इसे मत बेचना, इसे मत दबाना, इसे मत भूलना। जो इसे पहचानेगा, वो तेरा अपना होगा।"

"और आपने इसे पचास साल किसी को नहीं दिखाया?"

"मैंने खुद से भी छिपाकर रखा।" याकूब ने धीरे से कहा। "सोचता था, अगर दिखा दिया तो कोई इसे ले जाएगा और मेरे बाप का आख़िरी निशान भी चला जाएगा।"

टिंकू दरवाज़े के पास गया और शटर की दरार से बाहर झाँका।

"उस्ताद," उसने कहा, "बाहर मशीन वाले दो आदमी खड़े हैं। एक बार घड़ी देखी, फिर चला गया। और शबनम आपा ने समोसे भेजे हैं — ठंडे हो रहे हैं।"

"ठंडे समोसे भी अच्छे होते हैं," उस्ताद ने कहा। "पर ठंडी माफ़ी नहीं होती।"

उस वक़्त दरवाज़े पर हल्की खटखट हुई — तीन छोटी दस्तकें, जैसे कोई बच्चा हो जो अंदर आने से डर रहा हो। टिंकू ने दरवाज़ा एक हाथ खोला। बाहर गुड्डू खड़ा था, साँस फूली हुई, माथे पर पसीना, और हाथ में एक टूटी पतंग की लकड़ी।

"अंकुश भैया," उसने हाँफते हुए कहा, "वो… वो ओढ़नी वाली बूढ़ी औरत…"

"क्या हुआ उसे?"

"वो अब भी वहीं बैठी है।" गुड्डू ने कहा। "पीपल के नीचे। चबूतरी पर। सानिया ने उसे पानी दिया, उसने नहीं पिया। रफ़ीक़ ने उससे पूछा कि किसको ढूँढ रही हो, तो वो बस इतना बोली — अंकुश।"

मेरे पीछे मीरा का कैमरा रुक गया।

"और?" मैंने पूछा। "क्या और बोली?"

"बोली कि जब तक वो नहीं आएगा, वो नहीं उठेगी।" गुड्डू ने कहा। "और चिंटू ने हिम्मत करके पूछा कि तुम कौन हो, तो उसने कहा — जिसका नाम इस गली में सबसे पहले लिखा गया था।"

कमरा चुप हो गया।

मैं उठा। मेरी कुर्सी पीछे सरकी और उसकी टाँग फ़र्श पर खुरच खाई। मैंने घंटी जेब में डाली और अपनी कमीज़ के बटन ठीक किए।

"मैं जाता हूँ," मैंने कहा।

"नहीं जाएगा।" उस्ताद ने कहा।

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी पकड़ सख़्त थी — दर्ज़ी की पकड़, कैंची वाली पकड़, जो एक बार कपड़ा पकड़ ले तो फिसलने नहीं देती।

"उस्ताद," मैंने कहा, "वो बाहर बैठी है।"

"और तू अंदर खड़ा है।" उन्होंने कहा। "पहले ये बता कि अंदर क्या अधूरा है?"

मैंने मेज़ पर रखी चाबी और पीतल का टुकड़ा देखा।

"ये," मैंने कहा।

"तो पहले ये पूरा कर।" उस्ताद ने मेरा हाथ छोड़ा। "बाहर वाली औरत पचास साल से बाहर है। वो एक घंटा और रुक सकती है। पर अगर तू अधूरी मरम्मत लेकर बाहर गया, तो तू उसके सामने वही लड़का रहेगा जो कल था — और वो वही औरत रहेगी जो पचास साल पहले थी। नई शुरुआत के लिए पुरानी मरम्मत चुकानी पड़ती है।"

"पर उस्ताद," याकूब ने अचानक कहा, "ये टुकड़ा…"

उसकी आवाज़ बदल गई थी। वो धीमी हो गई थी, जैसे किसी पुराने कुएँ से आती हो।

"ये टुकड़ा," उसने फिर कहा, "मैं उस औरत को देना चाहता हूँ।"

कमरे में सब रुक गए।

"क्यों?" मैंने पूछा।

याकूब ने अपनी लाठी दीवार के सहारे रख दी। फिर उसने वो छोटा पीतल का टुकड़ा अपनी हथेली पर उठाया और बहुत देर तक उसे देखता रहा, जैसे हिसाब मिला रहा हो।

"क्योंकि," उसने कहा, "पचास साल पहले, उस आग वाली रात के बाद, मैंने एक बार उस औरत को देखा था। वो रात थी, बारिश भी हो रही थी। मैं अपने बाप की दुकान की जली लकड़ियाँ बटोर रहा था। और वो औरत वहाँ आई थी। बहुत दूर से नहीं, पास की गली से। उसके हाथ में एक झोला था और गले में ओढ़नी। और…"

उसने रुककर साँस ली।

"और उसकी गर्दन में, कंठे के पास, एक पीतल की मोटी अँगूठी लटकी थी। उसी अँगूठी से बँधा हुआ एक छोटा टुकड़ा। मैंने उसे दूर से देखा था और सोचा था कि वो कोई ताबीज़ है।"

उस्ताद की आँखें बंद हो गईं।

"माँ की अँगूठी," उन्होंने धीरे से कहा। "मेरी माँ की अँगूठी उस औरत के गले में।"

याकूब ने सिर हिलाया।

"मैं उस वक़्त नहीं समझा था," उसने कहा। "मुझे लगा कोई औरत है जो बाज़ार में मरने-जीने की चीज़ें बेच रही है। पर आज, जब उस्ताद ने कहा कि ये अँगूठी का निशान है, तब मुझे वो रात याद आई।"

"तो तुम कह रहे हो," मैंने कहा, "कि जो औरत पीपल के नीचे बैठी है, वो उस्ताद की माँ की अँगूठी पहने हुई थी?"

"मैं कह रहा हूँ," याकूब ने कहा, "कि मैंने वो अँगूठी उसके गले में देखी थी। और अगर वो उस औरत के पास है, तो इसका मतलब है कि वो अँगूठी उस्ताद की माँ ने खुद उसे दी थी। और अगर उस्ताद की माँ ने उसे अँगूठी दी थी, तो वो कोई बाज़ार की औरत नहीं है।"

वो मेरी तरफ़ मुड़ा।

"वो हमारे ही घर की है," उसने कहा। "और तेरे पापा ने आज तक उसका नाम क्यों नहीं लिया, ये अब मुझे भी जानना है।"

मेरी जेब में घंटी फिर हिली। इस बार उसने कुछ नहीं कहा। बस एक हल्की सी गूँज छोड़ी और चुप हो गई — वैसी गूँज जो बरसों से बंद किसी कमरे में दरवाज़ा खुलने पर आती है।

"टिंकू," मैंने कहा।

"हाँ?"

"बाहर जाकर सानिया को बोल कि वो औरत को पानी पिलाने की ज़िद करे, ज़िद से नहीं, मान से। और गुड्डू से कह कि वो चिंटू के साथ चबूतरी के पीछे से उसकी ओढ़नी पर नज़र रखे।"

"क्या ढूँढना है?"

"अँगूठी," मैंने कहा। "कंठे के पास, पीतल की मोटी अँगूठी।"

टिंकू एक पल को रुका, फिर उसकी आँखें बड़ी हो गईं, और वो बिना कुछ पूछे दरवाज़े से बाहर निकल गया।

मीरा ने अपना कैमरा बंद किया और काग़ज़ के टुकड़े को सँभालकर अपने फटे बैग में रखा।

"अंकुश," उसने कहा, "अगर वो अँगूठी सच में उस औरत के पास है, तो हम एक ऐसी चीज़ के पास पहुँच रहे हैं जो पचास साल से किसी काग़ज़ में नहीं है।"

"हाँ," मैंने कहा।

"और अगर वो काग़ज़ में नहीं है," नदीम ने धीरे से कहा, "तो रणवीर भी उसे नहीं जानता।"

"और अगर रणवीर नहीं जानता," मैंने कहा, "तो ये पहली चीज़ है जो हमारे पास है और उसके पास नहीं है।"

उस्ताद ने पीतल का टुकड़ा उठाया और उसे अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया।

"पहले," उन्होंने कहा, "इस टुकड़े को उस चाबी से मिलाने की जगह ढूँढो। जल्दबाज़ी में नहीं। शांति से। जैसे कोई दर्ज़ी आँख बंद करके सुई में धागा डालता है।"

मैंने चाबी मेज़ से उठाई और टुकड़ा उस्ताद की मुट्ठी से लिया।

मैंने टुकड़े का टूटा किनारा उँगली से सहलाया। किनारा बहुत पुराना था, पर अंदर से चिकना था — जैसे बरसों किसी ने उसे बार-बार छुआ हो। शायद उस्ताद की माँ ने। शायद उस औरत ने। शायद दोनों ने।

और तभी मुझे एक बात समझ आई, जो मैंने पहले नहीं सोची थी।

"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने कहा था कि आपकी माँ ने चाबी के छल्ले पर ये निशान खोदा था। पर ये निशान तो टुकड़े पर भी है।"

"हाँ।"

"इसका मतलब," मैंने धीरे से कहा, "कि टुकड़ा चाबी का हिस्सा नहीं है। टुकड़ा किसी और चीज़ का हिस्सा है — कोई चीज़ जो चाबी से जुड़ी थी।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा चमका जो बरसों से बंद था।

"ताले का घूमने वाला हिस्सा," वो बोले। "चाबी की नोक का जवाब देने वाला पत्ता।"

"और वो पत्ता," मैंने कहा, "सिर्फ़ चाबी से नहीं मिलता। वो मिलता है उस ताले से, जिसमें वो बैठता है।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

"और वो ताला," याकूब ने कहा, "किस चीज़ पर लगा था?"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने नदीम की तरफ़ देखा। नदीम ने अपनी डायरी की तरफ़ देखा। और उस्ताद ने मुझे देखा, बहुत देर तक, फिर बोले —

"मेरी माँ के छत की कोठरी पर।"

बाहर मशीन का शोर एक पल के लिए रुका, फिर फिर शुरू हुआ — जैसे कोई बड़ा जानवर साँस ले रहा हो।

"तो पहले वो ताला खोजना होगा," मैंने कहा।

"नहीं," उस्ताद ने कहा। "पहले उस औरत से पूछना होगा कि उसके गले में वो अँगूठी कहाँ से आई। क्योंकि अगर अँगूठी उसके पास है, तो ताले की चाबी भी कभी उसके पास रही होगी। और अगर चाबी उसके पास रही होगी…"

वो रुके। उन्होंने अपनी आँखें मलीं।

"तो वो मेरी माँ की आख़िरी बात जानती है।"

मैंने चाबी और टुकड़ा दोनों अपनी जेब में रखे और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

इस बार उस्ताद ने मेरा हाथ नहीं पकड़ा।

बाहर निकलते वक़्त मैंने पीछे मुड़कर देखा। याकूब चाचा अपनी लाठी के सहारे खड़े थे, और उनके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे — जैसे कोई पुरानी दुआ पढ़ रहे हों, या कोई पुराना हिसाब जोड़ रहे हों।

और उसी वक़्त, गली की तरफ़ से, सानिया की आवाज़ आई।

"अंकुश भैया! वो उठ गई! वो उठकर सीधी तुम्हारी दुकान की तरफ़ आ रही है!"

मैंने घंटी जेब से निकाली। वो हल्की गरम थी, और एक ही शब्द बोली।

"अब।"

॥

मैंने घंटी जेब में रखी और दरवाज़ा खोला। बाहर की धूप आँखों में ऐसे घुसी जैसे किसी ने मुट्ठी भर रेत फेंक दी हो।

गली में मशीन का शोर था। दूर, पीछे के प्लॉट से आता हुआ, धीमा और भारी — जैसे कोई बड़ा जानवर नींद में करवट ले रहा हो। और उसी शोर के नीचे सानिया खड़ी थी, दोनों हाथ घुटनों पर, साँस फूली हुई, पीछे गुड्डू और रफ़ीक़।

"भैया," सानिया ने हाँफते हुए कहा, "वो दुकान तक आ गई। शटर बंद देखा, तो वहीं शबनम आपा की बेंच पर बैठ गई। उठने का नाम नहीं ले रही।"

"कुछ बोली?"

