The Mysterious Bell – Chapter 969
घंटी की आख़िरी आवाज़ कमरे में ठहर गई, जैसे धुआँ छत से चिपक गया हो।
"जब तक तू उसे नहीं जोड़ेगा, कोई ताला नहीं खुलेगा।"
मैंने घंटी को हथेली में दबाया। ठंडी थी। उतनी ही ठंडी, जितना संदूकची का ताला। जैसे दोनों ने मिलकर मुझसे कह दिया हो — अंकुश, अब तेरी ज़ुबान से ज़्यादा तेरे हाथों की ज़रूरत है।
माँ ने मेरी छोटी उँगली पर बँधी खून की लकीर देखी और बिना कुछ कहे रसोई से हल्दी ले आईं। मैंने हाथ खींच लिया।
"रहने दो, माँ। ये लकीर आज काम आएगी।"
"कैसे?" काजल ने पूछा।
"दिखाने के लिए। कि हम भी थोड़े घायल हैं। जो सिर्फ़ साहब के काग़ज़ों में घायल नहीं होते।"
माँ कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रहीं, फिर बोलीं, "आज तू अकेला जाएगा तो मैं दरवाज़े पर खड़ी रहूँगी। कहीं नहीं जाऊँगी। समझ गया?"
"समझ गया।"
पापा दीवार की तरफ़ देख रहे थे। उनके हाथ में कुछ नहीं था। खाली हाथ। और मुझे अचानक लगा कि खाली हाथ खड़ा आदमी सबसे ज़्यादा डरता है। क्योंकि उसके पास छिपाने को कुछ नहीं होता।
मैं उनके पास गया और औज़ारों के ट्रंक से वो पुरानी रिंच निकाली, जिसकी चमक बहुत पहले खत्म हो चुकी थी।
"ये लीजिए," मैंने कहा। "कल आपके हाथ में यही रहेगी।"
उन्होंने रिंच देखी, जैसे कोई पुराना दोस्त देखा हो। फिर उँगलियों से पकड़ी और हल्की सी हिलाई।
"ये मेरे बाप की थी," उन्होंने धीरे से कहा।
"तो कल बताइए सबको।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। आँखों में वो डर अब भी था, पर उसके पीछे कुछ और भी था। जैसे बरसों से बंद कमरे में हवा की पहली लहर।
वो रात किसी ने नहीं सोई। काजल ने दवा का डिब्बा खोला और बंद कर दिया। माँ ने चूल्हे पर बिना वजह पानी चढ़ाया और उतार दिया। पापा आँगन में बैठे रहे, रिंच को घुटनों पर रखकर।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया और घंटी को धागे से उतारकर मेज़ पर रखा। उसकी सतह पर उँगली फेरी। कोई गुनगुनाहट नहीं। कोई टिन नहीं। सिर्फ़ पीतल की ठंड।
"सुन," मैंने कहा, "कल मैं साहब की कुर्सी पर बैठूँगा। पर एक बात पहले साफ़ कर लूँ — मैं उसकी बात नहीं सुनूँगा। मैं सिर्फ़ अपनी बात कहूँगा। और वो बात मेरी नहीं, इस पूरी गली की होगी।"
घंटी चुप रही।
"ठीक है," मैंने कहा, "चुप रह। कल जब मेरी ज़रूरत हो, तब बोलना।"
और मैं चारपाई पर लेट गया। आँखें बंद थीं, पर नींद कहीं दूर थी। कानों में बार-बार वही आवाज़ — मैं तेरा भाई हूँ।
सुबह पाँच बजे मुर्गे की आवाज़ से पहले शबनम आपा की गुमटी की केतली बोली। मैं उठा, मुँह धोया, पीतल का पेंच जेब में डाला और दुकान का शटर उठाया। सामने टिंकू खड़ा था, दोनों हाथों में एक पुरानी पीतल की बाल्टी।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने सोचा, आज आपको आवाज़ चाहिए होगी।"
"ये क्या है?"
"ये बाल्टी में आवाज़ गूँजती है। पिछली बार पप्पू भैया को ऐसे ही इल्ज़ाम से बचाया था।"
मैं हँस पड़ा। सच कहूँ तो बहुत दिनों बाद ऐसे हँसा।
"रख दे," मैंने कहा। "आज इसकी ज़रूरत पड़ सकती है।"
सुबह नौ बजे गली में वो माहौल बन गया जो शादी से पहले बनता है — कोई कुछ ला रहा था, कोई कुछ बता रहा था। शबनम आपा ने गुमटी के बाहर बड़ा ताँबे का बर्तन रख दिया और उस पर कपड़ा ढक दिया।
"क्यों?" मैंने पूछा।
"ताकि आज कोई यह न कहे कि शबनम की गुमटी बंद थी। चूल्हा जलेगा। आज पूरी गली पीएगी, और हिसाब में सबका नाम लिखा जाएगा।"
रज़िया पीछे खड़ी थीं, माँ की रेशमी चुनरी कंधे पर। आपा ने उनकी तरफ़ देखे बिना कहा, "तू भी चल।"
"मैं?"
