The Mysterious Bell – Chapter 67
वो मुस्कुराईं। यही सबसे बड़ी बात है, अंकुश। किसी को ठीक से पता ही नहीं। दोनों ने कभी कहा नहीं। और जो कभी नहीं कहा जाता, वो साल-दर-साल बड़ा होता रहता है। तीस साल पहले जो बात एक रोटी जितनी थी, आज वो पूरे घर जितनी हो गई है।
मैं गुमटी से उठा।
कहाँ?
पीपल के नीचे।
शबनम आपा ने मेरी कलाई पकड़ी और उनकी आवाज़ बदल गई।
सुन, उन्होंने कहा। वहाँ दो बुज़ुर्ग बैठे हैं। उनकी उम्र का लिहाज़ करना। हमारी गली के बुज़ुर्ग ऐसे होते हैं कि अगर वो चुप बैठे हैं तो चुप बैठे रहने दो, तुम्हारी ज़ुबान चलाने की ज़रूरत नहीं।
आपा, मैंने कहा, मुझे उन दोनों की ज़ुबान ही चलानी है।
उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया और एक लंबी साँस ली।
अच्छा, तो एक बात याद रख। उन दोनों के सामने अपने घर की बात मत करना। घर की बात वहीं बोलनी चाहिए जहाँ सच बोलने का इरादा हो।
मैंने सिर हिलाया।
चार लड्डू लेकर बच्चे लौटे। मैंने सानिया को पास बुलाया।
सानिया, एक काम है।
बोलो।
जब मैं पीपल के नीचे बैठा होऊँ, तो तुम सब वहीं रहना। दूर से। और अगर मैं हाथ उठाऊँ, तो तुम लोग आ जाना। पर बीच में बोलना मत।
गुड्डू बोला, हम क्यों?
क्योंकि तुम्हारे पास जो फ्रेम का टुकड़ा है न, वो आधा है। और आधी चीज़ें मेज़ पर रखी नहीं जातीं। उन्हें जोड़ने के लिए गवाह चाहिए। और गवाह वही होता है जो पीपल के नीचे खेलने वाला हो।
रफ़ीक़ की आँखें चमकीं। गवाह। यानी हम गवाह हैं।
हाँ, मैंने कहा। और गवाह को क्या करना होता है?
सच बोलना, चिंटू ने कहा।
नहीं, मैंने कहा। गवाह को याद रखना होता है। सच लोग खुद बोलते हैं। गवाह सिर्फ़ याद रखता है कि किसने कब क्या कहा।
मैं पीपल के नीचे पहुँचा।
चबूतरी पर दोनों बैठे थे। बंसी बाबा एक सिरे पर, सफ़ेद कुर्ता, माथे पर चंदन, हाथ में एक पुरानी लाठी जिसके ऊपर पीतल का मुँह था। रहमत बाबा दूसरे सिरे पर, सफ़ेद टोपी, हल्की दाढ़ी, और गोद में एक मैला रूमाल।
बीच में असली में जगह थी। बैठने की जगह। एक आदमी के लिए पूरी जगह।
मैंने बीच में पैर फैलाकर बैठने की सोची, फिर सोचा कि अभी नहीं।
मैंने नमस्ते कहा।
बंसी बाबा ने सिर हिलाया।
रहमत बाबा ने सिर हिलाया।
दोनों ने एक-दूसरे को नहीं देखा। जैसे एक-दूसरे के होने की खबर उन्हें सिर्फ़ हवा से मिलती हो।
मैंने बीच में बैठे बिना, चबूतरी के किनारे पर बैठकर कहा, बाबा, मेरी साइकिल का पहिया आज सुबह अटक रहा था।
बंसी बाबा बोले, तेल डाल।
रहमत बाबा बोले, धुरी देख।
दोनों ने एक साथ बोला।
फिर दोनों चुप।
मैं मुस्कुराया। बाबा, दोनों की सलाह सही है। तेल भी डाला, धुरी भी देखी। दिक्कत ये है कि पहिया बोलता है।
बंसी बाबा ने मेरी तरफ़ देखा। पहिया बोलता है?
हाँ। कभी-कभी। बोलता है कि तुम मुझे ठीक करते हो, पर मुझे चलाने वाला कोई और है।
रहमत बाबा हँसे। हल्की, खुरदरी हँसी। बंसी बाबा ने उनकी तरफ़ देखा, फिर तुरंत नज़र हटा ली।
मैंने कहा, बाबा, एक बात पूछूँ?
पूछ, बंसी बाबा बोले।
आप दोनों रोज़ यहाँ आते हैं?
हाँ।
कितने साल से?
बंसी बाबा ने सोचा। पैंतालीस। छियालीस हो गए होंगे।
और बात कितने साल से नहीं हो रही?
वो चुप हो गए।
रहमत बाबा ने रूमाल को मरोड़ा और उसकी तरफ़ देखे बिना कहा, बच्चा है। इसे क्यों घसीट रहे हो।
मैंने कहा, बाबा, मैं इसे घसीट नहीं रहा। मैं आप दोनों को बैठा देख रहा हूँ और मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि जो आदमी रोज़ आता है, वो बोलता क्यों नहीं।
बंसी बाबा ने लाठी ज़मीन पर टिकाई।
बोलने से कुछ होता है क्या?
मैंने कहा, बाबा, मेरी दुकान पर हर हफ़्ते कोई न कोई आता है और कहता है कि उसका रिश्ता टूट गया है। और मैंने देखा है कि जो लोग बोल देते हैं, उनका रिश्ता टूटा हुआ भी घर जाता है तो टूटा हुआ नहीं रहता। जो लोग नहीं बोलते, वो ज़िंदा रहते हैं पर मरे हुए जैसे।
रहमत बाबा ने कहा, तू चौबीस साल का है। तू चबूतरी पर नहीं बैठा पैंतालीस साल।
सही कहा, मैंने कहा। आप बैठे हैं। आप बताइए, इसमें क्या मज़ा है? रोज़ आना, बैठना, एक शब्द न कहना, फिर घर जाना। ये सज़ा है या आदत?
दोनों चुप।
मैंने कहा, अच्छा, फिर मैं बताता हूँ। और बाबा, ये सुनकर आप मुझे गली से निकाल सकते हैं, कोई बात नहीं।
मैंने घुटनों पर हाथ रखे।
पंद्रह साल पहले मेरे पापा ने एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया। उस काग़ज़ पर सिर्फ़ इलाज की बात लिखी थी, ऐसा उन्हें लगा। नीचे क्या था, उन्होंने देखा नहीं। और सात महीने बाद पता चला कि उस अंगूठे से पूरी गली बिक गई। मेरी माँ का इलाज चल रहा था इसलिए उन्होंने अंगूठा लगाया। वो ख़ुद को पंद्रह साल से कोस रहे हैं। और मैंने उनसे आज से पहले कभी नहीं पूछा कि पापा, क्या हुआ था।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
मैं पंद्रह साल से उस घर में रह रहा हूँ और मैंने अपनी माँ से कभी नहीं पूछा कि आप क्यों चुप हैं। मैंने सिर्फ़ ये मान लिया कि वो चुप हैं। आप दोनों भी यही कर रहे हैं। आपने मान लिया कि दूसरा बोलेगा नहीं। और वो भी यही मान बैठा। और मानने में आसानी है, बाबा, क्योंकि पूछने में गले पर चाकू चलता है।
बंसी बाबा की लाठी ज़मीन से खिसकी।
मैंने फ्रेम का टुकड़ा निकाला और अपनी हथेली पर रखा।
ये सुबह आपके हाथ से गिरा था। ये आधा है, बाबा। और जो चीज़ आधी रखी जाती है, वो टूटी इसलिए रहती है क्योंकि उसे जोड़ने वाला कोई नहीं होता।
रहमत बाबा की आँखें फ्रेम पर टिक गईं।
वो मेरी है, बंसी बाबा ने जल्दी से कहा।
आधी आपकी, मैंने कहा। और आधी किसकी?
चुप्पी।
रहमत बाबा ने अपना रूमाल खोला। उसमें दूसरा टुकड़ा था। बिल्कुल वैसा ही, उल्टा। उन्होंने उसे सामने फैलाकर रख दिया और हाथ खींच लिया, जैसे वो चीज़ आग की तरह जल रही हो।
मैंने दोनों टुकड़ों को साथ रखा।
वे मिलते थे। एकदम। बीच की लकड़ी टूटी हुई थी, पर किनारे ऐसे घूमते थे जैसे कोई साँस ले रहा हो।
तस्वीर में दो लड़के खड़े थे। दोनों युवा। दोनों के हाथ कंधों पर एक-दूसरे को छू रहे थे। उनके पीछे एक दुकान थी जिस पर एक बोर्ड था और बोर्ड पर जो लिखा था, उसका सिर्फ़ आधा हिस्सा बचा था, पर दो अक्षर साफ़ थे और दुकान के सामने खड़ी साइकिल का आधा हैंडल भी।
बंसी बाबा ने तस्वीर देखी और उनका चेहरा एक झटके में बूढ़ा हो गया।
रहमत बाबा ने देखा और उनकी आँखें भर आईं।
मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ देर के लिए सब कुछ सुनाई देना बंद हो गया — पीपल की पत्तियों की आवाज़, दूर स्कूल की घंटी, नाली में पानी का बहाव।
फिर बंसी बाबा बोले, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ नहीं थी जो लोग बुज़ुर्गों में सुनना चाहते हैं — वो प्यार नहीं था, वो डर था।
मेरी बहन का बेटा था।
मैंने पूछा, क्या था?
वो ज़ेवर। उन्होंने आँखें उठाईं। तेरे रहमत बाबा की बीवी ने उस रात अपनी चूड़ी उतारकर मेरी बेटी के हाथ में रखी थी। अपनी चूड़ी, बच्चा। अपनी, जो ब्याह में मिली थी। और सुबह जब संदूक खुला, तो सोने की चेन नहीं थी।
रहमत बाबा ने रूमाल कसकर मरोड़ा।
बंसी बाबा ने आगे कहा, सबने कहा कि उस रात घर में वो ही नई औरत थी। मैंने भी सुना। और मैंने मुँह नहीं खोला।
क्यों?
क्योंकि उस रात मुझे चेन का कुंडा मेरी बहन के बेटे की जेब में मिला था।
चबूतरी पर सन्नाटा।
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