The Mysterious Bell – Chapter 797
“बाद में,” उन्होंने कहा। बहुत साफ़। बहुत ठंडा। “पहले अपनी बात कर। ये चाबी आज नहीं। ये कल के लिए है।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी आँखों में देखा और एक बार भी नहीं झुकीं।
ठीक है, दादी। तेरी बात।
मैं रणवीर के पास नहीं गया।
मैं भीड़ में आगे आया, और भीड़ अपने आप मेरे लिए हटती चली गई — शबनम आपा, भोला भाई, रेडियो वाले बूढ़े, नसीमा बाई, दुबे अंकल। सब खड़े थे। सब देख रहे थे।
और मैं रुका — उस जगह पर जहाँ से रणवीर मुझे देख रहा था, और मैं उसे।
“अंकुश,” रणवीर ने कहा। आवाज़ में वही पुरानी मिठास। “बेटा, ये सब क्या हो रहा है? तेरी दादी ने… माफ़ करना, तेरी बुआ जी ने कुछ कह दिया, तेरे पापा कुछ और कह गए। बात बढ़ती जा रही है। तू समझदार है। इसे यहीं रोक दे।”
“रोक दूँ?” मैंने कहा।
“हाँ।” उसने हाथ जोड़े — हाथ जोड़े! वही हाथ जो हर तस्वीर में जुड़े हुए हैं। “मैं तुझे कुछ नहीं कहता। तेरी दुकान का काग़ज़ मैं खुद देख रहा हूँ। मैं कुछ नहीं करूँगा। बस…”
“साहब,” मैंने कहा। “आप आज हमसे नहीं, अपने गले से बात कीजिए।”
उसका हाथ अपने आप गले पर गया।
और तभी — मेरी जेब से आवाज़ आई।
टन्।
एक हल्की। बहुत हल्की। पर गली में इतनी खामोशी थी कि वो हल्की आवाज़ भी सबके कानों तक पहुँच गई। मैंने देखा — पाँच-छह लोगों ने एक साथ मेरी तरफ़ देखा।
घंटी ने कहा — और इस बार उसकी आवाज़ में वो सफ़ाई थी जो पहले नहीं थी। जैसे किसी ने काँच पोंछ दिया हो।
“आधा बोलेगा।”
मैंने रणवीर की तरफ़ देखा। उसका चेहरा बदला।
“अंकुश,” उसने फिर कहा, और इस बार आवाज़ में मिठास कम थी, “ये चीज़ें मेरे हाथ में मत ले। मैं तुझे आख़िरी बार कह रहा हूँ।”
“मैं कुछ नहीं ले रहा,” मैंने कहा। “मैं तो आपसे कुछ छीन भी नहीं रहा। मैं तो आपको देना चाहता हूँ।”
वो रुका।
“देना?”
“हाँ।” मैंने कहा। “आपको सच। जो आपने पचास साल से नहीं सुना।”
चंद्रेश आगे आया — सफ़ेद कुर्ता, मीठी आवाज़, हाथ में फ़ाइल।
“बेटा,” वो बोला, “ये सब भावुकता ठीक है, पर काग़ज़ पर…”
“चंद्रेश जी,” मैंने कहा। “आप काग़ज़ के आदमी हैं। आपको आज गली में कोई काग़ज़ नहीं मिलेगा। आज यहाँ सिर्फ़ लोग हैं।”
वो हँसा। सच में हँसा। बहुत प्यार से।
“तो लोग क्या करेंगे?”
“जोड़ेंगे,” मैंने कहा।
और मैं मुड़ा।
मैंने रणवीर को छोड़ दिया — बिल्कुल छोड़ दिया। उस रात मुझे उससे कोई लेना-देना नहीं था। उस रात की सबसे बड़ी लड़ाई रणवीर से नहीं थी। मुझे यह बात घंटी ने नहीं बताई थी। मेरे पापा के चेहरे ने बताई थी — जो भीड़ के आख़िरी कोने में खड़े थे, टेप से बँधा चश्मा, हाथ में पुरानी रिंच को ऐसे पकड़े हुए, जैसे कोई बच्चा अपनी फटी किताब पकड़ता है।
“पापा,” मैंने कहा।
उन्होंने देखा। मेरी तरफ़।
“पापा, आइए।”
“बेटा…”
“आइए।” और मैंने अपनी आवाज़ में सिर्फ़ एक बात रखी। सख़्ती नहीं। मदद। “आज सबसे पहले हमें अपना टूटा हिस्सा जोड़ना है।”
वो हिले। नहीं, हिले नहीं — काँपे। हाथ में रिंच काँपी।
और फिर मेरे पापा, जो बोलते बहुत कम हैं, जो सुबह से रात तक चुप रह सकते हैं, जिन्होंने बाईस साल में शायद किसी से अपनी बात नहीं कही — वो भीड़ को चीरकर आगे आए।
धीरे-धीरे।
मैंने देखा — भीड़ उनके लिए हटी। जैसे हटने में उसे कोई तकलीफ़ हो, फिर भी हटी। मैंने देखा — शबनम आपा ने अपना थाली वाला हाथ नीचे कर दिया। मैंने देखा — दुबे अंकल ने अपनी पीली कुर्सी छोड़ दी और खड़े हो गए।
और पापा आगे आए। मेरे पास नहीं। मेरे पास आकर वो रुके नहीं। वो मेरे पास से गुज़र गए — और शांति देवी के सामने खड़े हो गए।
