The Mysterious Bell – Chapter 850
पर एक भी काग़ज़ ऐसा नहीं है जो कहे कि अस्पताल की ज़मीन भारद्वाज की नहीं है।
"नहीं," मैंने कहा। "अभी नहीं।"
मीरा ने होंठ कसे।
"तो कल सात बजे तक चाहिए।"
"पता है।"
हम दोनों चुप हो गए।
इसी बीच पीछे से शबनम आपा की आवाज़ आई — "अंकुश! आ जा, समोसा ठंडा हो रहा है। और वो मीरा को भी ले आ।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और धीमे से कहा — "मैं उसकी चाय नहीं पीऊँगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसने रज़िया आपा से माफ़ी माँगी है, मुझसे नहीं।" वो हँसी। "मज़ाक कर रही हूँ। चल।"
हम गुमटी की तरफ़ लौटे।
रास्ते में मैंने पीछे मुड़कर गली देखी।
भोला भाई अपनी दुकान के बाहर कुर्सी पर बैठे थे और उनकी बीवी उनके कंधे पर हाथ रखकर उसी रेडियो की धुन पर हल्के से सिर हिला रही थी। उस्ताद अली बक्श याकूब के साथ चबूतरी के किनारे बैठे थे और दोनों की आवाज़ें बहुत धीमी थीं — इतनी धीमी कि लगे दो बूढ़े आदमी चुपचाप पचास साल का हिसाब कर रहे हों। कौशल्या दादी और शांति देवी को बच्चों ने घेर लिया था, और सानिया उन्हें अपनी लाल कवर कॉपी दिखा रही थी — जिसमें ट्रकों की तारीख़, वक़्त और शक्ल लिखी है।
और पीपल के नीचे, चबूतरी पर, एक कोना खाली था।
मुझे नहीं पता क्यों, पर मैंने उस खाली कोने को देखकर सोचा — कल किसी को वहाँ बैठना चाहिए। कल सुबह सात बजे, जब मशीन आए, तो उस कोने में कोई होना चाहिए, जो बोले।
"अंकुश," मीरा ने मेरा हाथ खींचा। "तेरा हाथ ठंडा है।"
"हाँ," मैंने कहा। "आज रात सब कुछ ठंडा है। घंटी ठंडी, हवा ठंडी, और मैं?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुरा दिया।
"मैं गरम हूँ। मैं आज रात किसी को सोने नहीं दूँगा।"
और इसी वक़्त, गुमटी की थाली से समोसा उठाते हुए, मेरी जेब में घंटी फिर से हिली — हल्की सी, एक बार, जैसे कोई मेरी बात का जवाब दे रहा हो।
नई बस्ती में, उस समय, भारद्वाज भवन की दूसरी मंज़िल पर पीली रोशनी जल रही थी।
रणवीर अपनी बड़ी लकड़ी की मेज़ के पीछे बैठा था। मेज़ पर उसकी पीली फाइल खुली थी, एक गिलास में पानी, और उसके बाएँ हाथ के पास, किसी बुज़ुर्ग की निशानी की तरह, वो पीतल का ताबीज़ पड़ा था — जो रात में बेज़ान लोहे जैसा लगता है, जिसकी चमक सिर्फ़ दिन में दिखती है, और जिसे छूने पर आदमी को कुछ नहीं होता, बस उँगली पर गरमी का एक हल्का निशान बच जाता है।
सामने खड़ा उसका आदमी — वही जो कल से काग़ज़ों के बंडल इधर-उधर कर रहा था — हाथ जोड़े खड़ा था और हिसाब बता रहा था।
"साहब, तारीख़ चढ़ गई है। काग़ज़ सुबह तक दफ़्तार पहुँच जाएगा। सात बजे मशीन का हुक्म भी साइट पर पहुँच चुका है।"
रणवीर ने सिर हिलाया।
"और गली?"
"गली में सब खुश हैं, साहब। हँसी-खुशी, रोटी, समोसा। लगता है किसी ने कुछ जोड़ दिया है। पर उसका कोई असर हम पर नहीं पड़ेगा, क्योंकि काग़ज़ हमारा है।"
रणवीर ने पानी का गिलास उठाया। एक घूँट लिया। फिर गिलास रखकर वो मुस्कुराया।
और उसी पल, मेज़ पर पड़ा वो बेज़ान पीतल ताबीज़ हल्का सा चमक उठा।
न ज़ोर से, न पूरा। बस एक पल के लिए, जैसे अंधेरे कमरे में किसी ने दूर से दीया जलाकर तुरंत बुझा दिया हो।
वो आदमी एक कदम पीछे हट गया।
उसने अपनी आँखों पर भरोसा नहीं किया। उसने दोबारा देखा। ताबीज़ वैसा ही पड़ा था — ठंडा, बेज़ान, पीला।
पर रणवीर की मुस्कान…
वो मुस्कान नहीं थी। वो कुछ और था। ऐसा, जैसे किसी ने उसके चेहरे पर मुस्कान का नक़ाब चढ़ा दिया हो और नक़ाब के नीचे कोई दूसरा आदमी बैठा हो।
आदमी ने अपने हाथ देखे। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"साहब?" वो धीमे से बोला।
रणवीर ने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या हुआ?"
"वो… वो ताबीज़।"
"ताबीज़?" रणवीर ने मेज़ पर रखे पीतल की तरफ़ देखा, फिर उसकी तरफ़। "ताबीज़ क्या करेगा? ताबीज़ तो पहनने की चीज़ है।"
उसने ताबीज़ उठाया और धीरे से अपने गले में लटका लिया।
"जा," उसने कहा। "सुबह सात बजे मुझे वहाँ खड़ा मिलना। और हाँ — उस लड़के की दुकान का बोर्ड सबसे पहले गिरेगा। सबसे पहले। सबके सामने।"
आदमी ने सिर हिलाया और कमरे से बाहर निकल गया।
दरवाज़ा बंद हुआ।
और उस पल, अगर कोई उस कमरे में होता, तो उसने सुना होता — ताबीज़ के भीतर से एक बहुत धीमी आवाज़, जैसे किसी बंद लोहे के बक्से में कोई खुरच रहा हो।
एक शब्द। बस एक।
और वो शब्द था — "आधा।"
गुमटी की तरफ़ लौटते हुए मैंने अपने कंधे पर हाथ रखा।
पीछे से हवा आई थी, ठंडी नहीं, गरम भी नहीं। बस ऐसी, जैसे किसी ने मेरे कान के पास से होकर कोई बात कही हो और मैं सुन न सका।
मैं रुका।
"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस ऐसे लगा जैसे किसी ने मेरा नाम लिया।"
"किसने?"
मैंने पीछे देखा। गली में भीड़ थी। हँसी थी। रोटी थी। समोसा था।
"नहीं," मैंने कहा। "शायद हवा ने।"
पर मैं झूठ बोल रहा था, और मुझे पता था कि मैं झूठ बोल रहा हूँ। क्योंकि उस वक़्त, मेरी जेब में, घंटी फिर से हिली थी — और इस बार उसने एक भी शब्द नहीं कहा।
बस हिली।
जैसे कोई बूढ़ा आदमी, जो सब जानता है, पर अभी नहीं बोलना चाहता।
॥
मैं गुमटी की तरफ़ लौट रहा था और मेरा मन कहीं और भाग रहा था।
गली में रोशनी थी। किसी ने पीपल के नीचे दो लालटेनें टाँग दी थीं। शबनम आपा की गुमटी से भाप उठ रही थी, जैसे चूल्हा अभी बुझा हो और उसकी आख़िरी गरमी बाहर आ रही हो। रज़िया बेंच पर बैठी थी और उसके हाथ में माँ की वो पुरानी रेशमी चुनरी थी, जिसके फूल धुल-धुल से हो गए थे।
लोग हँस रहे थे। उस्ताद अली बक्श याकूब के कंधे पर हाथ रखे कुछ कह रहे थे और याकूब सिर हिला रहा था। कौशल्या दादी अपनी लाठी के सहारे खड़ी थीं और शांति देवी उनके पीछे चुपचाप बैठी थीं। टिंकू किसी को समोसा खिला रहा था और खुद नहीं खा रहा था, जो उसके लिए बहुत बड़ी बात थी।
सब कुछ ठीक था।
फिर भी मेरे अंदर कुछ ठीक नहीं था।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे वो भी थक गया हो। मैंने चारपाई पर बैठकर जेब से घंटी निकाली और सामने लोहे की अलमारी पर रख दी। पीतल पर बल्ब की पीली रोशनी पड़ रही थी और उसका रंग ऐसा लग रहा था जैसे बरसों से किसी ने उसे नहीं छुआ।
मैंने हिसाब जोड़ा।
अट्ठावन बचे थे। घंटी ने एक सौ दस जोड़े। कुल एक सौ अड़सठ।
अब सुनो, मैं तुमसे सीधी बात करता हूँ, क्योंकि यहाँ कोई और नहीं है और मुझे अपनी ही बात पर शक हो रहा है।
मेरे हिसाब से यह जोड़ सीधा है। जोड़ो, अंक बढ़ाओ, खर्च करो, बचा लो। जैसे मैं अपनी दुकान में हिसाब रखता हूँ। कल तीन पंचर हुए, तीन का पैसा आया, दो रुपये की चेन बिकी, पाँच रुपये की हवा भरी। सब जोड़ो, कुल निकल आएगा।
पर यहाँ कुछ अलग था।
जब मैंने रज़िया और शबनम आपा को जोड़ा, तो अंक आए। जब स्कूल में वेद सर और शालिनी मैडम की बात जुड़ी, तो अंक आए। जब बंसी बाबा और हफ़ीज़ बाबा बैठे, तो अंक आए।
पर उसी वक़्त, कहीं न कहीं, कुछ जा भी रहा था।
ऐसा लग रहा था जैसे मेरे हाथ में एक छेद वाली बाल्टी है। मैं ऊपर से पानी डालता जा रहा हूँ, हिसाब में लिखता जा रहा हूँ कि इतना पानी डाला, और बाल्टी के नीचे से वो पानी किसी और के आँगन में गिर रहा है।
मैंने घंटी की तरफ़ देखा।
"सुन," मैंने कहा। "मुझे एक बात पूछनी है और तू आज सीधा जवाब दे।"
घंटी चुप रही।
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