The Mysterious Bell987 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 987

7 min read November 5, 2026

"आपने कहा था," मैंने धीरे से कहा, "कि किसी ने आपको नौकरी से नहीं निकाला।"

रेहाना ने रजिस्टर के किनारे पर उँगली रखी।

"डॉक्टर साहब ने मुझे नौकरी से नहीं निकाला था," उसने कहा। "डॉक्टर साहब ने मुझे बचाया था।"

मैंने डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा।

उन्होंने अब भी पलटकर नहीं देखा।

पर उनके कंधे हिल रहे थे। बहुत हल्के से।

रेहाना ने रजिस्टर खोला।

उसकी जिल्द चरमराई — वो आवाज़ जो सिर्फ़ बहुत पुराने काग़ज़ों से आती है। उसने उसे अपनी गोद में रखा और पन्ने पलटने लगी। उसकी उँगली पन्नों पर रेंग रही थी, एक-एक पन्ने पर रुककर, जैसे वो किसी पुराने रास्ते से गुज़र रही हो और हर मोड़ पर पहचान रही हो कि यहीं पर वो पहले भी रुकी थी।

वो एक पन्ने पर रुकी।

उसने उस पन्ने को देखा। फिर अपना सिर उठाया।

और डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा।

"डॉक्टर साहब," उसने कहा। "मैं पंद्रह साल यह सोचती रही कि आपने मेरे साथ यह क्यों किया। मैंने सोचा कि आप डर गए थे। मैंने सोचा कि आप मुझे बलि का बकरा बना गए। मैंने सोचा कि आप उन आदमियों से डरते थे जिनके काग़ज़ मैंने देख लिए थे, और आपने मेरा नाम काटकर अपना बचाव कर लिया।"

वो रुकी।

"पर आज जब आपका हाथ पर्ची पर रुका," उसने कहा, "तो मुझे समझ आया कि आप डरे हुए नहीं हैं। आप शर्मिंदा हैं। और शर्मिंदा आदमी वो होता है जिसने कुछ किया हो — जिसने कुछ बचाया हो।"

डॉक्टर इसरानी आख़िरकार पलटे।

उनके चश्मे के बिना उनकी आँखें छोटी दिख रही थीं। जैसे कोई बिना चश्मे के हमेशा से बड़ा दिखता है, वो अब थोड़े छोटे और थोड़े असली लग रहे थे।

"मैं उस रात गया था," उन्होंने कहा। "मैं उस आदमी से मिला था जिसने तुम्हें हटवाया था। मैंने उससे कहा कि यह लड़की कुछ नहीं जानती, यह इसे यहाँ से हटा दो, और मैं खुद तुम्हारा नाम जोड़ दूँगा।"

"तो आपने जोड़ा?"

"मैंने नहीं जोड़ा," उन्होंने कहा। "वो आदमी बोला कि नाम काटा गया है, अब जोड़ने के लिए तुम्हारी सिफ़ारिश चाहिए। मैंने वो सिफ़ारिश नहीं लिखी। मैंने सोचा कि दो दिन में लिखूँगा। और वो दो दिन पंद्रह साल में बदल गए।"

रेहाना ने पन्ना उठाया।

"मेरा नाम यहाँ है," उसने कहा। "कटा हुआ। पर कटा हुआ नाम दिखता है।"

डॉक्टर इसरानी ने उस पन्ने की तरफ़ देखा।

"मैं जानता हूँ," उन्होंने कहा। "मैंने वो रजिस्टर पंद्रह साल में कई बार खोला है। मैंने हर बार उस पन्ने को पलटा है। मैंने हर बार सोचा है कि काश मैं उस दिन तुम्हारी बात सुन लेता।"

"आपने क्यों नहीं सुनी?"

उन्होंने जवाब नहीं दिया।

वो अपनी कुर्सी पर बैठे रहे और उन्होंने अपना चश्मा फिर पोंछा।

और उस वक़्त मुझे लगा कि मैं अपने ही घर की चुप्पी देख रहा हूँ।

क्योंकि मैंने पापा को भी ऐसे ही बैठे देखा था — बिना जवाब, हाथ में कुछ पकड़े, आँखें किसी ऐसी जगह पर जो कमरे में नहीं थी। और मैं उस वक़्त पापा से नाराज़ हुआ था। मुझे लगा था कि वो चुप इसलिए हैं कि उनके पास कहने को कुछ नहीं है।

अब समझ आ रहा था कि लोग चुप इसलिए होते हैं कि उनके पास कहने को बहुत कुछ है, पर उसे कहने की जगह नहीं है।

और यह सबसे बड़ी दिक्कत है — चुप्पी के लिए जगह नहीं होती। चुप्पी के लिए कोई मंच नहीं होता। इसीलिए वो सालों तक चलती रहती है।

मैंने एक कदम आगे रखा।

"रेहाना आपा," मैंने कहा।

उन्होंने देखा।

"आपने कहा कि आपने उस काग़ज़ में कुछ बदला हुआ देखा था।"

"हाँ।"

"क्या आपको याद है कि उस काग़ज़ पर क्या था?"

