The Mysterious Bell211 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 211: jodne wala mistri hissa 022 ep211-220

162 min read November 5, 2026

मैंने गली में कदम रखा और पीछे मुड़कर नहीं देखा।

पीछे पापा खड़े थे, दुकान के शटर के सामने, हाथ में वही पुरानी रिंच। मीरा मेरे पीछे-पीछे चल रही थी, कैमरा खुला, बाँह नीची, आँखें सीधी घर के दरवाज़े पर। सानिया मेरे आगे थी। गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू बीच में, एक-दूसरे की कमीज़ पकड़े हुए।

और घर का दरवाज़ा खुला था।

बस खुला नहीं था, ऐसे खुला था जैसे किसी ने खोलकर छोड़ दिया हो और यह भूल गया हो कि बंद भी करना होता है।

भीतर से पीली रोशनी आ रही थी।

वो रोशनी मुझे पता थी। घर के पिछले हिस्से में, चूल्हे के पीछे, दीवार के ताखे पर माँ का पुराना पीतल का दीया रखा रहता था। महीने में एक बार जलता था — पूर्णिमा को, या जब माँ का मन भारी होता।

आज न पूर्णिमा थी, न माँ का मन भारी होने वाली कोई बात थी।

आज तो बस सुबह सात बजे हमारा घर, हमारी दुकान, हमारा अस्पताल — सब कुछ उस एक आदमी की मशीन के नीचे आने वाला था।

तुम सोच रहे होगे कि ऐसी रात में घर में घुसना बेवकूफ़ी है।

हाँ, है।

पर मैंने आज तक बेवकूफ़ी नहीं की, ये मैंने पिछली बार भी कहा था और आज भी कह रहा हूँ।

मैंने दरवाज़े पर हाथ रखा।

लकड़ी ठंडी थी।

पर भीतर की हवा गरम थी — जैसे किसी ने अभी कुछ जलाया हो और वो बुझा भी हो और गरमी छोड़ गया हो।

"अंकुश," मीरा ने धीमे से कहा। "कैमरा चालू है।"

"चालू रख," मैंने कहा। "और अगर भीतर कोई चीज़ आए, तो कैमरा नहीं, अपनी जान बचाना।"

"बहुत मज़ाकिया हो रहे हो।"

"मैं तो सीरियस हूँ," मैंने कहा। "कैमरा बाद में भी लग जाएगा। तू बाद में नहीं लगेगी।"

सानिया ने मेरी कमीज़ खींची।

"उस्ताद," उसने कहा। "अंदर जाना है क्या?"

"अंदर मेरा घर है," मैंने कहा।

"अरे, मतलब — डर नहीं लग रहा?"

"लग रहा है," मैंने कहा। "पर घर है। डर अलग बात है, घर अलग बात है। घर में डर जाता है कभी-कभी। घर डर से बड़ा होता है।"

चिंटू ने पीछे से कहा, "उस्ताद, इतनी फ़िलॉसफ़ी में तो भूत हमें खा जाएगा।"

"तो तू अंदर आ जल्दी," मैंने कहा।

मैं अंदर घुसा।

भीतर पहला कदम रसोई की तरफ़ जाता है, बाएँ हाथ माँ की अलमारी, दाएँ हाथ पापा की चारपाई। सीधे आगे छोटा आँगन, जिसके पीछे चूल्हा और चूल्हे के पीछे वो दरवाज़ा।

और मैंने पहले जो देखा, वो था — फ़र्श।

मिट्टी और गोबर से पुता हुआ फ़र्श, जिसे माँ हर रविवार खुद सींती थी। उस फ़र्श पर आज कुछ पड़ा था।

बुझी हुई माचिसें।

एक, दो, तीन… मैंने गिना।

नौ।

नौ माचिसें, जली हुई, टेढ़ी-मेढ़ी पड़ी थीं — जैसे किसी ने एक के बाद एक जलाया और बुझाया और फेंकता गया। और वो सब एक सीध में नहीं थीं। वो एक रास्ता बना रही थीं।

दरवाज़े से शुरू, फिर दीवार के साथ-साथ, फिर चूल्हे के पास, और फिर — पीछे के दरवाज़े की तरफ़।

मैंने सानिया की तरफ़ देखा।

वो भी वही देख रही थी।

"उस्ताद," उसने कहा। "ये कोई… किसी ने जान-बूझकर रखी हैं?"

"रास्ता बना रही हैं," रफ़ीक़ ने कहा। "जैसे जासूसी फ़िल्मों में होता है।"

"और तूने ये फ़िल्म कहाँ देखी?" चिंटू ने कहा।

"तेरे जैसे किसी के घर में, बिना बुलाए," रफ़ीक़ ने कहा।

"चुप दोनों," मैंने कहा।

मैंने आगे बढ़कर दीया देखा।

वो ताखे पर नहीं, फ़र्श पर रखा था — चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े के ठीक सामने, एक ईंट पर रखा हुआ। पीतल का पुराना दीया, काला पड़ा हुआ, तेल आधा, बत्ती लाल।

लौ काँप रही थी।

मैंने आसपास देखा — कोई खिड़की खुली नहीं, कोई हवा नहीं, कोई पंखा नहीं।

फिर भी लौ काँप रही थी। धीरे-धीरे। ऐसे, जैसे कोई बात कर रहा हो और साँस ले रहा हो बीच-बीच में।

मीरा ने कैमरा दीये पर टिकाया।

"अंकुश," उसने धीमे से कहा। "ये… ये जल रहा है।"

"दिख रहा है," मैंने कहा।

"मतलब — कोई अभी यहाँ था। कोई इसको जलाकर गया है।"

"या कोई इसे जलाकर छोड़ गया है कि हम समझें वो अभी भी यहाँ है," मैंने कहा।

मैंने दीये के चारों तरफ़ देखा।

राख।

गरम नहीं, ठंडी नहीं — ठंडी हो चुकी थी, पर ताज़ी थी। ऐसी राख जो आज की हो, हफ़्ते पुरानी नहीं।

और वो राख सिर्फ़ दीये के पास नहीं थी। वो दीये से चूल्हे तक जाती थी, और चूल्हे से उस छोटी संदूकची तक जो माँ के कमरे के कोने में रखी थी।

माँ की ब्याहता वाली संदूकची।

लाल कपड़े में लिपटी, पीतल की पट्टियों वाली, जिसे माँ ने अपनी शादी के सामान से नहीं, अपनी माँ के सामान से लिया था। जिसे मैंने बचपन में एक बार खोलने की कोशिश की थी और माँ ने हाथ पकड़कर रोक दिया था — "ये तेरे हाथ की चीज़ नहीं है अभी।"

मैं उसके पास गया।

और रुक गया।

संदूकची बंद थी।

ताला लगा था। पीतल का पुराना ताला, वैसा ही जैसा हमारे घर के बाकी संदूकों पर था।

पर उसके पास राख का निशान था।

हाथ का।

पूरा हाथ, फ़र्श पर राख से बना हुआ — पाँच उँगलियाँ, हथेली, कलाई। और सबसे छोटी उँगली — अधूरी।

मैंने मुड़कर मीरा को देखा।

मीरा का चेहरा सफ़ेद था।

"वही हाथ," उसने कहा।

"वही हाथ," मैंने कहा।

"अंकुश, घर में कोई है।"

"नहीं है," मैंने कहा।

"तू कैसे —"

"आ जाओ," मैंने कहा, और सबको इशारा किया।

हमने पूरा घर छाना। मैंने माँ के कमरे की अलमारी खोली — कपड़े, साड़ियाँ, हिसाब की कॉपी — सब जगह पर। पापा की चारपाई के नीचे देखा — औज़ार का बक्सा, पुराना जूता, धूल। रसोई — बर्तन जगह पर, आटे का डिब्बा बंद, चूल्हा ठंडा।

चूल्हा ठंडा था।

पर उसके पास की ज़मीन गरम थी।

मैंने हाथ फ़र्श पर रखा — गरमी नहीं, बस हल्की सी उमस, जैसे कोई अभी-अभी उठकर गया हो और अपनी गरमी छोड़ गया हो।

पीछे वाला दरवाज़ा।

वो दरवाज़ा जिसके बारे में पापा ने कहा था — "उसके पीछे तेरी माँ की ब्याहता है।"

वो दरवाज़ा बंद था।

पर उसके नीचे, फ़र्श पर, राख की एक पतली लकीर थी — जैसे किसी ने उँगली से उसे दबाया हो और फिर पीछे हट गया हो।

मैंने हाथ उस दरवाज़े के कुंडे पर रखा।

गरम था।

मैंने तुरंत हाथ हटा लिया।

"अंकुश?" मीरा ने कहा।

"ये गरम है," मैंने कहा।

"क्या?"

"वो दरवाज़ा गरम है," मैंने कहा। "जैसे — जैसे कोई अभी उसे पकड़कर खींचने की कोशिश कर रहा हो।"

"तो क्या हम —"

"नहीं," मैंने कहा, और मैंने खुद को पीछे किया। "पापा ने कहा था, आज रात इसे अकेले नहीं खोलूँगा। और घंटी ने कहा था, इसे चाबी नहीं, हिम्मत चाहिए।"

और मुझे पता था कि आज रात मेरी हिम्मत गली में खर्च होनी है, यहाँ नहीं।

सानिया ने ठंडी आवाज़ में कहा, "उस्ताद, एक बात कहूँ?"

"कह।"

"अंदर घुसते वक़्त मैं सोच रही थी — कोई भूत मिलेगा तो क्या करूँगी।"

"तो?"

"अब पता चला," उसने कहा। "भूत स्लिपर पहनना भूल गया। फ़र्श पर राख के पैरों के निशान बनाकर गया।"

चिंटू हँसने लगा।

पर गुड्डू नहीं हँसा।

गुड्डू ने मेरा हाथ पकड़ा।

"उस्ताद," उसने कहा। आवाज़ काँप रही थी। "बाहर — बाहर जब हम आए — मुझे लगा था कोई हमारे पीछे है। और उसके पैरों से… पैरों से आवाज़ नहीं आ रही थी।"

"तो आवाज़ कहाँ से आ रही थी?" रफ़ीक़ ने पूछा।

"उसके जूतों से," गुड्डू ने कहा। "लकड़ी के जूतों से। पर वो चलता नहीं था। लग रहा था वो खड़ा है और हम उसके पास से गुज़र रहे हैं।"

मैं कुछ नहीं बोला।

मैंने गुड्डू का हाथ थोड़ा ज़ोर से पकड़ा।

"ठीक है," मैंने कहा। "आज रात तुम पाँचों मेरे आस-पास रहोगे। एक कदम भी अलग नहीं।"

"उस्ताद," चिंटू ने कहा। "हम तो जासूस हैं। बच्चे नहीं।"

"जासूस भी मरते हैं," मैंने कहा। "और मैंने तुम्हारी माँ को वादा किया है कि ये जासूसी स्कूल बंद होने से पहले खत्म होगी। समझे?"

"समझे," सबने एक साथ कहा। यहाँ तक कि गुड्डू ने भी।

मैंने दीया उठाया।

लौ मेरी उँगलियों के पास आई और फिर भी नहीं बुझी।

"घंटी," मैंने धीमे से कहा। "कुछ बता।"

घंटी जेब में थी। ठंडी।

मैंने उसे निकाला।

हथेली पर रखा।

एक पल कुछ नहीं हुआ।

फिर घंटी बोली — बहुत धीमे, इतना धीमे कि जैसे मेरे ही अंदर से कोई आवाज़ आ रही हो।

"चोर नहीं आया," उसने कहा।

मैं ठिठका।

"ढूँढने वाला आया," घंटी ने कहा।

मीरा ने कैमरा थोड़ा नीचे किया, जैसे घंटी की आवाज़ रिकॉर्ड करनी हो।

"क्या ढूँढ रहा था?" मैंने पूछा।

"जो उसे मिला नहीं," घंटी ने कहा। "पर वो जानता है कि वो कहाँ है।"

"कौन सी चीज़?"

"नाम," घंटी ने कहा।

"किसका नाम?"

"तुम्हारे घर का नाम," घंटी ने कहा। "सिर्फ़ दरवाज़े पर लिखा नहीं। अंदर, किसी चीज़ पर लिखा हुआ।"

मैंने चारों तरफ़ देखा।

"कहाँ?"

घंटी चुप हो गई।

"घंटी —"

"मैंने कहा था," उसने कहा, "उसे खोलने के लिए हिम्मत चाहिए।"

"ये दरवाज़ा —"

"ये दरवाज़ा और वो दरवाज़ा, अंकुश," घंटी ने कहा, "एक ही ताले से बंद हैं।"

और फिर वो चुप हो गई, और इस बार ऐसी चुप कि मुझे लगा वो बोलने के लिए नहीं, मुझे सोचने के लिए चुप हुई है।

मैंने घंटी जेब में रखी।

मैंने दीया पीछे वाले दरवाज़े के सामने ही रख दिया — बुझाकर नहीं, जलता हुआ। जो जलाया था उसने, वो जलता रहे। अगर वो लौटेगा, तो देखेगा कि हमने उसकी लौ नहीं बुझाई — हमने बस वहाँ से अपना हिसाब लिया।

फिर मेरा फोन बजा।

काजल का नाम।

मैंने उठाया।

"अंकुश?" काजल की आवाज़ आई। धीमी, थोड़ी हाँफती।

"हाँ," मैंने कहा। "बोल। माँ?"

"माँ ठीक हैं," काजल ने कहा। "सुरक्षित हैं। बुखार नहीं, दर्द नहीं। पर —"

"पर?"

"वो सो नहीं रहीं," काजल ने कहा। "आधी रात से करवट बदल रही हैं। डॉक्टर इसरानी आए थे, उन्होंने कहा कि घबराने की बात नहीं। पर माँ बार-बार कुछ बुदबुदा रही हैं।"

मैंने आँखें बंद कीं।

"क्या?"

"एक पुरानी कैसेट का नाम ले रही हैं," काजल ने कहा। "मैंने पूछा, माँ कौन सी कैसेट, तो उन्होंने आँखें खोलीं और सिर्फ़ इतना कहा — 'वो कैसेट, जिस पर नीली स्याही से नाम लिखा है।'"

"कौन सा नाम?"

काजल कुछ देर चुप रही।

"मुझे ठीक से समझ नहीं आया," उसने कहा। "पर एक बार उन्होंने ज़ोर से कहा — शंकरलाल।"

मेरे हाथ से घंटी फिसल गई।

मैंने उसे हवा में पकड़ा, फिर हथेली पर रखा।

"शंकरलाल?" मैंने दोहराया।

"हाँ," काजल ने कहा। "फिर वो चुप हो गईं। जैसे कहकर डर गई हों। अंकुश — शंकरलाल कौन है?"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

मीरा ने सिर हिलाया — उसे भी नहीं पता था।

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर पड़ताल करूँगा। तू माँ के पास रह। कुछ भी हो — माँ को अकेला मत छोड़ना।"

"तू कहाँ है?"

"घर में," मैंने कहा।

"घर में?" उसकी आवाज़ तेज़ हुई। "अंकुश, इस वक़्त —"

"काजल," मैंने कहा। "मैं ठीक हूँ। बच्चे साथ हैं। मीरा साथ है।"

"पर घंटी ने कहा था —"

"घंटी ने कहा था कि घर की बारी है," मैंने कहा। "और मैं घर में हूँ।"

काजल कुछ देर चुप रही।

फिर बोली, "अंकुश, वो कैसेट वाली बात — मुझे अच्छी नहीं लग रही। माँ ने पहले कभी ऐसा नहीं किया।"

"माँ ने पहले कभी ऐसी रात नहीं देखी," मैंने कहा।

"मुझे डर लग रहा है।"

"मुझे भी," मैंने कहा। "पर मैं डर के साथ भी काम करता हूँ। तू भी कर।"

"क्या करूँ?"

"माँ के पास बैठ," मैंने कहा। "और उनका हाथ पकड़े रह। अगर वो फिर कुछ बोलें, तो सब याद रखना। हर शब्द। भले ही बेमतलब लगे।"

"ठीक है," काजल ने कहा।

"और काजल —"

"हाँ?"

"अगर माँ कहे कि कुछ लेने जाना है, तो मत जाना। जो वो कहें, मुझे बताना। मैं आकर लाऊँगा।"

"ठीक है।"

फोन कटा।

मैंने फोन जेब में रखा।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"शंकरलाल," उसने धीमे से कहा।

"हाँ।"

"अंकुश, ये नाम —"

"पेचकस के हत्थे में था," मैंने कहा। "उस्ताद ने खोला था, याद है? काग़ज़ में शंकरलाल लिखा था। दादा जगदीश यादव का बड़ा भाई।"

मीरा की आँखें बड़ी हुईं।

"तो माँ उसका नाम क्यों ले रही हैं?"

"यही तो," मैंने कहा। "और वो भी कैसेट के साथ। यानी घर में कोई पुरानी कैसेट है। और उस पर शंकरलाल का नाम लिखा है।"

"क्या तूने कभी देखी?"

"नहीं," मैंने कहा। "पर माँ की आवाज़ में डर था। और माँ को डर कम ही लगता है।"

मैंने सानिया की तरफ़ देखा।

"सानिया, तुम पाँचों अब भी घर छानो। पर इस बार एक चीज़ ढूँढो — कैसेट। पुरानी कैसेट। ऑडियो वाली।"

"कैसेट?" चिंटू ने कहा। "वो तो पुराने ज़माने की चीज़ है।"

"हाँ," मैंने कहा। "और इस घर में सब कुछ पुराने ज़माने का है। इसीलिए तो हम आज भी यहाँ रहते हैं।"

सानिया हँसी।

फिर गंभीर हो गई।

"उस्ताद," उसने कहा। "अगर कैसेट नहीं मिली तो?"

"तो मिलेगी," मैंने कहा। "तुम्हारे हाथ में।"

मैं बाहर निकला।

दरवाज़े पर खड़े होकर मैंने अपनी जेब से ताला निकाला — वही पुराना ताला जो हमारे घर पर हमेशा लगता था, जो सुबह से रात तक बाहर लटकता रहता था।

मैंने ताला लगाया।

चाबी घुमाई।

क्लिक।

आवाज़ आई — छोटी सी, साधारण सी।

और फिर मुझे लगा कि उस एक आवाज़ में कुछ और भी था। जैसे सालों से कोई चीज़ बंद थी और अब बंद होकर उसने चैन की साँस ली हो।

मैंने ताला हिलाकर देखा।

पक्का था।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

"तैयार है?"

"किस लिए?"

"गली में जाने के लिए," मैंने कहा। "अभी तो सिर्फ़ घर देखा है। असली बात गली में है।"

मीरा ने कैमरा ऊपर किया।

"अंकुश," उसने कहा। "एक बात कहूँ?"

"कह।"

"तूने दरवाज़ा बंद कर दिया," उसने कहा। "पर अंदर दीया जलता छोड़ आया।"

"हाँ।"

"क्यों?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्योंकि अगर वो लौटा," मैंने कहा, "तो उसे पता चलना चाहिए कि हमने उसका दीया नहीं बुझाया। हमने बस उसका घर बंद कर दिया।"

मीरा कुछ नहीं बोली।

हम गली की तरफ़ चल पड़े।

सानिया आगे, बच्चे बीच में, मीरा पीछे।

गली में धीमी हवा चल रही थी। पीपल के पत्ते सरसरा रहे थे। थाने के बाहर दुबे अंकल की कुर्सी खाली थी। शबनम आपा की गुमटी का शटर आधा गिरा था, पर उसके पीछे से हल्की रोशनी आ रही थी — काजल के लिए नहीं, बस उसने बंद नहीं किया था।

और मैंने दुकान की तरफ़ देखा।

मेरी दुकान।

पीपल के पास, टेढ़े बोर्ड वाली।

शटर बंद था।

मुझे सुकून मिला।

मैंने मीरा से कहा, "देखा, सब ठीक —"

और तभी मेरा फोन बजा।

टिंकू।

मैंने उठाया।

पहले उसकी साँस सुनी। हाँफती हुई। जैसे वो दौड़कर आया हो या दौड़ने से रुका हो।

"उस्ताद," उसने कहा।

और उसकी आवाज़ में वो डर था जो मैंने उसमें पहले कभी नहीं सुना था — उस दिन भी नहीं जब उसने अपने पापा की कमीज़ पहली बार पहनी थी।

"उस्ताद," उसने फिर कहा, "दुकान का ताला खुला है।"

मैं रुक गया।

"क्या?"

"ताला खुला है," उसने दोहराया। "और अंदर से कोई काग़ज़ खुरच रहा है।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

मीरा ने मेरी आँखें पढ़ लीं।

बिना कुछ कहे हम दोनों दुकान की तरफ़ भागे।

॥

टिंकू की आवाज़ में जो डर था, वो मुझे गली के मोड़ तक पीछे-पीछे आ रहा था। दौड़ते वक़्त मेरे फेफड़ों में जो हवा भर रही थी, वो ठंडी थी और उसमें पीपल के पत्तों की गंध थी। सुबह की हल्की रोशनी अभी आसमान के किनारे पर सिर्फ़ एक पतली लकीर बनकर उभरी थी, जैसे किसी ने आसमान पर पेंसिल से हल्की लाइन खींच दी हो।

गली में कोई नहीं था। थाने के बाहर दुबे अंकल की कुर्सी खाली थी। शबनम आपा की गुमटी का शटर आधा गिरा हुआ था और उसके पीछे से एक पीली, थकी हुई रोशनी आ रही थी — जैसे कोई रात भर जागा हो और अब भी बंद न कर पाया हो।

मैं दुकान के पास पहुँचा तो सबसे पहले शटर देखा।

आधा खुला था। बस एक हाथ भर। इतना कि कोई झुककर अंदर जा सके, खड़ा होकर नहीं। नीचे की ज़मीन पर शटर की धूल में दो पतले निशान बने थे — जूतों के, पर धुँधले, जैसे किसी ने खींचकर पोंछ दिए हों।

टिंकू शटर के बगल में दीवार से चिपका खड़ा था। उसके हाथ में मेरी पुरानी रिंच थी, पकड़ इतनी कसी हुई कि उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं। चेहरा पसीने से चिपचिपा था, आँखें बड़ी, और घुटने पर बँधी पट्टी उसने कसकर बाँधी हुई थी।

"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "मैंने अंदर नहीं झाँका।"

"क्यों नहीं झाँका?"

"क्योंकि आपने कहा था — अकेले किसी बंद जगह के अंदर नहीं घुसना। अगर अंदर कोई है तो बाहर से नाम लेना।"

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

"अच्छा किया," मैंने कहा। "धमाका करके अंदर घुस जाता तो आज मुझे तेरी माँ को हिसाब देना पड़ता।"

टिंकू ने मुश्किल से मुस्कुराने की कोशिश की।

मीरा पीछे आई। उसका कैमरा पहले से चालू था — लाल बत्ती जल रही थी, जैसे आज सुबह वो भी जल्दी उठकर तैयार आई हो।

सानिया दौड़कर आई। चिंटू उसके पीछे, और गुड्डू तथा रफ़ीक़ सबसे पीछे। रफ़ीक़ के टूटे चश्मे में एक काँच अब भी गायब था। चिंटू की चप्पल उसके हाथ में थी, क्योंकि आवाज़ न हो इसके लिए वो दौड़ते वक़्त चप्पल हाथ में ले आया था।

"अंदर कुछ है?" सानिया ने फुसफुसाकर पूछा।

"चुप रहो," मैंने कहा।

मैं शटर के नीचे झुका और घुटनों के बल बैठ गया। अंदर देखा।

दुकान वैसी ही थी जैसी रात छोड़ी थी। दीवार पर टँगे औज़ार, ट्यूब, पंचर वाला टब, लोहे की स्टैंड पर साइकिल का पहिया। गल्ला वहीं था — मेज़ पर, चारों कोनों पर पत्थर रखे हुए। कोई उसे उठाकर पलटा भी नहीं था।

पर जो चीज़ मेरी नज़र में आई, वो मेरी छाती के अंदर एक ठंडी सुई की तरह घुसी।

मेज़ के पीछे, दीवार से सटा पापा का पुराना औज़ारदान खुला पड़ा था। वो लोहे का लंबा बक्सा, जिसका ताला कभी मैंने खुलते नहीं देखा था। पापा उसे बहुत पहले — मेरे स्कूल के ज़माने में — मरम्मत के औज़ारों के नीचे ढककर रखते थे। उसका ढक्कन उलटा ज़मीन पर रखा था और अंदर का सामान बिखरा था।

औज़ार।

पुराने औज़ार।

…जिनमें से कुछ मैंने ज़िंदगी में पहली बार देखे।

"टिंकू," मैंने धीरे से कहा, "शटर खोलो — पूरा।"

टिंकू ने शटर ऊपर उठाया। आवाज़ बहुत तेज़ थी — लोहे की चर्चराहट गली में फैल गई। शबनम आपा की गुमटी से सिर उभरा, फिर बंसीलाल की सूखी खाँसी आई।

मैं अंदर घुसा और घुटनों के बल औज़ारदान के पास बैठ गया।

सब कुछ गिनती का था।

मेरी रिंचें, मेरे पेचकस, मेरी चेन, मेरी रेती, मेरी हथौड़ी। पंचर वाला डिब्बा वहीं। गल्ले में जो पैसे थे, सब जैसे थे — कुछ नहीं गया।

"कुछ चोरी नहीं हुआ," मीरा ने कहा, पीछे से झाँकते हुए।

"नहीं हुआ," मैंने कहा।

"तो फिर शटर क्यों खुला था?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्योंकि उसे चोरी नहीं करनी थी," मैंने कहा। "उसे कुछ ढूँढना था।"

मैंने औज़ारदान के अंदर हाथ डाला।

नीचे, सब औज़ारों के तले, एक मैला-सा कपड़ा था — कभी सफ़ेद रहा होगा, अब पीले-भूरे धब्बों वाला। उसके ऊपर पुराना रेडियो वाला तेल, ज़ंग का बुरादा और सूखी धूल की एक परत जमी थी। पर उँगली से छूने पर मुझे समझ आया — यह परत कुछ घंटे पहले टूटी थी। किसी ने इसे उठाया था, फिर जैसे-तैसे वापस रख दिया था।

मैंने कपड़ा उठाया।

नीचे दो चीज़ें थीं।

एक — एक पुरानी ऑडियो कैसेट। काले प्लास्टिक का चौकोर टुकड़ा, दोनों गोल छेदों के बीच धूल, और कैसेट के ऊपर लिपटी पुरानी सफ़ेद पट्टी पर किसी की हैंडराइटिंग — नीली स्याही से, काँपती हुई लकीरों में।

वो नीली स्याही।

मेरे हाथ काँपे।

दूसरी चीज़ — एक आधी जली रसीद। पीला काग़ज़, बीच से जलकर भूरा हो चुका, किनारे कुरकुरे। ऊपर जो बचा था उसमें सिर्फ़ एक टूटी सी लाइन और एक हल्की नीली गोल मोहर दिख रही थी — वैसी ही, जैसी भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की मोहर थी।

मैंने दोनों चीज़ें उठाईं।

टिंकू पीछे से आया और उसने धीरे से कहा, "उस्ताद, वो आदमी — सफ़ेद कुर्ते वाला।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"कौन सा आदमी?"

"रात को," टिंकू ने कहा। "जब मैं यहाँ पहरा दे रहा था। गली के मोड़ से वो आया — धीरे-धीरे चल रहा था, जैसे कोई मंदिर में घुस रहा हो। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते। चेहरा नहीं दिखा। दो बार यहाँ रुका, फिर खिड़की के पास झुककर अंदर देखने लगा। मैंने सीटी बजाने के लिए मुँह में उँगली रखी — पर तभी वो मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।"

"तुझे देखा?"

"नहीं," टिंकू ने कहा। "मुझे नहीं। मेरी तरफ़। मतलब — मेरी तरफ़ देखा, पर जैसे वो पहले से जानता हो कि मैं कहाँ छिपा हूँ। फिर हँसा। फिर चला गया।"

"हँसा कैसे?"

टिंकू ने कुछ सोचा।

"ऐसे," उसने कहा, "जैसे कोई हिसाब करके जाता हो।"

मीरा ने कैमरा हाथ में लिया और सीधी खड़ी हो गई।

"अंकुश," उसने कहा, "सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते। ये चंद्रेश के आदमियों का पहनावा है। मुझे यह भी याद है — उस रात मोटा आदमी, फिर स्कूल के गेट पर सफ़ेद कुर्ते वाला। दोनों। अलग-अलग समय, एक ही कपड़ा। ये चंद्रेश ही है।"

मैंने कैसेट को उँगलियों में घुमाया।

"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "चंद्रेश वकील है। वो चोरी नहीं करता, काग़ज़ करता है।"

"तो?"

"तो ये काग़ज़ का काम नहीं है," मैंने कहा। "यह कुछ और है।"

मैं आधी जली रसीद को रोशनी की तरफ़ उठाकर देखने लगा। जो बचा था उस पर सिर्फ़ दो शब्द बन रहे थे — बाक़ी सब जल गया था। और एक तारीख़ का आख़िरी अंक।

मैं अभी उसे ठीक से पढ़ने की कोशिश कर ही रहा था कि गली में पापा की चप्पलों की आवाज़ आई।

धीमी। भारी। जैसे कोई बहुत तेज़ चलने की कोशिश कर रहा हो पर टाँगें साथ न दे रही हों।

वो दुकान के सामने पहुँचे, शटर खुला देखा, मेरे हाथ में औज़ारदान देखा — और रुक गए।

उनका चेहरा उस पल ऐसे पीला पड़ा जैसे कोई काग़ज़ की शीट पानी में गिर गई हो। चश्मा, जो टेप से कान पर बँधा था, नाक की नोक तक फिसल आया। उन्होंने उसे ठीक करने की कोशिश भी नहीं की।

"पापा," मैंने कहा, "कुछ चोरी नहीं —"

वो अंदर आए। मेरे पास आए, झुके, और उनकी नज़र औज़ारदान पर पड़ी।

उन्होंने कुछ नहीं कहा।

बस घुटने के बल बैठ गए।

हाथ अंदर डाला।

मैंने उन्हें इतना बूढ़ा कभी नहीं देखा था। उनकी टहनी जैसी कलाई उस बक्से के अंदर डूबी और जब वो बाहर आई तो उनका पूरा शरीर एक झटके में काँप गया।

"बोलो पापा," मैंने कहा। "क्या ढूँढ रहे हो? ये क्या है?"

औज़ारदान के अंदर से उन्होंने धीरे से कुछ निकाला और मेरी तरफ़ नहीं, सामने दीवार की तरफ़ देखने लगे।

"औज़ारदान खुला था," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत धीमी थी। "इसका ढक्कन। मैंने खुद बंद किया था।"

"हाँ," मैंने कहा। "किसी ने खोला।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें अब पीली नहीं थीं, वो खून से लाल हो चुकी थीं।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "तूने उससे कुछ निकाला?"

"हाँ," मैंने कहा। "ये।"

मैंने अपनी हथेली खोली।

कैसेट।

और आधी जली रसीद।

पापा की आँखें उस कैसेट पर पड़ीं और फिर जो हुआ—

मैंने पापा को उससे पहले कभी नहीं देखा था। उन्होंने झपटकर कैसेट मेरी हथेली से छीन ली। इस तेज़ी से कि मेरे हाथ पर उनके नाखूनों की खरोंच लग गई। मैं पीछे हटा।

"पापा —"

"ये तूने कहाँ से निकाला?" उनकी आवाज़ भारी थी। ऊपर उठी हुई। इतनी ऊँची कि दुकान के बाहर खड़ी सानिया भी काँप गई।

"औज़ारदान से —"

"किसने कहा था इसे छूने को?"

