The Mysterious Bell – Chapter 719
मैं अंदर गया। आटे का डिब्बा रसोई के कोने में था, पीतल का ढक्कन, ऊपर हल्की धूल। मैंने ढक्कन खोला और आटे में हाथ डाला। अंदर, बिल्कुल तल्ले में, कपड़े में लिपटी एक मोटी चाबी थी। लोहे की, काले रंग की, दाँते घिसे हुए।
मैं वो चाबी लेकर आँगन में आया।
और तभी मैंने देखा कि दरवाज़े के नीचे, चौखट के भीतर की तरफ़, मिट्टी पर कुछ लिखा हुआ था। बहुत हल्का। किसी ने उँगली से लिखा था और हवा उसे मिटा रही थी, पर अभी भी पढ़ा जा सकता था।
दो अक्षर। और उनके बाद एक ऐसा निशान जो अधूरा था।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा। "ये नाम है।"
मैंने चाबी पापा की तरफ़ बढ़ाई। मेरा हाथ काँप रहा था और मैं उसे रोक नहीं रहा था।
"पापा," मैंने कहा। "आपने कहा था कि वो नाम आपके ऊपर लिखा गया था। ये नाम ज़मीन पर लिखा है। इसे कोई और लिख गया है।"
पापा ने चाबी ली। उन्होंने उसे अपनी हथेली में रखा और देर तक देखा, जैसे वो चाबी नहीं, कोई चेहरा हो।
और तभी घंटी ने एक और बात कही, इतनी धीमी कि सिर्फ़ मैंने सुनी:
"दरवाज़ा खुलेगा। पर अंदर जो है, वो तुम्हारे पापा नहीं है। वो उनका साया है जो उस रात बाहर गया था और बदलकर लौटा था।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
बाहर पीपल की पत्तियाँ हिल रही थीं। गुमटी से किसी बर्तन की आवाज़ आई। मोड़ पर रफ़ीक़ की सीटी बजी — एक लंबी, दो छोटी — जिसका मतलब था कि गली के मुँह पर कोई आ रहा है।
पापा ने चाबी ताले में डाली।
उनका हाथ काँप रहा था, फिर भी वो चाबी घुमाने लगे।
और मैंने अपनी जेब में हाथ डालकर घंटी दबा दी, ताकि जो अंदर है, वो हमें पहले सुन न ले।
क्योंकि आज रात कुछ भी हो सकता था। और मैं नहीं चाहता था कि वो हमसे पहले तैयार हो जाए।
॥
चाबी घूमी। पहले हल्की चरचराहट, जैसे चूल्हे पर रखा पुराना तवा हिला हो। फिर अंदर से एक छोटी, सूखी आवाज़ आई — क्लिक। जैसे किसी ने दाँत चबाया हो और चुप हो गया हो।
पापा ने चाबी और घुमाई। कुंडा ढीला पड़ा और दरवाज़ा एक हाथ जितना खुल गया।
और उस दरार से जो हवा निकली, वो मेरे पूरे चेहरे पर आकर रुक गई।
ठंडी थी। बंद थी। बरसों से किसी कमरे में पड़ी हुई। और उसमें वो गंध थी जिसे मैं अब पहचानता हूँ — जले काग़ज़ की गंध, पुराने कपड़े की गंध, और कहीं बहुत पीछे से आती हुई मिट्टी के तेल की बू।
दरवाज़े के भीतर अंधेरा था। पूरा काला नहीं, उस तरह का अंधेरा जिसमें आँखें डालने पर लगता है कि कोई बैठा है और साँस रोके हुए है।
पापा ने एक कदम आगे रखा।
"पापा," मैंने धीरे से कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। उनका हाथ दरवाज़े के पत्ते पर था, उँगलियाँ लकड़ी में धँसी हुई।
"इसमें रोशनी चाहिए," पापा ने कहा। आवाज़ ऐसी जैसे गला सूखा हो। "मोमबत्ती लाओ।"
पीछे माँ खड़ी थीं। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू पकड़ा हुआ था और उनका चेहरा उस पुराने पीले रंग का हो गया था जो डर के बाद आता है।
"शंकर," माँ ने कहा। "अंदर मत जाओ। बाहर से बोलो। दरवाज़े से ही बोलो।"
"किससे बोलूँ, सुशीला?" पापा ने पूछा। और यह सवाल इतने धीमे स्वर में आया कि काजल ने मेरी कलाई पकड़ ली।
तभी बाहर, गली के मुँह पर, रफ़ीक़ की सीटी बजी।
एक लंबी। दो छोटी।
और उसके तुरंत बाद सानिया की आवाज़ आई, इतनी ऊँची कि पीपल की पत्तियाँ जैसे जाग गईं।
"अंकुश भाई! सफ़ेद गाड़ी! सफ़ेद गाड़ी आई है!"
