The Mysterious Bell – Chapter 949
"बता," मैंने कहा।
और घंटी बोली, धीमे से, जैसे किसी पुराने टेप की आवाज़:
"जो गाता है, वो बंद नहीं होता। बंद की हुई आवाज़ गाती नहीं।"
"मेरा सवाल टाल मत," मैंने कहा। "मेरे अंदर एक कोना खाली है, और मुझे लगता है वो…"
मैं रुक गया।
मेरी आवाज़ भर आई थी।
"मुझे लगता है," मैंने धीमे से कहा, "कि मेरे अंदर कुछ था जो अब नहीं है। कुछ अपना। कोई आवाज़। कोई याद। कुछ। और मैं उसका नाम नहीं जानता। मुझे उसकी खाली जगह पता है पर उसकी जो चीज़ थी, वो नहीं पता।"
मैं बैठ गया आँगन की दीवार के सहारे। घंटी हाथ में थी।
"क्या तूने लिया?" मैंने पूछा। "क्या तूने मेरी कोई प्यारी याद ले ली?"
बहुत देर तक चुप्पी रही।
फिर घंटी ठंडी हो गई और उसने कहा:
"तंत्र याद नहीं लेता। तंत्र याद नहीं ले सकता। जिसकी याद होती है, वो उसकी होती है। यादें सिर्फ़ बंद होती हैं। चोरी नहीं होतीं।"
"तो किसने बंद की?"
"जिसके पास दरवाज़े की चाबी है।"
मैंने साँस रोक ली।
"कौन?"
घंटी चुप रही।
"कौन?" मैंने फिर पूछा।
घंटी फिर चुप रही।
"तू हर बात का आधा जवाब क्यों देता है?" मैंने गुस्से से कहा।
और तब, बहुत धीमे से, घंटी ने कहा:
"क्योंकि पूरा जवाब तेरे भीतर है और तेरे भीतर सबसे आख़िरी चीज़ है जिसे तू देखना चाहेगा।"
मैं कुछ देर बैठा रहा। साँस लेता रहा। और फिर मैंने वो एक शब्द पूछा जो मुझे चुभ रहा था:
"शंकरलाल कौन है?"
घंटी गरम हुई।
बहुत गरम।
इतनी गरम कि मैंने उसे ज़मीन पर रख दिया। और वो गरम रही। ज़मीन पर पड़ी रही। और गरम रही।
फिर उसने कहा:
"जिसे तू दुश्मन समझ रहा है, वह तेरे ही घर की चुप्पी में बैठा है।"
मेरी साँस रुक गई।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
घर में बत्ती जल रही थी। चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा बंद था। माँ वहीं बैठी थीं। पापा आँगन के छोर पर पंखे के पास बैठे थे। काजल उनके पास बैठी थी।
सब चुप थे।
बहुत चुप।
और उस चुप्पी में, बहुत धीरे, मुझे एक आवाज़ सुनाई दी।
नहीं, सुनी नहीं। महसूस हुई।
चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े के उस पार से, किसी गहरी, बहुत पुरानी, बहुत थकी हुई आवाज़… कुछ गुनगुना रही थी।
वही धुन।
मैं उठा।
मैं सीधा घर की तरफ़ चला। माँ ने देखा।
"कहाँ जा रहा है?" उन्होंने पूछा।
"माँ," मैंने कहा, "तुमने कहा था कि चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े को खोलते वक़्त तुम्हें साथ रखूँ।"
उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "अंकुश—"
"आज नहीं, माँ," मैंने कहा। "आज रात सिर्फ़ इतना कि वहाँ किसी ने पिछली बार साँस ली थी। मुझे उस दरवाज़े से सिर्फ़ यह जानना है कि क्या वहाँ अंदर कोई है।"
"अभी नहीं," माँ ने कहा, आवाज़ में वो कंपन था जो मैंने उनमें कभी नहीं सुना था। "अंकुश, अभी नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
और उनकी आँखों में कुछ और था। डर नहीं।
कुछ और।
जैसे कोई बहुत दिनों से किसी चीज़ को ढँके बैठा हो।
"माँ," मैंने धीमे से कहा, "तुम्हें पता है।"
उन्होंने नज़रें चुराईं।
"तुम्हें पता है कि वहाँ कौन है।"
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
मैं वहीं रुक गया। एक कदम और बढ़ाता तो दरवाज़े तक पहुँच जाता। पर मैं रुक गया।
क्योंकि घंटी ने कहा था — वह तेरे ही घर की चुप्पी में बैठा है।
मेरे ही घर की चुप्पी।
पापा की चुप्पी।
माँ की चुप्पी।
काजल की चुप्पी।
और मेरी अपनी चुप्पी।
मैं मुड़ा और पापा की तरफ़ देखा।
वो वहीं बैठे थे। पंखे के पास। हाथ में एक औज़ार था — कौन सा, नहीं पता। बस हाथ में पकड़े थे।
"पापा," मैंने कहा, "आपको पता है न?"