उन्होंने रजिस्टर बंद कर दिया।

"मुझे तारीख़ याद नहीं," उसने कहा। "मुझे नाम याद नहीं। पर मुझे इतना याद है कि उस काग़ज़ पर दो अंगूठे थे, और दोनों अंगूठों के नीचे एक ही आदमी का नाम था। और उस नाम के नीचे एक और नाम जोड़ा गया था — नई स्याही में, अलग हाथ से।"

मेरी साँस रुक गई।

"क्या वो नाम…" मैंने कहा। "क्या वो नाम शंकर यादव था?"

रेहाना ने मेरी तरफ़ देखा।

"मुझे नाम याद नहीं," उसने कहा। "पर मुझे याद है कि वो नाम बहुत साधारण था। और मुझे यह भी याद है कि उसके नीचे एक खाली जगह थी जिसमें कोई तीसरा नाम आना था — पर वो नहीं आया।"

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।

मेरी उँगली घंटी से छू गई और मुझे लगा कि वो अब ठंडी नहीं है। वो गरम भी नहीं है। वो बिलकुल बीच की है — वो तापमान जो न ठंडा होता है, न गरम। वो तापमान जो तब होता है जब कोई चीज़ साँस रोककर सुन रही हो।

मैंने घंटी निकाली।

उसके पीतल पर उभरे उभरे से दो निशान थे — दो मुड़ी लकीरें और बीच में एक बिंदु। वो निशान जो मैंने चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर देखा था। वो निशान जो मंसूर चाचा के पीले काग़ज़ पर था।

मैंने घंटी रेहाना की तरफ़ बढ़ाई।

"यह पहचानते हैं?"

उसने घंटी को देखा।

और उसका चेहरा बदल गया।

"मैंने यह निशान देखा है," वो धीरे से बोली। "अस्पताल के पुराने काग़ज़ों में। जिन काग़ज़ों को हम कूड़ा कहते थे, असल में वो हिसाब थे। और उनमें यह निशान बार-बार आता था।"

"कहाँ?"

"मोहर के नीचे," उसने कहा। "जिस काग़ज़ पर नीली गोल मोहर लगी होती थी, उसके नीचे कोने में यह निशान उभरा होता था। हर काग़ज़ पर। मैंने एक बार पूछा कि यह क्या है, तो मुझे कहा गया कि यह मोहर बनाने वाले की छाप है। पर एक बात अजीब थी — अलग-अलग साल के काग़ज़ों पर छाप एक जैसी थी।"

मेरे मुँह से जो निकला, वो मैंने सोचा नहीं था।

"यानी यह मोहर बनाने वाले की छाप नहीं है," मैंने कहा। "यह बनाने वाले का निशान है।"

रेहाना ने धीरे से सिर हिलाया।

"यही मैंने सोचा था," उसने कहा। "और यही सोचकर मैंने शिकायत की थी।"

मैंने घंटी जेब में रखी और काजल की तरफ़ देखा।

काजल ने मेरी तरफ़ देखा।

और बिना कुछ कहे हम दोनों ने एक ही बात सोची।

अगर यह निशान हर उस काग़ज़ पर है जिस पर भारद्वाज की मोहर लगी है, तो यह मोहर किसी दफ़्तार की नहीं है। यह उस आदमी की है जिसने इन काग़ज़ों को बनाया है। और उसका नाम वही है जो पापा की उस आधी जली रसीद पर था — खल्लू भाई।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

उसने अपना छोटा काग़ज़ निकाल लिया था और उस पर कुछ लिख रही थी।

"अब मैं तुमसे एक आख़िरी बात कहूँगी," रेहाना ने कहा। "और वो बात मैंने पंद्रह साल किसी को नहीं कही।"

वो उठकर खड़ी हो गई।

"डॉक्टर साहब ने मुझे डाँटा था," उसने कहा। "पर उसके बाद, उसी रात, उन्होंने मेरे हाथ में एक काग़ज़ रखा और कहा कि इसे तीन दिन अपने पास रखो, फिर लौटा देना। मैंने उसे अपनी जेब में रखा। वो काग़ज़ मेरे पास तीन दिन नहीं, पंद्रह साल रहा।"

मैंने रेहाना की तरफ़ देखा।

"वो काग़ज़…" मैंने धीरे से कहा।

रेहाना ने अपना बैग खोला। फटा हुआ बैग, जिसका पट्टा दो जगह से सीला हुआ था। उसमें से उसने एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। पीला काग़ज़, जिसके किनारे देर से पीले पड़ गए थे।

उसने वो काग़ज़ डॉक्टर इसरानी की मेज़ पर रखा।

"यह क्या है?" मैंने पूछा।

डॉक्टर इसरानी ने उस काग़ज़ को देखा।

"यह वो शिकायत है," उन्होंने कहा, "जो मैंने खुद लिखी थी।"

मैंने काग़ज़ उठाया।

उस पर सात-आठ लाइनें थीं। हाथ से लिखी। नीली स्याही। कुछ शब्दों पर लकीर लगी थी — जैसे लिखने वाले ने अपनी बात सोच-समझकर नरम कर दी हो।

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