पापा ने दरवाज़ा एक झटके में बंद किया। चाबी घुमाई। कुंडा ज़ोर से बैठा और पूरी गली में वो आवाज़ गई जैसे किसी ने ताला मार दिया हो।
"अंदर सब कुछ वैसा ही रहेगा," पापा ने कहा, और आवाज़ में वो कड़क थी जो उनमें कभी-कभार, साल में एक बार आती है। "जो कुछ है, जैसा है, वैसा ही।"
उन्होंने चाबी अपनी कमीज़ की जेब में रखी, फिर उसे निकालकर माँ की तरफ़ बढ़ाई।
"रख लो," उन्होंने कहा। "बाईस साल तुमने रखी है, तो आज भी तुम रखो। मेरे हाथ में ये रही तो मैं इसे फेंक दूँगा।"
माँ ने चाबी ली। उन्होंने उसे अपने पल्लू में बाँधा और उस गाँठ को दो बार कसा।
हम बाहर निकले।
गली में अभी भी वो रात वाली खामोशी थी, जिसमें हर आवाज़ बड़ी होकर आती है। चबूतरी पर बंसी बाबा और रहमत बाबा बैठे थे, दोनों के हाथ गोद में, दोनों एक ही दिशा में देख रहे थे। उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के सहारे खड़े थे, कैंची अब भी उनके हाथ में थी, जैसे वो उसे कहीं रखना भूल गए हों।
और गली के मुँह पर एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी।
इंजन बंद था। बत्ती बुझी थी। शीशा आधा खुला था। और उस शीशे के अंदर अंधेरा था, जो किसी इंसान का अंधेरा नहीं लग रहा था, किसी चीज़ का लग रहा था।
गाड़ी वहाँ करीब आधा मिनट रुकी रही।
आधा मिनट में इंसान बहुत कुछ सोच लेता है। मैंने सोचा कि क्या मैं दौड़कर शीशे पर हाथ रख दूँ। मैंने सोचा कि क्या पापा को पीछे कर दूँ। मैंने सोचा कि घंटी मेरी जेब में है और वो ठंडी है, बिल्कुल ठंडी, जैसे किसी ने उसे बर्फ में रख दिया हो।
फिर गाड़ी का इंजन बजा। धीमी, दबी आवाज़। और गाड़ी उसी तरह चली गई, धूल उड़ाती हुई, बिना रुके, बिना पीछे देखे, बिना कुछ कहे।
बबलू मेरे पीछे खड़ा था। उसका सफ़ेद रूमाल अब भी हाथ पर बँधा था और उस पर गुलाबी दाग़ सूखकर हल्का हो गया था। उसने धीरे से कहा, "ये गाड़ी साहब की नहीं है। साहब की गाड़ी लंबी है। ये छोटी है।"
"तो किसकी है?" मैंने पूछा।
बबलू ने जवाब नहीं दिया। उसने बस अपना रूमाल पकड़कर कस लिया।
उस रात हममें से कोई ठीक से सोया नहीं। मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में चारपाई पर पड़ा रहा और छत की टीन पर मच्छरों की आवाज़ सुनता रहा। काजल कमरे के बाहर चटाई पर बैठी थी, सुबह मुझे पता चला। माँ ने दरवाज़े की चौखट पर एक चादर बिछाकर खुद उसी पर लेट गईं, जैसे वो दरवाज़े की पहरेदार हो।
और सुबह छह बजे, जब पीपल पर पहली किरण आई, तब मैं जानता था कि आज कुछ होने वाला है।
वो कुछ सात बजे हुआ।
दो आदमी आए। दोनों सफ़ेद कुर्ता, दोनों के हाथ में काग़ज़। एक के हाथ में स्याही की डिब्बी और चौड़ा ब्रश था। दूसरे के हाथ में काग़ज़ों का बंडल और वो गोल डिब्बा जिसमें गोंद होता है।
वो दुकान के शटर तक आए, मेरी तरफ़ देखा भी नहीं, और काग़ज़ चिपका दिया।
मैं दुकान के अंदर था। मेज़ पर रणवर की मिठाई का डिब्बा अब भी खुला पड़ा था, एक भी टॉफ़ी कम नहीं, और उसकी केसर-इलायची की खुशबू अब भी हवा में थी, जैसे वो डिब्बा मुझ पर हँस रहा हो।
मैंने शटर उठाकर बाहर झाँका।
काग़ज़ सफ़ेद था। ऊपर मोटी नीली लाइन में लिखा था कि यह सूचना भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की तरफ़ से है और नीचे, छोटे अक्षरों में, वो लाइन थी जो मेरी आँखों से सीधे अंदर घुस गई।
दुकान तीन दिन के अंदर खाली की जाए।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
दोनों में से जो छोटा था, वो मुड़ा। उसके चेहरे पर वो थकान थी जो काग़ज़ चिपकाने वालों के चेहरे पर होती है। उसने कहा, "बड़े साहब का हुक्म है। तीन दिन बाद सुबह सात बजे यहाँ मशीन आएगी। जो सामान है, आज निकाल लो।"
"किस आधार पर?" मीरा की आवाज़ आई, पीछे से। उसने अपना कैमरा पहले ही चालू कर रखा था। उसके कंधे पर फटा बैग लटक रहा था और बाल आज भी बिखरे हुए थे। "काग़ज़ पर लिखा है तीन दिन। किसने तय किया? किसकी मुहर है? ये सूचना है या धमकी?"
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