The Mysterious Bell – Chapter 771
बाहर, गली में, मशीन का शोर फिर शुरू हुआ — इस बार और पास, और इस बार और ऊँचा, जैसे कोई घड़ी की सुई जान-बूझकर आगे बढ़ा रहा हो।
॥
माँ की आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुराने कुएँ से बाल्टी ऊपर आ रही हो — धीरे, भारी, और रस्सी के साथ कुछ और भी खिंचता हुआ आ रहा हो।
"माँ," मैंने कहा, "धीरे-धीरे। बैठ जाओ।"
"मैं बैठूँगी नहीं," उन्होंने कहा, पर उनका हाथ मेज़ के किनारे से नहीं छूटा। "बाईस साल मैं बैठी रही, अंकुश। बाईस साल। हर रात सोचती रही कि किसी को पता न चले। अब नहीं बैठूँगी।"
काजल ने पीछे से एक स्टूल खींचकर उनके पैरों के पास रख दिया। माँ ने उसे देखा, कुछ कहना चाहा, फिर चुपचाप बैठ गईं। थकान पैरों से ऊपर चढ़ रही थी, मैं देख सकता था। वो थकान जो इंसान के चेहरे पर सफ़ेदी बनकर आती है।
उस्ताद ने अपना चश्मा फिर नहीं पहना। वो उसे मेज़ पर ही छोड़े हुए थे और बिना चश्मे के बैठे थे। बिना चश्मे के उनका चेहरा अलग लग रहा था — ज़्यादा थका हुआ, ज़्यादा सच्चा, कम उस्ताद, ज़्यादा इंसान।
"सुशीला जी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में एक ऐसा आदर था जो मैंने उनमें पहले कभी नहीं सुना, "आप कह रही हैं कि ये नाम आपके ससुराल के पुराने ताले पर खुदा है?"
माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस मेरी तरफ़ देखा और अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया।
"माँ," मैंने कहा, "उस्ताद पूछ रहे हैं।"
"मैं सुन रही हूँ," उन्होंने कहा। फिर उन्होंने अपना मुँह उठाया और उस्ताद की तरफ़ देखा। "हाँ उस्ताद साहब, खुदा है। मेरे ससुराल के उस पुराने लकड़ी के संदूक पर जो आज भी मेरे घर के पीछे वाले कमरे में रखा है। जिसका बाहरी ताला आज गले की चाबी से खुला।"
कमरे में सन्नाटा उतर आया।
याकूब चाचा ने अपनी लाठी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, पर हाथ हवा में ही रुक गया। वो मेरी तरफ़ देखने लगे, फिर उस्ताद की तरफ़, फिर माँ की तरफ़।
"ये…" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में हवा नहीं थी, "ये सच है? आप कह रही हैं कि मेरे सीने पर पचास साल से जो पोटली बँधी है, उसका निशान आपके संदूक के ताले पर भी है?"
माँ ने गर्दन हिलाई। बहुत छोटी हरकत। पर वो हरकत कमरे में गूँज गई।
याकूब चाचा का हाथ काँपने लगा। उन्होंने अपनी सीने की पोटली नहीं खोली, बस उस पर हाथ रख दिया, जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की उँगली पकड़ता है।
"पचास साल," उन्होंने कहा। "पचास साल मैं उसे अपने सीने पर लेकर सोया हूँ। कभी सोचा नहीं कि वो किसी और के घर में भी लिखा हुआ मिलेगा।"
मीरा ने अपना कैमरा मेज़ पर रख दिया। उसका हाथ धीरे से काँप रहा था और मैंने देखा कि उसने जान-बूझकर कैमरा नीचे रखा — इस बात को कैमरे में नहीं लेना था। ये बात किसी को दिखाने की नहीं थी। ये बात पहले घर की थी, फिर खबर की।
"ताला लाओ," मैंने कहा।
माँ ने अपनी साड़ी के कोने से वो छोटा लोहे का ताला निकाला, जो अभी तक मेज़ पर पड़ा था। ज़ंग लगा, छोटा, मोटा — वो ताला जिसके भीतर से अभी-अभी खुरचने की आवाज़ आई थी, फिर बंद हो गई थी।
मैंने ताला मेज़ के बीच में रखा।
फिर घंटी रखी — वो पीतल की घंटी, जिसके भीतर अभी शिवनारायण यादव का नाम उभरा था।
फिर याकूब चाचा की तरफ़ देखा।
"चाचा," मैंने कहा, "वो टुकड़ा।"
याकूब चाचा ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा, जैसे दिमाग़ में कोई तराज़ू चल रहा हो — कुछ भीतर रखूँ या बाहर निकालूँ। फिर उन्होंने अपनी कमीज़ के नीचे से पोटली का मुँह खोला, और उसमें से वो नाखून से बड़ा पीतल का टुकड़ा निकालकर मेज़ पर रख दिया।
