The Mysterious Bell – Chapter 909
मैंने एक पल सोचा।
फिर मैंने कहा, "ठीक है। मान लीजिए उसने दी।"
"मान लीजिए नहीं। दिया।"
"अच्छा, दिया।" मैंने सिर हिलाया। "तो सुनिए। मालती देवी ने अपनी ज़मीन दी होगी। पर नूर अस्पताल की ज़मीन किसी ने नहीं दी। वो ज़मीन आपने ली है। और वो लेने का तरीक़ा काग़ज़ से नहीं, अंगूठे से हुआ है। वो काग़ज़ अभी भी उस दफ़्तार की दीवार के पीछे है, दो ईंटों के बीच, एक लकड़ी की पेटी में। और जिस दिन वो बाहर आएगा, उस दिन आपकी पत्नी की डायरी आपको बचा नहीं पाएगी, क्योंकि वो एक औरत की ज़मीन की गवाही देगी, और वो काग़ज़ सात लोगों की ज़मीन की गवाही देगा। सात अंगूठे, रणवीर साहब। सात। आपकी पत्नी एक थीं।"
रणवीर एक कदम पीछे हटा।
बस एक कदम। पर वो एक कदम मैंने गिन लिया।
और उसकी आँखों में — पहली बार, इतने महीनों में, इतनी बातों में, इतने काग़ज़ों में — उसकी आँखों में कुछ ऐसा दिखा जो मैंने कभी नहीं देखा था।
डर।
बहुत छोटा सा, बहुत गहरा सा, और बहुत जल्दी छिपा लिया गया। पर मैंने देख लिया।
उसने फाइल को दोनों हाथों से दबाया, जैसे कोई ठंड में शाल पकड़ता है।
"अगर तू वो काग़ज़ निकालेगा," उसने धीरे से कहा, "तो मैं वो करूँगा जो मैंने आज तक नहीं किया।"
"क्या करेंगे?" मैंने पूछा।
उसने जवाब नहीं दिया।
"देखिए," मैंने कहा, "मुझे आपका वो 'जो आज तक नहीं किया' अंदाज़ा है। आप मुझे डराएँगे। मेरी दुकान जलाएँगे? कर लीजिए। मेरी माँ का इलाज रुकवाएँगे? कर लीजिए। मुझ पर झूठा केस करेंगे? कर लीजिए। मैं आपको एक बात बताऊँ?" मैंने एक कदम आगे बढ़ा। "आप जो भी करेंगे, वो सब गली देखेगी। और गली ने आपको अब तक सिर्फ़ हाथ जोड़े हुए देखा है। आज के बाद जब भी आप उन्हें कंबल बाँटते दिखेंगे, उन्हें वो कंबल में लिपटा एक और काग़ज़ दिखेगा। आप जो भी करेंगे, वो आपके खिलाफ़ काग़ज़ बन जाएगा। क्योंकि अब गली काग़ज़ लिखती है। अब गली के पास मीरा है, मीरा के पास कैमरा है, और कैमरे के पास कोई अंगूठा नहीं लगता।"
उस्ताद ने पीछे से कहा — बहुत धीरे, बस इतना कि सुनाई दे — "ना नाप से बड़ा, न मन से।"
रणवीर ने उनकी तरफ़ देखा। एक पल के लिए उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जैसे कोई पुराना हिसाब पलट रहा हो। फिर वो मिट गया।
"आज शाम छह बजे," मैंने कहा। "पीपल के नीचे। पूरी गली आपका इंतज़ार करेगी।"
"मैं नहीं आऊँगा।"
"आएँगे।"
"क्यों?"
"क्योंकि आपको अंदाज़ा है कि अगर नहीं आए, तो कल सुबह गली के हर दरवाज़े पर यही बात लिखी मिलेगी — कि रणवीर भारद्वाज को पीपल के नीचे बुलाया गया था, और वो नहीं आया।" मैंने कंधे उचकाए। "और आप वो आदमी नहीं हैं जो किसी के बुलाने पर न आए। आपके पास पचास कारण होंगे, पर आप आएँगे। क्योंकि आपको हमेशा से यही डर रहा है कि कोई आपको अनदेखा कर देगा।"
गली में सन्नाटा था।
ऊपर किसी खिड़की में कोई बच्चा रोया और फिर चुप हो गया। दूर कहीं एक टेम्पो का हॉर्न बजा। पास की दीवार पर एक कबूतर फड़फड़ाया और उड़ गया।
रणवीर ने फाइल दबाई, फिर ढीली छोड़ दी।
"तेरे पापा बाईस साल मेरे साथ चले," उसने कहा। आवाज़ बदल गई थी — धीमी, जैसे अपने आप से बात कर रहा हो। "उन्होंने कभी मुँह नहीं उठाया। एक बार भी नहीं। मैंने उन्हें कभी कुछ नहीं कहा — न डराया, न धमकाया। वो खुद आते थे, खुद अंगूठा लगाते थे, और खुद चुप रहते थे। तू उनका बेटा है, और तूने आज सुबह से मुझे जो कुछ कहा है, वो उन्होंने बाईस साल में नहीं कहा।"
"क्योंकि पापा को मेरी माँ को बचाना था," मैंने कहा। "और मुझे उन्हें बचाना है। फ़र्क़ यही है।"
वो मुझे देखता रहा।
फिर उसने फाइल मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
मुझे यक़ीन नहीं हुआ।
"ले," उसने कहा।
मैंने हाथ नहीं बढ़ाया।
"ये क्या है?"