"पापा, मैं —"

"किसने कहा था, अंकुश?"

और मैं चुप हो गया।

क्योंकि मैंने पापा को पहली बार मुझ पर इतना गुस्सा करते देखा था। और दिलचस्प बात यह थी — वो गुस्सा मुझ पर था, पर आँखों में जो डर था, वो मुझसे नहीं, उस कैसेट से था।

मीरा आगे बढ़ी।

"शंकर भाई," उसने कहा, "शांत हो जाइए —"

"तू दूर रह," पापा ने कहा, और मीरा रुक गई।

पापा ने कैसेट को दोनों हाथों में पकड़ा। काँपती उँगलियों से उसके ऊपर की सफ़ेद पट्टी को हल्का-सा पोंछा, जैसे कोई पुरानी तस्वीर से धूल हटा रहा हो। और फिर उसे अपने सीने से लगा लिया — दोनों हाथों से, बच्चे की तरह।

दुकान में सन्नाटा था।

गली में सिर्फ़ पीपल के पत्ते सरसरा रहे थे। शबनम आपा की गुमटी से चूल्हे के जलने की कड़कड़ सुनाई दे रही थी, जैसे वो बाहर कुछ सुन ही नहीं रही हों।

टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ी।

"उस्ताद," उसने फुसफुसाया, "पापा रो रहे हैं?"

रो नहीं रहे थे।

उनकी आँखें सूखी थीं। पर उनका चेहरा उतना ही टूटा हुआ था जितना वो पचास साल की चुप्पी में छुपाकर रखते आए थे।

उन्होंने कैसेट को सीने से नहीं हटाया। आँखें बंद कर लीं।

"शंकरलाल," उन्होंने धीरे से कहा।

मेरी छाती में कुछ जम गया।

"पापा?"

"शंकरलाल," उन्होंने दोहराया। "मेरे ताऊ। जगदीश यादव के बड़े भाई। जो पचास साल पहले उस रात गायब हुए जिस रात साझी दुकान जली थी।"

"मैं जानता हूँ, पापा — माँ ने रात को नाम लिया था।"

पापा ने आँखें खोलीं और पहली बार मेरी तरफ़ सीधे देखा।

"माँ ने नाम लिया?"

"हाँ," मैंने कहा। "रात भर बुदबुदा रही थीं। कैसेट का नाम लिया, और एक बार ज़ोर से शंकरलाल चिल्ला दिया।"

पापा ने कैसेट को और कसकर पकड़ लिया।

"तो माँ को भी पता है कि ये कैसेट क्या है," मैंने कहा। "और तुम दोनों ने मुझसे छिपाकर रखी है। पचास साल से।"

"चौबीस साल से," पापा ने कहा। आवाज़ इतनी धीमी कि जैसे हवा में घुल गई। "तेरी उम्र के हिसाब से। जिस दिन तू पैदा हुआ, उस दिन मैंने इसे औज़ारदान में रखा था। तब से कभी नहीं निकाला।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो इसमें है," पापा ने कहा, "वो एक आदमी की आवाज़ है जो नहीं होना चाहिए।"

मीरा आगे आई।

"शंकर भाई," उसने कहा, आवाज़ नरम करके, "ये कैसेट अगर शंकरलाल की है, तो इसे सुनना सबसे ज़रूरी है। हमें जो भी जानकारी है आपकी मदद करेगी —"

"नहीं," पापा ने कहा।

इतनी सख़्त आवाज़ में कि मीरा फिर रुक गई।

"तुम सब चले जाओ," पापा ने कहा। "आज यहाँ कुछ नहीं होगा। दुकान बंद होगी।"

"पापा —"

"अंकुश," उन्होंने कहा, "तू अंदर आ।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"क्यों?"

"क्योंकि मैं तुझे कुछ बताने वाला हूँ," उन्होंने कहा, "और यह बात गली में नहीं कही जाएगी।"

मैं दुकान के पीछे के अपने छोटे कमरे में गया। वही कमरा — जिसमें एक चारपाई, लोहे की अलमारी, औज़ारों का ट्रंक और गुनगुनाता हुआ पुराना बल्ब है। पापा मेरे पीछे आए। उन्होंने ढक्कन जैसे ऊपर उठाया और अंदर से कुंडा चढ़ा दिया।

"पापा," मैंने कहा, "क्या कर रहे हो?"

"बैठ," उन्होंने कहा।

मैं चारपाई पर बैठ गया।

वो सामने लोहे की अलमारी की तरफ़ मुँह करके खड़े रहे। पीठ मेरी तरफ़ थी। उनके कंधे काँप रहे थे।

"तूने रात को जो पन्ना निकाला," उन्होंने कहा, "ट्रंक से। सात अंगूठों वाला। उस पर तेरा नाम नई स्याही में लिखा था।"

"हाँ।"

"तूने सोचा होगा कि वो धमकी है। कोई मुझे या तुझे डरा रहा है।"

"हाँ।"

"वो सिर्फ़ धमकी नहीं थी," पापा ने कहा। "वो एक हिसाब भी था।"

उन्होंने मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "अगर तू ये कैसेट सुन लेता, तो तू मेरी बात नहीं मानता। तू उसी रात अस्पताल में हंगामा कर देता। और अगर उस रात आग लग गई होती, तो जो कुछ हुआ, उसके लिए सबसे पहले मेरा नाम आता। क्योंकि मैं यह कैसेट पच्चीस साल से दबाए बैठा हूँ।"

"पर पापा —"

"सुन," उन्होंने कहा।

और वो मेरे सामने चारपाई की टाँग के पास घुटनों के बल बैठ गए। कैसेट अभी भी उनके हाथ में थी।

"मैं तुझे कुछ बताऊँगा," उन्होंने कहा, "पर एक शर्त पर। जब मैं बताऊँ, तू बीच में कुछ नहीं पूछेगा। न कुछ कहेगा। बिल्कुल नहीं।"

मैंने गला साफ़ किया।

"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात — आज सुबह सात बजे मशीन आने वाली है। उसकी तैयारी —"

"मैं जानता हूँ," पापा ने कहा। "इसीलिए यह बात अभी हो रही है। सात बजे से पहले सब हो जाएगा।"

उन्होंने कैसेट को मेरी तरफ़ बढ़ाया।

मैंने हाथ बढ़ाया — यह सोचकर कि अब वो मुझे दे देंगे।

पर उन्होंने वापस सीने से लगा लिया।

"नहीं," उन्होंने कहा। "ये तेरे हाथ में नहीं आनी चाहिए थी।"

"तो फिर क्या —"

"आज रात," उन्होंने कहा, "मैं और माँ, दोनों मिलकर इसे सुनेंगे। अगर इसमें वो है जो मुझे डर है, तो सबके सामने सुनूँगा। उससे पहले नहीं।"

"पापा, अगर ये सच में शंकरलाल की आवाज़ है —"

"तो इसका मतलब है कि वो उस रात मरा नहीं," पापा ने कहा।

और फिर कुछ ऐसा हुआ जो मैंने कभी नहीं सोचा था।

पापा उठे, मेरे कमरे से बाहर गए, दुकान की तरफ़ बढ़े — जहाँ मीरा, टिंकू, सानिया, चिंटू, गुड्डू, रफ़ीक़ सब खड़े थे — और उन्होंने शटर पकड़कर नीचे खींच दिया।

धड़ाम।

मीरा की आवाज़ बाहर से आई।

"शंकर भाई —"

पर पापा ने बाहर जवाब नहीं दिया। वो मुड़े, मेरे कमरे की तरफ़ आए, मेरे पास से गुज़रे बिना, अंदर वाले पीछे के दरवाज़े के पास गए — वो दरवाज़ा जो बाहर की तरफ़ खुलता था, गली की तरफ़।

उन्होंने उसे अंदर से बंद किया।

कुंडा चढ़ाया।

चिटकनी लगाई।

और मैंने पहली बार अपने पापा की आवाज़ में कुछ ऐसा सुना जो मैंने पच्चीस साल में नहीं सुना था — आदेश। नरम नहीं। बाप की आवाज़, जो अब कोई बहाना नहीं सुनेगा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "बाहर से कोई भी आए, चाहे वो पुलिस हो, चाहे चंद्रेश हो, चाहे खुद रणवीर भारद्वाज हो — तू मेरे इस कमरे का दरवाज़ा नहीं खोलेगा। मैं अंदर से खोलूँगा, तभी खुलेगा।"

मैंने कैसेट की तरफ़ देखा।

"पापा —"

"और अगर मैं न खोलूँ," उन्होंने कहा, "तो तू माँ को बुलाना। वो जानती है इसे कैसे खोलना है।"

"पापा, तुम डरा रहे हो मुझे।"

पापा ने मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।

और उस पल उनके चेहरे पर जो था, वो डर नहीं था।

वो एक आदमी का चेहरा था जो पच्चीस साल से एक बोझ उठाए खड़ा था, और अब उस बोझ को ज़मीन पर रखने की तैयारी कर रहा था — चाहे उसके नीचे कुछ भी हो।

"मैं डरा नहीं रहा," उन्होंने कहा। "मैं तुझे सच बताने जा रहा हूँ। और सच बताने से पहले मुझे अकेले बैठना पड़ेगा। तेरी माँ के साथ। क्योंकि अगर ये कैसेट सच में उसकी है, तो मैं उसे अकेले नहीं सुन सकता।"

दरवाज़ा बंद हो गया।

और मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में अकेला खड़ा रह गया — हाथ में आधी जली रसीद, आँखों में पापा का टूटा चेहरा, और जेब में वो छोटी घंटी, जो इस पूरे वक़्त चुप थी।

बाहर से मीरा की आवाज़ आई।

"अंकुश?"

मैंने दरवाज़े तक जाकर कहा, "रुको।"

"क्या हुआ?"

"पापा अंदर आए हैं," मैंने कहा। "कुछ बताने वाले हैं।"

"क्या बताने वाले हैं?"

मैंने आधी जली रसीद को जेब में डाला।

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर शायद वो बात, जो पच्चीस साल से नहीं बोली गई।"

मैं सीने से लगी घंटी की तरफ़ मुड़ा। मेरी जेब में वो ठंडी थी।

मैंने धीरे से पूछा, "कुछ बोल?"

घंटी ने एक छोटी, धीमी आवाज़ निकाली।

"अब आएगा," उसने कहा। "जो सबसे पहले आना चाहिए था।"

और मैं दीवार से टिककर बैठ गया — अपने पापा के पीछे वाले कमरे के दरवाज़े के सामने, जिसके अंदर एक कैसेट थी, एक आवाज़ थी, और एक आदमी था जो अब शायद पहली बार सच बोल रहा था।

बाहर गली में सुबह की पहली किरण आ रही थी।

और घड़ी की सुइयाँ सात की तरफ़ बढ़ रही थीं।

॥

मैं दीवार से टिककर बैठा था। पीठ के पीछे वही दरवाज़ा था जिसे पापा ने अभी अंदर से बंद किया था। लकड़ी ठंडी थी। मेरी जेब में घंटी भी ठंडी थी। और हाथ में वो आधी जली रसीद — जिसका एक कोना पूरा काला हो गया था, जैसे किसी ने उसे आग में डालकर फिर जल्दी से खींच लिया हो।

कमरे में अजीब सन्नाटा था। बाहर गली में सुबह की पहली किरण आ रही थी — वो किरण जो पीपल की पत्तियों से छनकर आती है और पत्थर की चबूतरी पर सुनहरी लकीरें बना देती है। पर आज वो लकीरें मुझे सुनहरी नहीं लग रही थीं। आज वो लकीरें जले काग़ज़ के किनारे जैसी लग रही थीं।

अंदर से आवाज़ आई। बहुत धीमी। किसी के बैठने की आवाज़ — चारपाई की रस्सियाँ खींचने जैसी। फिर कुछ रखा गया — जैसे कोई किसी चीज़ को बहुत सँभालकर मेज़ पर रख रहा हो।

"पापा?" मैंने दरवाज़े से लगकर कहा।

जवाब नहीं आया।

"पापा, मैं जानता हूँ तुम अंदर हो। तुम्हारी साँस सुनाई दे रही है।"

फिर भी जवाब नहीं।

मैंने माथा दरवाज़े पर टिका दिया। लकड़ी पर पुराना पेंट था — तीन बार पुता हुआ, तीन बार उखड़ा हुआ। मैंने सोचा, कितनी अजीब बात है। इंसान अपने ही घर में, अपने ही कमरे का दरवाज़ा ऐसे बंद कर लेता है, जैसे कोई अनजान आ गया हो।

बाहर से टिंकू की आवाज़ आई।

"उस्ताद? उस्ताद, शटर के नीचे से तुम्हारे पैर दिख रहे हैं!"

मैंने करवट बदली। "हट टिंकू, पैर दिखने दे।"

"पर मैंने तुम्हारे एक जूते की जगह दो जूते देखे!"

"वो दो जूते नहीं हैं," सानिया की आवाज़ आई। "वो उस्ताद के दो पैर हैं, बुद्धू।"

"अरे, मैंने साफ़ देखा —"

"तूने कुछ नहीं देखा। तूने सुबह-सुबह अपनी ही चप्पल देखी और समझा डाकू आ गया।"

मैं हँसा नहीं। हँसने की जगह अंदर कहीं सूखी पड़ी थी।

मैं उठा, शटर की तरफ़ गया और उसे आधा हाथ ऊपर उठाया। रोशनी अंदर आई और आँखों में चुभी।

बाहर मीरा खड़ी थी — कैमरा हाथ में, बाल उलझे हुए, आँखों में वो नींद नहीं थी जो आधी रात जागने से आती है। उसकी आँखें ऐसी थीं जैसे कोई काग़ज़ पढ़ते-पढ़ते बीच में रुक गया हो।

"क्या बात है?" मैंने पूछा।

"रसीद," उसने कहा। "वो आधी जली रसीद। देख सकती हूँ?"

मैंने जेब से निकालकर उसे दी। उसने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे कोई डॉक्टर कोई बहुत नाज़ुक परची पकड़ता है।

"इसमें क्या है?" मैंने पूछा।

"रुको।"

वो दुकान के अंदर आई, मेज़ के पास गई, और अपने फोन की रोशनी उस पर डाली। टिंकू, सानिया, चिंटू, गुड्डू और रफ़ीक़ सब शटर के नीचे से सर घुसाकर अंदर झाँकने लगे।

"सब बाहर," मीरा ने कहा।

"हम बाहर हैं," चिंटू ने कहा, "बस हमारा सिर अंदर है।"

"तो सिर भी बाहर करो।"

पाँचों सिर गायब हुए। फिर धीरे-धीरे पाँचों फिर आए। मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी बच्चों से लड़ना बेकार होता है।

मीरा ने रसीद को मेज़ पर रखा और उस पर फोन की रोशनी सरकाई।

"देख," उसने कहा। "ये ऊपर की मोहर। गोल है, और आधी जल चुकी है।"

मैंने झुककर देखा। हाँ। एक गोल मोहर — नीली स्याही से, पर आग ने उसका आधा हिस्सा खा लिया था।

"ये नूर अस्पताल की पुरानी मोहर है," मीरा ने कहा। "पुरानी। जो अब लगती ही नहीं। अब वाले काग़ज़ों पर नई मोहर आती है, जिसमें ऊपर तारीख़ और नीचे नंबर होता है। यहाँ मोहर के बीच में जो लिखा है, वो पढ़ो।"

मैंने आँखें सिकोड़ीं। "हकी…"

"हकीम," मीरा ने कहा। "हकीम साहब। वही नाम जो उस्ताद ने बताया था। वही मोहर जो स्कूल की झूठी सुरक्षा रिपोर्ट पर लगी थी।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने रसीद को करीब लिया।

"तारीख़?" मैंने पूछा।

"जल गई," उसने कहा। "नाम की जगह भी जल गई। बस ये आधी मोहर बची है और नीचे ये दो शब्द — 'रसीद' और 'जमा'।"

"तो इससे क्या पता चलता है?"

"ये पता चलता है," मीरा ने कहा, "कि ये रसीद उस ज़माने की है जब हकीम साहब यहाँ थे। और उस ज़माने की रसीद आज औज़ारदान के नीचे क्यों पड़ी थी — ये बात मुझे डरा रही है।"

मैंने रसीद को पलटा।

और तभी मुझे दिखा।

कोने पर, ठीक उस जगह जहाँ काग़ज़ मुड़ता है, एक धुँधला सा निशान था। अंगूठे का निशान। पर वो ऐसा नहीं था जैसे किसी ने आराम से रसीद पकड़ी हो। वो निशान दबा हुआ था — बहुत ज़ोर से दबाया हुआ। स्याही फैल गई थी, काग़ज़ में गड्ढा सा बन गया था।

मैंने उँगली उस पर रखी।

"देख," मैंने कहा। "ये अंगूठा है।"

मीरा ने देखा। उसने अपना चश्मा नहीं पहना था, इसलिए उसने आँखें सिकोड़कर देखा, फिर फोन की रोशनी और पास लाई।

"हाँ," उसने धीरे से कहा। "और ये अंगूठा डरकर दबाया गया है।"

"तुम्हें कैसे पता?"

"क्योंकि इंसान जब आराम से पकड़ता है, तो निशान साफ़ और गोल आता है। जब वो डरता है, तो उँगली काँपती है और निशान तीन तरफ़ फैल जाता है। ये देख —" उसने उँगली रखी "— यहाँ से यहाँ तक स्याही खिंची है। इसका मतलब है कि जिसने ये पकड़ा था, उसका हाथ काँप रहा था।"

मैंने एक लंबी साँस ली।

"पापा," मैंने धीरे से कहा।

"हो सकता है," मीरा ने कहा। "पर ये भी हो सकता है कि यह रसीद किसी और ने पकड़ी हो और पापा तक पहुँची हो।"

"पापा के औज़ारदान में पड़ी थी।"

"हाँ।"

"तो इसका मतलब —"

"इसका मतलब," मीरा ने कहा, "ये है कि तुम्हारे पापा ने इसे छिपाया। और जो आदमी कोई चीज़ छिपाता है, वो या तो उसे बचा रहा होता है, या उससे बच रहा होता है।"

मैं मेज़ के पास खड़ा रह गया। मेरे हाथ में रसीद थी, और मेरे पीछे वो दरवाज़ा था जिसके अंदर मेरे पापा बैठे थे।

तभी बाहर गली में एक आवाज़ आई — व्हीलचेयर के पहिये की आवाज़, पक्की सड़क पर। मैं उठा और शटर के पास गया।

काजल व्हीलचेयर धकेल रही थी, और उसमें माँ बैठी थीं।

माँ।

उनका गुलाबी दुपट्टा सर से खिसककर कंधों पर आ गया था। चेहरा पतला था — इन दिनों में और पतला हो गया था। पर आँखों में वो चीज़ थी जो बुखार में भी नहीं बुझी थी।

वो सीधे शटर के पास आईं।

"माँ, तुम्हें आराम —"

"चुप," उन्होंने कहा।

एक शब्द। बस एक शब्द। और मैं चुप हो गया।

काजल ने व्हीलचेयर रोकी। माँ ने मेरी तरफ़ देखा।

"वो अंदर है?"

मैंने सिर हिलाया।

"दरवाज़ा बंद है?"

"हाँ।"

"अंदर से?"

"हाँ।"

माँ ने एक गहरी साँस ली। फिर उन्होंने मुझसे कहा, "मुझे उस दरवाज़े तक ले चल।"

"माँ, तुम अभी —"

"अंकुश।" उन्होंने मेरा नाम ऐसे लिया जैसे कोई ताला खोलता है। "मुझे उस दरवाज़े तक ले चल।"

मैंने काजल की तरफ़ देखा। काजल ने धीरे से सिर हिलाया — मतलब, बहस मत कर।

मैंने व्हीलचेयर पकड़ी और उसे दुकान के पीछे वाले कमरे तक ले गया। रास्ते में माँ ने कुछ नहीं कहा। बस एक बार उन्होंने मेरा हाथ थपथपाया — वैसे ही, जैसे बचपन में कहती थीं, "घबरा मत, मैं हूँ ना।"

अब वो खुद घबराई हुई थीं। पर वो मुझे नहीं बता रही थीं।

पीछे वाले दरवाज़े के सामने हम रुके।

माँ ने व्हीलचेयर से हाथ बढ़ाकर दरवाज़े पर दो हल्की दस्तकें दीं।

"शंकर।"

अंदर से कोई आवाज़ नहीं।

"शंकर, मैं जानती हूँ तुम अंदर हो।"

फिर भी चुप्पी।

"शंकर, सुनो।" माँ की आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो मुझे बचपन से याद है — कभी ऊँची नहीं होती, पर कभी नहीं हारती। "जो सच है, वो बता देना ही ठीक है। छुपाने से घर में और आग लगती है। और मैं अब आग नहीं झेल सकती।"

अंदर से आवाज़ आई।

नहीं — आवाज़ नहीं।

कुछ गिरा। धातु का कुछ गिरा। ज़मीन पर। एक बार, फिर एक बार लुढ़का।

मैंने दरवाज़े पर हाथ रखा।

"पापा?"

कोई जवाब नहीं।

"पापा, तुम ठीक हो?"

माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"अभी मत पूछो," उन्होंने कहा। "अभी उनके अंदर जो चल रहा है, उसे जगह दो।"

"पर वो गिरा —"

"वो औज़ार गिरा है," माँ ने कहा। "औज़ार गिरते हैं। आदमी गिरते हैं। बस फ़र्क़ ये है कि औज़ार की आवाज़ बाहर आती है, आदमी की नहीं।"

मैं दीवार से टिक गया।

अंदर फिर सन्नाटा। फिर कोई चीज़ खिसकी।

मैंने धीरे से जेब में हाथ डाला और घंटी निकाली। वो मेरी हथेली में बहुत ठंडी थी।

मैंने मुँह मोड़कर, बहुत धीमे से पूछा, "कुछ बोल।"

घंटी चुप रही।

मैंने फिर पूछा, "मेरे पापा झूठ बोल रहे हैं?"

एक पल की चुप्पी। फिर घंटी में एक ठंडी सी आवाज़ उठी।

"झूठ नहीं।"

मेरी साँस रुक गई।

"तो क्या है?" मैंने पूछा।

"डर," घंटी ने कहा। "डर बोलता नहीं। डर दबता है। जैसे काग़ज़ पर अंगूठा। जैसे दरवाज़े पर कुंडा। जैसे आदमी के सीने पर पत्थर।"

मैंने घंटी को हथेली में दबाया। वो फिर चुप हो गई।

मीरा दरवाज़े के पास आई। उसके हाथ में रसीद थी। उसने माँ की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

"मैडम," मीरा ने कहा, "ये रसीद —"

माँ ने रसीद देखी। बस एक पल को। फिर उन्होंने आँखें फेर लीं।

"रख दो," उन्होंने कहा।

"पर इसमें —"

"रख दो, बेटी।" माँ की आवाज़ में वो धीमापन था जो किसी बात को थामकर रखता है। "जो मैं पच्चीस साल से देख रही हूँ, उसे तुम एक काग़ज़ में नहीं दिखा सकती।"

मीरा ने रसीद मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने ली।

तभी माँ ने कहा, "अंकुश, अभी तुम पापा से ज़्यादा मत पूछो।"

"माँ, मशीन सात बजे आने वाली है। अस्पताल के पीछे। और स्कूल की छत का काग़ज़ भी खुला है। और दस बजे रज़ा सलीम —"

"मैं जानती हूँ," उन्होंने कहा। "मैं सब जानती हूँ।"

"तो फिर?"

"तो फिर ये समझ लो," माँ ने कहा, "कि जब वो खुद बोलेंगे, तब सच आधा नहीं होगा। पूरा होगा। और पूरा सच आधे सच से ज़्यादा भारी होता है। इसलिए तैयार हो जाओ।"

मैंने गला साफ़ किया।

"तुम्हें पता है क्या है सच?"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा।

"मुझे कुछ-कुछ पता है," उन्होंने कहा। "पर अंदाज़ा और सच में फ़र्क़ होता है। और आज मैं अंदाज़े पर घर नहीं तोड़ूँगी।"

बाहर से काजल की आवाज़ आई।

"माँ, डॉक्टर इसरानी ने कहा था —"

"डॉक्टर इसरानी ने ये भी कहा था कि काग़ज़ साफ़ होने तक दवा रुकी रहेगी," माँ ने कहा। "और तुम्हारे पापा ने कहा था कि वो सब साफ़ करेंगे। तो मैं आज दोनों बातें एक साथ साफ़ होने दे रही हूँ।"

काजल ने कुछ नहीं कहा।

तभी शटर के नीचे से टिंकू का सिर घुसा।

"उस्ताद," उसने फुसफुसाकर कहा, "गली के मुँह पर फिर वो सफ़ेद गाड़ी आई है।"

मेरा शरीर सख़्त हो गया।

"कौन सी सफ़ेद गाड़ी?"

"वो ही। जो कल आई थी। खड़ी है। अंदर कोई दिख नहीं रहा, पर इंजन बंद है और शीशा थोड़ा खुला है।"

मीरा ने तुरंत अपना कैमरा उठाया।

"मत जाओ," माँ ने कहा।

"माँ —"

"मत जाओ बाहर।" माँ की आवाज़ नरम थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो हिलती नहीं। "आज सुबह कोई भी अकेले बाहर नहीं जाएगा। तुम कल रात ही कह आए हो — जो आदमी अपनी जगह छोड़कर भागेगा, वही आग का आदमी है। तो हम सब अपनी जगह पर रहेंगे।"

मैंने सिर हिलाया।

"टिंकू," मैंने कहा, "गाड़ी पर नज़र रख। पर पीपल के पीछे से। सामने से नहीं।"

"समझ गया, उस्ताद।"

"और सानिया को बोल — अपनी कॉपी निकाले। गाड़ी का नंबर, वक़्त, कितने आदमी उतरे, सब लिखे।"

"हो गया।"

टिंकू का सिर गायब हुआ।

मैं माँ के पास बैठ गया। मेरी जेब में घंटी थी, हाथ में रसीद, और सामने बंद दरवाज़ा।

"माँ," मैंने धीरे से कहा, "तुम्हें पता था? कैसेट के बारे में?"

माँ ने एक लंबी साँस ली।

"मुझे पता था कि कुछ है," उन्होंने कहा। "पर मुझे पता नहीं था कि वो क्या है। तुम्हारे पापा ने एक बार, बहुत पहले, आधी रात को, मुझे नींद में कहा था — 'शंकरलाल, वो कैसेट मत छेड़ना।' और सुबह जब मैंने पूछा, तो उन्होंने कहा कि कुछ नहीं, बुखार में बकवास कर रहे थे।"

"तुमने यक़ीन किया?"

"मैंने यक़ीन करने का नाटक किया," माँ ने कहा। "क्योंकि उस वक़्त मुझे लगा कि अगर मैं न करूँ, तो वो और अंदर चले जाएंगे। और ऐसे आदमी को अंदर जाने से रोकना होता है, बाहर खींचना नहीं।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

"मैं डरता हूँ, माँ," मैंने कहा।

माँ ने मेरा हाथ पकड़ा।

"मैं भी," उन्होंने कहा। "पर डर को काम करने देना और कुछ है, और डर के आगे झुक जाना कुछ और। हम पहला करेंगे।"

तभी पीछे के कमरे के दरवाज़े के नीचे से एक पतली रोशनी दिखी। पापा ने अंदर बत्ती जलाई थी।

मीरा ने कैमरे को नीचे किया।

"क्या कर रहे हैं वो?" उसने फुसफुसाकर पूछा।

"पता नहीं," मैंने कहा।

अंदर से आवाज़ आई — किसी चीज़ को खोलने की। ज़ंग लगी चीज़ को खोलने की। फिर कुछ टकराया। फिर कुछ खिसका।

मैंने घंटी निकाली।

"कुछ बोल," मैंने फुसफुसाकर कहा।

घंटी ने बहुत धीमे से कहा, "कैसेट खुल रही है।"

मेरी साँस रुक गई।

"वो अकेले सुन रहे हैं?"

"नहीं," घंटी ने कहा। "पर तेरी माँ बाहर है। और वो अंदर। दोनों एक ही आवाज़ सुनने की तैयारी कर रहे हैं।"

मैं उठा। माँ ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा।

"बैठ," उन्होंने कहा।

"पर माँ —"

"बैठ, अंकुश।"

मैं बैठ गया।

और फिर माँ ने एक बात कही जो मुझे आज तक याद है।

"जब कोई आदमी पच्चीस साल बाद अपना सबसे बड़ा डर खुद सुनने बैठता है," उन्होंने कहा, "तो उसके पास कोई नहीं होना चाहिए। न कोई सहारा, न कोई तारीफ़, न कोई माफ़ी। सिर्फ़ वो। क्योंकि डर से लड़ाई अकेले लड़नी पड़ती है। बाकी सब बाद में।"

मैंने सिर हिलाया।

तभी शटर के नीचे से चिंटू की आवाज़ आई।

"उस्ताद! उस्ताद, उस्ताद, सात का डर!"

"क्या?"

"वो सफ़ेद गाड़ी में से एक आदमी उतरा। उसने प्लॉट की तरफ़ देखा और फिर घड़ी देखी।"

"घड़ी?"

"हाँ, हाथ की घड़ी। और फिर वो मुस्कुराया।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"सात बजे की तैयारी," उसने कहा।

"हाँ," मैंने कहा।

"तो हम क्या कर रहे हैं?"

मैंने माँ की तरफ़ देखा।

"हम इंतज़ार कर रहे हैं," मैंने कहा।

मीरा का चेहरा कठोर हुआ।

"अंकुश —"

"देख मीरा," मैंने कहा। "मैं जानता हूँ तुझे ये बात पसंद नहीं आ रही। पर अगर मैं अभी उनका दरवाज़ा खोलूँ, तो सच टूट जाएगा। और मुझे ये सच पूरा चाहिए, आधा नहीं। क्योंकि आधे सच से मशीन रुकती नहीं।"

मीरा ने कैमरा नीचे किया।

"तो कम से कम," उसने कहा, "हम प्लॉट पर नज़र रखें। अगर वो सात बजे से पहले कुछ करें, तो हम तैयार हों।"

"हाँ," मैंने कहा। "ये करो।"

मीरा बाहर गई। काजल माँ के पास बैठ गई। मैं दरवाज़े के सामने बैठा रहा।

और फिर कमरे के अंदर से आवाज़ आई।

कैसेट की आवाज़।

एक क्लिक। फिर एक सरसराहट। फिर कुछ सेकंड का सन्नाटा।

और फिर एक आवाज़ — बहुत पुरानी, बहुत दबी हुई, जैसे किसी पुराने कुएँ से आ रही हो।

मैंने सब कुछ सुनने के लिए कान सीधे किए।

पर माँ ने मेरा कंधा पकड़ा और वो बोलीं जो मुझे समझ नहीं आया — "वो आवाज़ तुम्हारे लिए नहीं है, अंकुश। अभी नहीं।"

"माँ —"

"अभी नहीं," उन्होंने दोहराया।

और मैं बैठा रहा।

दरवाज़े के पार, मेरे पापा एक कैसेट सुन रहे थे। और मैं — मैं इतना करीब होकर भी उससे बहुत दूर था।

तभी मेरी जेब से घंटी ने एक आवाज़ निकाली — उसने बजकर नहीं, बस हिलकर कहा, "और अब पूरी गली को लगता है कि सच सिर्फ़ उनके पास है।"

मैंने घंटी को हथेली में दबाया।

"तो?"

"तो जब सब अपने-अपने सच लेकर बैठे हों," घंटी ने कहा, "तब आदमी को सबसे पहले अपना सच देखना पड़ता है — आईने में, काग़ज़ पर नहीं।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

तभी अंदर से फिर आवाज़ आई। पापा की आवाज़।

नहीं — पापा कोई बोलते नहीं थे।

पर जो आवाज़ अंदर से आई, वो कमरे की नहीं थी। वो किसी दराज़ की थी। फिर कुछ गिरा — हल्का सा, काग़ज़ जैसा।

और फिर मैंने कुछ सुना, जो मेरी रीढ़ तक गया।

पापा की आवाज़, बहुत धीमी, काँपती, पर साफ़।

"नहीं। ये सच नहीं हो सकता।"

मैं खड़ा हो गया।

"माँ —"

पर माँ ने मुझे रोका।

"रुको," उन्होंने कहा। "वो अभी बोल रहे हैं।"

और फिर कमरे के अंदर से आवाज़ आई — कुछ बिखरने की। काग़ज़ बिखरने की। बहुत सारे काग़ज़।

फिर सन्नाटा।

लंबा सन्नाटा।

और फिर — बहुत हल्की, बहुत दबी हुई, ऐसी आवाज़ जैसे कोई रो रहा हो पर आवाज़ न निकले — मेरे पापा की साँस।

मैंने माथा दरवाज़े पर टिका दिया।

और तभी पापा ने कहा।

आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो।

"उस कैसेट को मत छेड़ना।"

मैं ठिठक गया।

"वरना घर फिर जलेगा।"

॥

दरवाज़े के पार से आवाज़ आते ही मेरा हाथ कुंडे पर जा रुका।

"उस कैसेट को मत छेड़ना। वरना घर फिर जलेगा।"

पापा की आवाज़। धीमी। काँपती। पर साफ़। जैसे कोई बहुत थककर, बहुत दूर से बोल रहा हो।

मैंने माथा दरवाज़े से हटाया। माँ मेरे पीछे व्हीलचेयर पर बैठी थीं। काजल उनके कंधे पर हाथ रखे खड़ी थी। दुकान के पीछे वाला ये छोटा कमरा — जहाँ औज़ारों का ट्रंक था, जहाँ पापा खुद को बंद करके बैठे थे — वो अब एक तिजोरी जैसा लग रहा था। बंद। चुप। पर अंदर कुछ चल रहा था।

"पापा?" मैंने दरवाज़े से सटकर कहा।

कोई जवाब नहीं।

"पापा, कैसेट में क्या है?"

फिर सन्नाटा। फिर काग़ज़ सरकने की आवाज़। फिर दराज़ खुलने-बंद होने की आवाज़। फिर पानी का गिलास रखने जैसी आवाज़।

"पापा, मैं अंदर आ रहा हूँ।" मेरा हाथ कुंडे पर कस गया।

"नहीं।" पापा की आवाज़ साफ़ आई। "अभी नहीं।"

"पर —"

"अंकुश।" ये माँ थीं। उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। "उन्होंने मना किया है तो नहीं।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। व्हीलचेयर में बैठी माँ का चेहरा पीला था, पर आँखें साफ़ थीं। जैसे उन्हें पता था कि अंदर क्या चल रहा है। जैसे उन्हें ये भी पता था कि ये सब पहले भी एक बार हुआ था।

"माँ," मैंने धीरे से कहा, "आप जानती हैं ना, कैसेट में क्या है?"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर वही कहा जो वो हमेशा कहती थीं जब सच बहुत भारी होता था।

"जो सच खुद नहीं बोलता," उन्होंने कहा, "वो सच नहीं होता। बस एक बोझ होता है।"

मैं कुछ समझा नहीं। पर पूछा भी नहीं।

क्योंकि तभी अंदर से आवाज़ आई — कैसेट का क्लिक। और फिर सरसराहट।

और फिर वो आवाज़।

बहुत पुरानी। बहुत दबी हुई। जैसे किसी पुराने कुएँ की तली से कोई बोल रहा हो।

मैंने कान सीधे किए।

पर आवाज़ शब्दों में नहीं आ रही थी। सिर्फ़ एक लय आ रही थी। जैसे कोई गा रहा हो। धीरे-धीरे।

फिर आवाज़ बंद हो गई।

फिर पापा की आवाज़ आई। बहुत धीमी।

"नहीं। ये सच नहीं हो सकता।"

और फिर काग़ज़ बिखरने की आवाज़। बहुत सारे काग़ज़। जैसे किसी ने पूरा दराज़ उलट दिया हो।

फिर सन्नाटा।

लंबा सन्नाटा।

मैंने दरवाज़े पर कान टिका दिया। अंदर से सिर्फ़ साँस आ रही थी। धीमी। टूटी। जैसे कोई रो रहा हो पर आवाज़ न निकले।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा।

"अब?" मैंने पूछा।

"अब रुको," उन्होंने कहा।

"कब तक?"

"जब तक वो खुद दरवाज़ा न खोलें।"

मैंने सिर हिलाया और उठकर बाहर आ गया।

शटर आधा खुला था। सुबह की धूप गली में तिरछी पड़ रही थी। पीपल के पत्तों से छनकर आती रोशनी ज़मीन पर छोटे-छोटे टुकड़े बना रही थी।

और शटर के बाहर पाँच जोड़ी आँखें मेरा इंतज़ार कर रही थीं।

टिंकू सबसे आगे। सिर पर माँ का गुलाबी दुपट्टा बँधा हुआ, आँखों पर वो काला एक काँच वाला चश्मा, और चेहरे पर ऐसा भाव जैसे वो कोई बहुत बड़ा फ़ैसला लेने आया हो।

"उस्ताद," उसने कहा, "टीम तैयार है।"

मैंने उन पाँचों को देखा। सानिया हाथ में लाल कवर वाली कॉपी लिए खड़ी थी। गुड्डू अपनी चप्पल की उँगली से खेल रहा था। रफ़ीक़ ने वो टूटा चश्मा आँख पर लगाया हुआ था जिसका एक काँच गायब था। और चिंटू — चिंटू के हाथ में एक पुरानी साइकिल की रिम थी, जिसे वो ढाल की तरह सामने पकड़े खड़ा था।

"ये रिम क्यों?" मैंने पूछा।

"हिफ़ाज़त के लिए," चिंटू ने कहा।

"किससे?"

"पता नहीं। पर हिफ़ाज़त तो होनी चाहिए ना।"

मैं हँसा। पहली बार उस सुबह।

टिंकू ने हाथ उठाया।

"ध्यान दो," उसने कहा। "उस्ताद की तरह बोलूँ?"

"बोल।"

उसने गला साफ़ किया। फिर उस्ताद के अंदाज़ में, बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "बात छोटी है। काम बड़ा है।"

सानिया ने आँखें घुमाईं।

"टिंकू, तू उस्ताद की नकल करेगा तो मैं तेरी नकल करूँगी। फिर देख क्या होगा।"

"तो मत कर।"

"फिर तू भी मत कर।"

"अच्छा चुप।" टिंकू ने हाथ उठाया। "काम बाँटता हूँ।"

उसने सानिया की कॉपी माँगी, उसमें अपनी उँगली रखी और इस तरह पढ़ने लगा जैसे उसमें कुछ लिखा हो। कॉपी खाली थी। पर टिंकू की गंभीरता देखकर कोई हँसा नहीं।

"पहला काम," उसने कहा, "उस सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी की जासूसी। वो गली के मुँह पर खड़ा है। हिलता नहीं। पिछले कुछ वक़्त से।"

"कितने वक़्त से?" मैंने पूछा।

"जब से सूरज पीपल की डाल से ऊपर आया," चिंटू ने कहा। "मैंने गिना था।"

"तूने क्या नहीं गिना," गुड्डू ने कहा।

"मैंने गिना था, बोलना क्या है।"

टिंकू ने उन्हें चुप कराया।

"सुनो। सबको एक-एक काम। सानिया — तू नाप ले।"

"क्या नापूँ?"

"उस आदमी का कद।"

सानिया ने सोचा।

"पहले कद नापो, फिर चप्पल का साइज़," उसने कहा। "क्योंकि आदमी कद से पहचाना जाता है, पर भागता चप्पल से है।"

"ये स्कूल में नहीं पढ़ाया जाता," रफ़ीक़ ने कहा।

"तो?" सानिया ने कहा। "जासूसी में पढ़ाया जाता है।"

टिंकू ने सिर हिलाया। "ठीक है। सानिया — कद और चप्पल। गुड्डू और रफ़ीक़ — दुकान के पीछे जाओ। जहाँ कल राख मिली थी, वहाँ कुछ और देखो। मिट्टी देखो। पैर के निशान देखो। कुछ भी।"

"और मैं?" चिंटू ने पूछा।

"तू — खिड़कियाँ।"

"खिड़कियाँ?"

"अबे, जो आदमी खिड़की से झाँककर गया था ना रात में — उसकी कोई निशानी मिले तो ले आना। कुछ भी। धागा, काग़ज़, मिट्टी, कुछ भी। पर बिना पहचान कुछ नहीं।"

चिंटू ने रिम कंधे पर रखी और सीना फुलाकर खड़ा हो गया।

"समझ गया।"

"और हाँ," टिंकू ने कहा, "याद रखना — अगर वो आदमी हिले तो भागना नहीं। सीटी बजाना।"

"सीटी किसके पास है?" मैंने पूछा।

टिंकू ने जेब से एक पुरानी पीतल की सीटी निकाली।

"मेरे पास," उसने कहा। "पर ये सिर्फ़ सबसे बड़े खतरे के लिए। छोटी चीज़ के लिए नहीं।"

"और छोटी चीज़ के लिए?"

"आँख।" टिंकू ने अपनी आँखों की तरफ़ इशारा किया। "सिर्फ़ आँख।"

मैं उन्हें देख रहा था और अंदर से मुस्कुरा रहा था। ये बच्चे। इनके पास कुछ नहीं था — ना कैमरा, ना काग़ज़, ना ताक़त। बस आँखें थीं। और आज सुबह, शायद उन आँखों की ज़रूरत सबसे ज़्यादा थी।

"जाओ," मैंने कहा।

वो चल पड़े। टिंकू सबसे पीछे, दुपट्टा हवा में उड़ता हुआ।

और मैं दुकान के पास खड़ा रह गया। शटर के नीचे से अंदर झाँका। अंदर कुछ नहीं हिल रहा था। पर पापा की साँस की आवाज़ आ रही थी। धीमी। मैंने आँखें बंद कर लीं।

"पापा," मैंने धीरे से कहा, "मैं बाहर हूँ। दरवाज़े पर।"

अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

पर कुछ पल बाद दरवाज़े के नीचे से काग़ज़ का एक कोना सरका। मैंने उसे उठाया। आधा जला काग़ज़ था। ऊपर सिर्फ़ एक लाइन बची थी — "मैंने नहीं जलाया।"

मैंने वो काग़ज़ दोनों हाथों में पकड़ा और देर तक देखता रहा।

सुबह के दस बजे मीरा लौटी।

वो सीधी मेरे पास आई। उसके चेहरे पर पसीना था और हाथ में कैमरा ऐसे पकड़ा था जैसे किसी चीज़ पर क़ब्ज़ा कर रही हो।

"वो आदमी," उसने कहा, "अजीब है।"

"कैसे?"

"दुकान पर नहीं आया। किसी से नहीं बोला। बस प्लॉट के पास खड़ा रहा। फिर उसने ज़मीन नापने वाले फीते जैसी कोई चीज़ निकाली — पीली धातु की — और एक कोना नापा।"

"कौन सा कोना?"

"वही जहाँ कल राख मिली थी।"

मैं चुप हो गया।

"और फिर?" मैंने पूछा।

"फिर उसने घड़ी देखी। फिर अपनी कलाई पर बँधा कुछ ठीक किया — कोई धागा या पट्टा — और चला गया।"

"किधर?"

"गली के मुँह की तरफ़। फिर वो सफ़ेद गाड़ी के पास खड़ा हो गया, पर बैठा नहीं।"

"क्या कर रहा है?"

"इंतज़ार।" मीरा ने कैमरा नीचे किया। "अंकुश, वो इंतज़ार नहीं कर रहा। वो गिन रहा है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"सात बजे," मैंने कहा।

"हाँ," मीरा ने कहा। "और उससे पहले वो कुछ और गिन रहा है।"

"क्या?"

"पता नहीं। पर मैंने उसे तीन बार अपनी उँगलियाँ उठाते देखा। तीन बार। जैसे कोई तीन चीज़ें गिन रहा हो।"

मैंने सोचा। तीन। तीन क्या? तीन बत्तियाँ? नहीं, वो हमारे पास थीं। तीन दरवाज़े? तीन दिन?

"और एक बात," मीरा ने कहा। "जब मैं वहाँ से हट रही थी, तब मैंने उसे बहुत धीरे बोलते सुना। मुझे पूरा नहीं सुनाई दिया। पर एक शब्द था — 'अभी'।"

"अभी?"

"हाँ। जैसे — अभी या कभी नहीं।"

मैंने गहरी साँस ली।

तभी गुड्डू और रफ़ीक़ दौड़ते हुए आए। दोनों की साँस फूली हुई थी। गुड्डू के हाथ में एक टूटी डंडी थी और रफ़ीक़ के माथे पर पसीने की लकीरें।

"उस्ताद!" गुड्डू ने कहा। "उस्ताद, हमने देखा!"

"पहले साँस ले," मैंने कहा।

"नहीं, नहीं, देखो —" गुड्डू ने वो डंडी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये किसी लकड़ी की चीज़ का हिस्सा है।"

मैंने उसे लिया। हल्की। चिकनी। पुरानी। जैसे किसी लकड़ी के जूते से टूटी हो।

"कहाँ मिली?"

"दुकान के पीछे," रफ़ीक़ ने कहा। "वहाँ जहाँ कल राख मिली थी। पर उस्ताद —" उसने आँखें बड़ी कीं, "मिट्टी पर पैरों के निशान थे।"

"कैसे निशान?"

"बड़े," गुड्डू ने कहा। "चौड़े। जैसे लकड़ी के जूते के हों।"

मैं उठकर खड़ा हो गया।

"देखने ले चलो।"

हम दुकान के पीछे गए। वहाँ ज़मीन कच्ची थी। पिछले दिन शायद हल्की बारिश हुई थी — मुझे याद नहीं था, पर मिट्टी सख़्त हो चुकी थी और उस पर निशान बने हुए थे।

धुँधले। बहुत धुँधले। जैसे पानी से भर गए हों, फिर धूप में सूख गए हों और अब बस उनकी आकृति बची हो।

लकड़ी के जूतों जैसे निशान।

"यहाँ," गुड्डू ने कहा और एक निशान की तरफ़ इशारा किया। "ये बड़ा है।"

"और ये बच्चों का नहीं है," रफ़ीक़ ने कहा। "क्योंकि बच्चा इतना बड़ा क़दम नहीं रखता।"

मैंने निशानों को देखा।

"बारिश ने धुँधला कर दिया," मैंने कहा।

"हाँ," रफ़ीक़ ने कहा। "पर अगर बारिश न होती, तो ये निशान साफ़ होते।"

"तो?"

"तो इसका मतलब जो आया था, वो बारिश से पहले आया था। बारिश कब हुई?"

मैंने सोचा। मुझे याद आया। रात दो बजे के आसपास कुछ बूँदें गिरी थीं। मैं दुकान के बाहर बैठा था और मैंने छत पर एक-दो बूँदें सुनी थीं।

"रात दो बजे," मैंने कहा।

"तो वो दो बजे से पहले आया था," रफ़ीक़ ने कहा।

"तीन बजे," गुड्डू ने कहा।

"कैसे पता?"

"क्योंकि टिंकू ने रात में देखा था — उस वक़्त घड़ी में क्या था, मुझे नहीं पता। पर उसने कहा था कि वो आदमी हँसकर गया था।"

मैंने रफ़ीक़ की तरफ़ देखा। वो गर्व से खड़ा था। उसका टूटा चश्मा उसकी आँख पर टेढ़ा था, पर उसकी बात ठीक थी।

"ठीक है।" मैंने कहा। "अब मुझे एक बात बताओ।"

"पूछो," रफ़ीक़ ने कहा।

"ये निशान कितने हैं?"

गुड्डू ने गिनना शुरू किया। "एक, दो, तीन — नहीं, ये चार।"

"चार निशान," रफ़ीक़ ने कहा। "पर दो जोड़े हैं।"

"मतलब?"

"मतलब दो आदमी आए थे," रफ़ीक़ ने कहा। "एक के पैर बड़े थे, एक के छोटे। और दोनों लकड़ी के जूते पहने थे।"

मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा।

दो आदमी। लकड़ी के जूते। रात दो बजे से पहले।

"अच्छा काम," मैंने कहा। "अब जाओ — टिंकू को बताओ।"

दोनों भाग गए।

मैं अकेला खड़ा रहा और उन निशानों को देखता रहा।

दो आदमी।

एक घर में दाख़िल हुआ। एक बाहर रुका। जिसने कैसेट रखी, वो अंदर गया। जिसने राख मली, वो बाहर रहा।

मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। एकदम ठंडी।

"कुछ बोल," मैंने धीरे से कहा।

घंटी ने बजकर नहीं, बस हिलकर कहा —

"घर में जो आया था, वो घर का नहीं था। घर वाला बाहर खड़ा था।"

मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।

"क्या मतलब?"

पर घंटी चुप हो गई।

तभी चिंटू की आवाज़ आई।

"उस्ताद! उस्ताद!"

वो दौड़ता हुआ आ रहा था। रिम फेंक दी थी कहीं, दोनों हाथ आगे किए हुए।

"मिला! मिला!"

उसके हाथ में कुछ सफ़ेद था।

"क्या है?"

"खिड़की की कुंडी पर बँधा था," उसने कहा। "पीछे वाली खिड़की। वो वाली जो कमरे से बाहर दिखती है।"

मैंने उसके हाथ से चीज़ ली।

एक धागा। सफ़ेद। पतला। करीब दो उँगल लंबा। पर उस पर कुछ सिला हुआ था — काले धागे से।

मैंने उसे धूप में उठाया।

काले धागे से सिला हुआ एक नाम।

छोटा सा। उलझा हुआ। मैंने पहचानने की कोशिश की। अक्षर ठीक से नहीं बन रहे थे।

"टिंकू को बुलाओ," मैंने कहा।

चिंटू भागा। कुछ पलों में टिंकू आ गया, दुपट्टा अब भी सिर पर, चश्मा तिरछा।

मैंने उसे धागा दिया।

"देख इसे।"

टिंकू ने उसे पकड़ा। पहले ध्यान से देखा। फिर उसका चेहरा बदलने लगा। पहले गंभीर। फिर सफ़ेद। फिर डरा हुआ।

"उस्ताद," उसने धीमी आवाज़ में कहा, "ये — ये तो कफ़न वाले धागे जैसा है।"

मैं रुक गया।

"क्या कहा?"

टिंकू ने धागा मुझे लौटा दिया, जैसे छूने से डर लग रहा हो।

"मेरे पापा," उसने कहा, बहुत धीमी आवाज़ में। "जब उनका… जब जाना हुआ था… तब मैंने एक धागा देखा था। सफ़ेद। काले टीके के साथ। और बड़े लोगों ने उसे तुरंत छुपा दिया था। मेरी तरफ़ से।"

वो चुप हो गया।

फिर बोला —

"माँ ने कहा था कि वो धागा कभी नहीं खोलना चाहिए। वो जोड़ता है। जो चले गए हैं, उनसे।"

कुछ देर के लिए हम सब चुप रहे।

तभी मीरा आई और टिंकू के सिर पर हाथ रखा।

"अरे," उसने कहा, "तू जासूस है। जासूस डरता नहीं।"

"मैं नहीं डर रहा," टिंकू ने कहा। "मेरा हाथ थोड़ा काँप रहा है।"

"तो फिर भी वो काम कर रहा है," मीरा ने कहा और उसे थपकी दी।

टिंकू ने एक गहरी साँस ली। फिर अपना चश्मा सीधा किया। दुपट्टा ठीक किया। और एक पल में फिर से वो टिंकू बन गया जो सुबह आया था।

"ठीक है," उसने कहा। "आगे बताओ — कौन सा नाम है?"

मीरा ने धागा हाथ में लिया। उसे धूप के सामने उठाया। आँखों के सामने लाया। करीब लाई।

"अक्षर उलझे हैं," उसने कहा। "पढ़ा नहीं जा रहा।"

"क्या कोई लकीर है?" मैंने पूछा।

"हाँ। एक लंबी सीधी। फिर एक छोटी टेढ़ी। फिर बीच में एक बिंदु जैसा।"

"और?"

"और ये।" मीरा ने धागे का दूसरा कोना पलटा। "यहाँ कुछ जला हुआ है।"

मैंने देखा। सच में। धागे का एक कोना हल्का काला था। जला हुआ। बहुत कम। पर जला हुआ।

मैंने अपनी जेब से वो आधी जली रसीद निकाली।

और उसे धागे के पास रखा।

मीरा ने कुछ देर देखा। फिर उसकी आँखें बड़ी हो गईं।

"अंकुश," उसने कहा, "इन दोनों से एक ही गंध आ रही है।"

मैंने अपनी नाक़ उनके पास लाई। सूँघा।

हाँ।

जले काग़ज़ की गंध। हल्की। बहुत हल्की। पर वही।

कुछ देर मैं चुप रहा।

फिर मीरा ने कहा —

"चंद्रेश के आदमी ऐसे धागे नहीं पहनते।"

"कैसे पता?"

"मैंने उन्हें बार-बार देखा है। उनके कुर्ते में सफ़ेद धागा भी होता है, तो साफ़ सिला हुआ। मशीन का। और वो धागे कभी नहीं जलते।"

"तो इसका मतलब?"

मीरा ने धागे को घुमाया।

"मतलब इस धागे की जड़ कहीं और है," उसने कहा। "कहीं ऐसी जगह है जहाँ सफ़ेद धागे बाँधे जाते हैं। जहाँ काग़ज़ जलते हैं। और जहाँ नाम सिले जाते हैं।"

"कहाँ?"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"यही वो दरवाज़ा है," उसने कहा, "जो अभी तक नहीं खुला।"

मैंने दुकान की पिछली खिड़की की तरफ़ देखा। वही खिड़की जिसकी कुंडी पर ये धागा बँधा था। वही कुंडी जिसकी तरफ़ रात में कोई झाँका था।

तभी मेरी जेब से घंटी ने कहा —

"धागा जुड़ता है। पर धागे से जोड़ा हुआ धागा सबसे पहले कटता है।"

मैंने घंटी को हथेली में दबाया।

"क्या मतलब?"

"जो घर के अंदर सिला गया," घंटी ने कहा, "वो बाहर नहीं टिकता।"

And then Saniya runs.

फिर सानिया दौड़कर आई।

उसकी साँस फूली हुई थी। उसका चेहरा लाल था। कॉपी उसके हाथ से गिर गई थी और वो उठाने की ज़हमत भी नहीं कर रही थी।

"उस्ताद!" वो चिल्लाई।

"क्या हुआ?"

"उस्ताद, पिछले दरवाज़े पर कोई हमारा नाम लिख रहा है!"

कुछ पल के लिए पूरी गली में सन्नाटा छा गया।

पीपल के पत्ते तक रुक गए।

मैंने सानिया को देखा।

"कौन सा पिछला दरवाज़ा?"

"घर का," उसने कहा। "वही जिसके पीछे माँ की ब्याहता रखी है। वो दरवाज़ा। पूरा खुला हुआ है — और कोई अंदर से पीली रोशनी में नाम लिख रहा है।"

मैंने धागा जेब में रखा। रसीद भी। घंटी हथेली में कसी।

"टिंकू," मैंने कहा, "बच्चों को साथ लो। गुड्डू — भोला भाई को बुलाओ। रफ़ीक़ — मीरा के साथ चल। चिंटू — उस्ताद को। जल्दी।"

"और तुम?" मीरा ने पूछा।

मैं दुकान के अंदर की तरफ़ देखा। फिर बाहर की तरफ़।

"मैं दरवाज़े तक जा रहा हूँ," मैंने कहा।

"अकेले?"

मैंने घंटी को हथेली में उठाया।

"अकेले नहीं," मैंने कहा।

और चल पड़ा।

॥

मैं गली से भागा। चप्पल पैर से निकल गई तो उतार दी और नंगे पैर दौड़ा। पीपल की छाया पीछे छूट गई। मेरी दुकान का आधा खुला शटर पीछे छूट गया। सामने मेरे घर की पिछली दीवार दिख रही थी, और उस दीवार से आगे वह दरवाज़ा, जिसके बारे में घंटी ने कहा था — अब तेरा घर।

दरवाज़ा खुला था।

पूरा खुला। एक पल्ला अंदर की तरफ़ गया हुआ, दूसरा हवा में हिलता हुआ। और भीतर से पीली रोशनी आ रही थी। वैसी रोशनी जैसी पुराने दीये की होती है। काँपती हुई। धीमी। जैसे कोई बूढ़ा हाथ उसे अपनी हथेली से बचा रहा हो।

मैं दरवाज़े के सामने पहुँचा और रुक गया।

घंटी हथेली में ठंडी थी। न बज रही थी, न काँप रही थी। बस पड़ी थी।

"घंटी," मैंने फुसफुसाकर कहा।

चुप।

"घंटी, कुछ तो बोल।"

"अंदर आ," उसने कहा। "अब जो होगा, सामने होगा।"

मैंने एक कदम रखा।

भीतर का फ़र्श ठंडा था। ईंटें उस जगह से ज़्यादा ठंडी लग रही थीं, जहाँ सुबह धूप पड़ती थी। दीया लगभग वहीं जल रहा था, जहाँ पिछली रात मैंने उसे देखा था — चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े के सामने, एक ईंट पर रखा।

पर रोशनी के अलावा कुछ नहीं था।

न कोई आदमी। न कोई साया। न कोई चलने की आवाज़।

सिर्फ़ धूल थी।

और धूल में लिखा हुआ।

मैं झुका।

फ़र्श पर, दरवाज़े की चौखट से अंदर की तरफ़, एक पतली सी परत में धूल बैठी थी — वैसी महीन, जैसी बंद कमरों में बरसों में बनती है। उस धूल में किसी ने उँगली से कुछ लिखा था।

मैंने उसे पढ़ने की कोशिश की।

आधा मिट गया था।

दरवाज़े की तरफ़ से आती हवा, जो अभी भी पुरानी खिड़की की दरारों से घुसकर आ रही थी, उस लिखाई की एक तरफ़ को उड़ा ले गई थी। जो बचा था, वो किसी टूटे दाँत जैसा लग रहा था।

"क्या है?" पीछे से मीरा की आवाज़ आई।

मैंने पलटकर देखा। वो दौड़ती हुई आ रही थी, कैमरा एक हाथ में, दूसरे हाथ में उसका फटा बैग। उसके पीछे टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — पाँचों एक साथ, एक ही धूल उड़ाते हुए।

"अकेले मत आना," मीरा ने साँस रोकते हुए कहा। "तुम्हें मैंने कितनी बार कहा है—"

"बाद में डाँट लेना," मैंने कहा। "पहले ये देखो।"

मैंने धूल की तरफ़ इशारा किया।

मीरा झुकी। टिंकू भी झुका। सानिया ने अपनी लाल कवर वाली कॉपी सीने से लगा ली, जैसे डर गई हो।

"ये नाम नहीं है," मीरा ने कहा।

"पता है।"

"ये… ये कुछ और है।"

"हाँ।"

उसने अपनी उँगली धूल के पास ले जाकर हवा में एक लकीर बनाई। फिर दूसरी। फिर रुक गई।

"अंकुश," उसने कहा, "जब मैं आई थी, सानिया ने कहा था कि कोई नाम लिख रहा है।"

"हाँ।"

"तो नाम कहाँ गया?"

मैंने दरवाज़े के पल्ले की तरफ़ देखा। वो हवा में धीरे-धीरे हिल रहा था। हर झोंके के साथ धूल की सतह पर पतली लहर उठती थी, और उस लहर के साथ कुछ अक्षर और मिट जाते थे।

"यहीं गया," मैंने कहा। "हवा में।"

चिंटू ने अपनी चप्पल उठाई और धूल पर धीरे से रख दी, जैसे किसी को ढक रहा हो।

"अब नहीं उड़ेगी," उसने कहा।

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

"शाबाश।"

टिंकू ने दरवाज़े के बाहर झाँका। फिर अंदर। फिर बाहर।

"उस्ताद," उसने कहा, "कोई भागा कैसे? हम इतनी जल्दी आए। गली का मुँह तो सामने है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"सामने है," मैंने कहा। "पीछे भी कुछ है।"

मैं दरवाज़े से बाहर निकला। घर की पिछली दीवार के साथ एक पतला रास्ता जाता था — वही रास्ता जिसके बारे में पापा ने एक बार सिर्फ़ इतना कहा था कि "वहाँ से पहले भी लोग आते-जाते थे।" रास्ता नीचे की तरफ़ ढलान लेता था और सीढ़ी के नीचे से सूखी नाली में खुलता था।

नाली सूखी थी।

पर सूखी नाली की मिट्टी में, दो जगह, पैर के निशान थे।

नए नहीं। भूरे। जैसे किसी ने गीली मिट्टी में पैर रखा हो और फिर सूख जाने दिया हो। पर वो निशान टूटे नहीं थे। पूरे थे। मतलब उन पर अभी किसी ने पैर नहीं रखा था।

मैंने अपनी उँगली उनके ऊपर रखी।

"जूते नहीं," मैंने कहा। "लकड़ी के जूते।"

मीरा मेरे पास आई। उसने एक निशान की तस्वीर ली, फिर दूसरे की।

"यानी वो भागा नहीं," उसने कहा। "वो चला गया। आराम से।"

"हाँ।"

"कैसे?"

मैंने नाली की तरफ़ देखा। फिर अपने घर की तरफ़।

"क्योंकि उसे रास्ता पता था," मैंने कहा। "और जिसे रास्ता पता हो, वो कभी भागता नहीं।"

पीछे से टिंकू ने कहा —

"उस्ताद, यहाँ कुछ और है।"

हम सब अंदर गए।

टिंकू दीये के पास खड़ा था, और उसकी उँगली दीवार की तरफ़ थी।

"देखो," उसने कहा।

मैंने देखा।

दरवाज़े के ठीक बगल में, पीली दीवार पर, एक और लिखाई थी। बहुत छोटी। बहुत हल्की। जैसे किसी ने चलते-चलते जल्दी में उँगली फेर दी हो और फिर भूल गया हो।

मीरा ने कैमरा करीब किया।

"बता," मैंने कहा।

"यहाँ… यहाँ कुछ अधूरा है," उसने कहा। "जैसे कोई नाम लिख रहा था, और बीच में छोड़ गया।"

"कितना?"

"दो अक्षर। बस। और उसके आगे एक लकीर, जो नीचे की तरफ़ मुड़ी है।"

"कौन से अक्षर?"

मीरा ने ध्यान से देखा।

"एक बड़ा है," उसने कहा। "और एक छोटा। पर अंकुश, ये अक्षर नहीं हैं।"

"तो क्या हैं?"

"ये निशान हैं," उसने कहा। "जैसे कोई लिख रहा हो और बीच में डर जाए।"

मैंने घंटी को हथेली में से निकाला। वो अब भी ठंडी थी, पर जैसे ही मैंने उसे दीवार के करीब लाया, वो हल्की गरम हुई।

"घंटी," मैंने कहा। "ये क्या है?"

"ये नाम नहीं है," उसने कहा। "ये सवाल है।"

"किसका?"

"तुम्हारा।"

मैंने घंटी को देखा।

"क्या मतलब?"

"जो आया," घंटी ने कहा, "वो नाम लिखने नहीं आया था। वो पूछने आया था। और उसने अपना सवाल दीवार पर लिखा।"

"क्या पूछा?"

"वो तुम्हें पढ़ना होगा," घंटी ने कहा। "जब मिट जाए, तब समझ आएगा।"

और फिर वो चुप हो गई।

मीरा ने अपना कैमरा नीचे किया।

"अंकुश," उसने कहा, "मुझे एक बात कहनी है।"

"कह।"

"ये काम किसी ठेकेदार का नहीं है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तो?"

"अंकुश, ये चंद्रेश सक्सेना का काम हो सकता है।"

मैंने दीवार पर इकट्ठी होती धूल देखी।

"नहीं," मैंने कहा।

"तुम सुनते ही क्यों नहीं?"

"सुन रहा हूँ," मैंने कहा। "पर तू भी सुन। चंद्रेश काग़ज़ से खेलता है। काग़ज़ लिखवाता है। अंगूठा लेता है। तारीख़ें बदलता है। मगर दीवार पर उँगली नहीं चलाता।"

"क्यों नहीं?"

"क्योंकि उसको काग़ज़ पर भरोसा है," मैंने कहा। "काग़ज़ मिटता नहीं। पर धूल मिटती है। जो दीवार पर धूल में लिखता है, वो जानता है कि वो मिटेगा। वो इसीलिए लिखता है कि मिट जाए।"

मीरा चुप हो गई।

"तो ये कौन है?" उसने फिर पूछा।

मैंने दरवाज़े के पल्ले की तरफ़ देखा।

"कोई है," मैंने कहा, "जो चाहता है कि हम पढ़ें, पर पूरा न पढ़ें।"

सानिया ने धीरे से कहा —

"उस्ताद, माँ की ब्याहता की संदूकची…"

मैं दौड़ा।

संदूकची कोने में थी। रस्सी बँधी थी। जैसी थी, वैसी ही थी। मैंने उसे छुआ। ताला नहीं था, बस कुंडा था और वो कुंडा बंद था।

"किसी ने खोला नहीं," मैंने कहा।

"तो वो क्या ढूँढ रहा था?" मीरा ने कहा।

मैंने कमरे के चारों तरफ़ देखा।

"नाम," मैंने कहा। "वो घर का नाम ढूँढ रहा था।"

"किसका नाम?"

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर वो मिला नहीं।"

मीरा ने मेरे घर की पुरानी दीवारों को देखा। वो दीवारें जिन पर कोई तस्वीर नहीं थी। कोई नाम नहीं। कोई तारीख़ नहीं। सिर्फ़ चूना, और जगह-जगह उखड़ा हुआ। सिर्फ़ एक घर, जो किसी काग़ज़ में नहीं।

और तभी मुझे याद आया।

मैं पीछे पलटा।

"टिंकू," मैंने कहा। "दुकान से वो पुराना रेडियो ला। जो कोने में पड़ा है।"

"वो जला हुआ रेडियो?"

"हाँ।"

"उस्ताद, वो बजता नहीं।"

"लाना," मैंने कहा।

वो दौड़ा।

मीरा ने मुझे देखा।

"तुम उससे क्या करोगे?"

मैंने अपनी जलती हुई पीली उँगली देखी, जो धूल छूने से और गरम हो गई थी।

"मैं उसे ठीक करूँगा," मैंने कहा।

मीरा ने अपना कैमरा नीचे किया।

"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "तुम तीन रात से सोए नहीं हो।"

"सो जाऊँगा," मैंने कहा। "जब ये शहर सोने देगा।"

टिंकू रेडियो लेकर आया।

मैंने उसे दीवार के सहारे रखा। मैंने उसका पिछला ढक्कन खोला। भीतर के तार उलझे हुए थे, कुछ जले हुए, कुछ कटे हुए। एक तार लटक रहा था, जैसे किसी ने उसे उखाड़ दिया हो।

मैंने अपनी जेब से पेचकस निकाला। वो मेरे पास अब भी था — छोटा, घिसा हुआ, जो पापा की दुकान से उठाया था।

"बोल," टिंकू ने कहा। "क्या करें?"

"यहाँ देख," मैंने कहा। "ये तार अंदर घुसाना है। बस एक बार।"

"और फिर?"

"और फिर देखेंगे।"

मैंने पेचकस से तार का सिरा उठाया। वो छोटा था, गीला था, और बार-बार फिसल रहा था। मेरी उँगलियाँ ग्रीस और धूल से भरी थीं।

"टिंकू, टॉर्च पकड़।"

उसने टॉर्च जलाई।

मैंने तार को छेद में डाला।

एक चिंगारी निकली।

छोटी। पीली। नीली। और फिर एक आवाज़ — चट।

मैं पीछे हटा। मेरा हाथ खुल गया। पेचकस फ़र्श पर गिरा और लुढ़क गया।

"उस्ताद!" टिंकू चिल्लाया।

मैंने अपनी हथेली देखी।

जली थी। दो उँगलियों के बीच, एक छोटा सा गोल निशान, जो अभी उभर रहा था। चमड़ी सफ़ेद हो गई थी, किनारे लाल। दर्द नहीं हो रहा था। अभी नहीं। दर्द बाद में आता है। मुझे पता था। मैंने अपनी ज़िंदगी में बहुत बार ये जला हुआ निशान देखा था।

"बर्फ," मीरा ने कहा। "कहीं से बर्फ लाओ।"

सानिया दौड़ी।

"रुक," मैंने कहा। "सानिया, रुक।"

वो रुकी।

"कोई मत भेज," मैंने कहा। "सब यहीं रहो।"

मैंने हाथ को कमीज़ से पोंछा।

घंटी जेब में बजी।

एक बार। दो बार नहीं। एक बार।

"बोल," मैंने कहा।

"तू जल्दी में था," घंटी ने कहा।

"तो क्या करता? बैठकर इंतज़ार करता?"

"हाँ," घंटी ने कहा।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

"घंटी, ये वक़्त नहीं है।"

"यही वक़्त है," उसने कहा। "सुन। मशीन से पहले दो इंसान जुड़ें। वरना तार जुड़कर भी आवाज़ नहीं देगी।"

"कौन से दो इंसान?"

घंटी कुछ देर चुप रही।

फिर उसने कहा —

"वो तेरे सामने खड़ा है। तू उसे देख नहीं रहा।"

मैंने आँखें खोलीं।

सामने कोई नहीं था।

फिर मैंने पलटकर देखा।

दरवाज़े के बाहर, आँगन की सीढ़ी की आख़िरी पायदान पर, पापा खड़े थे।

वो कब आए, पता नहीं। उनके हाथ में कुछ नहीं था। उनका चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ था। उनकी कमीज़ की जेब फटी हुई थी। और वो खड़े थे — बस खड़े थे, जैसे कोई पुराना पेड़ हो जिसे किसी ने काटने की कोशिश की हो और छोड़ दिया हो।

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"पापा," मैंने कहा। "रेडियो — वो बजता नहीं। तार जुड़ गया, पर आवाज़ नहीं आ रही।"

पापा ने अपना मुँह फेर लिया।

"मैंने कहा था," उन्होंने कहा।

"क्या कहा था?"

"कि अब मैं कुछ नहीं छूऊँगा।"

कमरे में एक पल के लिए पूरी चुप्पी छा गई।

टिंकू ने पेचकस उठाया और फिर हाथ में ही पकड़े रह गया। सानिया ने अपनी कॉपी और कसकर पकड़ ली। मीरा ने अपना कैमरा नीचे कर दिया — न बंद किया, बस नीचे कर दिया। जैसे वो भी ये वाली बात रिकॉर्ड नहीं करना चाहती थी।

मैंने अपनी जली हथेली देखी।

"पापा," मैंने कहा। "बस तार है। तुम्हें पता है, तुम्हें ये सब पता है। तुमने पच्चीस साल उस्ताद की दुकान से टूटी चीज़ें ठीक कीं—"

"मैंने कुछ ठीक नहीं किया," उन्होंने कहा।

"क्या?"

पापा ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा।

"मैंने कुछ ठीक नहीं किया, अंकुश," उन्होंने कहा। "मैंने सिर्फ़ चुप रहकर उन्हें और बिगाड़ा है।"

"पापा—"

"ये रेडियो ठीक हो जाएगा तो क्या? गली ठीक हो जाएगी?"

उनकी आवाज़ नीची थी, पर उसमें कुछ था जो मैंने पहले नहीं सुना था। जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कुंडी को ज़ोर से खींचा गया हो।

"पापा, मैं तुमसे मदद माँग रहा हूँ। बस मदद।"

"नहीं।"

"एक बार।"

"नहीं।"

"पापा, तुम्हें ये तार जोड़ना आता है। तुम्हें ये यंत्र पता है। तुमने इसे हज़ार बार खोला—"

"मैंने क्या खोला?" पापा ने कहा। "मैंने सिर्फ़ उन चीज़ों को छुआ, जिन्हें छूने के बाद कोई सवाल नहीं पूछता। मैंने तुम्हें कभी ये नहीं बताया कि मैंने क्या किया। हकीम साहब के काग़ज़ पीछे के फाटक पर जलते रहे, वो शाम मैं वहीं खड़ा था, अंकुश। खड़ा रहा।"

सब चुप हो गए।

माँ की आवाज़ आँगन से आई, व्हीलचेयर की चरचराहट के साथ।

"शंकर," उन्होंने कहा।

पापा नहीं रुके।

"मैंने अंगूठा लगाया," उन्होंने कहा। "और फिर पच्चीस साल तक ये सोचता रहा कि उस अंगूठे को मिटाने का कोई तरीक़ा होगा। होता है?"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"तुम बताओ," उन्होंने कहा। "तुम्हारे पास घंटी है। तुम बताओ, अंगूठे का कोई इलाज होता है?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

क्योंकि मेरे पास इसका जवाब नहीं था।

"पापा," मैंने कहा। "मैं तुम्हें ये नहीं बता सकता कि उस अंगूठे का क्या होगा। पर मैं इतना जानता हूँ — जब तुम चुप रहते हो, तो तुम्हारी चुप्पी भी किसी का अंगूठा बन जाती है।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा।

"क्या बोला तूने?"

मेरी छाती में कुछ जम गया। ज़ोर से। गरम।

"मैंने कहा," मैंने आवाज़ उठाकर कहा, "कि तुम रोज़ चुप रहते हो। हर बार। जब कुछ होता है, तुम चुप हो जाते हो। काग़ज़ आता है, तुम चुप। अंगूठा माँगा जाता है, तुम चुप। अस्पताल की ज़मीन जाती है, तुम चुप। मैंने अंगूठा नहीं लगवाया, पापा, पर मैंने बीस दिन तक चुप रहकर तुम्हारा रास्ता साफ़ किया।"

"अंकुश!" मीरा ने कहा।

"नहीं," मैंने कहा। "आज ये बात होगी।"

मैं पापा के सामने गया।

"पापा, तुम्हें पता है मुझे कब सबसे ज़्यादा डर लगता है? अंधेरे से नहीं। राख से नहीं। सफ़ेद कुर्ते वाले से भी नहीं। जब तुम चुप होते हो, तब। क्योंकि जब तुम चुप होते हो, तो मुझे लगता है कि सब कुछ मुझे अकेले ही उठाना पड़ेगा। और मैं अकेला… मैं अकेला नहीं उठा पाऊँगा। मैं उठा नहीं पाता।"

मेरी आवाज़ टूटी।

"मैं उठा नहीं पाता, पापा," मैंने कहा। "इसीलिए मैं सबको जोड़ रहा हूँ। क्योंकि मुझे डर है कि मैं वो नहीं कर पाऊँगा जो तुम नहीं कर पाए।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा।

कुछ देर तक।

फिर उन्होंने अपना हाथ उठाया। जैसे मुझे कुछ कहने वाले हों। जैसे कोई पुरानी आदत हो — कि जब बेटा गलत बोले, तो बाप का हाथ उठता है।

पर उनका हाथ हवा में ही रुक गया।

और फिर नीचे गिर गया।

"नहीं," उन्होंने कहा।

"पापा—"

"नहीं, अंकुश। तू सही बोल रहा है।"

वो हिले।

दरवाज़े की तरफ़ गए।

उनके कदम भारी थे। जैसे किसी की चप्पल पानी से भर गई हो। वो दरवाज़े की चौखट तक पहुँचे, फिर वहाँ रुक गए।

एक हाथ उन्होंने चौखट पर रखा।

मैंने उनकी पीठ देखी।

पच्चीस साल की पीठ। झुकी हुई। पतली। सफ़ेद बालों वाली। वो पीठ जो मुझे बचपन में बहुत बड़ी दिखती थी, अब छोटी लग रही थी। और इतनी छोटी कि मैं उसे एक हाथ में समेट सकता था।

"मैं ठीक नहीं हूँ," पापा ने कहा।

उनकी आवाज़ टूटी।

पहली बार। पच्चीस साल में पहली बार।

मैंने उन्हें कभी नहीं सुना था ऐसे बोलते। वो हमेशा छोटे वाक्यों में बोलते थे। हाँ। नहीं। पानी ले आओ। बत्ती बंद कर दो। चुप रहो।

पर आज उनकी आवाज़ में बहुत कुछ था।

"मैं ठीक नहीं हूँ, अंकुश," उन्होंने कहा। "और मैं… मैं तुझे नहीं, खुद को नहीं समझ पाया।"

कमरे में जो भी था, सब रुक गया।

दीये की लौ भी।

"मैं पच्चीस साल ये सोचता रहा," पापा ने कहा, "कि अगर मैं चुप रहूँगा, तो तुम लोग सुरक्षित रहोगे। चुप्पी एक छत है, मैंने सोचा। उसके नीचे धूप नहीं आएगी, बारिश नहीं आएगी।"

उन्होंने हाथ चौखट से उठाया।

"पर वो छत नहीं थी," उन्होंने कहा। "वो कब्र थी।"

मैंने मुँह खोला। कुछ कहने के लिए।

"मत बोल," उन्होंने कहा। "प्लीज़। आज मत बोल।"

मैं चुप हो गया।

"मैंने सोचा था कि एक दिन मैं सब ठीक कर दूँगा," पापा ने कहा। "एक दिन। पर वो एक दिन कभी नहीं आया, अंकुश। क्योंकि एक दिन कभी नहीं आता।"

उन्होंने अपना चश्मा उतारा। टेप खुली। चश्मा हाथ में।

"मैं तेरी माँ को लेकर भाग आया था," उन्होंने कहा। "उस रात। जब काग़ज़ जल रहे थे। मैंने सोचा, दूर चले जाएँगे, सब भूल जाएँगे। पर ये गली… ये गली हमें छोड़ती ही नहीं। ये गली पकड़ लेती है। नाली से, पीपल से, तेरे हाथों से।"

वो पलटे।

उनकी आँखें लाल थीं।

"तू मुझसे मदद माँग रहा है," उन्होंने कहा। "और मैं तुझे क्या दूँ? ये हाथ? ये हाथ जो कुछ नहीं कर पाते। ये आँखें? ये आँखें जो चीज़ें देखकर भी चुप रहीं।"

"पापा—"

"मैं तुझे नहीं, खुद को नहीं समझ पाया," उन्होंने कहा।

और फिर वो मुड़े।

बिना पीछे देखे निकले।

सीढ़ियों से उतरे। आँगन से गुज़रे। माँ के पास से। माँ ने उन्हें रोकने के लिए अपना हाथ बढ़ाया — वो हाथ जो व्हीलचेयर के पहिये की तरफ़ जाता था — पर पहुँच नहीं पाया।

पापा निकल गए।

दरवाज़े से बाहर।

गली में।

और उनके जाने के बाद कमरे में एक बात बची — दीये की लौ, और टूटे रेडियो के तार से आती हुई हल्की चमक।

टिंकू ने धीरे से कहा —

"उस्ताद…"

"हाँ।"

"क्या हमें पापा के पीछे जाना चाहिए?"

मैंने अपनी जली हथेली देखी।

"नहीं," मैंने कहा।

"पर—"

"टिंकू, वो आदमी पच्चीस साल से इसी दरवाज़े पर खड़ा था। आज वो पहली बार बाहर निकला है। उसे अकेले जाने दो।"

मैं फ़र्श पर बैठ गया। पीठ दीवार से लगाई।

घंटी जेब में ठंडी हो गई थी।

"घंटी," मैंने कहा।

"बोल।"

"मैंने ग़लत कहा?"

"क्या?"

"जो मैंने पापा से कहा।"

घंटी कुछ देर चुप रही। फिर बोली —

"तूने सच कहा।"

"पर मैंने उन्हें तोड़ दिया।"

"नहीं," घंटी ने कहा। "तूने वो किया जो तेरे पास था। तोड़ना और खोलना एक जैसा दिखता है। फ़र्क़ बाद में पता चलता है।"

मीरा मेरे पास बैठ गई। उसने अपना कैमरा दीवार के सहारे रख दिया। पहली बार। जैसे वो भी थक गई हो।

"अंकुश," उसने कहा।

"हम्म।"

"जब मैंने अपने घर वालों से वो बात कही थी — जो मैंने छिपाई थी — तो मेरी माँ तीन दिन मुझसे नहीं बोली।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"फिर?"

"फिर चौथे दिन उसने मुझे चाय दी," मीरा ने कहा। "और कहा — अब खा ले। और कुछ नहीं कहा। पर वो चाय… वो चाय किसी माफ़ी से कम नहीं थी।"

मैंने सिर दीवार पर टिका दिया।

"तेरी माँ ने तुझे चाय दी," मैंने कहा। "मेरे पापा ने घर छोड़ दिया।"

"वो घर नहीं छोड़ा," मीरा ने कहा।

"तो?"

"वो उस दरवाज़े से बाहर गया है," उसने कहा, "जिसे पच्चीस साल से अंदर से बंद किया गया था। अंकुश, आदमी जब घर छोड़ता है, तो वो सामान लेकर जाता है। इनके हाथ में कुछ नहीं था। ये कुछ ढूँढने गए हैं।"

मैंने मीरा को देखा।

"तू अजीब तरह से सोचती है," मैंने कहा।

"तभी इन कामों में आई हूँ," उसने कहा।

और मुश्किल से, बहुत मुश्किल से, मेरे मुँह से एक हँसी निकली। छोटी सी। टूटी हुई। पर निकली।

माँ व्हीलचेयर पर दरवाज़े तक आईं।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"माँ।"

"मेरे पास सात सौ इकहत्तर रुपये हैं," उन्होंने कहा। "हिसाब की कॉपी में दबे हुए। मैंने उन्हें… उन्हीं के लिए बचाया था।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"किसके लिए?"

"तुम्हारे पापा के लिए," उन्होंने कहा। "वकील के लिए। अंगूठा मिटाने के लिए।"

मैंने अपना सिर नीचे किया।

"माँ, अंगूठा मिटता नहीं।"

"पता है," उन्होंने कहा। "पर उम्मीद मिटती भी नहीं।"

वो अपनी गोद में रखी कॉपी की तरफ़ देखने लगीं। फिर उन्होंने कहा —

"शंकर आज रात लौट आएगा।"

"तुम्हें कैसे पता?"

"क्योंकि वो गुस्से में नहीं गया," उन्होंने कहा। "वो शर्मिंदा होकर गया है। और शर्मिंदा आदमी देर तक बाहर नहीं रहता।"

फिर उन्होंने मेरी जली हथेली की तरफ़ देखा और उनका चेहरा बदल गया।

"ये क्या है?"

"रेडियो," मैंने कहा। "तार जोड़ रहा था।"

"तूने तार जोड़ा," उन्होंने कहा, "और हाथ जला लिया।"

"हाँ।"

"और आवाज़ आई?"

"नहीं।"

माँ ने दीये की तरफ़ देखा।

"तो तार ठीक नहीं है," उन्होंने कहा।

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"क्या?"

"तार ठीक होता तो आवाज़ आती," उन्होंने कहा। "तू आदमी जोड़ता है, और मशीन जोड़ने की जल्दी में है। मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, अंकुश। और बात में भी नहीं। जब आदमी आपस में नहीं जुड़े, तो तार क्या जुड़ेगा?"

मैंने घंटी को जेब से निकाला।

"घंटी," मैंने कहा, "यही तो तूने भी कहा था।"

"हाँ," उसने कहा।

"तो बता, कौन से दो आदमी?"

"अभी पता नहीं चलेगा," घंटी ने कहा। "जब दोनों सामने होंगे, तब बता दूँगी।"

मैंने घंटी को जेब में रख लिया और दीवार के सहारे सिर टिका दिया।

"टिंकू," मैंने कहा।

"हाँ उस्ताद।"

"बच्चों को बोल, घर के बाहर दो-दो, कोने-कोने पर खड़े हो जाएँ। सीटी सिर्फ़ सबसे बड़े खतरे के लिए।"

"और तुम?"

"मैं यहीं बैठा हूँ," मैंने कहा। "थोड़ी देर।"

टिंकू चला गया।

मीरा ने अपना कैमरा उठाया और उसे बंद कर दिया।

"क्यों बंद किया?" मैंने पूछा।

"क्योंकि ये बात किसी के देखने की नहीं है," उसने कहा।

फिर वो उठी।

"मैं दरवाज़े पर खड़ी हूँ," उसने कहा। "बस।"

वो चली गई।

मैं अकेला रह गया।

दीये की पीली रोशनी में मैंने अपनी जली हथेली देखी। उस पर अब तक दर्द नहीं उठा था। पर आ रहा था। धीरे-धीरे। ठंडे पानी की तरह।

मैंने घंटी को हथेली में लिया।

"घंटी," मैंने कहा।

"हाँ।"

"वो दरवाज़ा। जिस पर कोई धूल में लिख रहा था।"

"हाँ।"

"वो हमारा घर है।"

"हाँ।"

"तो अंदर आने के लिए उसे कोई रास्ता क्यों चाहिए था?"

घंटी चुप रही।

"घंटी?"

"क्योंकि," घंटी ने कहा, "वो घर में नहीं आया था। वो घर से बाहर गया था।"

मैंने दीवार से सिर उठाया।

"क्या?"

"उसने दरवाज़ा बाहर से नहीं खोला," घंटी ने कहा। "उसने अंदर से खोला।"

मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।

"क्या मतलब?"

"तेरा घर," घंटी ने कहा, "दो तरफ़ का है। एक दरवाज़ा गली की तरफ़। दूसरा… कहीं और की तरफ़।"

"कहाँ?"

"अभी नहीं," घंटी ने कहा। "पर एक बात सुन ले।"

"बोल।"

"आज रात जो आया," घंटी ने कहा, "वो तेरे घर का नहीं था। फिर भी वो अंदर से निकला। इसका मतलब सिर्फ़ एक है।"

मैंने आँखें बंद कीं।

"मतलब?"

"मतलब," घंटी ने कहा, "कि घर में कोई है जो उसे जानता है।"

कमरे में सन्नाटा था।

दीये की लौ हिली।

और मैंने पहली बार उस रात महसूस किया कि मेरा घर… मेरा घर मेरा नहीं रहा।

दरवाज़े पर मीरा की परछाईं दिखी। उसकी आवाज़ आई —

"अंकुश।"

"हाँ?"

"बाहर कोई खड़ा है।"

मैं उठा।

जली हथेली को कमीज़ में छिपाया। घंटी जेब में रखी। और दरवाज़े की तरफ़ चला।

"कौन?"

"पता नहीं," मीरा ने कहा। "पर वो हमारी तरफ़ नहीं देख रहा।"

मैं दरवाज़े पर पहुँचा।

आँगन की दीवार के पास, फाटक के ठीक बाहर, एक आदमी खड़ा था।

लंबा। पतला। सिर झुका हुआ।

उसके हाथ में कुछ था।

और वो काँप रहा था।

मैंने आँखें सिकोड़कर देखा।

फिर मेरा दिल धक् से रह गया।

वो पापा थे।

और उनके हाथ में वही टूटा रेडियो था।

जो मैंने कमरे में छोड़ा था।

॥

मैं पापा के पास पहुँचा। उनके हाथ में टूटा रेडियो था और वो काँप रहे थे, जैसे कोई बूढ़ा पेड़ आख़िरी बार हवा से लड़ रहा हो।

मैंने धीरे से रेडियो उनके हाथ से लिया। पहले तो उन्होंने छोड़ने से मना किया, उँगलियाँ कस गईं। फिर छोड़ दिया।

“पापा,” मैंने कहा।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। आँखें लाल थीं, पर पानी नहीं आ रहा था। पानी तो जाने पर आता है। उनका पानी पच्चीस साल से अंदर सूख रहा था।

“मैंने सोचा,” उन्होंने कहा, “कि तार जोड़ दूँ तो आवाज़ आ जाएगी। आवाज़ आई तो सब ठीक हो जाएगा।”

“पापा—”

“पर मैं जानता हूँ,” उन्होंने कहा, “कि ये तार नहीं है। तार तो बहाना है। मैं तीस साल से हर टूटी चीज़ में तार ढूँढ रहा हूँ, जिससे ये लगे कि ज़्यादा ज़रूरी टूटन नहीं है।”

मैंने उनका हाथ पकड़ा। सूखा था, ठंडा।

“अंदर चलिए,” मैंने कहा।

वो साथ आए। आँगन में ईंटों के पास बैठे। दीये की रोशनी हमारे बीच में थी, एक छोटी-सी पीली दुनिया।

माँ व्हीलचेयर पर थीं। उन्होंने पापा को देखा, फिर मुझे। कुछ नहीं बोलीं, बस हाथ से इशारा करके काजल को पानी का गिलास लाने को कहा।

पापा ने आधा पिया। बचा हुआ गिलास उन्होंने अपने घुटनों के पास रख दिया।

माँ ने व्हीलचेयर आगे बढ़ाई।

“शंकर,” उन्होंने कहा।

पापा ने नज़र उनकी तरफ़ की।

“बीस साल,” माँ ने कहा। “बीस साल से मैं तुम्हारे साथ सो रही हूँ। और हर रात मैं तुम्हारी चुप्पी के साथ सोती हूँ। तुम सोते हो क्या?”

पापा ने कुछ नहीं कहा।

“मुझे पता है कि तुम नहीं सोते,” माँ ने कहा। “तुम आँखें बंद कर लेते हो, बस।”

मैंने पापा की तरफ़ देखा। उन्होंने सिर झुका लिया।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा।

“तेरे पापा झूठ नहीं बोलते,” उन्होंने कहा।

“माँ, मुझे पता है।”

“नहीं,” माँ ने कहा। “तू सोचता है कि वो चुप रहते हैं क्योंकि उनके पास बोलने को कुछ नहीं है। पर सच ये है कि उनके पास इतना है कि अगर एक बार बोलना शुरू कर दें, तो रुकेंगे नहीं। और उन्हें पता है कि रुकना पड़ेगा। तो वो बोलते ही नहीं।”

मैंने कुछ कहना चाहा, माँ ने हाथ उठाया।

“वो बातें नहीं बोलते, ताकि किसी को डर न लगे,” माँ ने कहा। “यही उनका ढंग है। सच को अकेले ढोना। मुझे याद है, तेरे दादा के जाने के बाद उन्होंने तीन महीने में जितना बोला, उतना पूरे साल में भी नहीं बोलते। मैंने डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने कहा कि दिमाग़ शांत है। मैंने कहा कि शांत नहीं है, बस बंद है।”

माँ की आवाज़ धीमी थी, पर साफ़ थी। बीमारी ने उनका शरीर तोड़ा था, आवाज़ नहीं।

“एक बार,” माँ ने कहा, “उन्होंने घर बचाने के लिए अपना नाम कहीं दे दिया था।”

मेरी साँस रुकी।

“क्या?”

“अपना नाम,” माँ ने कहा। “अपने हाथ से लिखकर दिया था। किसी काग़ज़ पर। और उस दिन के बाद उनकी चुप्पी शुरू हुई।”

“कहाँ दिया था?” मैंने पूछा। “किस काग़ज़ पर?”

माँ ने पापा की तरफ़ देखा। पापा ने नज़र चुरा ली।

“ये मैं नहीं बताऊँगी,” माँ ने कहा।

“माँ—”

“क्योंकि ये बात मेरी ज़ुबान से नहीं निकलेगी,” उन्होंने कहा। “जिस दिन कैसेट बोलेगी, उस दिन सब सुनेंगे। तेरे पापा की आवाज़ में।”

“कैसेट में क्या है?”

“जो है,” माँ ने कहा। “वो अभी नहीं। सुबह बत्ती जाने से पहले।”

मैंने पेटी से तार निकाला। रेडियो के अंदर का जला हुआ तार देखा।

“पर आज रात तो—”

“आज रात तू ये सुन ले,” माँ ने कहा, “कि हमारे घर में एक नाम दिया गया था। तेरा और उसका। दोनों का।”

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

वो उठ गए। बिना एक शब्द कहे। बाहर चले गए।

“पापा!”

दरवाज़े पर रुके। पलटे नहीं।

“बाहर हूँ,” उन्होंने कहा। “पाँच मिनट।”

और चले गए।

मैं उठने लगा, माँ ने हाथ पकड़ा।

“मत जा,” उन्होंने कहा। “उसे जाने दे। जो आदमी बीस साल से रोया नहीं, उसे रोने का वक़्त देना भी इंसानियत है।”

मैं फिर बैठ गया।

बाहर से आवाज़ आई — मिट्टी पर कुछ गिरने की। फिर कोई चीज़ उठाने की। फिर चुप्पी।

मीरा दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। वो बाहर नहीं गई, बस वहीं खड़ी रही, मेरी तरफ़ पीठ करके, दरवाज़े की तरफ़ देखती हुई। जैसे रखवाली कर रही हो।

काजल माँ के पास बैठ गई।

मैंने रेडियो खोला।

पाँच मिनट बाद पापा आए।

मुझे पता नहीं चला कब आए। एक पल मैं सिर झुकाए रेडियो के तारों में उलझा था, और अगले पल वो मेरे पास बैठे थे। उनका चेहरा धुला हुआ था। आँखों के नीचे पानी की लकीरें थीं, जो उन्होंने पोंछी नहीं थीं। पानी तो पोंछने से जाता है। उन्होंने छोड़ दिया था, जाने के लिए।

उन्होंने मेरे हाथ से रिंच ली। एक पल मेरी जली हथेली देखी, फिर कुछ नहीं कहा।

“ये पट्टी पहले खोल,” उन्होंने कहा।

“यहाँ?”

“हाँ। ये रेडियो मैंने सोलह साल की उम्र में खोला था। तब तार इसी तरह थे।”

“आप करिए,” मैंने कहा। “मैं देखता हूँ।”

उन्होंने रिंच ली। हाथ काँप रहे थे। फिर धीरे-धीरे कम काँपने लगे। रिंच का लोहा अंदर गया, पट्टी खुली।

“ये जला है,” उन्होंने कहा।

मैंने नया तार दिया। उन्होंने देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा, जैसे पूछ रहे हों कि तूने ये कहाँ से निकाला।

“पेटी में था,” मैंने कहा। “पुराना है। पर साफ़ है।”

“धातु पुरानी नहीं होती,” पापा ने कहा। “बस लोग पुराने होते हैं।”

उन्होंने तार अंदर डाला। पहले एक सिरा जोड़ा, फिर दूसरा। फिर एक पेंच कसा। फिर दूसरा।

“पापा,” मैंने कहा।

“हूँ।”

“आपने माँ से वादा किया था कि ये बात अपने साथ नहीं ले जाओगे।”

उन्होंने काम रोका नहीं।

“हाँ।”

“तो फिर क्यों?”

“क्योंकि चुप रहना आसान लगा,” उन्होंने कहा। “बोलने से सब हिलता है। चुप रहने से कुछ नहीं हिलता। सिर्फ़ अंदर हिलता रहता है।”

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा रेडियो की तरफ़ झुका था, आधा अंधेरे में, आधा दीये की रोशनी में।

“अंकुश,” उन्होंने कहा, “मैंने तेरे दादा को अकेले मरने दिया।”

मेरा हाथ ठिठक गया।

“क्या कह रहे हैं आप?”

“उस रात,” पापा ने कहा, “दवा लेने मैं गया था। दुकान बंद हो रही थी। मैं रास्ते में बैठ गया। मैं थक गया था। और मैं सो गया।”

“कितनी देर?”

“दो घंटे।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

“उठा तो दवा की दुकान बंद थी। घर आया तो तेरे दादा की साँस जा चुकी थी। तेरी दादी दरवाज़े पर बैठी रो रही थी, और मेरी जेब में वो दवा थी जो मैं लाने में देर कर गया था।”

मैंने रेडियो नीचे रख दिया।

“तभी से,” पापा ने कहा, “मैं हर रात दो बजे उठ जाता हूँ। बीस साल से। कोई मुझे नहीं बताता कि रात के दो बजे हैं। मैं खुद उठ जाता हूँ।”

माँ ने आँखें बंद कर लीं।

“इसीलिए,” मैंने कहा, धीरे से, “जब दादा की साइकिल मेरे पास आई, तब आप उसे छू नहीं पाए?”

“मैं उस साइकिल को देख नहीं सका,” पापा ने कहा। “एक बार पच्चीस साल बाद देखा, तेरे उस कमरे में, और मैं काँप गया। मेरे हाथ से पेचकस गिर गया। तुझे मुझ पर शक हुआ।”

“पापा, मुझे तो लगा था कि आप कुछ छिपा रहे हैं।”

“मैं छिपा रहा था,” पापा ने कहा। “छिपा रहा था कि मैं डर गया था।”

वो एक पल रुके।

“और उसके बाद,” उन्होंने कहा, “रात के दो बजे वाला पापा फिर उठ गया। जो कभी सोता ही नहीं, वो क्या बताएगा कि उसे क्या हुआ?”

मैंने उनका कंधा पकड़ा। पहले कभी नहीं पकड़ा था।

“तो उस अंगूठे वाली बात में क्या सच है?”

पापा ने एक लंबी साँस ली।

“उस रात,” उन्होंने कहा, “मेरे पास पैसे नहीं थे। तेरी माँ अस्पताल में थीं। डॉक्टर इसरानी ने कहा था — दवा आज रात लगे, तो सुबह की साँस लौटेगी, वरना कोई वादा नहीं देता।”

माँ ने उनकी तरफ़ देखा।

“और काग़ज़ लेकर एक आदमी आया,” पापा ने कहा। “सफ़ेद कुर्ता, तेल की गंध, काग़ज़ स्याही से भीगा हुआ। उसने कहा — अंगूठा लगाओ, दवा की कीमत मिट जाएगी।”

“आपने पूछा नहीं कि काग़ज़ किसका है?”

“मैंने पूछा। उसने कहा — तेरी दुकान का।”

मैंने आँखें बंद कीं।

“दुकान तो दादा की थी।”

“मैंने यही कहा,” पापा ने कहा। “तो उसने कहा — ऊपर के काग़ज़ पर दुकान का नाम है, नीचे के काग़ज़ पर तेरा नाम लिखो। दोनों जुड़ेंगे तो ज़मीन का हिसाब बनेगा। मैंने कहा कि मैं पढ़ नहीं सकता, आँखें कमज़ोर हैं। उसने कहा — पढ़ने की ज़रूरत नहीं, नाम लिखने की ज़रूरत है।”

“और आपने लिख दिया।”

“उससे पहले मैंने तीन बार कहा कि मैं कुछ नहीं बेच रहा,” पापा ने कहा। “और तीनों बार उसने कहा कि बिक्री का काग़ज़ नहीं है, दवा का है। फिर उसने अस्पताल की रसीद दिखाई। सफ़ेद काग़ज़ पर नीली मोहर। डॉक्टर इसरानी का नाम। माँ की दवा। मैंने सोचा कि अगर रसीद अस्पताल की है, तो शायद बात सच है।”

“और अंगूठा लग गया।”

“अंगूठा लगा और नाम भी लिखा,” पापा ने कहा। “उस आदमी ने कहा — नाम और अंगूठा दोनों चाहिए। मैंने पूछा क्यों। उसने कहा — क्योंकि तेरे बाप नहीं हैं, तू है।”

कमरे में दीये की लौ हिली।

“मैंने लिख दिया — शंकर,” पापा ने कहा। “त्रिशूल जैसा नहीं, आम सा नाम। जैसे कोई चीज़ बेच नहीं रहा, बस काग़ज़ पूरा कर रहा हो।”

“और उसके बाद?”

“उसके बाद दवा मिली,” पापा ने कहा। “तेरी माँ बची। और मेरा नाम काग़ज़ पर रह गया। उस दिन के बाद मैंने कोई काग़ज़ नहीं पढ़ा। कोई काग़ज़ नहीं छुआ। डर लगता था कि कहीं किसी काग़ज़ पर मेरा नाम दिख गया तो मेरे हाथ फिर न लिखने लगें।”

माँ ने अपनी गोद में पड़ी साड़ी का पल्लू पकड़ लिया।

“मैं जानती थी,” उन्होंने कहा।

पापा ने उनकी तरफ़ देखा।

“तुझे कैसे पता?”

“क्योंकि उस रात तू जब दवा लेकर आया,” माँ ने कहा, “तेरे हाथ पर स्याही लगी थी। और तेरी जेब से काग़ज़ की गंध आ रही थी। और तू मेरी तरफ़ देख नहीं रहा था। बीस साल से तू मेरी आँखों में सीधा नहीं देखता, शंकर, माँगने के वक़्त छोड़कर।”

पापा कुछ नहीं बोले।

“कैसेट में क्या है?” मैंने फिर पूछा।

“तेरे दादा की आवाज़ नहीं है उसमें,” पापा ने कहा। “मेरी भी नहीं। उसमें एक आदमी है जिसने मुझसे उस रात कहा था — अगर तू सच बोल देगा, तो तेरा घर बचेगा। मगर उसके बाद तेरे पास घर नहीं होगा।”

“क्या मतलब?”

पापा ने रेडियो उठाया। उन्होंने देखा कि उसकी घरघराहट अब धीमी है, पर ज़िंदा। फिर उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया, जैसे कोई बच्चा हो।

“इसका मतलब,” पापा ने कहा, “कि वो काग़ज़ जिस पर मेरा नाम है, आज भी किसी दफ़्तर में रखा है। और उस काग़ज़ पर तेरा नाम भी जुड़ चुका है।”

“मेरा नाम? मैंने तो कभी नहीं लिखा!”

“उसी शीट पर,” पापा ने कहा, “नीचे की जगह पर, एक पतली लाइन है। और उस लाइन के आगे अक्षर अधूरे हैं। मैंने तब पूछा था कि नीचे कौन लिखेगा। उस आदमी ने कहा — जो आगे आएगा। मैंने कहा कि मेरे बेटे का तो कोई काम नहीं। उसने कहा — तेरे बेटे का आगे बड़ा काम होगा।”

मेरा दिल ज़ोर से धड़का।

“आपने उस आदमी को पहचाना?”

“नहीं,” पापा ने कहा। “काली अंगूठी थी उसकी उँगली में। मैंने बाद में कभी नहीं देखी।”

मैंने घंटी जेब से निकाली।

“घंटी,” मैंने कहा।

“हूँ।”

“ये सच है?”

घंटी एक पल चुप रही।

“तेरा पापा अपनी बात छुपाते हैं,” उसने कहा, “पर झूठ नहीं बोलते।”

“तो मेरा नाम उस काग़ज़ पर है?”

“हाँ।”

“और कैसेट?”

“कैसेट उस रात की बात कहेगी,” घंटी ने कहा। “पर सुनने वाले को तैयार होना पड़ेगा।”

मैंने घंटी जेब में रखी। पापा से पूछा—

“आपने आज रात वो रेडियो क्यों उठाया दुकान से?”

वो उठे। रेडियो को सीने से हटाया और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

“क्योंकि,” उन्होंने कहा, “आज रात बत्ती जाएगी। और बत्ती जाने से पहले अगर ये बोला, तो हमारे पास गवाही होगी। और अगर बत्ती जाने के बाद बोला, तो किसी को पता नहीं चलेगा कि ये आवाज़ इन दीवारों से आई थी या किसी और की।”

“बत्ती क्यों जाएगी?” मीरा ने पूछा, दरवाज़े से।

पापा ने उसकी तरफ़ देखा।

“क्योंकि साहब का आदमी आज रात यही करेगा,” पापा ने कहा। “काग़ज़ और बिजली, दोनों एक ही छड़ी से चलते हैं। जब तेरा काग़ज़ कमज़ोर हो, तो बत्ती जलने दो, गली देख लेगी कि तेरे पास सिर्फ़ काग़ज़ है, कुछ और नहीं।”

माँ ने व्हीलचेयर आगे सरकाई।

“शंकर,” उन्होंने कहा, “ये बात तूने अब तक क्यों नहीं बोली?”

“क्योंकि जिस दिन बोलता,” पापा ने कहा, “उस दिन काग़ज़ पर लिखा नाम खुद खुल जाता। और मैं नहीं चाहता था कि अंकुश उस काग़ज़ को देखे। मैं नहीं चाहता था कि ये उस पर से बोझ हो।”

“पर वो अब देख चुका है,” माँ ने कहा।

पापा ने मेरी तरफ़ देखा।

“हाँ,” मैंने कहा। “मैं देख चुका हूँ।”

उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरी तरफ़ देखते रहे।

मैं पास गया और उन्हें गले लगा लिया।

पहले पल उनका शरीर अकड़ा रहा। जैसे पच्चीस साल से किसी ने उन्हें छुआ नहीं था और अब छूने पर डर लग रहा हो कि कहीं ये सपना न हो। फिर उन्होंने मुझे पकड़ लिया। उनके हाथ मेरी पीठ पर थे, काँपते हुए, पर पकड़े हुए।

माँ ने हथेली से मुँह ढक लिया।

काजल कमरे से बाहर चली गई। मीरा उसके पीछे गई।

हम वहीं बैठे रहे।

कुछ देर बाद माँ ने कहा—

“अब भी वक़्त है। अगर बत्ती जाने से पहले उस कैसेट को सुन लें, तो कल सुबह सात बजे के सामने हम डटेंगे।”

“पर कैसेट कहाँ है?” मैंने पूछा।

पापा ने अलमारी की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।

“तेरे दादा की अलमारी के पीछे,” उन्होंने कहा। “लकड़ी के डिब्बे में। जो मैंने आज तक नहीं खोला।”

“क्यों?”

“क्योंकि उस पर लिखा था — मत खोलना।”

“किसने लिखा था?”

“तेरे दादा ने।”

पापा उठे। मैं भी उठा।

“कहाँ है अलमारी?”

“पीछे की तरफ़। चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े से जो कमरा है, उसके अंदर।”

मेरी साँस थम गई।

“वही दरवाज़ा,” मैंने कहा, “जो आज रात खुला था?”

“हाँ,” पापा ने कहा।

“तो उस कमरे में कोई और गया था।”

पापा ने मेरी तरफ़ देखा। गंभीरता से।

“लगता है कोई गया था,” उन्होंने कहा।

“और वो कोई उस डिब्बे को ढूँढ रहा था।”

पापा चुप रहे। फिर बहुत धीरे से बोले—

“या वो उसे पहले ही ले गया।”

मैंने घंटी जेब से निकाली। बिना हिलाए, बोला—

“घंटी, क्या वो अभी भी वहाँ है? डिब्बे में?”

“नहीं,” घंटी ने कहा।

मेरा दिल धक् से रह गया।

“क्या मतलब?”

“डिब्बा अभी वहीं है,” घंटी ने कहा। “पर उसके अंदर की चीज़… उसकी जगह किसी ने और चीज़ को रख दिया है।”

“क्या?”

“जब खोलो, तब पता चलेगा,” घंटी ने कहा।

मैंने पापा की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो कुछ था जो मैंने बीस साल में कभी नहीं देखा था। जज़्बा नहीं, तयशुदगी। आदमी जब सच बोलना तय कर लेता है, तो उसके चेहरे पर ऐसी ही लकीरें आती हैं।

“आज रात,” पापा ने कहा, “हम वो दरवाज़ा खोलेंगे। मैं साथ हूँ।”

“पर आपने कहा था कि रात ग्यारह बजे के बाद——”

“अब तक मैं बीस साल से कुछ और कह रहा था,” पापा ने कहा। “अब बोलूँगा।”

फिर उन्होंने रेडियो को सीने से लगाया। उसकी घरघराहट अब हल्की थी, जैसे दूर कोई रेडियो स्टेशन ज़िंदा हो। और पापा ने कहा—

“आज रात जब बत्ती जाएगी, तब सुनना। उसके बाद जो दरवाज़ा खटकेगा, उसे मत खोलना।”

“कौन सा दरवाज़ा?” मैंने पूछा।

“गली वाला,” पापा ने कहा।

“और अगर हम खोलें?”

“तो उस आदमी को जवाब देना पड़ेगा,” पापा ने कहा, “जो उस काग़ज़ पर मेरा नाम लिखवाने आया था।”

बाहर से सीटी बजी।

मीरा दौड़कर अंदर आई।

“काली गाड़ी,” उसने कहा। “गली के मुँह पर।”

पापा ने रेडियो कसकर पकड़ा।

“अंधेरे में,” उन्होंने कहा, “सबसे पहले बत्ती जाती है। फिर करंट। फिर आवाज़।”

“क्या करें?” मीरा ने पूछा।

“जो आज तक नहीं किया,” मैंने कहा। “काग़ज़ नहीं छिपाएँगे।”

“मतलब?”

“मतलब,” मैंने कहा, “कि आज रात बत्ती जाएगी, तो हमारे पास कुछ ऐसा होना चाहिए जो बत्ती के बिना भी जल सके।”

मैंने काजल को बुलाया। वो दौड़कर आई।

“मोमबत्तियाँ,” मैंने कहा। “जितनी मिलें। और चिमनी। और तेल।”

“अभी?”

“अभी,” मैंने कहा। “और टिंकू को बुला।”

टिंकू दौड़कर आया। उसके हाथ में चॉक था, कपड़े पीले थे।

“उस्ताद—”

“सब बच्चों को बोल,” मैंने कहा। “घर-घर जाओ। जिस घर में मोमबत्ती है, वो ले आओ। जिस घर में धागा है, वो भी ले आओ। और जिस घर में जले हुए दीये की एहसास है, वो भी।”

“क्यों?”

“क्योंकि आज रात गली को जागना पड़ेगा,” मैंने कहा। “और जागने के लिए बत्ती नहीं, तेल चाहिए।”

टिंकू भाग गया।

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

“एक बात पूछूँ ?”

“पूछ।”

“वो काग़ज़,” मैंने कहा, “जिस पर आपने मेरा नाम जुड़ा हुआ बताया। वो अगर किसी दफ़्तर में है, तो हम उसे नहीं जला सकते।”

“नहीं जला सकते,” पापा ने कहा।

“तो क्या कर"तो क्या करें?" मैंने कहा।

पापा ने रेडियो को सीने से थोड़ा दूर किया और मेरी तरफ़ देखा।

"काग़ज़ जलते हैं," उन्होंने कहा। "नाम नहीं जलते।"

"मतलब?"

"मतलब ये कि वो जो भी जलाता है, वो काग़ज़ जलाता है। नाम नहीं जला सकता। इसलिए आज रात हम काग़ज़ नहीं बचाएँगे।"

"तो?"

"नाम बाँटेंगे," पापा ने कहा। "एक नाम एक जेब में। सौ नाम सौ जेब में। फिर देखें, कितने जलाएगा।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

पापा की आँखें लाल थीं। चश्मा नाक पर फिसला हुआ था। हाथ में पेचकस था और पेचकस काँप रहा था। पर आवाज़… आवाज़ में वो कंपन नहीं था जो पिछले पाँच साल में था। आवाज़ सीधी थी। जैसे कोई पुराना तार आख़िरकार जुड़ गया हो।

"ठीक है," मैंने कहा। "नाम बाँटेंगे।"

मैं उठा और दरवाज़े की तरफ़ गया।

आँगन में काजल दौड़ती दिखी। उसके हाथ में मोमबत्तियों का गट्ठर था, और उसके पीछे माँ की व्हीलचेयर थी। माँ आँगन की दीवार के सहारे रुकी थीं। उनके हाथ में ताँबे का पुराना लोटा था, जिसमें गुड़ और सूखा धनिया था। जैसे किसी पुराने रीति के लिए कोई चीज़ निकाली गई हो।

"माँ?"

"आ जा," उन्होंने कहा। "दो मिनट बैठ जा।"

"माँ, अभी—"

"दो मिनट," माँ ने कहा। "गली का काम बीस मिनट में नहीं रुकेगा। पर ये बात अगर अब नहीं कही, तो फिर तेरे पापा के मुँह से नहीं निकलेगी।"

मैं उनके पास बैठ गया।

आँगन में लालटेन जल रही थी। दूर पीपल के नीचे बच्चों की आवाज़ आ रही थी — चिंटू किसी को डाँट रहा था, सानिया कह रही थी कि मोमबत्तियाँ गिनकर रखो। बाहर गली के मुँह पर काली गाड़ी खड़ी थी और उसका एक भी दरवाज़ा नहीं खुला था। बस इंजन की घरघराहट आ रही थी, जैसे कोई बैठा हुआ साँस ले रहा हो।

"तेरे पापा झूठ नहीं बोलते," माँ ने कहा। "ये मैं इक्कीस साल से देख रही हूँ। झूठ बोलने वाला आदमी आसान पकड़ा जाता है, अंकुश। क्योंकि उसे याद रखना पड़ता है कि किससे क्या कहा। तेरे पापा को कुछ याद नहीं रखना पड़ता। वो चुप रहते हैं।"

"चुप्पी भी झूठ होती है, माँ।"

"होती है," माँ ने कहा, बिना झिझक। "पर वो झूठ नहीं है। वो सच का बोझ है। जो आदमी सच अकेले ढोता है, वो बोलता नहीं। वो डरता है कि बोलेगा तो सच का वज़न बँट जाएगा और साथ में किसी और के सिर पर भी चला जाएगा।"

मैं चुप रहा।

"एक बार," माँ ने कहा, "तेरे पापा ने घर बचाने के लिए अपना नाम कहीं दे दिया था।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"क्या?"

"अपना नाम," माँ ने दोहराया। "किसी काग़ज़ पर। जहाँ उनका नाम होना ही नहीं चाहिए था।"

"कौन से काग़ज़ पर?"

"अब नहीं," माँ ने कहा।

"माँ—"

"अब नहीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वही कड़क आई जो दाल में पानी न मिलने वाली बात में होती है। "मैं एक बार कह चुकी हूँ और अब दोबारा नहीं कहूँगी। जिस दिन वो कैसेट बोलेगी, उस दिन सब सुनेंगे। सब एक साथ। तेरे पापा की ज़ुबान उस काग़ज़ में बंद है। और ताला वहीं खुलेगा, जहाँ लगा था।"

"पर माँ, अगर पापा बोल ही नहीं पाएँ—"

"तो तू उनके साथ बैठ," माँ ने कहा। "बोलने की ज़िद मत कर। बस बैठ। आदमी को अकेला देखकर सच निकलता है, सवाल से नहीं।"

मैंने पीछे देखा।

फाटक के बाहर, दीवार की परछाईं में, पापा खड़े थे। उन्होंने सब सुना था। उनके हाथ में पेचकस था और पेचकस हिल रहा था। वो अंदर नहीं आए। बस खड़े रहे, जैसे कोई सुन रहा हो कि अब क्या कहा जाएगा।

मैं उठा।

मैंने टूटा रेडियो उठाया, जो अभी भी दरवाज़े की चौखट पर पड़ा था। उसका पिछला ढक्कन खुला था, अंदर का तार काला पड़ चुका था, और उससे जली हुई चीनी जैसी गंध आ रही थी।

मैं वो रेडियो लेकर पापा की तरफ़ बढ़ा।

मैंने कुछ नहीं कहा। बस दोनों हाथों से रेडियो उनकी तरफ़ बढ़ा दिया।

पापा ने मेरी तरफ़ देखा।

फिर रेडियो देखा।

फिर उन्होंने पेचकस लिया, और बिना एक शब्द बोले, आँगन की सीढ़ी पर बैठ गए।

मैं भी बैठ गया। उनके बगल में। इतना पास कि हमारी कोहनियाँ छू रही थीं।

"तार," पापा ने कहा।

"हाँ।"

"औज़ारदान में ताँबे का तार है। पीछे की दराज़ में।"

"लाता हूँ।"

"और रेती।"

मैं रुका।

"रेती गायब है," मैंने कहा। "कल रात से।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा। एक पल।

"फिर घिसाई नहीं होगी," उन्होंने कहा। "फिर हम दोनों ही तार को हाथ से साफ़ करेंगे।"

मैं हँसा। बिना वजह। वो हँसी नहीं थी, वो कुछ और था — दो रातों से जमा हुई साँस जब पहली बार निकली।

पापा ने मेरी तरफ़ देखा और बहुत धीरे से, मुँह के कोने से, हँसे। पाँच साल में पहली बार।

मैंने ताँबे का तार लाया। पापा ने पीतल का छोटा पेचकस उठाया और रेडियो का पिछला हिस्सा खोला। अंदर धूल थी, जले काग़ज़ जैसी काली परत थी, और एक जगह तार बीच से टूटा हुआ था — न सिर्फ़ काला, बल्कि कटा हुआ। जैसे किसी ने नाखून से खींचकर तोड़ा हो।

मैंने उँगली से वो जगह छुई।

"पापा," मैंने कहा। "ये तार बुढ़ापे से नहीं टूटा।"

"मुझे भी यही लगा," पापा ने कहा।

"किसी ने तोड़ा है।"

"हाँ।"

"फिर हम जोड़ क्यों रहे हैं? ये तो…"

"क्योंकि जोड़ना हमारा काम है," पापा ने कहा। "तोड़ने वाले का काम वो खुद करेगा।"

मैं चुप हो गया।

हमने तार साफ़ किया। पापा के हाथ काँपते थे, पर उनकी उँगलियाँ जानती थीं कि कहाँ दबाना है। उन्होंने मुझे दिखाया कि तार को मोड़ते कैसे हैं, कहाँ पकड़ते हैं, कहाँ लपेटते हैं। मैंने ध्यान से देखा। बीच में एक बार उनका हाथ मेरे हाथ पर आ गया और वो हट गए, फिर रुक गए, और फिर हटा नहीं।

"तू छोटा था," पापा ने अचानक कहा। "तब तू इसी रेडियो को खोलकर बैठ जाता था। और मैं डाँटता था कि बिगाड़ेगा।"

"और मैं बिगाड़ भी देता था।"

"हाँ।" पापा ने कहा। "और फिर तू बैठकर रोता था। और माँ कहती थी — शंकर, इसे जोड़ना सिखा, रोना नहीं।"

मेरे गले में कुछ अटका।

"सिखाया नहीं," मैंने कहा। "आपने कभी नहीं सिखाया। मैंने खुद सीखा।"

पापा ने अपना सिर झुका लिया।

"हाँ," उन्होंने कहा। "यही गलती की। सिखाना चाहिए था। पर उस वक़्त लगा कि अगर मैं इसे औज़ार पकड़ना सिखा दूँगा, तो ये भी मेरी तरह चुप हो जाएगा। मुझे नहीं चाहिए था कि तू चुप हो। तू बोलता रहे, यही ठीक था।"

"पर आप चुप हो गए।"

"मैं चुप नहीं हुआ," पापा ने कहा। "मुझे चुप किया गया।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"किसने?"

पापा ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने तार को पकड़कर जोड़ा और छोटी पीतल की पट्टी से कस दिया।

"जब बोलेगा," उन्होंने कहा, "तब पूछना।"

मैं मुस्कुराया।

"ये आपकी नई आदत है," मैंने कहा। "हर बात के लिए 'तब' है।"

"हाँ," पापा ने कहा। "क्योंकि सच का वक़्त होता है। और वक़्त से पहले सच निकाला तो वो हथियार बन जाता है। हमारे पास हथियार नहीं हैं, अंकुश। हमारे पास लोग हैं।"

फिर उन्होंने रेडियो का बटन घुमाया।

कुछ नहीं हुआ।

फिर घुमाया।

कुछ नहीं।

मैंने घंटी जेब से निकाली। जेब में रखी थी, तो भी वो गरम थी।

"घंटी," मैंने कहा। "तार जुड़ गया।"

"हाँ।"

"तो आवाज़ क्यों नहीं?"

"क्योंकि तार दो तारों को जोड़ता है," घंटी ने कहा। "आदमी दो आदमियों को जोड़ता है। ये तार जुड़ गया है। पर इसमें बैठा आदमी अभी पूरा नहीं जुड़ा।"

"कौन सा आदमी?"

"जो अंदर बैठा है," घंटी ने कहा, "और जो बाहर खड़ा है। एक ही आदमी हैं।"

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

"पापा," मैंने कहा। "एक बात कहूँ?"

"कह।"

"जो उस काग़ज़ पर मेरा नाम है," मैंने कहा। "वो मेरा नाम नहीं है। मैंने कभी उस पर अंगूठा नहीं लगाया। और जब सुबह सात बजे मशीन आएगी, तो मैं उस काग़ज़ को मानूँगा भी नहीं। पर…"

"पर?"

"पर मैं ये भी जानता हूँ," मैंने कहा, "कि आपने मेरा नाम वहाँ नहीं लिखवाया। मुझे पता है। मुझे यह भी पता है कि आपने अपना नाम लिखवाया था। और अभी मैं ये नहीं पूछूँगा कि क्यों। बस एक बात कहता हूँ।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा।

"जब भी आप बोलेंगे," मैंने कहा, "मैं सुनूँगा। और जब मैं सुनूँगा, तो मैं आपको अकेले नहीं छोड़ूँगा। बस इतना।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा।

फिर उन्होंने रेडियो को गोद में रखा और अपना हाथ उस पर रख दिया, जैसे किसी के सिर पर रखा जाता है।

और रेडियो से एक हल्की घरघराहट निकली।

बहुत हल्की। कमरे की मक्खी जैसी। किसी दूर रेडियो स्टेशन के ज़िंदा होने जैसी।

मैंने साँस रोक ली।

घरघराहट बढ़ी। फिर अंदर से आवाज़ आई — पुरानी, सूखी, दबी हुई, जैसे किसी ने धूल में बोला हो।

"…तीसरी बार कह रहा हूँ," आवाज़ ने कहा। "ये नाम उधार का है। उधार का नाम कभी मज़बूत नहीं होता…"

फिर सरसराहट।

फिर आवाज़ बदल गई। पतली हो गई।

"…सात अंगूठे… सात, और एक…" फिर एक खटाका। "…और एक आठवाँ, जिसका कोई नाम नहीं…"

फिर एक लंबी सीटी जैसी आवाज़। और फिर शांत।

घरघराहट बनी रही।

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

पापा का चेहरा सफ़ेद था।

"पापा?"

"ये आवाज़," उन्होंने कहा, "मेरी नहीं है।"

"फिर किसकी है?"

"ये…" पापा ने रेडियो को कसकर पकड़ा। "ये शंकरलाल की है।"

बाहर से सीटी बजी।

मीरा दौड़कर आई।

"काली गाड़ी के साथ एक और गाड़ी। बड़ी। कुछ लोग उतर रहे हैं। गाड़ी का पीछा छत की तरफ़ है, उस्ताद — कुछ ऊँचा है उस पर।"

मैं उठा।

"माँ," मैंने कहा। "आप अंदर।"

"मैं अंदर नहीं जाऊँगी," माँ ने कहा। "मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, अंकुश। घर जलाने का ऐलान हो तो चूल्हे पर बैठी औरत भी उठकर बाल्टी लाती है।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा और मुझे कहना पड़ा कि मैं हार गया।

"ठीक है। पीपल के नीचे ले जाओ उन्हें," मैंने काजल से कहा। "और तुम उनके पास रहो। माँ, ये शर्त है।"

"शर्त नहीं," माँ ने कहा। "वादा।"

बाहर जाते वक़्त मैंने पापा की तरफ़ देखा।

वो उठे थे। रेडियो उनके हाथ में था और उनकी आँखें सीधी गली के मुँह पर टिकी थीं।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"हाँ?"

"तेरे पास सफ़ेद चॉक है?"

"है।"

"तो जाकर गली की दीवार पर लिख दे — 'अंकुश यादव यहाँ रहता है। सात नंबर दुकान। अंकुश यादव।' चार बार।"

मैं रुका।

"क्यों?"

"क्योंकि जो नाम मिटाना हो," पापा ने कहा, "उसे पहले दीवार पर लिखना पड़ता है। काग़ज़ छिपाने वाले उसे जला देते हैं। दीवार पर लिखा नाम जलता नहीं। उसे देखना पड़ता है। और जिसे देखना पड़े, वो भूल नहीं सकता।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"पापा," मैंने कहा। "आपने पाँच साल में इतना सोचा था और कभी नहीं बोले।"

"सोचने में हिम्मत नहीं लगती," पापा ने कहा। "बोलने में लगती है।"

फिर वो गली की तरफ़ चल पड़े।

पीपल के नीचे पूरी गली जमा हो रही थी। उस्ताद अली बक्श अपनी सिलाई मशीन की कुर्सी उठा लाए थे और उसे चबूतरी के किनारे रख रहे थे। शबनम आपा गुमटी का चूल्हा जला रही थीं — मैंने कहा था चूल्हा बंद, पर वो मेरी तरफ़ देखकर बोलीं, "चाय नहीं, पानी गरम हो रहा है। ज़ख्म धोने के लिए। और अगर ज़ख्म न हो, तो चाय बन जाएगी। दोनों एक ही चूल्हे पर होते हैं।"

भोला भाई अपनी दुकान से लंबी पटिया उठा लाए। दुबे अंकल थाने से अपनी पुरानी कुर्सी ले आए — नीली शर्ट में, छड़ी हाथ में — और बोले, "आज ये कुर्सी यहाँ रहेगी। अब थाने में क्या करेगी।"

बच्चे दौड़ रहे थे। टिंकू हर बच्चे के हाथ में गली का नक़्शा पकड़ा रहा था — नक़्शा मेरा नहीं था, उसका बनाया हुआ था, पेंसिल से, खाली काग़ज़ पर, जिसमें गली के चार कोने नंबर से लिखे थे।

मैंने सफ़ेद चॉक निकाला और गली के मोड़ की दीवार पर लिखा।

अंकुश यादव। सात नंबर दुकान।

फिर तीन बार और।

रफ़ीक़ ने देखा और बोला, "उस्ताद, ये तो तीन रात से मिट रहा है, ये नहीं मिटेगा?"

"मिटेगा," मैंने कहा। "पर मिटाने वाले को हर बार झुकना पड़ेगा। और झुकने वाले की पीठ पर बोझ रहता है।"

टिंकू ने चॉक उठाया और मेरे नाम के नीचे अपना नाम लिख दिया — टिंकू कुमार।

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्यों?"

"क्योंकि अब मैं भी उसी दुकान पर हूँ," उसने कहा, बिलकुल सीधे। "और अगर मेरा नाम मिटाएँगे, तो मुझे भी मिटाना पड़ेगा। और मैं दौड़ता बहुत तेज़ हूँ।"

मैं हँसा।

फिर सानिया ने लिखा — सानिया। फिर गुड्डू। फिर रफ़ीक़। फिर चिंटू। फिर उस्ताद आए और उन्होंने अपनी पतली सीधी लिखाई में लिखा — अली बक्श, दर्ज़ी, इस गली का।

फिर शबनम आपा ने लिखा — शबनम, जो किसी की बहन नहीं रही, पर इस गली की है।

फिर माँ ने कहा — मेरा नाम भी लिख।

और मैंने लिखा — सुशीला यादव।

और फिर मैं रुक गया।

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

वो दूर खड़े थे। रेडियो उनके सीने से चिपका हुआ था।

"पापा," मैंने कहा। "आपका?"

पापा कुछ देर चुप रहे। फिर आए। चॉक लिया। और बहुत धीरे, बहुत छोटे अक्षरों में लिखा —

शंकर यादव। मैंने नहीं जलाया।

गली में सन्नाटा हो गया।

किसी ने कुछ नहीं पूछा। किसी ने "क्या जलाया" नहीं पूछा। बस सब देखते रहे।

और मुझे लगा कि पापा ने आज पहली बार गली के सामने अपना पूरा नाम लिखा है।

उसी वक़्त बत्ती गई।

पूरी गली अंधेरे में डूब गई। पीपल, चबूतरी, दुकानें, काली गाड़ी, गुमटी, सब एक साथ। जैसे किसी ने एक तार खींच दिया हो।

बच्चों में से किसी ने चीख नहीं मारी। यही सबसे अच्छी बात थी। बस चिंटू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, मैंने मोमबत्ती जलाने की शपथ ली थी, अब जलाऊँ?"

"अभी नहीं," मैंने कहा। "दो मिनट। सब अपनी जगह। कोई हिलेगा नहीं।"

हम सब अंधेरे में खड़े रहे।

और फिर रेडियो बोला।

घरघराहट नहीं, आवाज़। साफ़। जैसे कोई बहुत करीब बैठा हो।

"अंकुश," आवाज़ ने कहा।

मेरा खून जम गया।

"अंकुश यादव," आवाज़ ने फिर कहा। "तेरे पापा की बात सुन। बत्ती गई है, तो सुन। अब जो दरवाज़ा खटकेगा, वो तेरे घर का दरवाज़ा नहीं है। वो उस घर का दरवाज़ा है जो तेरे घर से जुड़ा है। और उसके पीछे जो खड़ा है…"

आवाज़ रुकी।

सरसराहट हुई।

"…वो तेरा ही है," आवाज़ ने कहा। "वो तेरा ही है। और वो तुझसे पहले मर चुका है।"

रेडियो चुप हो गया।

पूरी गली में सिर्फ़ साँसों की आवाज़ बची।

मैंने घंटी हाथ में ली।

"घंटी," मैंने धीरे से कहा। "क्या ये सच है?"

"आधा सच है," घंटी ने कहा।

"आधा क्यों?"

"क्योंकि मरने वाला," घंटी ने कहा, "अभी यहाँ खड़ा है।"

और ठीक उसी पल गली के पुराने दरवाज़े पर दस्तक हुई।

एक। दो। तीन।

धीरे। बिलकुल धीरे। जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपनी उँगली से लकड़ी पर टपका रहा हो।

मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली में पसीना था।

"अंकुश," उसने कहा। "पापा कुछ कह रहे हैं।"

मैंने पलटकर देखा।

अंधेरे में पापा की आकृति दिख रही थी। उनका हाथ ऊपर उठा हुआ था। और उनकी आवाज़ आई, साफ़, बिना कंपन —

"नहीं खोलना।"

फिर एक और आवाज़ आई।

दरवाज़े के नीचे से कुछ सरका।

किसी ने एक काग़ज़ दरवाज़े के नीचे से अंदर धकेल दिया था।

चिंटू ने झट से माचिस जलाई। एक बत्ती। पीली रोशनी हम सब के चेहरों पर गिरी।

मैंने वो काग़ज़ उठाया।

उस पर नीली स्याही में चार लाइनें लिखी थीं। लिखाई काँपती हुई थी। पर अक्षर पहचाने हुए थे — मैं उन अक्षरों को जानता था। मैंने वो अक्षर सालों अपनी कॉपियों पर देखे थे।

लिखा था —

मैंने नहीं जलाया।

मुझे तेरे पापा से एक बात कहनी है।

दरवाज़ा खोल।

मैं तेरे पापा का भाई हूँ।

मेरे हाथ से काग़ज़ काँपा।

पापा दौड़कर आए। उन्होंने मेरे हाथ से वो काग़ज़ लिया, माचिस की रोशनी में देखा, और फिर उनका चेहरा ऐसा हुआ जैसे किसी ने उनके अंदर से पाँच साल निकाल दिए हों।

"पापा," मैंने कहा। "ये किसकी लिखाई है?"

पापा ने काग़ज़ को मोड़ा।

और फिर उन्होंने वो बात कही जो मैंने कभी सोची नहीं थी।

"ये लिखाई," उन्होंने कहा, "तेरे दादा की है।"

दरवाज़े पर चौथी दस्तक हुई।

"और दादा," पापा ने बहुत धीरे कहा, "पच्चीस साल पहले मर चुके हैं।"

माचिस बुझ गई।

अंधेरे में, दरवाज़े के नीचे से, चौथी दस्तक के बाद, एक हल्की सी घरघराहट आई।

रेडियो की।

जो अब भी पापा के सीने से चिपका था।

और जो बिना बत्ती के, बिना तार के, अपने आप बोल रहा था —

"खोल दे।"

॥

"खोल दे।"

वो आवाज़ रेडियो से आई थी। पर ऐसी नहीं जैसे रेडियो बोलता है। ऐसी जैसे कोई मेरे कान के ठीक पास खड़ा होकर धीरे से कह रहा हो। जैसे कोई बूढ़ा आदमी बिस्तर से उठकर आया हो और बच्चे को जगा रहा हो।

माचिस बुझ चुकी थी। अंधेरे में मैंने घंटी हथेली में कस ली।

"घंटी," मैंने धीरे से कहा। "बताओ। ये दरवाज़ा?"

"अभी नहीं।"

"क्यों अभी नहीं?"

"क्योंकि जो दरवाज़े के पीछे है," घंटी ने कहा, "वो खुलने नहीं, सुनने आया है।"

यही मेरी घंटी थी। जब सवाल सबसे बड़े होते, तब जवाब सबसे छोटा। मैंने एक गहरी साँस ली। गली में इतना अंधेरा था कि अपना ही हाथ नहीं दिख रहा था, और फिर भी मुझे लग रहा था कि कोई मेरे ठीक पीछे खड़ा है — सिर्फ़ साँस ले रहा है, और मेरी गर्दन के बालों को हल्का-हल्का हिला रहा है।

पापा का हाथ मेरे कंधे पर आया। अंधेरे में भी उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

"अंकुश," पापा ने कहा। "उस दरवाज़े को नहीं छूना। आज नहीं।"

"पापा, अगर वो सच में…"

"आज नहीं।"

उनकी आवाज़ में वो बात थी जो मैंने बहुत कम सुनी थी। डर नहीं था। वो था जो डर से भी गहरा होता है — जानना। जब आदमी को पता हो कि सामने क्या खड़ा है, और उसे लगे कि वो अभी तैयार नहीं है।

मीरा ने मेरा हाथ छोड़ा और अपना मोबाइल जलाया। उसकी स्क्रीन की सफ़ेद रोशनी में पूरी गली की शक्लें दिखीं — चिंटू के हाथ में जली माचिस, गुड्डू का खुला मुँह, रफ़ीक़ के चश्मे का एक काँच, सानिया के सिर पर बँधी माँ की गुलाबी चुनरी, माँ की व्हीलचेयर पर उनके पतले हाथ, और उस्ताद की आँखें — जो इस अंधेरे में भी कुछ देख रही थीं, जो हम सब नहीं देख रहे थे।

"दरवाज़े के आगे कुछ भारी रखो," पापा ने कहा।

"मेरा औज़ारदान," मैंने कहा। "पूरा लोहा है। खाली भी तीन मन का है।"

"और मेरा बेंच," शबनम आपा ने कहा। "जो उस दरवाज़े को खोलने की कोशिश करेगा, उसके पैर मेरी चाय की केतली से जलेंगे। कह देती हूँ।"

किसी ने हँसा नहीं। पर सबने उस बात को मान लिया। भोला भाई दौड़कर अपनी दुकान से लोहे की पटिया ले आए। उस्ताद ने अपनी सिलाई मशीन का लोहे का पाया खोला — वो पाया जो पचास साल से एक जगह जमा हुआ था। दुबे अंकल ने अपनी छड़ी से दरवाज़े के नीचे की ज़मीन टटोली और बोले, "नीचे से भी कुछ सरक रहा था। दरवाज़े के खुर के नीचे ज़मीन गरम है।"

जमीन गरम है। इस वाक्य ने मेरी रीढ़ में एक ठंडी सुई सी उतार दी।

हमने दरवाज़े के आगे औज़ारदान रख दिया। उसके ऊपर बेंच। बेंच पर मशीन का पाया। पाये पर भोला भाई की पटिया। अब उस दरवाज़े को खोलने के लिए किसी को पहले पटिया उठानी पड़ेगी, फिर पाया, फिर बेंच, फिर औज़ारदान। और यह सब करते-करते आधी गली जाग जाएगी।

और पीछे, अंधेरे में, किसी ने बहुत धीरे कहा —

"अंकुश यादव।"

मैं पलटा।

दरवाज़े के नीचे से जो काग़ज़ सरका था, वो अब भी वहीं पड़ा था। नीली स्याही, काँपती लिखाई, चार लाइनें। पर आवाज़ उससे नहीं आई। आवाज़ पापा के सीने से आई थी। रेडियो से।

"अंकुश यादव," आवाज़ ने फिर कहा। "तेरा दरवाज़ा आज रात नहीं खुलेगा। पर कल शाम को एक आदमी तेरी दुकान पर आएगा। वो तेरे पास बैठेगा, चाय पिएगा, और जो कहेगा, वो सुन लेना। वो सच कहेगा। पहली बार।"

रेडियो चुप हो गया।

पापा ने रेडियो सीने से उतारा। हाथ काँप रहा था। उन्होंने उसे मेज़ पर रखा और उसकी तरफ़ देखा, जैसे कोई पुराना दुश्मन सामने बैठा हो और बात करने को तैयार हो।

"पापा," मैंने कहा। "शंकरलाल कौन है?"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जिसे मैं नाम नहीं दे पाया। पसीना नहीं, आँसू नहीं। कुछ और।

"कल बताऊँगा," उन्होंने कहा। "आज नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि आज रात," उन्होंने कहा, "मुझे पहले खुद याद करना है कि मैं कौन हूँ।"

उस रात हम सबने आँगन में ही रात काटी। कोई सोया नहीं।

चिंटू ने तीन बार माचिस जलाई और तीन बार बुझा दी, आख़िरकार उसकी माँ ने उसे गोद में ले लिया और उसके कान में कुछ गुनगुनाने लगी। सानिया दो बार कान लगाकर दरवाज़े पर सुनने गई, दोनों बार कुछ नहीं सुना। रफ़ीक़ ने अपनी टूटी चश्मे की एक काँच वाली आँख से पूरी रात दरवाज़े की तरफ़ देखा, जैसे उसे वहाँ से कोई बाहर आता दिख जाएगा। गुड्डू ने कंबल ओढ़कर भी अपनी आँखें खुली रखीं और हर आधे घंटे में पूछता रहा, "अंकुश भैया, कितना बजा?"

मैं हर बार कहता, "अभी तो बहुत रात है।"

आख़िर में उस्ताद ने कहा, "गुड्डू, बेटा, घड़ी देखने से रात कटती है तो हम सब मिलकर घड़ी देखें।" और सब हँस पड़े। उस हँसी में डर था, पर हँसी थी।

कुछ नहीं आया।

सुबह चार बजे बत्ती लौटी। बिजली के आते ही दुकान के पीछे वाला बल्ब गुनगुनाया, जैसे वो भी पूरी रात जागा हुआ इंतज़ार कर रहा था। पाँच बजे पीपल पर पहला कौआ बैठा। छह बजे शबनम आपा ने चूल्हा जलाया और पूरी गली के लिए चाय बनाई। उस चाय में कुछ था — पहले घूँट में ही पता चल गया कि आज कोई हल्की बात नहीं होगी। उसमें अदरक ज़्यादा था। शबनम आपा जब डरती थीं, तो अदरक ज़्यादा डालती थीं।

दरवाज़ा। वो अब भी बंद था।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। औज़ारदान, बेंच, मशीन का पाया, पटिया — सब वैसे ही थे। कुछ नहीं हिला।

"घंटी," मैंने कहा। "कुछ हुआ?"

"दरवाज़ा नहीं खुला," घंटी ने कहा।

"इसका मतलब?"

"इसका मतलब," घंटी ने कहा, "कि जो पीछे था, वो अब भी पीछे है।"

मेरा पेट भारी हो गया।

दिन किसी तरह गुज़रा। उस्ताद ने रजिस्टर की कॉपी फिर निकाली और उसके पन्ने पलटते रहे। मीरा ने आधी जली रसीद फिर जाँची और इस बार उसने हर शब्द को एक कोरे काग़ज़ पर उतारा। माँ ने व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे कुछ और चीज़ें खोजीं — पुरानी तस्वीरें, दादा का कोई काग़ज़, बच्चों की कोई कॉपी, कुछ भी। पर उन्हें कुछ नहीं मिला। काजल ने दो बार पूछा कि क्या पापा ठीक हैं, और दोनों बार पापा ने सिर हिलाकर हाँ कहा, और दोनों बार पापा की आँखें झूठ बोल रही थीं।

दोपहर में भवानी प्रसाद रजिस्ट्री की बात लेकर आए और चले गए। शाम को रज़ा सलीम के आने की बात फिर याद आई। बबलू की काली गाड़ी गली के मुँह पर खड़ी रही और उसमें से कोई उतरा नहीं। उसका चालक भी बाहर नहीं आया।

और शाम पाँच बजे…

शाम पाँच बजे पता चला कि रेडियो का वो वादा अब भी ज़िंदा है।

वो गली में आया तो पहले किसी ने नहीं पहचाना।

सफ़ेद कुर्ता वो पहनता था, पर आज वो उतारकर साधारण पीली कमीज़ पहने हुए था — वो भी बिना इस्त्री की, कॉलर मुड़ा हुआ, आधी बाँह पर पसीने का धब्बा। गर्दन खाली थी। न सोने की मोटी चेन, न सोने का चौकोर लॉकेट जो हिलने पर टिक-टिक करता था। हाथ खाली थे। न पानदान, न पान, न वो चमकता हुआ सोने का डिब्बा। उसके जूते भी धूल भरे थे — वो जूते जो हमेशा इतने साफ़ रहते थे कि लगता था गली की धूल भी उनसे अलग है।

उसके कदम धीमे थे। जैसे किसी ने उसके जूतों के तले रेत डाल दी हो।

वो दुकान के सामने आकर रुका।

चिंटू ने पहले देखा। वो चबूतरी से उछलकर खड़ा हो गया और भरी आवाज़ में चिल्लाया, "अरे! ये तो अपना बबलू भाई है। बिना सोने के।"

सानिया हँसी — वो मज़ाक वाली हँसी, जिसमें ज़रा भी दया नहीं थी। "चेन कहाँ गई भाई? बैंक में जमा करा दी क्या?"

"पान भी नहीं है," रफ़ीक़ ने कहा, टूटे चश्मे के ऊपर से देखकर। "भाई, आज तुम खाली हाथ क्यों आए?"

"अरे चुप करो," गुड्डू ने कहा। "देख नहीं रहे? भाई जी का कल रात कोई सपना ख़राब हुआ है। सपना ख़राब हो तो चेन उतर जाती है।"

बबलू ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपनी कमीज़ के पल्ले को सीधा किया और चुपचाप आकर दुकान की बेंच पर बैठ गया। ऐसा बैठा जैसे कोई स्कूल का बच्चा मार खाकर मास्टर के सामने बैठता है — हाथ घुटनों पर, नज़र ज़मीन पर, पीठ सीधी पर झुकी हुई।

मुझे उससे हमेशा चिढ़ थी। गली में वो उस तरह का आदमी था जो अपनी आवाज़ के बल पर ज़िंदा रहता है — धमकी, पान, सोने की चेन, मोटा शरीर। और आज… आज वो सिर्फ़ एक आदमी लग रहा था। पीला, थका, कमज़ोर।

"बबलू भाई," मैंने कहा। "चाय पियोगे?"

"नहीं।"

"कुछ खाओगे?"

"नहीं।"

"तो फिर बैठ क्यों गए?"

वो चुप रहा।

शबनम आपा अपनी गुमटी से निकलकर आईं। उनके हाथ में एक गरम समोसा था, काग़ज़ की पुड़िया में लिपटा हुआ, जिसमें से भाप निकल रही थी। उन्होंने बिना कुछ पूछे उसे बबलू की तरफ़ बढ़ाया।

"ले," उन्होंने कहा। "खा। भूखा आदमी सही बात नहीं सोचता। और जो सही बात नहीं सोचता, वो जल्दी मरता है।"

बबलू ने समोसा नहीं लिया।

शबनम आपा ने ज़ोर से उसकी हथेली पकड़ी — कसकर — और समोसा उस पर रख दिया। "जब दुनिया डरा रही हो," उन्होंने कहा, "तब इंसान को कुछ गरम खाना चाहिए। भूख और डर, दोनों पेट से जुड़े होते हैं। मैं औरत हूँ, मेरे यहाँ सब आते हैं, मुझे ये बात पता है।"

बबलू ने एक तरफ़ देखा। फिर बहुत धीरे कहा, "आपा, मैं आज यहाँ चाय पीने नहीं आया।"

"तो किस लिए आया?"

"उस्ताद से बात करनी है।"

"कर।" मैंने कहा। "पर पहले समोसा खा। मेरी दुकान में भूखे आदमी से बात नहीं होती। और तेरे हाथ काँप रहे हैं — तेरे हाथ में समोसा है, अगर काँपता रहा तो गिर जाएगा, और शबनम आपा का एक भी समोसा बर्बाद होना मुझे गवारा नहीं।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर देखता रहा, जैसे पहली बार मुझे देख रहा हो। फिर उसने गरम समोसे की तरफ़ देखा। फिर उसने एक बड़ा सा कौर लिया। गरमी से उसका मुँह जल गया, वो फूँकने लगा, आँख से पानी आ गया।

"धीरे," शबनम आपा ने कहा। "कोई तुझे नहीं छीन रहा।"

तीन कौर में समोसा खत्म हो गया। उसने उँगलियों पर लगी चटनी को भी साफ़ किया, जैसे कोई आख़िरी चीज़ खा रहा हो।

फिर उसने हाथ जोड़ लिए।

"अंकुश," उसने कहा। "मैं तुझे डराने नहीं आया।"

"अच्छा।"

"मुझे भेजा गया था।"

"किसने?"

वो चुप रहा।

"बबलू भाई, कुछ तो बोलो। घर है, कोई कोर्ट नहीं। यहाँ किसी की वकालत नहीं चल रही।"

"साहब ने भेजा था," उसने कहा। "कैसेट खोजने।"

"कौन सी कैसेट?"

"तेरे पापा वाली। जो तेरी दुकान में है। साहब को पता है। उसने मुझे कहा — जाकर ले आ, जो भी हो, ले आ।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू आया था?" मैंने पूछा। "दुकान में?"

"हाँ। रात दो बजे। दरवाज़ा खुला था। मैं अंदर गया।"

"कुछ लिया?"

"कुछ नहीं।" उसने नीचे देखा। "और अब पछता रहा हूँ कि क्यों गया था।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैं अंदर था," उसने कहा, "और बाहर कोई और आया। मैंने उसे खिड़की से आते देखा — सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते। मैं उसकी बात सुन रहा था। वो हँसा, अपनी जेब से कुछ निकाला, कुछ कहा, और चला गया।"

"क्या कहा?"

"मैं सुन नहीं पाया," बबलू ने कहा। "पर मैंने देखा। और जब वो चला गया, तो मेरी हिम्मत टूट गई।"

चिंटू हँसा। "ये सुनो! ये सुनो! जो सारी गली को डराता था, वो आज खुद काँप रहा है!"

"देख भाई," सानिया ने कहा, अपनी कॉपी पर कुछ लिखते हुए, जैसे जासूस अपनी रिपोर्ट बना रही हो। "हम अब आपको डराएँगे नहीं। क्योंकि अब आप खुद डरे हुए हो। और डरे हुए आदमी को डराना गंदी बात है। ये हमारी गली का नियम है।"

"शाबाश," शबनम आपा ने कहा। "मेरी ही बोली है तू बोल रही है।"

"और सुनो बबलू भाई," चिंटू ने कहा, अब ज़रा गंभीर होकर। "अब आप हमारे साथ आ जाओ। अकेले मत रहो। अकेले डर और बढ़ता है। मैंने अपनी किताब में पढ़ा है।"

मैंने चिंटू को देखा। कभी-कभी ये बच्चा मुझे बूढ़ा कर देता था।

बबलू ने एक बार सबकी तरफ़ देखा। फिर उसने धीमी आवाज़ में वो कहा जो वो कहने आया था।

"बात वो नहीं है जो तुम सोच रहे हो," उसने कहा। "मैं साहब से नहीं डरा। साहब तो वो है जिसे मैं सालों से जानता हूँ। वो सिर्फ़ काग़ज़ और पैसा है। पर उसने मुझे कभी नहीं डराया। मैं उससे डरा जो साहब के पीछे खड़ा था।"

गली में एक ठहराव आया।

उस्ताद ने सिलाई मशीन के पास रखी कैंची उठाई, फिर रख दी। उन्होंने कुछ नहीं कहा, पर उनकी आँखें उसकी तरफ़ घूम गईं।

"कौन?" मैंने पूछा। "सफ़ेद कुर्ते वाला?"

"उसके पीछे एक और था," बबलू ने कहा। "उसका चेहरा नहीं दिखा। सिर्फ़ उँगली दिखी।"

"उँगली?"

"हाँ। उँगली में एक काली अंगूठी थी। और वो अंगूठी ऐसे चमक रही थी जैसे अंधेरे में कोई जली हुई लालटेन लेकर खड़ा हो।"

मेरा खून जम गया।

मैंने पलटकर पापा की तरफ़ देखा — वो मेरे पीछे खड़े थे, हाथ में आधी पी हुई चाय, पर प्याला अब भी वैसा ही भरा हुआ था। उन्होंने एक बूँद भी नहीं पी थी। उनका चेहरा सफ़ेद हो गया था — ऐसा सफ़ेद जैसा काग़ज़। और उनकी आँखों में वो बात थी जो मुझे कल रात भी दिखी थी। जानना।

"काली अंगूठी?" मैंने बबलू से दोबारा पूछा।

"हाँ।"

"पक्का?"

"अंकुश," बबलू ने कहा। "मैं ज़िंदगी में पहली बार सच बोल रहा हूँ। झूठ बोलने की हिम्मत भी नहीं बची है।"

मैंने घंटी हथेली में दबाया। वो ठंडी थी। बर्फ जैसी।

पर तभी…

घंटी गरम होने लगी।

पहले हल्की गरम — जैसे धूप में रखी हुई चीज़। फिर तेज़। फिर इतनी तेज़ कि मुझे उसे दूसरे हाथ में लेना पड़ा, जैसे किसी ने उसे मुठ्ठी में जला दिया हो।

"घंटी," मैंने कहा। "क्या हुआ?"

"आज रात," घंटी ने कहा।

"आज रात क्या?"

"आवाज़ बोलेगी।"

"फिर?"

"बत्ती जाएगी।"

"फिर?"

"और दरवाज़ा खटकेगा।"

पूरी गली सुन रही थी। मैंने देखा कि उस्ताद ने अपनी कैंची फिर उठाई और इस बार जाने नहीं दिया, उसे हथेली में कस लिया। माँ ने काजल का हाथ पकड़ लिया — इतना कसकर कि काजल की उँगलियाँ सफ़ेद हो गईं। पापा ने कुछ कहना चाहा, पर चुप रहे — जैसे उनके अंदर भी कोई चीज़ लड़ रही हो। और मीरा ने बस अपना मोबाइल उठाया और रिकॉर्डिंग चालू कर दी।

"कौन खटखटाएगा?" टिंकू ने पूछा।

उसकी आवाज़ पतली थी। पतली और साफ़ — जैसे पाँच साल पहले वाला टिंकू, अपनी माँ की गोद में बैठा हुआ, पूछ रहा हो कि आसमान में बादल क्यों होते हैं। मैंने उसे देखा। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा — वो बबलू को देख रहा था। जैसे सब जवाब उसके पास हों।

बबलू ने टिंकू का कंधा पकड़ा। उसके हाथ की उँगलियाँ गरम थीं — मैंने देखा, वो टिंकू के कंधे पर उँगलियाँ रखे हुए हल्का-हल्का काँप रही थीं।

"टिंकू," उसने धीरे से कहा। "मैं बताता हूँ।"

वो रुका।

जैसे कोई गले में फँसी चीज़ को निगलने की कोशिश कर रहा हो। उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा। फिर पापा की तरफ़। फिर उसने आँखें नीची कर लीं।

"वो दस्तक," उसने कहा, "इंसान की नहीं होगी।"

गली में हवा भी रुक गई।

उसने एक गहरी साँस ली। उसकी उँगलियाँ टिंकू के कंधे पर और कस गईं। उसने बहुत धीमी आवाज़ में, जैसे कोई अपना ही दुख किसी और को सौंप रहा हो, वो आख़िरी बात कही —

"वो दस्तक उस कैसेट की होगी जिसे तेरे पापा छुपा रहे हैं।"

मैंने पलटकर पापा को देखा।

पापा के हाथ से चाय का प्याला छूटा। वो ज़मीन पर गिरा। चटका नहीं — सिर्फ़ लुढ़का। चाय ज़मीन पर फैल गई और धूल में छोटे-छोटे गड्ढे बनाने लगी।

पापा नहीं हिले।

उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैं उनके जीवन में पहली बार देख रहा था।

डर नहीं। शर्म नहीं। पछतावा नहीं।

सन्नाटा।

और उस सन्नाटे में, मेरे हाथ की घंटी, जो अब भी गरम थी, बहुत धीरे से कुछ फुसफुसाई। मैंने कान लगाया।

"अंकुश," घंटी ने कहा।

"हाँ?"

"तेरे पापा वो कैसेट आज रात नहीं छुपा पाएँगे।"

॥

"तेरे पापा वो कैसेट आज रात नहीं छुपा पाएँगे।"

घंटी ने इतना कहा और चुप हो गई।

मैंने उसे हथेली में घुमाया। गरमी अब भी अंदर बैठी थी, जैसे दूर कहीं कोई अंगीठी जलाकर चला गया हो और धुआँ भूल गया हो।

पापा नहीं हिले।

चाय का प्याला उनके पैर के पास लुढ़क कर रुक गया था। चाय धूल में उतर रही थी और धूल उसे ऐसे पी रही थी जैसे बरसों की प्यासी हो। एक बूँद उनकी धोती पर भी गिरी, पर उन्होंने उसे पोंछा नहीं। उन्होंने कुछ नहीं किया। बस खड़े रहे।

गली में कोई नहीं बोला।

उस्ताद अली बक्श ने अपनी कैंची जेब में डाली, फिर निकाली, फिर जेब में रख दी — जैसे हाथ को कोई काम चाहिए था। शबनम आपा ने केतली उठाई और पास ही रख दी, तो उनका हाथ उस पर टिका रह गया। भोला भाई ने अपना रेडियो बंद कर दिया, जो अब तक धीरे से बज रहा था। दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे थे और उनकी नीली शर्ट की आस्तीन हवा में भी नहीं हिल रही थी।

बबलू चबूतरी के किनारे बैठा था। उसकी फीकी पीली कमीज़ में पसीने के गोल धब्बे दिख रहे थे और वो हाथ पर हाथ रखकर ऐसे बैठा था जैसे स्कूल का बच्चा हो जो पूरी क्लास के सामने खड़ा हो और अपना नाम भूल गया हो।

"पापा," मैंने कहा।

वो नहीं बोले।

"पापा, कैसेट कहाँ है?"

उन्होंने उठकर प्याला उठाया। उसे मेज़ पर रखा — उलटा, जैसे कोई बर्तन धोकर रखता है। फिर अपनी कमीज़ की जेब में हाथ डाला, कुछ ढूँढा, और हाथ खाली निकाल लिया।

"मैं छुपा नहीं रहा," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत धीमी थी, इतनी धीमी कि मुझे उनके होंठ देखकर अंदाज़ा लगाना पड़ा। "मैं बस… सोच रहा था।"

"क्या सोच रहे थे?"

"कि उसे सुनने से पहले मुझे अपना नाम याद रखना चाहिए।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि उसके बाद शायद मैं वही न रहूँ जो अभी हूँ।"

मेरे पेट में कुछ ठंडा हिला।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना कैमरा बैग से निकाला और सीने से लगाकर पकड़ लिया, जैसे कोई बच्चा अपनी कॉपी पकड़ता है।

तब माँ ने व्हीलचेयर के हैंडल पर हाथ रखकर कहा, "दुकान चलो।"

सबने उनकी तरफ़ देखा।

"यह बात गली के बीच में नहीं होगी," माँ ने कहा। "ना पीपल के नीचे, ना अस्पताल के आँगन में। जो काग़ज़ पंद्रह साल से चुप है, वो अब दुकान के पीछे वाले कमरे में बोलेगा। और वहाँ सिर्फ़ वही लोग होंगे जिनके नाम उसमें लिखे हैं।"

"माँ —" मैंने कहना चाहा।

"अंकुश।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी थीं, पर उनमें वो ज़िद थी जो सुबह पाँच बजे चूल्हा जलाते वक़्त उनके चेहरे पर होती है। "मैंने पंद्रह साल तुम्हारे पापा की चुप्पी को माला की तरह पहना है। अब उतारूँगी तो उसी कमरे में उतारूँगी, जहाँ पहली बार पहनी थी।"

पापा ने उनकी तरफ़ देखा।

दोनों ने एक-दूसरे को देखा और उस देखने में जो बात थी, वो मैं नहीं जानता। मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि उस पल गली में जितने भी लोग खड़े थे, सबने अपनी नज़रें ज़मीन पर कर लीं। कुछ बातें ऐसी होती हैं जो दो लोगों की होती हैं, और तीसरा देख ले तो वो चोरी जैसा लगता है।

फिर पापा ने कहा, "चलो।"

बस इतना।

वो मुड़े और चल पड़े। किसी ने उन्हें रोका नहीं।

उस्ताद ने मेरा कंधा पकड़ा और धीरे से कहा, "दुकान के पीछे वाले ट्रंक में मोमबत्तियों का पुराना डिब्बा रखा है। दादा के ज़माने का। उन्हें बत्ती जाने पर जलाया जाता था, ताकि कमरे में साँस लेने की जगह बची रहे।"

"आपको कैसे पता?"