टुकड़ा जैसे ही मेज़ पर पड़ा, कमरे में एक अजीब सी बेचैनी फैल गई। जैसे हवा ने एक कदम पीछे हटकर देखा हो कि अब क्या होगा।
"तीनों एक सीध में रखो," उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "अंकुश, ध्यान से। मेज़ पर तीन चीज़ें नहीं रख रहे हो तुम। तीन हिस्से रख रहे हो।"
मैंने ताला आगे खिसकाया। घंटी का मुँह नीचे किया, जैसे कोई गिलास उलटकर रखता है। फिर पीतल का टुकड़ा उनके बीच रखा।
तीनों की दूरी एक-एक इंच थी।
कुछ नहीं हुआ।
"और करीब," उस्ताद ने कहा।
मैंने ताला और करीब खिसकाया।
घंटी और करीब।
टुकड़ा बीच में।
और फिर — बहुत पहले, बिना किसी आवाज़ के — कुछ हुआ।
टुकड़े पर जो दो लकीरें और बीच में बिंदु वाला निशान था, वो मेरी आँखों के सामने ताले के ज़ंग लगे कुंडे पर उभरा। जैसे सूखी मिट्टी पर पानी की बूँद गिरे और वो जगह देर तक गीली दिखती रहे। ताले का पुराना ज़ंग उस निशान के चारों तरफ़ हट गया, जैसे किसी ने उसे पोंछ दिया हो।
और घंटी — घंटी ठंडी पड़ गई।
मैंने उसे हाथ में लिया। एक मिनट पहले वो तवे की तरह गरम थी, उससे उँगली जल रही थी। अब वो ठंडी थी। इतनी ठंडी जैसे सुबह की लोहे की चौखट को छुआ जाए।
"घंटी ठंडी हो गई," मैंने कहा।
"मतलब?" काजल ने पूछा।
"मतलब ये कि उसने अपनी बात कह दी," उस्ताद ने कहा। "ये घंटी जब तक कुछ कह रही होती है, गरम रहती है। जब बात पूरी हो जाती है, ठंडी हो जाती है। सुशीला जी — अब आप।"
माँ ने ताले को छुआ। उनकी उँगली नाखून के पीछे के हिस्से से उस कुंडे पर रगड़ी, जहाँ ज़ंग हट गया था, और फिर उन्होंने उँगली अपनी आँखों के सामने की। उँगली पर ज़ंग की लाल-भूरी धूल थी, पर उसके नीचे एक पतला सुनहरा निशान बचा था।
"ये वही निशान है," उन्होंने कहा।
"कौन सा निशान, माँ?" मैंने पूछा।
"जो घंटी के छल्ले पर है," उन्होंने कहा, और अपनी आवाज़ को सँभाला, "जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े के कुंडे पर है, और जो इस ताले पर है। अंकुश, ये कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है। ये एक ही हाथ का निशान है, जो तीन जगह लगा है।"
पापा की आवाज़ पीछे से आई।
"तीन जगह नहीं।"
हम सब पलटे।
पापा दरवाज़े के सहारे खड़े थे। कमज़ोर, झुके, एक हाथ से चौखट पकड़े हुए। उनकी आँखें थकी हुई थीं, पर वो थकान जो सोने से आती है, नहीं — वो थकान जो बहुत देर तक कुछ सहने से आती है।
"पापा," काजल ने कहा और दौड़कर उन्हें थामने पहुँची। "आपको उठना नहीं था। डॉक्टर ने कहा था—"
"डॉक्टर ने कहा था कि मेरी जाँच होनी है," पापा ने कहा। "मेरी जाँच सौ बार हो चुकी है, काजल। वो जाँच नहीं है, वो डर है जिसे काग़ज़ पर लिख रहे हैं।"
वो धीरे-धीरे मेज़ तक आए। काजल उनका हाथ पकड़े थी, माँ स्टूल से उठकर खड़ी हो गईं। पापा ने मेज़ पर रखी तीनों चीज़ें देखीं — ताला, घंटी, पीतल का टुकड़ा। उन्होंने देखा। एक लंबी नज़र से देखा।
फिर वो अपने घुटनों के बल बैठ गए।
"पापा!" मैंने कहा।
"रहने दे," उन्होंने कहा। "मुझे बैठने दो। जो आदमी अपने बाप के नाम के सामने खड़े होकर नहीं बोल सकता, वो बैठकर बोले तो बेहतर है।"
कमरा चुप हो गया।
पापा ने ताले को हाथ में लिया। उनके हाथ में ताला और छोटा लगने लगा, जैसे बच्चे के हाथ में बाप की घड़ी। उन्होंने उसे उलटा किया, पलटा, और फिर अपनी बाएँ हाथ की तर्जनी उस निशान पर रखी और वहीं रोक दी।
"शिवनारायण यादव," उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा। "मेरे दादा। मेरे बाप के बाप।"
"आपके दादा?" काजल ने कहा। "मतलब हमारे परदादा?"
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