The Mysterious Bell – Chapter 1: jodne wala mistri hissa 001 ep1-10
अरे, तुम आ गए? बैठो ना, चबूतरे पर बैठो। पेड़ की छाँव है, और आज सुबह-सुबह हवा भी चल रही है। मैं तुम्हें अपनी गली दिखाता हूँ। पर पहले एक बात साफ़ कर लूँ, ताकि बाद में तुम मुझ पर हँसो मत।
ये गली चौड़ी नहीं है। बिल्कुल नहीं। इतनी ही है कि दो साइकिलें आमने-सामने आ जाएँ तो दोनों को थोड़ा तिरछा होकर निकलना पड़ता है। एक तरफ़ दीवार, दीवार पर कोई पुराने ज़माने का नीला पेंट, जो अब जगह-जगह से उखड़कर ऐसे लगता है जैसे दीवार ने भी जीन्स पहन ली हो। दूसरी तरफ़ नाली, और नाली के ऊपर पत्थर का एक पुराना पुल। छोटा सा। दो कदम में पार। उस पुल के पत्थर अब भी मज़बूत हैं, बस बीच में एक जगह से घिस गए हैं, क्योंकि पचास साल से लोग वहीं से पैर रखते आए हैं।
गली के ठीक बीच में पीपल का पेड़ है। मोटा तना, ऊपर इतनी छाँव कि दोपहर में भी नीचे अंधेरा रहता है। पेड़ के नीचे पत्थर की चबूतरी है। सुबह वहाँ बुज़ुर्ग बैठते हैं, शाम को बच्चे। और मेरी दुकान ठीक उसके बगल में है। लकड़ी का बोर्ड, टेढ़ा टँगा हुआ, ऊपर सफ़ेद पेंट से लिखा है — साइकिल मरम्मत। नीचे छोटे अक्षरों में मेरा नाम, अंकुश यादव।
बोर्ड टेढ़ा है। साल में कम से कम चालीस बार मैं इसे सीधा करता हूँ, और हर बार वो फिर टेढ़ा हो जाता है। आज सुबह भी मैंने किया। कुर्सी पर चढ़ा, दोनों कोनों के कील निकाले, हथौड़े से ठोका, और एक कील सीधी जाकर मेरे अंगूठे पर लगी।
तुम सोच रहे होगे कि इतना सब बताने की क्या ज़रूरत है। तो सुनो, ज़रूरत है। क्योंकि जो आगे हुआ, वो इसी गली में हुआ। इसी बोर्ड के नीचे, इसी चबूतरे के पास, इन्हीं लोगों के बीच। और जब कोई कहानी गली से शुरू होती है, तो गली को ठीक से जानना ज़रूरी होता है। नहीं तो बाद में तुम्हें समझ ही नहीं आएगा कि मैं किस चीज़ के लिए लड़ रहा था।
मेरे बाईं तरफ़ उस्ताद अली बक्श की दर्ज़ी की दुकान है। सत्तर के ऊपर के आदमी हैं। सफ़ेद दाढ़ी, मोटा चश्मा, और कान पर हमेशा एक पेंसिल टँगी रहती है। उनकी सिलाई मशीन की आवाज़ सुबह से शाम तक टिक-टिक करती रहती है। कभी-कभी मुझे लगता है कि अगर उनकी मशीन एक दिन बंद रही, तो पूरी गली सो जाएगी। वो बोलते बहुत कम हैं। पर जो बोलते हैं, वो सीधे दिल में उतरता है।
दुकान के बगल में शबनम आपा की चाय और समोसे की गुमटी है। लोहे की गुमटी, ऊपर टीन का छज्जा, और अंदर से धुआँ, चाय की खुशबू और तेज़ ज़ुबान। आपा हाथ में लोहे की चिमटी लिए खड़ी रहती हैं और हर आने-जाने वाले को कुछ न कुछ सुना देती हैं। आज सुबह भी सुना रही थीं।
अंकुश, वो चबूतरे का पत्थर ढीला है। किसी को गिरा देगा। तू मिस्त्री है ना, तो ज़रा देख ले। मैंने कहा, आपा, मैं साइकिल ठीक करता हूँ, चबूतरा नहीं। तो वो हँसकर बोलीं, जब सब कुछ ठीक करता है, तो ये भी कर ले।
अब इस चायवाली की बात में एक दम है, ये तुम्हें बाद में समझ आएगा।
गली के मुहाने पर नूर अस्पताल है। पुराना दवाखाना, दो मंज़िला, पीली दीवारें, कुछ खिड़कियाँ टूटी हुईं। डॉक्टर निहाल इसरानी वहाँ बैठते हैं। साठ के ऊपर हैं, पर अब भी रोज़ मरीज़ देखते हैं और अब भी हर मरीज़ को नाम से बुलाते हैं। वही अस्पताल मेरे लिए सबसे ज़रूरी जगह बन जाएगा। पर उसके बारे में अभी नहीं।
चलो, चाय छोड़ो, मैं तुम्हें काम दिखाता हूँ।
सुबह के करीब साढ़े नौ बजे एक छोटा बच्चा आया। सानिया का भाई, चिंटू। दस साल का, नाक बहती हुई, घुटने पर पुरानी खरोंच, और साइकिल का टायर बिल्कुल बैठा हुआ। उसने साइकिल मेरी तरफ़ धकेल दी और बोला, भैया, पंचर।
मैंने कहा, ये साइकिल नहीं है, ये तो तेरे घर का बोझ है। पिछले महीने तीन बार पंचर करवाया था।
चिंटू ने आँखें बड़ी करके कहा, भैया, गली में नीम के पेड़ के नीचे काँटे पड़े हैं। कोई फेंक गया है।
मैं हँस पड़ा। ये बच्चे मुझे हर बार नई वजह बताते हैं। कभी काँटे, कभी रास्ते में पड़ी लोहे की पत्ती, कभी किसी का बदला। मैंने औज़ार उठाया, टायर खोला, अंदर की ट्यूब निकाली। हाथ पर ग्रीस लग गया, और मैंने बिना सोचे उसे अपनी जीन्स पर पोंछ लिया। जीन्स पहले से ही घुटने पर फटी हुई थी। अब वो फटन भी काली हो गई।
चिंटू ने पूछा, भैया, आप हमेशा गंदे कपड़े क्यों पहनते हो?
मैंने कहा, क्योंकि साफ़ कपड़े पहनकर साइकिल ठीक करने वाला आदमी गली में कोई नहीं मानेगा। लोग कहेंगे, ये तो बाहर से आया है।
वो ज़ोर से हँसा। फिर वहीं बैठ गया, पत्थर पर, और उसने वो लाइन कही जो आजकल बच्चे बहुत बोलते हैं। भैया, गली याद रखेगी।
मैं रुक गया। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने तो यूँ ही कह दिया था, मज़ाक में। पर मुझे उस वक़्त नहीं पता था कि कुछ दिन बाद मैं सच में ये सोचूँगा कि गली मुझे याद रखेगी या नहीं।
मैंने ट्यूब पानी में डाली। बुलबुले आने लगे। चिंटू उँगली डालकर बुलबुले फोड़ने लगा। मैंने उसका हाथ हटाया और कहा, अरे भाई, गाड़ी नहीं है, इंसान है। ज़रा सब्र से पेश आइए।
वो फिर हँसा। और मैं सोचने लगा कि मैं ये लाइन रोज़ कितनी बार बोलता हूँ। गाड़ी नहीं है, इंसान है, सब्र से पेश आइए। शायद मैं खुद ही ये लाइन ज़िंदगी को बोलता रहता हूँ।
तभी गली के मुहाने से मीरा निकली।
तुमने उसे देखा नहीं है। जब देखोगे, तो पहले लगेगा कि कोई स्कूल की लड़की भाग रही है। छोटा कद, कंधे तक कटे बाल, कंधे पर फटा हुआ बैग, हाथ में कैमरा। वो अपना एक ऑनलाइन चैनल चलाती है। नाम रखा है — बस्ती की आवाज़। मुझे तो नाम में ही दम नहीं लगता, पर उससे कहना मत, वरना वो पूरा आधा घंटा खड़ी होकर समझाएगी कि नाम में क्या फ़लसफ़ा है।
उसने दूर से ही आवाज़ दी, अंकुश, सुना है तुम्हारी दुकान पर रात में कुछ अजीब होता है?
मैंने कहा, हाँ, रात में मैं सोता हूँ। बहुत अजीब बात है।
वो झुंझला गई। मज़ाक नहीं कर रही। आज सुबह गली के बच्चे बता रहे थे कि पिछली रात तुम्हारी दुकान की घंटी बजी थी, जबकि दुकान बंद थी।
मेरे हाथ रुक गए। बिल्कुल रुक गए। मैंने चिंटू की तरफ़ देखा, उसने कंधे झेला। मैंने मीरा की तरफ़ देखा और कहा, बच्चों को चाय की चिंता नहीं है, अब दुकान की घंटी सुनने लगे हैं। बड़ी तरक्की है।
वो मुझे घूरती रही। मीरा की आदत है, किसी की बात सच मानने से पहले वो उसे दस बार तोलती है। फिर बोली, ठीक है। पर जिस दिन कुछ होगा, मुझे पहले बताना। कैमरा उठा लूँगी।
मैंने कहा, कैमरा उठाने से पहले चश्मा उठा लेना। दूर से देखने में तुम्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता।
वो हँसकर चली गई। पर उसके जाने के बाद मुझे दो मिनट तक चाय की खुशबू नहीं आई। सिर्फ़ उसकी वो बात कान में बजती रही। घंटी। मेरी साइकिल की घंटी। जो मैं कई दिनों से दुकान के पीछे वाले कमरे में रखी हुई हालत में छोड़ आया था।
उस वक़्त मुझे क्या पता था कि वो घंटी कभी मेरी नहीं थी, और कभी सिर्फ़ मेरी ही रह जाएगी।
चलो, अभी घर चलते हैं।
हमारा घर उसी गली के आख़िर में है। दो कमरे, छोटा आँगन, और छत पर लोहे का सीढ़ी-दरवाज़ा जो बारिश में चरमराता है। चार लोग हैं — माँ, पापा, काजल और मैं।
माँ का दिन सुबह पाँच बजे शुरू होता है। पाँच बजे मैंने कभी चूल्हा बजते नहीं सुना, मैंने सिर्फ़ चूल्हे की फूँक की आवाज़ सुनी है। फूँ टपू, फूँ टपू। और उसके बाद जब पहली रोटी तवे पर पड़ती है, उसकी आवाज़ पूरे घर को उठा देती है।
मैं ऊपर से उतरा। माँ साड़ी का पल्लू कमर में खोंसकर खड़ी थीं, माथे पर चंदन का टीका, और सामने बीस टिफ़िन की कतार। घर से टिफ़िन सेवा चलती है। यानी जो आज खाना खा रहा है, उसका हिसाब माँ की उस कॉपी में है। कॉपी पुरानी है, किनारों से उखड़ी हुई, और हर पन्ने पर लाल पेन के निशान।
मैंने पीछे से झाँका और कहा, माँ, आज क्या बना है?
बिना रुके, बिना पलटे, उन्होंने कहा, दाल, चावल, और तेरे लिए सवाल नहीं।
मैं हँस पड़ा। माँ की यही बात है। मुझे बहुत पसंद है। उन्होंने कड़ाही में हाथ का झटका दिया और फिर वो लाइन बोली जो वो हर हफ़्ते बोलती हैं। सुन, मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता। और बात में भी नहीं।
मैंने कहा, माँ, हम तो तुम्हारे ही खून के हैं। हमने कहाँ से पानी मिलाया।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। एक सेकंड भर। और उस एक सेकंड में मुझे लगा कि उन्होंने मेरी आँखों में कुछ देख लिया। फिर वो फिर तवे पर झुक गईं।
तभी कोने से आवाज़ आई। धातु की छोटी सी आवाज़, जैसे कोई पेंच रगड़ रहा हो।
पापा बैठे थे। शंकर यादव, पचपन साल, कमर झुकी हुई, कमज़ोर आँखें, और चश्मा जिसका एक कान टेप से बँधा है। हाथ में कोई पुराना औज़ार। वो चुपचाप उस चश्मे का कान ठीक कर रहे थे। पूरे सुबह में एक शब्द नहीं बोले। न मैंने सुना, न काजल ने।
मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि पापा ने कितने साल से चुप हैं। वो बोलते हैं, पर इतना कम कि हमें उनकी आवाज़ की आदत नहीं है। जब कभी वो एक पूरा वाक्य बोल देते हैं, घर में सब रुककर उनकी तरफ़ देखते हैं, जैसे किसी ने अचानक रेडियो चालू कर दिया हो।
पर उस सुबह मैंने उनके हाथ ज़रूर देखे। जब वो चश्मे का कान ठीक कर रहे थे, उनके हाथ काँप रहे थे। हल्का-हल्का। ऐसे जैसे कोई बहुत कोशिश करके ठीक कर रहा हो।
मैंने पूछना चाहा। पर पूछा नहीं। और यही मेरी सबसे बड़ी गलती रही।
तभी सीढ़ियों से काजल उतरी। अठारह साल की, पतली, बाल बेतरह बँधे हुए, एक हाथ में नर्सिंग की मोटी किताब और दूसरे हाथ में चप्पल। वो दौड़ते हुए आई और रास्ते में चप्पल पहनते हुए बोली, भैया, माँ की रिपोर्ट!
मैंने कॉपी में देखने की एक्टिंग की। कौन सी रिपोर्ट?
उसने मेरे सिर पर किताब मारी। वही रिपोर्ट जो डॉक्टर इसरानी ने लिखी है। टेस्ट! सब टेस्ट! मैंने कहा था ना, मैं उनसे बात करूँगी।
माँ ने तुरंत कहा, काजल, चुप।
काजल रुक गई। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर माँ की तरफ़। और मैंने उसके चेहरे पर वो भाव देखा जो हमारे घर में आम है — कुछ कहना है, पर कहना नहीं है।
मैंने माहौल हल्का करने के लिए कहा, अरे, टेस्ट होते रहते हैं। दो-चार, दस-बारह। माँ की क्या बात है, ये तो लोहे की कड़ाही हैं।
माँ ने कहा, हाँ, और तू चूल्हे की फूँक। अब जा, दुकान खोल।
मैं चला गया। पर तीन कदम चलकर मैंने पीछे देखा। माँ ने काजल के हाथ से वो काग़ज़ लेकर अपने पल्लू के नीचे दबा दिया था। ऐसे जैसे कोई चीज़ छुपा रही हो।
दिन भर मुझे वही काग़ज़ दिमाग में घूमता रहा।
दुकान पर आज काम भी खूब था। दोपहर में उस्ताद अली बक्श आए। अपनी दुकान से उठकर, धीरे-धीरे कदम रखते हुए, जैसे हर कदम नापकर रख रहे हों। वो मेरी दुकान के सामने रुके और चुपचाप मेरे हाथ देखने लगे। ऐसे दस सेकंड। मैंने पूछा, क्या हुआ उस्ताद? कुछ सिलना है?
वो बोले, तेरी उम्र में मैं भी ऐसे ही बैठता था। हाथ में तेल, आँख में ज़िद। फिर उन्होंने एक लंबी साँस ली और कहा, पर मैंने एक चीज़ छोड़ दी थी। और उसे छोड़ने के बाद मेरा आधा घर भी छूट गया।
मैं समझा नहीं। मैंने कहा, क्या चीज़ छोड़ दी, उस्ताद?
वो मुस्कुराए, मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोले, बाद में। पहले तू वो काग़ज़ वाली बात सँभाल। तेरी माँ के पास ख़त्म हो रहा है।
मैं वहीं ठिठक गया। उस्ताद अली बक्श चले गए, घूमकर अपनी मशीन की टिक-टिक शुरू करने। और मैं वहीं खड़ा रह गया। उन्हें कैसे पता? किसी ने कुछ कहा? माँ ने कहा?
शाम को गली में शोर हुआ। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू, चारों जासूस, एक साथ दौड़ते हुए आए। हाथ में पतंग की डोर, चेहरे पर उत्साह। गुड्डू चिल्लाया, भैया, स्कूल की छत से देखा, बाज़ार के पीछे वाले खाली प्लॉट पर चार बड़े ट्रक आए हैं! मिट्टी डाल रहे हैं!
मैंने कहा, तो? मिट्टी तो डलती रहती है।
सानिया ने आँखें सिकोड़कर कहा, पर भैया, उन ट्रकों पर लिखा था — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।
मेरी उंगलियाँ रुक गईं। उस्ताद अली बक्श की मशीन एक पल के लिए रुकी। शबनम आपा की चिमटी हवा में ठहर गई। और फिर आपा ने बिना मेरी तरफ़ देखे कहा, तेरे पापा से कहना, आज समोसा बाकी है। घर ले जाए।
पर उनका लहजा बदल गया था। वो जानती थीं। गली जानती थी। बस गली बोल नहीं रही थी।
रात हुई।
मैंने दुकान बंद की, दो पंचर ठीक किए, एक चेन जोड़ी, और दुकान के पीछे वाले छोटे कमरे में आया। वहाँ एक लकड़ी का बक्सा है जिसमें औज़ार हैं, एक नंगना बल्ब है, और कोने में पुरानी साइकिल खड़ी है। मेरे पापा की साइकिल। जो अब कोई नहीं चलाता, और जिसे मैंने भी कभी ठीक से नहीं चलाया। उसके हैंडल पर एक घंटी थी। छोटी, पीतल की, थोड़ी काली पड़ी हुई।
उस रात मैंने उस घंटी को देखा और मुझे मीरा की बात याद आई। दुकान बंद थी और घंटी बजी थी। मैंने हाथ बढ़ाया, फिर हटा लिया। मैंने खुद से कहा, अंकुश, तू मिस्त्री है, भूत नहीं। सो जा।
सोने से पहले मैं ऊपर गया। माँ सो चुकी थीं। कमरे में हल्की रोशनी थी, और मेज़ पर वो कॉपी खुली पड़ी थी। हिसाब की कॉपी। उसके नीचे से एक काग़ज़ का कोना झाँक रहा था।
मैंने उसे धीरे से खींचा।
दो पन्नों की पर्ची थी। ऊपर डॉक्टर इसरानी की लिखाई — साफ़, सीधी, बिना घुमाए। नीचे टेस्ट के नाम, एक के बाद एक, कतार में। और उनके आगे खाली जगह जहाँ रिपोर्ट आनी थी।
और सबसे नीचे, दाहिनी तरफ़, एक आँकड़ा। रुपयों का आँकड़ा।
मैं वहीं खड़ा रह गया।
तुम सोच रहे होगे कि इतनी सी बात से क्या होगा। रुपये हैं, कमा लेंगे। दुकान है, काम है, हाथ हैं। तो सुनो आगे।
मैंने उस आँकड़े को तीन बार देखा। फिर चौथी बार। फिर मैंने जेब से अपना पर्स निकाला, खोला, और उसमें जो था वो गिना। और मुझे वो सच देखना पड़ा जो मैंने किसी को नहीं बताया। वो पैसा मेरे पास नहीं था। दुकान के हिसाब से भी नहीं था। घर के हिसाब से तो बिल्कुल भी नहीं।
मैंने पर्स बंद किया। कॉपी वापस उसी जगह रखी। मैंने उस काग़ज़ को वैसे ही सरका दिया जैसे वो पड़ा था, ताकि माँ को पता न चले कि मैंने देखा है। और मैं दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा।
और तभी मेरी नज़र उस पर्ची के पीछे पड़ी।
पीछे भी कुछ लिखा था। माँ की लिखाई। माँ कभी पीछे नहीं लिखतीं। वो सामने लिखती हैं, सीधा, साफ़। पर उस रात उन्होंने पीछे लिखा था, छोटे अक्षरों में, लाल पेन से, जैसे कोई चुपके से कोई बात रख रहा हो।
मैंने पर्ची पलटी और पढ़ा।
अंकुश को मत बताना, वो सब अकेले उठा लेता है।
मैं वहीं खड़ा रहा। बल्ब जल रहा था। माँ की साँसें धीमी और बराबर चल रही थीं। नीचे गली से किसी की साइकिल की घंटी बजी, दूर, बहुत दूर, किसी और गली में।
मैंने पर्ची जेब में रखी। मैंने बल्ब बंद किया। और मैं चुपचाप सीढ़ियों से नीचे उतर गया।
उस रात मैंने दुकान के पीछे वाले कमरे में पुरानी साइकिल के सामने खड़े होकर खुद से एक बात कही, जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।
मैंने कहा, अंकुश, तू अकेले उठा लेता है। अब उठा।
और तभी, बिना किसी हवा के, बिना किसी के हाथ लगे, उस पुरानी साइकिल की पीतल की घंटी बजी।
एक बार। छोटी सी आवाज़। टन।
मैं जम गया।
और फिर उस घंटी के पीछे, बहुत धीमी, बहुत रूखी आवाज़ में किसी ने कहा — तुम अकेले नहीं उठाओगे।
उस रात मैंने पहली बार सुना कि मेरी गली में सिर्फ़ लोग नहीं रहते। कुछ और भी है। कुछ जो टूटी चीज़ें देखता है। जो सब्र से बैठा है। और जो आज मेरे नाम से बोला।
पर उस वक़्त मुझे नहीं पता था कि वो क्या है, कहाँ से आया, और सबसे ज़रूरी बात — उसकी कीमत क्या है।
मुझे बस इतना पता था कि उस पर्ची पर लिखा आँकड़ा मेरे पास नहीं है। माँ ठीक नहीं हैं। और गली के पीछे भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के ट्रक मिट्टी डाल रहे हैं।
और ये तीन बातें जब एक साथ आती हैं, तो किसी की गली बचती नहीं।
आज रात के लिए इतना ही। कल सुबह मैं उस घंटी को उठाऊँगा। पर उससे पहले मुझे एक आदमी से मिलना है जो गली में सबसे ज़्यादा चुप है — मेरे पापा।
क्योंकि अब मुझे लग रहा है कि उनकी चुप्पी में कोई कहानी है। और वो कहानी शायद उसी घंटी से जुड़ी है, जो सुबह तक मेरे हाथ में आ जाएगी।
॥
घंटी की आवाज़ जैसे हवा में घुल गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। पुरानी साइकिल मेरे सामने, टेढ़ी, थोड़ी झुकी हुई, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सहारा ढूँढ रहा हो। उसका हैडल मेरी तरफ़ झुका हुआ था और उस पर पीतल की वो छोटी घंटी — जो अभी बोली थी।
मैंने हाथ बढ़ाया। उँगली घंटी पर रखी। ठंडी थी। बिल्कुल ठंडी। जैसे अभी तक किसी ने छुई ही न हो।
“अच्छा,” मैंने कहा। “अच्छा।”
बस इतना ही निकला मुझसे।
मैंने चारों तरफ़ देखा। कमरे में मैं, औज़ारों का बक्सा, पुराने टायरों का ढेर, दीवार पर लटकी चेन, और बल्ब की पीली रोशनी। कोई नहीं था। दरवाज़ा बंद था। खिड़की पर जाली लगी थी। नीचे गली से कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आ रही थी, दूर किसी के घर से टीवी की आवाज़।
मैंने घंटी को फिर छुआ। इस बार ज़ोर से दबाया।
कुछ नहीं हुआ।
मैंने फिर दबाया। टन। सिर्फ़ पीतल की आम सी आवाज़, जो हर पुरानी साइकिल की घंटी करती है।
“तो तू बोलती है?” मैंने धीरे से पूछा। “अभी बोली थी। अब क्यों चुप?”
कमरा चुप।
“देख,” मैंने कहा, “मुझे नहीं पता तू क्या है। भूत है, जिन्न है, या मेरे दिमाग़ का कोई पुराना कीड़ा जो आज रात जाग गया। पर अगर तू सच में बोलती है, तो एक बात साफ़ कर दे।”
कुछ नहीं।
“माँ का इलाज कितने का है, वो मुझे पता है,” मैंने कहा। “वो आँकड़ा मेरे पास नहीं है, वो भी पता है। तू उसके बारे में कुछ जानती है? या तू सिर्फ़ डराने आई है?”
और तभी मुझे लगा कि कमरे की हवा थोड़ी भारी हो गई है।
नहीं, डरने वाली बात नहीं थी। बस ऐसा था जैसे कोई मेरे पीछे खड़ा हो और बहुत ध्यान से सुन रहा हो।
मैंने साइकिल का हैडल पकड़ा और उसे दीवार से टिका दिया। फिर मैं पीछे हटा, उस पुराने टायर के ढेर पर बैठ गया, और अपना सिर हाथों में पकड़ लिया।
तुम सोच रहे होगे कि अब ये रोने बैठेगा। नहीं। रोना बाद में आता है, जब कोई देख नहीं रहा होता। मेरे पास उस रात रोने का टाइम भी नहीं था। मेरे पास एक पर्ची थी जिस पर एक आँकड़ा लिखा था, और एक जेब थी जिसमें उस आँकड़े के आधे से भी कम पैसा था।
मैं उठा। मैंने बल्ब बंद किया। और मैं सीढ़ी से ऊपर अपने कमरे में चला गया।
उस रात मैंने अपनी आँखें बंद करके बहुत देर तक एक ही चीज़ सोची — कि पैसा कहाँ से आएगा।
और नींद में मुझे वही घंटी दिखी। बजती हुई। बिना हाथ के।
सुबह मेरी आँख उस वक़्त खुली जब नीचे से माँ की आवाज़ आई, “अंकुश, चाय ठंडी हो रही है।”
मैं उठा और सीधा आँगन में गया।
पापा वहाँ बैठे थे। पुरानी मोटी कुर्सी पर, कमर झुकाए, हाथ में एक पेचकस, और सामने मेज़ पर रखी एक घड़ी जिसकी परतें खुली पड़ी थीं। उनका चश्मा कान पर टेप से बँधा था और आज टेप की एक परत और चढ़ी हुई थी, जैसे उन्होंने रात में ही चश्मा मरम्मत किया हो।
मैंने चाय का गिलास उनके पास रखा और सामने वाली स्टूल पर बैठ गया।
“पापा।”
“हूँ।”
“कल रात को दुकान में घंटी बजी थी।”
उनका हाथ रुका। बस एक पल के लिए। फिर वो फिर से घड़ी की तरफ़ झुक गए और पेचकस घुमाने लगे।
“पुरानी साइकिल की घंटी,” मैंने कहा। “खुद बजी। मैं वहाँ अकेला था।”
“हवा से बजती है,” उन्होंने कहा, बिना ऊपर देखे। “पुरानी चीज़ें हैं। हिलती रहती हैं।”
“पापा, वो बोली भी।”
अब उनका हाथ पूरी तरह रुक गया।
पेचकस मेज़ पर रखा और उन्होंने चश्मा उतारा, उसे कुर्ते से पोंछा, फिर वापस पहना। उनकी आँखें मुझ पर नहीं आईं। आँगन की दीवार पर टिकी रहीं, जहाँ बरसात से प्लास्टर उतर गया था और अंदर की लाल ईंट दिख रही थी।
“क्या बोली?” उन्होंने पूछा।
बहुत धीमी आवाज़ में पूछा। इतनी धीमी कि मुझे लगा वो शायद यह नहीं चाहते थे कि मैं सुनूँ।
“कहा कि तुम अकेले नहीं उठाओगे,” मैंने कहा।
पापा ने आँखें बंद कर लीं।
लंबे समय तक बंद रखीं। फिर खोलीं और उन्होंने वो घड़ी बंद करके मेज़ पर रख दी, जैसे वो काम अब नहीं करना है।
“घंटी को मत छेड़,” उन्होंने कहा।
“क्यों?”
“बस मत छेड़।”
“पापा, वो खुद बजी। मैंने थोड़ी बजाई।”
“तो भी मत छेड़।” उनकी आवाज़ ज़रा ऊँची हुई, फिर तुरंत नीची हो गई। “उसे जहाँ है वहीं रहने दे। उसके पास जो है, वो सबको नहीं देना चाहिए। और हमें उससे कुछ माँगना नहीं चाहिए।”
मैंने उनका चेहरा देखा। झुर्रियों के नीचे कुछ था। कुछ ऐसा जो उन्होंने बहुत सालों से अंदर दबा रखा था। डर नहीं। डर जैसा ही कुछ, पर डर से भारी। शरम जैसा।
“तुमने माँ का काग़ज़ देखा?” मैंने पूछा।
他一 सवाल नहीं था। यह मैंने उन्हें परखने के लिए पूछा था।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। एक सेकंड। दो सेकंड। फिर उन्होंने अपनी जेब में हाथ डाला और उसमें से कुछ निकाला नहीं, बस हाथ डालकर रखा, जैसे वहाँ कुछ छिपा रहे हों।
“तुम माँ से कह देना कि मैं देख लूँगा,” उन्होंने कहा।
“क्या देख लोगे?”
“जो देखना होगा।”
“पापा।” मैंने आवाज़ धीमी रखी। “कल रात मैंने तीन बार वो आँकड़ा देखा। दुकान के हिसाब से हम उसका आधा भी नहीं जोड़ पाएँगे। मेरी जेब में उससे भी कम है। तो आप क्या देख लोगे?”
पापा कुछ नहीं बोले।
बस वहीं बैठे रहे, उनका हाथ उस घड़ी पर रखा हुआ, जिसकी परतें खुली थीं। और मुझे पहली बार लगा कि मेरे पापा असल में इस घर के सबसे बड़े टूटे हुए पुर्ज़े हैं। बाहर से ठीक, अंदर से ढीले।
“मैं मेले में जा रहा हूँ,” मैंने कहा, उठते हुए। “शाम को। बच्चों ने बताया है कि कोई पुराना कबाड़ी आया है। उससे सस्ता माल मिल सकता है। साइकिलों के पुराने पुर्ज़े खरीदकर बेच दूँगा। जो काम का होगा, वो रख लूँगा। कुछ पैसा आ जाए तो आ जाए।”
“मेले में मत जा,” पापा ने कहा।
मैं रुक गया।
“क्यों?”
“बस मत जा।”
“पापा, अगर हर बात का जवाब ‘बस मत जा’ होगा तो मैं कभी कुछ नहीं कर पाऊँगा।”
वो चुप रहे।
और मुझे उस वक़्त गुस्सा आया। सच कहूँ तो आया। पर मैंने कुछ नहीं कहा, क्योंकि आँगन में माँ खड़ी थीं, हाथ में टिफ़िन का ढक्कन, और मुझे उनके सामने पापा से झगड़ना ठीक नहीं लगा।
मैंने पापा के कंधे पर हाथ रखा। वो थोड़ा सख़्त था। नहीं, वो काँप रहा था।
“चाय पी लीजिए,” मैंने कहा। “ठंडी हो रही है।”
और मैं दुकान की तरफ़ चल दिया।
दिन किसी तरह कटा।
दुकान पर काम बहुत था, पर पैसा कम। दोपहर में चिंटू आया और अपनी साइकिल का पिछला टायर घसीटता हुआ ले आया, बोला, “उस्ताद, आज पंचर फ्री में कर देना, कल का तू बाकी है।”
“कल का मैं बाकी हूँ?” मैंने रिंच उठाते हुए कहा। “ओ चिंटू, तेरे कितने कल हो गए मेरे खाते में। पूरा महीना लिखा है।”
“तो एक और लिख ले,” वो हँसा। “काग़ज़ तो सस्ता है।”
“काग़ज़ सस्ता है, पंचर का गोंद नहीं।” मैंने टायर अपनी तरफ़ खींचा। “बैठ जा, और सुन, अगर तेरे पास कोई खबर हो तो बता। मुझे पैसे की खबर चाहिए। मरम्मत की नहीं, कमाई की।”
चिंटू तुरंत सीधा हो गया। खबर में तो उसका पूरा करियर चलता है।
“मेले में कबाड़ी आया है,” उसने कहा। “बड़ा वाला। दो ट्रॉली भरकर लाया है। पुरानी साइकिलें, पंखे, टेबल, पीतल के बर्तन, टूटे रेडियो। सब कुछ।”
“सस्ता दे रहा है?”
“सानिया बोली कि वो जो बोले, उसका आधा माँगना। और वो तुरंत हाँ कर देता है।” चिंटू ने आँखें छोटी कर लीं। “उस्ताद, ये ठीक नहीं है न? ऐसे आधे में कौन देता है?”
मुझे हँसी आई। “तू बड़ा बेवकूफ़ है। आधे में इसलिए देता है क्योंकि बाकी आधा उसने पहले ही तेरे जैसे किसी से ले रखा है।”
“मतलब?”
“मतलब, बैठ जा, और ध्यान से सुन।”
मैंने उसे टायर ठीक करते-करते कुछ सिखाया, कि सस्ता माल दो तरह का होता है, एक जो सस्ता होता है, और एक जो सस्ता दिखता है। पर वो अपनी बात पर अड़ा रहा कि कबाड़ी के पास एक पुरानी साइकिल है जो बहुत ही बढ़िया है, सिर्फ़ उसका हैंडल अजीब है।
“कैसा अजीब?” मैंने पूछा।
“उस पर लकड़ी का एक टुकड़ा लगा है। घंटी का। पर घंटी नहीं है उसमें। खाली है।”
मेरे हाथ से रिंच फिसल गई।
नहीं, गिरी नहीं। बस फिसली। पर उस वक़्त मेरे अंदर जो हुआ, वो रिंच के गिरने से बड़ा था।
“लकड़ी का टुकड़ा,” मैंने कहा। “घंटी का ब्रैकेट। खाली?”