"हाँ। तू गवाह है। अपने हिसाब से नहीं, अपनी आँखों से।"
दोपहर में मंसूर चाचा आए। उनकी कमर में चाबियों का गुच्छा खनक रहा था और जेब में वही ठंडा ताला था।
"लाए हो?" मैंने पूछा।
"ले आया।" उन्होंने ताला मेरी हथेली पर रखा। बर्फ़ जैसा। "देखना, जब सच बोलेगा, तब गरम होगा। और अंकुश —"
"हाँ?"
"आज किसी को कुछ साबित मत करना। बस कहना। जो साबित करने निकलता है, वो हार जाता है।"
तीन बजे उस्ताद अली बक्श आए। मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल, हाथ में लाल जिल्द वाली वो पुरानी कॉपी। उन्होंने बिना कुछ कहे कॉपी मुझे थमाई और बोले, "बोलने का क्रम इसमें है। एक आदमी एक बार। अगर तू इससे हटा, तो तेरे बाप की रिंच भी तेरा साथ नहीं देगी।"
चार बजे मीरा आई। दो कैमरे, एक कंधे पर, एक हाथ में।
"एक दिखेगा," उसने कहा, "एक छिपा रहेगा। साहब की मुस्कान का दूसरा कोण भी दुनिया को दिखना चाहिए।"
"और अगर वो कैमरा देखकर मुस्कुराना बंद कर दे?"
"तो वो आधा सच भी नहीं बेच पाएगा।"
साढ़े चार बजे मैं घर गया। काजल ने मेरी कमीज़ के बटन ठीक किए और मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"डर लग रहा है?" उसने पूछा।
"बहुत।"
"तो ठीक है। डर के बिना बोलने वाला आदमी सिर्फ़ शोर करता है।"
माँ ने मुझे गुड़ लगी रोटी का टुकड़ा दिया। मैंने खाया। फिर मैंने घंटी जेब से निकाली और काजल से कहा, "धागे से दो गाँठ लगा दे। ऐसे कि हिले तो आवाज़ आए, पर बजे नहीं। आज मैं खुद बजाऊँगा — जब वक़्त आएगा।"
काजल ने धागा बाँधा और घंटी जेब के अंदर लौटा दी।
और फिर पाँच बजे।
भारद्वाज भवन के खुले प्रांगण में सफ़ेद पत्थर की चमक ऐसी थी जैसे सूरज वहीं बैठा हो। बाहर बड़ी तस्वीर में रणवीर हाथ जोड़े खड़ा था। मैंने उस तस्वीर को देखा और सोचा — ये आदमी अपनी ही तस्वीर से कभी नहीं टकराया होगा।
प्रांगण के बीच में दो कुर्सियाँ थीं। एक सफ़ेद, नई। एक पुरानी, लकड़ी की, जिसकी बाँह घिसी हुई थी। पता नहीं कहाँ से उठाकर लाए थे, जैसे मुझे बैठाने से पहले ही बता देना चाहते हों — तू पुराना है।
और दोनों के बीच में लोहे का बड़ा संदूक।
मैं पहली बार अकेला नहीं आया।
मेरे पीछे पापा खड़े थे। पुरानी रिंच हाथ में। उन्होंने आज बाईस साल बाद वो नीली शर्ट पहनी थी जो घिसी हुई थी, पर साफ़ थी। उनके होंठ सूखे थे और उनकी आँखें सीधी सामने थीं।
माँ गेट पर खड़ी थीं, काजल के साथ। दुबे अंकल एक किनारे, नीली शर्ट में, कॉपी दबाए। उस्ताद दीवार से टिके। मंसूर चाचा चबूतरी से उठकर आए थे, ताला जेब में। गोविंद भाई सबसे पीछे, हाथ काँपते, नींबू-मिर्ची का हार जेब में। भवानी प्रसाद किसी की छाया की तरह पीछे खड़े थे। डॉक्टर इसरानी अपना पुराना स्टेथोस्कोप जैसे सहारे की तरह पकड़े थे।
और सबसे आगे — बच्चे। टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू। पीतल की बाल्टी टिंकू के हाथ में।
शबनम आपा चिमटी लिए खड़ी थीं। सच में चिमटी। लोहे की, गरम।
मीरा ने कैमरा चालू किया। लाल बत्ती जली।
रणवीर सफ़ेद कुर्ते में निकला। वैसी ही मुस्कान। वैसे ही जुड़े हाथ। जैसे कोई मंदिर से निकल रहा हो।
"आइए, अंकुश जी," उसने कहा। "बैठिए। चाय लगाऊँ?"
"चाय नहीं," मैंने कहा। "सीधी बात।"
वो हँसा। "सीधी बात हमेशा अच्छी होती है। बैठिए।"
मैं बैठा। पुरानी लकड़ी की कुर्सी चरमराई, जैसे कहे — अंकुश, संभलकर, मैं तेरे साथ हूँ पर मैं पुरानी हूँ।
रणवीर ने संदूक की तरफ़ हाथ बढ़ाया और उसकी कुंडी खोली। ढक्कन उठा।
अंदर पुराना नक्शा था, मुड़ा हुआ। एक याचिका की कॉपी थी, जिस पर बहुत सारे अंगूठे थे। कुछ पन्ने थे, जिन पर तारीख़ें लिखी थीं। और कुछ और नहीं।
कोई याद नहीं। कोई पीतल नहीं। कोई चाबी नहीं।
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