The Mysterious Bell – Chapter 801
“मतलब ये,” मैंने कहा, “कि अगर हम रात को किसी तरह उसका ताबीज़ खींच लें, तो पूरा शहर कहेगा — साइकिल वाले लड़के ने चोरी की। और हमारे पास जो सच है, वो भी उस चोरी के नीचे दब जाएगा।”
“तो?”
“तो सच से खोलना पड़ेगा,” मैंने कहा। “उसके गले से नहीं। उसके सामने बैठे लोगों के मुँह से।”
और तभी मेज़ पर रखी घंटी अपने आप हिली।
नहीं, बजी नहीं। हिली। जैसे कोई बच्चा सोते-सोते करवट बदलता है। मेज़ पर पीतल की आवाज़ हुई — खट।
दादी ने लाठी उठाई।
“ये क्या?” शांति देवी ने धीरे से कहा।
“ये वो कर रहा है,” दादी ने कहा। “बोलना चाहता है, पर अपनी आवाज़ से नहीं।”
“तू क्या कह रहा है?” मैंने घंटी से पूछा।
“मुझे तेरी ज़ुबान चाहिए,” ठंडी आवाज़ ने कहा। “एक बार। सिर्फ़ एक बार।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं पचास साल किसी और की ज़ुबान से बोला हूँ,” उसने कहा। “सभा में। तारीफ़ में। झूठे आशीर्वाद में। अब एक बार अपनी मर्ज़ी से बोलना है।”
मैंने अपनी घंटी को हाथ में लिया। ठंडी। और मैंने उसे हिलाया।
टन्।
“बोल,” मैंने कहा।
“वो आदमी,” ठंडी आवाज़ ने कहा, “जिसने मुझे बाँटा, वो आज तुम्हारे बीच में नहीं बैठा है। वो किसी की सभा में नहीं आता। वो सिर्फ़ काग़ज़ पर आता है।”
“नाम,” मैंने कहा।
“नाम मेरे पास नहीं है,” उसने कहा। “मेरे पास सिर्फ़ एहसास है। जब वो मेरे पास से गुज़रता है, मेरी धातु ठंडी हो जाती है।”
“तो तूने उसे महसूस किया है? कभी?”
“बहुत बार,” उसने कहा। “और हर बार मैं चुप रहा, क्योंकि मुझे बोलने की ज़ुबान नहीं मिली थी।”
मैंने घंटी को अपने कान के पास उठाया। और मैंने पहली बार सुना — उसमें से एक पतली सी घरघराहट आ रही थी, जैसे दूर से कोई पुरानी रेडियो बज रही हो।
“अंकुश,” मीरा ने कहा, “वक़्त नहीं है। नौ बजने को हैं। लोग पीपल पर जमा हो रहे हैं।”
“मैं जानता हूँ,” मैंने कहा।
“और एक बात,” मीरा ने कहा। “मैंने अभी बाहर सुना — रणवीर की सफ़ेद गाड़ी अस्पताल के पीछे वाले फाटक पर खड़ी है।”
मैंने घंटी नीचे रख दी।
“पीछे वाले फाटक पर?”
“हाँ। और उसकी खिड़की खुली है।”
मैंने दादी की तरफ़ देखा। वो अपनी लाठी पर झुकी बैठी थीं और उनके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे, जैसे कुछ गिन रही हों।
“दादी?”
“अंकुश,” उन्होंने कहा, बिना सिर उठाए, “जिस दिन घंटी दो आवाज़ों में बोले, उस दिन समझ लेना कि सच बोलने का वक़्त आ गया। ये दो आवाज़ें सिर्फ़ धातु की नहीं हैं। ये दो खानदानों की हैं। एक तेरे परदादा की, एक इलाही बक्श की।”
“तो इसे कैसे जोड़ूँ?”
“तू नहीं जोड़ेगा,” दादी ने कहा। “ये खुद जुड़ेगा। तेरा काम सिर्फ़ वो करना है जो आज तक किसी ने नहीं किया।”
“क्या?”
“सच को उस कमरे में ले जाना जहाँ आज तक सिर्फ़ झूठ बैठा है।”
उसी वक़्त बाहर गली से दौड़ते पैरों की आवाज़ आई, और दरवाज़े पर काजल खड़ी थी, साँस फूली हुई, हाथ में दवा की प्लास्टिक थैली।
“भैया,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी।
मैं उठ खड़ा हुआ।
“क्या हुआ? माँ ठीक है?”
“माँ ठीक है,” काजल ने कहा। “पर अस्पताल की सीढ़ी पर वो आदमी खड़ा है।”
कमरे में हवा रुक गई।
“कौन?”
“सफ़ेद कुर्ता। लकड़ी के जूते।” काजल ने दवा की थैली मेज़ पर रख दी और अपना हाथ मेरी बाँह पर रखा। “और भैया, उसके हाथ में चाबी है।”
“कैसी चाबी?”
“बड़ी। लोहे की। रस्सी बँधी है उसके छल्ले में।”
मैंने दादी की तरफ़ देखा।
दादी उठ खड़ी थीं। उनकी लाठी फ़र्श पर टकराई — टक।
“वो चाबी,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कंपन था जो मैंने आज तक उनमें नहीं सुना था, “वो ताले की है जो मैंने अपनी आँखों के सामने बंद किया था।”
“दादी, कौन सा ताला?”