वो मुस्कुराए — बहुत हल्का, जैसे पुराना ज़ख्म हँसा हो। "क्योंकि पचास साल पहले मैंने भी एक कमरे में मोमबत्तियाँ जलाई थीं। और उस रात मेरा भाई बाहर खड़ा था।"

वो चले गए।

मैंने टिंकू को इशारा किया। वो दौड़ा आया, चप्पल की आवाज़ गली में गूँज रही थी।

"उस्ताद," उसने कहा, "क्या हुआ? सब ऐसे चले जा रहे हैं जैसे कोई मर गया हो।"

"कोई नहीं मरा, टिंकू," मैंने कहा। "बस कुछ ज़िंदा हो रहा है।"

"वो तो और डरावना है।"

"हाँ," मैंने कहा। "तू ठीक कह रहा है।"

दुकान पहुँचकर उस्ताद ने ट्रंक खोला। अंदर औज़ार, कपड़े, पुराने पेंच और रस्सी के लच्छे पड़े थे। सबसे नीचे एक टिन का डिब्बा निकला, जिसका ढक्कन ज़ंग से पकड़ा हुआ था। उस्ताद ने कैंची से ढक्कन खोला। अंदर मोमबत्तियाँ थीं — सस्ती, सफ़ेद, थोड़ी टेढ़ी, कुछ का रंग पीला पड़ गया था।

"ये चलेंगी?" काजल ने पूछा।

"मोमबत्ती को चलना नहीं पड़ता, बेटा," उस्ताद ने कहा। "उसे बस जलना पड़ता है।"

हमने उन्हें जलाया।

काजल ने एक-एक करके मोमबत्तियाँ जलाईं और कमरे में जगह-जगह रख दीं। चारपाई के पास, अलमारी के सिरे पर, औज़ारों के ट्रंक पर, दरवाज़े की चौखट के दोनों तरफ़, और एक टूटी कुर्सी की सीट पर जिसकी टाँग काग़ज़ से बँधी थी।

मैंने ध्यान नहीं दिया कि कितनी जलीं। मैंने सिर्फ़ यह देखा कि कमरा भरता जा रहा है।

पहले कमरे में अंधेरा था, सिर्फ़ एक गुनगुनाता बल्ब और उसकी पीली रोशनी। फिर मोमबत्तियाँ जलीं और अंधेरा पीछे हटने लगा — जैसे कोई पुराना मेहमान दीवार से सटकर खड़ा हो गया हो।

और कमरे की दीवारों पर परछाइयाँ बनने लगीं।

वो परछाइयाँ हिल रही थीं, हालाँकि कोई नहीं हिल रहा था।

टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली। "उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "मुझे मोमबत्ती से डर नहीं लगता। मुझे उन चीज़ों से लगता है जो मोमबत्ती के पीछे खड़ी होती हैं।"

"तेरी उम्र में मुझे भी लगता था," मैंने कहा। "अब भी लगता है। फ़र्क़ बस इतना है कि अब मैं डर के साथ चाय भी पी लेता हूँ।"

"चाय कहाँ है?"

"नहीं है। इसीलिए तो डर ज़्यादा है।"

शबनम आपा बाहर बेंच पर बैठीं। उन्होंने गुमटी का चूल्हा आज नहीं जलाया था, पर अपनी बड़ी केतली और कपों की ट्रे ले आईं थीं — जैसे उन्हें भरोसा था कि आज रात किसी को चाय की ज़रूरत पड़ेगी और वो बिना चाय नहीं लौटेंगी। उन्होंने ट्रे बेंच पर रखी और अपने आप से कहा, "कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें सुनने से पहले पेट में कुछ गरम चाहिए होता है।"

पापा कमरे के बीच में खड़े थे। उनके एक हाथ में वो पुरानी कैसेट थी — नीली स्याही में लिखी सफ़ेद पट्टी, काँपती लिखाई, पुराना प्लास्टिक — और दूसरे हाथ में वो टूटा रेडियो, जिसका एक कोना जला हुआ था और जिसका तार मैंने आज शाम जोड़ने की कोशिश में अपनी उँगली जला ली थी।

"अंकुश," पापा ने कहा।

"हाँ।"

"तू बाहर रहेगा।"

"पापा —"

"मैंने कहा, बाहर।" उनकी आवाज़ में वो कड़क नहीं थी जो गुस्से में होती है। उसमें वो चीज़ थी जो पुल पर खड़े आदमी की आवाज़ में होती है जब वो नीचे पानी देख रहा हो। "अगर यह कैसेट मेरी है, तो मैं इसे अकेले सुनूँगा। और अगर यह मेरी नहीं है…" वो रुके। "तो भी मैं इसे अकेले सुनूँगा।"

माँ ने व्हीलचेयर घुमाई। "शंकर।"

वो रुके।

"दरवाज़ा बंद करोगे तो अंदर से आवाज़ सुनाओ," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ सपाट थी, जैसे कोई हिसाब की कॉपी में लिख रहा हो। "एक बार नहीं। हर बार जब कुछ बदले, मुझे सुनाओ। मैं बाहर बैठी रहूँगी और गिनती रखूँगी।"

पापा ने उनकी तरफ़ देखा। बहुत देर तक देखा। फिर उन्होंने सिर हिलाया — बस एक बार।

वो अंदर गए।

दरवाज़ा बंद हुआ।

और फिर वो आवाज़ आई जिससे मेरी रीढ़ सीधी हो गई — कुंडे की आवाज़। पहले धातु का हल्का खटका, फिर कुंडी चढ़ने की छोटी-सी चरचराहट। पापा ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया था।

कमरे की रोशनी दरवाज़े के नीचे की दरार से आ रही थी — पीली, काँपती, कभी तेज़, कभी धीमी, जैसे मोमबत्तियाँ आपस में बात कर रही हों।

मैं बाहर बेंच पर बैठ गया।

मीरा मेरे बगल में बैठी। उसने अपना कैमरा खोला, उसे छोटे तिपाई पर रखा और घुमाकर दरवाज़े की तरफ़ किया। लाल बत्ती जल गई।

"तूने बंद नहीं किया?" मैंने पूछा।

"क्यों बंद करूँ?"

"क्योंकि यह अब हमारी निजी बात है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसके चश्मे पर मोमबत्ती की रोशनी पड़ी, जिससे उसकी आँखें दो छोटे पीले गोले लगीं। "अंकुश," उसने कहा, "जिस दिन यह बात निजी रही, उसी दिन यह घर टूटा। पाँच साल पहले एक औरत का घर ऐसे ही टूटा था — क्योंकि सच सिर्फ़ दो लोगों के बीच रहा और बाक़ी सब अंदाज़े लगाते रहे। अब मैं कैमरा नहीं बंद करूँगी।"

मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि वो सही थी, और सही बात का जवाब मज़ाक से भी नहीं दिया जाता।

माँ व्हीलचेयर में हमारे सामने थीं। काजल उनके पीछे खड़ी थी, हाथ उनके कंधे पर। काजल के हाथ उलटे थे — मैंने देखा कि उसने अपनी मुट्ठियाँ कस रखी थीं और वो उन्हें खोलने की कोशिश कर रही थी और खुल नहीं रही थीं।

तभी मीरा ने स्क्रीन पर नज़र डाली और उसका शरीर अकड़ गया।

"अंकुश।"

"हाँ?"

"खिड़की के बाहर कौन है?"

मैंने स्क्रीन की तरफ़ देखा।

कैमरे में दरवाज़ा दिख रहा था, दरवाज़े के नीचे से आती पीली रोशनी, और बाईं तरफ़ कमरे की छोटी खिड़की — जो पीछे की गली में खुलती थी, जहाँ आज सुबह लकड़ी के जूतों के निशान मिले थे।

खिड़की के बाहर एक साया खड़ा था।

इंसान की शक्ल का, पर चेहरा नहीं था। कैमरे की स्क्रीन पर वो ऐसा दिख रहा था जैसे किसी ने काग़ज़ पर कालिख लगाकर इंसान बनाया हो और बीच में उँगली रगड़कर चेहरा मिटा दिया हो। उसका एक हाथ सामने था — नीचे लटका, ढीला, जैसे किसी ने उसे टांग रखा हो।

और दूसरा हाथ…

दूसरा हाथ उसने पीछे छुपा रखा था।

मैं उठा।

"कोई नहीं है," उस्ताद ने कहा, पर उनकी आवाज़ में यक़ीन नहीं था। "खिड़की पर अंधेरा है, उसमें शक्लें बनती हैं।"

"उस्ताद," मीरा ने कहा, "यह कैमरा है, आँख नहीं। आँख को भ्रम हो सकता है। कैमरे को नहीं।"

मैं दौड़कर दुकान के बाहर गया, कोने से मुड़ा और पीछे की गली में आ गया।

कुछ नहीं था।

पीछे की गली खाली थी। दूर एक ट्रक का पीछा दिख रहा था, जो बंद प्लॉट में खड़ा था। एक कुत्ता नाली के किनारे से गुज़रा और चुपचाप चला गया।

पर खिड़की के नीचे की दीवार…

मैंने उसे छुआ। गरम थी। उस दीवार पर कोई नहीं था और वो गरम थी, जैसे कुछ देर पहले कोई उसे सहारा लेकर खड़ा रहा हो। नीचे ज़मीन पर घुटने के बराबर की जगह पर धूल हिली हुई थी और उस हिली धूल में एक बहुत हल्का निशान बना था — जैसे किसी ने पैर का अगला हिस्सा रखा हो और फिर उठा लिया हो।

मैं वापस आया।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं पूछा। उन्होंने बस अपना हाथ बढ़ाया।

मैंने अपना हाथ उनके हाथ में रख दिया।

उनकी पकड़ कसकर हो गई। उनकी हथेली खुरदुरी थी — रसोई की, हिसाब की कॉपी की, चूल्हे की राख की। उसमें वो ताक़त थी जो बरसों हर सुबह पाँच बजे जागती है।

"अंकुश," माँ ने कहा।

"हाँ, माँ।"

"जिस वक़्त यह दरवाज़ा खुलेगा," उन्होंने धीरे से कहा, "तू मुझे बुलाना नहीं।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"मुझे साथ ले जाना।"

"माँ, आप —"

"मैं जानती हूँ कि मेरे पैर नहीं हैं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो सूखापन था जो रोने से पहले आता है। "पर मेरे पैर तो पंद्रह साल पहले भी ऐसे ही थे जब मैंने उन काग़ज़ों पर अंगूठा लगवाया था। उस वक़्त तूने मुझे नहीं बचाया था, अंकुश। उस वक़्त तू छोटा था। अब तू बड़ा है — पर मैं यह नहीं चाहती कि तू मुझे छोड़कर अंदर जाए और मैं बाहर बैठी रहूँ, इंतज़ार करती हुई, जैसे उस रात की औरत बाहर बैठी रही थी।"

काजल ने अपना हाथ उनके कंधे से हटा लिया। वो थोड़ा पीछे हटी और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "माँ, मैं आपको ले जाऊँगी। मैं साथ रहूँगी।"

"हाँ," माँ ने कहा। "तू और मैं, दोनों।"

मैंने कुछ कहना चाहा। कुछ मज़ाक — कुछ ऐसा जो हवा को हल्का कर दे। पर शब्द गले में ऐसे अटके जैसे नाली में काग़ज़ अटकता है।

इसलिए मैंने बस कहा, "ठीक है।"

और तभी…

दरवाज़े के अंदर से आवाज़ आई।

धीमी। दबी हुई। ऐसे जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो, पानी के नीचे से।

मैंने अपना कान दरवाज़े से सटा दिया।

लकड़ी ठंडी थी — ठंडी, जबकि दरवाज़े के नीचे से आती रोशनी गरम थी। यह अजीब बात थी और मेरा दिमाग़ उसी को पकड़कर बैठ गया, क्योंकि डर के वक़्त दिमाग़ सबसे छोटी चीज़ से चिपक जाता है।

पापा बोल रहे थे।

पर वो किसी से बात नहीं कर रहे थे। वो बुदबुदा रहे थे — धीरे, लगातार, एक ही लय में, जैसे कोई पुरानी दुआ पढ़ रहा हो। ऐसी दुआ जो कोई भूल चुका हो और जिसे उसने बरसों बाद याद किया हो, इसलिए शब्द टूट-टूटकर आ रहे थे।

मैंने सुनने की कोशिश की।

"…जगदीश यादव…"

मेरे हाथ की घंटी हल्की काँपी।

"…शंकर यादव… मैं हूँ… मैं रहूँगा…"

फिर एक लंबी चुप्पी।

"…सुशीला… काजल… अंकुश…"

मेरा नाम आया तो मेरा गला सूख गया।

"…अंकुश यादव… और… और जो नाम नहीं जानता… जो इस कमरे में है… उसका भी नाम मैं लेता हूँ…"

माँ ने मेरी कलाई दबाई। मैंने मुड़कर देखा। उनके होंठ हिल रहे थे — वो भी साथ गिन रही थीं, जैसे हिसाब की कॉपी में नाम लिख रही हों।

फिर पापा की आवाज़ बदली।

वो दुआ जैसी नहीं रही।

वो अब किसी को जवाब दे रहे थे।

"…नहीं… यह मैंने नहीं लिखा… मैंने सिर्फ़ अंगूठा लगाया… अंगूठा… मेरा अंगूठा…"

मेरी छाती में कुछ ऐसा हुआ जैसे कोई बंद कमरे में दरवाज़ा भड़भड़ाकर हिला रहा हो।

और तभी…

रेडियो बजा।

नहीं — 'बजा' कहना ग़लत है। बजने से पहले रेडियो में एक आवाज़ होती है, जो उसके अंदर ही होती है — घरघराहट, सरसराहट, स्टेशन के बीच में गिरने की आवाज़। वो आवाज़ आई।

दरवाज़े के अंदर रखे रेडियो से।

कमरे से इतनी साफ़ आई कि मैं पीछे हट गया — जैसे आवाज़ ने मेरे कान को छू लिया हो।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

मीरा मेरी तरफ़ देख रही थी।

और मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।

ताँबे का तार मेरी जेब में था। पूरा लिपटा हुआ, मुड़ा हुआ, ठंडा। आज शाम जब मैंने उसे रेडियो में जोड़ने की कोशिश की थी, मेरी उँगली जल गई थी और तार उसी वक़्त जेब में चला गया था।

वो अभी भी मेरी जेब में था।

रेडियो से जुड़ा नहीं था।

फिर भी रेडियो घरघरा रहा था।

"अंकुश," मीरा ने धीरे से कहा, और उसका हाथ कैमरे पर था, "यह बत्ती से चलने वाला रेडियो है।"

"मुझे पता है।"

"तो यह कैसे —"

"मीरा," मैंने कहा, "तू मुझसे यह मत पूछ। पूछ उससे।"

और मैंने घंटी उठाई।

वो गरम थी। बहुत ज़्यादा नहीं — इतनी, जैसे किसी ने उसे देर तक हाथ में रखा हो।

"घंटी," मैंने कहा। "यह क्या हो रहा है?"

"आवाज़ बोलेगी," घंटी ने कहा। वो एक ही लाइन बार-बार नहीं दोहराती। पर आज वो दोहरा रही थी, और दोहराव ही डरावना था।

"आवाज़ कौन बोलेगा?"

घंटी चुप रही।

"घंटी।"

"जिसके पास नाम नहीं और जिसे सब जानते हैं।"

मैंने उसे थोड़ा और कसकर पकड़ा। "पापा अंदर ठीक हैं?"

"अभी," घंटी ने कहा।

"अभी का मतलब?"

"अभी तक।"

मैंने होंठ कसे। यही तंत्र की आदत है — पूरी बात कभी नहीं, बस एक कोना। और तुम उस कोने को पकड़कर पूरा घर संभालने की कोशिश करते हो।

टिंकू बाहर दरवाज़े के पास खड़ा था, कान लगाए। उसने मेरी तरफ़ देखा और इशारा किया — "अंदर कोई पूछ रहा है।"

मैं गया और उसके साथ कान सटाया।

और अब आवाज़ साफ़ थी।

रेडियो की घरघराहट के नीचे, किसी दबी आवाज़ में आवाज़ें आ रही थीं। बहुत धीमी, बहुत बूढ़ी, बहुत थकी हुई।

"…मैंने नहीं जलाया…"

पापा की आवाज़।

"…तो किसने जलाया… मेरा नाम क्यों… मेरे बेटे का नाम क्यों…"

फिर कुछ सरसराया। फिर मोमबत्ती की लौ में हवा लगने जैसी आवाज़ आई — वो आवाज़ जो लौ के बुझने से ठीक पहले आती है।

"पापा!" मैंने दरवाज़े पर हाथ रखकर कहा। "पापा, अंदर सब ठीक है?"

कोई जवाब नहीं।

"पापा!"

"शंकर!" माँ ने कहा। उनकी आवाज़ सामान्य नहीं थी। "शंकर, तुमने कहा था तू हर बदलाव सुनाएगा। सुना तो।"

एक लंबी साँस की आवाज़ आई। फिर पापा की आवाज़ आई — बहुत थकी, पर इंसानी।

"वो खुद अपना नाम नहीं ले रहा," पापा ने कहा। "वो… वो बस कुछ बता रहा है। और मैं समझ नहीं पा रहा।"

"क्या बता रहा है?"

"कि इस घर में एक नाम ऐसा है जो किसी का नहीं है।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने सिर हिलाया — वो सुन नहीं रही थी, पर उसने कैमरे से सब रिकॉर्ड कर लिया था।

मैं दरवाज़े के साथ सटकर बैठ गया। मेरी पीठ लकड़ी पर और लकड़ी मेरी पीठ पर ठंडी लग रही थी। बाहर पीपल के नीचे एक पक्षी बोला और चुप हो गया। गली में कोई दूर से बरतन माँज रहा था — वो आवाज़ आज इतनी अजीब लग रही थी, जैसे कोई दूसरी दुनिया से आ रही हो।

और मोमबत्तियों की खुशबू दरवाज़े के नीचे से बहकर बाहर आ रही थी।

फिर अंदर रेडियो फिर घरघराया।

इस बार ज़ोर से।

इतनी ज़ोर से कि दरवाज़े के नीचे से आती पीली रोशनी एक पल के लिए काँपी, जैसे किसी ने मोमबत्तियों की तरफ़ हवा फेंक दी हो।

काजल ने कानों पर हाथ रख लिए। शबनम आपा उठकर खड़ी हो गईं। उस्ताद ने अपनी कैंसर — अपनी कैंची — जेब से निकाली और मुट्ठी में कसकर पकड़ ली। बबलू ने कुछ बुदबुदाया, मैंने सुना — "यह वही आवाज़ है। रात दो बजे वाली।"

और फिर घरघराहट के बीच से एक आवाज़ निकली।

पुरुष की। बूढ़ी। दरारों वाली।

"…नाम उधार का… नाम उधार का…"

मेरा शरीर ठंडा हो गया।

यह मैंने पहले सुना था। उस रात, जब टूटे रेडियो को ताँबे के तार से जोड़ा था और आवाज़ आई थी — "नाम उधार का, सात अंगूठे और एक बेनाम।"

माँ ने मेरी कलाई पकड़ ली। उनका हाथ ठंडा था।

"अंकुश," उन्होंने कहा। "मुझे अंदर ले चल।"

"माँ, दरवाज़ा अंदर से बंद है —"

"तो खटखटा।"

और तभी अंदर से पापा की आवाज़ आई।

इस बार उनकी आवाज़ हिम्मत से नहीं, डर से निकल रही थी। ऐसी आवाज़ जो इंसान तब निकालता है जब उसके हाथ से कोई चीज़ छूट रही हो और वो उसे पकड़ न पा रहा हो।

"रुक जाओ! रुक जाओ!"

रेडियो और ज़ोर से चीखने लगा।

और उस शोर में पापा ने जो कहा, वो इतनी तेज़ी से कहा कि वो टूटकर आया — शब्द अलग-अलग गिरे, जैसे सीढ़ी से काग़ज़ गिरते हैं।

"यह कैसेट मेरी नहीं है —"

रेडियो चीखा।

"— तेरी माँ की इज़्ज़त की है!"

और फिर रेडियो इतनी ज़ोर से चीखने लगा कि मुझे लगा कि कमरे की खिड़की का काँच अभी टूटेगा, और मोमबत्तियाँ एक साथ बुझ जाएँगी।

मैं दरवाज़े पर गिरा। मेरे हाथ दरवाज़े पर थे, मेरी छाती दरवाज़े पर, और मैं उस आवाज़ के अंदर से अपना नाम सुनने की कोशिश कर रहा था — पापा का नाम, माँ का नाम, दादा का नाम।

लेकिन रेडियो में बस एक ही शब्द था।

उधार।

उधार।

उधार।

और उसी शोर के बीच, मेरी मुट्ठी में घंटी फिर गरम हुई और फुसफुसाई —

"अब वो नाम ऊपर आएगा जो नीचे दबा था।"

॥

मैंने दरवाज़े पर मुट्ठी मारी।

"पापा!"

अंदर रेडियो का शोर था, पर अब वो शोर पहले जैसा नहीं था। पहले वो कान के अंदर चुभता था। अब वो दूर जा रहा था — जैसे कोई आदमी कुएँ के अंदर खड़ा हो और ऊपर तक उसकी आवाज़ आते-आते पतली पड़ जाए, टूट जाए, बस एक सुराग बच जाए।

"पापा, दरवाज़ा खोलो!"

मेरी हथेली जली हुई थी। दरवाज़े पर मुट्ठी मारते ही जलन उठी, पर मैं रुका नहीं। मैंने फिर मारी। फिर मारी।

अंदर से कोई जवाब नहीं आया। बस रेडियो।

"नाम उधार का… नाम उधार का…"

वो शब्द अब जैसे दीवारों में बैठ गए थे। और उनके नीचे, बहुत धीमे, कुछ और था — जैसे कोई काग़ज़ को काग़ज़ पर रगड़ रहा हो। खुरखुर। खुरखुर। फिर चुप। फिर खुरखुर।

मेरे पीछे मीरा ने कैमरा थोड़ा और ऊपर किया। उसकी साँस मैं सुन सकता था — तेज़, रुक-रुक कर।

"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "मैं रिकॉर्ड कर रही हूँ।"

मैंने सिर हिलाया। हाँ, करो। आज जो अंदर हो रहा है, वो सिर्फ़ हमारे कानों का नहीं रहना चाहिए।

तभी पीछे से व्हीलचेयर की आवाज़ आई।

पहिया घूमा — चरचर — और माँ दरवाज़े के पास आ गईं। काजल उन्हें धकेलकर लाई थी। माँ का दुपट्टा कंधे से खिसक गया था, जिसे उन्होंने ठीक भी नहीं किया। उनके होंठ सूखे थे, आँखें लाल। पर आवाज़ में वो चीज़ थी जो मैंने उनमें बहुत कम देखी थी — न गुस्सा, न डर। बस एक सीधी सी बात कहने की ज़िद।

"शंकर।"

अंदर रेडियो का शोर धीमा हुआ। जैसे किसी ने हाथ रखकर उसे दबा दिया हो।

"शंकर, अब बंद मत करो।"

मेरी छाती में कुछ हिला।

"बच्चा सुन रहा है," माँ ने कहा। "पूरी गली सुन रही है। तेरी चुप्पी से अब कुछ नहीं बचेगा। तू जितना देर करेगा, उतना ही वो चीज़ ऊपर आएगी जिससे तू डरता है।"

अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई।

"मैं अंदर आ रही हूँ," माँ ने कहा। "दरवाज़ा खोल या मैं काजल को कहूँगी तेरी दुकान का शटर उठाने को। जो भी अंदर है, मैं सबके सामने सुनूँगी।"

काजल ने माँ की तरफ़ देखा। उसके हाथ में नर्सिंग का बैग था, और वो उसे बहुत ज़ोर से पकड़े हुए थी, जैसे उसी में उसकी हिम्मत रखी हो।

फिर अंदर कुंडी हिली।

एक धातु की आवाज़ आई — टन। फिर दूसरी — टन। फिर दरवाज़ा धीरे से खुला।

पापा दरवाज़े में खड़े थे।

उनका चेहरा पसीने से भीगा हुआ था। सिर्फ़ पसीना नहीं — माथे से बूँदें गाल तक आ रही थीं, गर्दन भीगी हुई, कमीज़ का कॉलर भीगा हुआ। चश्मा नाक पर तिरछा था, कान पर बँधा टेप खुल गया था और एक सिरा हवा में लटक रहा था। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

उनकी आँखें मेरी तरफ़ नहीं थीं। वो मेरे पीछे देख रहे थे — गली में खड़े लोगों को। उस्ताद को। शबनम आपा को। बबलू को। दुबे अंकल को। और फिर उन्होंने सिर झुका लिया।

"अंदर आ जाओ," उन्होंने कहा। बस इतना।

कमरे में मोमबत्तियाँ जल रही थीं। कुछ मोम पिघलकर फ़र्श पर आ गया था, सफ़ेद-पीले धब्बे बन गए थे। मेज़ पर टूटा रेडियो पड़ा था — वही रेडियो, वही जिसे मैंने ताँबे के तार से जोड़ने की कोशिश की थी। अंदर कैसेट आधी धँसी हुई थी। आधी बाहर। उसका एक रील बाहर निकला हुआ था, और टेप की पतली पट्टी उलझकर रेडियो के मुँह पर लटक रही थी, जैसे कोई जीभ बाहर निकली हो।

फ़र्श पर काग़ज़ बिखरे थे। बहुत सारे। कुछ सफ़ेद, कुछ पीले, कुछ मुड़े, कुछ फटे। कुछ पर नीली स्याही थी, कुछ पर सिर्फ़ धूल।

और पूरे कमरे में एक गंध थी।

जले काग़ज़ की।

वो गंध मैंने पहले भी सूँघी थी — अस्पताल की दीवार के पास, ट्रंक में, उस रात दुकान में। पर आज वो गंध ज़्यादा ताज़ी थी। आज वो कमरे में घुली हुई थी, मोम की खुशबू के साथ मिलकर।

माँ व्हीलचेयर से उतरकर पापा के पास गईं। काजल ने उन्हें सहारा दिया। माँ ने पापा का चेहरा दोनों हाथों में लिया।

"देखो मुझे," उन्होंने कहा। "शंकर, देखो मुझे।"

पापा ने आँखें उठाईं।

"मैं हूँ," माँ ने कहा। "मैं ज़िंदा हूँ। तेरे सामने बैठी हूँ। ऐसे क्यों देख रहा है जैसे मैं कल की बात हो?"

पापा ने कुछ कहना चाहा, पर तभी रेडियो से आवाज़ आई।

सब जम गए।

कैसेट अंदर धँसी हुई थी और उस टूटे रेडियो में कुछ ऐसा हिल रहा था जो मरे हुए यंत्र में नहीं हिलना चाहिए। एक खट-खट। फिर घरघराहट। फिर एक शब्द।

"अंगूठा…"

फिर आवाज़ कट गई।

सिर्फ़ एक शब्द। आधा शब्द। जैसे किसी ने बोलते-बोलते मुँह पर हाथ रख दिया हो।

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

"किसका अंगूठा?" मैंने कहा।

मेरी आवाज़ कमरे में इतनी तेज़ लगी कि मैं खुद चौंक गया।

"पापा, किसका अंगूठा? उसने अंगूठा कहा — किसका?"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा।

और उनके चेहरे पर जो आया, वो डर नहीं था। डर में आदमी पीछे हटता है। ये कुछ और था — ये शर्म थी। ऐसी शर्म जो आदमी के पैरों को ज़मीन में गाड़ देती है।

वो मेज़ की तरफ़ बढ़े।

"पापा —"

उन्होंने हाथ बढ़ाया और रेडियो का प्लग पकड़ लिया।

"पापा, रुको, अभी तो —"

और उन्होंने प्लग खींच लिया।

एक छोटी सी आवाज़ आई — टक। बस इतनी।

और कमरा चुप हो गया।

सच में चुप।

वो चुप्पी जो कानों में बजती है। जिसमें आपको अपनी साँस भारी सुनाई देती है। जिसमें मोमबत्ती की लौ की आवाज़ आती है — हल्की, काँपती, जैसे कोई काग़ज़ का कोना हवा में हिल रहा हो।

मैं वहीं खड़ा रह गया। मेरी मुट्ठी में घंटी थी — गरम, पर अब वो बोल नहीं रही थी। वो चुप थी, जैसे वो भी सुन रही हो।

शबनम आपा ने दरवाज़े से अंदर झाँका। उनके हाथ में लोहे की चिमटी थी — पता नहीं कब उन्होंने उसे उठाया। उस्ताद दरवाज़े के बाहर खड़े थे, कैंची मुट्ठी में। बबलू पीछे था, और उसके होंठ हिल रहे थे, बिना आवाज़ के।

"ये… ये खुद बोला," बबलू ने धीरे से कहा। "प्लग निकालने के बाद भी नहीं… ये पहले बोला था।"

"चुप कर," शबनम आपा ने कहा। पर उनकी आवाज़ में वो तेज़ी नहीं थी जो आम तौर पर होती थी।

पापा ने प्लग मेज़ पर रख दिया। उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने हथेलियाँ पैंट पर रगड़ीं, जैसे उन्हें साफ़ कर रहे हों, और फिर पीछे हटकर दीवार से टिक गए।

"अंकुश," उन्होंने कहा। आवाज़ बैठी हुई थी। "तू मुझसे ये सवाल अभी मत पूछ।"

"क्यों नहीं पूछूँ?"

"क्योंकि जवाब मेरे पास नहीं है।"

"झूठ बोल रहे हो।"

"नहीं।" उन्होंने आँखें उठाईं। "मैं झूठ नहीं बोल रहा। मैं सच बोल रहा हूँ — जवाब मेरे पास नहीं है। मेरे पास सिर्फ़ इतना है कि मैंने उस काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था, और उस रात मुझे ये नहीं पता था कि मैं किसका अंगूठा बन रहा हूँ।"

कमरे में फिर चुप्पी।

"और अब?" मैंने कहा। "अब पता है?"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो मुझे पहले नहीं दिखा था। वो मुझसे कुछ कहना चाहते थे और कह नहीं पा रहे थे — ठीक वैसे, जैसे एक आदमी अपने बेटे को ये नहीं बता पाता कि वो किस चीज़ से डरता है, क्योंकि डर बताते ही वो डर बेटे में भी आ जाएगा।

"अब मुझे पता है," उन्होंने कहा। "कि उस काग़ज़ पर मेरा अंगूठा किसी और के नाम के नीचे लगा था। और वो नाम… वो नाम मेरे अपने घर का है।"

मेरी छाती में एक ठंडा सा धक्का लगा।

"घर का मतलब?"

"यादव का," पापा ने कहा। "और उससे आगे का शब्द मैं नहीं जानता। पर रेडियो ने कहा — अंगूठा। मतलब वो सात अंगूठों की बात कर रहा है। और उन सात में से एक ऐसा है जो… जो मेरा है।"

"और आठवाँ?"

