The Mysterious Bell – Chapter 72
मैंने टिंकू को आवाज़ दी। "टिंकू, वो दोनों — इब्राहीम चाचा और बृजमोहन बाबा — क्या बात है?"
टिंकू ने रिंच रखी और दरवाज़े पर आ गया। "पता नहीं, उस्ताद। मैंने पूछा था सानिया से। सानिया ने कहा कि बचपन से ऐसे ही हैं। न बोलते हैं, न झगड़ते हैं। बस अलग बैठते हैं।"
"कितने साल से?"
टिंकू ने कंधे उठाए। "सानिया कहती है, जब से उसे होश आया, तब से।"
मैं दुकान से बाहर निकला। शबनम आपा की गुमटी पर गया।
"आपा," मैंने कहा, "एक चाय, और एक सवाल।"
उन्होंने चिमटी से समोसा उठाया और पतीले में डाला। "चाय पहले, सवाल बाद में।"
मैं स्टूल पर बैठ गया। गुमटी के पास सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू इकट्ठे हो गए थे — चारों के हाथ में चाय के पैसे थे, चार आने-चार आने के।
"अंकुश भैया," सानिया ने कहा, "आज हम तेरी मदद करेंगे।"
मैंने भौंहें उठाईं। "मेरी मदद? कैसे?"
"अब तक तू हमें चाय पिलाता था। आज हम तुझे पिलाएँगे।"
मैं हँस पड़ा। "अरे वाह। ये तो कल की सुलह का असर है।"
गुड्डू ने आगे बढ़कर कहा, "भैया, हमें पता है इब्राहीम चाचा और बृजमोहन बाबा के बारे में।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "क्या पता है?"
"सानिया को पता है।"
सानिया ने गुड्डू को कोहनी मारी। "चुप कर।"
रफ़ीक़ बोला, "अरे बता दे। अंकुश भैया को सब पता है। इन्होंने कल दो बुज़ुर्गों को जोड़ दिया।"
मैंने चाय का कप उठाया। "ठीक है, सानिया, बता।"
सानिया ने चारों तरफ़ देखा, जैसे कोई राज़ बता रही हो। "भैया, इब्राहीम चाचा के बेटे का नाम यूसुफ़ है। व"भैया, इब्राहीम चाचा के बेटे का नाम यूसुफ़ है। वो अब दिल्ली में बड़ा आदमी है। मगर वो चाचा से नहीं बोलता।"
सानिया ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गंभीरता थी जो तेरह साल की लड़की में अचानक नहीं आती।
मैंने चाय का गिलास नीचे रखा।
"क्यों नहीं बोलता?"
"यही तो नहीं पता, भैया।" उसने कंधे उठाए। "मगर बृजमोहन बाबा रोज़ शाम को चार बजे से पहले आ जाते हैं। पीपल के नीचे। एक ही जगह — ज़मीन पर रखे उस पुराने पत्थर पर। वहाँ बैठकर वो इब्राहीम चाचा को देखते हैं, जो चबूतरी के दूसरे सिरे पर बैठते हैं।"
रफ़ीक़ ने आगे बढ़कर कहा, "और भैया, वो जेब से कुछ निकालकर देखते हैं। छोटी सी किसी चीज़ को।"
चिंटू ने गर्दन आगे की। "मैंने एक बार देखा। उनके हाथ से गिर गई थी। भूरे रंग की छोटी बोतल। खाली। जब वो उसे उठाने झुके, उनके हाथ काँप रहे थे।"
मेरे अंदर कुछ हिला।
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा।
"आपा, इन दोनों के बीच क्या बात है?"
उन्होंने लोहे की चिमटी पतीले से बाहर निकाली और किनारे रख दी। उनका चेहरा पल भर के लिए सपाट हो गया।
"चालीस साल में मैंने इन दोनों को एक बार साथ नहीं देखा।" उन्होंने कहा। "बस एक बार देखा था, बहुत पहले। तब मैं छोटी थी। मेरी माँ गुज़री थीं। शाम को पीपल के नीचे ये दोनों एक-दूसरे के गले लगकर रो रहे थे।"
"फिर क्या हुआ?"
"फिर कुछ हुआ। क्या हुआ, मुझे नहीं पता। अगली सुबह से ये अलग बैठने लगे।"
वो समोसा उठाने लगीं, फिर रुक गईं।
"अंकुश, ये चारों कल शाम से इन दोनों को देख रहे हैं। तुझे बताया नहीं?"
मैंने चारों की तरफ़ देखा। चारों एक साथ सिर हिला रहे थे, एक ही लय में, जैसे कोई छोटी सेना हो।
सानिया ने आगे बढ़कर कहा, "भैया, आज हमें कुछ करने दे। हम उनके पीछे लगेंगे। तू जा, उनसे बात कर। हम तेरे कान होंगे।"
मैं हँस पड़ा। "मेरे कान?"