और फिर याकूब के सामने।
और फिर उन्होंने याकूब का हाथ पकड़ लिया — बूढ़े आदमी का हाथ, जिसकी हथेली पर वो पतली लाल लकीर थी, जिसका मतलब आज तक नहीं खुला था।
और पापा ने कहा — इतनी धीमी आवाज़ में कि भीड़ आगे बढ़ आई, सिर्फ़ सुनने के लिए:
“मैंने अंगूठा लगाया था।”
खामोशी।
“डर के मारे।”
कोई नहीं बोला।
“उस दिन मेरी बीवी की जाँच रुकी थी। काजल की फ़ीस का काग़ज़ अटका था। दुकान का…” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर फ़ौरन नज़रें हटा लीं। “दुकान का काग़ज़… जो मेरे बाप का था। और मैं उसे बचा नहीं पाया था।”
उनका गला भरा, पर उन्होंने रुकने नहीं दिया। मेरे पापा ने रोने के लिए रुकना नहीं चुना। वो उस आदमी था जिसने रोना घर के अंदर ही रखा था — और यह पहली बार था कि वो घर के बाहर, सबके सामने, अपना एक टुकड़ा रख रहा था।
“उस आदमी ने कहा — एक अंगूठा, सब ठीक। मैंने काग़ज़ पढ़ा भी नहीं। मैंने सिर्फ़ कलम उठाई और अंगूठा दबा दिया।” उन्होंने याकूब की तरफ़ देखा। “और मैंने सोचा कि मैंने कुछ बचा लिया।”
जमीन पर देखा।
“मैंने कुछ नहीं बचाया। मैंने सब खो दिया।”
भीड़ में एक आवाज़ आई — कोई रो रहा था। मुझे नहीं पता कौन था। आँखों के छोर पर बस एक साड़ी का पल्लू उठता दिखा।
“और उस डर ने,” पापा ने कहा, “पूरे घर को चुप रहना सिखा दिया। मेरी बीवी ने जाना और चुप रही। मेरी बेटी ने देखा और चुप रही। मैं खुद चुप रहा। और मेरा बेटा…”
वो रुके।
मेरी तरफ़ नहीं देखा। शायद इसलिए कि देखते तो रो पड़ते।
“मेरा बेटा,” उन्होंने कहा, “इस चुप्पी में पा…
इसी चुप्पी में पला और मुझे लगा कि वो सब ठीक कर देगा। मैंने कभी नहीं सोचा कि मुझे भी कुछ ठीक करना है।”
इतना कहकर वो चुप हो गए।
और फिर हुआ वो, जो मैं नहीं भूलूँगा।
याकूब बूढ़ा था। चलने में उसे लाठी चाहिए थी। पर वो अपनी लाठी वहीं ज़मीन पर रखकर, एक कदम आगे आया और उसने अपना दूसरा हाथ भी पापा के हाथ पर रख दिया।
“बेटा,” याकूब ने कहा, और उसकी आवाज़ आधी टूटी थी, आधी धौंकनी जैसी, “तू माफ़ी मत माँग।”
पापा ने उसकी तरफ़ देखा। हैरानी से।
“माफ़ी माँगने से पहले यह सुन,” याकूब ने कहा। “मैंने पचास साल अपने भाई पर गुस्सा पाला।”
उसने उस्ताद की तरफ़ देखा। उस्ताद दुकान की सीमा पर खड़े थे, धूप में, अपने मोटे चश्मे के पीछे से।
“पचास साल,” याकूब ने कहा। “और उसमें से एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब मैंने यह नहीं सोचा कि उसने मुझे ठगा। पर सच ये है — मैंने एक बार भी उससे पूछा नहीं।”
वो हँसा।
“एक बार भी नहीं पूछा। बस हिसाब लिए बैठा रहा। हिस्सा माँगता रहा। काग़ज़ माँगता रहा। जबकि मुझे उससे सिर्फ़ एक बात कहनी थी — भाई, माँ के जाने के दिन तू कहाँ था? बस। इतना कह देता तो पचास साल नहीं जाते।”
उस्ताद ने अपना चश्मा उतारा।
मैंने उन्हें पहले कभी चश्मा उतारते नहीं देखा। उनकी आँखें उस दिन कैसी थीं, ये मैं तुम्हें बता नहीं सकता। फटी हुई तरह की नहीं थीं। बस — खुली थीं। जैसे पचास साल से किसी कोने में रखी चीज़ अचानक रोशनी में आ गई हो।
“तू क्यों नहीं आया?” याकूब ने कहा। आवाज़ में गुस्सा नहीं था। सिर्फ़ सवाल।
“मैं आया था,” उस्ताद ने कहा। “तेरे घर। मैंने दरवाज़ा खटखटाया।”
“कब?”
“अगले महीने।”
याकूब रुका।
“मैंने खटखटाया,” उस्ताद ने कहा। “तेरी बीवी ने दरवाज़ा खोला और कहा तू शहर गया है। मैं लौट गया। फिर कभी नहीं आया। मैंने सोचा, अब नहीं आऊँगा।” उन्होंने धीमे से कहा, “मैं गया शहर में तुझे ढूँढने, याकूब। दो दिन। तू उस बारात में था जो जवाब था।”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno