The Mysterious Bell – Chapter 785
तभी शबनम आपा ने अपनी गुमटी से आवाज़ दी।
"अंधेरे में कुछ ढूँढना है तो मेरी गुमटी आ जाओ," उन्होंने कहा। "मेरे पास दो बत्तियाँ हैं, चाय का स्टोव है, और रात भर बैठने का सब्र भी। जो चीज़ तुम लोग पीपल पर नहीं ढूँढ पाए, वो मेरी गुमटी पर कभी-कभी मिल जाती है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने कंधे उचकाए।
"ठीक है," मैंने कहा। "चलो।"
पंद्रह मिनट बाद हम शबनम आपा की गुमटी के पीछे वाले कमरे में बैठे थे। टिंकू साथ आ गया था — और भला मैं उसे कैसे रोकता? उसकी माँ से वादा था कि छह बजे घर लौटेगा, पर अब सात बज चुके थे। मैंने उसके फ़ोन से लक्ष्मी देवी को खबर भेज दी थी कि टिंकू मेरे साथ है, सुरक्षित है, और एक काम में लगा है जो उसके पापा के ज़माने से जुड़ा है। छोटा हाथ था, पर मुझे पता था — ये बहाना घर में काम करेगा।
शबनम आपा ने गुमटी की लोहे की थाली पीतल के छोटे से स्टोव पर रखी, उसमें पानी डाला, फिर उसमें चाय पत्ती और अदरक की महक फैलने लगी। पीछे वाले कमरे में गरम चाय की भाप और ठंडी हवा का जोड़ा ऐसा बना कि मुझे अपना घर याद आ गया — वो घर जो अब शायद मेरा रहा ही न हो।
मीरा ने अपना फटा बैग ज़मीन पर धड़ाम से रखा और उसमें से भूरे कपड़े का मोटा बंडल निकाला।
"ये सब मेरे पहले तीन साल की कमाई का हिसाब है," उसने कहा। "जब रणवीर भारद्वाज मेरे चैनल को जानता भी नहीं था। जब वो ख़ुद अपने काँच के भवन में बैठकर सोचता था कि पत्रकार क्या होती है — कोई कमज़ोर चीज़, जो थोड़े पैसों में खरीदी जा सकती है।"
मीरा ने बंडल खोला।
मुझे क्या देखना चाहिए था, मैं नहीं जानता था। पर जो मेरी आँखों के सामने फैला, वो सिर्फ़ तस्वीरें नहीं थीं। वो मेरे मोहल्ले के बदलने का पूरा इतिहास था, फोटो के काग़ज़ पर दबा हुआ।
पहली तस्वीर — किसी मंदिर के सामने रणवीर भारद्वाज खड़ा था, गले में फूलों का हार, हाथ जोड़े, और उसके पीछे बड़ा सा बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था कि वो कितना समाजसेवी है।
दूसरी तस्वीर — बड़े तालाब के किनारे, कुछ बुज़ुर्गों को कंबल बाँटते हुए। वही मुस्कान, वही जुड़े हुए हाथ। मुझे तब समझ नहीं आया कि उस मुस्कान में क्या है, पर अब — शायद थोड़ा समझ आ रहा था।
तीसरी तस्वीर — एक स्कूल के उद्घाटन की। रणवीर भारद्वाज कैंची लेकर रिबन काट रहा है। उसके पीछे बच्चों की कतार। और उस कतार में… रुको।
"ये कौन सा स्कूल है?" मैंने पूछा।
मीरा ने तस्वीर के नीचे लिखी तारीख़ पर उँगली रखी।
"पुराने बाज़ार के पास," उसने कहा। "जो अब बंद हो गया है। बच्चे बढ़ गए, मोहल्ला बदल गया, इमारत बिक गई। पर अंकुश… कैंची काटने वाला हाथ देख।"
मैंने देखा। रणवीर के दाहिने हाथ में कैंची थी, बायाँ हाथ नीचे था, और बाएँ हाथ की उँगलियों में कुछ लटक रहा था। बालों के नीचे, कॉलर के पास, एक छोटी सी चीज़। गोल। चमकती हुई।
"ये क्या है?" मैंने पूछा। "ताबीज़?"
मीरा ने तस्वीर करीब लाई, फिर मुझे दी।
"लग तो ताबीज़ ही रहा है," उसने कहा। "देख, गोल है, पीतल जैसा रंग है… पर अंकुश, इसकी शक्ल देखकर मुझे कुछ और याद आ रहा है।"
उसने धीरे से अपनी जेब से कुछ निकाला। कुछ ऐसा जो मेरे पास दुकान में था, पर आज जान-बूझकर बाहर नहीं लाया था — गोली। एक छोटा गोल पीतल का टुकड़ा, जिसे रणवीर ने उस दिन धागों के साथ लौटाया था। मैंने उसे जेब में रखा था, पूरी गली नहीं जानती थी।
"इसे तस्वीर के साथ रख," मीरा ने कहा।
मैंने रख दिया।
और फिर वो हुआ जो मुझे आज तक समझ नहीं आया।
मीरा ने अपना फोन निकाला, उसमें तस्वीर का हिस्सा ज़ूम किया, और उसे गोली के बराबर किया।
"अंकुश," उसने धीमे से कहा, "ये गोली, और तस्वीर में वो लटकती चीज़… एक जैसी हैं।"
मैंने करीब से देखा।
देखा। और मेरे हाथ की घंटी ठंडी हो गई।
क्योंकि वो चीज़ किसी ताबीज़ जैसी नहीं थी। वो चीज़ पीतल की बनी थी, गोल थी, और उसके किनारे पर कुछ खुदा हुआ था — मैं इतना दूर से नहीं बता सकता था, पर उसका आकार, उसका गोल, उसकी चमक… मेरी घंटी के गले के उस हिस्से जैसी थी जो चाबी के छल्ले पर नहीं, घंटी के भीतर होता है।
टिंकू ने सबसे पहले कहा।
वो उठकर खड़ा हो गया। उसकी आँखें फैल गईं।
"ये तो… ये तो घंटी का हिस्सा है, उस्ताद," उसने कहा। "जैसे किसी ने घंटी का पूरा हिस्सा चुरा लिया हो, और उसे छोटा करके ताबीज़ बना लिया हो।"
मेरे मुँह से कुछ फूटा नहीं। मैं बस देखता रहा।
शबनम आपा ने चाय की कटोरी मेरी तरफ़ सरकाई और पीछे हटकर खड़ी हो गईं। उनकी आँखें भी उसी तस्वीर पर थीं।
"सेठ की तस्वीर में भी अगर सच दिख जाए," उन्होंने धीमे से कहा, "तो आज कैमरा धन्य हो जाएगा। क्योंकि अब तक तो ये आँखें सिर्फ़ उसकी मुस्कान देखती थीं।"
मैंने धीरे से अपनी जेब से घंटी निकाली।
वो मेरी हथेली पर रखी थी। पर मेरी हथेली को जो ठंड लगी, उसे मैं शब्दों में नहीं कह सकता। मुझे लगा जैसे मैंने जेब में नहीं, किसी पुराने कुएँ के पानी में हाथ डाला हो।
"घंटी," मैंने धीमे से कहा।
कुछ नहीं। पहले तो वो काँपती थी, बजती थी, चमकती थी। पर अब… चुप्पी। ऐसी चुप्पी जैसे कोई बच्चा नाराज़ बैठा हो।
"घंटी," मैंने फिर कहा।
कुछ नहीं।
"उस्ताद," टिंकू ने धीमे से कहा, "ये नाराज़ है।"
मैं हँसा, पर हँसी में दर्द था। "किस बात पर नाराज़ है?"
"उससे दूर होने पर," टिंकू ने कहा। "जैसे…"
वो रुक गया। मुझे लगा वो कुछ और कहता, पर फिर चुप हो गया। उसकी उम्र में भी कुछ बातें सिर्फ़ समझ आती हैं, बोली नहीं जातीं।
मीरा ने तस्वीर को उठाया। वो करीब से देखने लगी। और फिर उसने धीरे से कहा।
"अंकुश, तू इस तस्वीर का साल देख।"
मैंने देखा। तस्वीर के नीचे किसी पुराने अख़बार की कतरन से तारीख़ कटी हुई थी — अस्पष्ट नीली स्याही में। साल पढ़ा जा सकता था।
"ये साल…" मैंने धीमे से कहा।
"हाँ," मीरा ने कहा। "यही साल है जब रणवीर भारद्वाज ने अपनी पहली बड़ी ज़मीन खरीदी थी। पहली बड़ी ज़मीन, अंकुश। पहली बार उसने अपना नाम किसी बड़े रजिस्टर के ऊपर लिखवाया।"
मेरी घंटी फिर ठंडी हुई।
मुझे कुछ और कहना था, पर उस वक़्त शबनम आपा के कमरे का पर्दा हिला। मैंने पलटकर देखा। कौशल्या दादी खड़ी थीं। वो इतनी धीमे से आईं थीं कि हमें पता भी नहीं चला। उनके पीछे शांति देवी थीं, एक हाथ में छड़ी और दूसरे हाथ में उनकी लाठी।
"अंदर आ जाओ, दादी," मैंने कहा। "बैठो।"
कौशल्या दादी ने नहीं सुना। वो सीधे हमारी मेज़ पर आईं, और मीरा की तस्वीरों के ऊपर झुक गईं। उन्होंने तस्वीरें उलट-पलट कर देखीं − बुज़ुर्गों को कंबल बाँटते रणवीर, बच्चों के साथ खड़े रणवीर, एक पुराने मंदिर के सामने हाथ जोड़े रणवीर।
फिर उनकी उँगली उस तस्वीर पर रुक गई जिसमें रणवीर गले में ताबीज़ लटकाए खड़ा था।
उनके हाथ धीरे से काँपने लगे।
"ये…" उन्होंने धीमे से कहा। "ये मैंने पहले कहीं देखा है।"
मैंने कहा, "कहाँ, दादी?"
कौशल्या दादी ने गहरी साँस ली।
"पचास साल पहले," उन्होंने कहा। "उस रात। आग की रात। शिवनारायण की दुकान जल रही थी, और इलाही बक्श मेरे सामने खड़ा था। उसके गले में कुछ लटक रहा था। मैंने सोचा पैसों की थैली है, या कोई पुरानी चीज़। पर अब…"
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