“वही ताला,” उन्होंने कहा, “जिसके पीछे तेरा घर है।”
शांति देवी ने अपना हाथ मुँह पर रख लिया।
“ये वक़्त नहीं है,” उन्होंने धीरे से कहा।
“इससे बेहतर वक़्त नहीं आएगा,” दादी ने कहा। “पचास साल से यही वक़्त ढूँढ रहे थे।”
और तभी मेज़ पर पड़ी घंटी ने खुद को उठाया।
नहीं, उठाया नहीं। वो हिली, दो बार लुढ़की, और मेज़ के किनारे पर आकर रुक गई। और उससे दो आवाज़ें एक साथ निकलीं — पहली गरम, जानी-पहचानी, मेरी अपनी; और दूसरी ठंडी, सीधी, चीरती हुई।
गरम आवाज़ ने कहा, “अंकुश, अब वक़्त है।”
ठंडी आवाज़ ने कहा, “मुझे जोड़ना है तो पहले उस आदमी को लाओ जिसने मेरे मालिक को झूठ सिखाया।”
मैंने घंटी को हाथ में लिया। वो अब ठंडी नहीं थी। वो गुनगुनी थी, दोनों तरफ़ से।
“कहाँ है वो आदमी?” मैंने पूछा।
“तू जानता है,” ठंडी आवाज़ ने कहा।
“मुझे नहीं पता।”
“तो सुन,” उसने कहा। “वो इस वक़्त तुम्हारे अस्पताल की सीढ़ी पर खड़ा है। लकड़ी के जूतों में। हाथ में वो चाबी लिए जो तुम्हारे घर में लगी उस दरवाज़े की है, जो तुमने आज तक नहीं खोला।”
मैंने घंटी मुट्ठी में कस ली।
“और वो क्या चाहता है?”
“वो चाहता है,” ठंडी आवाज़ ने कहा, “कि तू उस सीढ़ी पर पहुँचे। क्योंकि जिस दरवाज़े की चाबी उसके हाथ में है, उसे खोलने के लिए उसके पास सिर्फ़ एक चीज़ नहीं है।”
“क्या नहीं है?”
“तेरा नाम।”
काजल ने मेरा हाथ पकड़ा।
“भैया, मत जाओ,” उसने कहा। “सभा नौ बजे है। अगर तुम अभी गए और —”
“काजल,” मैंने कहा।
“नहीं, सुनो। माँ ने कहा था कि —”
“काजल,” मैंने फिर कहा, और इस बार मेरी आवाज़ वैसी थी जैसी मैं खुद नहीं सुनना चाहता था। “अगर वो आदमी उस दरवाज़े को खोल देता है और मैं वहाँ नहीं पहुँचा, तो जो घर में बंद है वो बाहर आ जाएगा — पर मेरे बिना।”
काजल की आँखें भर आईं।
“और अगर तुम गए,” उसने कहा, “तो मेरे बिना जाओगे।”
मैंने उसका सिर पकड़ा।
“नहीं,” मैंने कहा। “आज सब साथ चलेंगे। पूरी गली। तेरी माँ, तेरा कैमरा, तेरी चिमटी, तेरे मोज़े की चाबी।”
दादी हँसी — छोटी सी, खुरदुरी हँसी।
“अब बात करता है,” उन्होंने कहा।
मीरा ने कैमरा उठाया।
“मैं बाहर जाकर लोगों को बोलती हूँ,” उसने कहा। “नौ बजे की सभा पीपल पर नहीं होगी।”
“तो कहाँ?”
“अस्पताल की सीढ़ी के नीचे,” मीरा ने कहा। “जहाँ वो आदमी खड़ा है। जहाँ सारे काग़ज़ हैं। जहाँ सारी दीवारें उसकी तरफ़ देख रही हैं।”
वो निकल गई।
मैंने घंटी जेब में रखी। और मैंने परदादा की तस्वीर को मेज़ से उठाकर सीने से लगाया।
“परदादा,” मैंने धीरे से कहा, “मुझे नहीं पता तुम कैसे आदमी थे। पर जो घंटी तुमने बनाई, वो आज दो आवाज़ों में बोली है। और दोनों ने एक ही बात कही — सच पहले, जोड़ बाद में।”
मैंने तस्वीर वापस रखी।
और जैसे ही मैं दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा, मेरे कान में वो ठंडी आवाज़ फिर आई, बहुत धीमी, सिर्फ़ मेरे लिए।
“अंकुश।”
“हाँ?”
“जब वो आदमी सामने आए, तो उससे पहले मुझे बोलने दे।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैंने पचास साल उसकी बातें सुनी हैं,” उसने कहा। “अब मेरी बारी है।”
मैं गली में निकला।
पीपल के नीचे लोग जमा थे, और उनके चेहरे उस तरफ़ देख रहे थे जिधर अस्पताल था। गली के मुँह पर शबनम आपा की गुमटी का चूल्हा जल रहा था, और टिंकू दौड़ता हुआ आया।
“उस्ताद!” उसने कहा। “सीढ़ी पर वो आदमी खड़ा है। बोल रहा है कि जिसको चाबी चाहिए, वो आ जाए!”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी गुनगुनी थी।
“चलो,” मैंने कहा। “आज किसी को चाबी नहीं चाहिए। आज सबको सिर्फ़ सच चाहिए।”
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