"जो तू चाहता है," उसने कहा। "तेरी माँ का हिसाब। तस्वीर, जाँचें, दवाएँ, बिल। मेरे पास एक और कॉपी है। पर जो तेरे पास रहेगी, वो किसी काम की नहीं, क्योंकि असली काग़ज़ बस वही है जो अस्पताल के रिकॉर्ड में है। फिर भी…" उसने फाइल हिलाई, "इसमें एक बात है जो तुझे पता होनी चाहिए। उस पन्ने पर, जो कल नौ बजे फाइल हुआ है, अंगूठे की जगह खाली है।"
मैंने फाइल ली।
खोली और पन्ना पलटे बिना उसी जगह पर उँगली रखी। नीली स्याही की एक छोटी लाइन, और उसके नीचे गोल, खाली जगह।
"यहाँ अंगूठा लगेगा," उसने कहा। "किसका, ये अभी तय नहीं।"
मैंने फाइल बंद की।
"अब सुन," उसने कहा, और मुड़कर चलने को हुआ।
फिर रुका।
वो पीछे मुड़ा नहीं। सिर्फ़ रुका। उसकी नीली शर्ट की पीठ, और उसके कंधे, और उसका सीधा खड़ा होना — सब कुछ वैसा ही था, पर आवाज़ बदल गई थी। बहुत धीमी, बहुत साफ़, बिना किसी मिठास के।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"तेरी माँ के इलाज का बिल कल से बढ़ जाएगा।"
मेरा हाथ कसा।
"क्योंकि अस्पताल का जो नया काग़ज़ आज रात साइन होगा," उसने कहा, "उसमें तेरे पापा का अंगूठा नहीं होगा।"
वो रुका। गली की दीवार पर उसकी परछाईं हिली।
"तेरी माँ का अंगूठा होगा।"
और फिर वो चल दिया।
उसके जूतों की आवाज़ गली में गई — एक, दो, तीन — और फिर गली के मुँह पर मुड़कर खत्म हो गई।
मैं वहीं खड़ा रहा।
फाइल मेरे हाथ में थी, और उसका वज़न किसी काग़ज़ का नहीं, किसी पत्थर का लग रहा था।
काजल ने धीरे से कहा, "माँ का अंगूठा… अंकुश, माँ अंगूठा नहीं लगाएँगी। माँ ने कह दिया है।"
"माँ से नहीं लगवाएगा," मैंने कहा।
"तो फिर?"
मैंने फाइल उस्ताद की तरफ़ बढ़ाई। वो कुछ नहीं बोले। उन्होंने बस फाइल ली और अपनी छाती से लगा ली, जैसे कोई पुराना दर्ज़ी कपड़ा नापता है।
"आज रात," मैंने कहा। "आज रात हमें वो काग़ज़ निकालना है। आज रात ही। छह बजे से पहले नहीं — छह बजे के बाद। पीपल के नीचे जो होगा, उसके बाद। क्योंकि अगर हम आज रात वो काग़ज़ निकाल लेंगे, तो उसका नया काग़ज़ कोई मायने नहीं रखेगा।"
"पर उसने कहा कि आज रात वो साइन होगा," काजल ने कहा।
"तो हम उससे पहले पहुँचेंगे।"
उस्ताद ने कहा, "और अगर वो हमसे पहले पहुँच गया?"
मैंने जेब से घंटी निकाली।
वो ठंडी थी। मैंने उसे हथेली में रखा, और उँगली से हल्का सा हिलाया। आवाज़ नहीं आई। बस एक बार, बहुत हल्का, धातु की वो घरघराहट आई जो सिर्फ़ मैं सुन सकता हूँ।
फिर घंटी ने कहा, दो शब्द, बस दो शब्द, जैसे कोई बूढ़ा सामने बैठा हो और सिर्फ़ इतना कहे —
"छह से पहले।"
मैंने घंटी जेब में रखी और आसमान की तरफ़ देखा। दोपहर ढल रही थी। दीवार की परछाईं लंबी हो रही थी।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आप गुमटी जाइए। शबनम आपा से कहिए कि छह बजे की सभा नहीं — पाँच बजे की। और पीपल के नीचे नहीं — अस्पताल के सामने, उसी दीवार के सामने जिसके पीछे वो काग़ज़ है।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ चमका।
"तू आज बहुत जल्दी बड़ा हो गया," उन्होंने कहा।
"मैं बड़ा नहीं हुआ, उस्ताद," मैंने कहा। "बस आज सुबह पता चल गया कि छोटा रहने का वक़्त खत्म हो गया।"
और मैं सीढ़ी की तरफ़ मुड़ा, ताकि ऊपर जाकर भवानी प्रसाद से वो एक बात पूछ सकूँ, जो मुझे रणवीर की आँखों में दिखे डर के बाद से रह-रहकर खटक रही थी — कि उस रात, जब रणवीर की आँख बंद हुई थी, उसने आख़िर देखा क्या था।
॥
सीढ़ी की तीसरी पायदान पर पैर रखते ही मुझे आवाज़ सुनाई दी।
"आ जा। दरवाज़ा खुला है।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno