The Mysterious Bell – Chapter 69
जवाब है, मैंने कहा। पर वो जवाब तुम्हें अभी नहीं दे सकता। क्योंकि वो जवाब मेरा नहीं है।
तो किसका है?
मैंने जेब की तरफ़ देखा। घंटी अब भी वहीं थी, ठंडी, चुप, जैसे कुछ सुन रही हो।
मीरा, मैंने कहा, तुमने कभी कोई चीज़ छुपाई है?
उसका चेहरा सख़्त हो गया।
क्यों पूछ रहे हो?
क्योंकि तुम्हारी आँखों में जो थकान है, वो आज की नहीं है। वो पाँच साल पुरानी है। और मुझे लगता है तुम यहाँ सिर्फ़ मेरा सच नहीं ढूँढने आई हो। तुम अपना भी कुछ ढूँढ रही हो।
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने कैमरा उठाया और बंद कर दिया।
ठीक है, उसने कहा। आज शाम। पीपल के नीचे। तुमने जो कहा, वो करके दिखाओ। पर मैं वहाँ रहूँगी, और मेरा कैमरा चालू रहेगा।
मैंने कहा, कैमरा चालू रखना, पर एक बात याद रखना।
क्या?
जब मैं सच बोलूँ, तो कैमरे से ज़्यादा अपनी आँखों पर भरोसा करना। क्योंकि कैमरा आदमी का चेहरा पकड़ता है, आवाज़ नहीं।
वो हँसी। पहली बार। छोटी सी हँसी, जैसे किसी बंद कमरे में खिड़की खुल गई हो।
चलो देखें, उसने कहा।
वो मुड़ी और चली गई। मैं दुकान के दरवाज़े पर खड़ा रहा।
और तभी मुझे एहसास हुआ कि जब मीरा आई थी, तब बबलू वहाँ नहीं था।
वो कब गया, मुझे पता ही नहीं चला।
पर दरवाज़े की चौखट पर पान की एक लाल बूँद पड़ी थी। और उसके साथ मिट्टी के जूते का एक निशान, जो सीधे दुकान के बाहर, मेरे बोर्ड की तरफ़ जाता था।
बबलू गया नहीं था। बबलू रुककर मेरा बोर्ड पढ़ रहा था।
शंकर यादव और बेटे।
उसने वो नाम पढ़ा था। और वो नाम उसे कुछ याद दिला गया था।
मैंने उस पल महसूस किया कि खेल अब सिर्फ़ घंटी का नहीं रह गया है। खेल अब नाम का हो गया है।
शाम को मैं समय से पहले पीपल के पास पहुँच गया।
सूरज तालाब की तरफ़ जा रहा था। गली में मिट्टी की खुशबू थी, क्योंकि पीछे के प्लॉट से ट्रक फिर गुज़रे थे और उन्होंने पूरी गली में धूल छोड़ दी थी।
चबूतरी पर दो बुज़ुर्ग बैठे थे।
बाबा कलीम, एक सिरे पर। सफ़ेद टोपी, सफ़ेद दाढ़ी, हाथ में तस्बीह। और पंडित रामदीन, दूसरे सिरे पर। पीली धोती, कंधे पर गमछा, हाथ में छोटी सी लाठी जिसे वो बस पकड़े रहते थे, टेकने के लिए नहीं।
दोनों के बीच में एक हाथ भर की जगह खाली थी।
पचास साल से खाली।
मैं वहाँ पहुँचा तो दोनों ने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। जैसे मैं हवा हूँ।
मीरा पहले से वहाँ थी। उसका कैमरा एक कोने में टंगा था, तिपाई पर। टिंकू पेड़ की जड़ के पास बैठा था। शबनम आपा अपनी गुमटी से गर्दन निकालकर देख रही थी। और बच्चे — सानसानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — चारों शबनम आपा की गुमटी के पीछे बैठे थे। वो टूटी बेंच जो आपा ने किसी के घर से उठाकर लाई थी, उस पर चारों इस तरह बैठे थे जैसे कोई सभा चल रही हो।
सानिया के हाथ में आधा समोसा था और आँखें पीपल की तरफ़।
"देखो," उसने कहा, "दोनों एक-दूसरे को छू भी नहीं रहे। बाबा कलीम की तस्बीह उस तरफ़ झूल रही है, पंडित जी की लाठी इस तरफ़। जैसे बीच में कोई दीवार हो जो हमें दिखती नहीं।"
चिंटू ने घुटने पर बँधी पट्टी खुजाई। "माँ कहती है पचास साल से ऐसे ही है। बात नहीं करते। सलाम भी नहीं, राम भी नहीं।"
"पर झगड़ा किस बात का?" मैंने पूछा। मैं उनके पीछे खड़ा था और मुझे लगा मैं किसी बड़ी कहानी के दरवाज़े पर खड़ा हूँ।
गुड्डू ने समोसे का आधा हिस्सा एक साँस में निगलकर कहा, "मेरी दादी बताती है। पहले यहीं, इसी कोने पर, दोनों की मिलकर चाय की दुकान थी। छोटी सी। तीन बेंच, एक स्टोव, एक पीतल का डिब्बा — जिसमें दिन भर की कमाई डालते थे।"
"डिब्बा?"
"हाँ. पीतल का। ढक्कन पर फूल बना था। दादी कहती है पैसा पूरा उसी डिब्बे में जाता था और रात को डिब्बा पीपल के कोटर में छिपा दिया जाता था, क्योंकि दुकान में ताला नहीं था।"
रफ़ीक़ ने धीमी आवाज़ में कहा, "एक रात डिब्बा गायब हो गया। सुबह पंडित जी ने बाबा कलीम पर इल्ज़ाम लगा दिया। बाबा कलीम ने कुछ नहीं कहा। बस उस दिन के बाद दुकान बंद।"
मेरे अंदर कुछ हिला।
"और डिब्बा?"
"किसी को नहीं मिला," सानिया ने कहा। "दादी कहती है जब तक डिब्बा नहीं मिलेगा, तब तक कोई नहीं बोलेगा।"
मैंने पीपल की तरफ़ देखा। उसकी जड़ें चबूतरी की सीढ़ी में घुसी हुई थीं, जैसे कोई बूढ़ा हाथ ज़मीन पकड़े बैठा हो। और उस तने में, कमर की ऊँचाई से थोड़ा ऊपर, एक गहरा कोटर था — काला, चौड़ा, जिसमें शायद कभी कुछ रखा जाता था।
मैंने सानिया को देखा।
वो मुस्कुराई। वो मुस्कान जो बच्चे तभी मुस्कुराते हैं जब उनके पास कोई चीज़ पहले से हो।
"चिंटू, पतंग वाली डोर ला," उसने कहा।
चिंटू गुमटी के पीछे से एक मैली, पतली रस्सी ले आया। गुड्डू ने उसे अपनी कमर से बाँधा और सानिया ने कहा, "तू हल्का है, तू चढ़।"
मैं वहीं खड़ा रहा और मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि मुझे पता था — इन बच्चों को रोकना बेकार है। ये गली के जासूस हैं। इनके पास हर खबर पहले आती है, और ये कभी बड़ों की इजाज़त नहीं लेते।
चिंटू पीपल पर चढ़ा। उसकी पट्टी वाली टाँग पेड़ से चिपकी रही और वो तने के सहारे कोटर तक पहुँचा। उसने हाथ अंदर डाला। कुछ हिलाया। फिर उसका चेहरा बदला।
"कुछ है," उसने ऊपर से कहा। "पत्थर जैसा। भारी है।"
"निकाल," सानिया ने कहा।
चिंटू ने ज़ोर लगाया। कोटर से एक चीज़ निकली — गोल, हरी-काली, जंग से भरी हुई, ऊपर एक उभरा हुआ फूल जिसे देखकर ही पता चलता था कि ये कभी पीतल था।
पीतल का डिब्बा।
वो उतरा और उसने डिब्बा सानिया की गोद में रख दिया। सब उस पर झुक गए। मैं भी झुका।
ढक्कन जंग से बैठ गया था। रफ़ीक़ ने रिंच जैसा कुछ निकाला, ज़ोर लगाया, और ढक्कन टूटकर खुल गया।
अंदर सिक्के थे — पुराने, काले पड़े हुए। कुछ आने, कुछ पैसे। और उनके नीचे एक मुड़ा हुआ काग़ज़।
चिंटू ने काग़ज़ निकाला। पीला, नाज़ुक, किनारों से फटा हुआ। मैंने उसे बहुत सँभालकर खोला।
उस पर हाथ से लिखा था, नीली स्याही में, झुके अक्षरों में।
"कलीम की बच्ची के इलाज के लिए — दो रुपये चार आने। किसी को न बताना।"
नीचे एक तारीख़ थी, और उसके नीचे वही हस्ताक्षर जो मैंने पंद्रह दिन पहले एक पुराने संदूक के काग़ज़ पर देखे थे — नहीं, वो उस्ताद के थे। ये दूसरे थे। पर मैं उन्हें पहचानता था।
रामदीन।
चबूतरी पर बैठे पंडित रामदीन के हाथ के अक्षर।
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों में पकड़कर पलटा। पीछे की तरफ़ बस धुँधला सा एक वाक्य और था, बहुत छोटा, बहुत झुका हुआ।
"बच्ची बच जाए तो कह दूँगा। न बचे तो कभी नहीं।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
मैंने काग़ज़ सानिया के हाथ में दिया और कहा, "इसे सँभालकर रख।"
फिर मैं पीपल की तरफ़ चला।
चबूतरी पर दोनों बुज़ुर्ग बैठे थे। बाबा कलीम की तस्बीह चल रही थी। पंडित रामदीन की लाठी उनके घुटने के पास खड़ी थी। दोनों के बीच वो एक हाथ भर की खाली जगह — जो दिखती जगह नहीं थी, आदत थी।
मैं सीधा गया और उसी खाली जगह में बैठ गया।
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा। पंडित जी की भौंहें चढ़ीं। बाबा कलीम की तस्बीह रुकी।
"ये जगह नहीं है तेरी," पंडित जी ने कहा। आवाज़ सूखी, जैसे पुराने पीतल पर उँगली फेर दी हो।
"पता है," मैंने कहा। "पर मेरे पास बैठने की और जगह नहीं है।" मैंने झूठ नहीं बोला। मैंने सच बोला — इन दोनों के बीच, इस खाली जगह में, मुझे लगा जैसे मैं कुछ ठीक करने आया हूँ।
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