"बोली," रफ़ीक़ ने आगे आकर कहा, "कि मैं किसी के घर नहीं जाऊँगी। मेरा घर मुझसे बोलता नहीं, तो मैं किसके घर जाऊँगी।"

मेरे पीछे उस्ताद बाहर आए, हाथ में अपनी लाठी जैसी सीधी कमर, और उनके पीछे याकूब चाचा — कमज़ोर, काँपते, एक हाथ से दीवार टटोलते हुए। नदीम उनका थैला उठाए खड़ा था, और मीरा कैमरा बंद करके सबसे आख़िर में निकली।

याकूब चाचा ने एक कदम रखा और रुक गए। उनकी साँस बज रही थी।

"ये मशीन," वो बोले, "पचास साल पहले भी ऐसी ही आवाज़ करती थी। उस रात भी। जब बाज़ार जल रहा था।"

उस्ताद ने उनका कंधा पकड़ा।

"अब बैठो," उस्ताद ने कहा। "तुम्हारा हाथ ठंडा है।"

"मैं किसी यादव के घर नहीं बैठूँगा।"

वो इतने धीरे बोले कि मुश्किल से सुना गया। पर सबने सुन लिया।

मैंने अपनी कमीज़ के पीछे हाथ पोंछा और उनके सामने आ गया।

"चाचा," मैंने कहा, "आप हिसाब लेने आए थे ना? तो सुन लो — हिसाब कभी सड़क पर नहीं बनता। हिसाब बैठकर बनता है। और बैठने की जगह अगर आपको पसंद नहीं, तो आप ज़मीन पर बैठ जाओ, मैं चारपाई पर बैठूँगा। बदला भी ले लेना।"

याकूब चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा था, पर थकान उससे बड़ी थी।

"तू जगदीश का पोता है," वो बोले। "जगदीश भी ऐसे ही बोलता था। बात को मज़ाक में लपेटकर रखता था, ताकि सामने वाले को लड़ने का बहाना न मिले।"

"तो फिर चलिए," मैंने कहा। "घर पास है। और मेरी माँ अगर आपको इस हाल में देख लेगी और आपने उसका गुड़ का पानी नहीं पिया, तो आज रात आपको मेरे साथ मशीन के सामने सोना पड़ेगा।"

सानिया हँस पड़ी।

याकूब चाचा कुछ बोलने ही वाले थे कि खाँसी आ गई। वो झुके, और नदीम ने उन्हें थामा। मीरा ने तुरंत कैमरा मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"मैं इसे उनके मुँह पर नहीं रखूँगी," उसने धीरे से कहा। "लेकिन चलूँगी साथ। अगर उन्हें कुछ हो जाए तो गली में मुझे ही कोसा जाएगा या नहीं — ये बाद में देखेंगे।"

हम गली में निकले — मैं एक तरफ़, नदीम दूसरी तरफ़, याकूब चाचा बीच में, उनकी लाठी धूल में टक-टक करती हुई। उस्ताद आगे-आगे चल रहे थे, ऐसे जैसे रास्ता वो साफ़ कर रहे हों।

और जैसे ही हम गुमटी के पास पहुँचे, मैंने उसे देखा।

बेंच पर एक औरत बैठी थी। सफ़ेद बाल, ओढ़नी सर से खिसकी हुई, और एक हाथ की कलाई पर वो हरी चूड़ी — रंग गया, चमक गई, पर वो वहीं थी। उसने हमें देखा। उसकी नज़र मेरे ऊपर से फिसलकर याकूब पर, फिर उस्ताद पर, और फिर वापस मेरे ऊपर आ गई।

वो उठी नहीं।

"मैं तेरे घर नहीं आऊँगी," उसने इतना ही कहा। "मैं यहीं बैठी हूँ। मेरे पास वक़्त है।"

मैंने कुछ कहना चाहा, पर उस्ताद ने मेरा कंधा दबा दिया।

"घर चलो," उन्होंने धीरे से कहा। "औरत जो यहाँ बैठी है, वो अपनी जगह खुद चुन रही है। जबरदस्ती करने से सिर्फ़ नाम निकलेगा, सच नहीं।"

और इसलिए हम चले गए — एक औरत को गुमटी की बेंच पर बैठा छोड़कर, जैसे गली में कोई पुराना पत्थर पड़ा हो।

घर पहुँचकर मैंने चारपाई खींची। माँ रसोई में थीं; चूल्हे की आवाज़ आ रही थी और घर में धनिया और घी की गंध भरी हुई थी।

माँ ने पलटकर देखा। उन्होंने एक पल के लिए भी नहीं पूछा कि ये कौन है, कहाँ से आया, क्यों आया। बस कपड़े से हाथ पोंछे और एक ताँबे का लोटा उठा लिया।

"बैठाओ इन्हें," उन्होंने कहा। "और पहले पानी। बात बाद में।"

याकूब चाचा चारपाई के किनारे बैठे। उन्होंने घर को देखा — पीली दीवार, पुरानी ताख, ताख में रखी दादा की घिसी तस्वीर, और चूल्हे के पीछे वाला वो दरवाज़ा, जिस पर सालों पुराना ताला लगा था।

"मैं इस घर में पहली बार बैठा हूँ," वो बोले। "पचास साल में पहली बार।"

"तो अब इसे पहली बार मान लीजिए," माँ ने गुड़ का पानी उनके हाथ में रखते हुए कहा। "और जो पहली बार होता है, वो थोड़ा मीठा होता है। पी लीजिए।"

उन्होंने लोटा दोनों हाथों से पकड़ा। हाथ काँप रहे थे, तो माँ ने खुद उनके हाथ नीचे से सहारा दिया। याकूब चाचा ने पिया, और मैंने देखा कि पीते वक़्त उनकी आँखें बंद थीं और एक आँसू उनकी झुर्री में उतरकर गुम हो गया — जैसे बरसों से सूखी नाली में पहली बार पानी आया हो।

माँ ने रोटी रखी। घी लगी, गरम। और साथ में एक छोटी कटोरी में अचार।

"इस घर में दाल में पानी नहीं मिलता," माँ ने कहा, "और बात में भी नहीं। तो मैं सीधी बात करूँगी। आप जिस हिसाब से आए हैं, उसका पहला हिस्सा ये रोटी है। बाकी बातें खाने के बाद।"

उस्ताद दीवार के सहारे खड़े होकर मुस्कुराए। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और आँखों से कहा — ये औरत आज कुछ करवाकर रहेगी।

तभी पीछे के कमरे का परदा हिला और पापा निकले।

वो दीवार टटोलकर, झुके हुए, धीरे-धीरे आ रहे थे। पैर ज़मीन पर घसीटते हुए। मैं दौड़कर पहुँचा, पर उन्होंने हाथ उठाकर मुझे रोक दिया।

"मैं खुद चलूँगा," उन्होंने कहा। और चले।

याकूब चाचा ने सिर उठाया। दोनों की नज़रें मिलीं — और कमरे में हवा जैसे रुक गई।

किसी ने कुछ नहीं कहा। एक लंबी साँस भर का वक़्त। फिर पापा ने कुर्सी खींची और याकूब चाचा के सामने बैठ गए — ज़मीन पर नहीं, बिल्कुल उनके सामने, घुटनों के बल, इतने पास कि दोनों की साँसें एक ही हवा में मिल जाएँ।

"चाचा," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ फटी हुई थी, "मैं आपका इल्ज़ाम नहीं कर सकता।"

याकूब चाचा सकपका गए।

"मैंने भी," पापा ने कहा, "एक डर के कारण काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था। मुझे नहीं पता था उस काग़ज़ पर क्या लिखा है। मुझे बस इतना पता था कि अगर मैंने अंगूठा नहीं लगाया, तो मेरी बीवी का इलाज रुक जाएगा। उस रात मैंने अपने आपको समझाया कि ये सिर्फ़ एक अंगूठा है। काग़ज़ नहीं है।"

उनकी आवाज़ और धीमी हो गई।

"बाईस साल मैंने अपने आपको यही समझाया। हर बार नहीं समझ पाया। इसलिए चाचा, जो आदमी अपने अंगूठे से डरता है, वो आपके हाथ पर उँगली नहीं उठा सकता।"

याकूब चाचा ने रोटी का टुकड़ा नीचे रख दिया। उनका जबड़ा कस गया, जैसे वो कुछ ऐसा कहना चाहते हैं जो पचास साल से उनके अंदर बैठा है, पर आवाज़ रास्ता भूल गई है।

"मैंने," वो बोले, "पचास साल तुम्हारे बाप से यही माँगा था कि एक बार पूछ लो। एक बार।"

"मैं पूछ रहा हूँ," पापा ने कहा। "देर से पूछ रहा हूँ, पर पूछ रहा हूँ।"

याकूब चाचा ने उनका हाथ पकड़ा — और ये कोई हाथ मिलाना नहीं था। ये हाथ पकड़ना था। जैसे कोई गिरती हुई चीज़ को थाम लेता है, ये जानते हुए भी कि सारी ताक़त उसी के बाजू में नहीं है।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा और आँखों से कहा — अब ज़्यादा मत बोलो। फिर वो रसोई में लौट गईं और पीछे से बोलीं, वो अपनी आवाज़ थोड़ी ऊँची करके बोलीं, ताकि सिर्फ़ हम सुनें, बाहर वाले न सुनें:

"आज इस घर में सच का दरवाज़ा खुला है। मैंने खुद उसे खोला है, मेरे होते हुए कोई देर तक बंद नहीं रहेगा।"

फिर वो रुकीं। कड़ाही में कुछ गिरा।

"पर सुन लो सब," वो बोलीं, "उस औरत का नाम बोलने से पहले सबूत चाहिए। सबूत! क्योंकि अगर आज नाम बोल दिया और कल सुबह दस बजे की सभा में वो खड़े होकर मुस्कुराकर कह देगी कि सब झूठ है — तो गली दो हिस्सों में बँट जाएगी। और बँटी हुई गली में बाप-बेटे बोलना बंद कर देते हैं। मैंने बाईस साल एक बँटा हुआ घर झेला है। दूसरा नहीं झेलूँगी।"

उनकी आवाज़ में आग थी। माँ की रसोई में आग हमेशा चूल्हे में जलती है — आज बातों में भी जल रही थी।

मैंने पीछे देखा। काजल दरवाज़े के सहारे खड़ी थी। हाथ में दवा के दो पत्ते — दोनों दबे हुए, दोनों खाली। वो उन्हें पलट रही थी, फिर से पलट रही थी, जैसे गिनती करके भी भरोसा नहीं हो रहा हो।

"दो," उसने धीरे से कहा, "एक में दो गोली। कुल चार। डॉक्टर ने कहा था दिन में दो बार। मतलब दो दिन। बस दो दिन।"

"काजल।"

"और नई खेप रुकी है," उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा, बस पत्तों को देखती रही, "क्योंकि काग़ज़ साफ़ नहीं। काग़ज़ साफ़ होने के लिए ज़मीन का काग़ज़ नहीं देना पड़ेगा, वरना अस्पताल का नाम ही नहीं रहेगा। मॉडल की तरह साफ़ समझ आ रहा है, भैया। दोनों तरफ़ हार है।"

मैं उसके पास गया और उसके हाथ से पत्ते लिए।

"हार नहीं है," मैंने कहा।

"तो क्या है?"

"एक रास्ता है जो अभी हमने खोजा नहीं है।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, पर जिस वक़्त उसने अस्पताल में काम देखा है, वो नर्स वाली आँखें थीं — जो थकती नहीं, बस चुप हो जाती हैं।

"आज सुबह सात बजे मशीन आएगी," वो बोली। "पीछे वाले प्लॉट पर। नींव खोदने के लिए।"

"और मशीन ज़मीन पर उतरेगी," मैंने कहा, "पर उस ज़मीन का मालिक कोई और निकलेगा। मैं वादा करता हूँ — सात बजे से पहले, रणवीर का उस ज़मीन पर जाने का रास्ता बंद हो जाएगा।"

"कैसे?"

"जब वक़्त आएगा, बताऊँगा," मैंने कहा। "क्योंकि अगर मैं अभी बताऊँगा, तो तुम चार दिन की दवा के डर में बैठकर उसे सबसे बड़ा राज़ समझ लोगी — और वो सबसे छोटा काग़ज़ है।"

काजल ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने मेरे कंधे पर हल्का-सा हाथ रखा और धीरे से कहा —

"अगर तुम झूठ बोल रहे हो, तो मैं तुम्हें माँ के हाथ से पीटवाऊँगी। मैं खुद नहीं पीटूँगी, मेरे हाथ ज़्यादा मुलायम हैं।"

"मंज़ूर," मैंने कहा।

उस कमरे में उस वक़्त कोई डर नहीं था। एक रोटी थी, एक लोटा था, दो आदमी एक-दूसरे का हाथ पकड़े बैठे थे और एक चूल्हा जल रहा था। बाहर मशीन थी। अंदर सच था। और सच जब जलता है, तो पहले बहुत धीमा जलता है, बाद में ताप आता है।

तभी मीरा उठी।

वो दीवार के पास बैठी थी, कैमरा गोद में, और अचानक उसकी नज़र पीछे के कमरे के कोने पर पड़ी — जहाँ चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े से आगे, एक अंधेरा कोना था, और वहाँ एक पुराना लकड़ी का संदूक रखा था, जिस पर रस्सी बँधी थी।

"रुको," मीरा ने कहा। "ये संदूक मैंने देखा है।"

हम सब उसकी तरफ़ देखने लगे।

"मैं छोटी थी," वो बोली, "तुम्हारी माँ से मिलने आई थी। किसी खबर के लिए। और ये संदूक मैंने यहीं, इसी कोने में देखा था। तुम्हारी माँ ने उसे जल्दी से अपनी साड़ी के पल्लू से ढक दिया था। ऐसे, जैसे कोई बच्चा मिठाई का डिब्बा छिपाता है। और उस वक़्त मैंने सोचा था कि अंदर गुड़ होगा।"

माँ रसोई से बाहर आईं। उनके हाथ में कड़छी थी, और वो कुछ कहने से पहले चुप रहीं, जो उनकी आदत नहीं।

"वो संदूक मेरे ससुराल से आया था," उन्होंने कहा। "मेरे सास-ससुर के घर से। जिस दिन मैं इस घर में आई, उस दिन से वो वहीं रखा है। किसी ने नहीं खोला।"

"क्यों नहीं खोला?" मीरा ने पूछा।

"क्योंकि ताले पर एक नाम खुदा है," माँ ने कहा। "और उस नाम को पढ़कर ससुर जी ने कहा था — इस पर हाथ मत डालना। ये उसका है जो गया है।"

कमरे में सन्नाटा।

"कौन गया है?" मैंने पूछा।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा।

"यही तो पता नहीं," उन्होंने कहा। "और आज सुबह लग रहा है कि यही हमारी सबसे बड़ी कमी है।"

हम सब उस कोने की तरफ़ बढ़े। उस्ताद ने लालटेन जलाई क्योंकि कोने में रोशनी नहीं थी। याकूब चाचा उठे और मेरा हाथ पकड़कर खड़े हुए — वो देखना चाहते थे, बैठकर नहीं।

हमने रस्सी खोली। धूल उड़ी और मैंने नाक पोंछी। संदूक पुराना था, पीतल की फूलों वाली पट्टियाँ उखड़ी हुई, ऊपर का ढक्कन टेढ़ा, पीछे से दरार। और सामने ज़ंग लगा बड़ा सा ताला — जिस पर कुछ खुदा था, पर पचास साल की धूल के नीचे सिर्फ़ दो अक्षर बचे थे, बाकी घिस गया था।

"शं…" मीरा ने हाथ में आतिशी शीशा लेकर पढ़ा, "…लाल।"

याकूब चाचा ने एक कदम पीछे किया।

"इसका आधा नाम मिटा है," मीरा ने कहा। "पर जो बचा है, वो शंकरलाल जैसा लगता है।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "तुम्हारे पास जो चाबी है।"

मैंने गले की पुरानी चाबी निकाली। पच्चीस साल से वो मेरे गले में थी और मुझे नहीं पता था कि वो किस चीज़ की है। पापा ने मुझे दी थी, पंद्रह-सोलह साल की उम्र में, यह नहीं बताया कि क्या है।

पापा चारपाई पर बैठे थे और उनका चेहरा बदल गया।

"ऊपर वाले ताले में," उन्होंने कहा।

मैंने देखा। मेज़ पर पड़ा ताला धूल के नीचे बैठा था, पर उसकी कुंडी अलग दिख रही थी — जैसे हाल में किसी ने उसे छुआ हो, पोंछा हो।

"रुको," मैंने कहा। "ये ताला पुराना है, पर इसे कोई साफ़ कर चुका है। कुछ दिन पहले।"

उस्ताद झुके। उन्होंने उँगली से कुंडी पर पसीना पोंछा।

"हाँ," वो बोले। "कोई इसे देखता है। पर खोलता नहीं।"

मैंने चाबी डाली।

वो अंदर गई। एक बार नहीं, दो बार नहीं — पूरी गई, और अटकी, और फिर अनायास घूम गई। क्लिक। ताला खुला।

दरवाज़े के बाहर किसी ने दूर से पूछा — मजदूर नहीं, कोई और — और फिर हवा ने उस आवाज़ को मोड़ दिया। गली में मशीन का सुर बदल गया।

हमने ढक्कन उठाया।

अंदर से गंध आई — कपूर, पुराना काग़ज़, और एक और गंध — थोड़ी सी नफ़्तलीन, जैसे कोई दराज़ बहुत साल बंद रहा हो।

अंदर कपड़े थे। मोड़े हुए। दो साड़ियाँ, एक टोपी, कुछ बच्चों के कपड़े, और एक मोटा कपड़े का बंडल।

और उस बंडल के ऊपर, रखा था एक छोटा सा ताला।

लोहे का। मुट्ठी से भी छोटा। रंग काला पड़ा, पर कुंडी चमकदार।

मैंने चाबी और टुकड़ा दोनों जेब से निकाले। याकूब चाचा का पीतल का टुकड़ा — जिस पर आधा नाम और दो लकीरें-बिंदु वाला निशान था — मैंने छोटे ताले की कुंडी के सामने लिया।

उस्ताद ने लालटेन ऊपर उठाई।

"देखो," उन्होंने कहा।

और मैंने देखा।

कुंडी का छेद टुकड़े से छोटा था।

याकूब चाचा ने साँस रोक ली।

"मेल नहीं खा रहा," नदीम ने धीरे से कहा।

"मेल नहीं खा रहा," मैंने दोहराया।

मैंने टुकड़ा थोड़ा घुमाया। किनारे पर टिकाया। अंदर धकेला। नहीं गया। टुकड़े का टूटा किनारा कुंडी के मुँह से बड़ा था, जैसे किसी बड़े आदमी का जूता छोटे बच्चे के पैर में।

"तो ये ताला उसका नहीं है," मीरा ने कहा।

"नहीं," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने उनमें नहीं सुना — निराशा नहीं, कंपन।

"तो किसका है?" मैंने पूछा।

वो नहीं बोले।

और उसी वक़्त मैंने जोर से महसूस किया — मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई थी। बर्फ़ जैसी। जब वो ठंडी होती है, तो कुछ आने वाला होता है। जब वो गरम होती है, तो कुछ हो चुका होता है।

पापा चारपाई से उठे, धीरे-धीरे आए, और मेरे हाथ से वो छोटा ताला ले लिया। उन्होंने उसे उँगलियों में घुमाया। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं आई। फिर वो बोले, बहुत धीमे, जैसे खुद से:

"ये मेरे हाथ में पहले आया है।"

"कब?" मैंने पूछा।

"उस रात," उन्होंने कहा। "जिस रात औरत ने मेरा अंगूठा दबाया। उस कमरे में मेज़ पर एक लकड़ी का बक्सा था, और उसके ऊपर यही ताला रखा था। मैंने उसे उठाया था, सिर्फ़ इसलिए कि मुझे लगा मैं कोई चीज़ समझ लूँगा। और उन्होंने मेरे हाथ से छीन लिया।"

कमरे में याकूब चाचा ने लाठी ज़मीन पर टिका दी।

"तो ये उसी का है," वो बोले। "उस औरत का। जो गुमटी पर बैठी है।"

"हो सकता है," उस्ताद ने कहा।

"तो चलिए पूछते हैं।"

"नहीं," मैंने कहा। और ये बात मेरे मुँह से इतनी ज़ोर से निकली कि सब रुक गए। "पहले मैं एक चीज़ समझना चाहता हूँ। अगर ये ताला उसका है, तो इसे इस संदूक के अंदर किसने रखा? ये संदूक हमारे घर में है। हमारे ससुराल से आया है। और अगर इस पर शंकरलाल का आधा नाम खुदा है — तो ये संदूक शंकरलाल का है।"

"और शंकरलाल," मीरा ने कहा, "पापा की बहन का पति था।"

"मतलब," मैंने कहा, "वो औरत, जो गुमटी पर बैठी है, इस घर की बहू है।"

खिड़की के बाहर मशीन का शोर एक पल के लिए रुका, फिर शुरू हुआ।

माँ ने कपड़े से हाथ साफ़ किए और कमरे के बीच आकर खड़ी हो गईं।

"मैं इतना जानती हूँ," उन्होंने कहा, "कि इस घर की एक बहू सच बोलकर गई थी, और उसके बोलने से सब टूट गया था। इसलिए आज कोई नाम नहीं लेगा। पहले हम इस छोटे ताले को खोलेंगे। जो अंदर है, वो बोलेगा।"

"इसकी चाबी किसके पास है?" नदीम ने पूछा।

"यही तो सवाल है," मैंने कहा।

और तभी — मैं उस ताले को अपनी हथेली में रखे हुए था, ठीक उसके मुँह के पास — और ताले के अंदर से आवाज़ आई।

बहुत धीमी। धातु के अंदर से खुरचने जैसी आवाज़, जैसे कोई बंद चीज़ उँगली से दीवार पर अक्षर लिख रही हो। खुर, खुर, खुर। फिर रुकी। फिर खुर, खुर, खुर।

मेरी रीढ़ से होते हुए वो आवाज़ मेरे सिर तक गई और मेरे हाथ से ताला छूटते-छूटते बचा।

"भैया," काजल ने कहा, "ये ताला बोल रहा है।"

"नहीं," मीरा ने कहा, और उसने कैमरा चालू किया, "ये ताला किसी का नाम पढ़ रहा है।"

हम सब चुप हो गए। खुरचने की आवाज़ दोहराई, धीमी और साफ़, जैसे कोई एक-एक अक्षर गिन रहा हो।

और मुझे, मुझे ऐसा लगा जैसे उस आवाज़ के नीचे, बहुत दूर से, कोई मेरा नाम बोल रहा है।

मैंने ताले को कान के पास लिया। माँ ने मेरा हाथ पकड़ा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "सुन।"

"मैं सुन रहा हूँ, माँ।"

"नहीं," उन्होंने कहा। "आँख बंद करके सुन।"

मैंने आँखें बंद कीं।

हवा रुक गई। मशीन की आवाज़ दूर चली गई। और उस ताले के अंदर से एक-एक खुरचकर, बहुत धीरे, किसी ने तीन अक्षर बनाए — और मैं उन्हें पढ़ गया।

मैंने आँखें खोलीं और माँ की तरफ़ देखा।

"उसने मेरा नाम नहीं पढ़ा," मैंने कहा। "उसने अपना नाम पढ़ा।"

"क्या?" याकूब चाचा ने कहा।

"और वो नाम," मैंने धीरे से कहा, "मेरे कान में पच्चीस साल से गूँज रहा है, पर मैंने उसे कभी पूरा सुना ही नहीं।"

माँ की आँखें भर आईं। उन्होंने ताले को मेरे हाथ से लिया, उसे दोनों हथेलियों में बंद किया, जैसे कोई गरम रोटी पकड़ता है, और फिर बोलीं —

"इसे खोलने के लिए," उन्होंने कहा, "चाबी नहीं चाहिए। इसे खोलने के लिए उस औरत को अपना नाम बोलना पड़ेगा।"

और बाहर, गुमटी की तरफ़ से, हवा में कुछ ऐसा आया जो मुझे लगा कि वही औरत अपनी ओढ़नी सर पर रखकर और मज़बूती से बैठ गई हो।

और घंटी, मेरी जेब में, ठंडी से ठंडी होती चली गई।

॥

घंटी मेरी जेब में ठंडी होती जा रही थी, जैसे किसी ने उसे बर्फ़ के पानी में डुबोकर रख दिया हो। और माँ के दोनों हाथों में वो छोटा लोहे का ताला था, जिसके अंदर से खुरचने की आवाज़ अभी-अभी बंद हुई थी।

"माँ," मैंने कहा, "इसे ज़बरदस्ती मत खोलिए।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर ज़ुबान अभी भी वैसी ही सीधी थी।

"कौन ज़बरदस्ती कर रहा है, अंकुश? मैं तो सिर्फ़ इसे हाथ में पकड़े हूँ।"

"वही तो," मैंने कहा और उनके हाथ से ताला ले लिया। "हम सब इसी को खोलने पर टूटे बैठे हैं। पापा ने कहा ये उस औरत के कमरे में मेज़ पर रखा था। याकूब चाचा की पोटली में आधा नाम खुदा पीतल का टुकड़ा है, जो इससे मेल नहीं खाता। मीरा का कैमरा चालू है। और बाहर मशीन का शोर है, जो सात बजे हमारी गली खुरचने आएगा।"

"तो?" काजल ने कहा।

"तो ये ताला आज नहीं खुलेगा," मैंने कहा।

कमरे में एक ऐसी चुप्पी आई, जिसमें मशीन की आवाज़ भी दूर होकर सिर्फ़ एक धीमी गूँज जैसी रह गई।

"घंटी ने साफ़ कहा था," मैंने धीरे से कहा। "मशीन से पहले दो इंसान जुड़ेंगे। और मुझे लगता है, वो दो इंसान आज सुबह से हमारे सामने बैठे हैं, और हम उन्हें देख ही नहीं रहे।"

उस्ताद अली बक्श ने अपना मोटा चश्मा सीधा किया। याकूब चाचा ने लाठी पर हाथ कस लिया।

"तुम कहना क्या चाहते हो, बेटा?" उस्ताद ने कहा।

"मैं कहना चाहता हूँ," मैंने कहा और ताला मेज़ पर रख दिया, "कि आप दोनों भाई हैं। पचास साल से एक-दूसरे से नहीं बोले। और आज से पहले, एक बार भी उस मशीन को नहीं छुआ, जो आपके पिता इलाही बक्श की थी।"

याकूब चाचा की साँस अटकी। उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा, ऐसे जैसे मैंने उनके हाथ से कोई चीज़ छीन ली हो।

"वो मशीन टूटी है," उस्ताद ने कहा। "पाया चटका हुआ है। चलेगी तो भी टेढ़े पाँव पर चलेगी।"

"तो जोड़िए," मैंने कहा।

"क्या?"