बहुत देर तक कुछ नहीं बोले।
फिर उन्होंने सिर हिलाया। सिर्फ़ हिलाया। एक बार।
मेरे हाथ से घंटी छूट गई और ज़मीन पर गिरी।
वो बजी।
बहुत ज़ोर से।
और फिर वो ऐसे बजी जैसे किसी ने दूर से जवाब में बजा दी हो — आधी आवाज़, दूसरी घंटी, बहुत दूर से।
मैंने घंटी उठाई।
"अब बता," मैंने कहा, आवाज़ काँप रही थी। "अब बता कि वहाँ कौन है। और मत कहना कि मैं नहीं जानना चाहता। मैं जानना चाहता हूँ, चाहे कितना भी भारी हो।"
घंटी गरम हुई।
और उसने कहा, बहुत धीमे से, बहुत थके से, जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो:
"तेरे ही घर की चुप्पी में वो बैठा है जिसकी आवाज़ तेरे अंदर की खाली जगह में गाती थी।"
मेरी आँखें भर आईं।
"मतलब…"
"मतलब," घंटी ने कहा, "शंकरलाल तेरा दुश्मन नहीं है। शंकरलाल तेरा…"
और घंटी चुप हो गई।
"शंकरलाल तेरा क्या?" मैंने कहा, आवाज़ ऊँची हो गई। "बोल! शंकरलाल तेरा क्या?"
घंटी ठंडी हो गई। बिल्कुल ठंडी।
मैं उसे हिलाता रहा। बजाता रहा।
कुछ नहीं।
माँ उठकर मेरे पास आईं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
"अंकुश," उन्होंने धीमे से कहा। "सुन।"
और फिर उन्होंने वो धुन गुनगुनाई — वही धुन — और इस बार मैंने ध्यान से सुना।
और जैसे ही उन्होंने गुनगुनाया, मुझे लगा… नहीं।
मेरे भीतर की खाली जगह में, कुछ हिला।
कुछ बहुत हल्का।
कुछ बहुत पुराना।
जैसे कोई सोया हुआ आदमी किसी धुन में करवट ले।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
और फिर, बहुत दूर से, बहुत पुराने टेप की आवाज़ में, मैंने उस धुन के साथ शब्द सुने।
एक शब्द।
सिर्फ़ एक शब्द।
मेरा ही नाम।
बहुत प्यार से बोला हुआ।
"अंकुश।"
मैंने आँखें खोलीं। माँ मेरी तरफ़ देख रही थीं।
"तुमने… तुमने सुना?" मैंने पूछा।
"क्या?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा।
पर मैंने झूठ बोला। मुझे सुनाई दिया था।
किसी ऐसे आदमी की आवाज़ ने, जो बहुत पहले चला गया था या चला गया था या… या बंद कर दिया गया था।
और मैं जानता था — वो आवाज़ वो नहीं थी जो मैं दुश्मनों के साथ जोड़ता था।
वो आवाज़… अपनी थी।
बहुत अपनी।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो अब भी वहीं बैठे थे, पंखे के पास। पर अब वो पंखा नहीं देख रहे थे। वो अपने हाथ देख रहे थे। दोनों हाथ। जैसे पहली बार देख रहे हों।
"पापा," मैंने कहा। "वो आवाज़… जिसने मुझे बचपन में नाम से पुकारा था…"
उन्होंने सिर उठाया।
"वो…" उनका गला रुंध गया। "वो…"
"कौन है, पापा?"
और फिर उन्होंने वो बात कही जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
नहीं, उम्मीद थी।
पर सुनकर भी लगा जैसे मुझे किसी ने पकड़कर ज़मीन पर पटक दिया हो।
"मुझे नाम नहीं पता," पापा ने कहा। "पर वो आवाज़ मैं जानता हूँ। वो मेरे बचपन की आवाज़ है। मेरे घर की आवाज़। और वो… वो मेरे साथ थी जब मैं छोटा था।"
"मतलब…"
"मतलब," पापा ने धीमे से कहा, "वो मेರా भाई है।"
मेरा दिल एक पल रुक गया।
"क्या?"
"मेरा भाई," पापा ने दोहराया, आवाज़ काँप रही थी। "मुझे याद आई… अभी। वो धुन सुनकर। वो धुन मेरी माँ गुनगुनाती थी। और वो…"
वो रुक गए।
"वो किसके लिए गुनगुनाती थी?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"दोनों के लिए," उन्होंने कहा। "मेरे लिए और…"
और उन्होंने तीसरा नाम नहीं लिया।
पर मैंने लिया।
"और शंकरलाल के लिए," मैंने कहा।
पापा ने सिर नीचा कर लिया।
हाँ में।
और उसी पल, बाहर से एक आवाज़ आई।
पीपल की तरफ़ से।
किसी ने दूर से, धीमे से, वही धुन गुनगुनाई — ठीक वही धुन — और फिर चुप हो गया।
मैं दौड़कर बाहर निकला।
आँगन में कोई नहीं था।
पीपल के नीचे कोई नहीं था।
बस हवा थी, और हवा में एक गंध थी।
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