पापा ने सिर झुकाया।

"आठवाँ वो है जिसका नाम नहीं," उन्होंने कहा। "और आज रेडियो उसी की तरफ़ इशारा कर रहा था।"

माँ ने पापा का कंधा पकड़ लिया। "शंकर, बस।"

"नहीं," पापा ने कहा। "वो कह रही हैं बस। पर मैं अब बहुत देर कर चुका हूँ।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, ये कैसेट मेरी नहीं थी। ये मुझे किसी ने दी नहीं थी। ये मेरे कमरे में रखी मिली थी, पच्चीस साल पहले, दादा के जाने के बाद। मैंने इसे कभी चलाया नहीं। मैंने इसे छुआ नहीं। मैंने इसे शटर के पीछे, दराज़ के पीछे, धूल में दबा रखा था — ताकि कभी वो दिन न आए जिस दिन ये बजेगी।"

"तो आज क्यों बजी?"

पापा ने उन काग़ज़ों की तरफ़ देखा जो फ़र्श पर बिखरे थे।

"क्योंकि जो आज यहाँ आया," उन्होंने कहा, "वो इसे ढूँढ रहा था। और उसे पता था ये कहाँ है। मैंने इसे बचाया, छिपाया, और वो बिना एक काग़ज़ हिलाए कमरे में घुस आया।"

"कमरे में कौन आया?" मैंने पूछा।

पापा ने जवाब नहीं दिया।

और तभी कमरे की बत्ती झपकी।

हम सब सन्न रह गए। बत्ती अभी जली हुई थी — पीली, हल्की, टिमटिमाती। और एक बार झपकी — जैसे किसी ने आँख मिचकी हो।

फिर दूसरी बार।

दो बार। पूरा कमरा अंधेरे में चला गया और फिर लौट आया, इतनी तेज़ी से कि पहले लगा मेरी आँखों में कुछ हुआ है। पर काजल ने चीख दबाई — "माँ!" — और माँ ने उसे पकड़ लिया।

और बत्ती लौटते ही, बाहर, गली में, एक आवाज़ आई।

टक।

लकड़ी के जूते की। एक आदमी के। एक कदम।

और फिर रुक गई।

बस एक आवाज़। एक कदम। न आगे, न पीछे। जैसे किसी ने कदम रखा हो और फिर सुनना शुरू कर दिया हो — कि अंदर क्या हो रहा है।

मेरी रीढ़ में ठंडी सुई सी दौड़ गई।

बबलू दरवाज़े के पास से हट गया।

"मैंने सुना," उसने फुसफुसाया। "मैंने सुना, ये लकड़ी का जूता था।"

"चुप।" शबनम आपा ने कहा।

"मैंने सुना —"

"मैंने कहा चुप।"

सन्नाटा।

बाहर पीपल के पत्ते हिल रहे थे। बहुत धीमे। मुझे लगा कि अगर मैं ज़ोर से साँस लूँगा तो वो आवाज़ दरवाज़े तक पहुँच जाएगी और वो कदम वापस आ जाएगा। तो मैंने साँस रोक ली।

मीरा ने कैमरा धीरे से नीचे किया। उसकी आँखें दरवाज़े पर थीं।

माँ ने बहुत धीरे, लगभग होंठों में कहा — "काजल, पर्दा हटा।"

काजल ने पर्दा हटाया।

बाहर से गली की हल्की पीली रोशनी अंदर आई। मैंने दरवाज़े से झाँका।

गली खाली थी।

पीपल के नीचे चबूतरी पर कोई नहीं था। उस्ताद की दुकान का शटर आधा गिरा था। शबनम की गुमटी की तरफ़ कोई नहीं था। धूल में कुछ घसीटने के निशान नहीं थे, कोई जूते का निशान नहीं था।

पर हवा में वो गंध थी — जला काग़ज़।

मैंने घंटी हथेली में घुमाई।

"कुछ कह," मैंने धीरे से कहा। "अब कुछ कह।"

घंटी गरम हुई। बहुत धीमी। धीमी, जैसे बुखार में कोई आदमी बोल रहा हो।

"अब बत्ती जाएगी," घंटी ने कहा।

मेरी मुट्ठी कस गई।

"और जो दरवाज़ा खटकेगा," घंटी ने कहा, "वो तेरा नहीं, उसका है।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

पापा की तरफ़। माँ की तरफ़। उस दरवाज़े की तरफ़ जो चूल्हे के पीछे था और जो आज सुबह गरम मिला था।

माँ ने मेरी आँखों में देखा और बिना कुछ कहे उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में और कसकर खोंस लिया।

"अंकुश," उन्होंने कहा। "जो भी होगा, मेरे सामने होगा।"

"माँ —"

"ना।" उनकी आवाज़ साफ़ थी। "आज मैं तेरे पीछे नहीं रहूँगी।"

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

वो दीवार से टिके खड़े थे। उनकी आँखों में वो शर्म अभी भी थी। पर अब उसके साथ कुछ और भी था — जैसे कोई आदमी पहली बार अपने ही घर में अजनबी होने से थक गया हो।

मैंने दरवाज़े की तरफ़ कदम बढ़ाया।

और बाहर, गली में, फिर एक आवाज़ आई।

इस बार दरवाज़ा नहीं खटका।

इस बार किसी ने बहुत धीरे, बहुत सलीके से, पीपल की चबूतरी पर बैठकर, अपने जूते उतारे। फिर दूसरे। फिर दोनों को साथ रखकर, चुपचाप बैठ गया।

उस्ताद ने मेरा कंधा पकड़ा।

"अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा, "ये चबूतरी की आवाज़ नहीं है। ये… ये उस आदमी की है जो जानता है कि हम कब सुन रहे हैं।"

मैंने चबूतरी की तरफ़ देखा।

और मुझे एक पल के लिए लगा कि वहाँ कोई बैठा है।

बस एक पल।

फिर पीपल के पत्तों से छनकर आती रोशनी हिली, और वहाँ कुछ नहीं था।

पर चबूतरी पर, जहाँ बुज़ुर्ग बैठते हैं, उस पत्थर पर, धूल में एक साफ़ चौकोर जगह बन गई थी — जैसे अभी-अभी कोई उठकर गया हो और अपनी जगह छोड़ गया हो।

बबलू ने एक कदम पीछे हटकर कहा, "उसने जूते उतारे। जूते उतारने का मतलब… उसने कहा कि वो लड़ने नहीं आया।"

शबनम आपा ने चिमटी मेज़ पर रख दी। उनकी आवाज़ पहली बार हल्की पड़ी।

"जो लड़ने नहीं आया," उन्होंने कहा, "वो सबसे ज़्यादा डराता है।"

मैं दरवाज़े के बाहर निकला।

गली की हवा ठंडी थी, और उसमें वो गंध थी जिससे मेरा पेट भारी हो गया।

और तभी, मेरी जेब से एक आवाज़ आई।

घंटी नहीं थी।

फोन था।

स्क्रीन पर नाम नहीं था। सिर्फ़ एक नंबर — जिसके जगह लिखा था "अज्ञात"।

मैंने फोन उठाया।

दूसरी तरफ़ सन्नाटा था। लंबा। सिर्फ़ साँस।

फिर एक आवाज़ आई — बूढ़ी, दरारों वाली, वही जो रेडियो में थी।

"अंकुश यादव।"

मेरी गर्दन के बाल खड़े हो गए।

"तूने मेरा अंगूठा पूछा था," आवाज़ ने कहा। "अपने पापा से ये मत पूछ। वो सिर्फ़ अंगूठा लगाने वाला है। अंगूठा मेरा है। और जब वो काग़ज़ पर लगा, तब उसके नीचे एक नाम था जो अब तक किसी ने नहीं पढ़ा।"

मेरी आवाज़ गले में फँस गई।

"कौन हो तुम?"

हल्की हँसी आई। बहुत हल्की। जैसे जले काग़ज़ से धुआँ उठ रहा हो।

"मैं वो हूँ," आवाज़ ने कहा, "जिसे तेरे दादा ने सबसे आख़िर में अपने घर के दरवाज़े पर खड़ा देखा था।"

और लाइन कट गई।

मैं वहीं खड़ा रह गया। हाथ में फोन, दूसरी मुट्ठी में घंटी।

पीछे से काजल ने कहा, "अंकुश? कौन था?"

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। पापा उनके पीछे। मीरा कैमरा लिए। उस्ताद, शबनम आपा, बबलू, दुबे अंकल — सब चुप।

और उसी पल, कमरे की बत्ती, जो अभी-अभी दो बार झपकी थी, एक आख़िरी बार झपकी।

इस बार वो लौटी नहीं।

पूरी गली अंधेरे में डूब गई।

केवल दो रोशनियाँ बचीं — माँ के पीछे जलती मोमबत्ती, और चबूतरी पर पड़ी उन जूतों की परछाईं, जो किसी ने उतारे थे और जो अब भी वहीं पड़े थे।

और घंटी, मेरी मुट्ठी में, एक आख़िरी बार गरम होकर फुसफुसाई —

"दरवाज़ा खटकेगा। पर आज नहीं। आज वो सिर्फ़ गिनेगा — कि इस घर में कितने लोग अब भी उसके सामने खड़े हैं।"

॥

अंधेरे में मेरी मुट्ठी अब भी गरम थी।

घंटी ने आख़िरी बात कहकर चुप्पी पकड़ ली थी, पर उसका गरमापन मेरी हड्डी तक उतर गया था। जैसे किसी ने मुट्ठी में अंगारा रख दिया हो और कह दिया हो — अब इसे मत गिराना।

सामने चबूतरी पर उन जूतों की परछाईं पड़ी थी जो किसी ने उतारे थे। परछाईं थी, मालिक नहीं।

"अंकुश? कौन था?"

काजल की आवाज़ कान में आई, पर वो किसी और कमरे से आती लगी।

मैंने फोन जेब में डाला। स्क्रीन पर अब भी "अज्ञात" लिखा था, जैसे वो शब्द मेरा पीछा कर रहा हो।

"कोई नहीं," मैंने कहा।

और ये पहला झूठ था, जो उस रात मेरे मुँह से निकला। घंटी ने कुछ नहीं कहा। बस अपना गरमापन बढ़ा दिया, जैसे कह रही हो — मैंने सुना है।

काजल ने मेरी आँखों में देखा। वो छोटी है, पर बेवकूफ़ नहीं।

"तेरी आवाज़ बदल गई थी," उसने धीरे से कहा।

"ठंड लग गई।"

"अभी तो गर्मी है।"

मैंने जवाब नहीं दिया।

दरवाज़े पर माँ खड़ी थीं। व्हीलचेयर उनके पीछे थी, और वो खुद खड़ी थीं — किसी के सहारे के बिना। उनके हाथ काँप रहे थे, पर चेहरा पत्थर जैसा था।

और उनके पीछे, कमरे के अंदर, मोमबत्ती की लौ के नीचे, पापा टूटे रेडियो के पास बैठे थे।

उनके हाथ में कैसेट थी।

वो कैसेट जो पच्चीस साल से किसी अलमारी में बंद थी। जिसे उन्होंने कभी छुआ नहीं। जिसे उन्होंने छिपाया। जिसके बारे में उन्होंने आज तक किसी से एक शब्द नहीं कहा।

वो कैसेट अब उनके हाथ में थी, और उनके हाथ ऐसे काँप रहे थे जैसे उन्होंने ज़िंदगी में पहली बार कुछ पकड़ा हो।

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चश्मे पर मोमबत्ती की रोशनी पड़ रही थी, और उस रोशनी में उनके चेहरे की हर झुर्री साफ़ दिख रही थी।

"शंकर," उन्होंने धीरे से कहा, "एक बात सुन लो।"

पापा ने सिर नहीं उठाया।

"काग़ज़ बोलता है तो इंसान चुप हो जाता है," उस्ताद ने कहा, "पर आवाज़ बोलती है तो इंसान को बोलना पड़ता है। आज तुम चुप नहीं रह सकते।"

पापा ने कैसेट को अपनी हथेली पर रखा और देर तक उसे देखा।

फिर उन्होंने पहली बार मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ किसी और आदमी की थी, "बैठ जा।"

मैं बैठ गया।

"मीरा," पापा ने कहा, "कैमरा रख दो।"

मीरा ने कैमरा नीचे नहीं किया। उसने सिर्फ़ इतना कहा, "पापा जी, ये सच है। सच को छिपाने से वो मरता है, बड़ा होता है।"

"कैमरा रख दो," पापा ने दोहराया।

मीरा ने एक पल सोचा, फिर कैमरा मोड़कर अपने सीने से लगा लिया। लाल बत्ती बंद हो गई। पर उसका हाथ बैग पर टिका रहा — मुझे पता था, वहाँ उसका छोटा रिकॉर्डर है।

पापा ने कैसेट को टूटे रेडियो की तरफ़ बढ़ाया।

और मैंने देखा — रेडियो का तार जला हुआ था। पीछे का प्लग निकला पड़ा था, जैसे किसी ने उसे छीनकर फेंक दिया हो। उसके अंदर से वो जली हुई, कड़वी गंध आ रही थी जो आज पूरे दिन मेरी नाक में घुसी हुई थी।

"पापा," मैंने कहा, "ये चलेगा नहीं। इसका तार जला है।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा और पहली बार उनके चेहरे पर कुछ और था — वो शर्म नहीं थी, वो डर नहीं था।

वो ज़िद थी।

"आज सच बाहर आएगा," उन्होंने कहा।

और उन्होंने कैसेट उस टूटे रेडियो में डाल दी।

क्लिक हुई। एक धीमी, कड़वी, मुर्दा आवाज़ आई।

फिर कुछ नहीं।

कमरे में सिर्फ़ मोमबत्ती की फुसफुसाहट बची। बाहर गली में कहीं एक कुत्ता भौंका और चुप हो गया।

काजल ने धीरे से कहा, "देखा? मैंने कहा था।"

और ठीक उसी वक़्त, रेडियो के अंदर से, बिना प्लग, बिना तार, बिना बत्ती — एक आवाज़ आई।

सरसराहट। जैसे कोई पुराना काग़ज़ खुल रहा हो।

फिर साँस।

फिर एक आवाज़।

"मैंने अंगूठा लगाया था।"

मेरी साँस रुक गई।

वो पापा की आवाज़ थी।

पर पापा की आवाज़ पच्चीस साल पुरानी थी। जवान। कमज़ोर। काँपती हुई। जैसे किसी ने दबे हुए गले से, रोते हुए, खुद से कहा हो।

"मैंने अंगूठा लगाया था।"

मैंने पीछे देखा।

पापा दीवार से टिके बैठे थे। उनका चेहरा मोमबत्ती की रोशनी से कटा हुआ लग रहा था।

और माँ।

माँ ने अपना मुँह दोनों हाथों से ढक लिया।

ये वो हरकत नहीं थी जो कोई चौंककर करता है। ये वो हरकत थी जो कोई सालों से जानता है, और अब बस सहन नहीं कर पा रहा।

मेरी आँखें अपने आप उनकी तरफ़ उठ गईं।

और उसी पल मुझे कुछ समझ आया — जो मुझे पहले कभी नहीं समझ आया था।

माँ चौंकी नहीं।

माँ सिर्फ़ टूट गईं।

फ़र्क़ समझ रहे हो न? चौंकना ये होता है कि "ये क्या हुआ"। और टूटना ये होता है कि "ये तो होना ही था"।

माँ को पता था।

शायद शुरू से पता था।

रेडियो फिर बोला, और इस बार आवाज़ थोड़ी साफ़ थी, जैसे कैसेट को अपनी जगह मिल गई हो।

"सुशीला की दवा के लिए मजबूरी थी। अंगूठा मैंने लगाया। काग़ज़ मेज़ पर रखा था। मैंने ऊपर का नाम पढ़ा — शंकर यादव। मैंने अपना अंगूठा लगा दिया।"

कमरे में कोई हिला नहीं।

"नीचे एक लाइन थी। मैंने वो नहीं पढ़ी। वो आदमी बोला — नीचे वाली लाइन में तेरा बेटा लिखा है। मैंने कहा, मेरा बेटा अभी छोटा है। वो हँसा। उसने कहा — छोटा है, इसीलिए तो लिखा है।"

मेरी छाती में कुछ भारी हो गया।

"मैंने उससे पूछा — क्या लिखा है? उसने कहा — जो लिखा है, वो तेरे अंगूठे से सच हो गया। और फिर उसने काग़ज़ उठा लिया।"

रेडियो में सरसराहट आई। फिर आवाज़ और धीमी हुई, जैसे रिकॉर्ड करने वाले का हाथ काँप रहा हो।

"अगर ये आवाज़ कभी कोई सुने, तो सुनने वाले से एक बात कहना — मैंने अपने बेटे के नाम के नीचे अंगूठा नहीं लगाया। मैंने अपना लगाया। और मैं आज तक उस काग़ज़ को वापस नहीं ला पाया।"

क्लिक।

चुप्पी।

रेडियो बंद हो गया, और उसके अंदर से एक आख़िरी बार जली हुई गंध निकली, जैसे किसी ने आख़िरी साँस छोड़ी हो।

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

उनके चश्मे का टेप टूट चुका था। चश्मा नाक पर तिरछा लटक रहा था। उन्होंने उसे ठीक नहीं किया।

"पापा," मैंने कहा।

"मुझे पता है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ सूखी थी, "तू पूछेगा कि क्यों छिपाया।"

"मैं वो नहीं पूछ रहा।"

वो चौंके।

"मैं ये पूछ रहा हूँ," मैंने कहा, "कि वो आदमी कौन था।"

पापा ने मुँह खोला।

और ठीक उसी पल —

पूरी गली की बत्ती बुझ गई।

ऐसे नहीं कि हमारे घर की, ऐसे नहीं कि दुकान की। पूरी गली। बाज़ार। सामने का थाना। स्कूल की गली। उस्ताद की दुकान। शबनम आपा की गुमटी की लाल बत्ती भी।

एक साथ।

मैंने बाहर से होने वाले शोर को सुना — कुछ लोगों का "अरे!", एक बच्चे का रोना, किसी का दरवाज़ा खुलना, इनवर्टर के बीप की आवाज़ जो तुरंत सांस लेकर मर गई।

फिर सब शांत।

बिल्कुल शांत।

इतनी शांत कि मुझे अपने ही दिल की धड़कन गली में गूँजती सुनाई दी।

कमरे में सिर्फ़ मोमबत्ती की लौ काँप रही थी। उसकी रोशनी में माँ का चेहरा, पापा का चेहरा, काजल का चेहरा, मीरा का कैमरा, उस्ताद की कैंची, शबनम आपा की चिमटी, बबलू के पसीने से भीगे गाल — सब एक ही पीले रंग में डूबे थे।

और तभी।

तक।

दरवाज़े पर पहली दस्तक हुई।

एकदम साधारण। इतनी साधारण कि उससे ज़्यादा डरावनी कोई चीख़ नहीं हो सकती थी।

किसी ने हाथ उठाकर दरवाज़े पर उँगली से एक बार खटखटाया। धीरे। सलीके से। जैसे किसी को जल्दी न हो।

मेरी मुट्ठी फिर गरम हुई।

मैंने बिना आवाज़ करके घंटी जेब से निकालकर देखी। वो काँप रही थी, बज नहीं रही थी। जैसे वो भी साँस रोके बैठी हो।

बबलू ने धीरे से कहा, "म… मैंने सुना।"

"सबने सुना," शबनम आपा ने कहा।

टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली। छोटा हाथ, मज़बूत पकड़। उसकी आँखों में डर नहीं, सवाल था।

"उस्ताद," उसने कान में फुसफुसाया, "जो जूते उतारकर चबूतरी पर बैठा था… वो अगर दरवाज़े पर आया, तो जूते पहने होंगे न?"

"क्यों?"

"क्योंकि चबूतरी पर जूते रखे हैं। अगर उसने उन्हें पहन लिया होता, तो दबे पैर पता नहीं चलता। पर उसने नहीं पहने। मतलब उसके पैर नंगे हैं।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"नंगे पैर आदमी दरवाज़ा खटखटाने आता है," टिंकू ने कहा, "लड़ने नहीं।"

मैंने उसका सिर पकड़ा, हल्का सा दबाया, और उसका हाथ छुड़ाया।

फिर मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

"अंकुश," माँ ने कहा।

मैं रुक गया।

"आज तुम पीछे नहीं हटोगे," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ था जो पहले नहीं था, "पर दरवाज़ा खोलने से पहले मेरी एक बात सुन लो।"

"कहिए।"

"जो बाहर है," माँ ने कहा, "वो तुम्हारे पापा से कुछ माँगेगा। और तुम्हारे पापा दे देंगे। क्योंकि वो आज तक खुद को माफ़ नहीं कर पाए।"

पापा ने सिर उठाया।

"सुशीला —"

"आज तुम चुप रहो," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जिससे मैं डरता हूँ, "आज तुमने बहुत बोल लिया।"

मैं दरवाज़े के पास पहुँचा।

दरवाज़ा लकड़ी का था, पुराना, नीचे से थोड़ा सूजा हुआ। बरसात में वो फूल जाता था और धक्का देने पर कराहता था।

मैंने मुँह उससे सटाया।

"कौन है?"

कोई जवाब नहीं आया।

सिर्फ़ साँस। हल्की। बूढ़ी। जैसे कोई बहुत देर से चलकर आया हो और अब सहारे के लिए दरवाज़े पर झुका खड़ा हो।

मैंने उँगली कुंडी पर रखी।

तभी दूसरी दस्तक आई।

इस बार तेज़।

इतनी तेज़ कि मोमबत्ती की लौ एक तरफ़ झुक गई और फिर लौट आई। और दरवाज़े के ऊपर से सूखा प्लास्टर झरकर मेरे कंधे पर गिरा।

काजल ने एक छोटी सी आवाज़ निकाली।

और घंटी, मेरी जेब में, तब तक गरम हो चुकी थी। इतनी गरम कि मुझे कपड़े के आर-पार जलन महसूस हुई।

मैंने उसे हाथ में लिया।

वो फुसफुसाई —

"जो बाहर है, वो दरवाज़ा नहीं माँग रहा।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

"तो क्या माँग रहा है?"

"नाम।"

मेरी आँखें खुल गईं।

"किसका नाम?"

घंटी चुप हो गई। बस गरम बनी रही।

मैंने पीछे मुड़कर सबको देखा। पापा, माँ, काजल, मीरा, उस्ताद, शबनम आपा, बबलू, टिंकू — और दरवाज़े के बाहर, गली की तरफ़ जाती हुई सीढ़ी पर खड़े दुबे अंकल, जो पीछे से आ गए थे और अब अपनी पुरानी नीली शर्ट में, हाथ में छड़ी लिए, चुपचाप मेरी तरफ़ देख रहे थे।

"बोलो तो," मैंने कहा, "कोई तो बोले।"

उस्ताद ने कैंची मेज़ पर रखी और खड़े हो गए।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "अगर मैं बोलूँ, तो बात तेरे और मेरे बीच रहेगी?"

"नहीं।"

तो वो चुप रहे।

अच्छा हुआ।

क्योंकि जो वो बोलने वाले थे, वो मुझे खुद पता लगाना था।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

"कैमरा चालू करो," मैंने कहा।

"क्या?"

"कैमरा चालू करो," मैंने दोहराया, "अगर आज यहाँ कुछ होगा, तो वो टेप में रहेगा। और अगर अगली सुबह हममें से कोई याद नहीं कर पाए कि क्या हुआ, तो टेप याद दिला देगा।"

मीरा ने एक पल मुझे देखा, फिर कैमरा उठाया। लाल बत्ती जली। बत्ती न होने के बाद भी उसकी छोटी लाल रोशनी कमरे में एक नया रंग ले आई।

फिर मैं दरवाज़े के पास गया और तीसरी दस्तक का इंतज़ार करने लगा।

पर वो नहीं आई।

एक सेकंड।

दो सेकंड।

पाँच सेकंड।

बाहर से सिर्फ़ हवा आ रही थी।

और फिर मैंने वो सुना जिसने मेरी छाती में कुछ जमा दिया।

धातु की आवाज़।

दरवाज़े का हैंडल।

बहुत धीरे। बहुत सलीके से।

जैसे बाहर खड़ा आदमी अपनी उँगलियाँ हैंडल पर रखकर उसे बिना ज़ोर लगाए घुमा रहा हो। एक चौथाई। आधा। फिर रुक गया।

कुंडी अंदर से बंद थी। मैंने उसे खींचकर देखा — नहीं हिली।

और तभी मेरे कानों में एक आवाज़ आई, ऐसी जैसे दरवाज़े की लकड़ी के अंदर से कोई बोल रहा हो।

वही बूढ़ी आवाज़।

वही, जो फोन पर थी।

"अंकुश यादव," उसने धीरे से कहा, "हाँ, मैं जानता हूँ। तेरे घर में तीन आदमी हैं जिन्होंने इस दरवाज़े को रात में खोलने की क़सम खाई थी — तेरे दादा, तेरे पापा, और तू।"

मेरी उँगलियाँ हैंडल पर जम गईं।

"दो ने खोला," आवाज़ ने कहा, "तेरी बारी है।"

और हैंडल मेरे हाथ के नीचे, अपने आप, बहुत धीरे-धीरे, पूरा घूम गया।

हैंडल घूम गया।

पूरा।

मेरी हथेली के नीचे धातु ठंडी थी, पर मेरे भीतर कुछ गरम था जो गले तक चढ़ आया था।

मैंने साँस रोक ली।

कुंडी ने पकड़ा हुआ था। दरवाज़ा हिला भी नहीं। बस हैंडल घूमकर अपनी जगह पर लौट रहा था, बहुत धीरे, जैसे बाहर खड़ा कोई समझ गया हो कि आज अंदर से कोई नहीं खोलेगा।

और फिर एक हल्की सी आवाज़ आई।

टिक।

जैसे कोई चीज़ अपनी जगह पर बैठ गई हो।

"ये क्या था?" बबलू ने फुसफुसाया।

"चुप।"

"पर —"

"बबलू," शबनम आपा ने कहा, "अगर तुझमें हिम्मत है तो बोल, वरना मुँह बंद रख।"

बबलू चुप हो गया।

मैंने अपना हाथ हैंडल से हटाया। मेरी हथेली पर ज़ंग का एक निशान छप गया था — लाल, गीला, जैसे किसी ने उँगली से मेरे हाथ पर कुछ लिखा हो।

मैंने उसे रगड़ा। नहीं गया।

"पापा," मैंने कहा, बिना पीछे मुड़े, "आपने कहा था कि आज सच बाहर आएगा।"

"हाँ।"

"तो बोलिए।"

"अंकुश —"

"बोलिए," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपने ही कानों में अजनबी लगी, "क्योंकि अगर बाहर वाला आपका नाम जानता है, तो मेरा भी जानता है। और वो मेरा नाम ऐसे ले रहा था जैसे घर का कोई बुज़ुर्ग बुलाता हो।"

पापा ने कुछ कहना चाहा, पर माँ ने उनका हाथ पकड़ लिया।

"पहले वो," माँ ने धीरे से कहा, "जो सच है।"

पापा ने आँखें बंद कीं।

"तेरे दादा ने एक रात इस दरवाज़े पर कुछ बोला था," उन्होंने कहा, "और मैं उस रात सीढ़ी पर बैठा सुन रहा था। मैं आठ साल का था। उन्होंने कहा था — जो घर में रहता है, वो बाहर वालों से नहीं डरता। और फिर उन्होंने दरवाज़ा खोला।"

कमरे में इतनी चुप्पी फैल गई कि मुझे मोमबत्ती जलने की आवाज़ सुनाई दी।

"और अंदर क्या आया?" काजल ने पूछा।

पापा ने उसकी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — शर्म।

"कुछ नहीं आया," उन्होंने कहा, "बाहर से दादा गए, और अंदर से दादा आए। पर बोलने का ढंग बदल गया था। बाद में उन्होंने मुझे कभी उस रात के बारे में नहीं बताया। बस एक दिन कहा — बेटा, दरवाज़े पर तीन दस्तक होती हैं। तीसरी के बाद कोई नाम बोलेगा। तू अपना नाम न बोलना।"

"और आपने खुद कोशिश की?" मैंने पूछा।

पापा ने गला साफ़ किया।

"मैंने उस रात अंगूठा लगाया था," उन्होंने कहा, "कुंडी पर। और मेरा अंगूठा चिपक गया था। मैंने खींचा तो खाल उतर आई। देख —"

उन्होंने हाथ बढ़ाया।

उनके अंगूठे पर एक गोल निशान था, सफ़ेद, चिकना। बचपन से मैंने उसे नहीं देखा था। मुझे याद आया — जब वो चाय का कप पकड़ते थे, अंगूठा टेढ़ा रखते थे।

मेरे भीतर कुछ बैठ गया।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा।

"अब समझा?" उन्होंने कहा, "ये सब नहीं है। ये सब तब से चल रहा है जब तू पैदा भी नहीं हुआ था।"

घंटी फिर गरम हुई।

मैंने उसे कान के पास लाया।

"बोल," मैंने कहा।

"अब जो होगा," घंटी ने कहा, "वो दरवाज़ा नहीं खोलेगा।"

"तो?"

"वो भीतर आएगा। और जब आएगा, तो तेरी आवाज़ में बोलेगा।"

मेरे हाथ से घंटी फिसल गई। मेज़ पर गिरी, एक बार लुढ़की, और रुक गई।

तभी दुबे अंकल सीढ़ी से नीचे आए। उनकी छड़ी की आवाज़ कमरे में गूँजी।

"अंकुश बेटा," उन्होंने कहा, "मैंने इस दरवाज़े को दो बार खुलते देखा है।"

"कब?"

"जब तुम्हारे दादा गए थे। और जब तुम्हारे पापा खड़े थे।"

"और दोनों बार?"

दुबे अंकल ने छड़ी का सिरा फ़र्श पर टिकाया।

"दोनों बार," उन्होंने कहा, "घर से एक नाम मिट गया।"

मीरा का कैमरा अभी भी चल रहा था। मुझे उसकी छोटी लाल बत्ती दिख रही थी और मुझे लगा कि दुनिया में शायद यही एक चीज़ है जो अभी सच बोल रही है।

मैंने कुंडी को एक बार हाथ लगाया।

फिर पीछे हट गया।

"अच्छा," मैंने कहा, "तो आज मैं अपना नाम नहीं बोलूँगा।"

माँ ने सिर हिलाया।

"और तू दरवाज़ा भी नहीं खोलेगा।"

"नहीं खोलूँगा।"

मैंने सबको देखा — टिंकू माँ की साड़ी का पल्लू पकड़े बैठा था, उस्ताद कैंची उठाकर अपनी गोद में रख चुके थे, जैसे अब किसी चीज़ की ज़रूरत पड़ेगी।

और फिर तीसरी दस्तक आई।

पर ये दस्तक थी ही नहीं।

ये एक धमाका था, जैसे कोई बाहर से अपनी पूरी देह दरवाज़े पर गिरा दे। दरवाज़ा अंदर की तरफ़ झुका, मोमबत्ती बुझ गई, और अंधेरे में मैंने सिर्फ़ इतना देखा कि हैंडल, बिना किसी हाथ के, बहुत धीरे-धीरे घूमने लगा।

धीरे-धीरे।

जैसे अब उसकी जल्दी न हो।

जैसे वो जानता हो कि दरवाज़ा खुद ही खुल जाएगा।

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