The Mysterious Bell – Chapter 984
क्योंकि मैं जानता था। कभी-कभी सच बोलने से पहले इंसान को अपने सबसे प्यारे चेहरे की तरफ़ देखना पड़ता है, ताकि उसे हिम्मत मिल जाए।
रेहाना आपा ने अपना रजिस्टर अपने सीने से लगाया।
"मैं कल आऊँगी," उसने कहा। "पाँच बजे की सभा में। यह रजिस्टर लेकर।"
"आप आएँगी?" मैंने पूछा।
"मैं पंदरह साल से इस दिन का इंतज़ार कर रही हूँ," उसने कहा। "अब जब बुलावा आ गया है, तो क्यों नहीं आऊँगी?"
वो मुड़ीं और जाने लगीं।
काजल ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"रेहाना आपा," उसने कहा। उसकी आवाज़ भरी हुई थी। "आप कहाँ रहती हैं? मैं — मैं आपको कुछ भेज सकती हूँ?"
रेहाना आपा ने उसकी तरफ़ देखा, और पहली बार उनके चेहरे पर वो हल्की-सी मुस्कान आई जो अब तक नहीं थी।
"तुम काजल हो," उसने कहा। "शंकर यादव की बेटी।"
"हाँ।"
"तुम्हारी माँ ने उस रात मेरे हाथ में एक कटोरी पकड़ाई थी। मैंने कहा था — मत करो, मैं कुछ नहीं कर सकती। उसने कहा — तुम चाय तो पिला सकती हो।"
काजल ने हाथ और कसकर पकड़ लिया।
"तो तुम मुझे कुछ मत भेजो," रेहाना आपा ने कहा। "तुम बस अपनी माँ के पास रहो और उनसे कहो कि मैं वो कटोरी आज तक संभालकर रखी हूँ।"
वो चली गईं। उनके जूतों की आवाज़ गलियारे में धीरे-धीरे दूर गई। सीढ़ियों पर मुड़ीं, और फिर गायब हो गईं।
डॉक्टर इसरानी वहीं खड़े रहे। उनका चश्मा फिर से हाथ में था।
और पहली बार मुझे लगा कि वो चश्मा साफ़ नहीं कर रहे थे। वो उसे पकड़कर अपने हाथों को व्यस्त रख रहे थे, वरना उनके हाथ कुछ और कर देते — किसी की तरफ़ उठ जाते, कोई बात कर देते, या फिर अपना चेहरा ढक लेते।
मीरा ने कैमरा बंद किया।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा। "तुमने देखा?"
"क्या?"
"उसने कुछ नहीं माँगा। उसने नौकरी नहीं माँगी, पैसा नहीं माँगा, बदला नहीं माँगा। वो सिर्फ़ इतना कहने आई थी कि उसका नाम काट दिया गया था।"
"हाँ," मैंने कहा। "यही सबसे बड़ी बात है।"
"क्या?"
"कि उसने कुछ माँगा नहीं," मैंने कहा। "जो इंसान बदला नहीं माँगता, वो अपने साथ एक और चीज़ लेकर चलता है — सबूत। और सबूत से बड़ा कोई हथियार नहीं होता।"
मैंने अपनी जेब से वो काग़ज़ निकाला जो मैंने भोला भाई के शटर के नीचे से उठाया था। उस पर मोटी नीली स्याही में दो शब्द लिखे थे।
मीरा ने उसे देखा।
"कब से?" उसने पूछा।
"जब से मैंने उसे उठाया," मैंने कहा।
"बोलो न," उसने कहा। "क्या लिखा है?"
मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया। उसने पढ़ा।
दो शब्द थे — तीसरा नाम।
और उस काग़ज़ के नीचे, हल्की स्याही में, कोई चीज़ ऐसी लिखी थी जो सिर्फ़ एक ही आदमी की लिखाई हो सकती थी — वही आदमी जो हर काग़ज़ पर लिखता है, "भारद्वाज कंस्ट्रक्शन", पर इस बार उसने कुछ और लिखा था।
काग़ज़ पर लिखा था — "जोड़ने वाला ही तोड़ेगा।"
मैंने वो काग़ज़ अपनी जेब में रखा। मेरी उँगली घंटी से छू गई।
वो अब गरम हो रही थी। धीरे-धीरे।
और मैंने धीरे से कहा, "कल पाँच बजे की सभा में अब तीन गवाह हैं — पापा, गोविंद भाई और रेहाना आपा।"
"तीन नहीं," काजल ने कहा। "चार।"
"कौन?"
उसने अपनी जेब से एक मुड़ी हुई पर्ची निकाली और मेरी हथेली पर रख दी।
"मैं," उसने कहा। "क्योंकि मैंने वो पुराना रजिस्टर देखा था जिसमें वही कटा हुआ नाम था। और डॉक्टर साहब ने वो रजिस्टर मुझसे वापस ले लिया था। मैंने कभी किसी को नहीं बताया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
और मुझे लगा कि यही तो है — यही पूरी गली है। एक-एक इंसान के पास एक कटा हुआ नाम है, एक अधूरी लाइन है, एक ऐसा काग़ज़ है जिसे उसने कभी किसी को नहीं दिखाया। और जिस दिनकाजल की पर्ची मेरी हथेली पर रखी थी। मुड़ी हुई, छोटी, कोने से फटी। मैंने उसे खोला।
उस पर कुछ नहीं लिखा था। सिर्फ़ एक तारीख़ थी। और उस तारीख़ के नीचे एक लाइन — "आज से पंद्रह साल पहले।"
"यह क्या है?" मैंने पूछा।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो लोग तब दिखाते हैं जब वो कोई बोझ उतारने आए हों, पर उतारने से पहले डर रहे हों कि कहीं बोझ उन्हीं पर न गिर जाए।
"वो पुराना रजिस्टर," वो बोली, "जो मुझे ट्रेनी के दिनों में फेंकने को दिया गया था। उसमें आख़िरी पन्ने पर एक नाम आधा कटा हुआ था। मैंने उसे पढ़ा नहीं था, पर मैंने उसे देखा था। और डॉक्टर साहब ने वो रजिस्टर मेरे हाथ से ले लिया, बड़े प्यार से, जैसे कोई बच्चे के हाथ से चाकू लेता है।"
"और तूने किसी को नहीं बताया।"
"मैंने खुद को भी नहीं बताया," उसने कहा। "मैंने अपने आप से भी यह नहीं कहा कि मैंने क्या देखा। मैंने उसे भुला दिया। जैसे हम सब भूलते हैं — रोज़, थोड़ा-थोड़ा।"
उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी। सिर्फ़ एक थकान थी, वो थकान जो लोग तब महसूस करते हैं जब उन्हें अपनी ही यादों से शर्म आने लगे।
मीरा ने अपना कैमरा बैग में रख दिया।
"अब मैं तुम्हें कुछ नहीं पूछूँगी," उसने काजल से कहा। "जब तुम खुद बोलना चाहो, बोल देना। पर एक बात कह रही हूँ — सभा में यह बात मेज़ पर रखी जानी चाहिए। तुम्हारे नाम से या किसी और के नाम से, यह तुम तय करना।"
काजल ने सिर हिलाया।
उस वक़्त गुमटी के चूल्हे की लौ ऊँची हुई और शबनम आपा ने बिना मुड़े कहा, "दोपहर हो गई। तीनों को कुछ खाना चाहिए।"
"हमें अस्पताल जाना है," मैंने कहा।
"अस्पताल में भी खाना मिलता है," उन्होंने कहा। "पर जो खाना प्यार से बनता है, वो वहाँ नहीं मिलता।" उन्होंने प्लेट मेरी तरफ़ बढ़ाई।
समोसा ठंडा नहीं था। गरम भी नहीं था। ठीक उस तापमान पर था जिस पर इंसान किसी आपदा के बीच भी खा सकता है।
मैंने खाया।
क्योंकि मुझे बात करनी थी, और भूखे आदमी की ज़ुबान भी भूखी होती है।
चलते वक़्त मीरा ने मेरे कंधे के पास आकर कहा, "उस औरत को लेकर तेरा क्या ख़याल है? जो वर्दी में थी?"
"मेरा ख़याल यह है," मैंने कहा, "कि आज दिन ऐसा है जिसमें हर कोई अपना पुराना नाम वापस माँगने आ रहा है।"
"और तेरे पास देने को क्या है?"
"मेरे पास एक घंटी है," मैंने कहा, "एक पट्टी है, और अब एक कटा हुआ नाम।"
वो हँसी। पहली बार उस दिन हँसी।
"तू इन तीन चीज़ों से क्या कर लेगा?"
"सीख लूँगा," मैंने कहा। "कटे हुए नाम का हिसाब रखना।"
अस्पताल का गलियारा दोपहर में और भी लंबा लगता है।
सुबह वहाँ रोशनी आड़ी आती है, दीवारों पर सरकती है, और सब कुछ थोड़ा नरम दिखता है। पर दोपहर में सूरज सिर पर होता है और रोशनी सीधी गिरती है। दीवार की दरारें साफ़ दिखती हैं। फर्श की टाइलों का कोई कोना ऐसा नहीं जो ऊपर न उठा हो। और गलियारे के आख़िर में लगा वो पीला पोस्टर — जिस पर रणवीर भारद्वाज हाथ जोड़े खड़े थे और नीचे लिखा था "नई शुरुआत, नए सपने" — उसकी चमक दोपहर में और तेज़ हो जाती है, आँख को चुभती है।
माँ पलंग पर बैठी थीं। काजल ने उनके पास जाकर उनका हाथ पकड़ा। माँ ने उसका सिर सहलाया और बिना कुछ कहे मेरी तरफ़ देखा।
"आज टिफ़िन नहीं गया," मैंने कहा।
"नहीं गया," उन्होंने कहा।
"और आपने कुछ नहीं पूछा।"
"पूछने से क्या होगा?" उन्होंने कहा। "पूछूँगी तो तू जवाब देगा, और जवाब में मुझे वही बात सुननी पड़ेगी जो मैंने अब तक पंद्रह बार सुन ली है। मुझे नया जवाब चाहिए।"
"नया जवाब नहीं है, माँ।"
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