"पाया जोड़िए। दुकान के पीछे वाली मशीन का पाया। आज। अभी। दोनों मिलकर।"

उस्ताद ने मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। याकूब चाचा ने खाँसी रोककर मेरी तरफ़ देखा और फिर बहुत धीरे से बोले, "बेटा, पचास साल के बाद आदमी औज़ार नहीं पकड़ता, हाथ पकड़ता है।"

"तो हाथ भी पकड़िए," मैंने कहा। "मैं औज़ार का नहीं, हाथ का ही कह रहा हूँ।"

मीरा ने कैमरा नीचे किया और मेरी आँखों में देखा। फिर उसने बहुत धीमे से कहा, "अंकुश, सात बजे मशीन है। अभी सवा छह बजे हैं। तेरे पास पैंतालीस मिनट हैं।"

"तो पैंतालीस मिनट में दो भाई जुड़ जाएँ, यही ठीक है," मैंने कहा और मुस्कुरा दिया। "वैसे भी, मेरे हिसाब से इतना आसान काम आज तक नहीं आया।"

माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनका हाथ ठंडा था, पर था तो माँ का हाथ।

"जाओ," उन्होंने कहा। "और सुन लो — अगर उस्ताद या याकूब चाचा में से कोई भी बीच में उठकर चला गया, तो ये घर आज रात बंद रहेगा। और ये घर बंद होने का मतलब तुम जानते हो।"

"जानता हूँ," मैंने कहा।

हम दुकान की तरफ़ निकले। गली में धूल थी, और धूल में वो अजीब सी चुप्पी, जो मशीन के आने से पहले किसी गली पर उतरती है। पीपल के नीचे बुज़ुर्ग बैठे थे, पर आज कोई चर्चा नहीं हो रही थी। सब बस देख रहे थे। गुमटी पर वो ओढ़नी वाली बूढ़ी औरत अपनी जगह से हिली नहीं थी — सिर्फ़ उसकी हरी चूड़ी वाली कलाई बेंच के किनारे पर टिकी थी और उँगलियाँ गोद में बंद थीं।

दुकान पहुँचकर मैंने शटर आधा उठाया और पीछे वाला बल्ब जलाया। बल्ब गुनगुनाया, फिर चमका, फिर हम सब उसकी पीली रोशनी में खड़े हो गए।

मशीन कोने में ढकी पड़ी थी। उस्ताद ने कपड़ा खींचा और वो टिक-टिक करने लगी, बिना छुए, बिना तार के। याकूब चाचा ने एक कदम पीछे हटते हुए अपनी लाठी पर हाथ कस लिया।

"ये मशीन," उस्ताद ने कहा, "बीस साल से नहीं चली।"

"तो टिक-टिक क्यों कर रही है?" टिंकू ने कहा।

"क्योंकि इसे भी सुनना है," मैंने कहा। "चलो, टिंकू, तू बाहर जाकर पहरा दे। कोई आए तो आवाज़ दे। और हाँ — घंटी मेरे पास है। मैं बीच-बीच में बजाता रहूँगा।"

टिंकू एक पल को रुका। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और बोला, "उस्ताद, एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"अगर मशीन जुड़ गई, तो घंटी क्या बोलेगी?"

"मुझे नहीं पता," मैंने सच कहा। "और आज सच ही बोलूँगा, इसलिए पूछ मत।"

टिंकू हँसा और बाहर चला गया।

मैंने दो चौकियाँ लगाईं, मशीन के दोनों तरफ़, और उस्ताद को एक तरफ़, याकूब चाचा को दूसरी तरफ़ बैठा दिया। फिर मैं बीच में औज़ारों का ट्रंक रखकर उस पर बैठ गया। ट्रंक की ढक्कन ठंडी थी और मेरी जाँघों के नीचे वो हल्की-सी काँपी, जैसे अंदर कुछ हिला हो।

"पहले नियम," मैंने कहा और घंटी निकाली। मैंने उसे एक बार बजाया। टन। साफ़, तेज़, गली की दीवारों से लौटकर। "मरम्मत के वक़्त कोई झूठ नहीं बोलेगा। बात छिपा सकते हैं, चुप रह सकते हैं, पर झूठ बोला, तो आज का सारा हिसाब शून्य। समझे?"

याकूब चाचा ने अपनी छोटी, झुर्रीदार आँखों से घंटी को देखा और कहा, "ये घंटी मेरे सामने पहली बार बजी थी, जब मैं जवान था और मेरे बाप ज़िंदा थे। आज फिर बजी। अब मैं इसे झूठ नहीं सुनाऊँगा।"

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा। वो सिर्फ़ अपनी मशीन को देखते रहे।

"तो शुरू कीजिए," मैंने कहा। "पाया खुला है। पहले देखिए, कहाँ से चटका है।"

उस्ताद ने झुककर मशीन के पाए को हाथ लगाया। याकूब चाचा भी झुके। दोनों के सिर पास आए, और पचास साल का फ़ासला एक पल के लिए इतना छोटा हो गया कि मुझे अपनी साँस सुनाई देने लगी।

"ये दरार," उस्ताद ने कहा, "उस रात पड़ी थी। जब मैंने इसे लात मारी थी।"

"तूने लात मारी थी?" याकूब चाचा ने सिर उठाया। "तूने मशीन पर लात मारी थी?"

"मैंने मशीन पर नहीं," उस्ताद ने कहा, "अपने आप पर मारी थी। पर मशीन बीच में थी।"

"तो भी," याकूब चाचा ने कहा, "ये मशीन हमारे बाप की थी। इसे लात मारने का हक़ तेरे पास नहीं था।"

"हक़?" उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो पुरानी चुभन लौट आई। "हक़ की बात तू करता है? जिसने पचास साल मुझसे मुँह नहीं खोला?"

"तूने खोला था?" याकूब चाचा ने कहा। "तू मेरे दरवाज़े पर आया था? चार बार आया, ये तूने आज बताया। चार बार आकर भी तू चुप रहा। तेरी चुप्पी ने मुझे मार डाला, अली। मुझे तेरा गुस्सा नहीं मारता था — उससे तो आदमी ज़िंदा रहता है। तेरी चुप्पी मारती थी।"

उस्ताद का हाथ मशीन पर रुक गया।

"मैं डरता था," उन्होंने कहा। इतना धीमे कि मुश्किल से सुनाई दिया।

"किससे?"

"इससे," उस्ताद ने कहा और याकूब चाचा की तरफ़ देखा, "कि तू मुझे माफ़ कर देगा। और फिर मुझे अपने आप से बात करनी पड़ेगी।"

याकूब चाचा ने अपनी लाठी मेज़ के सहारे रख दी। उनका हाथ काँप रहा था। मैंने देखा कि उनकी हथेली पर वो पतली लाल लकीर अब और गहरी हो गई है।

"देखिए," मैंने कहा और घंटी फिर बजाई। टन। "बातें बाद में। पहले ये पाया। याकूब चाचा, आप पेंच पकड़िए।"

"मैं?"

"हाँ। आप। उस्ताद, आप हथौड़ा चलाइए।"

दोनों ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने उनसे कोई गुनाह करवा दिया हो।

"बेटा," याकूब चाचा ने कहा, "मेरे हाथ अब पकड़ते नहीं।"

"पकड़िए," मैंने कहा। "हाथ जब पकड़ते नहीं, तब भी कुछ पकड़ते हैं। यही तो हमारा काम है।"

बहुत देर तक कुछ नहीं हुआ। मशीन बीच में खड़ी रही, टिक-टिक करती, जैसे वो भी इंतज़ार कर रही हो। बाहर मशीन का शोर धीमा पड़ गया था — जैसे बाहर वाले भी सुन रहे हों।

फिर याकूब चाचा ने अपना हाथ बढ़ाया और पेंच को उँगलियों में पकड़ लिया।

"पकड़ लिया," उन्होंने कहा। आवाज़ रूखी थी। "अब?"

उस्ताद ने हथौड़ा उठाया। उनका हाथ काँपा। उन्होंने दो बार निशाना देखा, फिर हथौड़ा नीचे रख दिया।

"मैं नहीं कर सकता," उन्होंने कहा।

"क्यों?"

"क्योंकि जब ये पेंच पकड़ेगा, तो मुझे इसकी उँगलियों पर भरोसा करना पड़ेगा। और मैंने एक बार इस पर भरोसा किया था। उसके बाद सब बिखर गया।"

"उसके बाद सब बिखर गया," मैंने कहा, "या आपने बिखरने के बाद सब छोड़ दिया?"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनका चेहरा उस बल्ब की रोशनी में पीला पड़ रहा था।

"आज चुप नहीं रहिए," मैंने कहा। "आपने खुद कहा था, घंटी की शर्त है — सच बोलकर जुड़े तो घंटी खुद बजेगी। मैं आपसे तंत्र की बात नहीं कर रहा, उस्ताद। मैं आपसे सिर्फ़ एक बात पूछ रहा हूँ — आपने उस रात क्या किया था?"

उस्ताद का हाथ हथौड़े पर जम गया। कमरे में मशीन की टिक-टिक धीमी हो गई, जैसे वो भी कान लगाकर बैठ गई हो।

"मैं भाग गया था," उन्होंने कहा।

याकूब चाचा के हाथ से पेंच छूटते-छूटते बचा।

"क्या?"

"भाग गया था," उस्ताद ने दोहराया, और इस बार उनकी आवाज़ टूट गई। "खुद को बचाने के लिए नहीं। मैं तुझे बचाने के नाम पर उस इल्ज़ाम से दूर भाग गया था। मैंने सोचा — अगर मैं तेरे साथ खड़ा हो गया, तो बाज़ार कहेगा कि दोनों एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। और अगर मैं खड़ा नहीं हुआ, तो कोई कहेगा कि अली ने इलाही बक्श का साथ छोड़ दिया। दोनों में पिसना था। इसलिए मैं चुप हो गया।"

"और मुझे?" याकूब चाचा ने कहा। "मुझे तूने पूछा था?"

"नहीं।"

"तो तेरी चुप्पी में सच था?"