“हाँ। बूढ़ा कहता है कि घंटी खो गई। कोई ले गया।”
मैं कुछ देर चुप रहा। फिर मैंने टायर उठाया और काम पर लग गया, और अपनी आवाज़ सामान्य रखी।
“शाम को चलेंगे,” मैंने कहा। “तू मेरे पीछे आ।”
चार बजे काजल अस्पताल से लौटी। सीधी दुकान पर आई और मेरे सामने खड़ी हो गई।
“माँ की रिपोर्ट आई है,” उसने कहा। “दो टेस्ट और होने हैं। डॉक्टर इसरानी ने लिख दिए हैं।”
“पैसा?”
“उन्होंने कहा कि पहले करा लो, बाकी बाद में देखेंगे।”
“काजल, बाकी बाद में देखेंगे का मतलब होता है कि बाकी हमें देखना पड़ेगा।”
वो एक पल के लिए चुप हुई। फिर उसने वही किया जो वो हमेशा करती है — मेरी बात को हल्का कर दिया।
“तो देख लेंगे,” उसने कहा। “मैं अस्पताल में हूँ। डॉक्टर मुझे पसंद करते हैं। कुछ तो छूट ही जाएगा।”
“काजल।”
“क्या?”
“तू झूठ बोल रही है।”
उसकी आँखें भर आईं। पर वो रोई नहीं। वो भी मेरे जैसी है, रोने के लिए जगह ढूँढती है।
“एक रात मैंने पापा को देखा था,” वो धीरे से बोली।
मैंने सिर उठाया।
“कब?”
“कुछ महीने पहले। भारद्वाज भवन के बाहर से निकल रहे थे।” उसने हाथ से अपनी आँखें साफ़ कीं। “मैंने पूछा तो बोले कि काग़ज़ का काम था। पर उनका चेहरा ऐसा था…”
“कैसा?”
“ऐसा जैसे वो अंदर से टूटकर बाहर आ रहे हों।”
मैंने रिंच मेज़ पर रख दिया।
“काजल, ये बात माँ को नहीं पता?”
“माँ सब जानती हैं,” उसने कहा। “बस बोलती नहीं।”
वो चली गई। और मैं दुकान में अकेला बैठा रह गया, यह सोचते हुए कि मेरे घर में कितने दरवाज़े हैं जो बंद हैं, और उनके पीछे कौन-कौन बैठा है।
शाम को मैं साइकिल निकाल लाया।
वही पुरानी, जिसका रंग कब का उतर गया था, जिसकी सीट पर मैंने चमड़े का टुकड़ा खुद टाँका था। मैंने टायर में हवा भरी। एयर पंप चलाते-चलाते मैंने सोचा कि आज अगर कुछ अच्छा नहीं हुआ तो कम से कम चाट तो खा ही लूँगा।
तो सुनो, चाट भी नहीं खाई मैंने। नहीं, झूठ नहीं बोलूँगा — खाई, पर बहुत बाद में। और वो भी चिंटू के पैसों से।
रास्ते में पीपल के पेड़ के नीचे शबनम आपा की गुमटी पर भीड़ थी। उन्होंने मुझे देखा और चिमटी हवा में घुमाई।
“अंकुश, इधर आ।”
“आपा, मेले जा रहा हूँ।”
“दो समोसे ले जा।” उन्होंने काग़ज़ में लपेटकर मेरे हाथ में दे दिए। “एक तू खा। एक घर ले जा।”
“पैसे?”
“अगली बार दे देना।” फिर उन्होंने आवाज़ धीमी की। “और सुन, बच्चों ने बताया कि पीछे वाले प्लॉट पर फिर ट्रक आए हैं।”
“आपा, इसमें हम क्या करें?”
“हम?” उन्होंने सवाल दोहराया। “तू अपना काम कर। मैं अपना देख लूँगी।” और वो भीड़ की तरफ़ मुड़ गईं।
मेले में जाते वक़्त मेरे पीछे चार साए लग गए।
सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों अपनी साइकिलों पर, मेरे पीछे-पीछे, बिना आवाज़ किए। रफ़ीक़ ने मेरी साइकिल के पीछे वाले मडगार्ड को पकड़ लिया था और उसकी साइकिल मेरी साइकिल से चिपकी चल रही थी।
“अरे, छोड़ मेरा मडगार्ड,” मैंने कहा।
“उस्ताद, मेरी साइकिल की चेन ढीली है।”
“तो कल दुकान पर आ। आज मेरा मडगार्ड छोड़।”
“चारों तो आ रहे हैं, एक चीज़ का क्या है,” सानिया ने कहा।
मुझे हँसी आई। “ये टोली जब साथ चलती है तो मुझे लगता है कि मैं जुलूस निकाल रहा हूँ।”
“इससे अच्छा जुलूस होगा?” गुड्डू बोला। “उस्ताद, मेले में झूला भी है। बड़ा वाला। उस पर गाँव के लोगों का झगड़ा हो गया था।”
“क्यों?”
“कोई बोला कि पहले हम चढ़ेंगे। फिर कोई बोला कि पैसे बाद में देंगे। फिर दोनों भाई लगे आपस में।”
“भाई?”
“हाँ, दोनों भाई हैं। खेलू और बेलू। बड़े किसान हैं। बस पैसों पर लड़ते हैं।”
मैंने साइकिल धीमी की।
मुझे उस वक़्त नहीं पता था कि आगे क्या होगा। पर मुझे इतना ज़रूर लगा कि सिर्फ़ मेले के मज़े के लिए मैं जा रहा हूँ, यह बात पूरी नहीं है।
बड़ा तालाब।
शाम का वक़्त। तालाब पर हवा चल रही थी और पानी पर पीली रोशनी की लहरें बन रही थीं। मेले में पूरा शहर उतर आया था। झूलों की आवाज़ें, चाट की गुमटियों से उठता धुआँ, बच्चों के हाथों में गुब्बारे, चूड़ियों की खनक, और एक कोने में बैठा हुआ चूड़ीवाला जो एक ही सुर में गा रहा था।
मैंने साइकिल खड़ी की और आगे बढ़ा।
पहले मुझे वो बैनर दिखा।
बड़ा, साफ़ छपा हुआ, मेले के मुख्य दरवाज़े पर लगा। ऊपर लिखा था — इस मेले में पीने के पानी की व्यवस्था सहयोग से। और नीचे एक नाम, जो मैंने पहले भी बहुत बार देखा था।
भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।
मैं वहीं खड़ा होकर हँस पड़ा। सच में हँस पड़ा। लोग मुझे देखने लगे।
कितने अजीब लोग हैं हम। जो गली के पीछे ट्रकों से मिट्टी डाल रहा है, वही मेले में पानी की व्यवस्था कर रहा है। और हम वही पानी पीते हैं, और उसी को धन्यवाद देते हैं।
“उस्ताद, इधर,” चिंटू ने खींचा। “कबाड़ी उधर है।”
कबाड़ी मेले के किनारे पर था। एक टूटी टेबल पर उसने अपना सामान रखा था और उसके पीछे दो ट्रॉली खड़ी थीं, जिनमें सारा कबाड़ भरा था। एक पुराना पंखा, लोहे की कुर्सी, पीतल की परात, दो टूटे रेडियो, चार साइकिलें।
और वो।
दूसरे कबाड़ियों में शोर है, हँसी है, लोगों को बुलाने की आवाज़ है। ये चुप बैठा था। बिल्कुल चुप। सफ़ेद दाढ़ी, झुकी कमर, सिर पर गमछा, और आँखों में ऐसा कुछ कि मैंने एक पल के लिए सोचा कि ये बूढ़ा है या मेरे जैसे ही किसी की कहानी का कोई पुराना किरदार।
“ये कैसे बेचते हो?” गुड्डू ने एक पीतल का घड़ा उठाकर पूछा।
“जितना दे सको,” बूढ़े ने कहा।
“मतलब?”
“मतलब, जो मन करे।” और वो हँसा। अजीब हँसी। जैसे हँसी भी हो और खाँसी भी।
मैंने साइकिलों की तरफ़ देखा।
तीन साइकिलें तो आम थीं, टूटी हुई, बिना टायर की। पर चौथी…
चौथी थोड़ी अलग थी। उसका फ्रेम मोटा था, हैंडल पुराना पर मज़बूत। और हैंडल के बीचोंबीच, जहाँ घंटी लगती है, वहाँ लकड़ी का एक टुकड़ा लगा था। टूटा हुआ, चिकना, किसी पुराने हाथ से बार-बार छुआ हुआ।
और उस ब्रैकेट में घंटी नहीं थी।
बस एक खाली जगह थी। एक गोल निशान, जहाँ किसी चीज़ ने बहुत साल बिताए थे।
मेरी जेब में, मेरे पैंट के अंदर, वो पीतल की घंटी थी। मैंने उस सुबह ही उसे साइकिल से उतारकर जेब में रख लिया था।
मुझे नहीं पता क्यों रखा था। शायद इसलिए कि मुझे लगा कि अगर वो अपने आप बोल सकती है तो उसे मेरे पास रहना चाहिए। शायद इसलिए कि मुझे उससे डर लग रहा था और मैं उसे अपने पास रखकर सोच रहा था कि डर पर काबू पा लूँगा।
“ये वाली?” मैंने पूछा।
“ये पुरानी है,” बूढ़े ने कहा। “बहुत दिनों से पड़ी है। कोई खरीदता ही नहीं। घंटी भी नहीं है, तो लोग कहते हैं अधूरी है।”
“कहाँ से आई?”
“कहाँ से आती हैं ऐसी चीज़ें?” उसने कंधे उठाए। “कहीं से। कोई छोड़ जाता है। हम उठा लाते हैं।”
“इसका मोल?”
“तू बोल।”
“दो सौ।”
वो हँसा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और कहा, “ले ले।”
मैं रुक गया। “इतना आसान?”
“इसमें क्या आसान?” उसने कहा। “तूने माँगा, मैंने दे दिया। बेचने वाले को खुशी, खरीदने वाले को माल। बस एक बात।”
“क्या?”
“इसे घर ले जाकर सीधा मत रखना। पहले उस दीवार की तरफ़ मुँह करके रखना जो घर में सबसे पुरानी हो।”
मैंने उसे देखा। “क्यों?”
“क्योंकि पुरानी चीज़ें पुरानी दीवारों से बात करती हैं,” उसने कहा, “और नई दीवारें उनकी बात समझती नहीं।”
चारों बच्चे चुप हो गए।
मैंने पैसे निकाले और उसके हाथ में रख दिए। वो बूढ़ा मुस्कुराया और उसने साइकिल मेरी तरफ़ सरका दी।
“उस्ताद, ये तो सड़ी हुई है,” चिंटू ने धीरे से कहा। “इसके पुर्ज़े भी नहीं बिकेंगे।”
“पुर्ज़े बिकेंगे,” मैंने कहा, और अपनी आवाज़ में मज़ाक डाला। “और नहीं तो पूरी साइकिल ही किसी को बेच दूँगा। मेला है, किसी को पसंद आ जाएगी।”
बात बन गई, बच्चे हँस पड़े।
और तभी, भीड़ के बीच से, मुझे एक लड़की दिखी।
छोटा कद, कंधे तक कटे बाल, हाथ में कैमरा, मुँह पर कपड़ा बाँधे हुए। वो भीड़ को चीरती हुई आगे जा रही थी, कैमरा उठाए, और कुछ बोल रही थी, पर आवाज़ मेले के शोर में डूब रही थी।
मुझे उसका चलने का ढंग जाना-पहचाना लगा। जल्दबाज़। जैसे हर जगह पाँच मिनट देर से पहुँची हो और अगले पाँच मिनट में कहीं और पहुँचना हो।
मैंने देखा, पर पहचान नहीं पाया। भीड़ बहुत थी। और सच कहूँ तो उस वक़्त मेरा ध्यान कहीं और था। मेरे हाथ में एक जंग लगी साइकिल थी, जिसके हैंडल पर एक खाली लकड़ी का ब्रैकेट था, और मेरी जेब में एक पीतल की घंटी थी जो कल रात बोली थी।
दो चीज़ें जब इतनी साफ़-साफ़ एक-दूसरे को बुला रही हों, तो आदमी के पास सवाल पूछने का टाइम नहीं होता।
बस डर होता है।
रात नौ बजे हम लौटे।
रास्ते में बच्चे एक-एक करके अपनी गलियों में मुड़ गए। पहले गुड्डू, फिर रफ़ीक़। फिर सानिया और चिंटू। चिंटू जाते-जाते रुका और बोला, “उस्ताद, कल सुबह आ जाऊँ?”
“आ जा।”
“अगर तू उस साइकिल को ठीक करे, तो मुझे बताना।”
“क्यों?”
“क्योंकि उस पर घंटी नहीं है,” उसने कहा, “और मुझे लगता है कि तेरे पास है।”
मैं वहीं रुक गया।
“क्या बोला?”
पर वो हँसता हुआ भाग गया। बच्चे कभी-कभी बिना जाने सबसे सही बात कह देते हैं, और फिर भाग जाते हैं।
पीपल के पेड़ के नीचे अब सन्नाटा था। शबनम आपा की गुमटी बंद। उस्ताद की दुकान पर ताला। गली की नाली में पानी की आवाज़।
मैं साइकिल पर बैठा, और नई साइकिल को दूसरे हाथ से खींचता हुआ आगे बढ़ा। वो जंग लगी साइकिल पहिए पर नहीं चल रही थी — उसके टायर बिल्कुल खाली थे, और उसका पहिया घूमता नहीं था, घसीटता था।
फिर मुझे लगा कि वो भारी होती जा रही है।
पहले हल्की थी। फिर थोड़ी भारी। फिर ऐसी भारी जैसे कोई पीछे बैठा हो।
मैंने मुड़कर देखा। कोई नहीं।
मैंने फिर खींचा।
वो पीछे की तरफ़ खिंची।
नहीं, खिंची नहीं। वो रुकी। जैसे किसी ने उसका पहिया ज़मीन से चिपका दिया हो।
मैंने ज़ोर लगाया। वो नहीं हिली।
“अरे,” मैंने कहा। “अब तू मेरे साथ नाटक करेगी?”
वो चुप।
मैंने हाथ बदला। फिर ज़ोर लगाया। नहीं हिली।
और मुझे गुस्सा आ गया। सच में आया। सारा दिन का गुस्सा, पापा की चुप्पी, माँ की पर्ची, काजल की भरी आँखें, बैनर पर लिखा वो नाम — सब एक साथ आ गया।
मैंने जेब में हाथ डाला और वो पीतल की घंटी निकाल ली।
“सुन,” मैंने उसे सामने करके कहा, “कल रात तूने कहा था कि मैं अकेले नहीं उठाऊँगा। तो अब ये क्या है? तेरी ही साइकिल मुझे खींच रही है? या तू मुझे बेवकूफ़ बना रही है?”
और मैंने अपने अँगूठे से उस घंटी को दबा दिया।
मुझे लगा वो आम सी आवाज़ करेगी। टन। और मेरा गुस्सा कुछ कम हो जाएगा।
पर जो हुआ, वो आम नहीं था।
घंटी बजी — पर ऐसे नहीं जैसे बाहर से कोई अँगूठा दबाता है। वो ऐसे बजी जैसे किसी ने अंदर से उसे ज़ोर से पकड़ लिया हो और हिला दिया हो। आवाज़ बाहर नहीं आई, वो अंदर की तरफ़ गई। मेरी हथेली में झनझनाहट फैली, कलाई तक, कोहनी तक, और मेरी रीढ़ से सीधी गर्दन तक एक ठंडी लकीर खींच गई।
और फिर, मेरे ठीक कान के पास, एक रूखी आवाज़ ने कहा —
अब मत बजाना।
मेरी साँस रुक गई।
मैं वहीं खड़ा रहा, हाथ में घंटी, और सामने वो जंग लगी साइकिल, जिसके खाली ब्रैकेट से धूल गिर रही थी।
और मुझे लगा कि वो साइकिल अब पीछे खींच नहीं रही। वो बस मेरी तरफ़ झुकी खड़ी है, जैसे कह रही हो — अब मुझे घर ले चल।
मैंने घंटी जेब में रखी। मैंने साइकिल का हैडल पकड़ा।
और उस रात, पहली बार, मुझे अपनी गली छोटी नहीं लगी।
मुझे लगी कि ये गली बहुत बड़ी है। इतनी बड़ी कि इसमें मेरे घर की चुप्पी, मेरे पापा का डर, मेरी माँ की पर्ची, और एक अनजानी आवाज़ — सब के लिए जगह है।
और मुझे ये भी लगा कि जो आवाज़ कल रात बोली थी और आज मना कर रही है, वो मेरी दुश्मन नहीं है।
मगर वो मेरी दोस्त भी नहीं है। अभी नहीं।
क्योंकि जो चीज़ मुफ़्त में मिलती है, वो कभी दोस्ती नहीं होती। वो उधार होती है।
और मुझे अभी से लग रहा था कि इस उधार की किस्तें बहुत भारी होंगी।
॥
मैं वहीं खड़ा रहा। हाथ में घंटी, आँखें सामने, और कान में वो आवाज़ अभी भी गूँज रही थी, जैसे किसी ने मेरे कान के अंदर कोई ठंडी कील ठोंक दी हो।
अब मत बजाना।
मैंने चारों तरफ़ देखा। सड़क खाली थी। सामने पुराना पीपल, उसके नीचे अंधेरा, और उस अंधेरे में चबूतरा। मेरे पीछे गुमटी बंद, बगल में उस्ताद की दुकान पर ताला।
कोई नहीं था।
मैंने फिर देखा। नाली के पुल पर, दीवार के पीछे, पेड़ की छाया में — कहीं भी कोई नहीं।
"कौन?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ अपनी ही कान में अजीब लगी, जैसे किसी और की हो।
जवाब नहीं आया।
"अरे, सामने आ," मैंने कहा, थोड़ा और ज़ोर से। "कौन बोला? मज़ाक कर रहे हो क्या?"
गली चुप थी। बस पानी की आवाज़, और दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज़।
मैंने घंटी को देखा। पीतल, पुरानी, कहीं-कहीं हरी परत चढ़ी हुई, पकड़ने की जगह घिसी हुई। ये घंटी आम थी। बिल्कुल आम।
मुझे पसीना आ गया। माथे से, गर्दन से, पीठ से।
और फिर मेरे अंदर वो आवाज़ उठी जो हर आम आदमी के अंदर उठती है जब वो कोई अजीब चीज़ देखता है — वो आवाज़ जो हमें हमारी आँखों से झूठ बुलवाती है।
गर्मी है। बस गर्मी है। आज दिन भर धूप में रहा हूँ। मेले में धूल खाई है, सिर पर तेज़ धूप पड़ी है, पानी भी ठीक से नहीं पिया। बस इसीलिए कान में बज रहा है।
हाँ, यही बात है। कान में बजना आम बात है। किसी को भूख लगती है, किसी को चक्कर आता है, और किसी के कान में बजता है। मेरे कान में बजा। बस इतनी सी बात।
मैंने घंटी को देखा।
"तू ऐसा मत कर," मैंने धीरे से कहा, जैसे घंटी को डाँट रहा हूँ। "समझ गया, तू कुछ बोलती है। पर मैं आज नहीं सुनूँगा। आज मैं थका हुआ हूँ।"
घंटी चुप रही। पीतल पर चाँद की रोशनी पड़ रही थी, और अंदर कहीं एक बहुत छोटी सी झलक थी, जैसे अंधेरे में किसी सिक्के का कोना।
मैंने घंटी जेब में रखी और साइकिल का हैंडल पकड़ा। इस बार साइकिल भारी नहीं थी। या शायद थी, पर मैंने ध्यान नहीं दिया। मैं चल पड़ा।
गली के मोहाने तक पहुँचा तो मुझे प्यास लगी। सच में लगी। गला सूख रहा था, जैसे मेले की धूल अब तक हलक में बैठी हो।
मोहाने वाले मोड़ पर पुराना नल है, पत्थर के टैंक के पास, जहाँ सुबह-शाम लोग पानी भरते हैं। रात में वहाँ कोई नहीं होता। मैंने साइकिल खड़ी की और नल खोला। पानी गरम था, क्योंकि पाइप धूप में पड़ा था। फिर ठंडा आया।
मैंने मुँह में पानी डाला। दो घूँट। फिर तीन। फिर पूरा हाथ भर कर पीया।
और फिर मैंने दोनों हाथों में पानी लेकर अपना मुँह धोया। पानी गर्दन से नीचे बह गया, कमीज़ भीग गई।
मैंने अपना चेहरा टैंक के ऊपर की तरफ़ देखा। पानी में मेरा चेहरा हिल रहा था, टूट रहा था, फिर जुड़ रहा था।
"देखा," मैंने अपने आप से कहा। "सब ठीक है। तू थका है, बस।"
मैंने मुँह पोंछा। गीली कलाई से बाल पीछे किए।
और फिर मैंने जेब से घंटी निकाली।
क्योंकि मुझे अंदर से एक बात साल रही थी। जो आदमी शक करता है, वो दोबारा परखता है। मैं साइकिल मिस्त्री हूँ। मैंने ज़िंदगी में हज़ार चीज़ें ठीक की हैं, और मैंने एक बात सीखी है — अगर कोई चीज़ एक बार अजीब करे, तो उसे दोबारा करके देखो। अगर दोबारा वही हो, तो वो अजीब नहीं है, वो सच है। अगर दोबारा कुछ न हो, तो तेरा दिमाग ख़राब है, और तू सो जा।
मैंने घंटी को दूर से देखा। फिर करीब से। फिर मैंने उसे उँगली से हल्का सा छुआ।
कुछ नहीं हुआ।
मैंने हिम्मत की और अँगूठे से दबा दिया।
घंटी बजी। इस बार भी वो वैसे ही बजी — बाहर से नहीं, अंदर से, जैसे किसी ने उसे अंदर से पकड़कर हिलाया हो। हथेली में वो झनझनाहट फिर फैली, कलाई तक।
और फिर आवाज़ आई।
"सुन, मैं बुखार नहीं हूँ।"
मैंने घंटी को गिराते-गिराते बचाया। हाथ काँप रहा था।
"मैंने कहा था न," आवाज़ फिर बोली, धीमी, रूखी, जैसे कोई बहुत सालों से न बोला हो और आवाज़ को अभी आदत न हो। "अब मत बजाना।"
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
"तू सोचेगा कि गर्मी है, धूप है, सिर में चक्कर है," आवाज़ ने कहा। "पर तू सिर्फ़ एक चीज़ से बच रहा है — ये मानने से कि मैं हूँ।"
मैंने पानी की तरफ़ देखा, टैंक की तरफ़, पेड़ की तरफ़। मेरे होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"तू डर गया," आवाज़ ने कहा। इसमें कोई मज़ाक नहीं था। कोई तरस भी नहीं। बस एक ठंडा सच। "डरना बंद करने के लिए मुझे दोबारा बजाया। अब पता चला तो फिर डर गया। सुन, ये आगे भी ऐसे ही चलेगा अगर तू समझ नहीं रहा।"
मैंने घंटी को देखा और मेरे मुँह से निकला, "तू है कौन?"
घंटी चुप हो गई।
"अरे, बोल ना," मैंने कहा। "मैंने पूछा तू कौन है?"
चुप।
"देख," मैंने कहा, थोड़ा गुस्से में। "तू मेरी जेब में है। मेरी घंटी है तू। और जो मेरी चीज़ हो और मेरे सवाल का जवाब न दे, उसका रखना बेकार है।"
इस बार जवाब आया। पर वो जवाब नहीं था जो मैं चाहता था।
"तू मुझे मेरी जेब से निकाल सकता है," आवाज़ ने कहा। "निकाल। रख दे उस साइकिल के ब्रैकेट पर। और चला जा।"
मैं रुक गया।
क्योंकि ये बात मुझे चुभ गई। जैसे किसी ने मुझे कह दिया हो — जा, भाग जा। और मुझे भागना पसंद नहीं है। कभी नहीं था।
"नहीं," मैंने कहा। "मैं नहीं जाऊँगा।"
"तो सीधा खड़ा हो," आवाज़ ने कहा। "काँपना बंद कर।"
और फिर वो चुप हो गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। पानी टपक रहा था, नल से, टैंक से, मेरे हाथ से। मेरा दिल धड़क रहा था, और मुझे लग रहा था कि मेरी हड्डियों में कुछ ठंडा बह रहा है।
और फिर, किसी अजीब वजह से, मुझे हँसी आ गई।
सच में। मैं वहीं खड़ा हँसने लगा। रात के ग्यारह बजे, खाली नल के पास, हाथ में पुरानी पीतल की घंटी, और मैं हँस रहा हूँ।
क्योंकि मेरे दिमाग़ में एक ही बात आ रही थी — मेला आज, दो सौ रुपये, जंग लगी साइकिल, और उसमें एक बातूनी घंटी फ्री। कबाड़ी बूढ़े ने मुझे ठगा नहीं, उसने मुझे पूरा पैकेज दिया।
"अच्छा," मैंने घंटी को जेब में डालते हुए कहा। "तो तू बोलती है। ठीक है। कोई और होता तो डर के मारे साइकिल छोड़कर भाग जाता। पर मैं डरता नहीं।"
मैंने साइकिल का हैंडल पकड़ा।
"मैं सिर्फ़ थोड़ा सा डरता हूँ," मैंने कबूल किया, क्योंकि मेरी आदत है सच बोलने की, चाहे अपने आप से ही। "पर तू जान ले — जो डरता है, वो भागता है। जो डरता है और भागता नहीं, वो मज़बूत होता है। और मैं आज किसी के आगे नहीं भागने वाला।"
मैंने साइकिल घसीटी, और आगे बढ़ा।
उस वक़्त मुझे लगा कि बात ख़त्म हो गई। मैंने घंटी से बात कर ली, घंटी ने मुझे जवाब दे दिया, अब सब ठीक है। आम आदमी का दिमाग़ ऐसे ही काम करता है — जो डरावनी चीज़ सामने आ जाए, उससे बात कर लो, फिर लगता है कि बात ख़त्म।
पर घंटी ने मेरे बारे में कुछ जान लिया था। वो जान गई थी कि मैं भाग सकता हूँ। और उसने मेरा इम्तिहान लिया।
मैं गली के बीच में पहुँचा था, पीपल के पेड़ से करीब पचास कदम आगे। साइकिल घसीट रहा था, जंग लगी, टायर खाली, पहिया रगड़ खा रहा था। रात की चुप्पी में वो आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी — जैसे कोई पुरानी चीज़ ज़मीन पर अपना पेट घसीट रही हो।
और फिर मेरे अंदर एक सोच आई। बहुत बुरी सोच।
अगर घंटी बोलती है, तो घंटी चीज़ है। और अगर घंटी चीज़ है, तो वो मेरी नहीं हो सकती। मैंने उस घंटी को कबाड़ी से खरीदा नहीं। मैंने साइकिल खरीदी थी। घंटी अलग से मिली थी। किसी और की चीज़ मेरे पास है।
और जो चीज़ किसी और की हो और बोलती हो, उससे मैं दूरी रखना चाहता हूँ। अभी मेरे पास माँ की पर्ची है, पापा की चुप्पी है, काजल की भरी आँखें हैं, और भारद्वाज कंस्ट्रक्शन पीछे मिट्टी डाल रहा है। मुझे एक बोलती घंटी की नहीं, सोचने के लिए एक रात की ज़रूरत है।
मैंने साइकिल हैंडल से छोड़ दी।
वो ढह गई, थोड़ी कटी, कटकर सड़क पर पड़ गई। जैसे कोई थका हुआ जानवर लेट जाए।
और मैं मुड़कर तेज़ कदमों से घर की तरफ़ चल पड़ा।
तेज़ कदम। बहुत तेज़।
इतने तेज़ कि मुझे खुद पर शर्म आ रही थी, पर मैं रुका नहीं। मेरी पीठ पर एक एहसास था जैसे उस साइकिल के ब्रैकेट से कोई देख रहा हो। ब्रैकेट खाली था, मुझे पता था, पर मैं मुड़कर देखना नहीं चाहता था। मुड़कर न देखना ही बहादुरी है, यही मैं अपने आप को बता रहा था। ये भी एक झूठ ही था, पर उस वक़्त वो झूठ ज़रूरी लग रहा था।
मैं गली के आख़िरी मोड़ पर पहुँचा, जहाँ से मेरा घर दिखता है।
और तभी जेब में घंटी बजी।
अपने आप। मैंने उसे छुआ भी नहीं। मेरे हाथ जेब से बाहर थे, मैं तेज़ चल रहा था।
आवाज़ मेरे कान के पास आई, बिल्कुल पास, जैसे कोई मेरे कंधे पर मुँह रखकर बोल रहा हो।
"वापस जा। साइकिल उठा। उसे यूँ अकेला मत छोड़।"
मैं रुका। मेरे पैर अपने आप रुक गए, जैसे किसी ने रस्सी से खींच लिया हो।
"अब सुन," मैंने कहा, जेब की तरफ़ झुककर, जैसे जेब में बैठे किसी से बात कर रहा हूँ। "तू मुझे आदेश नहीं देगी। मैं तेरा नौकर नहीं हूँ।"
"साइकिल उठा," आवाज़ ने फिर कहा। इसमें कोई गुस्सा नहीं था, कोई रोना नहीं था, कोई विनती भी नहीं। बस एक बात, जैसे कोई थका हुआ आदमी आख़िरी बार कुछ कह रहा हो। "तू इसे छोड़ने की सोच भी क्यों रहा है, मुझे पता है। तू सोच रहा है कि ये किसी और की चीज़ है। सही सोच रहा है। पर तू ये भी सोच — जो चीज़ किसी और की हो और तुझे सौंपी गई हो, उसे सड़क पर पटककर जाना, ये कौन सी बात है?"
मैं चुप खड़ा रहा।
"मुझे तेरी ज़रूरत नहीं," मैंने कहा, पर मेरी आवाज़ में वो ज़ोर नहीं था जो मैं चाहता था।
"नहीं," आवाज़ ने कहा। "मुझे तेरी ज़रूरत है। और तुझे ये बात पसंद नहीं आएगी। पर यही सच है। अब जा, साइकिल उठा। मेरी बात मानने के लिए नहीं — अपनी बात मानने के लिए। तूने पैसे दिए हैं। दो सौ। अपनी मेहनत के पैसे। उन पैसों की इज़्ज़त रख।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। बिना तारों वाला आसमान, जैसे शहर की रोशनी ने सब निगल लिया हो।
और फिर मैं मुड़ा।
मैं वापस चला। उसी रास्ते से। तेज़, पर इस बार भागते हुए नहीं। सीधे कदमों से।
साइकिल वहीं पड़ी थी, सड़क पर, पीपल की छाया के बाहर, चाँद की रोशनी में। जंग लगी, टेढ़ी, बेकार। एक बार देखो तो लगे कि कोई इसे उठाकर कबाड़े में फेंक दे।
मैंने उसे उठाया। वो भारी थी, पर आम भारी। जैसे लोहे की साइकिल होती है वैसे ही।
मैंने उसे सहारा देकर खड़ा किया। फिर मैंने घंटी जेब से निकाली और उसे उसके ब्रैकेट पर लगाने लगा। हाथ जा रहा था।
"नहीं," आवाज़ ने कहा।
मैं रुका।
"मैं तेरे पास रहूँगी," आवाज़ ने कहा। "जेब में रख। पर साइकिल अब मेरी जगह नहीं है। साइकिल तेरी ज़िम्मेदारी है। दोनों अलग रख।"
मैंने घंटी को जेब में डाला। और मुझे लगा जैसे मैंने जेब में कोई गरम फेंटा डाल दिया हो। कपड़ा भीग रहा था, पीतल मेरी जाँघ से चिपक रहा था, और वो जगह जल रही थी।
मैंने साइकिल घसीटते हुए घर की तरफ़ बढ़ाया।
घर के गेट पर मैंने साइकिल खड़ी की, दीवार की तरफ़ मुँह करके, जैसे कबाड़ी बूढ़े ने कहा था। पुरानी दीवार। घर की सबसे पुरानी दीवार। वो दीवार जिस पर प्लास्टर उखड़ा हुआ है और जिसके नीचे माँ ने तुलसी का पौधा लगा रखा है।
मैंने साइकिल का मुँह दीवार की तरफ़ किया और खड़ा कर दिया।
और उस वक़्त मुझे लगा जैसे साइकिल ने राहत की साँस ली हो।
मैं अंदर गया।
दरवाज़े पर काजल बैठी थी, रसोई की सीढ़ी पर, हाथ में नर्सिंग की किताब, और उसके चेहरे पर वो भाव जो बहनों के चेहरे पर तब आता है जब वो जानती हैं कि भाई कुछ छिपा रहा है।
"क्या हुआ?" उसने पूछा, मेरा चेहरा देखते ही। "तेरा चेहरा ऐसा क्यों है?"
"कैसा है?" मैंने कहा, जूते उतारते हुए।
"ऐसा जैसे तूने कोई चीज़ देखी है," काजल ने कहा। "या जैसे किसी ने तुझे देख लिया है।"
काजल की ज़ुबान तेज़ है। मुझसे भी तेज़। और वो मेरे चेहरे पर बात पढ़ने में उस्ताद है।
मैं रुका। मेरे दिमाग़ में सच था, पर सच कहना मना था। अभी नहीं। क्योंकि अगर मैं कहता कि घंटी मुझसे बात करती है, तो काजल मुझे डॉक्टर इसरानी के पास ले जाती, और उनके पास जाने का एक ही मतलब होता — या तो मैं पागल हूँ, या माँ के इलाज के पैसे उड़ा रहा हूँ। दोनों बातें मुझे पसंद नहीं थीं।
तो मैंने वही किया जो मैं हमेशा करता हूँ। सच को मज़ाक में लपेट दिया।
"मेले में एक साइकिल मिली," मैंने कहा, सीढ़ी पर बैठते हुए। "सस्ती थी। दो सौ। पर उसमें एक दिक्कत है।"
"क्या?"
