The Mysterious Bell – Chapter 675
वो वही था।
बिना चेहरे का साया। जैसे धुएँ से बना हो, पर धुआँ नहीं था। धुआँ हवा में चलता है। ये नहीं चल रहा था। ये खड़ा था। इंतज़ार कर रहा था।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
वो ठंडी थी। ठंडी और चुप।
"घंटी," मैंने कहा। "बोल।"
कुछ नहीं।
शबनम आपा पीछे हटीं। रज़िया आपा ने उनका हाथ पकड़ा।
डॉक्टर इसरानी खड़े रहे। उनके हाथ में मोमबत्ती थी। वो काँप रही थी — नहीं, मोमबत्ती नहीं। उनका हाथ। पर वो खड़े रहे।
साया धीरे-धीरे बड़ा होने लगा।
पहले एक आदमी जितना। फिर दरवाज़े जितना। फिर — दीवार जितना।
और फिर उसके भीतर से एक हाथ निकला।
एक उँगली।
बाक़ी सब बिखरा हुआ, पर उँगली साफ़। साफ़ और सीधी।
और वो उँगली मेरी तरफ़ नहीं उठी।
डॉक्टर इसरानी की तरफ़ नहीं उठी।
अस्पताल की तरफ़ नहीं उठी।
वो उँगली गली के मुँह की तरफ़ उठी।
दुकान की तरफ़।
मेरी दुकान की तरफ़।
और उस पल पूरी गली ने साँस रोक ली।
मुझे अपने ही कानों में आवाज़ आई — जैसे कोई दूर से पुकार रहा हो। एक आदमी ने कुछ कहा, पर आवाज़ नहीं निकली। एक औरत ने अपने बेटे को सीने से लगा लिया।
मैंने साये की तरफ़ देखा।
"तू क्या चाहता है?" मैंने कहा।
मेरी आवाज़ तेज़ थी। गली में गूँजी।
साया हिला। नहीं, मुस्कुराया। बिना मुँह के कैसे मुस्कुराया, मुझे नहीं पता। पर मुझे लगा कि मुस्कुराया।
फिर वो पीछे हटा।
धीरे-धीरे।
और गायब हो गया।
पर उसकी उँगली की दिशा वहीं रह गई। हवा में नहीं। मेरे अंदर।
मैंने घंटी को हथेली में कसा।
वो अब भी ठंडी थी।
"घंटी," मैंने कहा। "अब बोल।"
और तब — मेरी जेब में रखी घंटी ने एक आवाज़ निकाली। सीधी नहीं। घूमकर। जैसे कोई दूर से आ रहा हो। जैसे कोई सुरंग में चल रहा हो।
"अब तेरा घर," उसने कहा।
मैंने आँखें बंद नहीं कीं।
"और?"
"और कुछ नहीं," घंटी ने कहा। "बस — अब तेरा घर।"
और तभी मुझे गंध आई।
जली काग़ज़ की।
न हल्की। न दूर की।
तेज़। तीखी।
जैसे कोई बहुत सारे काग़ज़ एक साथ जलाकर ऊपर से पानी डाल दे, और धुआँ दबकर नीचे बैठ जाए।
मैं गली की तरफ़ मुड़ा।
गली के मुँह से धुआँ नहीं दिख रहा था। लालटेन भी नहीं। सिर्फ़ अंधेरा।
पर गंध साफ़ थी।
मेरी दुकान की तरफ़ से आ रही थी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
उसने कैमरा नीचे किया।
"अंकुश," उसने कहा। "ये गंध —"
"हाँ," मैंने कहा। "मुझे भी आ रही है।"
डॉक्टर इसरानी आगे आए।
"तू जा," उन्होंने कहा। "अस्पताल मेरे पास है।"
"पर —"
"अंकुश," उन्होंने कहा। "मैंने साठ साल में बहुत चीज़ें खोई हैं। आज मुझे एक चीज़ मिली है — हिम्मत। अगर तू यहाँ खड़ा रहा और वहाँ कुछ हो गया, तो मेरी हिम्मत भी जाएगी। जा।"
मैंने सिर हिलाया।
"शबनम आपा," मैंने कहा। "आप डॉक्टर साहब के साथ।"
"हाँ," उन्होंने कहा। "पर जब लौटे, तो खाली हाथ न लौटना।"
"क्या लाऊँ?"
"सच," उन्होंने कहा। "बस सच लेकर आ।"
मैं हँसा।
"पूरी गली का सच लेकर आऊँगा," मैंने कहा। "थोड़ा भारी होगा, पर तुम सब मिलकर उठा लेना।"
मैं और मीरा गली की तरफ़ भागे।
सानिया आगे, पीछे गुड्डू और रफ़ीक़।
गली का मुँह। पीपल। चबूतरी।
और फिर…
दुकान।
शटर बंद था। पापा, उस्ताद, भोला भाई, मंसूर, बबलू — सब वहीं खड़े थे।
मैंने शटर के नीचे से देखा।
कुछ जल नहीं रहा था।
पर गंध। गंध वहीं थी। जैसे किसी ने अभी, अभी, आधे मिनट पहले, यहाँ कुछ जलाया हो और बुझा दिया हो।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"कुछ दिखा?"
"नहीं," उन्होंने कहा। "पर सुना।"
"क्या?"
"कुछ खुरचने की आवाज़," उन्होंने कहा। "शटर के अंदर से। जैसे कोई अंदर काग़ज़ खुरच रहा हो।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"उस्ताद?"
उस्ताद ने अपना मोटा चश्मा ठीक किया।
"मैंने गंध सुनी," उन्होंने कहा।
"गंध सुनी नहीं जाती, सूँघी जाती है," बबलू ने कहा।
"तू मुझे मत सिखा," उस्ताद ने कहा। "मैंने गंध सुनी। क्योंकि वो गंध किसी काग़ज़ की नहीं थी। वो गंध हकीम साहब की कॉपी की थी। जिस कॉपी को उन्होंने पचास साल पहले आग से बचाया था।"
हवा में सन्नाटा।
"उस्ताद," मैंने कहा। "आपको यक़ीन है?"
"नहीं," उन्होंने कहा। "पर मेरी नाक को यक़ीन है। और मेरी नाक ने आज तक बेवकूफ़ी नहीं की।"
मैंने घंटी निकाली।
हथेली पर रखी।
वो गरम हो गई थी।
फिर गरम और।
फिर गरम और।
"घंटी," मैंने कहा। "बोल।"
"अब तेरा घर," उसने फिर कहा।
"ये पता है," मैंने कहा। "कुछ और बता।"
घंटी चुप रही।
फिर बोली। धीमे। जैसे कोई आदमी अपनी ही आवाज़ से डर रहा हो।
"आज रात," उसने कहा, "मकान नहीं जलेगा।"
मैं ठिठका।
"तो?"
"ब्याहता जलेगी," घंटी ने कहा।
और चुप हो गई।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
उनका चेहरा ऐसा था जैसे वो कुछ जानते हों और फिर भी नहीं जानते हों।
"पापा —"
पापा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "घर के पीछे, चूल्हे के पीछे, वो दरवाज़ा है। उसके पीछे तेरी माँ की ब्याहता है।"
मैं खड़ा रह गया।
और जब मैंने पीछे मुड़कर देखा, तो गली के मुँह पर बिल्कुल अंधेरे में, लकड़ी के जूतों की एक आवाज़ आई।
सिर्फ़ एक।
और फिर वो रुक गई। जैसे किसी ने कहा हो — तेरा दरवाज़ा खुल गया था और अब तेरी बारी।
मैंने पन्ना जेब से निकाला।
उसे देखा।
"जो जोड़ेगा, उसका घर पहले जलेगा।"
मैंने उसे उँगली से दबाया।
"तो जल," मैंने कहा। "पहले मेरा घर। पर मेरा घर मेरे लोगों से बना है। और उन्हें जलाना इतना आसान नहीं जितना तुझे लगता है।"
मैंने घंटी उठाई।
वो गरम थी।
"घंटी," मैंने कहा। "आज रात मुझे तेरे हिसाब से नहीं चलना है। मेरे हिसाब से भी चलना है। कुछ बताओ जो मेरे काम आए।"
घंटी चुप रही।
फिर बोली।
"पीछे वाला दरवाज़ा," उसने कहा।
"हाँ?"
"उसका एक तरफ़ घर है," घंटी ने कहा। "दूसरा तरफ़ — कोई और।"
"कौन?"
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
सिर्फ़ इतना कहा, "जिस दरवाज़े को पचास साल से कोई नहीं खोलता, उसे खोलने के लिए चाबी नहीं चाहिए, अंकुश। उसे खोलने के लिए — हिम्मत चाहिए।"
मैंने घंटी जेब में रखी।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"पापा," मैंने कहा। "आज रात वो दरवाज़ा खुलेगा।"
पापा ने सिर हिलाया।
"मैं साथ चलूँगा," उन्होंने कहा।
"नहीं," मैंने कहा।
उनका चेहरा बदला।
"तू —"
"पापा," मैंने कहा। "आप यहाँ रहिए। इस गली पर। मेरी दुकान पर। अगर आग लगी, तो आप पहले वहाँ पहुँचिए। और मैं अंदर रहूँगा।"
"अंदर कौन?"
"माँ," मैंने कहा। "उनकी ब्याहता। मैं उन्हें अपने साथ रखूँगा। जैसा उन्होंने कहा था।"
पापा कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे।
फिर उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा।
"मेरा बेटा," उन्होंने कहा।
बस इतना कहा।
मैंने अपना रूमाल निकाला — वही जो मैंने शादी में छोड़ दिया था, वही जिससे टिंकू ने पसीना पोंछा था, वही जिससे सानिया ने चश्मा पोंछा था — और मैंने अपना चेहरा पोंछा।
फिर मैंने रूमाल जेब में रखा।
और बिना पीछे मुड़े, गली की तरफ़ चल पड़ा।
मीरा पीछे थी। सानिया आगे थी।
और उस रात गली में जो देखा, वो मैं अगली बार बताऊँगा।
बस इतना पहले कह दूँ — घर का दरवाज़ा खुला था। और उसके भीतर से नीली रोशनी नहीं आ रही थी। पीली आ रही थी।
पुराने दीये की पीली रोशनी।
जैसे कोई मुझसे पहले पहुँच चुका हो।
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