The Mysterious Bell – Chapter 942
"वही," चाचा ने कहा, "जिसने उन दोनों को पचास साल पहले मेरे पास भेजा।"
और फिर उन्होंने उँगली उठाई।
मुझे याद है, उस वक़्त उनकी उँगली हल्की काँप रही थी। शायद उम्र से। शायद बात से।
"एक बात सुन लो," उन्होंने कहा। "यह ताला देखने में लोहे का है। पर इसके अंदर लोहा नहीं है।"
काजल ने कहा, "फिर क्या है?"
"एक याद," चाचा ने कहा।
कमरे में सन्नाटा। इतना कि मुझे अपना दिल सुनाई दे रहा था।
"मैंने ताले बनाए हैं," वो बोले, "पूरी उम्र। मैंने लोहा ढाला है, आग में। मैं जानता हूँ लोहा कैसे बोलता है — ठंडा होते वक़्त हल्की टन-टन, गरम होते वक़्त खिंचाव की आवाज़। ये जो तुम्हारे सामने है, इसमें वो आवाज़ नहीं है। इसमें कोई चुपचाप बैठा है।"
और फिर उन्होंने वो कहा जो मुझे आज तक रात में जगाता है।
"जिस दिन यह याद खुलेगी," उन्होंने कहा, "उस दिन तुझे अपनी एक पुरानी आवाज़ याद आएगी। ऐसी आवाज़ जो अब तेरे अंदर नहीं है।"
मुझे लगा कमरा हिल गया।
"कैसी आवाज़?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ भारी थी।
"वो तुम खुद सुनोगे।"
"चाचा, साफ़ बोलिए।"
"मैं साफ़ ही बोल रहा हूँ," उन्होंने कहा। "अंकुश, तुम्हारे अंदर एक आवाज़ थी। तुम्हारी अपनी। तुम्हारी उम्र की, तुम्हारे घर की, तुम्हारी गली की। वो कब से नहीं बोली, तुमने गिना है?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"बोलो," उन्होंने कहा। "आख़िरी बार कब तुम खुद से बात की थी? अपने आप से। बिना किसी डर के। बिना ये सोचे कि किसका क्या टूटेगा।"
मैंने याद करने की कोशिश की। और मुझे कुछ नहीं मिला। सिर्फ़ एक खाली जगह मिली, जैसे किसी कमरे से कोई चीज़ उठा ली गई हो और निशान भी मिटा दिया गया हो।
मंसूर चाचा ने मेरा कंधा थामा। उनका हाथ खुरदुरा था, ऐसा जैसे पचास साल लोहे के साथ रहा हो।
"आज ताला बंद रहेगा," उन्होंने कहा। "पर ये जान लो — ताला खुलने के लिए तोड़ा नहीं जाएगा। ताला खुलेगा उस दिन, जिस दिन तुम अपनी वो आवाज़ वापस लाओगे।"
वो उठे।
"चाचा," मैंने कहा, "आप कहाँ जा रहे हैं?"
"घर," उन्होंने कहा। "मेरी दुकान बंद है पचास साल से, पर मेरा घर नहीं। आज रात मैं अपने घर में जाकर एक काम करूँगा — उन दोनों ताले-चाबी वालों को याद करूँगा। और कल सुबह, अगर मैं कुछ और याद कर लूँ, तो तुम्हें बताऊँगा।"
वो दरवाज़े तक गए। फिर रुके। इस बार पलटे।
"और अंकुश," उन्होंने कहा, "एक बात और। जो चीज़ उस घर में पड़ी है, वो तुम्हारी चाबी से खुलेगी। पर तुम्हें वहाँ अकेले नहीं जाना।"
"मैं अकेला नहीं जाऊँगा," मैंने कहा।
"और वो काग़ज़," उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ देखा, "जो आज सुबह थाने आया — वो भी उसी घर से आया है। क्योंकि जो तुम्हारे दादा की मौत की तारीख़ जानता है, उसने वो तारीख़ किसी ताले के अंदर से नहीं पढ़ी। उसने वो तारीख़ उस घर की दीवार से पढ़ी है।"
वो चले गए।
दरवाज़ा खुला रह गया। बाहर गली में हवा चल रही थी। पीपल की पत्तियाँ हिल रही थीं। और मुझे पहली बार लगा कि वो पत्तियाँ भी कुछ कह रही हैं।
पापा उठे और दरवाज़ा बंद किया। फिर वो मेरे पास आए और बैठ गए। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरे कंधे पर हाथ रखा।
उनका हाथ भी खुरदुरा था।
और उस वक़्त मुझे कुछ अजीब हुआ। मुझे लगा कि मैंने अपनी आवाज़ कहीं खोई है। नहीं, गलत कहा। मुझे लगा कि मैंने उसे कहीं रख दिया है और भूल गया हूँ कि कहाँ।
मैंने घंटी जेब से निकाली। हथेली पर रखी। वो गरम थी, पर आज वो गरमी बुरी नहीं लग रही थी। आज वो गरमी ऐसी थी जैसे कोई ठंडे हाथों में गरम चाय का गिलास रख दे।
"सुन," मैंने कहा। "तू जानती है ना, वो आवाज़ कहाँ है?"
घंटी एक पल चुप रही। फिर बोली। बहुत धीमे, इतना धीमे कि मुझे लगा मैंने सुना या सोचा।
"तेरे पास," उसने कहा। "बस बंद है।"
"कहाँ?"
"जहाँ तूने उसे खुद बंद किया था।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
और मेरे अंदर कोई जगह थी — दीवार, कोई दरवाज़ा नहीं, बस एक खाली कोना, जहाँ कुछ नहीं था। पर उस जगह की खालीपन में एक आकार था। जैसे किसी ने वहाँ कुछ रखा था, बहुत साल पहले, और फिर उसे ढक दिया।
मैंने आँखें खोलीं।
कमरा अब भी वही था। संदूक बंद। ताला मेज़ पर। माँ ने काजल के हाथ में चाय का गिलास पकड़ाया। शबनम आपा केतली धोने लगीं। उस्ताद ने अपनी स्टूल समेटी। मीरा कैमरा बंद कर रही थी। दुबे अंकल अपनी छड़ी उठा रहे थे।
सब कुछ सामान्य था।
पर सामान्य नहीं था। क्योंकि उस रात के बाद हम सब जानते थे कि हमारा झगड़ा रणवीर से नहीं था। हमारा झगड़ा उस चीज़ से था जो पचास साल पहले दो घरों के बीच बंद कर दी गई थी — एक याद, एक ताले में, एक गली के नीचे, एक बड़े आदमी के घर में।
और सबसे बड़ी बात — जो चाबी मेरे गले में थी, वो मेरे घर की नहीं थी।
वो उसके घर की थी।
काजल ने बाहर जाते वक़्त मेरे कान में कहा, "अंकुश, तू ठीक है?"
मैंने कहा, "हाँ।"
वो रुकी। "झूठ बोल रहा है।"
मैं हँसा। "थोड़ा।"
"कितना?"
"इतना कि अगर तू अभी मुझे गले लगा दे, तो मैं रो दूँगा। और फिर सुबह सब कहेंगे कि अंकुश बच्चों जैसा हो गया।"
वो मेरी तरफ़ देखकर हँसी, फिर मेरे कंधे पर सिर रख दिया, बस एक पल के लिए। फिर उठी और बोली, "कल सुबह आठ बजे मेरी क्लास है। पर मैं छह बजे आ जाऊँगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि तू अकेले ताला खोलने की सोचेगा। और मैं तुझे अकेले नहीं छोड़ूँगी।"
वो चली गई।
मैं कमरे में अकेला रह गया। बल्ब गुनगुना रहा था। बाहर गली में कहीं टीवी की आवाज़ आ रही थी। किसी के घर में बच्चा रो रहा था। ज़िंदगी चल रही थी, अपनी रफ़्तार से, चाहे हमारे अंदर ताले बंद हों या खुले।
मैंने ताला अपनी हथेली पर रखा और उसे देखा।
"अब सुन," मैंने उससे कहा। "तेरे पास एक याद है। मेरे पास एक चाबी है। और बीच में एक आदमी है जिसके पास वो चीज़ है जो तुझे खोल सकती है। तो फिर एक काम करते हैं — तू बंद रह। ज़्यादा देर नहीं। पर इतनी देर तक रुक कि मैं अपनी आवाज़ ढूँढ लूँ।"
ताला चुप रहा।
पर उस रात, पहली बार, मुझे लगा कि उस चुप्पी में 'हाँ' थी।
साइकिल की घंटी मेरी जेब में थी।
उसने कुछ नहीं कहा।
पर उस रात वो और गरम थी।
और अगर तुम पूछो कि अंकुश को क्या पता चला — तो इतना पता चला कि गली में जितने ताले हैं, उनमें सिर्फ़ एक ताला ऐसा है जिसकी चाबी किसी और के घर में रखी है। और वो ताला मेरे ही घर में पड़ा है। यानी जिस चीज़ को मैं अपना घर समझ रहा था, वो असल में दो घरों के बीच की सरहद थी।
उस रात मैंने संदूक को नहीं छुआ। ताला मेज़ पर ही रखा। और सोने से पहले मैंने एक काम किया — दादा की पुरानी तस्वीर उतारी, जिसमें वो साइकिल के साथ खड़े थे, और उसे अपने सिरहाने रख लिया।
"दादा," मैंने कहा, "आपने ये ताला बंद करके अच्छा नहीं किया। अब खोलने का तरीक़ा भी आप ही बताइए।"
तस्वीर से कोई जवाब नहीं आया। पर हवा ने परदा हिलाया, और मुझे लगा कि किसी ने हल्का सिर हिलाया।
सुबह उठते ही मैंने सबसे पहले वो काग़ज़ देखा जो थाने से आया था — गवाह: अंकुश यादव।
और उस काग़ज़ के नीचे, जो मैंने पहले नहीं देखा था, एक आख़िरी लाइन थी। बहुत छोटे अक्षरों में। इतनी छोटी कि शायद उसे कोई पढ़े ही नहीं।
"जो चाबी तेरे गले में है, वो इस काग़ज़ को नहीं खोलेगी। उसके लिए वही चाबी चाहिए जो तेरे घर में बंद है।"
मैंने काग़ज़ मोड़ा।
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