The Mysterious Bell – Chapter 81
मीरा का कैमरा नीचे आ गया।
"बाबा," उसने धीरे से कहा।
"तू अपना काम कर, बेटी," हाफ़िज़ बाबा ने कहा। "तू सवाल पूछती है, ये अच्छी बात है। पर सवाल पूछने वाले को भी इतनी जगह छोड़नी चाहिए कि जवाब आ सके।"
गली में किसी ने ताली नहीं बजाई। कोई शोर नहीं हुआ। बस लोग चुपचाप खड़े रहे, और वो चुप्पी ताली से ज़्यादा बड़ी थी।
मीरा ने कैमरा बंद किया।
"मैं आज रात आऊँगी," उसने मुझसे कहा। "तुम्हारे पापा के सामने। और मैं तुम्हारे साथ खड़ी रहूँगी। पर तुम्हें सच बोलना पड़ेगा। पूरा।"
"बोलूँगा," मैंने कहा।
वो मुड़ी और चली गई। इस बार जल्दी में नहीं। धीरे। जैसे किसी चीज़ के बारे में सोच रही हो।
भीड़ छँटने लगी।
मैंने पंडित जी और हाफ़िज़ बाबा को प्रणाम किया। वो दोनों फिर मूँड़े पर बैठ गए — और मुझे अच्छा लगा कि उनमें से किसी ने भी जाने की जल्दी नहीं दिखाई।
मैं गुमटी की तरफ़ मुड़ा ही था कि उस्ताद का हाथ मेरे कंधे पर आया।
"दुकान चल," उन्होंने कहा।
आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ़ मैंने सुनी।
हम उनकी दुकान में गए। अंदर कपड़ों की गंध थी, चाक के निशान, और सिलाई मशीन पर टँगा एक पुराना नीला धागा।
उस्ताद ने दरवाज़ा बंद किया।
फिर मेरी तरफ़ मुड़े।
"निकाल," उन्होंने कहा।
मैंने घंटी निकाली।
उस्ताद ने उसे अपने हाथ में नहीं लिया। बस देखा — बहुत देर तक।
"मैंने ये आवाज़ पचास साल बाद सुनी," वो बोले। "आज। पीपल के नीचे।"
"आप जानते हैं ये क्या है, उस्ताद?"
उन्होंने चश्मा उतारा। पोंछा। फिर से पहना।
"जानता हूँ," कहा। "और यही मेरी मुसीबत है।"
वो अपनी कुर्सी पर बैठे। मुझे बैठने का इशारा किया।
"सुन, बेटा। ये चीज़ तेरे पास कहाँ से आई, ये बाद में। पहले ये समझ — ये घंटी किसी की मिरासी होती है।"
"मिरासी?"
"विरासत में मिली चीज़।" उन्होंने कुर्सी की बाँह पकड़ी। "पर एक बात सुन ले। घर की विरासत का हिसाब आसान होता है — अलमारी मिली, संदूक मिला, गिन लिया। पर इस तरह की मिरासी का हिसाब भारी होता है। ये तुझे मिली है, पर ये तेरी नहीं है। ये तेरे पास रखी गई है। और जो चीज़ तेरे पास रखी गई हो, उसे बाज़ार में नहीं दिखाते।"
"उस्ताद —"
"सुन पहले।" उन्होंने हाथ उठाया। "आज तूने ये घंटी पीपल के नीचे बजने दी। गली के बीस आदमियों ने सुना। कल बत्तीस सुनेंगे। परसों चारों तरफ़ सुनाई देगा। और जो चीज़ चारों तरफ़ सुनाई देती है, उसके पीछे लोग पड़ते हैं। कुछ लोग लेने के लिए। कुछ लोग छीनने के लिए। और कुछ लोग —" वो रुके। "कुछ लोग इसलिए, क्योंकि वो इसे पहले से जानते हैं।"
मेरी रीढ़ में ठंडी सुई जैसी चीज़ चली।
"आप किसकी बात कर रहे हैं?"
"बबलू आया था ना? काले फ़्रेम की बात करके गया?"
"हाँ।"
"तो उसने तुझे एक चीज़ बता दी है जो मुझे पचास साल में किसी ने नहीं बताई। उस आदमी के कमरे में, सीढ़ी के पास, एक काग़ज़ टँगा है। और उस काग़ज़ पर ये घंटी बनी है। अब बता — एक ठेकेदार के कमरे में घंटी की तस्वीर क्यों टँगी होगी?"
मैं चुप रहा।
"क्योंकि वो उसे जानता है," उस्ताद ने कहा। "और जो जानता है, वो ढूँढता भी है।"
"तो मैं क्या करूँ? इसे कहीं छिपा दूँ?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर।
"नहीं," बोले। "छिपाने से चीज़ें बड़ी हो जाती हैं। घंटी को ऐसे रख जैसे वो तेरी रोज़ की चीज़ है — जेब में, साइकिल पर, औज़ारों के साथ। पर बाज़ार में नहीं बजाना। और जो अंगूठा लेने वाले घूमते हैं, उनके सामने नहीं खोलना। मैं तुझे एक बात बताता हूँ जो मैंने पचास साल पहले सीखी थी —"
वो रुक गए। उनकी आवाज़ बदली।
"घंटी को लोग सिर्फ़ आवाज़ समझते हैं। ये आवाज़ नहीं है। ये हिसाब है। और इसका हिसाब जो भी रखता है, वो अकेले नहीं रख पाता। मुझे भी यही लगा था कि मैं अकेला रख लूँगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"आज तूने पीपल के नीचे दो बूढ़ों को जोड़ा। अच्छा किया। पर तूने ये नहीं बताया कि उन्हें जोड़ने के बाद तेरे भीतर क्या हुआ। जब हाफ़िज़ ने पंडित का हाथ पकड़ा, तो तेरे अंदर कुछ टूटा या जुड़ा?"
मैंने सोचा।
"मुझे… मुझे अपने घर की याद आई," मैंने कहा। "और मुझे ये भी लगा कि मैं इनके सामने सच बोल रहा हूँ, जबकि अपने घर में मैं कुछ नहीं बोलता।"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"तो जाकर पूछ।"
"किससे?"
"तंत्र से।" उन्होंने ठुड्डी घंटी की तरफ़ उठाई। "जाकर पूछ — तेरा घर इतना चुप क्यों है।"
मेरी जेब में घंटी गर्म हुई। एक बार बजी।
उस्ताद ने वो आवाज़ सुनी। फिर वो उठे और मेरी तरफ़ पीठ करके खड़े हो गए।
"जा," उन्होंने कहा। "और बेटा —"
"हाँ, उस्ताद।"
"अगर कल तू मुझसे कहे कि सभा में खड़े होकर सच बोलना है — तो मैं आ जाऊँगा। पर एक शर्त है। मैं पहले अपनी चुप्पी बोलूँगा। किसी और की नहीं। अपनी।"
मैं दुकान से बाहर निकला।
गली में अंधेरा उतर रहा था। गुमटी के लाल बल्ब में पीपल का पत्ता हिलता दिख रहा था। पीछे की दुकानों में बत्तियाँ जल रही थीं।
मैं अपने घर की तरफ़ चला।
रास्ते में मेरी जेब की घंटी गर्म होती गई। ज़्यादा गर्म। जैसे किसी ने उसे आग पर रख दिया हो।
मैंने रास्ते में ही, चलते-चलते, धीरे से पूछा — "मेरा घर इतना चुप क्यों है?"
और घंटी ने जवाब दिया।
तेरे घर में तीन लोग हैं। और तीनों ने एक-एक सच अंदर बंद कर रखा है।
मैं रुक गया।
"कौन से तीन?"
तेरे पापा का सच तुझे पता है। तेरी माँ का सच तुझे पता है।
और तीसरा?
घंटी चुप हो गई।
"बोल," मैंने कहा। "तीसरा कौन?"
घंटी एकघंटी ने कहा — एक…
और फिर चुप।
मैं गली के बीचोबीच खड़ा रह गया। घंटी हाथ में थी। ठंडी। अभी एक मिनट पहले जो गर्म थी, अब वो बर्फ़ जैसी लग रही थी।
"अरे," मैंने धीरे से कहा, "एक क्या? एक क्या बोल रही थी? पूरा बोल ना।"
कुछ नहीं।
"तीसरा सच किसका है? माँ का तो पता है, पापा का पता है। तीसरा कौन?"
घंटी ने जवाब नहीं दिया।
मैंने उसे जेब में रखा। एक कदम चला। फिर रुक गया। क्योंकि पीछे से आवाज़ आई।
"उस्ताद!"
सानिया भागी आ रही थी। उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों साथ में। सानिया के बाल हवा से उड़ रहे थे और चिंटू की नाक बह रही थी, जैसे वो दौड़ते हुए आया हो और रास्ते में भूल गया हो कि नाक भी है।
"उस्ताद, उस्ताद, आप जल्दी चलो।"
"क्या हुआ?"
"वो दो बाबा," गुड्डू ने कहा। उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं। "वो दो बाबा फिर बैठे हैं।"
"कौन से दो बाबा?"
"अरे वही," सानिया ने कहा, जैसे मैं दुनिया का सबसे बड़ा बेवकूफ़ हूँ। "हाफ़िज़ बाबा और ब्रजकिशोर पंडित जी। जिनका आपने आज सुबह झगड़ा सुलझाया था।"
मेरा पेट गिरा।
"वो तो सुलह कर गए थे। गले मिले थे। मैंने देखा था।"
"देखा था," रफ़ीक़ ने कहा। उसने घुटने पर बँधी पट्टी को सहलाया। "पर अब वो फिर अलग-अलग बैठे हैं। दोनों तरफ़। बीच में पूरा चबूतरा खाली है। और —"
"और क्या?"
"और वो बोल रहे हैं," चिंटू ने कहा। "धीरे-धीरे। पर बोल रहे हैं। और हाफ़िज़ बाबा की आवाज़ ऐसी है जैसे कोई रो रहा हो।"
मैंने एक पल सोचा।
तो सुलह होना काफ़ी नहीं था। सुलह सिर्फ़ पहला दरवाज़ा था। असली कमरा अंदर था, बंद, और उसकी चाबी किसी और जेब में।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno