The Mysterious Bell716 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 716

7 min read November 5, 2026

डर इस बात से कि कल सुबह सात बजे हम में से कौन कहाँ खड़ा मिलेगा।

॥

पापा का हाथ मेरे हाथ में ठंडा था। उन्होंने वो वाक्य कह दिया था — वो सच कह रहा है — और उसके बाद हम दोनों वहीं खड़े रह गए, जैसे किसी ने हमारी आवाज़ की चाबी निकाल ली हो।

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके चश्मे पर टेप अब भी बँधा था, पर टेप के नीचे कान की खाल लाल हो रही थी, जैसे वो उसे बहुत देर से दबा रहे हों।

"पापा," मैंने कहा। "वो सच कह रहा है — मतलब?"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर नज़र नीचे की।

"मतलब ये नहीं कि मैं उसकी बात मान रहा हूँ," उन्होंने धीरे से कहा। "मतलब ये कि उस रात… उस रात अस्पताल में जो हुआ, वो मेरे साथ हुआ। मैं वहाँ था।"

"आप वहाँ थे," मैंने दोहराया। "ये तो हम जानते हैं। आपने अंगूठा लगाया था।"

पापा ने सिर हिलाया, पर ऐसे जैसे हिलाना नहीं चाहते थे।

"अंकुश, मैंने तुम्हें सब बता दिया, फिर भी कुछ बाकी है," उन्होंने कहा। "और वो कुछ… मैं आज नहीं बोल सकता। सुबह से बोल रहा हूँ न, बस कर। आज बस कर।"

मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा।

"बस कर देंगे," मैंने कहा। "पर एक बात साफ़ कर दीजिए — क्या वो कमरा, वो दूसरा कमरा, वहाँ कोई और था?"

पापा की उँगलियाँ मेरी हथेली में एक बार कसीं, फिर ढीली पड़ गईं।

"आज नहीं," उन्होंने कहा।

मैंने उनका हाथ छोड़ दिया। छोड़ना पड़ा। क्योंकि अगर मैं एक और सवाल पूछता, तो वो आदमी जो सुबह से अपने अंदर सब दबाए खड़ा था, वहीं गिर जाता। और मुझे उस आदमी को गिरते हुए नहीं देखना था। मैंने उसे बहुत देर से देखा था, अब भी देखना नहीं चाहता था।

मैंने पीछे मुड़कर पूरी दुकान को देखा।

मेज़ पर मिठाई का डिब्बा खुला पड़ा था। सफ़ेद पन्नी, केसर की खुशबू, और उसके अंदर बारह-चौदह गोल टॉफ़ियाँ, एक भी कम नहीं। रणवीर ने खुद खाई थी, बच्चों को दी थी, और एक भी चीज़ ऐसी नहीं थी जो हमने छुई हो।

"उस्ताद," टिंकू ने फिर कहा। "ये डिब्बा यहीं रहेगा?"

"यहीं," मैंने कहा। "जब तक गली देख न ले।"

उस्ताद ने कैंची मेज़ पर रखी और उसे ऐसे सरकाया जैसे कोई गंदी चीज़ हो।

"डिब्बा रहने दो," उन्होंने कहा। "अब बैठो। सबको बैठना पड़ेगा।"

हम बैठे।

वो बैठक अजीब थी। किसी ने कुछ नहीं पूछा। मीरा अपना कैमरा लिए खड़ी थी, और उसके पीछे खड़े उसके दो साथी मुँह पर फोन लिए खामोश थे। शबनम आपा गुमटी से आईं और पीतल की थाली मेज़ पर रख दी — उसमें पानी के चार गिलास थे।

"चाय बाद में," उन्होंने कहा। "पहले पानी।"

माँ आँगन से आईं, हाथ में हिसाब की कॉपी थी, पर वो कॉपी उन्होंने कहीं नीचे रख दी, जैसे आज हिसाब का दिन नहीं है।

"शंकर," माँ ने कहा। "बैठ जाओ।"

पापा बैठ गए। मैंने देखा कि उन्होंने बैठते वक़्त कुर्सी नहीं छुई, दीवार को हाथ लगाया। जैसे ज़मीन उन्हें नहीं सँभालेगी और दीवार सँभालेगी।

मीरा ने कुछ नहीं पूछा। वो सिर्फ़ अपने बैग से एक पन्नी निकालकर मेज़ पर रखने लगी, और मैंने उसे रोका।

"अभी नहीं," मैंने कहा।

"अंकुश," मीरा ने कहा, "अभी। सुबह सात बजे मशीन आनी है। और उससे पहले हमें ये जानना है कि इस काग़ज़ पर किसका अंगूठा है।"

"मैं जानता हूँ किसका है," मैंने कहा।

"मुझे भी पता है किसका है," मीरा ने कहा। "पर मुझे ये भी देखना है कि जो हम जानते हैं, वो सही है या नहीं।"

उसकी आवाज़ कड़क थी, पर आँखें नरम। मैं चुप हो गया।

दिन कैसे गुज़रा, मुझे ठीक से याद नहीं। मुझे इतना याद है कि गली उस दिन अजीब तरह से चुप थी। दुकानें खुली थीं, शटर उठे थे, पर किसी ने ज़ोर से बात नहीं की। भोला भाई ने अपनी दुकान का रेडियो तेज़ कर दिया था, जैसे बोलना नहीं चाहते थे तो आवाज़ को अपनी जगह बोलने देना चाहते थे। दुबे अंकल अपनी नीली कुर्सी पर बैठे रहे और उसी कुर्सी के पैर के नीचे ईंट का टुकड़ा ठीक करते रहे, जो हिलती नहीं है।