"सच था," उस्ताद ने कहा, "पर मेरी मरज़ी का सच नहीं था। वो मेरे डर का सच था। और दोनों में फ़र्क़ होता है, याकूब। डर का सच तो वो होता है, जो किसी और से लिखवा लिया जाए।"

याकूब चाचा ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर उन्होंने अपनी दूसरी हथेली भी बढ़ाई और पेंच को दोनों उँगलियों के बीच कस लिया।

"मेरा भी डर था," उन्होंने कहा। "उस दिन हिस्सा माँगने मैं आया था, ये मैंने तुझे कह दिया। पर माँगने आने का मतलब है कि मैं बात करने की हिम्मत कर रहा था। मैं तेरी बीवी का दुख जानता था, तेरे बच्चे का घर ठीक नहीं चल रहा था — मुझे तेरे हाल की खबर थी, अली। मैं तुझे कुछ देने आया था, पर मुझे लगा कि अगर मैंने दिया, तो तू सोचेगा कि मैं सहानुभूति बाँट रहा हूँ। इसलिए वो बात मैंने ज़ुबान पर नहीं लाई। मैं हिस्सा माँगने पर अटक गया। और ये हठ मेरे साथ पचास साल सोया, भाई। पचास साल मैंने बोलना ज़रूरी समझा ही नहीं।"

"पचास साल।" उस्ताद ने हथौड़ा फिर उठाया। "आधी ज़िंदगी।"

"आधी नहीं," याकूब चाचा ने कहा, "पूरी। बीस साल तो हमने यही सोचकर काटे कि दूसरा आएगा। और तीस साल यही सोचकर कि दूसरा कभी नहीं आएगा।"

"मेरी चार बार," उस्ताद ने कहा। "मैं तेरे दरवाज़े तक आया। तेरी दुकान तक आया। तेरी खिड़की के नीचे खड़ा रहा। और लौट गया।"

"मुझे पता है," याकूब चाचा ने कहा।

उस्ताद का हाथ रुक गया।

"क्या?"

"पता है," याकूब चाचा ने कहा और पेंच को कसकर पकड़ा। "चार बार। तीसरी बार तेरे जूते मेरी खिड़की के नीचे दिखे थे। मैंने तुझे आवाज़ नहीं दी। मैं बैठा रहा और सोचता रहा — मेरा ही दरवाज़ा है, मैं खुद क्यों नहीं खोलता। मैं नहीं खोल सका। ये हठ नहीं था, भाई। ये आदत थी। और आदत हठ से ज़्यादा भारी होती है।"

मैंने घंटी बजाई। टन।

"बात छुपाना ठीक है," मैंने कहा। "झूठ बोलना नहीं। दोनों की बातों में डर था, हिसाब था, अफ़सोस था — झूठ नहीं। अब औज़ार चलाइए।"

उस्ताद ने हथौड़ा उठाया और याकूब चाचा ने पेंच कसा। पहली चोट सीधी नहीं लगी। हथौड़ा पेंच के ऊपर से फिसल गया और मशीन की लोहे की सतह पर एक छोटी-सी ठन लगी।

"धीरे," याकूब चाचा ने कहा। "पचास साल बाद आदमी के हाथ में लकड़ी ज़्यादा जानती है, लोहा कम।"

"तेरे हाथ भी काँप रहे हैं।"

"तो दोनों काँप रहे हैं। तो काँपते हाथों से मारेंगे। एक साथ काँपेंगे तो टकराएँगे नहीं।"

मैं हँस पड़ा। और ये हँसी इस घर में बहुत दिनों बाद निकली, बिना किसी मज़ाक के, सिर्फ़ इसलिए कि दो बूढ़े भाई एक मशीन पर एक साथ झुके थे और दोनों के हाथ काँप रहे थे।

दूसरी चोट सीधी लगी। ठन। पेंच आधा अंदर गया।

"और एक," याकूब चाचा ने कहा।

"रुक," उस्ताद ने कहा और रुके। "तेरा हाथ नीचे है। अँगूठा दूसरी तरफ़ घुमा। नहीं तो चोट लगेगी।"

याकूब चाचा ने अँगूठा घुमाया। मैंने उनका हाथ देखा और मुझे लगा कि मेरे भीतर कहीं एक पुरानी गाँठ खुल रही है।

तीसरी चोट। ठन। पेंच पूरा बैठ गया।

और फिर — मैं जानता हूँ, ये बात सुनकर आप कहेंगे कि ये सब मेरी कल्पना है, पर मैं उस वक़्त वहीं था — मशीन का पाया जुड़ते ही मशीन ने खुद एक आवाज़ निकाली। टिक-टिक रुकी, और फिर एक लंबी, धीमी, चिकनी आवाज़ आई, जैसे कोई हफ़्तों बाद पहली बार साँस ले रहा हो। सुई ऊपर-नीचे हुई, बिना हाथ, बिना पैर, अपने आप, एक बार, दो बार, तीन बार। और कपड़े की एक पुरानी महक फैल गई — जिसमें धूप थी, इस्तरी थी, और कुछ ऐसा जो सिर्फ़ पुराने घरों की अलमारियों से आता है।

दुकान की हवा गरम हो गई।

मैंने अपनी घंटी को हथेली में उठाया। वो पहले ठंडी थी। अब गरम थी, एकदम गरम, जैसे कोई उसे दोनों हाथों में लेकर सहला रहा हो। और मैंने देखा — घंटी के भीतर, जीभ के नीचे, पीतल की सतह पर एक धुँधली सी चमक जगी, एक छोटी सी लकीर, फिर दूसरी।

"अंकुश," टिंकू ने दरवाज़े से ही चिल्लाया, "अंकुश, घंटी के अंदर कुछ लिखा दिख रहा है!"

"बाहर खड़ा रह," मैंने कहा।

"पर तेरे हाथ में है, वो चमक रहा है —"

"बाहर खड़ा रह, टिंकू," मैंने दोहराया, और मेरी आवाज़ में वो चीज़ थी जो टिंकू को चुप करा गई।

मैंने घंटी को आँखों के पास लिया। उस्ताद और याकूब चाचा दोनों उठ खड़े हुए। मशीन उनके पीछे स्थिर खड़ी थी, जैसे किसी बूढ़े ने सालों बाद पीठ सीधी कर ली हो।

और घंटी के अंदर, पीतल की उस सतह पर, अक्षर बनने लगे। पहले धुएँ जैसे — कोई आकृति उभरती, फिर मिटती, फिर दोबारा उभरती। जैसे कोई बहुत दूर से किसी की लिखाई पढ़ने की कोशिश कर रहा हो।

माँ भी आ गई थीं। कब आईं, मुझे पता नहीं चला। काजल उनके पीछे खड़ी थी। मीरा ने कैमरा ऊपर उठाया और फिर बहुत धीरे से नीचे कर दिया, जैसे उसे लगा कि ये कैमरे की चीज़ नहीं है।

"पहचान रहे हो?" उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी।

"न… नहीं," मैंने कहा। "अक्षर बनते हैं और फिर…"

मैं रुक गया। क्योंकि अबकी बार अक्षर नहीं मिटे।

वो साफ़ हो गए। धीरे-धीरे। एक-एक करके। छोटे, सीधे अक्षर, जैसे किसी ने नाखून से पीतल पर खुरचे हों। और मैंने उन्हें पढ़ा।

शि व ना रा य ण या द व

मैंने एक बार पढ़ा। फिर दूसरी बार पढ़ा। फिर घंटी को उलटकर देखा, जैसे मुझे ग़लत पढ़ने का मौक़ा चाहिए था।

"ये…" याकूब चाचा ने कहा और उनकी लाठी हाथ से छूटकर लकड़ी के फ़र्श पर गिर गई, "ये तो…"

"शिवनारायण यादव," मैंने धीरे से कहा। "मेरे परदादा। जिन्होंने इलाही बक्श के साथ ये घंटी बनाई थी।"

उस्ताद ने अपना चश्मा उतार लिया और उसे मेज़ पर रख दिया। उनका चेहरा अचानक बूढ़ा हो गया, बहुत बूढ़ा, पचास साल एक पल में।

"तो तीसरा नाम," उन्होंने कहा, "वो नाम है जो मैंने कभी ज़ुबान पर नहीं लिया।"

"आपने कहा था," मीरा ने कहा, "कि तीसरा नाम आपसे छिन गया है और आप उसे नहीं लेंगे।"

"मैंने झूठ नहीं कहा था," उस्ताद ने कहा। "मैंने सिर्फ़ ये नहीं कहा कि वो नाम मेरे अपने घर में लिखा हुआ है।"

मैंने घंटी को थोड़ा ऊपर किया और उस पीली रोशनी में उन अक्षरों को घूमाकर देखा। वो चमक रहे थे। हल्की, सुनहरी, झुर्रीदार चमक, जैसे कोई पुराना सिक्का धूप में रखा हो।

और तभी मुझे महसूस हुआ कि कमरे में कोई चुप है।

बहुत चुप।

मैंने पलटकर देखा।

माँ खड़ी थीं। उनका मुँह खुला था और आँखें उसी नाम पर जमी थीं। उनका चेहरा पीला पड़ गया था — नहीं, सफ़ेद, एकदम सफ़ेद, जैसे किसी ने उनके चेहरे से खून ही खींच लिया हो। उनका हाथ मेज़ के किनारे पर था और उँगलियाँ इतनी ज़ोर से कसी हुई थीं कि नाखून किनारे पर सफ़ेद दिख रहे थे।

"माँ?" काजल ने कहा और उनकी तरफ़ बढ़ी। "माँ, क्या हुआ?"

माँ ने कुछ नहीं कहा।

"माँ," मैंने कहा और घंटी नीचे कर दी, "ये तो परदादा का नाम है। इसमें डरने वाली क्या बात है?"

माँ ने बहुत धीरे से अपनी ज़ुबान पर आवाज़ लाई, जैसे वो किसी बहुत गहरी जगह से ऊपर आ रही हो।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "ये नाम…"

"हाँ?"

उन्होंने घंटी मेरे हाथ से ली। उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने उसे आँखों के पास लिया, देखा, और फिर बहुत धीरे से मेरी तरफ़ देखा — और उनकी आँखों में वो डर था जो मैंने उनकी आँखों में उस रात देखा था, जब घर का लकड़ी का दरवाज़ा खुला मिला था और भीतर दीया जल रहा था।

"ये नाम," उन्होंने कहा, "उस काग़ज़ पर नहीं है, जिसे तेरे पापा ने अंगूठा लगाकर साइन किया था।"

"तो?"

"ये नाम," माँ ने कहा और उनकी आवाज़ टूट गई, "उस काग़ज़ पर है जिसे मैंने अपनी हिसाब की कॉपी के पिछले हिस्से में बाईस साल से छुपा रखा है। और अंकुश — उस काग़ज़ पर ये नाम मेरे ससुर के हाथ की लिखाई में नहीं है। ये नाम किसी और ने लिखा है।"

"किसने?" मैंने पूछा।

माँ ने घंटी को मेरी हथेली पर रख दिया, और मेरी तरफ़ देखे बिना, बहुत धीमे से कहा —

"जिसने मुझे इस घर में बहू बनाया था।"

बाहर, गली में, मशीन का शोर फिर शुरू हुआ — इस बार और पास, और इस बार और ऊँचा, जैसे कोई घड़ी की सुई जान-बूझकर आगे बढ़ा रहा हो।

॥

माँ की आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुराने कुएँ से बाल्टी ऊपर आ रही हो — धीरे, भारी, और रस्सी के साथ कुछ और भी खिंचता हुआ आ रहा हो।

"माँ," मैंने कहा, "धीरे-धीरे। बैठ जाओ।"

"मैं बैठूँगी नहीं," उन्होंने कहा, पर उनका हाथ मेज़ के किनारे से नहीं छूटा। "बाईस साल मैं बैठी रही, अंकुश। बाईस साल। हर रात सोचती रही कि किसी को पता न चले। अब नहीं बैठूँगी।"

काजल ने पीछे से एक स्टूल खींचकर उनके पैरों के पास रख दिया। माँ ने उसे देखा, कुछ कहना चाहा, फिर चुपचाप बैठ गईं। थकान पैरों से ऊपर चढ़ रही थी, मैं देख सकता था। वो थकान जो इंसान के चेहरे पर सफ़ेदी बनकर आती है।

उस्ताद ने अपना चश्मा फिर नहीं पहना। वो उसे मेज़ पर ही छोड़े हुए थे और बिना चश्मे के बैठे थे। बिना चश्मे के उनका चेहरा अलग लग रहा था — ज़्यादा थका हुआ, ज़्यादा सच्चा, कम उस्ताद, ज़्यादा इंसान।

"सुशीला जी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में एक ऐसा आदर था जो मैंने उनमें पहले कभी नहीं सुना, "आप कह रही हैं कि ये नाम आपके ससुराल के पुराने ताले पर खुदा है?"

माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस मेरी तरफ़ देखा और अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया।

"माँ," मैंने कहा, "उस्ताद पूछ रहे हैं।"

"मैं सुन रही हूँ," उन्होंने कहा। फिर उन्होंने अपना मुँह उठाया और उस्ताद की तरफ़ देखा। "हाँ उस्ताद साहब, खुदा है। मेरे ससुराल के उस पुराने लकड़ी के संदूक पर जो आज भी मेरे घर के पीछे वाले कमरे में रखा है। जिसका बाहरी ताला आज गले की चाबी से खुला।"

कमरे में सन्नाटा उतर आया।

याकूब चाचा ने अपनी लाठी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, पर हाथ हवा में ही रुक गया। वो मेरी तरफ़ देखने लगे, फिर उस्ताद की तरफ़, फिर माँ की तरफ़।

"ये…" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में हवा नहीं थी, "ये सच है? आप कह रही हैं कि मेरे सीने पर पचास साल से जो पोटली बँधी है, उसका निशान आपके संदूक के ताले पर भी है?"

माँ ने गर्दन हिलाई। बहुत छोटी हरकत। पर वो हरकत कमरे में गूँज गई।

याकूब चाचा का हाथ काँपने लगा। उन्होंने अपनी सीने की पोटली नहीं खोली, बस उस पर हाथ रख दिया, जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की उँगली पकड़ता है।

"पचास साल," उन्होंने कहा। "पचास साल मैं उसे अपने सीने पर लेकर सोया हूँ। कभी सोचा नहीं कि वो किसी और के घर में भी लिखा हुआ मिलेगा।"

मीरा ने अपना कैमरा मेज़ पर रख दिया। उसका हाथ धीरे से काँप रहा था और मैंने देखा कि उसने जान-बूझकर कैमरा नीचे रखा — इस बात को कैमरे में नहीं लेना था। ये बात किसी को दिखाने की नहीं थी। ये बात पहले घर की थी, फिर खबर की।

"ताला लाओ," मैंने कहा।

माँ ने अपनी साड़ी के कोने से वो छोटा लोहे का ताला निकाला, जो अभी तक मेज़ पर पड़ा था। ज़ंग लगा, छोटा, मोटा — वो ताला जिसके भीतर से अभी-अभी खुरचने की आवाज़ आई थी, फिर बंद हो गई थी।

मैंने ताला मेज़ के बीच में रखा।

फिर घंटी रखी — वो पीतल की घंटी, जिसके भीतर अभी शिवनारायण यादव का नाम उभरा था।

फिर याकूब चाचा की तरफ़ देखा।

"चाचा," मैंने कहा, "वो टुकड़ा।"

याकूब चाचा ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा, जैसे दिमाग़ में कोई तराज़ू चल रहा हो — कुछ भीतर रखूँ या बाहर निकालूँ। फिर उन्होंने अपनी कमीज़ के नीचे से पोटली का मुँह खोला, और उसमें से वो नाखून से बड़ा पीतल का टुकड़ा निकालकर मेज़ पर रख दिया।

टुकड़ा जैसे ही मेज़ पर पड़ा, कमरे में एक अजीब सी बेचैनी फैल गई। जैसे हवा ने एक कदम पीछे हटकर देखा हो कि अब क्या होगा।

"तीनों एक सीध में रखो," उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "अंकुश, ध्यान से। मेज़ पर तीन चीज़ें नहीं रख रहे हो तुम। तीन हिस्से रख रहे हो।"

मैंने ताला आगे खिसकाया। घंटी का मुँह नीचे किया, जैसे कोई गिलास उलटकर रखता है। फिर पीतल का टुकड़ा उनके बीच रखा।

तीनों की दूरी एक-एक इंच थी।

कुछ नहीं हुआ।

"और करीब," उस्ताद ने कहा।

मैंने ताला और करीब खिसकाया।

घंटी और करीब।

टुकड़ा बीच में।

और फिर — बहुत पहले, बिना किसी आवाज़ के — कुछ हुआ।

टुकड़े पर जो दो लकीरें और बीच में बिंदु वाला निशान था, वो मेरी आँखों के सामने ताले के ज़ंग लगे कुंडे पर उभरा। जैसे सूखी मिट्टी पर पानी की बूँद गिरे और वो जगह देर तक गीली दिखती रहे। ताले का पुराना ज़ंग उस निशान के चारों तरफ़ हट गया, जैसे किसी ने उसे पोंछ दिया हो।

और घंटी — घंटी ठंडी पड़ गई।

मैंने उसे हाथ में लिया। एक मिनट पहले वो तवे की तरह गरम थी, उससे उँगली जल रही थी। अब वो ठंडी थी। इतनी ठंडी जैसे सुबह की लोहे की चौखट को छुआ जाए।

"घंटी ठंडी हो गई," मैंने कहा।

"मतलब?" काजल ने पूछा।

"मतलब ये कि उसने अपनी बात कह दी," उस्ताद ने कहा। "ये घंटी जब तक कुछ कह रही होती है, गरम रहती है। जब बात पूरी हो जाती है, ठंडी हो जाती है। सुशीला जी — अब आप।"

माँ ने ताले को छुआ। उनकी उँगली नाखून के पीछे के हिस्से से उस कुंडे पर रगड़ी, जहाँ ज़ंग हट गया था, और फिर उन्होंने उँगली अपनी आँखों के सामने की। उँगली पर ज़ंग की लाल-भूरी धूल थी, पर उसके नीचे एक पतला सुनहरा निशान बचा था।

"ये वही निशान है," उन्होंने कहा।

"कौन सा निशान, माँ?" मैंने पूछा।

"जो घंटी के छल्ले पर है," उन्होंने कहा, और अपनी आवाज़ को सँभाला, "जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े के कुंडे पर है, और जो इस ताले पर है। अंकुश, ये कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है। ये एक ही हाथ का निशान है, जो तीन जगह लगा है।"

पापा की आवाज़ पीछे से आई।

"तीन जगह नहीं।"

हम सब पलटे।

पापा दरवाज़े के सहारे खड़े थे। कमज़ोर, झुके, एक हाथ से चौखट पकड़े हुए। उनकी आँखें थकी हुई थीं, पर वो थकान जो सोने से आती है, नहीं — वो थकान जो बहुत देर तक कुछ सहने से आती है।

"पापा," काजल ने कहा और दौड़कर उन्हें थामने पहुँची। "आपको उठना नहीं था। डॉक्टर ने कहा था—"

"डॉक्टर ने कहा था कि मेरी जाँच होनी है," पापा ने कहा। "मेरी जाँच सौ बार हो चुकी है, काजल। वो जाँच नहीं है, वो डर है जिसे काग़ज़ पर लिख रहे हैं।"

वो धीरे-धीरे मेज़ तक आए। काजल उनका हाथ पकड़े थी, माँ स्टूल से उठकर खड़ी हो गईं। पापा ने मेज़ पर रखी तीनों चीज़ें देखीं — ताला, घंटी, पीतल का टुकड़ा। उन्होंने देखा। एक लंबी नज़र से देखा।

फिर वो अपने घुटनों के बल बैठ गए।

"पापा!" मैंने कहा।

"रहने दे," उन्होंने कहा। "मुझे बैठने दो। जो आदमी अपने बाप के नाम के सामने खड़े होकर नहीं बोल सकता, वो बैठकर बोले तो बेहतर है।"

कमरा चुप हो गया।

पापा ने ताले को हाथ में लिया। उनके हाथ में ताला और छोटा लगने लगा, जैसे बच्चे के हाथ में बाप की घड़ी। उन्होंने उसे उलटा किया, पलटा, और फिर अपनी बाएँ हाथ की तर्जनी उस निशान पर रखी और वहीं रोक दी।

"शिवनारायण यादव," उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा। "मेरे दादा। मेरे बाप के बाप।"

"आपके दादा?" काजल ने कहा। "मतलब हमारे परदादा?"

"हाँ," पापा ने कहा। "पर ये नाम घर में कभी ज़ोर से नहीं लिया गया। तुम्हारी दादी उनका नाम सुनकर चुप हो जाती थीं। मैंने एक बार पूछा था, बचपन में — बापू कैसे थे? तो तुम्हारे दादा ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ गलत पूछ लिया हो। और फिर बस इतना कहा — वो हमें एक अधूरा काम दे गए, बेटा। वो काम आज तक हमें खींच रहा है।"

"कौन सा काम?" मैंने पूछा।

पापा ने ताले को मेज़ पर वापस रखा।

"यही," उन्होंने कहा। "ये ताला। जो हमारे घर के संदूक पर आज भी लगा है। जिसे तुमने आज गले की चाबी से खोला।"

मैंने देखा कि पापा के हाथ काँप रहे थे। पर उनकी आवाज़ नहीं काँप रही थी। ये पहली बार था जब मैंने देखा कि पापा काँपते हुए भी साफ़ बोल सकते हैं। जैसे शरीर काँप रहा हो और आवाज़ ने फ़ैसला कर लिया हो कि अब नहीं।

"इस ताले के भीतर जो आवाज़ आ रही थी," उन्होंने कहा, "वो किसी औरत का नाम था। मुझे याद है। उस रात मैंने भी उसे सुना था। उस औरत ने अपना नाम नहीं बोला था, पर उसकी उँगली इस ताले पर थी। और अब मुझे समझ आ रहा है कि क्यों।"

"क्यों?" मीरा ने पूछा।

"क्योंकि ये ताला उसका नहीं है," पापा ने कहा। "ये मेरे दादा का है। और वो औरत इसे पचास साल से अपने पास रखे हुए थी। जो इंसान किसी का ताला पचास साल संभालकर रखे, उसने सिर्फ़ ताला नहीं संभाला होता। उसने उस ताले के पीछे बंद बात भी संभाली होती है।"

माँ ने अचानक कहा, "मुझे बोलने दो।"

हम सब उनकी तरफ़ देखने लगे।

माँ खड़ी थीं, दोनों हाथ मेज़ पर टिकाए हुए। उनका चेहरा अब सफ़ेद नहीं था। अब उस पर एक अलग रंग आ गया था — वो रंग जो औरत के चेहरे पर तब आता है जब वो बहुत सालों का दबाया हुआ एक ही साँस में बाहर निकाल रही हो।

"बाईस साल पहले मैं इस घर में आई," उन्होंने कहा। "मेरी शादी हुई। मैं अठाईस साल की थी। मुझे ये घर दिखाया गया, ये आँगन दिखाया गया, ये दुकान दिखाई गई। सब कुछ दिखाया गया — बस एक चीज़ नहीं दिखाई गई। कमरे के पीछे वाला एक कोना। जहाँ ये संदूक रखा था।"

मैंने कुछ कहना चाहा, पर माँ ने हाथ उठाकर रोक दिया।

"पहली रात को मैंने ये संदूक देखा। मैंने तुम्हारे पापा से पूछा — इसके ऊपर लिखा क्या है? तुम्हारे पापा ने कहा — पता नहीं, बचपन से ऐसा ही है, बापू ने कभी खोलने नहीं दिया। मैंने पूछा — इसकी चाबी कहाँ है? तो वो चुप हो गए।"

पापा ने अपना सिर नीचे कर लिया।

"तीसरे दिन," माँ ने कहा, "मुझे ये संदूक साफ़ करने को मिला। मैंने उसकी धूल पोंछी। मैंने उसके ताले के नीचे उँगली फेरी। और उँगली के नीचे मुझे वही नाम महसूस हुआ जो आज घंटी में उभरा है। खुदा हुआ। सीधा। साफ़। मुझे उस वक़्त पढ़ना नहीं आता था — मैंने आठवीं तक पढ़ाई की थी, पर वो अक्षर पुराने ढंग के थे। तो मैंने किसी से पूछा नहीं।"

"आपने पूछा नहीं?" मीरा ने कहा।

"पूछती तो क्या होता?" माँ ने कहा। "नई बहू, नया घर, सास-ससुर सामने। मैंने सोचा — अगर ये कोई बात है तो मुझे कोई बताएगा। पर किसी ने नहीं बताया। और फिर…"

वो रुकीं।

"और फिर एक दिन," उन्होंने कहा, "मुझे एक काग़ज़ मिला।"

कमरे में हवा भी रुक गई।

"कहाँ मिला?" मैंने पूछा।

"उसी संदूक के नीचे," माँ ने कहा। "संदूक के तल्ले और फ़र्श के बीच, दबा हुआ। एक पुराना काग़ज़। पीला, मुड़ा, किनारे से थोड़ा फटा। उस पर लिखाई थी — नीली स्याही, बहुत पुरानी। और सबसे ऊपर वही नाम था। शिवनारायण यादव।"

"और नीचे?" काजल ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो उत्सुकता थी जो बच्चों में होती है — आगे क्या हुआ — पर मैंने देखा कि उसके हाथ ठंडे से हो रहे थे।

