The Mysterious Bell – Chapter 903
मैंने माथा सहला। “और इसमें आपका फ़ायदा?”
वो हँसे। हँसी छोटी थी, जैसे किसी पुराने पंखे की आख़िरी घूम।
“फ़ायदा? बेटा, मेरी उम्र का आदमी फ़ायदा नहीं देखता, हिसाब देखता है। मेरा हिसाब बाकी है। ये रजिस्टर मेरे हाथ से गुज़रा है और मैं चुप बैठा रहा। अब चुप्पी का ब्याज बहुत बढ़ गया है।”
काजल ने मेरी जेब से रजिस्टर निकाला और उनकी तरफ़ बढ़ा दिया, जैसे परख रही हो। उन्होंने हाथ नहीं बढ़ाया।
“नहीं, बेटी। जो चीज़ तुमने मेहनत से निकाली है, वो तुम्हारी है। मैंने सिर्फ़ दरवाज़ा खुला छोड़ा था।”
फिर वो अपनी कुर्सी पर बैठ गए, कप उठाया, और एक लंबा घूँट लिया। कमरे में चुप्पी थी, और उस चुप्पी में मुझे अपनी घंटी की आवाज़ सुनाई दी — जैसे बहुत दूर से कोई खुद ही को बुला रहा हो।
“एक बात कहूँ?” उन्होंने कप होंठों से हटाया। “ये सफ़ेद टोपी रणवीर की थी। उस दिन उसके सिर से गिरी थी। मैंने उठाकर रख ली। बीस साल से मैं इसे पहनता हूँ — याद रखने के लिए नहीं, याद दिलाने के लिए।”
“किसको?” मैंने पूछा।
“खुद को।” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। “कि जिस रात उस आदमी की आँख बंद हुई, उस रात इस कमरे में तीन आदमी थे। एक मैं, एक रणवीर…”
वो रुके। कप उनके हाथ में था और भाप धीरे-धीरे कम हो रही थी, जैसे कोई राज़ अपनी आख़िरी साँस ले रहा हो।
“…और तीसरा तेरा बाप।”
॥
"तीसरा तेरा बाप।"
ये शब्द कमरे में ऐसे गिरे जैसे कोई भारी चीज़ सीढ़ियों से लुढ़कती हुई आई हो और आख़िरी सीढ़ी पर धड़ाम से रुक गई हो। मैं वहीं कुर्सी पर बैठा रह गया। मेरे हाथ में रजिस्टर था, गोद में लाल डायरी, और जेब में वो चाबी जो गोविंद भाई ने दी थी। तीनों चीज़ें मेरे पास थीं। पर उस वक़्त मुझे लगा कि मेरे पास कुछ भी नहीं है।
काजल ने पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर उनकी तरफ़। टिंकू ने अपनी पट्टी वाला घुटना सहला और धीरे से बोला, "उस्ताद…"
मैंने हाथ उठाकर उसे रोका। मुझे उस वक़्त अपनी आवाज़ पर भरोसा नहीं था। जब इंसान के अंदर कुछ टूटता है, तो पहले आवाज़ टूटती है। बाद में समझ आता है कि असल में टूटा क्या है।
मैंने उनके हाथ में काँपती भाप देखी और कहा, "अच्छा। तो अब बताइए, मेरे पापा उस रात वहाँ क्या कर रहे थे? चाय पीने आए थे क्या?"
मेरी आवाज़ में जो मज़ाक था, वो नकली था। और वो खुद जानते थे। उन्होंने कप नीचे रखा और बिना जल्दी किए बोले, "तेरे बाप उस रात वहाँ इसलिए आए थे क्योंकि मैंने उन्हें बुलाया था।"
काजल की साँस रुक गई। टिंकू की उँगलियाँ पट्टी पर जम गईं।
"आपने बुलाया था?" मैंने पूछा।
"हाँ।" उन्होंने अपनी उँगली से कुर्सी की टूटी टाँग के नीचे रखी ईंट छुई, जैसे कोई पुरानी आदत हो। "उस रात से पहले मैंने देख लिया था कि रणवीर साहब कुछ ऐसा करने वाले हैं जिसमें एक आदमी का नाम हमेशा के लिए काग़ज़ में बंद हो जाएगा। मैंने तेरे बाप को बुलाया। कहा — आ जाओ, तुम्हारे नाम का काग़ज़ है, अपनी आँख से देख लो, फिर जो करना हो करना।"
"और पापा आए?"
"आए।" उन्होंने कहा। "देर से आए। आधी रात के बाद। जब तक आए, तब तक रणवीर साहब की आँख बंद हो चुकी थी।"
"आँख बंद?" टिंकू ने पूछा। "मतलब सो गए थे?"
वो मुस्कुराए। वैसी मुस्कान जो बच्चों के सामने नहीं खोली जाती।
"बेटा, कुछ आदमी सोते नहीं, वो बंद हो जाते हैं। दोनों में फ़र्क़ है। सोया हुआ आदमी उठ जाता है। बंद हुआ आदमी वापस खुलता है या नहीं — ये उसके अंदर बैठी चीज़ तय करती है, वो नहीं।"
मैंने कुर्सी पीछे सरकाई और टाँग पर टाँग चढ़ा ली, जैसे गली में बैठकर कोई आम बातचीत हो रही हो। पर मेरे अंदर सब कुछ काँप रहा था। घुटने, जबड़ा, और वो चीज़ भी जिसका नाम मैं नहीं जानता पर जो सीने के बीच में बैठी होती है।
"चाचा," मैंने कहा, "मुझे उल्टा-सीधा मत बताइए। मैं सीधा आदमी हूँ। मुझे सीधी बात समझ आती है। एक-एक करके बताइए, जैसे हिसाब की कॉपी में लिखते हैं।"
वो मेरी तरफ़ मुड़े। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बहुत पुराने लोगों की आँखों में होती है — थकान नहीं, हिसाब। जैसे कोई बहुत लंबा जोड़ लगाता रहा हो और अब आख़िरी कतार में बैठा हो, यह सोचकर कि क्या ये आख़िरी कतार है या नहीं।
"मेरा नाम भवानी प्रसाद है।" उन्होंने कहा।
मेरे हाथ से रजिस्टर थोड़ा ढीला हुआ।
वो नाम मैंने सुना था। कहाँ सुना था? किसी काग़ज़ के कोने पर, किसी मोहर के नीचे, किसी पुरानी रसीद की आख़िरी लाइन में। नाम ऐसे होते हैं — कभी सामने नहीं आते, बस काग़ज़ों में बैठे रहते हैं। और एक दिन अचानक सामने आकर खड़े हो जाते हैं, जैसे पच्चीस साल से दरवाज़े के बाहर खड़े इंतज़ार कर रहे हों।
"भवानी प्रसाद," मैंने दोहराया। "वो भवानी प्रसाद जिनका नाम पीली फाइल के पहले पन्ने पर था? जिनके हाथ की लिखाई उस रिपोर्ट पर थी जिससे स्कूल की छत बंद होने वाली थी?"
"हाँ।" उन्होंने कहा। "वही। जिसने पैंतीस साल रणवीर भारद्वाज के लिए हिसाब लिखा। जिसने सैकड़ों अंगूठे काग़ज़ों पर लगवाए। जिसकी लिखाई आज भी इस रजिस्टर में ज़िंदा बैठी है।"
काजल आगे आई। "और आप अब भी इसी इमारत में रहते हैं?"
"ऊपर।" उन्होंने छत की तरफ़ उँगली उठाई। "छत पर एक छोटा कमरा है। बारह फुट का। उसमें एक चारपाई, एक स्टूल, एक अलमारी, और बरसों की धूल है। बाईस साल से वहीं रहता हूँ। सुबह नीचे आता हूँ, शाम को ऊपर जाता हूँ। कभी-कभी लगता है कि मैं इस इमारत की सबसे पुरानी चीज़ हूँ — इन ईंटों से भी पुराना।"
"आपने खुद के लिए कुछ नहीं बनाया?" मैंने पूछा। "पैंतीस साल हिसाब लिखा, इतना बड़ा दफ़्तर, इतने काग़ज़, इतनी मोहरें… और आप छत के कमरे में?"
वो हँसे। इस बार हँसी पूरी थी, छोटी नहीं। "बना तो था, बेटा। एक छोटा मकान था, पुराने बाज़ार के पीछे। दो कमरे, एक आँगन, आँगन में नीम का पेड़। बीवी थी। बेटा था। बेटे का नाम…" वो रुके। कप उठाया, फिर रख दिया। "बेटे का नाम क्या ज़रूरत है बताने की। नाम बताते ही आदमी काग़ज़ पर चढ़ जाता है।"
"फिर?"
"फिर एक दिन मैंने अपने ही हिसाब में देखा कि वो मकान किसी और के नाम पर है।" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, बस गिनती थी। "सोचो, बेटा। आदमी पैंतीस साल किसी और का हिसाब लिखे और एक दिन पाए कि उसका अपना हिसाब भी किसी और के खाते में जा चुका है। काग़ज़ ऐसा होता है। तुम जितना उसे संभालते हो, वो उतना तुम्हें निगलता है।"
कमरे में छत का पंखा मुड़े ब्लेड के साथ धीरे घूम रहा था। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हाँफ रहा हो। खिड़की से आती धूप में धूल के कण तैर रहे थे, और मुझे लगा कि ये धूल भी उसी दफ़्तार के किसी पुराने काग़ज़ से उड़ी है।
मैंने लाल डायरी अपनी गोद से उठाई। जिल्द उखड़ रही थी, कोने फटे थे, और ऊपर हाथ से लिखा था — जिसे पढ़ना हो, पढ़ ले।
"ये डायरी किसकी है?" मैंने पूछा। "ये रणवीर की नहीं लगती। उसकी लिखाई मोटी है, दबाकर लिखता है, जैसे काग़ज़ को सज़ा दे रहा हो। ये लिखाई पतली है और ऊपर की लाइन में विनती है। रणवीर किसी से विनती नहीं करता।"
भवानी प्रसाद ने पहली बार मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई इम्तिहान पास कर लिया हो, बिना तैयारी के।
"अच्छा देखा तूने।" उन्होंने कहा। "तेरे दादा भी ऐसे ही देखते थे। काग़ज़ पढ़ने से पहले आदमी पढ़ते थे।"
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