"उसमें भूत है," मैंने कहा। बिल्कुल सीधे, जैसे रोज़ की बात बता रहा हूँ।
काजल ने एक पल मुझे देखा।
फिर वो हँस पड़ी। एक छोटी सी हँसी, जो टहनी से टपकती बूँद जैसी थी, पर उस रात मेरे लिए वो बहुत बड़ी थी।
"बेकार बात," उसने कहा। "तू अपनी साइकिलों में बस भूत ही ढूँढता है। पिछले महीने तूने गुड्डू की साइकिल में धमकी वाली आवाज़ कही थी, वो निकली बॉल बियरिंग।"
"वो अलग था," मैंने कहा। "इस बार वो असली भूत है। बोलती है। हिंदी में।"
"तो उससे कह देना कि उसका किराया भी देना पड़ेगा," काजल ने कहा, किताब बंद करते हुए। "हमारे घर में मुफ़्त में कोई नहीं रहता। भूत हो या मेहमान।"
वो हँसती हुई अंदर चली गई।
और मैं सीढ़ी पर बैठा रहा।
अंदर से माँ की आवाज़ आई, थोड़ी थकी, थोड़ी खुरदरी। "काजल, दरवाज़ा बंद कर दे। रात हो गई है।"
और फिर पापा की आवाज़ नहीं आई। बस खाँसी की एक आवाज़, और कुर्सी खिसकने की आवाज़। वो कमरे के कोने में बैठे थे, जहाँ से बाहर का कुछ नहीं दिखता। शायद इसीलिए वहाँ बैठते हैं।
मैंने जूते उतारे, हाथ धोए, और खाने की मेज़ पर बैठा।
खाना ठंडा हो चुका था। रोटी सूख रही थी। माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"देर क्यों हुई?" उन्होंने पूछा।
"मेला घूमने गया था," मैंने कहा। "बच्चों के साथ।"
"मेला?" माँ ने धीरे से कहा, और उनकी आवाज़ में वो सवाल था जो मैं टाल रहा था। "क्या खरीदा?"
मैंने चबाना रोक दिया।
"एक साइकिल," मैंने कहा। "पुरानी। दो सौ की।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। वो मेरी झूठ पकड़ सकती हैं, दूध में पानी से भी आसानी से। उन्होंने कहा कुछ नहीं, पर उनके होंठ सिकुड़ गए।
"अंकुश," उन्होंने कहा, धीमी आवाज़ में। "दो सौ?"
"माँ," मैंने कहा, "अगर मैं साइकिल नहीं खरीदता, तो मेरा काम ही क्या है?"
वो कुछ बोलतीं इससे पहले पापा ने कुर्सी की तरफ़ से कहा।
"पैसा बचा के रख।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"पैसा," मैंने कहा, "मैं बचा रहा हूँ। दो सौ में मैं क्या बचा रहा हूँ या क्या उड़ा रहा हूँ, पापा, ये भी सोच लो।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनका चश्मा टेप से बँधा था, और उस टेप के नीचे उनकी आँखें थीं, जिनमें कोई सवाल नहीं था। सिर्फ़ थकान थी। बहुत ज़्यादा थकान।
"तू मेरे पास आ," उन्होंने कहा।
तो मैं गया। कुर्सी के पास। वो मेरे कंधे तक ऊँचे बैठे थे, और मुझे झुकना पड़ा।
"मुझे पता है," पापा ने कहा, बहुत धीमी आवाज़ में, इतनी धीमी कि माँ सुन न सकें। "तू माँ की पर्ची पढ़ चुका है।"
मैंने माँ की तरफ़ झटके से देखा। वो रसोई की तरफ़ मुँह करके बर्तन धो रही थीं।
"कैसे पता?" मैंने पूछा।
"तेरी आँखें," पापा ने कहा। "आज सुबह मैंने तेरी आँखें देखी थीं। सुबह तेरी आँखें डरती नहीं हैं। आज रात डरती हैं। और मैं जानता हूँ कि तू किस चीज़ से डरता है। पैसे से नहीं।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तू अभी कुछ मत बोल," पापा ने कहा। "मैं जानता हूँ तू सब कुछ पूछेगा। यही तेरी आदत है। पर आज रात नहीं। आज रात सो जा। कल मैं खुद बताऊँगा।"
"कल तक मैं सो नहीं सकता," मैंने कहा।
"तो बैठ," पापा ने कहा। "बैठ और सोच। पर अकेले मत सोच।"
मैं उनकी बात का मतलब नहीं समझा। बस सिर हिलाया। खाना खाया। हाथ धोए, और सीढ़ी से छत पर गया।
हमारी छत छोटी है। कोने में पानी की टंकी, एक टूटी कुर्सी, और सुखाने के लिए डाली हुई साड़ी। आज रात वहाँ कोई साड़ी नहीं थी। बस कुर्सी थी, और आसमान।
मैं कुर्सी पर बैठ गया।
गली से आवाज़ें आ रही थीं। कोई टीवी देख रहा था, कोई बच्चा रो रहा था, कोई गाड़ी जा रही थी। फिर धीरे-धीरे सब कम हो गया।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
पीतल। पुरानी। मेरी हथेली में छोटी सी लग रही थी। मैंने उसे घुमाया। मैंने उसे रोशनी में उठाया। मैंने उसे अपने घुटने पर रखा।
वो चुप थी।
मैंने उसे अपनी मुठ्ठी में लिया। मैंने उसे हिलाया। कुछ नहीं।
तो ये क्या है? जब मैं उसे दबाता हूँ, तब वो बोलती है, और जब मैं उसे हिलाता हूँ, तब चुप। इसका मतलब ये है कि उसे शुरू करने की ज़रूरत है। उसे शुरू करने के लिए किनारे से दबाना पड़ता है।
मैंने अपने अँगूठे को उसके बीच वाले किनारे पर रखा।
और फिर मैंने उसे धीरे से गोल घुमाया।
शायद ये आम घंटी है। शायद कुछ नहीं होगा। शायद मैंने पूरा पागलपन में निकाल दिया।
और फिर मैंने सोचा, रुक जा। अभी न बजा। सोच पहले।
मैंने घंटी को अपने घुटने पर रखा और आसमान की तरफ़ देखा।
मैंने सोचा, क्या कहा था उसने? "मैं बुखार नहीं हूँ।" ये कोई आम बात नहीं थी। ये उसने मेरी सोच का जवाब दिया था। मैं सोच रहा था — गर्मी, धूप, कान में बजना। और उसने वही कहा।
मतलब वो मेरे अंदर झाँक सकती है।
और ये बात मुझे डरा नहीं, ठंडा कर गई।
मैंने सोचा, ठीक है। अगर तू मेरे अंदर झाँक सकती है, तो मेरा अगला सवाल भी सुन ले — तू कुछ माँगती क्या है?
क्योंकि मैं साइकिल मिस्त्री हूँ। मैं जानता हूँ कि कोई चीज़ मुफ़्त नहीं आती। एक पहिया ठीक करने के लिए भी हाथ लगाना पड़ता है, ग्रीस गंदा करना पड़ता है, हवा डालनी पड़ती है। मेले में एक कबाड़ी ने मुझे दो सौ में साइकिल दी, और उस साइकिल पर एक बोलती घंटी थी। और कबाड़ी चुप बैठा था, बिल्कुल चुप, जैसे जानता था कि मैं क्या ले जा रहा हूँ।
अब सवाल है — मैं क्या ले आया हूँ?
और यही सोचते-सोचते, मेरी उंगली अपने आप घंटी पर रखी गई।
घंटी बजी।
इस बार मैंने अपने आप को तैयार रखा था। हथेली में झनझनाहट आई, कलाई तक, और वो ठंडी लकीर रीढ़ से गर्दन तक खिंच गई।
और आवाज़ आई।
"कल मेले में वो औरत जो तुझे ठग समझेगी, उससे बचकर मत भागना। उसकी बात सुनना।"
मेरा हाथ घंटी पर जम गया।
"कौन औरत?" मैंने फुसफुसाकर पूछा।
पर घंटी चुप हो चुकी थी। जैसे बोलने की उसकी चीज़ ख़त्म हो गई हो। जैसे उसने एक बात कहने के लिए बहुत ज़ोर लगाया हो, और अब उसे आराम चाहिए।
मैं छत पर बैठा रहा।
नीचे गली से आवाज़ आई, टिंकू की माँ की आवाज़, "टिंकू, चल सो जा!" और फिर दरवाज़ा बंद होने की आवाज़।
मैंने घंटी को देखा।
"ठग समझेगी," मैंने धीरे से दोहराया। "मेला तो आज ही था।"
मेरे अंदर एक झटका सा हुआ। मेला आज था। पर घंटी कह रही है — कल मेले में। यानी कल फिर मेला है। या फिर मैं गलत समझ रहा हूँ।
मैंने अपनी जेब टटोली, पर वो खाली थी। घंटी मेरे हाथ में थी।
मैंने अपने आप से कहा, हो सकता है वो कल की बात कर रही हो। सड़क पर। कहीं और। किसी और मेले की।
मेरी माँ ने कहा था, दो टेस्ट और होने हैं। काजल ने कहा था, दो टेस्ट और होने हैं। और मेले में मैंने एक लड़की देखी थी, कैमरा लिए, बहुत जल्दी में। मीरा? नहीं, मीरा आज मेले में नहीं थी। या थी? मुझे याद नहीं।
मैंने घंटी को मुठ्ठी में लिया।
"ठग समझेगी," मैंने फिर कहा, धीरे से। "कोई औरत मुझे ठग समझेगी। मैं किसी को ठगता नहीं हूँ। मैं तो दो रुपये का पंचर पैच पाँच में करता हूँ, और वो भी बताकर करता हूँ।"
मुझे गुस्सा आया। सच में आया। किसी अजनबी की बात का गुस्सा, किसी अनजान चीज़ का गुस्सा।
और फिर वो गुस्सा एक ठंडी बात में बदल गया, जो मेरे अंदर बैठ गई — अगर कोई औरत मुझे ठग समझती है, तो शायद इसकी वजह है कि मैं उसकी नज़र में ठग हूँ।
ये बात बुरी थी। माँ की पर्ची, पापा की चुप्पी, भारद्वाज का बैनर — ये सब रहस्य थे। पर "तुझे कोई ठग समझेगा" कोई रहस्य नहीं है। वो इल्ज़ाम है।
और इल्ज़ाम का जवाब देना पड़ता है।
मैंने घंटी को देखा।
"सुन," मैंने कहा, "तू अगली बार जब बोले, तो पूरी बात बोल। अधूरी बात बोलकर चुप हो जाना, ये बुज़ुर्गों की आदत है। और मैं बुज़ुर्गों की आदतों से तंग आ चुका हूँ।"
घंटी चुप रही। बस पीतल चमका, थोड़ा सा, मेरी मुट्ठी में।
मैंने उसे अपनी जेब में डाला, और छत पर लेट गया। आसमान में कोई तारा नहीं था। बस एक चाँद था, जो शहर की धूल में पीला पड़ रहा था।
और नीचे, घर की सबसे पुरानी दीवार के पास, जंग लगी साइकिल खड़ी थी। दीवार की तरफ़ मुँह किए हुए। जैसे किसी से बात कर रही हो।
मुझे नींद नहीं आई।
मैंने सुना — नीचे पापा ने करवट बदली। माँ ने खाँसा। काजल ने अपनी किताब बंद की।
और एक पल ऐसा आया जब मुझे लगा कि पूरी गली सो रही है, और सिर्फ़ मैं जाग रहा हूँ। सिर्फ़ मैं, और मेरी जेब में पीतल की घंटी।
मैंने सोचा, अगर ये घंटी मेरी है, तो मैं इसका मालिक हूँ। और अगर मैं मालिक हूँ, तो मुझे इससे सवाल पूछने का हक़ है। और अगर वो मेरे सवाल का जवाब नहीं देती, तो मैं उसे उस ब्रैकेट पर लटका दूँगा और कबाड़ी के पास वापस ले जाऊँगा।
"दो सौ वापस," मैंने अपने आप से कहा। "और एक झटका मुफ़्त।"
मुझे हँसी आई।
फिर मेरे अंदर एक और बात उठी, अचानक, बिना बुलाए — अगर कोई मुझे ठग समझेगी, तो हो सकता है वो मुझे ठगने की कोशिश भी करेगी। और अगर वो पहले से मुझे ठग समझती है, तो शायद वो मुझे कुछ ऐसा देगी जो देखने में सस्ता हो और अंदर से महँगा।
और मैंने तय किया — मैं कल उससे नहीं भागूँगा। चाहे वो कुछ भी हो। चाहे वो कैमरा लिए कोई जल्दबाज़ लड़की हो, या कोई बूढ़ी कबाड़न, या कोई ऐसी जो मेरे बारे में कुछ ऐसा जानती हो जो मैं खुद नहीं जानता।
क्योंकि उस रात मुझे एक बात समझ आ गई थी।
मेरे पास दो रहस्य थे — जो मैंने खुद देखे थे, और जो मुझे दिखाए गए थे। माँ की पर्ची पहला था। और ये घंटी दूसरा। और दोनों में एक बात एक जैसी थी।
दोनों मुझसे कह रहे थे — अंकुश, तू जो समझ रहा है, वो पूरी बात नहीं है।
और मुझे लगा कि कल, अगर मैं मेले में जाऊँगा, तो मुझे उस पूरी बात का एक टुकड़ा मिलेगा। शायद सिर्फ़ एक टुकड़ा। पर मैं उस टुकड़े के लिए किसी से नहीं भागूँगा।
और जब आधी रात के बाद मैंने करवट बदली, तब मेरे कान में वो रूखी आवाज़ बहुत दूर से आई।
"अब सो जा। तेरे पास कल एक औरत से मिलने जाना है। और तू जानता है, औरतों के सामने ऐसी हालत में नहीं जाना चाहिए।"
मैंने आँख खोली।
कोई नहीं था। बस छत, बस चाँद, बस गली की चुप्पी।
मैंने घंटी को जेब में अच्छी तरह खोंसा और मुँह फेरकर लेट गया।
पर मेरे अंदर एक बात चुभ रही थी — घंटी ने पहली बार मुझसे मज़ाक किया था। और मुझे ये मज़ाक पसंद आया।
ये बात ख़तरनाक थी।
क्योंकि जिससे आपकी बनने लगे, उसे आप आसानी से छोड़ नहीं पाते।
और मैं आज किसी चीज़ को छोड़ने के मूड में नहीं था।
मैं सो गया।
पर नींद में मुझे एक साइकिल दिखी, जो चल रही थी, और उस साइकिल पर घंटी नहीं थी, और फिर भी घंटी बज रही थी। और आवाज़ कह रही थी — तू अकेले नहीं उठाएगा।
सुबह मुझे किसी के हँसने की आवाज़ से नींद खुली।
टिंकू नीचे खड़ा था, गली में, और मेरी जंग लगी साइकिल की तरफ़ देखकर हँस रहा था।
"उस्ताद!" उसने चिल्लाकर कहा। "ये कबाड़ा बाहर क्यों खड़ा है? किसी को ठोकना है?"
मैंने करवट बदली और अपनी जेब टटोली।
घंटी वहीं थी। गरम, जैसे रात भर जागी हो।
और मैं मुस्कुराया।
"नहीं," मैंने नीचे चिल्लाकर कहा। "ये कबाड़ा नहीं है, टिंकू। ये मेरी नई साइकिल है। और इसका किराया बहुत भारी है।"
॥
"नई साइकिल है," मैंने खिड़की से नीचे चिल्लाकर कहा। "और इसका किराया बहुत भारी है।"
टिंकू ने मुँह बनाया, जैसे उसने मुझसे कोई बहुत बड़ा जवाब उम्मीद किया था और मैंने उसे और बड़ी उलझन दे दी।
"उस्ताद," उसने हाथ में पट्टी बँधा घुटना सहलाते हुए कहा, "किराया तो वो होता है जो हर महीने देना पड़ता है। ये तो एक बार का झटका है ना?"
मैं मुस्कुराया। ये लड़का सवाल ऐसे पूछता है जैसे कोई वकील जिरह कर रहा हो। और सच कहूँ तो कई बार इसके सवाल मुझे मेरे ही जवाब से ज़्यादा डराते हैं।
"टिंकू," मैंने कहा, "कुछ चीज़ें एक बार में ही पूरी ज़िंदगी का किराया वसूल कर लेती हैं।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि तू अभी छोटा है। तेरे लिए ये सिर्फ़ जंग लगी साइकिल है। मेरे लिए ये एक ऐसा किरायेदार है जो पहले महीने में ही मकान मालिक बनने की तैयारी कर रहा है।"
टिंकू हँसा। उसकी हँसी सुबह की गली में ऐसे फैली जैसे किसी ने पानी में कंकड़ मार दिया हो। दो-तीन दुकानों के शटर खुल रहे थे, कोई बाल्टी भर रहा था, कोई झाड़ू मार रहा था। मैंने साइकिल को दुकान के पीछे वाले कमरे से बाहर निकाला और घर की सबसे पुरानी दीवार की तरफ़ मुँह करके खड़ा कर दिया, ठीक जैसे कबाड़ी बूढ़े ने कहा था।
टिंकू ने गौर से देखा।
"उस्ताद, इसमें तो घंटी ही नहीं है।"
मेरी जेब में घंटी गरम हुई। जैसे किसी ने सुन लिया हो और कह रहा हो, चुप कर, बेवकूफ़।
"घंटी है," मैंने कहा। "बस इसने अभी फ़ैसला नहीं किया कि इसे कहाँ बैठना है।"
टिंकू ने सिर खुजाया और चला गया, ये कहकर कि उसकी माँ उसे दूध लाने भेज रही है और अगर वो देर की तो उसका कान गरम हो जाएगा। मैं उसके जाने के बाद साइकिल के हैंडल पर हाथ फेरता रह गया।
लोहे पर जंग की परत ऐसी थी जैसे किसी बूढ़े की ज़ुबान पर चुप्पी जम गई हो।
घर के अंदर से माँ की खाँसी आई। दो बार। फिर थोड़ी देर बाद तीसरी बार। मैंने आँख बंद की और मन में गिना — सुबह से ये चौथी खाँसी है।
तुम सोच रहे होगे कि चौथी खाँसी में क्या बड़ी बात है। भाई, जब घर में कोई बीमार हो और वो बीमारी अपनी क़ीमत काग़ज़ पर लिखकर लाती हो, तो हर खाँसी एक हिसाब की लाइन बन जाती है। मेरी जेब में एक पर्ची थी, जिस पर माँ ने अपने हाथ से एक आँकड़ा लिखा था, जो मेरी पूरी दुकान की महीने भर की कमाई से भी बड़ा था।
और पीछे एक लाइन — अंकुश को मत बताना।
मैंने वो पर्ची चार तह करके जेब में रखी हुई थी, बिल्कुल उसी जेब में जहाँ घंटी थी। दोनों एक साथ रहते थे, और मुझे लगता था कि दोनों एक-दूसरे से बात करते हैं, जब मैं सो जाता हूँ।
नाश्ते की मेज़ पर पापा चुप बैठे थे। रोटी के दो टुकड़े सामने रखे थे, और उन्होंने एक भी नहीं उठाया। चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ था, टेप पुराना होकर पीला पड़ गया था। हाथ में एक छोटी सी रेती थी, जिसे वो बिना वजह घुमा रहे थे।
कल रात उन्होंने कहा था — कल सब बताऊँगा।
मैंने कल का इंतज़ार किया। कल आ गया था, मेरी आँखों के सामने बैठा था, और कुछ नहीं बोल रहा था।
"पापा," मैंने कहा।
"हम्म।"
"कल आज हो गया।"
उन्होंने रेती घुमाना बंद किया। फिर उसे मेज़ पर रख दिया और उठकर हाथ धोने चले गए। जब लौटे तो माँ की तरफ़ देखा, माँ ने उनकी तरफ़ देखा, और बीच में जो बात थी वो दोनों की आँखों के बीच से होकर गुज़र गई, मेरे पास नहीं आई।
"शाम को," पापा ने कहा। सिर्फ़ इतना। दो शब्द। और फिर औज़ारों का थैला उठाकर बाहर।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा और कंधे उठा दिए। वो अपनी नर्सिंग की किताब खोल रही थी, उसकी उँगली पन्ने पर रुकी हुई थी, जैसे वो पढ़ रही हो और साथ में पूरा घर भी सुन रही हो।
"तू जानती है ना," मैंने धीरे से कहा।
"क्या?"
"जो मैं नहीं जानता।"
काजल ने किताब बंद की। उसका चेहरा एक पल के लिए बड़ा हो गया, फिर वो फिर से अठारह साल की हो गई।
"अंकुश भैया," उसने कहा, "मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि माँ की रिपोर्ट में दो टेस्ट और लिखे हैं, और माँ ने वो रिपोर्ट अपनी साड़ी के बक्से में रखी है, कपड़ों के नीचे। और मुझे इतना भी पता है कि अगर तूने वो रिपोर्ट देख ली, तो माँ को ये नहीं लगना चाहिए कि हम डर गए हैं।"
"और पापा?"
वो एक सेकंड रुकी।
"पापा के बारे में मुझे कुछ नहीं पता," उसने कहा, और उसका रुकना ही बता रहा था कि वो झूठ बोल रही है। पर उसका झूठ साफ़ था, बुरा नहीं था। घर के झूठ अक्सर ऐसे ही होते हैं — पतले, शर्मिंदा, और दोनों तरफ़ से जाने हुए।
मैंने उसे टोका नहीं। मैं उठकर दुकान की तरफ़ चल पड़ा, और रास्ते में पैर की उँगली से एक कंकड़ उछाला जो नाली के पुल पर जाकर गिरा।
दुकान पर उस सुबह एक पहिया था, एक चेन, और एक ट्यूब जिसे चार जगह से पैबंद लगाना था। मैंने हाथ लगाया तो पता चला कि उस सुबह मेरा मन किसी और जगह था। उँगलियाँ काम कर रही थीं, दिमाग़ नहीं।
उस्ताद अली बक्श की दुकान पर ताला लगा था। तीसरे दिन भी। उनकी सिलाई मशीन की टिक-टिक नहीं सुनाई दी, और सच कहूँ तो गली उस आवाज़ के बिना वैसे ही लग रही थी जैसे सुबह बिना अज़ान के।
मैंने शटर के नीचे से एक काग़ज़ खींचा। चार तह का, किसी अख़बार के कोने पर लिखा हुआ, बूढ़ी उँगली की सीधी-सादी लिखाई में।
लिखा था — घंटी जेब में रखना। आज किसी को मत दिखाना।
मैंने वो काग़ज़ दोबारा पढ़ा। फिर तीसरी बार। नीचे कोई नाम नहीं था। मगर गली में सिर्फ़ एक आदमी है जो इस तरह काग़ज़ मोड़कर छोड़ता है, और वो अभी तीन दिन से गायब है।
शबनम आपा की गुमटी पर भाप उठ रही थी। मैंने वहाँ खड़े होकर चाय माँगी। उन्होंने कप रखा, फिर मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरी जेब की तरफ़।
"सुना," उन्होंने कहा, "तूने मेले से एक कबाड़ खरीदा।"
"साइकिल है, आपा।"
"वही कह रही हूँ।"
मैं हँसा। शबनम आपा की ज़ुबान ऐसी है कि अगर वो तारीफ़ भी करें तो आदमी को लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है।
"आपा," मैंने धीरे से कहा, "पीछे के प्लॉट पर फिर ट्रक आए?"
उन्होंने चिमटी से एक समोसा उठाया और काग़ज़ पर रखा।
"रोज़ आ रहे हैं," उन्होंने कहा। "और रोज़ उनके साथ एक आदमी आता है, मोटा, गले में चेन, पान चबाता हुआ। वो यहाँ गिनती करता है — कितनी दुकानें हैं, किसका शटर कितना बड़ा है।"
"बबलू।"
"तू नाम लेना भी मत," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार धीमी हुई। "आज शाम मेला है। वो वहाँ होगा। देख लेना, किसी से उलझना मत।"
"मैं मेले में जा ही नहीं रहा," मैंने कहा।
पर सच ये था कि मैं जानता था कि जाना पड़ेगा। घंटी ने कहा था — वो औरत मुझे ठग समझेगी, और मुझे उससे भागना नहीं है। मुझे उस रात लगा था कि वो बूढ़ी कबाड़न होगी, या कोई ऐसी औरत जो सपनों में आकर हिसाब माँगती है।
मैं उस रात इस खयाल पर हँसा था। दिन में वो खयाल मुझ पर हँसने लगा।
दोपहर में काम के बीच एक अजीब बात हुई। एक आदमी अपनी साइकिल का हैंडल ठीक करवाने आया, और जब मैंने पैसे माँगे तो उसने कहा, "यार, तू तो अब बड़ा कारोबारी बन गया है। मेले में तेरा नाम चल रहा है।"
मेरा हाथ रुक गया।
"मेला? मेरे नाम का क्या है मेले में?"
वो हँसा। "मतलब तू नहीं जानता? कल शाम को जिसके यहाँ 'उस्ताद' का बोर्ड था, वहाँ अब 'चमत्कारी जोड़ी साइकिल' का बोर्ड लगा है। कहते हैं कोई औरत फ़ोटो खींच रही है और बोल रही है कि गली का एक पागल लड़का लोगों को झांसा देता है।"
वो आदमी हँसता हुआ चला गया। मैं दुकान के बाहर खड़ा रह गया, हाथ में ग्रीस लगा पोंछा, और मेरे अंदर एक बात बैठ गई — मैं तो कल पूरा दिन घर पर और मेले में था। मेरे नाम का बोर्ड मेले में किसने लगाया?
घंटी जेब में गरम हुई।
"कुछ कह," मैंने धीरे से कहा, मुँह दुकान के अंदर करके।
"ये डरता है," घंटी ने कहा।
"इतना तो मुझे भी पता है, कि लोग ऐसा बोर्ड लगाकर मुझे फँसाना चाहते हैं।"
"नहीं। वो डरता है।"
और फिर चुप।
ये घंटी भी कमाल की है। पूरी बात कभी नहीं कहती। अगर कोई आदमी ऐसे बोले तो उसे दो पैसे का दिमाग़ कहते हैं, पर ये पीतल का गोला जब ऐसे बोलता है तो आदमी सोचता है कि इसमें कोई गहरा भेद है।
शाम को मैंने मेले जाने का मन बनाया। माँ से झूठ बोला कि दुकान पर कुछ पुर्ज़े माँगने हैं। पापा अब तक घर नहीं लौटे थे। मैंने दरवाज़े से आधी बार देखा, फिर चला आया। अब मैं उनके इंतज़ार में बैठकर अपने ही दिल को घुटने देने के मूड में नहीं था।
बड़ा तालाब पर पहुँचते ही आवाज़ ने मुझे अंदर खींच लिया। ढोल की आवाज़, बच्चों की चिल्लाहट, झूले की चर्र-चर्र, और किसी की मिठाई की दुकान से बासी घी और ताज़ी जलेबी की खुशबू। लाइटें ऐसी जल रही थीं जैसे तालाब में आग लगी हो और वो पानी में उतर आई हो।
दरवाज़े पर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का वही बैनर लगा था — पीने के पानी की व्यवस्था, सहयोग से। और बैनर पर भारद्वाज जी का नाम ऐसे छपा था कि लगता था पानी उन्होंने खुद बहाया है, भगवान ने नहीं।
मैं कुछ क़दम चला ही था कि सामने से कुछ आया।
छोटा कद, कंधे तक कटे बाल, कंधे पर एक फटा बैग जिसकी सिलाई खुल रही थी, और हाथ में एक कैमरा जिसकी लेंस ढक्कन से ढकी थी। उसकी चाल में जल्दबाज़ी ऐसी थी कि लगा कि मेला उसकी तरफ़ भाग रहा है, वो नहीं।
उसने मेरे सामने माइक थमा दिया।
बिना नमस्ते। बिना नाम। बिना कि हम मिले हैं।
"तुम हो," उसने कहा, "जो लोगों को जोड़ने का झांसा देता है?"
मैंने माइक को देखा। फिर उसे। फिर माइक को।
"मैडम," मैंने कहा, "एक तो मेरा दो सौ का कच्चा कर्ज़ है, ऊपर से आपने माइक थमा दिया। इसे कहते हैं कर्ज़दार को और कर्ज़ देना।"
उसकी आँखें एक पल के लिए मुस्कुराईं, फिर तुरंत कड़ी हो गईं, जैसे उसने अपने चेहरे का ताला अंदर से बंद कर लिया हो।
"बकवास बंद करो," उसने कहा। "मेरा नाम मीरा तिवारी है। मैं 'बस्ती की आवाज़' चलाती हूँ। कल शाम इस मेले में तुम्हारे नाम का बोर्ड लगा था, और लोगों से पैसे लिए जा रहे थे — एक साइकिल ठीक करवाने का सौ रुपये, और जोड़ों को जोड़ने का पाँच सौ। कौन था वो? कितने पैसे लिए? किसने भेजा?"
मैं सन्न रह गया।
देखो, अगर कोई आदमी मुझसे पूछता कि मैंने किसी से पाँच सौ लिए हैं, तो मैं हँसकर कह देता कि भाई मेरी दुकान पर आज तक कोई पाँच सौ का नोट लेकर नहीं आया, बस एक आदमी ने बीस का सिक्का देकर पचास वापस माँगे थे और मैं वो किस्सा आज तक नहीं भूला।
पर ये औरत मेरे सामने खड़ी थी, कैमरा उसके हाथ में, और उसकी आवाज़ में गुस्सा सच्चा था। वो झूठ नहीं बोल रही थी। उसे सच में लग रहा था कि मैं वो आदमी हूँ।
"मैडम," मैंने कहा, "मैं साइकिल ठीक करता हूँ। इंसान नहीं।"
"इसी लाइन पर तुमने पैसे ठगे होंगे।"
"और आपका कैमरा मेरी शक्ल देखकर डर रहा है। लेंस का ढक्कन अभी तक नहीं खुला। आप सबूत इस तरह नहीं बनाएँगी, मैडम। कम से कम दुश्मन को तो अपना चेहरा दिखा दीजिए।"
मीरा ने ढक्कन खोला। इतनी ज़ोर से कि लगा कैमरा ही बोल देगा।
"तुम हँसी में सब टाल देते हो," उसने कहा। "मैं ये नहीं पूछ रही कि तुम कितने अच्छे हो। मैं ये पूछ रही हूँ कि इस मेले में वसूली किसके लिए हो रही है। मुझे वो काग़ज़ चाहिए, वो लोग चाहिए जिनसे पैसे लिए गए, और वो नाम चाहिए जिसने तुम्हारे बोर्ड पर अपना हाथ रखा।"
"मेरे बोर्ड पर?"
"तुमने अभी-अभी सुना नहीं? कल शाम। मेले में। तुम्हारी साइकिल के बोर्ड पर लिखा था, जोड़ों को जोड़ने वाला उस्ताद।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
मैंने आस-पास देखा। झूला, मिठाई, गुब्बारे, और मेले के कोने पर एक छोटी सी जगह जहाँ एक बोर्ड टेढ़ा-सा टिका था। मैं उसकी तरफ़ बढ़ा। मीरा पीछे-पीछे आई, कैमरा उठाए।
बोर्ड पर लिखा था — जोड़ों को जोड़ने वाला उस्ताद। पुराने रिश्ते, नई मरम्मत। एक सौ में।
और बोर्ड के नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, एक लाइन थी जो मैंने नहीं लिखी थी और जिसे मैं आज तक किसी को नहीं बताया।
वो लाइन थी — घंटी वाला मालिक।
मैंने अपनी जेब की तरफ़ हाथ बढ़ाया। घंटी ठंडी थी। बर्फ़ जैसी ठंडी।
"मैडम," मैंने धीरे से कहा, "ये बोर्ड मेरा नहीं है।"
"हर ठग यही कहता है।"
"हर ठग ये नहीं कहता कि उसका बोर्ड कौन लगा रहा है, ये जानने की ज़रूरत है। सुनिए, मैं आपको एक सच बताता हूँ। मेरी दुकान का बोर्ड तीन दिन पहले टूट गया था और मैंने उसे अभी तक ठीक नहीं किया। अगर मैं लोगों से पाँच सौ ले रहा होता, तो पहले वो बोर्ड ठीक करवाता। मुझे अपनी इज़्ज़त से ज़्यादा अपनी दुकान की सजावट की फ़िक्र है।"
मीरा ने कैमरा थोड़ा नीचा किया। एक इंच भर। पर मैंने देखा।
"तो मेले में कल शाम कौन था?"
"मैं नहीं।"
"तुम्हारी दुकान से किसका रिश्ता है?"
"मेरा। और मेरी माँ का। और मेरी बहन का। और मेरे पापा का। और उसमें किसी का पाँच सौ नहीं है।"
वो कुछ कहने ही वाली थी कि मेले की आवाज़ बदल गई।
तुम जानते हो मेले की आवाज़ कैसे बदलती है? एक आदमी आता है, और भीड़ का शोर उतना ही रहता है, पर उसमें एक चुप्पी घुल जाती है। लोग आँख नीची कर लेते हैं। दुकानदार अपना सामान कसकर पकड़ लेते हैं। ढोल बजता रहता है, पर ढोल बजाने वाला भी दबे हाथ से बजाता है।
मैंने मुड़कर देखा।
बबलू पांडे आ रहा था। मोटा शरीर, बाँहें शरीर से अलग चलती हुईं, गले में मोटी सोने की चेन जो हर क़दम पर उछलती थी। मुँह में पान। वो चलते हुए दाएँ-बाएँ थूकता जा रहा था, और लोग उस थूक से बचने के लिए रास्ता छोड़ रहे थे, जैसे वो ज़मीन पर नहीं, लोगों के दिलों पर पड़ रही हो।
उसके पीछे दो आदमी थे, जिनके हाथ खाली थे और जिनकी आँखें बातूनी थीं।
मीरा ने कैमरा तुरंत उठा लिया। उसकी आँखों में डर नहीं, भूख थी। पत्रकार की भूख।
"रुको," मैंने धीरे से कहा। "ये आदमी अभी सबसे ख़तरनाक मूड में है, क्योंकि इसके हाथ में कुछ नहीं है और इसे लगता है कि दुनिया उससे छीन रही है।"
"मैं यही तो ढूँढ रही हूँ," मीरा ने कहा और आगे बढ़ गई।
बबलू पहले मिठाई की दुकान पर रुका। दुकानदार ने बिना कुछ कहे एक लिफ़ाफ़ा उसके हाथ में रख दिया। फिर चूड़ियों वाले बूढ़े की गुमटी आई। वो बूढ़ा मेला शुरू होने से पहले ही आ जाता है, एक ही स्टैंड पर बैठा रहता है, कमर झुकी हुई, और हर चूड़ी की कीमत वो इस तरह बताता है जैसे अपनी बेटी का हाथ माँग रहा हो।
"काका," बबलू ने कहा, "इस हफ़्ते का?"
बूढ़े ने अपनी जेब से दस का एक नोट निकाला, फिर माफ़ी की तरह कहा, "भाई साहब, बारिश की वजह से दो दिन दुकान नहीं लगी। अगले हफ़्ते दोनों हफ़्ते का दे दूँगा।"
बबलू कुछ नहीं बोला। उसने पान का पीक थूका, फिर उस गुमटी की तरफ़ हाथ बढ़ाया जिस पर चूड़ियों के डिब्बे रखे थे।
और गुमटी उलट गई।
सैकड़ों चूड़ियाँ ज़मीन पर गिरीं। काँच की आवाज़ ऐसी उठी जैसे किसी ने हँसी को तोड़कर फेंक दिया हो। कुछ चूड़ियाँ नहीं टूटीं, वो ज़मीन पर लुढ़कती रह गईं, और वो लुढ़कना उस बूढ़े की ज़िंदगी का सबसे बुरा दिन था। बूढ़ा नीचे बैठ गया और दोनों हाथों से चूड़ियाँ समेटने लगा, बिना एक शब्द कहे।
लोगों ने देखा। सबने देखा। किसी ने कुछ नहीं कहा।
मेरे अंदर कुछ हुआ। मैं नहीं बता सकता कि वो गुस्सा था या वो शर्म जो दूसरों की बेइज़्ज़ती देखकर होती है। पर मेरे पैर खुद आगे बढ़ गए।
"भाई साहब," मैंने कहा, "हाथ धीरे। ये गुमटी इनकी रोटी है।"
चारों तरफ़ चुप्पी। मीरा का कैमरा मेरी तरफ़ घूम गया।
बबलू ने धीरे से मुड़कर देखा। जैसे कोई बड़ा जानवर ये तय कर रहा हो कि जो आवाज़ आई है, वो खाने की चीज़ है या नहीं।
"तू कौन है?"
"मैं साइकिल वाला हूँ। गली के मोड़ पर। आप मेरी दुकान के सामने से कई बार गुज़रे हैं। एक बार मेरे पंप से हवा भी भरी थी, और पैसे नहीं दिए थे। मैंने कुछ नहीं कहा था, क्योंकि मुझे लगा था कि आप भूल गए होंगे। पर अब लगता है आपको भूलने की बीमारी है, भाई साहब।"
भीड़ में कोई हँसा। बस एक। और बबलू का चेहरा बदल गया।
वो मेरे पास आया। उसका पेट मेरे पेट से टकराने की दूरी पर था। उसकी साँस में पान और तंबाकू की बदबू थी।
"साइकिल मिस्त्री," उसने कहा, "बहुत बोलने लगा है।"
"बोलना मेरा पेशा है, भाई साहब। जो ठीक नहीं होता, उसके बारे में बोलना पड़ता है। जो ठीक हो जाता है, उसके बारे में चुप रहता हूँ।"
उसका हाथ बढ़ा और मेरा गला पकड़ लिया।
मैं झूठ नहीं बोलूँगा — उस पल मेरे अंदर जो पहली चीज़ उठी, वो गुस्सा नहीं था। डर था। ठंडा, सीधा, बच्चों वाला डर। गला पकड़े जाने पर आदमी की आवाज़ छोटी हो जाती है, चाहे वो कितना ही बड़ा बोलने वाला हो।
पर मेरी जेब में घंटी थी।
और घंटी ने कहा।
इतना धीरे कि मुझे लगा मैंने सुना, और फिर लगा कि मैंने खुद सोचा।
"ये डरता है।"
मैंने बबलू की आँखों में देखा।
और मैंने देखा। उसकी पकड़ मज़बूत थी, पर उसकी आँखें मेरी आँखों से नहीं मिल रही थीं। वो मेरे कंधे के पीछे देख रहा था। भीड़ की तरफ़ नहीं — भीड़ के पीछे, मेले के दरवाज़े की तरफ़। जैसे उसे डर था कि कोई आ रहा है।
"भाई साहब," मैंने धीरे से कहा, गला दबा हुआ था, आवाज़ फट रही थी, "आप मुझे छोड़ दीजिए। मुझमें दम नहीं है। मैं दुबला आदमी हूँ, मेरे साथ ये ज़ुल्म अच्छा नहीं लगता।"
उसने पकड़ थोड़ी ढीली की, पर छोड़ा नहीं।
"सुन," उसने कहा, "तेरी दुकान की जगह पर एक बड़े साहब की नज़र है। वो जगह मोटी है। तेरी दुकान उस जगह पर ऐसे बैठी है जैसे हाथी के रास्ते में चींटी। समझा?"
"समझ गया। पर एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"वो बड़े साहब को मेरी दुकान में ऐसा क्या दिखा जो मुझे नहीं दिखा? क्योंकि मैं वहाँ तीन साल से बैठा हूँ और मुझे तो वहाँ सिर्फ़ तेल, ग्रीस और एक टूटी कुर्सी दिखती है।"
बबलू हँसा। पर उसकी हँसी में मज़ा नहीं था। उसने मेरा गला छोड़ दिया और मेरे कंधे पर हाथ रखकर धीरे से कहा, जैसे कोई भाई नसीहत दे रहा हो।
"तेरे जैसे लोग सोचते हैं कि दुकान ज़मीन पर खड़ी होती है। दुकान काग़ज़ पर खड़ी होती है, बेटा। और काग़ज़ किसी के हाथ में होता है। तेरे हाथ में क्या है? पेचकस?"
पीछे मीरा का कैमरा चल रहा था। मैंने उसे कोने से देखा — वो बिल्कुल स्थिर खड़ी थी, हाथ ऊपर, और उसके होंठ हिल रहे थे। बाद में मुझे पता चला कि वो उस वक़्त अपनी आवाज़ में क्या कह रही थी। वो कह रही थी — ये पहला सबूत है, ये पहला सबूत है, इसे नहीं जाने देना।
बबलू ने मेरी जेब की तरफ़ अनजाने में देखा। बस एक पल। फिर उसने अपना पान का पीक थूका, मेरे पैर से दूर, और कदम पीछे किया।
और फिर वो रुका।
ये चीज़ मुझे आज तक चुभती है। आदमी जब जाता है तो चला जाता है, पर ये आदमी रुका। मुड़ा। मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ आई जो अब तक नहीं थी — न गुस्सा, न धमकी। कुछ और। जैसे उसने कुछ देखा हो जो उसे नहीं देखना चाहिए था।
वो मेरे पास आया और बहुत धीरे से कहा, इतना धीरे कि मीरा का कैमरा भी नहीं पकड़ सका, और भीड़ के शोर में वो सिर्फ़ मेरे लिए था।
"अपनी उस जंग लगी साइकिल का हैंडल बदल लेना। वरना कोई उसे उखाड़कर फेंक देगा।"
मेरे पूरे शरीर से खून गिर गया।
उसने मेरे चेहरे का रंग देखा और हँसा। फिर अपने उन दो आदमियों के साथ मेले की दूसरी तरफ़ चला गया, और लोग उसके रास्ते से ऐसे बच रहे थे जैसे रास्ते से नहीं, किसी आफ़त से बच रहे हों।
मैं वहीं खड़ा रह गया।
जंग लगी साइकिल। मैंने वो साइकिल दो दिन पहले खरीदी थी। दो दिन। मैंने इसके बारे में किसी को नहीं बताया था, सिवाय अपने घर वालों के और टिंकू के।
और वो साइकिल घर के पीछे खड़ी थी।
मीरा मेरे पास आई। उसने कैमरा बंद किया और पहली बार माइक नीचे की।
"तुम ठीक हो?"
"हाँ।"
"झूठ। तुम्हारा चेहरा सफ़ेद है।"
"मेरा चेहरा हमेशा सफ़ेद है, मैडम। मैं दुकान के अंदर रहता हूँ, धूप नहीं मिलती।"
उसने आँख सिकोड़कर देखा। फिर उसने वही किया जो मुझे उससे उम्मीद नहीं थी। उसने अपना बैग खोला, उसमें से एक पानी की बोतल निकाली, और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"पी लो," उसने कहा। "और अब सच बताओ। वो तुम्हारे कान में क्या कहकर गया?"
मैंने पानी पिया। पानी गले में जाता हुआ, जहाँ उँगलियाँ थीं, वहाँ जल रहा था।
"मैडम," मैंने कहा, "आप पत्रकार हैं। आपको सबूत चाहिए। ये लीजिए सबूत — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के ट्रक तीन हफ़्ते से बाज़ार के पीछे वाले खाली प्लॉट में मिट्टी डाल रहे हैं। रात में। बिना बोर्ड के। पीछे क्या बन रहा है, ये मुझे नहीं पता। पर वो मिट्टी साफ़ प्लॉट में नहीं डाली जाती। वो मिट्टी नींव के लिए होती है।"
मीरा कुछ सेकंड मेरी तरफ़ देखती रही।
"तुम ये बात मुझे क्यों बता रहे हो?"
"क्योंकि आपने मुझे ठग कहा, और मुझे ठग बनने का शौक़ नहीं है। मैं चाहता हूँ कि आप अपना काम करें। मुझमें भरोसा नहीं है, ठीक है, मुझ पर भरोसा मत कीजिए। पर ट्रकों पर भरोसा कीजिए। वो रात में चलते हैं, और रात में चलने वाली चीज़ें हमेशा कुछ छिपाती हैं।"
उसने कैमरा बैग में रखा। उसका फटा बैग ऐसे लटका जैसे उसने अपनी पूरी ज़िंदगी उसमें ठूँस रखी हो।
"मैं तुम्हारे पीछे नहीं पड़ूँगी," उसने कहा। "पर अगर कल वो बोर्ड फिर लगा दिखा, तो मैं उस पर तुम्हारा चेहरा भी लगा दूँगी।"
"और अगर वो बोर्ड तीसरी बार कहीं और लगा दिखा," मैंने कहा, "तो आप मुझे फ़ोन कीजिए। मेरा नंबर शबनम आपा की गुमटी के पास लिखा है, उनके हिसाब वाली कॉपी के पीछे। मैं वहाँ उधार का हिसाब चुकाने जाता हूँ, तो नाम भी लिख देता हूँ।"
मीरा पहली बार मुस्कुराई। बहुत छोटी सी। एक सेकंड भी नहीं। फिर चली गई, भीड़ में, अपनी जल्दबाज़ी वाली चाल में।
मैं वहीं रुका रहा और मेले को देखता रहा। बूढ़ा अब भी चूड़ियाँ समेट रहा था। चारों तरफ़ काँच के टुकड़े चमक रहे थे, और मेले की लाइटों में वो रोशनी ऐसी लग रही थी जैसे ज़मीन पर तारे टूटकर गिरे हों।
मैं उसके पास गया और बैठ गया।
"काका," मैंने कहा, "ये चूड़ियाँ मुझे दीजिए। मेरी बहन है, उसे दे दूँगा।"
वो बूढ़ा मेरी तरफ़ देखने लगा। उसकी आँखें सूखी थीं, और यही सबसे बुरा था। रोने वाले आदमी को आदमी सहलाकर चुप करा सकता है। सूखी आँखों वाले को क्या करेगा?
"बेटा," उसने कहा, "ये सब टूटी हैं।"
"मुझे टूटी ही चाहिए," मैंने कहा। "मेरा पूरा काम टूटी चीज़ों का है।"
उसने मेरी तरफ़ देर तक देखा। फिर उसने चूड़ियों का एक बंद डिब्बा उठाया, जो गिरते वक़्त बच गया था, और मेरी झोली में रख दिया।
"पैसे नहीं लूँगा," उसने कहा।
"पैसे तो मैं दूँगा ही नहीं, काका," मैंने हँसकर कहा। "मैं तो इन्हें मुफ़्त ले जा रहा हूँ। पर एक दिन आप मेरी दुकान पर आइए, अपनी गुमटी का पहिया ठीक करवाइए। वो गुमटी हिलती है, मैंने देखा है। वो हिलती है तो आपका काम भी हिलता है।"
वो बूढ़ा पहली बार हँसा। उसकी हँसी में दाँत कम थे, पर आवाज़ भरी हुई थी।
मैं घर की तरफ़ चला।
रास्ते में घंटी जेब में ठंडी हो चुकी थी। मैंने पूरे रास्ते उसे टोका नहीं। मुझे गुस्सा था उस पर। उसने मुझे बताया था कि वो औरत मुझे ठग समझेगी, और उसने मुझे बबलू के बारे में एक शब्द नहीं बताया था। उसने मुझे वो बात नहीं बताई जो सबसे ज़रूरी थी।
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को उँगलियों में पकड़ लिया।
"सुन," मैंने धीरे से कहा, "तूने मुझे बताया था कि वो डरता है। पर ये नहीं बताया कि वो मेरी साइकिल का नाम लेगा।"
एक लंबी चुप्पी। फिर वैसी ही रूखी आवाज़, जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कुंडी खुल रही हो।
"मैंने तुझे बताया था कि वो डरता है," घंटी ने कहा। "ये तुझे समझना था कि डरा हुआ आदमी सबसे ज़्यादा देखता है।"
मैं चलता रहा। गली का मोड़ आया। पीतल की घंटी मेरी हथेली में गरम हो रही थी।
"अब सुन," घंटी ने कहा। "कल सुबह दुकान खोलना। कोई आएगा।"
"कौन?"
"जो अपनी चीज़ लेने आएगा। और उसके साथ एक बात लाएगा जो तेरे दुकान के बोर्ड से ज़्यादा भारी है।"
"और तू मुझे ये क्यों नहीं बता सकती पूरा?"
"क्योंकि मैं तेरा नौकर नहीं हूँ।"
मैं रुक गया और हँस पड़ा। रात की गली में मेरी हँसी किसी दरवाज़े से टकराकर लौटी।
"अच्छा," मैंने कहा, "पर एक बात और। आज तू मेरे साथ थी। तूने बबलू को देखा?"
घंटी एक पल चुप रही।
"देखा," उसने कहा। "और एक चीज़ और देखी।"
"क्या?"
"जब वो तुझे धमका रहा था, तब उसकी आँखें मेले के दरवाज़े पर थीं। किसी को ढूँढ रहा था। मतलब वो अकेला नहीं आया था, और जो उसके साथ आया था, वो सामने नहीं आया।"
मेरी हँसी मर गई।
"तू ये अब बता रही है?"
"अब समझ आई। इसीलिए बता रही हूँ।"
॥
रात के ग्यारह बज चुके थे और गली ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने उसका आवाज़ वाला बटन दबा दिया हो। दिन में यहाँ इतना शोर रहता है कि कान दुखने लगते हैं — चाय की केतली की सीटी, उस्ताद की सिलाई मशीन की टिक टिक, दो बच्चों की बहस कि पहले कौन बल्लेबाज़ी करेगा, और ऊपर से ट्रकों की घरघराहट जो पिछले कुछ हफ़्तों से हमारी गली का नया संगीत बन गई है।
पर रात में यही गली अजनबी लगती है।
मैं चल रहा था और मेरी चप्पल की आवाज़ भी मुझे अपनी नहीं लग रही थी। पीपल के पेड़ के नीचे पत्थर की चबूतरी खाली पड़ी थी। बुज़ुर्ग वहाँ दिन में बैठते हैं, चार बजे के बाद। उस वक़्त चबूतरी पर सिर्फ़ एक बंदर बैठा था, जो मुझे देखकर भाग गया — जैसे मुझसे भी कुछ पूछना नहीं चाहता।
मैंने उस्ताद की दुकान की तरफ़ देखा। तीसरे दिन भी ताला। मैंने शटर पर हाथ रखा तो धूल उँगलियों से चिपक गई। धूल का मतलब होता है कि कोई नहीं आया। न कोई खोला, न कोई बंद किया। बस शटर वैसे ही पड़ा है, जैसे कोई बात अधूरी छोड़कर चला गया हो।
"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा, "आप कहाँ हो?"
जवाब नहीं आया। और मुझे अजीब लगा कि जब जवाब की सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो, तब आसपास कोई नहीं होता। न उस्ताद, न पापा। दोनों आदमी हैं जो बोलते कम हैं, और आज दोनों ही गायब हैं।
मैं आगे बढ़ा। शबनम आपा की गुमटी पर एक लालटेन जल रही थी, बहुत धीमी। वो अभी नहीं सोई थी। मुझे देखकर खिड़की से बाहर झाँका और सिर्फ़ इतना कहा, "खाना खा लेना। तीन दिन से तेरा चेहरा भूखा लग रहा है।"
मैंने हाथ जोड़े और आगे बढ़ गया। यही तो हमारी गली है। यहाँ कोई आपसे पूछता नहीं कि तुम ठीक हो क्या। यहाँ लोग सीधे खाना दे देते हैं और यह मान लेते हैं कि तुम समझ जाओगे।
घर का दरवाज़ा खुला था। माँ का ढंग है — जब तक आख़िरी बच्चा घर न आए, दरवाज़ा बंद नहीं होता। पिछवाड़े में मैंने साइकिल खड़ी की। उस पुरानी जंग लगी साइकिल को मैंने घर की सबसे पुरानी दीवार की तरफ़ मुँह करके खड़ा किया, जैसे कबाड़ी बूढ़े ने कहा था। और आज पहली बार मुझे लगा कि वो सलाह सिर्फ़ सलाह नहीं थी। वो कुछ और थी जो मैं अभी समझ नहीं पा रहा था।
जब मैंने हैंडल छोड़ा, तो साइकिल की जंज़ीर हल्की सी खड़खड़ाई। मैंने उसे देखा। धूप में तपी हुई, जंग से भरी, हैंडल पर वो खाली लकड़ी का ब्रैकेट, जहाँ पहले घंटी बैठती थी। उस ब्रैकेट को देखकर मुझे रोज़ ऐसा लगता था जैसे किसी के सिर से ताज उतारकर अलग रख दिया गया हो।
अंदर आया तो माँ हिसाब की कॉपी पर झुकी हुई थीं। उनका चश्मा नाक पर फिसला हुआ था, और उँगली काग़ज़ पर ऐसे चल रही थी जैसे कोई गिनती भूल गया हो और दोबारा गिन रहा हो। सामने वाले कोने में पापा बैठे थे। वो कुछ नहीं कर रहे थे। बस बैठे थे। उनके हाथ में एक पुराना पेचकस था जिसे वो घुमा रहे थे, बिना किसी औज़ार पर लगाए। काजल नर्सिंग की किताब खोलकर बैठी थी, पर उसकी आँखें पन्नों पर नहीं थीं।
मुझे देखकर माँ ने चश्मा उतारा।
"खाना रखा है," उन्होंने कहा। "ठंडा हो गया है। गरम कर दूँ?"
और मुझे उस वक़्त कुछ ऐसा सूझा जो मुझे नहीं सूझना चाहिए था। थकान थी, दिन भर का गुस्सा था, बबलू का हाथ गले पर था, मीरा का माइक सामने था, उस्ताद की बंद दुकान थी, और पापा वहाँ बैठे थे — पूरे दिन घर नहीं आए थे, और अब आए हैं तो कुछ नहीं बता रहे।
तो मैंने जेब से घंटी निकाल ली।
पीतल की वही घंटी। पुरानी, घिसी हुई, ऊपर की तरफ़ एक छोटी सी दरार, जो सिर्फ़ अच्छी रोशनी में दिखती है। मैंने उसे हवा में उठाया और हँसते हुए कहा, "पापा, ये घंटी बोलती है। सच में बोलती है। आप आज से सुन लीजिए। आपकी चुप्पी का इलाज मिल गया है।"
मैंने यह इसलिए कहा कि मैं हँसाना चाहता था। मैं यह चाहता था कि पापा सिर उठाएँ, झिड़कें, कहें कि पागल हो गया है, और फिर माँ हम दोनों को डाँटे और घर में कुछ आवाज़ हो। मुझे बस आवाज़ चाहिए थी। उस वक़्त मुझे यह नहीं पता था कि आवाज़ के लिए उठाया गया यह हाथ मेरे घर में क्या कर देगा।
पापा नहीं हिले। एक सेकंड नहीं हिले। फिर उनकी नज़र मेरी ओर से हटकर उस घंटी पर पड़ी।
और फिर जो हुआ, वो मैं आज तक भूल नहीं पाया।
उनका पेचकस उनके हाथ से छूटा। फ़र्श पर गिरा, एक बार उछला, दो बार घूमा, और रुक गया। पापा का चेहरा ऐसा हो गया जैसे किसी ने उनके सीने पर पत्थर रख दिया हो और वो साँस लेने के लिए मुँह खोल रहे हों, पर साँस न आ रही हो। उनकी आँखें घंटी पर टिकी रहीं। बहुत देर तक। इतनी देर तक कि माँ ने कॉपी बंद कर दी और काजल की किताब उसके हाथ से फिसल गई।
"पापा?" मैंने कहा।
वो नहीं बोले। वो उठे। उठते वक़्त उनका हाथ मेज़ पर टिका और मेज़ की एक टाँग हिली — हमारी मेज़ की लोहे की टाँग आज भी हिलती है, मैं तीन महीने से उसे ठीक करने की सोच रहा हूँ।
वो पिछवाड़े की तरफ़ चले।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी नज़र में एक अजीब सी चीज़ थी — डर नहीं, डर से एक कदम आगे की चीज़। जैसे उसे कुछ पता हो और वो मुझे बता न पा रही हो।
"मैंने कुछ गलत कहा?" मैंने पूछा।
"नहीं," काजल ने धीरे से कहा। "तूने कुछ गलत नहीं कहा।"
माँ उठीं और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं। वो हर समय गरम रहती हैं — चूल्हे के पास ज़िंदगी बिताने वाली औरत के हाथ ठंडे कैसे हो सकते हैं, ये आज पहली बार समझ आया।
"इधर आ," उन्होंने कहा। "खाना लगाऊँ।"
"माँ, पापा बाहर गए हैं —"
"वो आ जाएँगे।" उनका हाथ मेरी कलाई पर सख़्त हो गया। "बात बढ़ाने की ज़रूरत नहीं है, अंकुश। खाना ठंडा हो रहा है।"
मैं पिछवाड़े के दरवाज़े से बाहर झाँक सकता था। दरवाज़ा खुला था। बाहर अंधेरा था और उस अंधेरे में पापा खड़े थे।
मैंने चुपचाप झाँका।
वो साइकिल के ठीक सामने खड़े थे। हाथ नीचे लटके हुए। सिर झुका हुआ। मुझे ऐसा लगा जैसे वो किसी से बात कर रहे हैं, पर उनके होंठ नहीं हिल रहे थे। बस वो उसे देख रहे थे। उस जंग लगी, टूटी, खड़खड़ाती साइकिल को देख रहे थे, जिसे मैंने दो दिन पहले मेले में एक चुपचाप बैठे कबाड़ी बूढ़े से दो सौ रुपये में खरीदा था।
और फिर मैंने देखा कि उनके कंधे हल्के से काँप रहे हैं।
बहुत हल्के से। इतने हल्के से कि अगर मैं ठीक से न देखता तो पता भी न चलता। पापा पचपन साल के हैं और मैंने उन्हें कभी रोते नहीं देखा। एक बार मेरी उँगली कट गई थी, बहुत खून बहा था, तब भी वो चुपचाप पट्टी बाँधकर चले गए थे। माँ की तबीयत खराब होती है तो वो बाहर जाकर खड़े रहते हैं। यही उनका रोना है।
पर आज कंधे काँप रहे थे।
मैं आगे नहीं बढ़ा। आज तक मुझे इस बात का एहसास है कि उस रात मैं आगे क्यों नहीं बढ़ा। शायद डर से। शायद इसलिए कि अगर मैं उनके पास जाता और वो मुड़कर देखते, तो मुझे कुछ कहना पड़ता। और मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
माँ ने मुझे खींचकर अंदर कर दिया और दरवाज़ा आधा बंद कर दिया।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया।
थाली में रोटी रखी। रोटी वो वाली, जो वो हमेशा मेरे लिए बनाती हैं — किनारों पर ज़्यादा सिंकी हुई, क्योंकि मुझे वो ख़ास पसंद है और मज़ाक करने पर वो कहती हैं कि मेरी शक्ल बर्बाद हो गई है, सारा सुख जले हुए किनारों में है। आज वो किनारे भी मुझे जले हुए लग रहे थे।
काजल ने मेरे सामने बैठकर अपनी थाली खींच ली। वो कुछ नहीं बोली। और काजल का कुछ न बोलना — ये सबसे बड़ा ख़तरा है। वो दिन में चौदह बार मेरी हँसी उड़ाती है, मेरी जीन्स के घुटने पर टिप्पणी करती है, मेरे ग्रीस लगे हाथों पर चिढ़ती है। आज वो चुपचाप रोटी को टुकड़ों में तोड़ रही थी।
मैंने एक रोटी उठाई और मज़ाक करना चाहा।
"अरे, इतना सन्नाटा क्यों है? क्या कोई मुर्दे की नींद खराब हो गई है? मैं तो —"
"खा।" माँ ने कहा।
बस इतना। एक शब्द।
मैं खा गया।
और मुझे अपनी ही आवाज़ अजीब लगने लगी। मैंने अपनी हँसी पर झूठ बोलना छोड़ दिया — बोलता हूँ, पर उस रात लगा कि मैं हँस नहीं रहा, सिर्फ़ ऐसा दिखा रहा हूँ। जैसे किसी बंद कमरे में सिग्नल न आ रहा हो और फ़ोन की स्क्रीन पर सिर्फ़ एक काला घेरा घूम रहा हो।
पाँच मिनट बाद पापा अंदर आए।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। अपनी थाली उठाई, घुटनों के बल नीचे बैठे, और खाने लगे। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं। चश्मा आज भी कान पर टेप से बँधा था। वो टेप का रंग पीला पड़ चुका है, वो उसे दो साल से बदलने की सोच रहे हैं।
खाने के बाद काजल ने बर्तन उठाए। माँ कॉपी के पास लौट गईं। पापा वहीं दीवार से टिककर बैठ गए और अपनी हथेलियाँ घुटनों पर रखकर उन्हें देखने लगे, जैसे दूसरे के कुछ हो गया हो।
मैं चुपचाप उठा।
छत पर गई हुई हवा थी। हमारे घर की छत छोटी है, पर रात में वहाँ से पूरी गली दिखती है — चबूतरी, नल, पुल, और आगे नई बस्ती की रोशनी। मैं वहाँ बैठ गया और जेब से घंटी निकाल ली।
"सुन," मैंने धीरे से कहा। "आज तू चुप क्यों है?"
घंटी ने लंबा वक़्त लिया। इतना लंबा कि मुझे लगा वो आज बोलेगी ही नहीं। फिर वही रूखी आवाज़ आई, जैसे किसी पुराने लोहे के दरवाज़े की सिटकनी।
"क्योंकि आज घंटी नहीं, तेरे पापा की बारी है।"
"इसका मतलब क्या हुआ?"
"इसका मतलब हुआ कि आज रात तुझे बोलने वाला मैं नहीं हूँ।"
"तू पहले भी यही कह रही थी कि कुछ मत पूछ। तू मुझे कुछ नहीं बताती।"
"मैं तुझे वो बताती हूँ जो तुझे सुनना चाहिए। सुनना वो नहीं होता जो तुझे अच्छा लगे।"
मैंने घंटी को हथेली में दबाया। गरम हो रही थी।
"आज पापा को देखकर ऐसा लगा कि उनको मेरे हँसने का मन नहीं था," मैंने कहा। "पर मैं हँसता रहा। आदत है।"
घंटी चुप रही। शायद वो इस बात से सहमत थी। शायद उसे कहना नहीं था।
नीचे से काजल आई। वो छत के दरवाज़े पर खड़ी रही, फिर आकर मेरे पास बैठ गई। उसने अपने घुटनों को गले से लगाया।
"वो सच में बोलती है?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"और क्या बोलती है?"
"कभी कुछ नहीं। कभी आधी बात। मुझे लगता है वो मुझसे ज़्यादा जानती है और मुझे कम बताती है।"
काजल ने घंटी को देखा पर छुआ नहीं। वो अंदर से साफ़-सुथरी है, मेरी बहन। जो चीज़ रखी है वो अपनी नहीं उठाती।
"अंकुश," उसने कहा, "तूने माँ की पर्ची पढ़ ली है ना?"
मैं चौंका। मैंने पापा को बताया था, किसी को नहीं। पर माँ की बातें पढ़ने वाला मेरा चेहरा सबसे पहले काजल ही पढ़ लेती है।
"कैसे पता?"
"तेरा चेहरा। तू सुबह से ऐसे घूम रहा है जैसे किसी ने तेरे साइकिल से हवा निकाल दी हो।" उसने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। "जिस रकम के बारे में मैं तुझसे झूठ नहीं बोल सकती, वो मैंने तुझसे छुपाई थी। पापा ने छुपाया। माँ ने छुपाया। सब एक ही डिब्बे में बैठे किसी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं और नतीजा ये है कि कोई किसी से बोल नहीं रहा।"
"तूने मुझसे क्यों नहीं कहा?" मैंने पूछा। गुस्से में नहीं, थकावट में।
"क्योंकि माँ ने कहा था कि तू अपनी सारी कमाई उसी पर लगा देगा और फिर हम सब एक साथ डूबेंगे।"
मैं हँसा। छोटी, सूखी हँसी।
"और ऐसे हम डूब नहीं रहे?"
काजल ने जवाब नहीं दिया।
थोड़ी देर बाद वो उठी और दरवाज़े की तरफ़ गई। फिर रुकी, और बिना मुड़े बोली, "एक बात कहूँ?"
"कह।"
"पापा से पूछ लेना।" उसकी आवाज़ भारी हो गई। "मैं जानती हूँ कि तू सब अकेले सँभालने की ज़िद करता है। पर कभी कभी सबसे बड़ी मर्दानगी ये होती है कि तू बैठकर पूछ ले कि सच क्या है।"
वो चली गई।
मैं वहीं बैठा रहा। घंटी जेब में डालकर सीढ़ियों से नीचे उतरा। घर सो रहा था। माँ का चूल्हा ठंडा था। हमारे घर में चूल्हा सुबह पाँच बजे जलता है और उस वक़्त से पूरा घर उसी आग पर चलता है। कभी सोचता हूँ कि माँ के हाथ इतनी मेहनत करते हैं और उनकी रिपोर्ट में बस एक आँकड़ा लिखा होता है जो हमारी पूरी ज़िंदगी तय कर देता है।
मैंने अपना बिस्तर खोला। चटाई पर लेटा। आँखें बंद कीं।
बाहर गली में कोई कुत्ता तीन बार भौंका और फिर चुप हो गया। पिछवाड़े से कोई आवाज़ नहीं आई। मुझे लगा पापा सो गए होंगे।
लेकिन मेरी नींद नहीं आई।
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को हथेली में दबा लिया। ठंडी थी। फिर उसकी ठंडक मेरी हथेली से मिलकर गरम होती गई।
और मैं जिस चीज़ के बारे में सोचना नहीं चाहता था, वो आ गई।
मैंने सोचा — मैं दिन भर टूटी चीज़ें ठीक करता हूँ। पंचर, चेन, ब्रेक की रस्सी, हैंडल, सीट, गियर, किसी का कटा हुआ तार। लोग मेरे पास ऐसी चीज़ें लेकर आते हैं जो दो रुपये की होती हैं और उन्हें ठीक कराने के लिए तैयार हो जाते हैं। पर एक चीज़ है जो टूटी पड़ी है और जिसे किसी ने ठीक कराने की कोशिश नहीं की।
वो मेरा ही घर है।
इसमें सब कुछ है — दीवार, छत, चूल्हा, दो कमरे, इतनी जगह कि दो लोग बिना टकराए चल सकें। पर अंदर से एक-एक चीज़ की जोड़ निकल गई है। माँ के हाथ हर काम करते हैं पर वो अपनी रिपोर्ट कपड़ों के नीचे छुपा देती हैं। पापा रोज़ काम पर जाते हैं और रोज़ वहीं बैठकर ख़ुद को तोड़ते हैं और बोलते नहीं। काजल इतनी छोटी है और उसने अपनी उम्र से दो गुना वज़न उठा लिया है। और मैं — मैं सबके सामने हँसता हूँ।
मैंने आँखें खोलीं और छत को देखा।
उस पल मुझे लगा कि अगर मेरा घर भी एक साइकिल होती, तो वो पिछवाड़े में खड़ी उस जंग लगी साइकिल जैसी होती। हैंडल टेढ़ा, चेन ढीली, और घंटी वाला ब्रैकेट खाली। और कोई जानने वाला भी नहीं कि इसमें क्या कमी है, क्योंकि हर कोई उसे देखकर कहता है — चल तो रही है ना।
घंटी ने हथेली में हल्की सी गरमाहट दी। कुछ नहीं बोली।
मैंने उसे जेब में दबाया और करवट ले ली।
कुछ देर बाद नींद की एक झपकी आई। ऐसी झपकी जिसमें सब कुछ अधूरा रहता है — मेले की लाइटें, मीरा का माइक, बबलू का पान चबाता चेहरा, और उसके पीछे दरवाज़े पर खड़ी एक परछाई जिसका चेहरा नहीं दिखता।
फिर आवाज़ आई।
ऊँची नहीं। बहुत ठंडी भी नहीं। पर ऐसी कि नींद एक झटके में कट गई, जैसे किसी ने तार खींच लिया हो।
"ये साइकिल तू कहाँ से लाया, अंकुश?"
पिछवाड़े से आई थी। पापा की आवाज़।
मैं उठकर बैठ गया।
आधी रात थी। घर में सब सो रहे थे। माँ के साँस की आवाज़ सुनाई दे रही थी — वही खाँसी वाली साँस, जो रात में थोड़ी और भारी हो जाती है। काजल की चूड़ियों की आवाज़ नहीं थी, यानी वो सो गई थी।
और पापा पिछवाड़े में थे। अंधेरे में। साइकिल के सामने।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। बिल्कुल ठंडी, जैसे हमेशा से ठंडी रही हो।
मैंने पूछना चाहा — कुछ कहूँ?
वो चुप रही।
मैंने दरवाज़े का नाम सुना। मैं खड़ा हुआ। मेरे घुटने में एक दर्द उठा, वही जो हमेशा रहता है जब मैं घबराता हूँ।
और उस रात, दरवाज़े की तरफ़ जाते वक़्त, मेरे दिमाग़ में एक ही बात थी —
कि मैंने उस्ताद से पूछा था कि साइकिल घर के किसी पुराने कोने में रखो।
कबाड़ी बूढ़े ने कहा था कि साइकिल को घर की सबसे पुरानी दीवार की तरफ़ मुँह करके खड़ा करना।
और आज आधी रात को मेरे पापा उसी साइकिल के सामने खड़े होकर पूछ रहे थे कि मैंने उसे कहाँ से लाया।
मैंने दरवाज़ा खोला।
बाहर अंधेरे में पापा खड़े थे, और उनके हाथ में एक पुराना, जंग लगा, छोटा सा पीतल का टुकड़ा था — जो दिखने में ठीक मेरी जेब वाली घंटी के ब्रैकेट से मिलता था।
॥
पीतल का टुकड़ा उनकी हथेली में था और उस पर आँगन की उस अकेली बल्ब की पीली रोशनी पड़ रही थी, जो रात में कभी-कभी अपने आप झपक जाती है।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। मैंने कुछ नहीं कहा।
पापा साइकिल के सामने खड़े थे। उनका एक हाथ हैंडल पर था। और वो उसे पकड़ नहीं रहे थे — वो उसे छू रहे थे। जैसे कोई बहुत पुराने ज़ख़्म को छूता है, धीरे-धीरे, ये देखने के लिए कि अब भी दर्द होता है या नहीं।
मुझे लगा कि कमरे में हवा भारी हो गई है।
"पापा?"
वो नहीं हिले। उनका हाथ हैंडल पर वैसे ही टिका रहा, उँगलियाँ रबर के उस घिसे हुए हिस्से पर, जहाँ से पकड़ते-पकड़ते रंग उतर गया था और अंदर का काला लोहा दिखने लगा था।
"ये साइकिल तू कहाँ से लाया, अंकुश?"
आवाज़ वही थी, पर कुछ बदला हुआ था। सुनने में लगा जैसे वो सवाल पूछ नहीं रहे, किसी पुराने काग़ज़ को खोल रहे हैं।
मैंने गला साफ़ किया।
"मेले से, पापा। एक कबाड़ी बैठा था, चुप्पा-चुप्पा। दो सौ में दे दी। मैंने सोचा — इतने में तो सिर्फ़ पहिया मिलता है बाज़ार में।"
पापा चुप रहे।
"और देखिए, चलती भी है। बस चेन ढीली है, ब्रेक की रस्सी बदलनी है, और पिछला मडगार्ड थोड़ा टेढ़ा है। कल दो घंटे लगेंगे, एकदम नई जैसी।"
मैं बोलता जा रहा था। मुझे पता था कि मैं बोलता जा रहा हूँ क्योंकि अगर मैं रुक गया तो उनकी चुप्पी मुझ पर गिर पड़ेगी।
"अंकुश।"
"जी?"
"मैंने पूछा — कहाँ से लाया।"
मैंने एक साँस ली।
"और मैं सोच रहा था, पापा, कि इसके पुर्ज़े बेचकर माँ की जाँच करवा दूँगा। हैंडल अलग, सीट अलग, पहिए अलग — कबाड़ी बाज़ार में इन्हीं पुराने पुर्ज़ों के अच्छे दाम मिलते हैं। दो टेस्ट बाकी हैं ना? उसके पैसे…"
मैंने बात अधूरी छोड़ दी, क्योंकि पापा ने हाथ हैंडल से हटा लिया था और मेरी तरफ़ देखा था।
और मैं क्या बताऊँ तुम्हें, उनकी आँखों में उस वक़्त क्या था। डर नहीं था, गुस्सा नहीं था। कुछ ऐसा था जैसे कोई आदमी बरसों बाद अपना ही पुराना खत पढ़ रहा हो, और खत में उसकी अपनी लिखाई हो।
"इसे मत बेचना।"
बस इतना कहा। दो शब्द।
और फिर वो मुड़े और अंदर चले गए। दरवाज़ा खुला रह गया, और हवा ने उसे धीरे से हिलाया।
मैं आँगन में अकेला खड़ा रह गया।
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"मत बेचना।" मैंने खुद से कहा, आवाज़ में वो ज़हर जो रात में थोड़ा और तेज़ हो जाता है। "बस? बस इतना? और माँ के टेस्ट का पैसा? और वो काग़ज़ जो कोई बार-बार दरवाज़े के नीचे से सरका रहा है? और वो बबलू जो मेरे मुँह पर बोल गया कि मेरी दुकान की जगह पर किसी की नज़र है?"
चुप्पी।
"मत बेचना। बहुत बढ़िया, पापा। मत बेचना। कुछ नहीं बेचना। कुछ नहीं कहना। कुछ नहीं करना। बस बैठे रहना और देखना कि सब अपने आप टूटता जाए।"
मैंने पत्थर पर लात मारी। पत्थर दीवार से टकराया और उछलकर साइकिल के पैडल पर लगा, और घंटी झनकी — एक छोटी, धातु वाली आवाज़।
मैं रुक गया।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी वहाँ नहीं थी। मैं उसे जेब में रखना भूल गया था, वो साइकिल के हैंडल पर टँगी थी, जहाँ मैंने उसे सबसे पहले टाँगा था।
मैं उसके पास गया और मेरी नज़र साइकिल पर पड़ी।
और पहली बार मैंने उसे ध्यान से देखा।
आधी रात में, पीली बल्ब की रोशनी में, जब आस-पास कुछ नहीं था और देखने के सिवा कोई काम नहीं था।
सीट की चमड़ी सामने से नहीं, पीछे से ज़्यादा घिसी थी। जैसे सवार हमेशा आगे खिसककर बैठता हो। हैंडल के दोनों सिरों पर रबर घिसा था, पर बाएँ हाथ की तरफ़ थोड़ा ज़्यादा — क्योंकि कोई आदमी एक हाथ से सीटका और दूसरे से हैंडल पकड़ता होगा। पैडल का रबर दाएँ तरफ़ से ज़्यादा घिसा था। पिछले मडगार्ड पर एक गहरा बेंचा हुआ गड्ढा था, जैसे एक ही जगह पर बरसों एक ही ताले की चोट पड़ती रही हो।
और फ्रेम पर, पीछे की तरफ़, मैंने उँगली से धूल हटाई तो नीले रंग की एक पतली पट्टी दिखी, जिस पर कोई चीज़ लिखी थी और सब मिट चुका था।
मैंने हाथ पीछे कर लिया।
क्योंकि अचानक मुझे समझ आ गया कि पापा ने पूछा नहीं था कि मैंने इसे कहाँ से लिया।
उन्होंने पूछा था कि मैंने इसे कहाँ से लाया — और जवाब सुनकर चुप हो गए। जैसे जवाब उन्हें पहले से पता था। जैसे वो इस चीज़ का इंतज़ार कर रहे थे।
मैंने घंटी पकड़ी और उसे हिलाया।
"बोल।"
कुछ नहीं।
"अरे, अब क्या चुप हो गई? कल रात तो खूब बोल रही थी। मुझे नल पर घसीटकर ले गई थी।"
घंटी ठंडी थी, जैसे किसी ने उसे बर्फ़ में रखकर छोड़ दिया हो।
"ठीक है। तेरी मर्ज़ी।"
मैंने उसे जेब में ठूँसा और अंदर चला गया, और तब मुझे पता चला कि मुझे नींद नहीं आएगी। मैं करवट बदलता रहा, और छत पर उसी बल्ब की रोशनी का एक पीला धब्बा नाचता रहा, और मेरे दिमाग़ में पापा का वो एक वाक्य घूमता रहा — इसे मत बेचना।
सुबह मैंने आँख खोली तो पाँच बजे थे। माँ के चूल्हे की आवाज़ आ रही थी, और उसके साथ वही खाँसी, जो अब सुबह भी थोड़ी देर रुकती है।
मैं उठा और बाहर गया।
काजल बाल बाँधते हुए रसोई में खड़ी थी, हाथ में नर्सिंग की किताब दबाए। माँ चूल्हे पर रोटी डाल रही थीं, और उनका कंधा थोड़ा झुका हुआ था।
"आज जल्दी क्यों?" माँ ने पूछा। "चाय पी ले।"
"पी लूँगा।"
काजल ने मुझे देखा और आँखें सिकोड़ीं।
"भैया, आपकी आँखें लाल हैं। रात में क्या हुआ था? मुझे आवाज़ आई थी, आँगन की तरफ़।"
"कुछ नहीं। साइकिल का स्टैंड लग रहा था, वो गिर गई थी।"
"आधी रात को साइकिल का स्टैंड लगाने कौन जाता है?"
"मैं जाता हूँ। मेरा पेशा है।"
वो हँस पड़ी, पर उसकी हँसी में वो चीज़ थी जो बड़ी बहनों की हँसी में नहीं होती और छोटी बहनों की हँसी में होती है — थोड़ा डर।
मैंने जेब से घंटी निकाली और उसकी तरफ़ बढ़ा दी।
"ये पकड़।"
"ये क्या है?"
"घंटी है। साइकिल की।"
"तो?"
"बजा।"
"क्यों?"
"बस बजा। दो बार।"
उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने उससे कहा हो कि जाकर आसमान से चाँद तोड़ लाओ। फिर उसने घंटी ली और दो बार बजाई।
टन। टन।
साधारण आवाज़। वो आवाज़ जो हर साइकिल की घंटी करती है। जिससे किसी की नींद नहीं उड़ती, किसी का दिल नहीं डूबता, कुछ नहीं होता।
"हुआ क्या?" उसने पूछा।
"तीन बार बजा।"
उसने तीन बार बजाई।
टन। टन। टन।
कुछ नहीं हुआ। माँ ने चूल्हे से कहा, "अब सुबह-सुबह घंटी क्यों बज रही है? काजल, छोड़ दे उसे।"
काजल ने घंटी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"लो। मरम्मत कर लो, आवाज़ में लगता है थोड़ा पानी घुसा है।"
मैंने घंटी अपने हाथ में ली।
और जैसे ही मेरी उँगली उसके ऊपर के पीतल के ढक्कन पर टिकी, मैंने उसे बजाया।
टन।
और आवाज़ आई।
"तू अब भी सोचता है कि ये सब तेरे दिमाग़ में है?"
मैं जैसे जम गया।
आवाज़ वही थी। रूखी। छोटी। बिना जल्दबाज़ी। और उसमें वो चीज़ थी जो लोग तब बोलते हैं जब वो जानते हैं कि तुम अभी मानने वाले नहीं हो।
काजल रोटी का डिब्बा खोल रही थी।
"भैया, क्या हुआ? ऐसे देख रहे हो जैसे कोई भूत देख लिया हो।"
"तूने सुना?"
"क्या सुना?"
"कुछ नहीं।"
"क्या सुना, भैया?"
"मैंने कहा कुछ नहीं, काजल।"
वो रुकी। उसने डिब्बा बंद किया और मेरी तरफ़ आई, और मेरे माथे पर हाथ रखा।
"भैया, तुम कम सो रहे हो। तुम दो रात से ठीक से नहीं सोए। और सुबह तुम्हारा चेहरा ऐसा लग रहा है जैसे कोई काम अधूरा छूट गया हो।"
"काजल।"
"हाँ?"
"तू अगर कोई चीज़ बजाए और उसके अंदर से कोई बोले, और मुझे सुनाई न दे — तो तू क्या करेगी?"
वो एक पल रुकी। फिर उसने मेरी आँखों में देखा और बोली, "मैं सबको बता दूँगी। और सबको बताने से पहले मैं ये देखूँगी कि मुझे क्या सुनाई दिया था — क्योंकि अगर सिर्फ़ मुझे सुनाई दे रहा है, तो शायद मुझे ही कुछ सुनना है।"
मुझे उसकी बात समझ नहीं आई और ठीक उसी वक़्त मुझे यह भी समझ आ गया कि वो सही बोल रही है।
माँ ने आवाज़ दी, "काजल, अब देर हो रही है, खाना रख दे।"
मैंने घंटी जेब में रखी।
और जब मैं बाहर निकल रहा था, मेरे दिमाग़ में एक बात ठीक से बैठ गई, जैसे कोई पेंच आख़िरी चक्कर में जाकर बैठ जाता है।
काजल ने घंटी तीन बार बजाई। उसके हाथ में कुछ नहीं हुआ।
मैंने एक बार बजाई और आवाज़ आ गई।
यानी ये चीज़ सिर्फ़ मेरी आवाज़ पहचानती है।
और ये बात मुझे किसी चमत्कार जैसी नहीं लगी। ये बात मुझे ऐसी लगी जैसे कोई कह रहा हो — भाई, तेरे सिवा कोई नहीं है। तू अकेला है इस चीज़ में।
और मैंने उस सुबह पहली बार सोचा कि अगर ये सब सच है, तो इसका मतलब ये भी है कि मैं अब किसी को भी ये नहीं दिखा सकता। मैं किसी को भी ये साबित नहीं कर सकता। और जो इंसान किसी को कुछ साबित नहीं कर सकता, वो आख़िर में सिर्फ़ खुद को साबित करता रह जाता है।
पापा दरवाज़े पर खड़े थे, चश्मा टेप से बँधा, हाथ में चाय का कप। उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा।
मैंने भी उनकी तरफ़ नहीं देखा।
माँ ने कहा, "दुकान खोलने जा रहा है? चाय पीकर जा।"
"पी लिया।"
"झूठ बोल रहा है। कप वहीं रखा है।"
मैंने कप उठाया और दो घूँट में पी लिया, जबकि वो बहुत गरम थी, और मेरी जीभ जल गई, और मैंने कुछ नहीं कहा।
जब मैं दरवाज़े से निकल रहा था, तब काजल ने मेरा हाथ पकड़ा।
"भैया।"
"हाँ।"
"पापा से बात हुई?"
मैंने सिर हिलाया।
वो मुस्कुराई। छोटी सी, थकी हुई मुस्कान।
"और? क्या बोले?"
"बोले — इसे मत बेचना।"
"किसे?"
"साइकिल को।"
काजल ने मेरा हाथ छोड़ दिया और उसका चेहरा बदल गया।
"तो मत बेचो।"
"काजल, माँ के दो टेस्ट बाकी हैं। तू जानती है ना?"
"जानती हूँ।"
"तो फिर?"
वो एक पल चुप रही, फिर बोली, "भैया, पैसे का रास्ता निकाल लेंगे। किसी तरह निकाल लेंगे। पर जो चीज़ पापा ने पहली बार बोलकर माँगी है, उसे मत बेचो। वो ज़िंदगी में कुछ नहीं माँगते।"
वो अंदर चली गई।
मैं सड़क पर खड़ा रह गया, और मुझे लगा कि आज सुबह सब लोग मुझसे ऐसी बातें कह रहे हैं जिनका जवाब मेरे पास नहीं है।
दुकान पर पहुँचकर मैंने शटर उठाया।
टेढ़ा बोर्ड अब भी वहीं टँगा था, एक कील से, जैसे कोई आदमी एक ही टाँग पर खड़ा हो। मैंने उसे उतारा और मेज़ पर रखा, और कील ठोकने लगा।
मेज़ के एक कोने पर वो पुराना बैग रखा था। सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी का।
कल सुबह वो आया था, बैग रखकर बोला था कि वो पापा का पुराना जानने वाला है और अपनी चीज़ लेने आया है, और फिर चला गया था ये कहकर कि शाम को आएगा।
शाम को नहीं आया।
रात को पापा आए, आँगन में, साइकिल के सामने।
और मैंने उस बैग को नहीं खोला। मैंने सोचा था — जो आदमी अपनी चीज़ लेने आएगा, वो खुद खोलेगा। पर अब मैं उस बैग को देख रहा था और मुझे लग रहा था कि वो बैग मेरी दुकान पर नहीं, मेरे सीने पर रखा है।
मैंने उसे उठाकर नीचे बेंच के नीचे रख दिया।
तभी टिंकू आ गया, स्कूल की कॉपी बगल में दबाए, घुटने पर पट्टी बदली हुई।
"उस्ताद!"
"हाँ।"
"आज आपका चेहरा ऐसा है जैसे आपने रात में किसी से झगड़ा किया हो।"
"किसी से झगड़ा नहीं किया। खुद से किया।"
"खुद से झगड़ा कैसे करते हैं?"
"बड़े हो जाओगे तो सीख जाओगे। और ये बताओ, स्कूल से भागकर आए हो?"
"नहीं। छुट्टी है।"
"छुट्टी कब से?"
"आज से।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने आँखें चुरा लीं और साइकिल का पहिया घुमाने लगा।
"टिंकू।"
"हाँ उस्ताद।"
"छुट्टी है या तुमने छुट्टी कर दी?"
वो कुछ नहीं बोला।
"मैंने पूछा, टिंकू।"
"कल मास्टर ने कहा कि फीस का काग़ज़ लेकर आना। मैंने घर पर कहा तो माँ ने कहा कि अगले महीने देखेंगे। और मुझे लगा कि अगर मैं स्कूल जाऊँगा और काग़ज़ नहीं ले जाऊँगा, तो सबके सामने खड़ा कर देंगे।"
वो पहिया घुमाता रहा।
"तो बैठ जाओ यहाँ। मेरे पास काम है।"
"अच्छा?"
"हाँ। ये बोर्ड ठीक करना है। तेरे हाथ हल्के हैं।"
वो बैठ गया, और मैंने उसे कील और हथौड़ा दिया, और उसके चेहरे पर वो भाव आया जो बच्चों के चेहरे पर तब आता है जब उन्हें लगता है कि कोई उन्हें बड़ा आदमी समझ रहा है।
मैं दिन भर दुकान पर बैठा रहा।
और मैं सच बताऊँ — मैं काम नहीं कर रहा था। मैं देख रहा था।
हर आने-जाने वाले को।
एक औरत गुज़री जो सब्ज़ी का थैला लिए थी, और मैंने सोचा कि वो मेरी तरफ़ देखकर क्यों मुस्कुराई। एक आदमी साइकिल पर निकला, और मैंने सोचा कि वो घंटी क्यों नहीं बजा रहा। एक बच्चा रोता हुआ गुज़रा और मैंने सोचा कि किसी का घर टूटा होगा।
मुझे कोई हल चाहिए था, और मुझे पता नहीं था कि हल कैसा दिखता है, इसलिए मैं हर चीज़ में हल ढूँढ रहा था।
शबनम आपा ने दोपहर में चाय भेजी। चाय के साथ एक समोसा भी, हल्के हाथ से लपेटकर काग़ज़ में।
"आपा कह रही हैं कि खाली पेट चाय मत पीना," चिंटू ने कहा और भाग गया, क्योंकि वो जानता था कि मैं पैसे देने की ज़िद करूँगा और वो नहीं ले सकता।
दो बजे मीरा आई।
वो हमेशा की तरह जल्दी में थी, बाल उड़ रहे थे, कैमरा कंधे पर, और फटा बैग उसके ज़्यादा फटा हुआ लग रहा था।
"अंकुश।"
"जी, मैडम।"
"वो जो तुमने मुझे रात के ट्रकों की जानकारी दी थी, मैंने लगा दी। वीडियो पर दो हजार लोगों ने देखा।"
"वाह। दो हजार।"
"मज़ाक मत करो। दो हजार इस बस्ती के हिसाब से बहुत है।"
"मैं मज़ाक नहीं कर रहा। मैं सच में खुश हूँ कि दो हजार लोगों ने कुछ देखा।"
वो मेरी तरफ़ देखकर रुक गई।
"तुम आज अजीब लग रहे हो।"
"मैं रोज़ अजीब लगता हूँ।"
"नहीं। रोज़ तुम ऐसे लगते हो जैसे सब कुछ मज़ाक है। आज तुम ऐसे लग रहे हो जैसे सब कुछ मज़ाक है और तुम उस मज़ाक के अंदर फँसे हुए हो।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो बैठ गई, मेज़ के किनारे पर, और उसने अपना माइक वहीं रख दिया।
"सुनो, एक बात है। पीछे के प्लॉट पर जो मिट्टी गिर रही है, वो सिर्फ़ मिट्टी नहीं है। मैंने दो लोगों से पूछा। कह रहे थे कि ज़मीन के काग़ज़ में कुछ गड़बड़ है। और उन्हीं दो लोगों ने मुझे ये भी कहा कि अब लोगों से अंगूठे लिए जा रहे हैं।"
मेरा सिर ऊपर उठा।
"कौन ले रहा है?"
"पता नहीं। पर जो भी है, वो काग़ज़ के साथ घूम रहा है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"और तुम्हारी दुकान का नाम भी कहीं आ रहा है, अंकुश। मुझे ठीक से नहीं पता, पर सुनकर लगा कि जिस सूची में दुकानें लिखी हैं, उसमें तुम्हारी दुकान भी है।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा हो गया।
"मीरा।"
"हाँ।"
"तूने मेले में मेरा गला पकड़ा हुआ वीडियो रखा है ना?"
"रखा है।"
"अभी मत छापना।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर तूने छाप दिया, तो वो लोग समझ जाएँगे कि हम उनकी तरफ़ देख रहे हैं। और जिस दिन उन्हें पता चलेगा कि हम देख रहे हैं, उस दिन वो रुकेंगे नहीं। वो और तेज़ हो जाएँगे।"
वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रही।
"ये बात तुमने किससे सीखी?"
"किससे नहीं सीखी। मैं रोज़ देखता हूँ कि लोग चीज़ें कैसे तोड़ते हैं। पहले हल्के से, फिर ज़ोर से।"
वो उठी और उसने अपना माइक उठाया।
"ठीक है। मैं रोक लेती हूँ। पर ज़्यादा देर नहीं रोक पाऊँगी, अंकुश। मैं उस आदमी की नहीं हूँ जो चुप बैठता है। मैं वो आदमी हूँ जो गलत वक़्त पर बोलकर अपना घर बिगाड़ बैठता है।"
"मुझे पता है।"
वो रुकी।
"क्या पता है?"
"तुझे पता है कि मुझे पता है।"
वो हँसी, पर उसकी हँसी में वो चीज़ नहीं थी।
वो जाने लगी, फिर रुकी और बोली, "तुम्हारी माँ ठीक हैं?"
"हाँ।"
"सच?"
"दो टेस्ट बाकी हैं।"
वो कुछ कहने को हुई, फिर नहीं कहा और चली गई।
शाम तक मैंने तीन साइकिलें ठीक कीं। एक बच्चे की, एक दूध वाले की, और एक उस बूढ़े की जिसकी साइकिल पर बैठने की जगह सिर्फ़ एक ही थी और वो उसे रोज़ अस्पताल ले जाता था अपनी औरत को।
और ठीक शाम पाँच बजे, जब मैं पंचर वाले टब में हाथ धो रहा था, गली में वो आवाज़ आई जो किसी गली में सबसे पहले कान पकड़ती है — चप्पलों की एक साथ चलती आवाज़।
दो आदमी आए।
एक के हाथ में काग़ज़ों का एक मोटा बंडल था, दूसरे के हाथ में स्याही की छोटी डिब्बी और एक कपड़ा। दोनों सफ़ेद कुर्ते में थे, पर उनके सफ़ेद में वो सफ़ेदी नहीं थी जो रणवीर भारद्वाज की तस्वीरों में होती है। उनके कुर्ते धोए हुए थे, पर उन पर धूल थी — वो धूल जो सिर्फ़ मिट्टी के ट्रकों के पास उड़ती है।
वो उस्ताद अली बक्श की बंद दुकान के सामने रुके, शटर पर हाथ मारा, और जब कोई नहीं खोला तो एक काग़ज़ शटर के नीचे से अंदर सरका दिया और हँसे।
फिर वो एक-एक दुकान पर जाने लगे।
मैंने अपना हाथ पोंछा और सड़क पर आ गया।
शबनम आपा की गुमटी पर आपा ने चिमटी हाथ में लेकर कहा, "मैं कुछ नहीं लगाती।"
"आपा, ये तो सिर्फ़ एक काग़ज़ है।"
"मेरे पास कुछ नहीं है लगाने को। ये स्टैंड किराए का है, मेरा नहीं है।"
"तो किराए वाले का नाम लगा दो।"
"मैं अपने मालिक का नाम किसी काग़ज़ पर नहीं लगाती।"
उन्होंने एक-दूसरे को देखा, और फिर छोटे आदमी ने बंडल से एक काग़ज़ निकाला और उसे आपा की गुमटी के किनारे पर रख दिया।
"कल तक लगा देना। साहब नाराज़ होते हैं।"
और वो आगे बढ़ गए।
पीछे की तरफ़ एक पुराने किराने की दुकान है, जिसके बाहर बोरियों में दालें रखी हैं और जिसके अंदर एक बूढ़ा दुकानदार बैठता है, जिसकी आँखें अब ठीक से नहीं देखतीं और जो अपनी दुकान के बाहर बैठकर रोज़ शाम को चना खाता है।
मैंने देखा कि वो दोनों उसकी दुकान पर गए।
और मैं सुन रहा था, क्योंकि गली सिर्फ़ चौदह कद की है और चौदह कद में सब कुछ सुनाई देता है।
"काका, ये काग़ज़।"
"क्या है?"
"आपकी दुकान। आपकी ज़मीन।"
"मेरी ज़मीन मेरी है।"
"है तो। इसीलिए तो आपसे पूछने आए हैं। बस अंगूठा लगा दीजिए कि मकान आपका है।"
"किसलिए?"
"सरकारी काग़ज़ है। बिजली का मीटर।"
"मीटर का काग़ज़ पचास साल से मैं खुद भर रहा हूँ।"
"ये नया नियम है।"
मैंने दुकान की तरफ़ बढ़ते कदम तेज़ किए।
और तभी बूढ़े ने उस काग़ज़ को उठाया, अपनी आँखों के पास ले गया, इतना पास कि उसकी नाक काग़ज़ को छूने लगी। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने ऊपर की लाइन पढ़ी, फिर नीचे की लाइन पढ़ी, और फिर उसने काग़ज़ वापस मेज़ पर रख दिया और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी बच्चे की आवाज़ हो।
"ये तो बिक्री का काग़ज़ है।"
दोनों आदमियों में से छोटे ने तुरंत कहा, "काका, आपने गलत पढ़ा।"
"मैं पैंतालीस साल से ये दुकान चला रहा हूँ। मैंने दो बार ज़मीन बेची है। मैं बिक्री का काग़ज़ पहचानता हूँ। इस पर लिखा है कि मैंने बेच दिया।"
"आपको ठीक से दिखता नहीं है, काका।"
"मुझे ठीक से दिखता नहीं है, पर ये इतना बड़ा लिखा है कि ये अंधे को भी दिखे।"
मैं उनके पीछे खड़ा था।
और उस वक़्त मेरे अंदर से एक आवाज़ निकली, बिना सोचे, बिना रुके।
"एक मिनट।"
दोनों मुड़े।
छोटे आदमी ने ऊपर से नीचे तक मुझे देखा और उसके चेहरे पर वो मुस्कान आई जो लोग उस आदमी के चेहरे पर लगाते हैं जिसे वो कुछ नहीं समझते।
"बोलो, मिस्त्री।"
"ये काग़ज़ मुझे दिखाओ।"
"क्यों?"
"क्योंकि मेरी दुकान भी इस गली में है।"
"तुम्हारी दुकान का काग़ज़ अलग है।"
मैं रुक गया।
"अलग कैसे?"
"तुम्हारी दुकान बड़े साहब खुद देखेंगे। तुम्हारे लिए कोई काग़ज़ नहीं भेजा गया।"
उसने मेरे कंधे की तरफ़ देखा और हँसा, और उसका हँसना ऐसा था जैसे कोई मुझे कुछ बता रहा हो बिना बताए।
"तुम्हारी दुकान की जगह पर बड़े साहब की नज़र है, ये बबलू भाई ने बोला नहीं था तुमसे?"
मैंने जवाब नहीं दिया।
बूढ़े काका ने काग़ज़ उनके हाथ से खींच लिया।
"मैं नहीं लगाऊँगा।"
"काका, सोच लो।"
"मैं नहीं लगाऊँगा।"
"अच्छा।"
और वो चले गए। बिना झगड़े के। बिना धमकी के। और यही सबसे डरावना था — उन्होंने धमकी नहीं दी, क्योंकि जिनके पास काग़ज़ होता है, वो धमकी नहीं देते। वो सिर्फ़ तारीख़ देते हैं।
वो गली के मुहाने की तरफ़ बढ़े।
मैं उनके पीछे ही चल पड़ा, दूर से, जैसे हमारी गली का कोई आदमी हो जो ये देखना चाहता है कि ट्रक कितनी देर में आता है।
और तभी उनमें से बड़े आदमी ने अपना बंडल खोला, क्योंकि हवा लग गई थी और काग़ज़ उड़ने लगे थे।
काग़ज़ों की पहली शीट ऊपर आई, और मैंने उस पर दूर से एक नाम देखा।
शंकर यादव।
मेरे पापा का नाम।
और उस नाम के आगे, उसी लाल स्याही से जो उनकी डिब्बी में थी, एक छोटा सा निशान बना हुआ था — ठीक वैसा ही निशान जैसा किसी अंगूठे का होता है।
मैं वहीं जम गया।
और जेब में घंटी, जो दो दिन से ठंडी और चुप थी, अचानक इतनी ठंडी हो गई जैसे किसी ने उसे मेरी हड्डी के अंदर रख दिया हो।
मैंने उसे बाहर निकाला और बजाया।
टन।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस इतना कहा, इतने धीमे से कि मुझे लगा किसी ने मेरे कान के अंदर साँस छोड़ी है —
"अब पूछ। मत बेचना का मतलब।"
॥
तंत्र ने जो कहा, वो सिर्फ़ तीन शब्दों में था, पर उसने मेरे अंदर एक कमरा खाली कर दिया।
"अब पूछ। मत बेचना का मतलब।"
मैंने घंटी को हथेली में दबाया। वो इतनी ठंडी थी कि लगा किसी ने बर्फ़ का टुकड़ा मेरी हड्डी के अंदर रख दिया हो।
"पूछ क्या रहा हूँ, तू बता।" मैंने गली की तरफ़ देखा। सामने किराने की दुकान का बूढ़ा काका अब भी अपनी मेज़ पर बैठा था, दोनों हाथ जोड़कर, जैसे कोई बच्चा अपना खोया हुआ खिलौना देख रहा हो। "तूने कहा, अब पूछ। तो मैं पूछ रहा हूँ। पापा का अंगूठा उस काग़ज़ पर क्यों है?"
"क्योंकि उन्होंने लगाया था।"
"कब?"
"जब उन्हें लगाना पड़ा।"
मेरी उँगलियाँ घंटी पर कस गईं। "तू सीधा बोल ना। तू ऐसे बोलती है जैसे पहेली बुझा रही हो।"
"पहेली का जवाब पूछने वाले के पास होता है, घंटी के पास नहीं।"
मैंने आँखें बंद कीं। बारह साल की उम्र में मैंने एक बार पापा को रात में चूल्हे के पास बैठे देखा था, हाथ जोड़े, आँखें बंद। मैंने सोचा था प्रार्थना कर रहे हैं। आज उसी तस्वीर के सामने एक काग़ज़ आ गया था, और तस्वीर का मतलब पूरा बदल गया था।
"मत बेचना का मतलब क्या है?" मैंने धीरे से पूछा।
"जिस चीज़ पर हाथ रखा जाए, वो पहले देखना चाहिए कि हाथ किसका है।"
"ये जवाब नहीं है।"
"यही जवाब है। तू साइकिल की सोच रहा है। साइकिल बहाना है।"
मैंने घंटी को जेब में वापस रखा। दोनों सफ़ेद कुर्ते वाले गली के मुहाने से गायब हो चुके थे। हवा अब भी वहीं खड़ी थी, जहाँ वो काग़ज़ उड़े थे, जैसे हवा को भी यक़ीन नहीं हो रहा था कि उसने क्या देखा।
मैं अपनी दुकान पर लौटा। बोर्ड अब भी मेज़ पर पड़ा था, और मैंने उसे उठाकर देखा। लकड़ी पर काले अक्षर आधे उखड़े हुए थे। मैंने उँगली से उन पर हाथ फेরা।
फिर मैं घर गया।
रात में माँ की खाँसी तीन बार उठी। पहली बार दो बजे, दूसरी बार तीन बजकर कुछ, और तीसरी बार सुबह ठीक चूल्हा जलने के वक़्त। मैं छत पर लेटा था, आँखें बंद, पर नींद नहीं थी। नीचे से तवे पर रोटी पलटने की आवाज़ आ रही थी और माँ बीच-बीच में हाँफ रही थीं, और हर हाँफ मेरे सीने पर पत्थर रख रही थी।
सुबह छह बजे मैं नीचे गया और बोला, "माँ, आज अस्पताल चलेंगे।"
उन्होंने तवा उठाया, पोंछा, रख दिया, और बिना मेरी तरफ़ देखे बोलीं, "पाँच बजे का टिफ़िन है। स्कूल वाले पंद्रह हैं, दुकान वाले नौ। किसके हाथ में दूँ?"
"काजल दे देगी।"
"काजल को कॉलेज जाना है।"
"एक दिन की बात है, माँ।"
"एक दिन की बात मैंने बीस साल पहले पापा से सुनी थी। आज तक ख़त्म नहीं हुई।"
मैं हँसा, पर हँसी आधी गले में ही रुक गई। माँ ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो बात थी जो माँओं की आँखों में तभी आती है जब उन्हें पता हो कि उनका बच्चा डर रहा है और वो उसे छुपाने की कोशिश कर रहा है।
"बैठ।" उन्होंने कहा।
"माँ—"
"बैठ, दो मिनट।"
मैं बैठ गया। उन्होंने चाय का गिलास मेरे सामने रखा, और फिर अपना पल्लू कमर में खोंसकर बोलीं, "मैं ठीक हूँ, अंकुश। मुझे अपनी बीमारी का डर नहीं है। मुझे इस बात का डर है कि मेरे कारण तुम और काजल अपनी उम्र से पहले बूढ़े हो जाओगे।"
"ये किसने कहा?"
"जो सुबह तीन बजे छत पर बैठा था। मैंने देखा।"
मैंने गिलास पकड़ा, और उसमें एक बूँद भी नहीं गिरी, क्योंकि मेरा हाथ काँप रहा था।
"आज चलेंगे।" मैंने कहा। "बस इस बार ज़िद मेरी है।"
वो कुछ नहीं बोलीं। और माँ का न बोलना माँ की हाँ के सबसे करीब होता है।
गली में उस वक़्त सुबह की धूप पत्थर की चबूतरी पर आधी चढ़ चुकी थी। पीपल के नीचे गुड्डू और रफ़ीक़ कुछ खोज रहे थे, जैसे ज़मीन से कोई सिक्का मिल गया हो। उसी पुराने रिक्शे वाले बूढ़े ने— वो जो रोज़ अपनी औरत को अस्पताल ले जाता है— मुझे देखा और साइकिल रोक ली।
"बहू को बैठा? मैं छोड़ आऊँगा।"
"बूढ़े काका, आपकी औरत?" मैंने पूछा।
"आज तीन दिन से बुखार नहीं आया। डॉक्टर साहब ने नई दवा दी है। वो कहते हैं, हमेशा नहीं चलेगा बुखार, कभी रुकेगा भी।" उन्होंने एक हाथ से साइकिल का हैंडल पकड़ा और दूसरे से हवा में एक छोटी सी रेखा खींच दी, जैसे किसी ने उनके जीवन में एक तारीख़ खींच दी हो। "आज मैं अकेला जा रहा हूँ। उसने कहा, आज तू ही जा, मैं घर संभाल लूँगी।"
और मुझे कुछ अजीब लगा। इस गली में बीमारी ऐसे चलती है जैसे कोई किराएदार हो — आता है, रहता है, कभी-कभी चला जाता है, और उसके जाने पर लोग उसे भूल जाते हैं, जैसे वो कभी था ही नहीं।
नूर अस्पताल का दरवाज़ा हमेशा से कुछ टेढ़ा था। लोहे का बना, हरे रंग का, और उसकी एक कुंडी ऊपर, एक नीचे। जब वो खुलता था तो एक ऐसी आवाज़ करता था जैसे कोई बूढ़ा आदमी उठते वक़्त हल्का कराह दे।
अंदर घुसते ही वो गंध आई जो सिर्फ़ पुराने अस्पतालों में होती है — फ़िनाइल, पुराना काग़ज़, और किसी के हाथ में लगी हुई क्रीम। पीली दीवारें, ऊपर से नीचे तक, और जहाँ-जहाँ हाथ लगा था वहाँ सफ़ेदी उतर गई थी, जैसे दीवार का कोई छोटा-सा राज़ खुल गया हो।
सीढ़ियों के पास की खिड़की टूटी थी। काँच के टुकड़ों पर किसी ने टेप चिपकाकर उसे जोड़ रखा था, और उस टेप से होकर धूप अंदर आती थी, टुकड़ों में, जैसे किसी ने रोशनी भी फाड़कर चिपकाई हो।
बेंच पर चार लोग बैठे थे। एक बूढ़ी औरत, एक आदमी जिसके हाथ में बच्चा था, और दो लड़के जो एक ही काग़ज़ को दोनों तरफ़ से पकड़े हुए थे, जैसे उसका कोई हिस्सा छूट जाने का डर हो।
काजल सफ़ेद कोट में बाहर आई। उसका कोट उससे दो नंबर बड़ा था, आस्तीन ऊपर मोड़ी हुई, और जेब से एक पेन निकला हुआ था।
"तू आ गया!" वो दौड़कर आई और माँ का हाथ पकड़ लिया। "माँ, डॉक्टर साहब आज बहुत अच्छे मूड में हैं। सुबह उन्होंने मुझे पहली बार खुद से सुई लगाने दी।"
"लगाई?" माँ ने पूछा।
"लगाई।" काजल ने गर्व से कहा, फिर धीरे से मेरे कान में बोली, "तीन बार। पहली दो बार मरीज़ ने कहा, बेटा ज़रा नरमी से। तीसरी बार वो सो गया।"
मैं हँसते-हँसते रुक गया।
डॉक्टर इसरानी का कमरा पहली मंज़िल पर था। दरवाज़े पर कोई नाम नहीं, बस एक छोटी सी तख़्ती, जिस पर उनका नाम उभरा हुआ था और किनारे से रंग उतर चुका था। अंदर मेज़ पर काग़ज़ों के तीन ढेर, एक शीशे का गिलास जिसमें पानी आधा, एक चश्मा जिसका एक काँच चिपका हुआ, और दीवार पर एक तस्वीर — एक औरत, जिसकी आँखें हँस रही थीं और जिसके नीचे कोई तारीख़ नहीं लिखी थी।
डॉक्टर इसरानी साठ के पार हैं, पर उनकी आवाज़ अब भी वैसी है जैसे किसी ने उसे अलमारी में बंद करके रखा हो और वो बाहर निकलने की जल्दी में न हो। सफ़ेद बाल, कम किए हुए चश्मे, और हाथ में एक पुराना स्टेथोस्कोप जिसकी रबर की नली पर टेप लिपटा हुआ था।
"आओ, बहू।" उन्होंने कहा। "बैठो।"
माँ बैठीं और तुरंत बोलीं, "डॉक्टर साहब, मैं तो ठीक हूँ। बेटा ज़्यादा डरता है। रात को मेरी खाँसी सुनकर छत पर बैठ जाता है, और सुबह मुझे डाँटता है जैसे मैं उसकी बेटी होऊँ।"
डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में हल्की हँसी आई।
"बेटा तो डरेगा ही।" उन्होंने स्टेथोस्कोप उठाया। "अगर बेटा न डरे तो समझो कुछ गड़बड़ है। ज़रा साँस लो, बहू।"
माँ ने साँस ली। फिर दूसरी बार। फिर तीसरी बार, और तीसरी बार में खाँसी आ गई, और वो खाँसी कमरे में चारों तरफ़ फैल गई जैसे कोई चीज़ गिर पड़ी हो।
मैं दीवार की तरफ़ देखता रहा। दीवार पर एक कैलेंडर लटक रहा था, जिसका महीना दो महीने पुराना था, और उस पर एक बच्चे ने पेंसिल से सूरज बनाया हुआ था।
"ठीक है।" डॉक्टर इसरानी ने स्टेथोस्कोप नीचे रखा। "अब सुनो, दोनों।"
मैंने सुना।
"खाँसी अब सूखी नहीं है, बल्कि सीने के अंदर से आ रही है। पुरानी बात यह है कि इसे लंबा इलाज चाहिए। अच्छी बात यह है कि अभी देर नहीं हुई है।" उन्होंने मेज़ पर से एक परची उठाई और लिखने लगे। "दो जाँच और हैं। दवा बदलनी पड़ेगी। और तुम, बेटा—" उन्होंने मेरी तरफ़ उँगली उठाई, "—माँ को रोटी बनाने से रोकना चाहो तो रोक लो, पर मना मत करना। औरत अगर रसोई छोड़ दे तो वो बीमार नहीं, बेकार हो जाती है। मुझे बीमार मरीज़ चाहिए, बेकार औरत नहीं।"
माँ हँस पड़ीं। "सुन लिया? डॉक्टर साहब भी मेरी तरफ़ हैं।"
"डॉक्टर साहब मरीज़ की तरफ़ होते हैं, बहू।" उन्होंने कहा। "बस कभी-कभी मरीज़ को यह बताना पड़ता है कि वो मरीज़ हैं।"
मैं बाहर आ गया।
दीवार से टिक गया। वो दीवार जिस पर सफ़ेदी उतरी हुई थी और जिसके नीचे लाल रंग की एक पट्टी बनी थी, जैसे किसी ने दीवार की कमर पर पेटी बाँध दी हो।
मेरे हाथ काँप रहे थे और मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि किस बात पर ज़्यादा डरूँ। उस काग़ज़ पर पापा के नाम के आगे लगे अंगूठे पर, या उस परची पर जिस पर दो जाँच और लिखी थीं और जिनके आगे लिखी तारीख़ पिछले महीने की हो चुकी थी।
मैंने जेब से घंटी निकाली। उसे देखा। वो चुप थी। बजाई तो भी चुप रही। मैंने धीरे से कहा, "अब तू क्यों चुप है?"
कुछ नहीं।
"जब बात मेरे समझ में न आए, तब तू बोलती है। अब मेरे समझ में आ गया कि मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, तो तू चुप है?"
कुछ नहीं।
तो मैंने घंटी को जेब में रख दिया और मैंने अपने आप से कहा, ठीक है, अकेले सोचता हूँ।
और ठीक उसी वक़्त काजल भागकर आई।
वो इतनी तेज़ भागी कि उसके कोट की आस्तीन खुल गई और पेन ज़मीन पर गिर गया, और वो पेन उठाने के लिए भी न रुकी।
"अंकुश।" उसने मेरी बाँह पकड़ी। "सुन।"
"क्या?"
"जाँच के पैसे।"
मेरा पेट कस गया। "कितने हैं?"
"नहीं, तू सुन।" उसने मेरी बाँह दबाई। "डॉक्टर साहब ने कहा है कि जाँच के पैसे कुछ महीने के लिए टाल दिए गए हैं। एडवांस नहीं, टाल दिए। उन्होंने स्टेशनरी वाले को फ़ोन भी किया और कहा कि जाँच की तारीख़ जल्दी की जाए।"
मैंने उसका हाथ हटाया। "कितने पैसे?"
"तू पैसे की बात क्यों कर रहा है, मैं बता रही हूँ पैसे की ज़रूरत नहीं है—"
"काजल।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "कितने?"
वो रुक गई। उसने होठ भींचे। उसकी आँखें भर आईं और वो एकदम से बोली, "मुझे पता नहीं। उन्होंने मुझे नहीं बताया। मैंने मेज़ पर परची देखी, पर वो उन्होंने उलटी कर दी। और मैं जानती हूँ कि तू पैसे देगा और मैं जानती हूँ कि तेरे पास नहीं हैं और मैं जानती हूँ कि तू ये बात मुझे नहीं बताएगा, इसलिए मैं पहले बता रही हूँ।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा।
फिर मैंने कहा, "बात करूँगा।"
"अंकुश—"
"बात करूँगा, काजल। उनसे। कोई पैसे टालेगा तो मुझे पूछना पड़ेगा। मुफ़्त में कुछ नहीं होता।"
"ये मुफ़्त नहीं है।" वो मेरे सामने आ गई, और उसकी आवाज़ में वही कड़क थी जो माँ की है। "डॉक्टर इसरानी पच्चीस साल से इस अस्पताल में हैं। इस गली के हर बच्चे को उन्होंने टीका लगाया है। मेरे हाथ में सुई उन्होंने पकड़ी थी। जब मैंने कहा था कि मैं नर्सिंग में जाना चाहती हूँ, तो घर में कोई नहीं था जो मानता, इन्होंने आकर पापा से बात की थी।"
मैं नहीं बोला।
"इसलिए डॉक्टर साहब पर शक करना बंद कर।" उसने कहा।
"मैं शक नहीं कर रहा।" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी। "मैं सिर्फ़ यह जानना चाहता हूँ कि भला कोई इंसान किसी से क्यों कहेगा कि तुम्हारे पैसे की ज़रूरत नहीं।"
और तभी पीछे से आवाज़ आई।
"क्योंकि मैं पैसा नहीं माँग रहा। मैं एक चीज़ माँग रहा हूँ।"
डॉक्टर इसरानी दरवाज़े पर खड़े थे। उनके हाथ में वही परची थी, मोड़ी हुई, और उन्होंने उसे अपनी जेब में डाल दिया।
"सर, मेरे पास—"
"मुझे पता है कि तुम्हारे पास क्या है और क्या नहीं है।" उन्होंने कहा। "तुम्हारी दुकान का हिसाब मैंने एक बार देखा था, दो साल पहले, जब तुम्हारे पापा की तबीयत खराब थी। तुम उस वक़्त काग़ज़ों पर टाइल का डिब्बा रखकर उन्हें छुपा रहे थे।"
मैंने नज़रें नीची कर लीं।
"बेटा, इलाज रुकेगा नहीं।" उन्होंने कहा। "बस अस्पताल बचा रहे।"
मैं ठिठक गया।
"मतलब?"
"मतलब यह कि तुम अपनी माँ को यहाँ लाना बंद मत करना।" उन्होंने कहा। "बस इतना।"
"नहीं, आपने कहा—"
"अंकुश।" उन्होंने मेरा नाम लिया और मैं चुप हो गया। "अभी मैं मरीज़ देख रहा हूँ। बाद में बात करेंगे।"
और वो अंदर चले गए। दरवाज़ा बंद नहीं किया, बस अधखुला छोड़ गए, और उस अधखुले दरवाज़े से माँ की हँसी आई, जो किसी बात पर काजल को डाँट रही थीं।
मैं दीवार से टिका रहा और मेरे दिमाग़ में एक ही लाइन घूम रही थी।
अस्पताल बचा रहे।
कौन अस्पताल को बचाएगा?
अस्पताल को किससे बचाना है?
और तभी मुझे वो काग़ज़ याद आया — पीछे के प्लॉट की ज़मीन, दुकानों की सूची, मेरी दुकान का नाम, और सबसे ऊपर शंकर यादव।
मैं सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ा ही था कि गेट की तरफ़ से एक आवाज़ आई।
"निहाल भाई! इतनी सीढ़ियाँ चढ़ूँगा, तो मेरा भी इलाज करना पड़ेगा।"
वो आवाज़ मीठी थी। इतनी मीठी कि जैसे किसी ने चीनी को पानी में घोलकर हवा में छिड़क दिया हो।
आदमी सफ़ेद कुर्ते में था। कुर्ता इतना साफ़ कि उस पर धूल एक भी दाना नहीं थी, जबकि गली की धूल हर आदमी पर पाँच मिनट में बैठ जाती है। साफ़ कटा बाल, काले रंग की पतली घड़ी, हाथ में एक फ़ाइल जिसके किनारे पर सोने का रंग था, और चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जो कभी नहीं उतरती— चाहे सामने वाला हँसे या रोए।
वो सीढ़ियों के नीचे खड़ा था और ऊपर देख रहा था। उसने डॉक्टर इसरानी को देखा और दोनों हाथ जोड़कर हल्का सा सिर झुकाया।
"आइए, आइए, चंद्रेश जी।" डॉक्टर इसरानी बाहर आ गए, और उनकी आवाज़ में वो नरमी थी जो लोग मेहमान के लिए रखते हैं, पर उनके कंधे अकड़े हुए थे।
"बेटा, तुम्हारी इमारत में लिफ़्ट नहीं है।" चंद्रेश ने कहा, और मुस्कुराया। "साठ पार का आदमी चढ़ेगा कैसे?"
"मुझे साठ पार का आदमी कहकर बुलाओगे?" डॉक्टर इसरानी ने कहा। "मैं तुमसे दस साल बड़ा हूँ, चंद्रेश।"
"उम्र का तो पता ही नहीं चलता, बेटा।" चंद्रेश ने कहा, और उसके चेहरे पर हँसी फैल गई, जैसे कोई चीज़ पानी में डालकर फैलती हो।
फिर उसने अपनी फ़ाइल खोली, एक काग़ज़ निकाला, और बिना आवाज़ बदले बोला, "तारीख़ आगे नहीं बढ़ेगी।"
कमरे में एक ऐसी चुप्पी आई जो पहले नहीं थी। बेंच पर बैठा वो आदमी जिसके हाथ में बच्चा था, उसने बच्चे को अपने सीने से चिपका लिया, जैसे उसने भी कुछ समझ लिया हो।
"मैंने तुमसे कहा था कि मुझे समय चाहिए।" डॉक्टर इसरानी ने कहा।
"समय चीज़ों को ठीक नहीं करता, बेटा।" चंद्रेश ने फ़ाइल बंद की। "समय सिर्फ़ तारीख़ें बदलता है। और तारीख़ें मेरे पास हैं।"
मैंने देखा कि डॉक्टर इसरानी की उँगलियाँ काँप रही थीं। वो कोई जवाब देते, उससे पहले मुझसे निकल पड़ा।
"साहब।"
चंद्रेश मुड़ा। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, और उसका देखना ऐसा था जैसे दर्ज़ी किसी कपड़े को पलटकर उसका पीछा देखती हो।
"यहाँ मरीज़ भर्ती हैं।" मैंने कहा। "बाहर बेंच पर बच्चे हैं। अंदर बूढ़ी औरतें हैं। आप यहाँ काग़ज़ निकालकर खड़े हैं। ये ठीक नहीं लगता।"
वो हँसा। सच में हँसा, और उसकी हँसी में कोई ठंडक नहीं थी — वो बस हँसी थी, जैसे बच्चा कुछ मज़ेदार कह दे और बड़े लोग हँस दें।
"बहुत अच्छा कहा।" उसने कहा। "बिल्कुल ठीक कहा।"
फिर उसने मेरी तरफ़ कदम बढ़ाया।
"तुम्हारा नाम?"
"अंकुश। अंकुश यादव।"
"अंकुश।" उसने दोहराया, जैसे नाम को मुँह में रखकर चख रहा हो। "अच्छा नाम है। पुराना नाम है। मेरे एक दोस्त का भी ऐसा ही नाम था।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"यहाँ क्या काम है, अंकुश?" उसने पूछा। "तुम मरीज़ हो या साथ आए हो?"
"माँ को लाया हूँ।"
"बेटा है तुम।" उसने कहा। "अच्छी बात है। माँ को लाना चाहिए।"
फिर उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसका हाथ हल्का था, पर मुझे लगा किसी ने मेरे कंधे पर कोई काग़ज़ रख दिया हो, जिसका वज़न नहीं दिखता, पर उतारना मुश्किल होता है।
"अंकुश।" उसने कहा। "तुम शंकर यादव के बेटे हो न?"
मेरे पैरों के नीचे का फ़र्श एक इंच खिसक गया।
"हाँ।" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सुनकर मुझे अपना ही डर महसूस हुआ।
चंद्रेश मुस्कुराया। वो मुस्कान अब भी वैसी ही थी, पर उसकी आँखों में कुछ और था, जैसे उसने बहुत दिनों से कोई गाँठ बाँध रखी हो और आज वो खुल गई हो।
"तुम्हारे पापा से कहना," उसने कहा, और आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, "वो काग़ज़ अभी भी मेरे पास सुरक्षित रखा है।"
और उसके बाद उसने अपना हाथ मेरे कंधे से उठाया, फ़ाइल दोबारा पकड़ी, डॉक्टर इसरानी की तरफ़ मुड़ा, और बोला, "बेटा, मैं अगले हफ़्ते फिर आऊँगा। तुम तब तक सोच लेना। और हाँ, तुम्हारे बच्चों को भी बताना, जो मुझे सफ़ेद कुर्ते में देखकर डरते हैं। मैं किसी का बुरा नहीं करता। मैं बस काग़ज़ों का आदमी हूँ।"
वो मुड़ा और चला गया।
उसके जाने के बाद वो टूटी खिड़की वाली धूप वैसी ही पड़ी रही, वो बेंच वैसी ही रही, वो बूढ़ी औरत वैसी ही बैठी रही। कुछ नहीं बदला।
बस मेरे अंदर कुछ बदल गया था। मुझे लगा जैसे मैं अब तक एक दरवाज़े के बाहर खड़ा था, और अब जाकर मुझे दिखा कि वो दरवाज़ा किसी और रास्ते का दरवाज़ा नहीं, मेरे ही घर का दरवाज़ा है।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी ठंडी थी, पर अब वो खाली नहीं लग रही थी। अब उसमें एक शब्द बैठा था, जो उसने अभी नहीं कहा, पर मैंने सुन लिया।
मीठी आवाज़ वाला सबसे ज़्यादा तोड़ता है।
॥
अस्पताल की सीढ़ियों से उतरते वक़्त मुझे लगा कि मेरे कंधे पर अभी भी कोई हाथ रखा है। मैंने दो बार पीछे देखा। कोई नहीं था। बस वही टूटी खिड़की वाली धूप, वही बेंच पर बैठी बूढ़ी औरत, और दवाइयों की गंध जो कपड़ों में चिपक जाती है।
मैंने साइकिल नहीं उठाई। पैदल चला। साइकिल घर के पीछे खड़ी थी, और मुझे लगा कि आज अगर मैंने उसे छुआ, तो कहीं वो भी कुछ पूछ बैठे। जब दिमाग़ में इतने सवाल हों, तब आदमी औज़ारों से दूरी बना लेता है। तुम सोच रहे होगे कि साइकिल क्या पूछेगी भाई। तुमने अभी वो घंटी सुनी नहीं है, इसीलिए ये बात तुम्हें हल्की लग रही है।
गली में उस वक़्त धूप आधी हो चुकी थी। पीपल की छाँव लंबी होकर नाली तक आ गई थी। शबनम आपा की गुमटी पर कोई नहीं बैठा था, बस चिमटी कराहट की आवाज़ कर रही थी। उस्ताद की दुकान पर वही ताला, वही धूल। मैंने चलते-चलते उस शटर को देखा और मन में कहा, उस्ताद, आपने चार तह का काग़ज़ छोड़कर मुझे आधा ही समझाया। बाक़ी आधा कब बताओगे।
घर का दरवाज़ा खुला था।
माँ चूल्हे पर थीं। कमर में पल्लू खोंसा हुआ, माथे पर चंदन का टीका, और पास में हिसाब की कॉपी खुली पड़ी थी। उनकी साँस सीने से आ रही थी, गले से नहीं। मैंने सुना और कुछ नहीं कहा। इन दिनों घर में एक नियम बन गया था — जो चीज़ सबको दिख रही है, उसका नाम नहीं लिया जाता।
"आ गया?" माँ ने पूछा, बिना मुड़े।
"आ गया।"
"डॉक्टर ने क्या कहा?"
"कहा कि दवा बदलेगी। दो जाँच और हैं।"
माँ ने करछी एक बार हाँडी में घुमाई, फिर रख दी।
"अच्छा।"
बस इतना। अच्छा। जैसे मैंने कहा हो कि बाहर हल्की बारिश है।
पापा कोने में बैठे थे। उनके सामने फर्श पर एक पुराना पंखा खुला पड़ा था, जिसका तार टूटा हुआ था। वो उसी में लगे थे। चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ, हाथ में छोटा पेचकस, और उँगलियाँ धीरे-धीरे घूम रही थीं, जैसे कोई प्रार्थना कर रहा हो जिसमें शब्द नहीं होते।
मैंने जूते उतारे। पानी पिया। एक बार सोचा कि चुपचाप चला जाऊँ, दुकान पर बैठूँ, किसी की साइकिल का पहिया सीधा करूँ और अपना दिमाग़ टाल दूँ।
पर आज दिमाग़ टलने वालों में नहीं था।
मैं उनके सामने बैठ गया। फर्श पर। घुटनों के बल।
"पापा।"
उन्होंने पेचकस घुमाया।
"पापा।"
"हम्म।"
"वो कौन सा काग़ज़ है?"
पेचकस रुक गया। बस एक पल के लिए। फिर वापस घूमने लगा।
"कौन सा काग़ज़, पापा? जो चंद्रेश के पास सुरक्षित रखा है। जो उसने आज अस्पताल में मुझसे कहा कि तुम्हारे पापा से कहना, वो काग़ज़ अभी भी मेरे पास सुरक्षित है।"
पापा ने सिर नहीं उठाया। उन्होंने पंखे की एक तार उठाई, देखी, फिर उसी जगह रख दी, जहाँ से उठाई थी। जैसे उन्होंने मेरी बात सुनी ही न हो। जैसे मैं हवा में बोल रहा हूँ और हवा को जवाब देने की ज़रूरत नहीं।
"पापा, मैं आपसे पूछ रहा हूँ।"
"पंखा ठीक करने दे।"
"पंखा छोड़ो।"
"पंखा गरमी में काम आएगा।"
"पापा!"
मेरी आवाज़ घर में फैल गई। माँ का हाथ करछी पर रुक गया। पड़ोस से किसी के बर्तन की आवाज़ आई और फिर चुप्पी।
पापा ने सिर उठाया। उनकी आँखें थकी हुई थीं। डर से नहीं — थकान से। और वो थकान मुझे जानी-पहचानी लगी, क्योंकि वो थकान मेरे अंदर भी पिछले कुछ महीनों से बैठी हुई है।
"बेटा," उन्होंने धीमे से कहा, "तुम डॉक्टर से क्या बात करके आए हो, वो बताओ। बाक़ी सब बाद में।"
"बाद में कब? जब वो काग़ज़ आपके सामने मेज़ पर रखा होगा? जब घर चला जाएगा? जब माँ को…" मैंने अपनी आवाज़ पकड़ ली। "पापा, आप पिछली रात साइकिल देखकर टूट गए थे। आपने मुझसे पूछा तक नहीं कि वो कहाँ से आई। आपको पहले से पता था। सब पता था। और आप मुझे आज तक कुछ नहीं बताया।"
"मैंने तुम्हें सब बताया। दादा की बीमारी, गिरवी, घंटी —"
"वो आधा सच था, पापा।"
पापा का हाथ रुक गया। पेचकस धीरे से नीचे रख दिया। उन्होंने दोनों हाथ घुटनों पर रख लिए और सामने फर्श को देखने लगे। बोले कुछ नहीं।
और उनकी यही चुप्पी मुझे सबसे ज़्यादा चुभी। चीख़ से ज़्यादा चुभी। क्योंकि चीख़ का जवाब दिया जा सकता है। चुप्पी का नहीं।
मैं खड़ा हो गया। मेरे हाथ काँप रहे थे और मुझे यह सुनकर और गुस्सा आया कि मेरे हाथ काँप रहे हैं।
"पापा, आप जानते हैं, आपकी चुप्पी से क्या हो रहा है? मैं सुबह उठता हूँ और मुझे डर लगता है कि आज घर में कौन सी चीज़ टूटी मिलेगी। मैं दुकान पर बैठता हूँ और सोचता हूँ कि किसी दिन कोई आकर कहेगा कि ये तुम्हारे पापा का काग़ज़ है, देख लो। मैं अस्पताल जाता हूँ और डॉक्टर मुझसे नज़र नहीं मिलाते। और आप? आप पंखा ठीक करते हैं।"
पापा ने कुछ नहीं कहा।
"आप चुप रहकर सब ठीक नहीं कर रहे, पापा। आप चुप रहकर सिर्फ़ मुझे अंधेरे में रख रहे हैं। मैं अंधेरे में लड़ नहीं सकता, समझते हो? मुझे दुश्मन दिखे तो मैं लड़ूँ। पर आपने मेरी आँखों पर पर्दा डाल दिया है और कह रहे हो कि बेटा, संभलकर चलो।"
तभी माँ की आवाज़ आई।
"अंकुश।"
वो धीमी थी, पर उसमें वो डोरी थी जो एक बार खिंच जाए तो हाथ कट जाता है।
"चूल्हे पर हूँ, मुड़ नहीं रही। सुन रहा है?"
"माँ —"
"सुन रहा है?"
"हाँ।"
"तेरे पापा ने ज़िंदगी भर चुप रहकर ही हमें खड़ा रखा है।"
मैं चुप हो गया।
"जब तेरे दादा बीमार पड़े, तब ये घर था, और इन्होंने चुप रहकर साइकिल गिरवी रखी। मुझे तीन दिन बाद पता चला। जब मैं बीमार पड़ी, इन्होंने चुप रहकर अस्पताल के काग़ज़ भरे। तुझे तब भी नहीं बताया, क्योंकि तू तब छोटा था, और तेरा बचपन ख़राब होने का डर इन्हें मुझसे ज़्यादा था।"
उनकी आवाज़ का आख़िरी हिस्सा काँप गया। माँ ने करछी नीचे रखी, और उसकी खनक घर में गूँज गई।
"ये चुप नहीं हैं, अंकुश। ये थके हैं। और थका आदमी बोलता नहीं, बस सहता है। तू चौबीस साल का है, तुझे लगता है कि सच बोलना बहादुरी है। सच बोलना बहादुरी है। पर कभी-कभी सच सहना भी उतनी ही बड़ी बात होती है, जो ये सालों से कर रहे हैं।"
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
वहाँ, आधे खुले दरवाज़े के पीछे, काजल खड़ी थी। नर्सिंग का बैग कंधे से उतरा हुआ, जूते पैरों में ही, और आँखें भरी हुईं। वो मुझे देखकर हटी नहीं। वो मुझे देखती रही, और मैंने उसकी आँखों में वो बात देखी जो वो कभी बोलती नहीं — कि वो भी चुप्पी में हिस्सेदार है। कि उसने भी पापा को भारद्वाज भवन के बाहर टूटे चेहरे के साथ देखा था और किसी से कुछ नहीं कहा था।
वो अंदर आई, बैग रखा, मेरे पास से निकली और सीधे पापा के पास जाकर बैठ गई। पापा के घुटने पर हाथ रखा। कुछ नहीं बोली।
पापा ने उसका हाथ नहीं हटाया।
और मैं, जो अभी-अभी इतना कुछ बोल गया था, उस दृश्य में कहीं भी फ़िट नहीं हो रहा था। मैं दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा और बाहर निकल गया।
रात को मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठा था।
कमरा छोटा है — इतना ही कि एक चारपाई, एक लोहे की अलमारी, और औज़ारों का एक ट्रंक आ जाए। दीवार पर एक पुराना बल्ब है जो जलता है तो गुनगुनाता है। उसकी रोशनी में सारी चीज़ें पीली दिखती हैं, जैसे पुरानी तस्वीर।
मेरे सामने मेज़ पर एक रेडियो रखा था। बबलू के आने से पहले वाला कोई ग्राहक छोड़ गया था — बोला था कि आवाज़ आती है पर फटी हुई, और अगर ठीक हो जाए तो दस रुपये देगा। मैंने रेडियो खोला। अंदर धूल, जंग, और एक टूटा तार।
मैंने पेचकस उठाया। तार जोड़ा। रेडियो में फटी आवाज़ आई — कहीं कोई भजन चल रहा था। फिर बंद।
मैंने फिर जोड़ा। फिर बंद।
मैंने रेडियो को ज़ोर से मेज़ पर पटका।
"बोल!" मैंने कहा। "बोल न!"