"नीचे," माँ ने कहा, "सात लोगों के नाम थे। और सात अंगूठे। और एक लकीर थी — ज़मीन की, इलाज की, किसी की। मैंने उसे पूरा पढ़ा नहीं। मैंने बस ये देखा कि उस काग़ज़ पर वही नाम लिखा है, जो संदूक पर खुदा है। और उसके नीचे वो लिखाई थी — जो मेरे ससुर की नहीं थी।"

"आपको कैसे पता कि वो ससुर की नहीं थी?" याकूब चाचा ने पूछा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी चुभन थी। जैसे कोई अपने ही सवाल से डर रहा हो।

"क्योंकि मैंने ससुर की लिखाई देखी थी," माँ ने कहा। "हिसाब की कॉपी पर, रसीदों पर, दुकान के रजिस्टर पर। उनका हाथ भारी था। अक्षर मोटे और सीधे। ये लिखाई पतली थी। और झुकी हुई थी — जैसे लिखने वाले का हाथ जल्दी में हो या डर में हो।"

"और आपने वो काग़ज़ क्या किया?" मीरा ने पूछा।

माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया।

"मैंने उसे अपनी हिसाब की कॉपी के पिछले हिस्से में छिपा दिया," उन्होंने कहा। "और फिर कभी नहीं खोला। बाईस साल। हर बार जब मैं वो कॉपी खोलती, मेरा हाथ काँपता और मैं उसे वापस बंद कर देती। मुझे डर था कि अगर मैंने वो काग़ज़ निकाला, तो घर में कुछ टूट जाएगा।"

"तो आपने उसे छुपाया," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ में वो चीज़ थी जिसे मैं छिपा नहीं पाया — थोड़ी नाराज़गी।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा।

"हाँ," उन्होंने कहा। "मैंने छुपाया। तेरे पापा ने अपना अंगूठा छुपाया, मैंने वो काग़ज़ छुपाया। और हम दोनों ने तुझे बताया कि सब ठीक है। अंकुश — मैं जानती हूँ तू क्या सोच रहा है। तू सोच रहा है कि माँ ने भी झूठ बोला। तो हाँ, माँ ने भी झूठ बोला। पर मैं उस वक़्त तेरी माँ थी, किसी सभा की गवाह नहीं थी। और मैंने सोचा था कि अगर मैं चुप रहूँगी तो तू स्कूल जाएगा, काजल नर्सिंग पढ़ेगी, और ये घर चलता रहेगा।"

वो रुकीं और उन्होंने अपने हाथ मेज़ पर रखे।

"बाईस साल बाद मैं कह रही हूँ कि मैं ग़लत थी," उन्होंने कहा। "घर चलता रहा, पर हम नहीं चले। हम बस खड़े रहे।"

काजल ने माँ का हाथ पकड़ लिया। माँ ने उसे झिड़का नहीं। उन्होंने बस उसका हाथ दबा दिया।

"उस्ताद साहब," माँ ने कहा और अपनी आवाज़ सँभाली, "अब आप बताइए। ये ताला मेरे ससुर के घर का है, ये मैं जानती हूँ। पर ये पीतल का टुकड़ा जो याकूब चाचा ने पचास साल रखा — ये कहाँ का है?"

उस्ताद ने अपना चश्मा उठाया और फिर वापस मेज़ पर रख दिया। जैसे उन्हें उसकी ज़रूरत नहीं थी, बस आदत थी।

"ये उसी ताले के भीतर का पत्ता है," उन्होंने कहा। "नहीं — सही बोलूँ — ये उस ताले के भीतर के पत्ते का टुकड़ा है। मैंने पचास साल पहले इसे अपनी माँ की अँगूठी का हिस्सा समझा था। आज सुबह भी यही सोचा। पर ये अँगूठी नहीं है। देखिए इसका किनारा — ये घिसा हुआ है, मुड़ा हुआ है। अँगूठी का किनारा ऐसे नहीं मुड़ता। ताले के भीतर का पत्ता ऐसे मुड़ता है, जब कोई उसे ज़बरदस्ती घुमाता है।"

"मतलब?" मैंने कहा।

"मतलब ये कि तुम्हारे परदादा का ताला किसी ने ज़बरदस्ती खोलने की कोशिश की थी," उस्ताद ने कहा। "और वो कोशिश पचास साल पहले हुई थी। उसी रात के आसपास जब आग लगी थी।"

याकूब चाचा ने अपना हाथ उठाया, और उनका हाथ हवा में काँप रहा था।

"पचास साल पहले," उन्होंने कहा। "उस रात के बाद मेरे बाप ने वो लिफ़ाफ़ा मुझे दिया। बंद। सील बंद। कहा — जब तेरा भरोसा लौटे, तब खोलना। मैंने पूछा — किस पर भरोसा? तो वो चुप हो गए।"

"और आपने पचास साल उसे नहीं खोला," मीरा ने कहा।

"मैंने उसे नहीं खोला क्योंकि मुझे लगा कि भरोसा किसी और पर करना है," याकूब चाचा ने कहा। "आज शाम पता चला कि भरोसा खुद पर करना था।"

कमरे में कुछ देर चुप्पी रही।

और उस चुप्पी में मुझे एक बात साफ़ सुनाई दी, जो किसी ने नहीं कही थी — कि हम अब तक एक ही चीज़ के चारों तरफ़ घूम रहे थे, और वो चीज़ नाम नहीं थी। वो चीज़ डर थी। हर आदमी यहाँ अपना-अपना डर छिपाए बैठा था — माँ काग़ज़ का, पापा अंगूठे का, याकूब चाचा लिफ़ाफ़े का, उस्ताद आग की रात का, और मैं…

मैं? मेरा डर क्या था?

मेरा डर ये था कि सब कुछ जुड़ जाने के बाद भी कुछ बचेगा नहीं। कि मैं सब जोड़ दूँगा और फिर भी ये घर वैसा नहीं होगा जैसा एक बार था। और मुझे ये बात किसी को नहीं बतानी थी, खासकर खुद को।

"अब मैं कुछ कहूँ?" मीरा ने कहा।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो खड़ी थी, एक हाथ कूल्हे पर, दूसरे में अपनी पुरानी कलम। कमरे की लाइट उसके चेहरे पर पड़ रही थी और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले भी कई बार देखी थी — जल्दबाज़ी। सिर्फ़ जल्दबाज़ी नहीं। बेचैनी।

"कहो," मैंने कहा।

"ये नाम," उसने कहा और मेज़ पर रखे ताले की तरफ़ इशारा किया, "अब हमें पता है। पर नाम से क्या होगा? सुबह सात बजे मशीन आ रही है। मशीन नाम नहीं पढ़ती। मशीन दीवार पढ़ती है। बच्चों, हमारे पास सवा घंटा है — नहीं, इससे भी कम। मुझे घड़ी देखने की ज़रूरत नहीं, मेरे पेट में गड़बड़ हो रही है।"

"मीरा," काजल ने कहा, "तुमने अभी-अभी खाया नहीं था।"

"भूख नहीं है," मीरा ने कहा। "ये डर है जो पेट में बैठकर घड़ी का काम कर रहा है।"

मैंने अपना मोबाइल उठाया। स्क्रीन पर समय था — सवा छह बजे के आसपास। मैंने स्क्रीन बंद कर दी।

"मीरा ठीक कह रही है," उस्ताद ने कहा। "नाम मिल गया। पर नाम से ताला नहीं खुलता। ताला खुलने के लिए ताले का असली मालिक चाहिए।"

"ताले का असली मालिक तो हमारे परदादा हैं," काजल ने कहा। "और वो नहीं हैं।"

"तो मालिक का हक़ किसके पास है?" याकूब चाचा ने पूछा।

माँ ने धीरे से कहा, "औरत के पास।"

सब फिर उनकी तरफ़ देखने लगे।

"बाईस साल मैंने सोचा," माँ ने कहा, "कि वो काग़ज़ मेरे ससुर ने किसी को दिया था, और वो किसी ने मेरे संदूक के नीचे दबा दिया। पर आज जब मैंने देखा कि ताले पर वही नाम खुदा है, तो समझ आया — काग़ज़ नीचे नहीं पड़ा था, अंकुश। काग़ज़ जान-बूझकर नीचे रखा गया था। जिसने रखा, वो चाहता था कि कोई उसे ढूँढे — पर ऐसा कोई न ढूँढे जो उसे समझ न सके।"

"औरत," मैंने कहा।

"हाँ," माँ ने कहा।

मैंने मेज़ से घंटी उठाई। वो ठंडी थी। मैंने उसे हाथ में लिया और कान के पास लाया, जैसे कोई उसे बजाए बिना सुन सकता हो।

और मैंने घंटी से पूछा, बहुत धीरे से, इतना धीरे कि कमरे में सिर्फ़ माँ ने सुना।

"अब क्या?"

घंटी कुछ देर चुप रही। और फिर, बिना बजे, बिना हिले, उसके भीतर से एक आवाज़ आई — रूखी, छोटी, तीन शब्दों से ज़्यादा नहीं।

"सामने वाला हाथ।"

मैंने घंटी नीचे की। मुझे समझ आ गया था।

"अंकुश?" काजल ने कहा। "तू क्या सोच रहा है?"

"मैं पहले उस औरत से मिलूँगा," मैंने कहा, और अपनी जैकेट उठाई, "जो रोज़ सुबह झोपड़ी के बाहर पत्थर पर पाँच रोटियाँ रख जाती है।"

"क्यों?" याकूब चाचा ने कहा।

"क्योंकि पचास साल से वो उन्हीं हाथों से रोटी रख रही है," मैंने कहा, "जिन हाथों ने उस रात कुछ उठाया था। और आज वो पीपल के नीचे बैठी हमारी राह देख रही है।"

मैंने घंटी अपनी जेब में रखी। फिर रुका, पलटा, और माँ की तरफ़ देखा।

"माँ," मैंने कहा, "आज से जो भी सच होगा, वो सबके सामने होगा। सबके सामने। अब अलमारी में नहीं। ठीक है?"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर मैंने उनकी आँखों में वो चीज़ पहली बार देखी जो मैंने बीस साल में कभी नहीं देखी थी — हल्की सी मुस्कान। बहुत थकी हुई, बहुत छोटी, पर मुस्कान।

"ठीक है," उन्होंने कहा। "पर एक बात सुन ले। जो काग़ज़ मेरी कॉपी के पिछले हिस्से में है — उसे मैं लाई हूँ। यहाँ। मेरी कमर में।"

मैं चौंका।

"अभी?"

"तूने सोचा मैं बाईस साल सिर्फ़ छिपाती रही?" उन्होंने कहा। "मैं हर रोज़ उसे देखती थी, अंकुश। हर रोज़। हर बार जब कोई बाहर से दरवाज़ा खटखटाता, मैं उसे छूकर देखती कि वो अभी भी है। अब वो मेरी कमर में है और मैं उसे लेकर तेरे साथ चलूँगी।"

"माँ, वहाँ मशीन है—"

"मैं मशीन से नहीं लड़ने जा रही," उन्होंने कहा। "मैं उनके सामने वो काग़ज़ खोलने जा रही हूँ जिसे मैंने बाईस साल छिपाया। और अगर वो मुझे रोकने आए, तो मैं उन्हें ये बताऊँगी कि मैं वो औरत नहीं हूँ जो डर के मारे अंगूठा लगाती है। मैं सुशीला यादव हूँ।"

काजल ने कहा, "माँ, मैं भी चलूँगी।"

"नहीं," माँ ने कहा। "तू काजल की तरफ़ मत देख, अंकुश। तू उसके साथ अस्पताल जाएगी।"

"माँ—"

"काजल," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में अब वो सख़्ती थी जो सिर्फ़ माँ की आवाज़ में होती है — और साथ में कुछ और भी, जो सिर्फ़ उस रात में होता है जब माँ को पता हो कि बेटी की ज़िद जानलेवा है। "तेरे पास चार गोली हैं। दो दिन। नई खेप रुकी है। तू अस्पताल जाएगी, डॉक्टर इसरानी के पास बैठेगी, और वहाँ से हिलेगी नहीं। अगर मैं सुनूँ कि तू गली में आई, तो मैं उसी वक़्त वहाँ से उठकर घर आ जाऊँगी। और तू जानती है कि मैं ऐसा कर सकती हूँ।"

काजल की आँखें भर आईं। पर वो माँ की बेटी थी। उसने गर्दन हिलाई, और उस हरकत में हाँ से ज़्यादा ठीक है था।

मैंने अपना हाथ बढ़ाया और माँ की कमर से लिपटा कपड़े का पुलिंदा लिया। बहुत हल्का था। मैंने उसे जेब में रखा।

फिर मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

उस्ताद मेरे साथ आए। याकूब चाचा उठे, फिर रुक गए।

"तुम नहीं चाचा," मैंने कहा। "आप यहाँ रहिए। माँ के साथ।"

"मैं किसी की रखवाली नहीं करता," याकूब चाचा ने कहा कड़क आवाज़ में, और उनकी आवाज़ में पचास साल पुरानी वो हठ थी जो कोई नहीं बदल सकता था। "मैंने पचास साल अपने सीने पर वो पोटली रखी है। आज रात वो खुलेगी, और मैं उस वक़्त किसी के पीछे नहीं बैठूँगा।"

मैं उन्हें देखता रह गया।

"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक शर्त है। आप अपनी लाठी उठाइए। और अगर मैं कहूँ कि रुक जाइए, तो आप रुक जाइएगा। भाई की बात तो माननी पड़ती है।"

याकूब चाचा ने पलक नहीं झपकी।

"किसका भाई?" उन्होंने कहा।

"मेरा," मैंने कहा, और मुस्कुरा दिया। "अभी-अभी बना हूँ। पचास साल की देरी है, पर देर आए दुरुस्त आए।"

कमरे में पहली बार हल्की हँसी फैली। उस्ताद ने कहा, "ये लड़का तंत्र से नहीं, बकबक से काम निकालेगा।" और माँ ने कहा, "उसके बाप का ही बेटा है।" पापा ने कुछ नहीं कहा, पर उनके चेहरे पर वो थकी हुई सुकून थी जो आदमी के चेहरे पर तब आती है जब वो बहुत दिनों बाद अपने ही घर में घुटनों के बल बैठा हो और कोई उन्हें उठने को न कह रहा हो।

मैंने दरवाज़ा खोला।

बाहर आधी शाम थी। गली में पीली रोशनी आ रही थी — पीपल के नीचे जलती तपेरी की, जो कोई बूढ़ा रोज़ जलाता था। हवा में मिट्टी की गंध थी और दूर कहीं मशीन की धीमी घरघराहट।

मैंने एक कदम निकाला और रुक गया।

क्योंकि पीपल के नीचे, चबूतरी के ठीक सामने, वो खड़ी थी।

ओढ़नी वाली बूढ़ी औरत। उसी ओढ़नी में, वही झुर्रियों भरा चेहरा, पर आज उसके हाथ खाली नहीं थे। आज उसने अपना हाथ ऊपर उठाया हुआ था — और उस उठे हुए हाथ की कलाई पर मुझे वो दिखी जो मैंने पहले कभी इतनी साफ़ नहीं देखी थी।

हरी शीशे की चूड़ी।

एक ही चूड़ी। बाक़ी कलाई खाली थी। और वो चूड़ी उसकी कलाई से बड़ी थी — ढीली, हिलती हुई, जैसे किसी और की हो और वो अपने पास सिर्फ़ इसलिए रखे हुए हो कि लौटानी है।

हम दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

और फिर उसने चूड़ी को थोड़ा और ऊपर किया, जैसे कोई तराज़ू पर कोई चीज़ रखता है, और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

"तू आ गया," उसने कहा। उसकी आवाज़ में कोई हैरानी नहीं थी। जैसे उसे पता था। जैसे वो पचास साल से नहीं, आज सुबह से इंतज़ार कर रही थी, और आज सुबह वो इंतज़ार खत्म हो चुका था।

"मैं आ गया," मैंने कहा। "पर आपने मुझे नहीं बताया कि आप मेरे घर की हो।"

औरत ने चूड़ी को हाथ में रखा और उसे देखने लगी, जैसे वो कोई चीज़ नहीं, कोई गवाह हो।

"बताती तो क्या होता?" उसने कहा। "कुछ चीज़ें बोलने से नहीं, बोलवानी पड़ती हैं। तेरे घर में आज बहुत बातें बोलवाई गईं। मैं वहीं बैठी सुन रही थी।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसकी।

"आप सुन रही थीं?"

"मैं पचास साल से सुन रही हूँ," उसने कहा। "आज पहली बार कुछ ऐसा सुना जो मुझे सुनना था। तेरी माँ ने अपनी बात कही। तेरे पापा ने अपना हाथ उठाया। और याकूब…" उसने याकूब चाचा की तरफ़ देखा, जो मेरे पीछे दरवाज़े पर खड़े थे, और उसकी आवाज़ पहली बार बदली, "याकूब, तू बूढ़ा हो गया।"

याकूब चाचा की लाठी फिर फ़र्श पर गिरी। इस बार वो उसे उठाने के लिए नहीं झुके। वो सीधे उसकी तरफ़ चले और उनकी आँखों में पानी था।

"बड़ी बी," उन्होंने कहा।

बड़ी बी।

वो नाम जो उस्ताद ने आज दुकान में लिया था। वो नाम जिसके साथ पचास साल पुराना इल्ज़ाम जुड़ा था। वो नाम जिस पर सबको यकीन था कि उसने याकूब पर झूठा आरोप लगाया था।

वो औरत बड़ी बी थी।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा नहीं बदला। न कोई गुस्सा, न कोई माफ़ी माँगने की जल्दी। बस एक बहुत थकी हुई सफ़ाई, जैसे बरसों की धूल किसी ने आज सुबह पोंछ दी हो।

"तूने मुझ पर इल्ज़ाम लगाया था," याकूब चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ टूट रही थी। "तूने पूरे बाज़ार में कहा कि मैंने काग़ज़ बदले। मेरे बाप को दुकान छोड़नी पड़ी। हमने घर बदला। मेरी बहन की शादी टूटी। तू जानती है कि तूने क्या किया?"

"जानती हूँ," बड़ी बी ने कहा।

"और तू अब चुप खड़ी है?"

"मैं चुप नहीं खड़ी," उसने कहा। "मैं तेरी बात सुन रही हूँ। पहले तू पूरी बात कह ले। पचास साल का हिसाब एक मिनट में नहीं चुकता।"

याकूब चाचा ने अपना मुँह खोला, पर कुछ नहीं निकला। उनके हाथ काँप रहे थे और उनकी लाठी ज़मीन पर पड़ी थी और कोई उसे उठाने वाला नहीं था।

मैंने घंटी जेब से निकाली।

वो ठंडी थी। एकदम ठंडी।

और तभी मुझे एहसास हुआ कि ये ठंडक पहली वाली ठंडक नहीं थी। पहली ठंडक बात पूरी होने की थी। ये ठंडक कुछ और थी। ये उस ठंडक की तरह थी जो दरवाज़े के बाहर खड़े किसी आदमी की होती है, जो अंदर आने से पहले एक गहरी साँस लेता है।

बड़ी बी ने अपना हाथ नीचे किया और हरी चूड़ी उसकी उँगलियों में लटक गई।

"अंकुश," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा आया जो मैं समझ नहीं पाया — न ममता, न सख़्ती, कुछ बीच का। "तेरे पास जो ताला है, वो मेरे पास आया था। उसी रात। उसी रात जब आग लगी थी।"

"आपके पास?"

"मैंने उसे फ़र्श से उठाया था," उसने कहा। "जब सब भाग रहे थे और कोई किसी को नहीं देख रहा था। मैंने सोचा — ये रहने दो, कोई इसे ढूँढने आएगा। पर कोई नहीं आया। पचास साल कोई नहीं आया। तो मैंने खुद रास्ता बनाया।"

"आपने मेरे घर में काग़ज़ रखा," मैंने कहा। "माँ की हिसाब की कॉपी में।"

"हाँ," उसने कहा। "और एक दिन वो काग़ज़ तेरी माँ को मिला। मैंने देखा कि उसने उसे छुपाया। मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सोचा — एक दिन ये औरत खुद इसे बाहर निकालेगी। और आज निकाला।"

मैं उसकी तरफ़ देखता रह गया।

"आप मेरी परदादी हैं?" मैंने पूछा।

बड़ी बी ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने अपनी चूड़ी उतारी और उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये तेरी परदादी की है," उसने कहा। "मैंने इसे पचास साल अपनी कलाई पर इसलिए रखा था कि ये किसी और की चीज़ है। अब तू इसे पहन। और मैं तुझे बताती हूँ — शिवनारायण का ताला मेरे पास है, और उसकी चाबी तेरे गले में नहीं, तेरे पापा के डर में बंद है।"

मैंने वो चूड़ी अपनी हथेली पर ली। वो ठंडी थी।

"मेरे पापा के डर में?"

"तेरे गले की चाबी ताले की चाबी नहीं है," बड़ी बी ने कहा। "वो घर की चाबी है। ताले की चाबी वो चीज़ है जो तेरे पापा पाँच साल से अपनी जेब में रखे हैं और निकालते नहीं। और जब तक वो उसे निकालकर खुद मेरी तरफ़ नहीं बढ़ाएँगे, ये ताला नहीं खुलेगा।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

पापा दरवाज़े पर खड़े थे। वो सब सुन रहे थे। और उनका चेहरा — मैंने उसे कई बार टूटते देखा था, पर आज उस पर एक चीज़ और थी।

पहचान।

जैसे कोई पाँच साल से किसी को खोज रहा हो, और वो सामने खड़ा हो।

पापा ने धीरे से कहा, "बड़ी बी, आप यहाँ कब से हो?"

"जब से तुमने मुझे भुलाया," बड़ी बी ने कहा।

"मैंने आपको नहीं भुलाया," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ भारी हो गई, "मुझे हर रात याद आता था। मैंने बस सोचा कि आपने मुझे माफ़ नहीं किया।"

"मुझे माफ़ करने के लिए तुझे सामने आना पड़ता," बड़ी बी ने कहा। "और तू सामने नहीं आया। तेरा बेटा आया।"

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"इसका सारा नाम मेरे पास लिखा है," उसने कहा, "और मैं तुम्हें बताऊँगी। पर पहले एक चीज़।"

"क्या?" मैंने कहा।

"उस औरत का नाम," बड़ी बी ने कहा और उसकी आँखें मेरी आँखों में जम गईं, "जिसने तेरे पापा को रणवीर के दफ़्तर में अंगूठा लगवाया। उसे भी आना पड़ेगा। और वो आएगी — क्योंकि वो भी पचास साल से इंतज़ार कर रही है।"

"कौन है वो?" मैंने पूछा।

बड़ी बी ने अपने होंठ खोले, और फिर कुछ नहीं कहा। उसने सिर्फ़ इतना कहा —

"सात बजे से पहले उसका नाम तेरे मुँह पर नहीं आएगा। क्योंकि सात बजे वाला काम तेरा नहीं है। सात बजे वाला काम मेरा है। और मैं उसे अकेले करूँगी।"

मशीन की आवाज़ पास आ गई।

और मैं दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में हरी चूड़ी, जेब में ठंडी घंटी, और ये समझ नहीं पा रहा था कि जो पाँच मिनट पहले सबसे बड़ा सवाल था — कि मेरे परदादा कौन थे — वो सवाल अब कहीं पीछे छूट गया है, और सामने एक नया सवाल खड़ा है।

कि वो औरत जो रोज़ रोटी रखती थी, जिसने मेरी माँ की ससुराल का ताला पचास साल संभाला, जो मेरे घर की थी — वो सात बजे अपने बूते पर क्या करने जा रही थी।

और मैंने उससे पूछा, क्योंकि मैं रह नहीं पाया।

"बड़ी बी," मैंने कहा, "आप सात बजे क्या करेंगी?"

बड़ी बी ने अपनी ओढ़नी ठीक की और सीधी मेरी तरफ़ देखा।

"मैं अपना नाम," उसने कहा, "पूरी गली के सामने बोलूँगी। और जब मैं अपना नाम बोलूँगी, तो तेरे परदादा का ताला खुद खुलेगा।"

वो पलटी और चलने लगी।

फिर रुकी, और बिना मुड़े बोली —

"और अंकुश — वो जो मशीन लेकर सात बजे आ रਹा है, उसके पीछे जो आदमी खड़ा है, उसने मुझे भी पच्चीस साल पहले बुलाया था। मैं नहीं गई।" उसकी आवाज़ में पहली बार गुस्सा आया, बहुत पुराना, बहुत ठंडा गुस्सा। "आज वो आएगा। और आज मैं उसका नाम लूँगी।"

वो पीपल की तरफ़ चल दी, और गली की पीली रोशनी में उसकी परछाईं लंबी होती गई, जैसे बाईस साल की चुप्पी एक साथ सामने चल रही हो।

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