The Mysterious Bell – Chapter 940
"और दो बड़ी?"
वो उठे और अपना थैला उठाने लगे।
"दो बड़ी," उन्होंने कहा, "मैंने अपने पास से नहीं दीं। मैंने बनाकर उन्हें उनके हाथ में रखी थीं, जिस रात उन्होंने चाबियाँ बदलीं। उस रात के बाद मैंने वो बड़ी चाबियाँ कभी नहीं देखीं।"
वो दरवाज़े तक गए। फिर रुके। पलटे नहीं।
"एक बात और," उन्होंने कहा। "कल जब तुम उस घउस घर से लौटो, तो मुझे वो ताला दिखाना। बिना देखे मैं कुछ नहीं कहूँगा। और हाँ, आज रात ज़िद मत करना। ताले की भी उम्र होती है। पचास साल से बंद ताला सिर्फ़ चाबी से नहीं खुलता। वो तब खुलता है जब उसे लगे कि बंद रहने का वक़्त पूरा हो गया है।
वो चले गए। उनके जाने के बाद कमरे में वो ही गुनगुनाता बल्ब बच गया और मैं।
मैंने ताला उठाया। हथेली पर रखा। वज़न अजीब था। ज़्यादा भारी नहीं, पर इतना हल्का भी नहीं कि तुम उसे भूल जाओ। जैसे किसी ने लोहे में थोड़ी सी चुप्पी मिला दी हो।
मैंने गले की चाबी निकाली। ताले में डाली। घुमाई।
कुछ नहीं हुआ।
न घड़घड़ाहट, न हल्का हिलना। जैसे ताले ने चाबी को देखा भी न हो।
मैंने दोबारा कोशिश की। तीन बार। चार बार।
फिर मैंने ताले से बात की। हाँ, हँसो मत। तुम हँसते होगे कि अंकुश को आदत पड़ गई है सामान से बात करने की। पर उस रात मुझे लगा कि अगर घंटी बोल सकती है, तो ये ताला भी कुछ तो सोच रहा है।
"सुन," मैंने कहा। "तेरे पास मेरी चाबी है। मेरे पास तेरा घर। फिर भी तू बंद है। क्यों?"
ताला चुप।
"तेरी दूसरी चाबी किसके पास है? वो आदमी जो मुझे रखवाला कहता है? वो?"
अब भी चुप।
मैंने ताला मेज़ पर रखा और पीछे हटकर बैठ गया। घंटी जेब से निकाली। ठंडी थी, बिल्कुल ठंडी। पिछले कुछ दिनों से वो या तो गरम हो जाती थी या काँपती थी। आज वो बस चुप थी।
"तू भी चुप," मैंने कहा। "अच्छा है। कभी-कभी चुप्पी भी जवाब होती है, है ना?"
घंटी ने कुछ नहीं कहा। पर मुझे लगा जैसे उसने हल्का सिर हिलाया हो। बस इतना ही।
रात भर मैं सोया नहीं। दो बजे उठकर बैठा। तीन बजे छत पर गया। चार बजे आकर माँ की दवा की पत्ती गिनी — अठारह। अठारह पत्ते। यानी कल रात तक। उसके बाद कुछ नहीं।
सुबह पाँच बजे माँ उठीं। चूल्हा जला। चाय की खुशबू आई। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस एक गिलास मेरे सामने रखा और कहा, "आज आँखें लाल हैं। सुबह ही मुँह धो लिया कर।"
मैं मुस्कुराया। "माँ, आपको कभी डर नहीं लगता?"
वो हँसीं। "लगता है। पर डर के साथ चूल्हा जलाना पड़ता है। डर बैठ जाए तो रोटी जल जाती है।"
इतना कहकर वो रसोई में चली गईं। मैं वहीं बैठा रहा। और सोचता रहा कि इस घर की सबसे ताक़तवर औरत मेरी माँ है, और उसे कोई नहीं जानता।
छह बजे मैं थाने पहुँचा।
दुबे अंकल वहीं बैठे थे। उसी कुर्सी पर। पर आज उनकी पीठ और झुकी थी। हाथ में वो लिफ़ाफ़ा था। मुझे देखते ही वो उठने लगे, फिर बैठ गए। जैसे उठना भी एक बोझ हो।
"आ गया," उन्होंने कहा।
"आ गया, अंकल। दिखाइए।"
उन्होंने लिफ़ाफ़ा खोला। उसमें एक काग़ज़ था। सफ़ेद। मोटा। ऊपर कोई मोहर नहीं, कोई नाम नहीं।
और उस काग़ज़ पर सिर्फ़ तीन लाइनें थीं।
पहली लाइन — गवाह: अंकुश यादव, पुत्र शंकर यादव, साइकिल गली, सातवाँ नंबर।
दूसरी लाइन — मामला: नूर अस्पताल की भूमि।
तीसरी लाइन — और उस लाइन में वो तारीख़ लिखी थी जिस दिन मेरे दादा मरे थे।
मेरे हाथ ठंडे हो गए। काग़ज़ हल्का था, पर लगा किसी ने ईंट हाथ में रख दी है।
"अंकल," मैंने धीरे से कहा, "ये तारीख़ किसी को पता नहीं है। मेरे दादा बुखार से गए थे, दवा देर से आई थी। ये बात घर में भी कम लोग जानते हैं।"
दुबे अंकल ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें छोटी थीं, पर उनमें वो डर था जो आदमी को रात भर जगाए रखता है।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "जिसने ये लिखा है, उसे सिर्फ़ नाम नहीं पता। उसे तेरा घर पता है। उसे तेरा दादा पता है। और सबसे बात ये है — उसने इसे थाने में भेजा है। मतलब वो चाहता है कि सब देखें।"
"किसने भेजा?"
"कोई नहीं जानता। सुबह दरवाज़े के नीचे से मिला।"
मैंने काग़ज़ मोड़ा और जेब में रखा।
"अंकल, ये काग़ज़ आज शाम छह बजे तक मेरी जेब में रहेगा। फिर जो होगा, सबके सामने होगा।"
वो कुछ कहने लगे, फिर रुक गए। और फिर इतना कहा जो मैं कभी नहीं भूलूँगा।
"अंकुश, मैं पच्चीस साल यहाँ बैठा हूँ। मैंने डर बहुत देखा है। पर ऐसा डर कम देखा जो बिना गाली, बिना धमकी, सिर्फ़ एक काग़ज़ से आए। ये आदमी झगड़ता नहीं। ये टुकड़े करता है। और टुकड़े वाला आदमी झगड़े वाले से ज़्यादा खतरनाक होता है।"
मैंने सिर हिलाया और वापस लौटा।
रास्ते में घंटी जेब में थी। मैंने कहा, "कुछ बोल।" नहीं बोली।
खैर।
दिन कैसे गुज़रा, ये बताना ज़रूरी नहीं। बस इतना बताऊँगा कि पूरा दिन उस कमरे की सफ़ाई में लगा। जिस कमरे में संदूक है, वो कमरा आज तक सिर्फ़ मेरा था — मेरे औज़ार, मेरी ग्रीस, मेरे बल्ब की गुनगुनाहट। आज वहाँ पूरी गली बैठने वाली थी।
काजल ने फ़र्श पर पानी डाला और सुखाया। टिंकू ने कोने में एक पुरानी चटाई बिछाई, जो उसकी माँ ने भेजी थी। उस्ताद अली बक्श अपनी छोटी स्टूल लेकर आए, वही जिस पर वो सिलाई मशीन के पास बैठते हैं।
"ये कुर्सी," उन्होंने कहा, "रोज़ मेरा वज़न उठाती है। आज ताले का भी उठा लेगी।"
शबनम आपा दो बार आईं। पहली बार केतली लेकर, दूसरी बार चिमटी लेकर, यह कहने कि अगर कोई ऊँची आवाज़ करेगा तो चिमटी का स्वाद चखेगा। फिर वो खुद हँस पड़ीं और बोलीं, "मज़ाक था। आज कोई नहीं लड़ेगा। आज हम सब एक ही बात सुनने आए हैं।"
पाँच बजे मीरा आई। उसके गले में कैमरा था। मैंने कहा, "इसे बंद कर दे।"
उसने कहा, "नहीं।"
"मीरा, ये घर है।"
"और ये कहानी है," उसने कहा। "अंकुश, मैं तेरी दोस्त हूँ, तेरी दुश्मन नहीं। पर जो आज इस कमरे में बोला जाएगा, वो दीवारों में नहीं रहेगा। वो बाहर जाएगा। और जिस दिन उनकी मशीन आएगी, उस दिन किसी को याद रहना चाहिए कि इस कमरे में कौन खड़ा था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो अपने फटे बैग से एक छोटा तिपाई निकाल रही थी, जिसकी एक टाँग टेप से बँधी थी।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर चेहरे साफ़ आने चाहिए।"
"ये मेरा काम है," वो हँसी। "तेरा काम है ताले को खोलना।"
"खुलेगा," मैंने कहा। "आज नहीं, तो कल।"
"आज," उसने कहा। "आज होना चाहिए।"
पाँच बजकर पचास मिनट पर पापा आए।
वो दिन भर आँगन में बैठे रहे थे। चुप। कोई काम नहीं। बस पुराना पंखा खोला, तार टूटा था, उसे ठीक करने के बहाने बैठे रहे। मैं जानता हूँ, उन्होंने पंखा ठीक नहीं किया। वो सिर्फ़ हाथ व्यस्त रखना चाहते थे, ताकि मुँह से कुछ न निकले।
कमरे में आते वक़्त वो दरवाज़े पर ही खड़े रहे।
"अंदर आइए," माँ ने कहा।
"मैं यहीं ठीक हूँ।"
"शंकर," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ पच्चीस साल की जान-पहचान के बाद आती है। "तू बाहर खड़ा रहेगा, और अंदर तेरा ही घर बोलेगा? अंदर आ।"
पापा अंदर आए। चुपचाप कोने में बैठ गए।
और फिर छह बजे।
मुझे नहीं पता कि उस वक़्त किसने घंटी बजाई। घंटी मेरी जेब में थी। किसी ने उसे नहीं छुआ। पर गली में पीपल की तरफ़ से आवाज़ आई — एक साफ़, गोल, टन्न जैसी आवाज़, जैसे कोई चाँदी की चम्मच पत्थर पर गिरा दे।
सब चौंके।
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