वो चुप।
मैंने दोबारा पटका। इस बार इतनी ज़ोर से कि उसका पिछला ढक्कन खुलकर गिर गया और अंदर के पुर्ज़े बिखर गए।
मैं हाँफने लगा। मेरे हाथ ग्रीस से काले थे और उनमें काँपट थी। कमरे में बस मेरी साँस की आवाज़ थी और बाहर से किसी कुत्ते के भौंकने की।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी वहीं थी। ठंडी। सुबह से ठंडी।
मैंने उसे बाहर निकाला और ज़ोर से बजाया।
टन्न।
"सुन।" मैंने कहा। मेरी आवाज़ कर्कश थी। "कुछ कर। कुछ बता। तेरा कोई काम है या नहीं? तू बस ऐसे ही पड़ी रहती है, और जब मन करता है तब पहेली बोल देती है। आज तूने कहा था कि मीठी आवाज़ वाला सबसे ज़्यादा तोड़ता है। ठीक है, मान लिया। पर उसके बाद? मैं उससे क्या पूछूँ? क्या लड़ूँ? मेरे पापा ने क्या किया था, ये तुझे पता है न? तो बता दे। सीधा बता दे। मैं तेरे पास पहेली सुलझाने नहीं आया, मैं तेरे पास अपना घर बचाने आया हूँ।"
घंटी चुप रही।
मैंने उसे मेज़ पर पटक दिया। पीतल की आवाज़ हुई और वो लुढ़ककर ट्रंक के पास जा गिरी।
मैं चारपाई पर बैठ गया और अपना सिर हाथों में पकड़ लिया।
तुम सोच रहे होगे कि ये लड़का इतना क्यों बिगड़ रहा है, बात तो छोटी है। भाई, बात छोटी नहीं है। बात ये है कि आज सुबह तक मुझे लगता था कि मेरे घर में एक ही आदमी है जो कभी गलत नहीं हो सकता — मेरे पापा। और शाम तक मुझे पता चल गया कि उनके नाम के आगे कहीं लाल स्याही का अँगूठा है। मुझे ये नहीं पता कि वो अँगूठा किस काग़ज़ पर है। और यही सबसे बुरा हिस्सा है। जब आपको दुश्मन पता हो, तो लड़ाई आसान होती है। जब आपको ये पता हो कि आपके ही घर में कोई चोट खा रहा है और नाम नहीं बता रहा — तब आप हर कमरे में चोर ढूँढते फिरते हो और हर आवाज़ पर चौंक जाते हो।
तभी खिड़की पर खटका हुआ।
छोटी खिड़की है, छत की तरफ़। उस पर लोहे की जाली है। मैंने सिर उठाया।
चार सिर दिख रहे थे। एक के ऊपर दूसरा।
"उस्ताद।"
सानिया की आवाज़। उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़ और सबसे नीचे चिंटू, जो अपनी ऊँचाई के हिसाब से किसी की कंधे पर चढ़ा था।
"क्या है?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अभी भी सख़्त थी।
"उस्ताद, गुस्सा मत करो।" चिंटू ने कहा। "हमने तुम्हें सोया नहीं देखा, इसलिए आए।"
"बोलो।"
गुड्डू आगे आया। उसकी आँखें बड़ी थीं, जैसी चौदह साल के लड़के की आँखें होती हैं जब उसे लगता है कि उसने कुछ बड़ा देख लिया है।
"उस्ताद, शाम को हम थाने के सामने बैठे थे। दुबे अंकल की कुर्सी के पास।"
"हाँ।"
"तो एक सफ़ेद गाड़ी आई। बड़ी, चमकदार। रुकी। उसमें से सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी उतरा — वही जो काग़ज़ बाँटने आया था, पर आज उसके हाथ में काग़ज़ नहीं था, बस एक फ़ोन।"
मैं सीधा बैठ गया।
"वो थाने के अंदर नहीं गया।" रफ़ीक़ बोला। "बाहर ही खड़ा रहा। और फिर उसने फ़ोन पर किसी से बात की।"
"क्या बात की?" मैंने पूछा।
सानिया ने आगे झुककर कहा, "उस्ताद, हम सब चुपचाप पास चले गए। दुबे अंकल सो रहे थे, और उनकी कुर्सी की आड़ में हम बैठ गए। वो आदमी ज़ोर से नहीं बोल रहा था, पर जब गुस्से में होता है तो आवाज़ खुद ऊपर उठ जाती है।"
"उसने कहा —" गुड्डू ने नकल करते हुए कहा, "यादव का अंगूठा। वही अंगूठा। और अगर वो अंगूठा नहीं मिला तो पूरी फ़ाइल बेकार है।"
कमरे में चुप्पी छा गई।
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"ये ज़रूरी नहीं कि वो हमारे पापा के बारे में बोल रहा था।" मैंने कहा। पर मेरी आवाज़ कह रही थी कि वो हमारे पापा के बारे में ही बोल रहा था।
"उस्ताद, हमने सुना —" चिंटू ने धीमे से कहा, "वो आदमी ये भी बोला कि अगर ये काग़ज़ नहीं टिका, तो साहब को अस्पताल की ज़मीन के लिए रास्ता नहीं मिलेगा।"
मैंने अपनी साँस रोक ली।
अस्पताल। वही अस्पताल जहाँ माँ का इलाज चल रहा है। वही अस्पताल जिसके लिए डॉक्टर इसरानी ने कहा था — बस अस्पताल बचा रहे।
मैंने बच्चों को देखा। चारों खिड़की की जाली से झाँक रहे थे, और उनके चेहरे पर वो भावना थी जो बड़ों के चेहरे पर होनी चाहिए थी — डर, और साथ में उत्साह। क्योंकि बच्चे जब कोई खबर लाते हैं, तो उन्हें लगता है कि उन्होंने दुनिया को बदल दिया। और सच कहूँ तो, कई बार वो सच में बदल देते हैं।
"तुम चारों सीधे घर जाओ।" मैंने कहा। "किसी को कुछ मत बताना।"
"उस्ताद —"
"एक बात।" मैंने कहा। "ये अंगूठे वाली बात तुमने किसी को बताई?"
"नहीं उस्ताद।" सानिया ने कहा। "हमने सोचा, पहले तुम्हें बताएँ।"
"अच्छा किया।"
वो चारों उतर गए, और खिड़की फिर खाली हो गई।
मैं कमरे में अकेला था। फिर मेरी नज़र ट्रंक के पास पड़ी घंटी पर गई। वो वहीं पड़ी थी, पीतल का रंग बल्ब की रोशनी में और गहरा लग रहा था।
मैं उठा। उसे उठाया। मुट्ठी में पकड़ा।
"सुन।" मैंने कहा, और इस बार मेरी आवाज़ गुस्से से नहीं, थकान से भरी थी। "मैं आज सुबह सोच रहा था कि मैं सब सँभाल लूँगा। माँ की बीमारी, पापा की चुप्पी, दुकान, काग़ज़, बबलू, वो मीठी आवाज़ वाला आदमी — सब। और अब शाम को मुझे लग रहा है कि मैं सिर्फ़ एक अंधेरे कुएँ में गोली चला रहा हूँ।"
मैंने घंटी को ऊपर उठाया, जैसे किसी से सीधे बात कर रहा होऊँ।
"तू क्यों चुप है? जब मैंने पापा पर चिल्लाया, तब तू चुप रही। जब मैंने बेकार रेडियो तोड़ा, तब तू चुप रही। तुझे क्या लगता है, मैं ग़लत कर रहा हूँ? मुझे गुस्सा नहीं आना चाहिए था? मेरे पापा के नाम के आगे किसी ने लाल स्याही का अँगूठा लगाया है, और तू मुझसे कहेगी कि मैं घर में तोड़ी हुई चीज़ें ढूँढूँ?"
कमरे में चुप्पी।
फिर मैंने घंटी बजाई।
टन्न।
और आवाज़ आई। रूखी। वैसी ही जैसी पहली रात आई थी, जैसे कोई बुज़ुर्ग बिना मुड़े पीछे से बोल रहा हो।
"गुस्से से कुछ नहीं जुड़ेगा।"
मैं कुछ कहने वाला था कि आवाज़ फिर आई, और इस बार उसमें एक अजीब सी गर्मी थी, जो मैंने पहले नहीं सुनी थी।
"पहले वो ढूँढ जो तेरे घर में टूटा है, और जिसे तूने कभी देखा ही नहीं।"
घंटी फिर चुप हो गई।
मैं कमरे में खड़ा रह गया, हाथ में पीतल, और सामने मेज़ पर बिखरा हुआ वो टूटा रेडियो।
जो मेरे घर में टूटा है, और जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं।
मैंने दीवार पर टँगा कैलेंडर देखा। मैंने ट्रंक देखा। मैंने फर्श पर पड़ा वो जंग लगा पेचकस देखा, जो पापा का था और जो कल से यहीं पड़ा है, क्योंकि वो उसे लेने कभी नहीं आए।
और मुझे समझ आया कि आज रात मुझे सोना नहीं है।
आज रात मुझे अपने ही घर में उस चीज़ को ढूँढना है जिसे मैंने चौबीस साल से देखा है, पर कभी देखा नहीं।
॥
रात भर मैंने अपने ही घर में चोरी की।
ऐसे चोरी, जैसे कोई अपनी ही अलमारी में हाथ डाले और फिर हर आवाज़ पर चौंक जाए। पहले रसोई। माँ की हिसाब की कॉपी, मसालों के डिब्बे, पीछे वाला कोना जहाँ पुराने बर्तन रखे हैं और उनके ऊपर धूल की एक मोटी परत बैठी है। फिर माँ का साड़ी वाला बक्सा। कपड़ों के नीचे रिपोर्टें मिलीं, दो टेस्ट की परचियाँ, पुरानी दवाओं के खाली पत्ते, और एक छोटी सी पुड़िया जिसमें माँ ने पहली बार की सुई रखी थी।
पर वो चीज़ नहीं मिली जिसे घंटी ने कहा था।
जो टूटी है और जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं।
फिर पापा की अलमारी। दो कुर्ते, एक चादर, औज़ारों की लोहे की डिब्बी, और नीचे वो पुरानी रस्सी का गोला जिसे उन्होंने आज तक नहीं फेंका। छत पर भी गया। पानी की टंकी के पीछे ईंटों का ढेर, उसके पीछे सिर्फ़ अँधेरा। दुकान के पीछे वाले कमरे में ट्रंक उलट दिया। टूटा रेडियो, औज़ार, पुराने बोल्ट, पंचर वाले टब के नीचे सिर्फ़ कीचड़।
कुछ नहीं।
सुबह हो गई और मैंने कुछ नहीं ढूँढा।
तुम सोच रहे होगे कि एक पूरी रात में इतना कुछ ढूँढने पर भी कुछ नहीं मिला तो मैं बेवकूफ़ हूँ। सच कहूँ तो, मैं उस वक़्त खुद को बेवकूफ़ ही लग रहा था। पर बात ये थी कि मैं चीज़ें ढूँढ रहा था, और घंटी ने मुझसे कहा था — वो ढूँढ जो तोड़ा हुआ है। दोनों में फ़र्क़ होता है। टूटी हुई चीज़ आम तौर पर आँख से छुप जाती है, क्योंकि इंसान उसे देखता नहीं, उसके आर-पार देख जाता है।
सूरज निकलते ही माँ उठ गईं।
खाँसी पहले आई, फिर आवाज़। ऐसे जैसे कोई पुरानी अलमारी खुले। मैंने पानी का गिलास बढ़ाया, उन्होंने लिया, दो घूँट पिए, और फिर मेरी तरफ़ देखकर कहा, "तूने रात में सब कुछ हिला-डुला दिया।"
मैंने कहा, "कुछ ढूँढ रहा था।"
"क्या?"
मैं चुप रह गया।
माँ ने मुझे देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो किसी भी माँ की आँखों में तब आती है जब उसका बच्चा उससे कोई बात छुपा रहा हो और वो समझ जाए कि इस बार बात बड़ी है।
"अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा, "अगर कुछ मिल गया है तो बता दे। छुपाने से बोझ बढ़ता है।"
मैंने उन्हें वो सच नहीं बताया जो मैं खुद नहीं जानता था।
फिर मेरी नज़र घर के उस कोने पर गई, जहाँ पापा का संदूक रखा है।
मैं तुम्हें उस संदूक के बारे में बताता हूँ। वो हमारे घर के उस कोने में है जहाँ शाम को सबसे पहले अँधेरा आता है। लकड़ी का, गहरा भूरा, कोनों पर लोहे की पत्तियाँ, और ऊपर से रस्सी बँधी है। रस्सी ऐसे बँधी है जैसे किसी ने उसे खोलने से नहीं, खुलने से बचाने के लिए बाँधा हो। उसके ऊपर पापा के औज़ार पड़े रहते हैं, एक मोड़ी हुई चादर, और बटनों का एक पुराना टिन।
और मेरे गले में वो चाबी है।
छोटी, काली पड़ चुकी, दाँते घिसे हुए। पापा ने यह चाबी मुझे तब दी थी जब मैं पंद्रह-सोलह साल का था। कहा था — संभाल के रखना। बस। यह किस चीज़ की है, ये कभी नहीं बताया। और मैंने कभी पूछा भी नहीं। घर में कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिन्हें पूछना अपने आप पर शक करने जैसा लगता है।
पर आज सुबह मैंने उस संदूक को बहुत देर तक देखा।
बहुत देर तक।
ऐसे देखा जैसे वो भी मुझे देख रहा हो, और दोनों में से कोई पहले नहीं बोलना चाहता हो।
माँ ने रसोई से कहा, "उस संदूक को ऐसे मत देख, जैसे उसमें कोई ज़िंदा बैठा हो।"
मैंने भीतर से कहा — क्या पता, माँ। क्या पता उसमें सच में कोई बैठा हो।
पापा फर्श पर बैठे थे। वही टूटा पंखा उनके सामने खुला पड़ा था, वही पंखा जिसका तार कल से टूटा है और जिसे वो दो दिन से ठीक करने के बहाने छू रहे हैं। चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ, पेचकस हाथ में, और आँखें उस तार पर जमी हुईं, जो असल में वहाँ नहीं थीं।
मैंने कहा, "पापा, चाय ठंडी हो रही है।"
उन्होंने सिर हिलाया। प्याला उठाया। एक घूँट लिया, और रख दिया।
मुझे कुछ पूछना था। संदूक के बारे में, चाबी के बारे में। पर मैंने पूछा नहीं। मुझे लगा कि आज सुबह अगर मैंने वो सवाल पूछा और वो फिर टाल गए, तो कहीं मैं फिर चिल्ला न दूँ, जैसे कल चिल्लाया था। और ये मैं नहीं चाहता था। कल की शाम ने मुझे उस चीज़ का स्वाद दे दिया था जो बाद में बहुत कड़वा लगता है।
काजल अपनी नर्सिंग की किताब दबाए निकली। बाल बाँधते हुए बोली, "आज डॉक्टर साहब सुबह ही आएँगे, दवा का हिसाब करना है।"
"तू जा," माँ ने कहा। "सीख, आगे काम आएगा।"
काजल ने मुझे देखा। कुछ कहना चाहती थी, फिर नहीं कहा। दरवाज़े से निकलते हुए रुकी और बोली, "अंकुश, आज दुकान के बोर्ड पर चढ़ना कम, टिंकू से करवाना। उसकी फीस का काग़ज़… मैंने देखा है, तेरी जेब में है।"
मैं मुस्कुराया। "अच्छा मैडम।"
वो मुस्कुराई नहीं। बस चली गई। कभी-कभी लोग मुस्कुराते नहीं, क्योंकि उनके मुँह में मुस्कुराहट फँस जाती है।
मैं दुकान पहुँचा तो टिंकू पहले से वहाँ था। बोर्ड उसने उतार लिया था और अपनी पट्टी बँधी उँगलियों से उस पर ज़ंग साफ़ कर रहा था। मुझे देखकर बोला, "उस्ताद, आज चाय आपकी तरफ़ से है। मैं दो घंटे से इसे रगड़ रहा हूँ।"
"रगड़ने से पेंट नहीं आता।"
"तो पेंट लाओ।"
"पैसे हैं नहीं।"
"तो रगड़ते रहो।"
मैंने उसका सिर पकड़कर हिलाया और औज़ार का डिब्बा खोला। दिन शुरू हो गया था, और मन कुछ हल्का लग रहा था, जैसे एक रात बीत जाने से चीज़ें वाकई थोड़ी ठीक हो जाती हों।
फिर मीरा आई।
वो गली में ऐसे घुसी जैसे कोई आँधी घुसे, बिना दरवाज़ा खटखटाए। कैमरा कंधे पर, बैग टूटा हुआ, बाल बिखरे और आँखों के नीचे काले घेरे — जैसे सारी रात किसी काग़ज़ के ऊपर झुकी रही हो।
मैंने मज़ाक किया, "मीरा जी, सुबह-सुबह चेहरा बता रहा है कि रात में भूत देखा है।"
वो नहीं हँसी।
उसने अपना बैग बेंच पर पटका और एक काग़ज़ निकालकर मेरे सामने फैला दिया।
"पढ़।"
"मैं इतना पढ़ा-लिखा नहीं हूँ—"
"मैं पढ़ा देती हूँ।" उसने उँगली रखी। "इस गली की ज़मीन पिछले दो महीने में दो बार नाम बदल चुकी है। एक बार किसी के नाम पर, फिर किसी और के नाम पर। और दोनों बार तारीख़ इतनी आसान थी कि कोई स्कूल का बच्चा भी पकड़ ले।"
मैंने कहा, "तो?"
"तो ये काग़ज़ों की गड़बड़ नहीं है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "ये तैयारी है।"
उसने अपनी उँगली खिसकाई।
"यहाँ से पीपल का पेड़, यहाँ से पीछे का खाली प्लॉट, यहाँ से मुहाने का अस्पताल, और स्कूल की दीवार के पीछे वाली झुग्गी — तीनों एक ही सौदे में जुड़े हुए हैं। एक टुकड़ा। जैसे किसी ने तराज़ू पर नापकर काटा हो।"
मेरा हाथ औज़ार पर रुक गया।
उसने आवाज़ धीमी की, पर वो धीमी आवाज़ ज़्यादा चुभती है, ये मैं तब जाना जब वो बोली।
"और तुम्हारी दुकान का नंबर भी उसी सूची में है। सातवाँ।"
मैंने कहा, "मुझे पता है मेरी दुकान उस सूची में है। मैंने वो सूची देखी है।"
"तो तुम अब भी यहाँ बैठे हो? तुम अब भी इन लोगों को चाय पर बुलाकर, हँसी-मज़ाक करके, अपनी घंटी वाली बातें सुनाकर—"
"रुक।" मैंने कहा। "घंटी वाली बातें क्या मतलब?"
मीरा ने अपना होंठ काटा। ज़ाहिर था कि उसने कुछ ज़्यादा बोल दिया था, पर वो पीछे नहीं हटी। मीरा कभी पीछे नहीं हटती, यही उसकी सबसे अच्छी और सबसे ख़राब आदत है।
"मतलब ये कि तुम लोगों को जोड़ने की बातें करते हो।" उसने कहा। "तुम कहते हो — हम सब एक हैं, हम सब साथ हैं, सब ठीक हो जाएगा। और लोग? लोग सच में मानने लगते हैं। शबनम आपा ने कल रात अपनी बहन को फ़ोन किया। पंद्रह साल बाद। तुम्हें पता है? उसने मुझे बताया। वो रो रही थी, अंकुश। ख़ुशी से नहीं। डर से। क्योंकि उसे लगा कि अब कुछ बदल सकता है।"
मैं चुप रहा।
"और मैं तुमसे पूछती हूँ — किसके भरोसे?" उसने कहा। "तुम्हारे पास क्या है? कोई काग़ज़? कोई वकील? कोई पैसा? कुछ भी? तुम्हारे पास सिर्फ़ बातें हैं। और जब ये सौदा हो जाएगा, और ये गली गिर जाएगी, तो जिन लोगों को तुमने खड़ा किया है, वो और ज़ोर से गिरेंगे। क्योंकि जो ऊँचाई से गिरता है, वो सिर्फ़ हड्डी नहीं तोड़ता। वो भरोसा तोड़ता है।"
मैंने औज़ार रख दिया।
"तुम मुझे ठग समझती हो।"
वो एक पल रुकी।
"मैंने ये नहीं कहा।"
"कहने की ज़रूरत नहीं।" मैंने कहा। "मेले में तुमने मेरी फ़ोटो खींची, मुझे ठग कहकर माइक थमाया, और अब तुम सुबह-सुबह ये काग़ज़ लेकर आई हो, जैसे तुम मुझे पकड़ने आई हो। मैं वो नहीं हूँ जो तुम समझ रही हो, मीरा।"
"तो तुम क्या हो?" उसने पूछा। "बता दो। क्योंकि मैं दो हफ़्ते से देख रही हूँ। तुम चार बच्चों को खबरें लाने भेजते हो। तुम एक बूढ़े दर्ज़ी की बंद दुकान के आगे खड़े रहते हो। तुम एक चायवाली को उसकी बहन से मिलाने की बात करते हो। किसी के पास कोई ताक़त नहीं है, कोई रास्ता नहीं है, और तुम सबको लड़ने के लिए तैयार कर रहे हो। ऐसा आदमी क्या कहलाता है? मुझे बताओ।"
मेरे भीतर कुछ तपक उठा।
वो तपक वो नहीं थी जो काग़ज़ों से आती है। वो वो थी जो तब आती है जब कोई इंसान तुम्हारे सबसे सच्चे हिस्से को उठाकर तुम्हारे मुँह पर पटक देता है और कहता है — देख, ये भी तो बेकार है।
मैंने कहा, "और तुम? तुम हर बात में सिर्फ़ गंदगी ढूँढती हो। किसी की नीयत में, किसी की मेहनत में, किसी की हँसी में भी। शायद इसीलिए तुम्हारा कोई भरोसा नहीं करता।"
मैंने ये बात कही और उसी वक़्त जान गया कि मैंने ग़लत कही।
पर बोला हुआ शब्द वापस नहीं आता। वो हवा में लटक जाता है और वहीं रहता है, तुम्हारे और सामने वाले के बीच, एक टूटे हुए तार की तरह।
मीरा का चेहरा बदला।
एक पल के लिए। सिर्फ़ एक पल। उसकी आँखों में कुछ ऐसा खुला जो वो हमेशा बंद रखती है — जैसे किसी ने कमरे में जलती हुई माचिस डाल दी हो और वो भीतर तक देख लिया हो।
फिर वो बंद हो गया।
उसने अपना काग़ज़ उठाया। तह किया। बड़े ध्यान से बैग में रखा, जैसे उस काग़ज़ का कोई कसूर हो। और बिना मेरी तरफ़ देखे बोली, "ठीक है। मेरा काम हो गया।"
"मीरा—"
"तुम्हारी गली। तुम्हारे लोग। तुम्हारी बातें।" उसने कंधे पर कैमरा सँभाला। "मुझे क्या। मैं तो सिर्फ़ खबर ढूँढती हूँ। और तुमने अभी-अभी बता दिया कि मैं क्या ढूँढती हूँ।"
वो मुड़ी और चली गई।
उसका बैग बेंच से टकराया। एक पें उससे छूटकर धूल में गिरी और वो नहीं रुकी। मैंने उसे उठाना चाहा, पर टिंकू ने पहले उठा लिया। वो उसे लेकर दौड़ा, "दीदी! दीदी, आपकी पेन!"
मीरा ने रुककर पेन लिया। टिंकू के सिर पर हाथ रखा। और फिर आगे बढ़ गई। पर जाते वक़्त उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा, और यही सबसे ज़्यादा बोल गया।
टिंकू लौटा। बोला, "उस्ताद, उनकी आँखें…"
"चाय बना।"
"उस्ताद—"
"टिंकू। चाय।"
वो चला गया। मैं बेंच पर बैठा रहा। मेरे हाथ पर ग्रीस लगी थी और मुझे उसकी खबर नहीं थी। मैं सोच रहा था कि इंसान जब किसी को चोट पहुँचाता है, तो सबसे पहले किस चीज़ का बहाना बनाता है? अपनी थकान का। मैं भी थका था। रात भर सोया नहीं था। माँ की खाँसी सुनकर उठा था। और मैंने उसे वो बात कह दी जो किसी को नहीं कहनी चाहिए थी।
तभी मुझे आवाज़ आई।
टिक। टिक। टिक।
मैंने सिर उठाया।
गली के उस पार, उस्ताद अली बक्श की दुकान का दरवाज़ा खुला था।
कई दिनों से वो बंद था। ताला लगा था, धूल जमी थी, और मैंने सोचा था कि उस्ताद शायद कहीं बाहर गए हैं। पर आज दरवाज़ा खुला था, और भीतर से उनकी पुरानी सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी।
टिक। टिक। टिक।
वो आवाज़ गली की सबसे पुरानी आवाज़ है। मैं बच्चा था जब पहली बार सुनी थी। उस्ताद बैठे रहते हैं, पैर से पेडल दबाते हैं, और सुई ऊपर-नीचे होती रहती है, जैसे कोई दिल धड़क रहा हो।
मैंने बिना सोचे अपनी जेब से घंटी निकाली।
मुझे नहीं पता क्यों निकाली। शायद इसलिए कि जब मन भारी होता है, तो हाथ किसी पुरानी चीज़ को पकड़ना चाहता है। शायद इसलिए कि मैं मीरा की बातों से जूझ रहा था और मुझे कोई ऐसा चाहिए था जो मुझसे बहस करे।
मैंने घंटी दबा दी।
टन।
छोटी सी आवाज़। हल्की। घंटी बोली नहीं। बस बजी।
और उस पार, उस्ताद अली बक्श रुक गए।
मशीन की आवाज़ रुकी नहीं, पर उनके हाथ रुक गए। मैंने दूर से देखा कि उन्होंने सुई से कपड़ा हटाया और सीधे खड़े हो गए। उनका चश्मा नाक पर था, कान पर पेंसिल, और सफ़ेद दाढ़ी में आज कुछ और भी सफ़ेद लग रहा था।
वो दुकान के दरवाज़े पर आए। हाथ दरवाज़े की लकड़ी पर रखा। और मेरी तरफ़ देखा।
फिर वो धीरे-धीरे चलकर आए।
उस्ताद कभी जल्दी नहीं चलते। कहते हैं, उम्र ने उन्हें एक-एक कदम की कीमत सिखा दी है। आज उन्होंने वो दूरी और भी धीरे तय की। नाली के पत्थर के पुल पर उन्होंने एक बार रुककर मेरी तरफ़ देखा, फिर आगे बढ़े।
शबनम आपा अपनी गुमटी से झाँकने लगीं। टिंकू अपनी चाय छोड़कर दरवाज़े पर आ गया।
उस्ताद मेरे सामने आकर खड़े हुए।
और फिर बोले, "फिर से बजाओ।"
मैंने कहा, "क्या?"
"घंटी।" उन्होंने मेरे हाथ की तरफ़ देखा, जिसमें वो अब भी थी। "फिर से बजाओ।"
मैंने बजाई।
टन।
घंटी चुप रही। बिल्कुल चुप। जैसे वो भी उस्ताद को देख रही हो और उनकी नज़रों से बचने के लिए साँस रोककर खड़ी हो।
उस्ताद बहुत देर तक उसे देखते रहे। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "ये कहाँ से आई?"
"दादा की साइकिल पर थी।"
"तुम्हारे दादा।" वो इतना ही बोले।
फिर चुप।
मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा, क्योंकि जो आदमी कभी दो शब्द से ज़्यादा नहीं बोलता, वो आज मेरे सामने खड़ा होकर चुप हो गया था। और ये चुप्पी उनके स्वभाव की चुप्पी नहीं थी। ये वो चुप्पी थी जो इंसान के भीतर तब आती है जब वो किसी पुराने दरवाज़े के सामने खड़ा हो जाए जिसे उसने खुद बंद किया था।
मैंने कहा, "उस्ताद, ये घंटी—"
"ये घंटी किसी की मिरासी होती है।"
"मिरासी?"
"मिरासी।" उन्होंने कहा। "मतलब वो चीज़ जो विरासत में मिलती है। पर हर विरासत में हिसाब होता है, बेटा। ज़मीन मिलती है तो उसका लगान होता है। नाम मिलता है तो उसकी मर्यादा होती है। और अगर आवाज़ मिले, तो उसका हिसाब सबसे भारी होता है।"
मैंने कहा, "मुझे ये बातें समझ नहीं आ रही—"
"मत समझो।" उन्होंने कहा। "पहले सुनो।"
उन्होंने मेरे हाथ से घंटी नहीं ली। छूई नहीं। बस देखी, जैसे कोई पुराने दोस्त को बहुत सालों बाद देखता है, और ये नहीं चाहता कि दूसरा उसे पहचान ले।
"ये बाज़ार में मत दिखाना।" उन्होंने कहा। "न किसी कबाड़ी को, न किसी दुकानदार को, न किसी साहब को। जो इसे देखेगा, वो इसकी कीमत लगाएगा। और जिसकी कीमत लग गई, वो चीज़ आम हो जाती है। ये आम होने के लिए नहीं बनी।"
मैंने कहा, "उस्ताद, कल बबलू पांडे ने मुझसे कहा कि साइकिल का हैंडल बदल दो, वरना कोई उखाड़कर फेंक देगा।"
उस्ताद ने एक पल को आँखें बंद कीं।
"तो उसने हैंडल नहीं देखा होता।" उन्होंने कहा। "उसने घंटी की जगह देखी होती।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"और जो इसे बजाता है," उन्होंने कहा, "उसे पता होना चाहिए कि हर आवाज़ का हिसाब होता है। आवाज़ मुफ़्त नहीं होती, बेटा। हम सोचते हैं कि बोलना मुफ़्त है। एक शब्द बोल दिया, हँस दिए, टाल दिया। पर हर आवाज़ दूसरे कान में जाकर बैठ जाती है, और वहाँ वो कुछ न कुछ खा जाती है। किसी का भरोसा, किसी का सब्र, किसी की नींद।"
मैंने धीरे से कहा, "मैंने आज सुबह किसी से ऐसी बात कही, जो नहीं कहनी चाहिए थी।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें मोटे चश्मे के पीछे से भी साफ़ दिख रही थीं।
"तो जा और माफ़ी मांग।" उन्होंने कहा। "माफ़ी मांगना आदमी का सबसे बड़ा हुनर है, और ये हुनर किसी स्कूल में नहीं सिखाया जाता।"
"पर वो सुनने को तैयार नहीं होगी।"
"तो बैठ जाना उसके दरवाज़े पर।" उस्ताद ने कहा, और मुझे लगा कि वो मज़ाक नहीं कर रहे। "जो लड़की पंद्रह साल बाद बहन को फ़ोन करवा सकती है, वो खुद भी माफ़ी सुन सकती है। बस उसे सही आवाज़ चाहिए। तेरी आवाज़ में आज सुबह एक औरत का चेहरा था, बेटे। वो आवाज़ नहीं, वो तलवार थी।"
मैंने सिर झुका लिया।
उस्ताद ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। उनका हाथ हड्डी जैसा पतला था, पर मज़बूत। कुछ लोग पतले होते हैं, पर उनमें जो होता है वो मोटा नहीं होता, वो गहरा होता है।
"अब सुन।" उन्होंने कहा। "तूने ये चीज़ मेले से लाई, या सड़क से, या किसी के हाथ से — मुझे नहीं पूछना। पर दो बात मैं तुझे बता रहा हूँ, और याद रखना। पहली, ये चीज़ तुझे मिली नहीं है। ये चीज़ तुझे दी गई है। और जो दी जाती है, उसका कर्ज़ होता है।"
"और दूसरी?"
"दूसरी ये कि तेरे पापा—" वो रुके। फिर बोले, "तेरे पापा से कह देना कि उस्ताद ने याद किया। और कहना कि उस्ताद अब भी उस दिन को याद करते हैं जब उन्होंने मेरी दुकान पर साइकिल खड़ी करते हुए ये कहा था — उस्ताद, सिर्फ़ तीन दिन के लिए।"
मेरी साँस रुक गई।
"तीन दिन," उस्ताद ने धीरे से दोहराया, "और वो तीन दिन पच्चीस साल हो गए।"
वो मुड़े और चलने लगे। उनके कदम धीमे थे, पर इस बार कुछ और भी था उनमें — जैसे कोई बोझ उठाकर रख दिया हो और फिर वापस उठा रहा हो।
वो आधी गली तक गए।
शबनम आपा ने गुमटी के दरवाज़े से झाँका, टिंकू मेरे पीछे खड़ा था और उसकी चाय ठंडी हो चुकी थी।
और फिर उस्ताद रुके।
वो मुड़े नहीं। बस वहीं खड़े होकर, पीठ मेरी तरफ़, बोले। उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे लगा गली ने भी साँस रोक ली है।
"ये आवाज़ मैंने पहले सुनी है।"
पीछे उनकी दुकान में मशीन की टिक-टिक अब भी आ रही थी, दूर, हल्की, जैसे कोई दूसरे कमरे में कोई सिलाई कर रहा हो।
"पचास साल पहले।" उस्ताद ने कहा। "और उस दिन मैंने अपना भाई खो दिया था।"
वो आगे बढ़े।
और उसी पल पीछे उनकी दुकान में मशीन की आवाज़ बंद हो गई।
मैं हाथ में घंटी लिए खड़ा रह गया। वो ठंडी हो चुकी थी — बर्फ़ जैसी नहीं, हड्डी जैसी। और मुझे लगा कि जो आवाज़ मैंने अभी सुनी, वो घंटी की नहीं थी। वो उस्ताद के भीतर से आई थी, किसी बंद संदूक में से, जिसकी चाबी उन्होंने पचास साल पहले खो दी थी।
॥
"उस्ताद —" मैंने कहा।
वो रुके नहीं। बस उनका एक हाथ पीछे की तरफ़ उठा, हथेली मेरी तरफ़, जैसे कोई रास्ता रोक रहा हो। इतना ही। कोई शब्द नहीं। कोई मुड़कर देखना नहीं।
मेरे मुँह में जो सवाल था, वो अधूरा ही रह गया। आधा गले में, आधा होंठों पर।
उस्ताद की पीठ धीरे-धीरे गली के मोड़ की तरफ़ बढ़ती गई। उनके कंधे झुके हुए थे। एक कदम, फिर दूसरा। जैसे हर कदम के साथ कुछ पीछे छूट रहा हो और वो जानबूझकर उसे उठाने नहीं लौट रहे हों।
पीछे उनकी दुकान में मशीन चुप थी। बिल्कुल चुप। जैसे उसने भी पचास साल पुरानी कोई बात सुन ली हो और साँस रोक ली हो।
टिंकू मेरे पीछे खड़ा था। उसकी चाय ठंडी हो चुकी थी, कप अब भी उसके हाथ में था, पर वो एक घूँट भी नहीं लिया था।
"उस्ताद," टिंकू ने फुसफुसाया, "उनका भाई…?"
"पता नहीं।"
"आप पूछते क्यों नहीं?"
"उन्होंने हाथ उठा दिया, टिंकू।"
"तो?"
"तो मतलब अभी नहीं।"
मैंने घंटी को जेब में डाला। वो ठंडी थी। मेरी जाँघ से उसकी ठंडक छनकर अंदर तक गई, जैसे जेब में बर्फ़ नहीं, कोई हड्डी रखी हो।
शबनम आपा गुमटी के दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनके हाथ में लोहे की चिमटी थी, और चेहरे पर वो भाव था जो लोग तब बनाते हैं जब वो कुछ समझ नहीं पाते पर समझने की कोशिश भी नहीं करते।
"क्या हुआ इनको?" उन्होंने पूछा।
"पता नहीं, आपा।"
"उस्ताद ऐसे नहीं होते।" उन्होंने चिमटी नीचे की। "सत्तर साल के हो गए, मैंने इन्हें कभी ऐसे नहीं देखा। ये आदमी जब बोलता है तो सीधा बोलता है, घूमकर नहीं।"
"आज घूमकर बोले।"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर उस्ताद की तरफ़, जो अब गली के मोड़ पर पहुँच चुके थे और उनका सिर सिर्फ़ एक छोटे से अंधेरे टुकड़े जितना दिख रहा था।
"जा," उन्होंने कहा। "पीछे मत जा। पर दोपहर तक जाकर बैठ जाना उनकी दुकान पर। चुपचाप। कुछ मत पूछना। बस बैठ जाना।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो आदमी पचास साल से किसी बात को अकेले ढो रहा है," शबनम आपा ने कहा, "उसको बोलने के लिए सिर्फ़ सवाल काफ़ी नहीं होता। उसको आदमी चाहिए जो चुप बैठ सके।"
मैंने सिर हिलाया।
उस रात मैं ठीक से सोया भी नहीं, और सोया तो सपने में उस्ताद की मशीन की आवाज़ आती रही। टिक, टिक, टिक। और फिर अचानक चुप।
सुबह मैंने दुकान खोली तो हाथ काँप रहे थे। मैंने खुद को डाँटा — अंकुश, ये कोई जंग नहीं है, ये सिर्फ़ एक दुकान है, एक टायर है, एक पंचर है। पर हाथ नहीं माने।
पहला ग्राहक उसी बूढ़े अंकल थे जो रोज़ अपनी औरत को अस्पताल ले जाने के लिए साइकिल लाते हैं। उनकी साइकिल की सीट बहुत पुरानी है, और उस पर बैठने की जगह सिर्फ़ एक ही है। वो बैठते हैं, औरत पीछे की रॉड पर। सालों से यही चल रहा है।
"अंकुश भाई," उन्होंने कहा, "पिछला पहिया ज़रा देख लेना। हिलता है।"
"हाँ," मैंने कहा। "हाँ।"
मैंने पहिया उठाया। फिर वापस रख दिया। फिर उठाया।
"अंकुश भाई?"
"हाँ।"
"तुमने सुना?"
"सुना। पहिया।"
"पर तुमने देखा नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो मुस्कुरा रहे थे, पर उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बुज़ुर्ग लोगों की आँखों में तब आती है जब वो किसी जवान को देखकर अपना कोई पुराना चेहरा याद कर लेते हैं।
"कहाँ खोए हो?" उन्होंने पूछा।
"कहीं नहीं।"
"बेटा, मैं पचहत्तर साल का हूँ। मैं जानता हूँ कि 'कहीं नहीं' का मतलब क्या होता है।"
मैं हँसा। पर हँसी आधी निकली।
"अंकल, आपको कभी ऐसा लगा है कि आपके हाथ में कुछ है, पर आपको पता नहीं कि वो क्या है?"
वो रुके। फिर बोले, "एक बार।"
"क्या?"
"मेरी औरत की पहली रिपोर्ट। डॉक्टर ने काग़ज़ थमा दिया, मैंने पकड़ लिया। पर मुझे पढ़ना नहीं आता था। पढ़ना आता था, पर उस भाषा में नहीं। मैं उस काग़ज़ को तीन दिन जेब में रखे घूमता रहा। खाना खाया, काम किया, हँसा, झगड़ा किया — और जेब में वो काग़ज़ था, जो मेरे पूरे जीवन का फ़ैसला था, और मैं उसे पढ़ नहीं सकता था।"
"फिर?"
"फिर एक चपरासी ने पढ़कर सुनाया।" उन्होंने कहा। "दस मिनट में सब खत्म। दस मिनट। और मैंने उसके लिए तीन दिन जेब में आग रखी थी।"
उन्होंने साइकिल की तरफ़ इशारा किया।
"जो चीज़ तेरे हाथ में है," उन्होंने कहा, "उसका चपरासी भी कोई होगा। ढूँढ उसे। खुद मत पढ़ने की ज़िद कर। कुछ काग़ज़ ऐसे होते हैं जिन्हें अकेले पढ़ना जान को खतरे में डाल देता है।"
मैंने सिर हिलाया। पहिया ठीक किया। उन्होंने पैसे दिए, दो रुपये ऊपर रख दिए, और चले गए।
दो रुपये मैंने उसी वक़्त गुमटी की कटोरी में डाल दिए, जहाँ गली के लोग चाय के पैसे छोड़ते हैं।
दोपहर में मैं उस्ताद की दुकान पर गया। बैठ गया, जैसा शबनम आपा ने कहा था। दरवाज़े के पास, चौकी पर। कुछ नहीं बोला।
उस्ताद बैठे थे, मशीन के सामने, और उनके हाथ में एक पुरानी कुर्ता था, जिसे वो पचास बार देख चुके थे, दोबारा देख रहे थे।
आधा घंटा ऐसे ही बीता।
फिर उस्ताद ने सुई बदली। टिक-टिक शुरू हुई। और मुझे लगा कि दुकान में फिर हवा भर गई है।
"तू अभी भी यहाँ है?" यह उन्होंने पूछा, जैसे अभी देखा हो।
"बैठा हूँ।"
"कुछ पूछना है?"
"आपने हाथ उठाया था कल।"
"याद है मुझे।" उन्होंने सुई रोकी। "अब भी नहीं पूछना।"
"क्यों?"
"क्योंकि मेरी बात सुनकर तुझे कुछ नहीं मिलेगा।" उन्होंने कुर्ता मोड़ा। "पचास साल पुरानी बात सुनकर तू क्या करेगा? रोएगा? दुखी होगा? मेरे भाई को लौटा लाएगा?"
मैं चुप हो गया।
"पहले ये देख," उन्होंने कहा। "घंटी क्या माँगती है। ये जो तेरी जेब में है, ये भूखी है। और भूखी चीज़ें माँगती हैं। जब तक तू इसे समझ नहीं लेता, मेरी बातें तेरे काम की नहीं।"
"आप मुझे बता दीजिए।"
"नहीं।" उन्होंने साफ़ कहा। "क्योंकि जो बात आदमी खुद नहीं खोजता, वो उसके काम नहीं आती। मैंने पचास साल पहले किसी से पूछ लिया था — 'ये कैसे चलता है?' और वो आदमी मुझे बता भी दिया। इसीलिए मैंने भाई खोया।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा सिलाई मशीन की तरह शांत था। पर हाथ नहीं थे। हाथ रुक-रुक कर कुर्ते को मोड़ रहे थे, जैसे उँगलियाँ बात करना चाहती थीं और आवाज़ नहीं थी।
"उस्ताद —"
"जा।" उन्होंने कहा। "शाम को आना। और अगर न आ सको तो महीने बाद आना। मैं भाग नहीं रहा। मैं इसी दुकान पर हूँ, जहाँ तेरे पापा ने साइकिल खड़ी की थी।"
मैं उठ गया।
दरवाज़े पर पहुँचकर मुड़ा। "उस्ताद, एक दिन मैं वापस आऊँगा और उस दिन आपको बोलना पड़ेगा।"
"उस दिन तो बोलूँगा शायद।" उन्होंने कहा। "पर उस दिन तेरे पास मेरे जवाब से ज़्यादा ज़रूरी सवाल होंगे, बेटा। और सवाल ही तो जवाब से बड़े होते हैं।"
वो मुस्कुराए। पचास साल में पहली बार ऐसे मुस्कुराए जैसे मुस्कुराहट उनके चेहरे पर मेहमान बनकर आई हो, रहने के लिए नहीं आई हो।
मैं बाहर निकला।
पूरा दिन मैं बेचैन घूमता रहा। दुकान पर बैठा, एक साइकिल की चेन तेल से साफ़ की, फिर वही चेन तीन बार साफ़ की। टिंकू सवाल पूछता रहा और मैं आधे जवाब देता रहा।
"उस्ताद, ये बोल्ट कहाँ लगेगा?"
"वहाँ।"
"कौन वहाँ?"
"वही वहाँ।"
"उस्ताद, आप आज भी वही वहाँ-वहाँ कर रहे हैं।"
"तो तू वही वहाँ-वहाँ खुद कर ले।"
टिंकू ने मुँह बिगाड़ा और चला गया। फिर लौटा और बोला, "उस्ताद, फीस का काग़ज़ अभी भी नहीं आया।"
"कल देखेंगे।"
"कल आप यही बोलेंगे।"
"फिर परसों देखेंगे।"
"उस्ताद, कहीं आप स्कूल मत बंद करवा देना मेरा।"
मैं रुक गया। उसकी तरफ़ देखा। वो तेरह साल का है, पर उसकी आँखों में वो डर था जो पचास साल के आदमी की आँखों में भी नहीं आता। वो डर नहीं था कि स्कूल में क्या होगा। वो डर था कि कहीं ये दुकान भी न छिन जाए।
"टिंकू," मैंने कहा, "सुन।"
"हाँ?"
"आज तेरी फीस भूल जा। आज कुछ और होने वाला है। मुझे समझ नहीं आ रहा क्या, पर होने वाला है। और उसके बाद मैं तेरी फीस का भी कुछ करूँगा।"
वो मुझे देखता रहा। "क्या होने वाला है?"
"पता नहीं।"
"तो आपको कैसे पता कि होने वाला है?"
"क्योंकि मेरी जेब में जो है," मैंने कहा, "वो मुझे अंदर से खींच रही है। जैसे किसी घर का दरवाज़ा खुला रह गया हो और हवा आ रही हो।"
टिंकू ने कुछ सोचा। फिर बोला, "उस्ताद, किसी दिन आप मुझे ये सब खोलकर बताओगे?"
"खोलकर नहीं," मैंने कहा। "खोलने पर तो मेरा ही सिर फट रहा है। पर जब कुछ समझ आएगा, पहले तुझे बताऊँगा।"
वो खुश हो गया, जितना तेरह साल का लड़का फीस के डर के साथ खुश हो सकता है।
शाम को हम सब शबनम आपा की गुमटी पर बैठे थे। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — चारों अपने-अपने गिलास पर झुके हुए थे। शबनम आपा ने सबको गरमा-गरम चाय दी थी, और कहा था कि पैसे महीने के आख़िर में देंगे।
"आपको पता है," मैंने कहा, "आज कुछ अजीब होने वाला है।"
"कैसे पता?" सानिया ने पूछा।
"पता ही नहीं है।"
"तो काहे बोल रहे हो?" चिंटू ने कहा, जो सबसे छोटा था और सबसे ईमानदार।
"क्योंकि आज अंदर एक आवाज़ है," मैंने कहा। "जो हमेशा नहीं होती।"
"भूत की आवाज़?" गुड्डू की आँखें बड़ी हो गईं।
"नहीं।"
"आपकी वही साइकिल वाली आवाज़?"
मैं चुप हो गया।
चारों एक साथ मेरी तरफ़ देखने लगे। मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि इन चारों को कुछ पता है। बच्चे सब जानते हैं। यही इनकी सबसे बड़ी ताक़त है और सबसे बड़ी मुसीबत।
"तुम लोगों ने क्या सुना?"
"कुछ नहीं," सानिया ने कहा। "पर आपका चेहरा देखकर लग रहा है।"
शबनम आपा पीछे से बोलीं, "बच्चे, चाय पीओ। बड़ों के अंदर की आवाज़ नहीं सुननी। वो अंदर की होती है इसलिए अंदर ही रहने दो।"
"पर आपा," रफ़ीक़ ने कहा, "वो कभी बाहर आती है?"
शबनम आपा ने समोसे की प्लेट रखी और बोलीं, "जब बाहर आती है, तो सबको पता चल जाता है। आज चुप है। इसलिए खाओ।"
बच्चे हँसे और समोसे पर टूट पड़े।
मैंने चाय का आख़िरी घूँट लिया और डोंगी कटोरी में रखी। जब मैं उठा, शबनम आपा मेरी तरफ़ झुकीं और उन्होंने धीरे से कहा, "अंकुश, उस्ताद से मिला?"
"मिला।"
"कुछ बोले?"
"ना बोलने की बात बोले।"
उन्होंने सिर हिलाया। "पचास साल पहले," उन्होंने कहा, "मैं छोटी थी। पर मुझे याद है कि उस्ताद के साथ एक आदमी हुआ करता था। बहुत हँसता था। दोनों भाई दुकान पर बैठते, बातें करते, और कभी-कभी मुझे भी टॉफ़ी देते।"
"फिर?"
"फिर एक दिन वो आदमी नहीं आया।" उन्होंने कटोरी पोंछी। "उस्ताद ने उनके बारे में कभी नहीं बताया। मैंने भी नहीं पूछा। कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिन्हें पूछने से जवाब नहीं, दरारें खुलती हैं।"
मैंने उनका हाथ थाम लिया। उनका हाथ गरम था, चूल्हे के पास का।
"आपा, अगर मैं किसी दिन उनसे पूछूँ, तो बुरा तो नहीं होगा?"
"बुरा तो नहीं होगा," उन्होंने कहा, "पर तैयार रहना। क्योंकि जवाब तेरी जेब की चीज़ से जुड़ा होगा, और तेरी जेब की चीज़ किसी को मुफ़्त में कुछ नहीं देती।"
मैं घर लौटा।
घर में बल्ब जल रहा था। माँ फ़र्श पर बैठी थीं, सामने कॉपी खुली थी, और वो उँगली से हिसाब लगा रही थीं। उनके होंठ हिल रहे थे, जैसे अंदर ही अंदर जोड़-घटाव कर रही हों।
मैंने चप्पल उतारी। वो उठीं नहीं।
"आ गया?" उन्होंने पूछा, बिना ऊपर देखे।
"हाँ।"
"खाना रखा है। खा ले।"
"आप खाईं?"
"मैं बाद में।" उन्होंने कॉपी में कुछ लिखा। कलम रुकी। फिर वो बोलीं, "अंकुश, ज़रा बैठ।"
मैं बैठ गया।
उन्होंने कॉपी बंद की। उनके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ नहीं। आवाज़ सीधी थी, जैसे किसी सपाट ज़मीन पर चल रही हो।
"मैं तुझे कुछ बताने वाली हूँ," उन्होंने कहा, "और तू बीच में कुछ नहीं बोलेगा।"
"अच्छा।"
"मेरे दो टेस्ट और हैं। डॉक्टर साहब ने दवा बदली है, नई दवा महँगी है। और हिसाब देखो तो टिफ़िन से जो आता है, उतने में दवा और खाना दोनों नहीं निकलेंगे।"
"माँ —"
"मैंने बोला ना, बीच में नहीं बोलेगा।"
मैं चुप हो गया।
माँ ने गहरी साँस ली। "मैंने सोचा है कि दो हफ़्ते की दवा छोड़ दूँ।" उन्होंने कहा। "दो हफ़्ते से कुछ नहीं होगा। खाँसी थोड़ी बढ़ेगी, पर रुपये जुड़ जाएँगे। फिर जब पैसे हों, तब टेस्ट करा लूँगी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मेरे हाथ कुछ और भी हो गए।
"अंकुश?"
"आप दवा नहीं छोड़ेंगी।"
"मैंने तुझसे कुछ और कहा था।"
"माँ, आप दवा नहीं छोड़ेंगी।" मेरी आवाज़ धीमी थी, पर अंदर से कुछ ऐसा निकल रहा था जो मेरी आवाज़ नहीं थी — ये वो आवाज़ थी जो मैंने खुद नहीं सुनी थी, कभी। "मैं पैसे का इंतज़ाम करूँगा।"
"कैसे?"
यही सवाल। यही एक सवाल जो सबसे छोटा है और सबसे बड़ा है। कैसे।
मेरे पास जवाब नहीं था।
मैं उठ गया। शर्ट पहनी। चप्पल पहनी।
"कहाँ जा रहा है?"
"थोड़ी देर में आता हूँ।"
"अंकुश —"
"माँ, मैं ठीक हूँ। बस थोड़ी हवा लेने जा रहा हूँ।"
मैं बाहर निकला, और मुँह से एक लंबी साँस निकली, जैसे किसी साँस की जगह किसी ने दीवार बना दी हो।
मैंने बाहर से ही माँ को देखा। वो वापस बैठ गईं, कॉपी खोली, और फिर उसी पन्ने पर नज़रें गड़ा दीं। बल्ब की रोशनी में उनका चेहरा और छोटा लग रहा था।
फिर मैंने देखा कि काजल दरवाज़े की आड़ में खड़ी थी। उसने सब सुना था। उसके हाथ में नर्सिंग की किताब थी, और उसकी आँखें भीगी थीं। उसने मुझे देखा, और जल्दी से हाथ से आँख पोंछी, जैसे अपराध पकड़ा गया हो।
"कुछ नहीं," उसने कहा। "मैं ठीक हूँ।"
"काजल —"
"अंकुश, मैं ठीक हूँ।" उसकी आवाज़ माँ जैसी हो गई थी, बस थोड़ी पतली और थोड़ी कच्ची। "मैं कल डॉक्टर साहब से पूछ लूँगी कि क्या कोई और रास्ता है।"
"क्या रास्ता?"
"कोई स्कीम, कोई फ़ंड, कुछ तो होता है। मैं पूछूँगी।"
"पूछ लेना।" मैंने कहा। "और काजल — तूने सुना जो माँ ने कहा, वो होने मत देना। किसी भी हालत में। अगर ज़रूरत पड़े तो —"
"तो?"
"तो मेरी दुकान के औज़ार बेच देना, पर माँ की दवा नहीं।"
उसकी आँखें भर आईं। "तू पागल है।"
"एक दिन पहले भी किसी ने बोला था।" मैं मुस्कुराया। "आज दोपहर में उस्ताद ने बोला।"
वो हँसने की कोशिश कर गई, फिर रोने लगी। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। वो अठारह साल की है पर उस वक़्त अस्पताल की ट्रेनी नहीं, छोटी बहन लग रही थी।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में आया।
अंदर लोहे की अलमारी, औज़ारों का ट्रंक, बल्ब जो अभी भी धीरे से गुनगुना रहा था। और फ़र्श पर रोटी का टिफ़िन, जो माँ ने रख दिया था। वो ठंडा हो चुका था।
मैंने उसे नहीं खाया।
मैंने बल्ब बुझाया और छत पर चढ़ गया।
दुकान के पीछे वाली छत छोटी है, आधी ईंट की, आधी टीन की। वहाँ से पूरी गली दिखती है। पीपल का पेड़, पत्थर की चबूतरी, वो पुराना मोहाने वाला नल, और उसके पार उस्ताद की दुकान का छोटा सा अंधेरा बिंदु।
मैं लेट गया। ऊपर आसमान नहीं था, सिर्फ़ शहर की धूल थी, जिसमें दो-चार तारे मुश्किल से दिख रहे थे।
जेब में हाथ डाला। घंटी निकाली। ठंडी नहीं थी, आज गरम थी। अजीब। कल हड्डी जैसी ठंडी थी, आज जैसे किसी ने उसे चूल्हे के पास रख दिया हो।
मैंने उसे सीने पर रखा।
और मन में जो एक ही बात घूम रही थी, वो यह थी — मैं अपना घर बचा पाऊँगा या नहीं?
ये बात मैंने कभी किसी से नहीं कही। टिंकू से नहीं, मीरा से नहीं, काजल से नहीं, माँ से नहीं। अपनी छत पर, अंधेरे में, हर आदमी अपने सबसे बड़े डर से ईमानदारी से बात करता है, क्योंकि वहाँ कोई सुनने वाला नहीं होता।
पर आज सुनने वाला था।
मैंने सोचा — क्या बचाना है? दुकान? चार दीवारें? माँ का इलाज? या वो चीज़ जो अभी भी इन सबके बीच से मुझे देखती है और मुस्कुराती है?
मुझे याद आया, बचपन में पापा मुझे साइकिल पर बैठाते थे और कहते थे, "पकड़ ले कसकर।" मैं उनकी कमर पकड़ लेता था। बड़ा होकर मैंने वही साइकिल चलाई, पंचर किए, चेन लगाई, और एक दिन वो साइकिल कहीं खो गई। इतनी चुपचाप कि मुझे पता ही नहीं चला। पापा ने कभी नहीं पूछा — साइकिल कहाँ गई?
इतने साल बाद पता चला, वो दादा की थी। और उस्ताद की दुकान पर पड़ी थी। और पापा हर रोज़ उस गली से गुज़रते थे।
हर रोज़। पच्चीस साल से।
अब मुझे समझ आ रहा था कि पापा चुप क्यों हैं। वो मजबूत आदमी नहीं, वो टूटा हुआ आदमी है, जो हर रोज़ उस गली से गुज़रता है जहाँ उसका पापा की साइकिल रखी है, और जहाँ उसका गुनाह इसका इंतज़ार कर रहा है।
उसका गुनाह। उसका कोई गुनाह है। मैंने सोचा। पापा ने कुछ किया है जो मुझे नहीं पता।
मेरी जेब में जो काग़ज़ था — नहीं, जो काग़ज़ मैंने देखा था, उस पर पापा का नाम और लाल अँगूठे जैसा निशान।
पापा।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
उसी वक़्त घंटी बजी।
नहीं, बजी नहीं — फूटी। जैसे किसी ने बरसों बाद अपनी आवाज़ उठाई हो। एक लंबी, साफ़, खुली आवाज़। टन्। और उसमें से कुछ निकला, जो हवा में फैल गया और दूर तक चला गया, और उसके बाद घंटी एक सुर में बजती रही, जैसे किसी ने चाबी घुमा दी हो और वो अपने आप चलने लगा हो।
मैं उठकर बैठ गया।
मेरे हाथ में कुछ नहीं था। घंटी मेरे सीने पर रखी थी, और मेरे दोनों हाथ उसके दोनों तरफ़ थे। बिना छुए। फिर भी बज रही थी।
मेरी साँस रुक गई।
"तू बज रही है," मैंने फुसफुसाया।
आवाज़ आई। धीमी। पहली बार धीमी। जैसे वो भी थकी हुई हो।
"आज मुझे खुद बजना पड़ा।"
मैंने घंटी को दोनों हाथों में उठाया और सीने से लगा लिया। ये क्या कर रहा हूँ मैं? मैंने सोचा। ये धातु का टुकड़ा है। पर उस वक़्त मुझे लगा कि मैं किसी को थाम रहा हूँ, जो गिर रहा था।
"क्यों?"
"क्योंकि तू सुन नहीं रहा था।" आवाज़ ने कहा। "तू छत पर लेटा था और अंदर से खुद से एक सवाल पूछ रहा था, जिसका जवाब मैं नहीं दे सकती।"
"तू जानती है मेरा सवाल?"
"तेरे सवाल की बात नहीं है।" आवाज़ ने कहा। "तेरे सवाल की गंध है। वो मेरे पास आती है और मुझे पता चल जाता है कि तू किस तरफ़ देख रहा है।"
मैं चुप हो गया।
आवाज़ कुछ देर चुप रही। फिर बोली, बहुत धीमे, "तू डर रहा है कि घर बचेगा या नहीं।"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैं तुझे अपने बारे में एक बात बताती हूँ।" उसने कहा। "मैं मरम्मत करती हूँ। पर मैं बचा नहीं सकती। मैं टूटी चीज़ जोड़ सकती हूँ, पर उसे गिरने से नहीं रोक सकती। वो काम तेरा है, और तेरे लोगों का। अगर तू सोचता रहा कि मैं सब ठीक कर दूँगी, तो तूने मुझे ग़लत समझा है।"
"तो तू किस लिए है?"
"मैं उन रास्तों के लिए हूँ," आवाज़ ने कहा, "जो तुझे दिखते नहीं। मैं रास्ते नहीं बनाती, मैं बंद दरवाज़ों पर हल्की-सी दस्तक देती हूँ। खोलना तेरा काम है।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। वो दो-चार तारे अब भी थे, बस अब मुझे लग रहा था कि वो भी सुन रहे हैं।
"कल सुबह," आवाज़ ने कहा।
मैं सीधा हो गया।
"क्या?"
"कल सुबह दुकान पर दो भाई आएँगे।" उसकी आवाज़ में अब कुछ और था, जैसे कोई बहुत पुरानी बात अब भी उसके अंदर काँप रही हो। "उनके बीच एक पुरानी साइकिल का कर्ज़ टूटा पड़ा है।"
"कर्ज़?"
"कर्ज़ सिर्फ़ पैसे का नहीं होता।" उसने कहा। "कभी कर्ज़ एक शब्द का होता है, कभी एक चुप्पी का, कभी एक दिन का। इन दोनों का कर्ज़ साइकिल का है, और साइकिल के साथ वो सब जुड़ा है जो साइकिल ने ढोया — एक भाई का कंधा, दूसरे भाई की चुप्पी।"
मैंने घंटी को और कसकर पकड़ लिया।
"मुझे उनमें से एक को जोड़ना है," आवाज़ ने कहा।
"मतलब?"
"मतलब दोनों को।" उसने कहा। "जब दो जुड़ते हैं, तब एक जुड़ता है। यही मेरा हिसाब है।"
फिर वो चुप हो गई।
मैंने इंतज़ार किया। छत पर हवा चल रही थी। नीचे गली में कहीं कोई दरवाज़ा बंद हुआ। किसी ने खाँसा। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था।
"फिर?" मैंने पूछा। "फिर क्या? मैं क्या करूँ?"
"तू सिर्फ़ एक चीज़ कर सकता है," आवाज़ ने कहा। "उन्हें बैठना। दोनों को एक-दूसरे के सामने बैठना, और तेरे सामने नहीं। मेरे सामने नहीं। एक-दूसरे के सामने। और तब जो वो बोलेंगे, तू सुनेगा। सिर्फ़ सुनेगा।"
"अगर वो नहीं बोलें?"
"तो तू उन्हें अपनी बात नहीं बताएगा।" उसने कहा। "तू उनकी बात पूछेगा।"
"क्या पूछूँ?"
आवाज़ रुकी। फिर बोली, "उनसे पूछ — साइकिल कहाँ है?"
मेरे पूरे शरीर में एक झुरझुरी दौड़ गई।
"बस?"
"बस।" उसने कहा। "और जब जवाब आए, तब तू जान जाएगा कि तुझे अंदर कब बोलना है और कब चुप रहना है।"
मैंने घंटी नीचे रख दी। सीने पर। फिर उठाया और जेब में डाल दिया। फिर निकाला। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसे कहाँ रखूँ। ये पहली बार हुआ कि मुझे उसके पास होने से डर नहीं लग रहा था — बस उसे खोने से लग रहा था।
"एक बात और," मैंने कहा। "उस्ताद ने कहा कि वो ये आवाज़ पचास साल पहले सुनी थी। और उस दिन उन्होंने अपना भाई खोया।"
आवाज़ चुप रही।
"ये सच है?"
"हर बात सच है और हर सच अधूरा है।" उसने कहा। "तेरे उस्ताद ने जो खोया, वो मैंने नहीं खोया। उन्होंने खोया। और जो खुद खोता है, उसे खुद ही ढूँढना पड़ता है।"
"पर तू उनके पास थी।"
"मैं बहुत लोगों के पास रही हूँ," आवाज़ ने कहा। "मैं किसी की नहीं होती। मैं दो लोगों के बीच की चीज़ हूँ। जब दो जुड़ते हैं, मैं ज़िंदा होती हूँ। जब दो टूटते हैं, मैं चुप हो जाती हूँ। मुझे मुफ़्त में कोई नहीं पा सकता, और मुझे कोई अकेला नहीं रख सकता।"
मैंने सिर झुका लिया।
"तो कल सुबह।" मैंने कहा।
"कल सुबह।" उसने कहा। "और अंकुश —"
"हाँ?"
"इस बार मैं तुझे एक चीज़ बता रही हूँ, क्योंकि तू अभी मुझसे नहीं, खुद से डर रहा है।" उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ था जो गरम था, बहुत कम, बहुत धीमा, पर था। "दो भाइयों को जोड़ने के बाद, तेरे हाथ में जो पहला अंक आएगा, वो उनका नहीं होगा। वो तेरा होगा। और उस अंक से तू एक चीज़ खरीद सकेगा जो आज तू सोच भी नहीं सकता।"
"क्या?"
"घड़ी देख लेना।" उसने कहा। "अभी मत पूछ। अभी सो जा। कल सुबह तेरे दरवाज़े पर दो आदमी खड़े होंगे, और उनमें से एक वो होगा जो मुझे जानता है, पर मुझे कभी छू नहीं पाया। और दूसरा वो होगा जो मुझे छूकर छोड़ चुका है, और अब मेरी आवाज़ से डरता है।"
"मैं कैसे पहचानूँ?"
"तुझे पहचानना नहीं पड़ेगा।" उसने कहा। "वो खुद को पहचाने बिना आएँगे।"
मैं लेट गया।
आवाज़ चली गई।
घंटी फिर ठंडी थी, पर अब उसकी ठंडक में कुछ और था — जैसे किसी ने मुझे हल्का सा छुआ हो और हाथ हटा लिया हो।
मैंने आँखें बंद कीं।
नीचे दुकान का दरवाज़ा खुला था। मैंने सोचा — उठकर बंद करूँ। फिर सोचा, छोड़ दे। आज रात कुछ बंद नहीं करना है।
मुझे नींद नहीं आई। बस आँखें बंद रहीं, और दिमाग़ में एक ही तस्वीर घूमती रही — दो आदमी, एक साइकिल, एक टूटा हुआ कर्ज़, और बीच में खड़ा मैं, जिसे उनके बीच में नहीं, उनके सामने नहीं, उनके साथ खड़ा होना है।
मुझे याद आया, एक बार टिंकू ने पूछा था, "उस्ताद, अगर आप किसी को ठीक नहीं कर सकते तो क्या करते हैं?"
और मैंने कहा था, "उसके पास बैठ जाता हूँ।"
आज लगा कि वो जवाब मेरा नहीं था। वो जवाब घंटी का था, जो मेरे मुँह से निकला था, ताकि जिस दिन ज़रूरत पड़े, मुझे याद रहे।
आधी रात के बाद मैं उठा। नीचे गया। दुकान का दरवाज़ा बंद किया। ट्रंक से औज़ार निकाले, साफ़ किए, वापस रखे। बेंच के नीचे से अजनबी का बैग निकाला, उसे हाथ में लिया, वापस रखा। टूटा रेडियो उठाया, उसे देखा, और मेज़ पर वापस रख दिया — इस बार धीरे से।
फिर मैं उस पुरानी साइकिल के पास गया जो घर के पीछे दीवार की तरफ़ खड़ी है।
मैंने उसे छुआ।
आज कुछ नहीं हुआ। न कोई आवाज़, न कोई झुरझुरी। सिर्फ़ धातु की ठंडक।
पर मुझे लगा, जैसे साइकिल ने मेरा हाथ पहचान लिया हो और कह दिया हो — आ जा। आज नहीं, कल।
मैंने घंटी निकाली और उसे ब्रैकेट पर रखा। बिना जोड़े। बस रख दिया। और मैंने उससे कहा, धीरे से, जैसे कोई किसी दोस्त से कहता है, "कल सुबह दुकान जल्दी खोलूँगा।"
घंटी चुप रही।
और मुझे लगा कि उस चुप्पी में भी एक जवाब था — हाँ।
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