दोपहर में काजल अस्पताल से लौटी। उसके हाथ में दवा की प्लास्टिक थैली थी और आँखें सूजी हुई थीं।

"माँ," उसने कहा, "खेप अभी नहीं आई। रजिस्टर वाला आदमी कह रहा था कि काग़ज़ साफ़ होने तक रुकी है।"

माँ ने कुछ नहीं कहा। माँ ने सिर्फ़ चूल्हे की तरफ़ देखा और कहा, "दो पत्ते हैं न, दो दिन चलेंगे।"

"तीसरे दिन?" काजल ने पूछा।

"तीसरे दिन भगवान देखेंगे," माँ ने कहा। और फिर चूल्हे पर पतीली रख दी, इतने ज़ोर से कि आवाज़ पूरी गली में गई।

मैंने उस दिन दुकान पर कुछ ठीक नहीं किया। एक साइकिल आई थी, उसका पिछला पहिया घिसा हुआ था। मैंने पहिया निकाला, साफ़ किया, फिर वापस लगा दिया। मुझे याद नहीं कि मैंने कोई पेंच कसा भी या नहीं।

शाम को धूप जब पीपल की डालों के बीच से निकल गई, तब मीरा मेरी दुकान पर आई। उसके हाथ में वही पन्नी थी, और उसके पीछे उस्ताद अली बक्श थे, और उनके पीछे बबलू।

बबलू के हाथ पर रूमाल बदल गया था। नया रूमाल भी सफ़ेद था, पर उस पर भी गुलाबी दाग़ था।

"मैं वो काम करने नहीं आया," बबलू ने पहले ही कह दिया, जैसे किसी ने उससे यह वाक्य याद करा दिया हो। "मैं बस… देखने आया।"

"बैठ," मैंने कहा।

वो बैठ गया। गली में आज पहली बार किसी ने किसी को किसी ऐसी जगह बैठाया, जहाँ वो कभी नहीं बैठा था।

रात आठ बजे के आसपास हम सब वहीं थे — मेरी दुकान के अंदर, और बाहर चबूतरी तक लोग। रफ़ीक़ और गुड्डू मोड़ पर थे, सीटी लिए। सानिया और चिंटू पीपल के नीचे बैठे थे और दोनों चुप थे, जो उन दोनों के लिए बहुत बड़ी बात थी।

मीरा ने पीतल का लैंप जलाया। माँ का पुराना लैंप, जिसकी रोशनी पीली है और जिसमें तेल जल्दी खत्म होता है।

"रखो," मीरा ने कहा।

उसने मेज़ पर आधी जली रसीद रखी। फिर उसके बगल में सफ़ेद काग़ज़ की एक चौकोर शीट रखी। फिर अपनी जेब से स्याही की छोटी डिब्बी निकाली, जो उसने स्कूल के स्टोर से उठाई थी।

"शंकर अंकल," उसने कहा, धीरे से, बहुत धीरे से। "बस एक बार। इस काग़ज़ पर अंगूठा लगा दीजिए।"

पापा ने उसकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर माँ की तरफ़।

"क्यों?" उन्होंने पूछा।

"क्योंकि मुझे तुलना करनी है," मीरा ने कहा। "और ये तुलना मैं झूठ से नहीं करना चाहती।"

पापा ने हाथ आगे किया। उनका हाथ काँप रहा था। मीरा ने उनका अंगूठा स्याही में डुबोया और सफ़ेद काग़ज़ पर दबाया। ध्यान से, बिना जल्दबाज़ी के, जैसे डॉक्टर कोई निशान ले रहा हो।

फिर उसने माँ का अंगूठा लिया, और उसी तरह दबाया — दूसरे कोने पर।

फिर उसने पीतल का लैंप उठाकर आधी जली रसीद के ऊपर किया, और उसके ऊपर अपना कैमरा लगाया, और कैमरे की स्क्रीन पर तीनों चीज़ें एक साथ दिखीं — रसीद का अंगूठा, पापा का अंगूठा, माँ का अंगूठा।

मैंने स्क्रीन में झाँका।

मैंने वो दृश्य आज भी याद रखा है, क्योंकि उस वक़्त मेरे अंदर कुछ ऐसा टूटा जो बहुत दिनों से टूटने की तैयारी में था।

माँ का अंगूठा चौड़ा था, गोल था, और उसके किनारे की लकीर साफ़ थी।

पापा का अंगूठा लंबा था, थोड़ा सपाट, और उसका निशान उस तरह फैलता था जैसे लंबा दबाया गया हो।

और रसीद पर जो अंगूठा था… वो तीनों से अलग था।

वो न माँ जितना चौड़ा था, न पापा जितना लंबा। वो छोटा था। मतलब, उसका निशान छोटा था — गोलाई में छोटा, पर गहरा। और उसके बीच में एक जगह ऐसी थी जहाँ स्याही नहीं बैठी थी, जैसे उँगली पर वहाँ कुछ रगड़ा हुआ हो, कोई पुराना निशान।

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