"हाँ। तेरे कान। और तेरी आँखें भी।"
गुड्डू ने अपनी छोटी मुट्ठी बंद करके कहा, "आज से हम तेरी टीम हैं, भैया।"
मैंने उन चारों को देखा। रफ़ीक़ के घुटने पर पट्टी बँधी थी, चिंटू की नाक बह रही थी, सानिया के बाल उलझे थे — और इन चारों की आँखों में वो चीज़ थी जो बड़ों की आँखों में अब नहीं बची थी।
"ठीक है," मैंने कहा, और चाय का आख़िरी घूँट मारा। "लेकिन दूर से। किसी को कुछ नहीं बोलना। बस देखना।"
"हाँ भैया!"
चारों भागे। शबनम आपा ने उनके पीछे देखते हुए कहा, "ऐसे भागेंगे तो बृजमोहन बाबा को शक हो जाएगा।"
मगर वो हँस रही थीं।
मैं शाम चार बजकर पचास मिनट पर दुकान से निकला। पीपल के नीचे चबूतरी खाली थी। बृजमोहन बाबा अभी नहीं आए थे। शबनम आपा की गुमटी के पीछे चार छोटी छायाएँ दिखीं और फिर गायब हो गईं।
मैं पीपल की तरफ़ गया और चबूतरी के किनारे बैठ गया।
चार बजकर पचपन पर बृजमोहन बाबा आए।
दुबले, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लाठी, सिर पर सफ़ेद टोपी और छोटी दाढ़ी। उन्होंने पीपल के नीचे ज़मीन पर पड़े उस पत्थर को देखा, फिर चबूतरी पर मुझे देखा।
वो रुक गए।
"अंकुश," उन्होंने कहा। आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो सिर्फ़ पुराने लोगों की आवाज़ में होती है। "चबूतरी तो हमारी है।"
"जानता हूँ, बाबा। मैं आपकी जगह नहीं लूँगा।"
मैं उठ गया। "अरे, और वो पत्थर भी आपका ही है — जिस पर आप चालीस साल से बैठते हैं। मुझे सब पता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भारी थीं।
"किसने बताया?"
"मेरे जासूस," मैंने कहा और हल्का मुस्कुराया।
वो नहीं हँसे। वो पत्थर पर बैठ गए। मैं उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
"बाबा, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"वो जो आप जेब से निकालकर देखते हैं, छोटी सी भूरी बोतल — क्या है?"
उनका चेहरा एकदम नरम हो गया। वो देर तक मेरी तरफ़ देखते रहे, जैसे तय कर रहे हों। फिर उन्होंने जेब में हाथ डाला।
बोतल निकली। छोटी, काँच की, भूरी। ढक्कन खोया हुआ था। ऊपर का काग़ज़ पूरा घिस चुका था, सिर्फ़ एक कोने पर "अ" अब भी दिखता था, बाकी सब मिट गया था।
"ये बोतल चालीस साल पुरानी है।" उन्होंने कहा। "मेरी बीवी की दवा की बोतल। साँस की।"
उन्होंने उसे उलट-पलट कर देखा।
"उस रात वो हमारे घर के बाहर ज़मीन पर गिर गई थी। साँस नहीं आ रही थी। होश नहीं था। मैंने उसे गोद में उठाया और अस्पताल भागा। रास्ते में सोचा — पैसे? मेरे पास एक रुपया भी नहीं था।"
वो रुके। साँस भरते रहे, धीरे।
"उसी दिन सुबह इब्राहीम ने यूसुफ़ की फ़ीस के अस्सी रुपये मेरे हाथ में दिए थे। मैंने कहा था — भरोसा रख, सोमवार तक फ़ार्म जमा करा दूँगा। और सोमवार से पहले, उसी रात, मेरी बीवी उस हाल में पहुँची।"
"अस्सी रुपये दवा में लग गए?"
"डॉक्टर ने कहा — इंजेक्शन। पच्चीस रुपये। और भर्ती। उस रात मेरे पास सोलह रुपये थे। फिर इब्राहीम के अस्सी। मैंने एक मिनट सोचा।"
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
"एक मिनट, बेटा। बस एक मिनट। फ़ीस ज़रूरी है या साँस? पागल था मैं। मैंने पैसे दे दिए। मेरी बीवी बच गई।"
"और यूसुफ़ भाई?"
"उस साल दाख़िला रह गया। अगले साल फिर रह गया। तीसरे साल उसने पढ़ाई छोड़ दी और गोदाम में काम करने लगा।" उन्होंने आँखें खोलीं। "मेरे बेटे के साथ। दोनों एक ही गोदाम में। मेरा बेटा आज भी वहीं है। यूसुफ़ दिल्ली में है। भगवान की मर्ज़ी।"
"और इब्राहीम चाचा को क्या बताया?"
"मैंने क्या बताता?" उनका गला भर आया। "उसने पूछा, पैसे कहाँ हैं? मैंने कहा, पैसे नहीं हैं। उसने पूछा, कहाँ गए? मैं चुप रहा।"
"क्यों?"
"शर्म आई, बेटा।" उन्होंने कहा। "मैंने सोचा — कहेगा, तेरी बीवी की दवा के लिए मेरे बेटे का भविष्य? मैं वो सुनने को तैयार नहीं था।"
"उसने क्या कहा?"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno