The Mysterious Bell – Chapter 622
"बबलू भाई," मैंने कहा, "मेरा हाथ छोड़ो।"
उसने छोड़ दिया।
मैं टंकी के पीछे से निकला और आँगन के बाहर की तरफ़ बढ़ा। मेरे पीछे बबलू भी उठा, पर थोड़ी दूर रहा।
अस्पताल का आँगन — जहाँ सुबह की सभा हुई थी, जहाँ पीली दीवार पर तीन लाइनें लिखी थीं — उस आँगन में अब कुछ और था। दो आदमी। एक मोटा, एक दुबला। मोटे के हाथ में काग़ज़ों का बंडल, बगल में स्याही की डिब्बी। दुबले के हाथ में — ब्रश।
वो दुबला दीवार पर ब्रश चला रहा था। ऊपर, बड़े अक्षरों में। और मोटा पीछे खड़ा था, हाथ में एक काग़ज़ लिए, और उसे पढ़कर दुबले को बता रहा था।
मेरे पीछे से उस्ताद की आवाज़ आई।
"अंकुश।"
मैंने पलटकर देखा। उस्ताद अस्पताल के मुख्य दरवाज़े से निकल रहे थे, धीरे-धीरे, लाठी टेकते हुए। उनके पीछे डॉक्टर इसरानी और — हाँ — मीरा, जिसका कैमरा अब भी उसके हाथ में था पर लाल बत्ती बंद थी।
"क्या हो रहा है?" मैंने पूछा।
"मुझे भी पूछना है," उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "पर वो पहले बोलेंगे।"
हम दोनों ने दुबले आदमी की तरफ़ देखा। उसने दीवार पर बड़े-बड़े अक्षर लिखे — पर वो अभी पूरे नहीं हुए थे। सिर्फ़ ऊपर की दो लाइनें — "सूचना" और उसके नीचे कुछ जो मैं पढ़ नहीं पाया।
मोटे आदमी ने हमें देखा।
"तुम कौन हो?" उसने पूछा।
"मैं — " मैंने शुरू किया।
उस्ताद ने मेरी बाँह पकड़ ली। उनका इशारा था — ठहरो। मैं रुक गया।
"आप कौन हैं?" उस्ताद ने पूछा।
"नगरपालिका," मोटे ने कहा, और इतना सीधे कह दिया कि जैसे कोई रोज़ की बात हो। "आदेश आया है। सूचना लगानी है।"
"किसने भेजा?"
"ये मैं नहीं जानता। हमें बस लेकर आए हैं।" उसने अपने हाथ के काग़ज़ की तरफ़ देखा। "दो जगह लगानी है। एक अस्पताल के गेट पर, एक अस्पताल के बाहरी बोर्ड के पास।"
"क्या लिखा है?" मैंने पूछा।
मोटे ने मुझे देखा, फिर उस्ताद को देखा, फिर काग़ज़ को। जैसे वो सोच रहा हो कि ये पढ़ने की बात है या नहीं। फिर उसने कंधे उठाए और पढ़ना शुरू किया।
"सूचना — नूर अस्पताल, भोपाल पुरानी बस्ती।" वो थोड़ा हाँफा, फिर आगे पढ़ा। "यह सूचित किया जाता है कि उपरोक्त अस्पताल की इमारत और भूमि को विकास हेतु अधिग्रहित किया जा रहा है — " वो रुका, " — और अस्पताल में भर्ती सभी मरीज़ों को चौबीस घंटे के अंदर दूसरी जगह स्थानांतरित किया जाएगा। अस्पताल में नए मरीज़ स्वीकार नहीं किए जाएंगे।"
आँगन में पूरी तरह सन्नाटा हो गया।
मैं जानता हूँ कि ऐसे पल में आदमी को क्या सोचना चाहिए। दीवार, नोटिस, मोहर, काग़ज़, हकीम अली, सात नाम, आठवाँ पन्ना। पर मुझे कुछ नहीं सूझा। बस एक बात सूझी।
चौबीस घंटे।
माँ। इसी अस्पताल में। अभी भी, इसी इमारत में, पीली दीवार के पीछे, छोटे कमरे में, पलंग पर। और वो मरीज़ हैं। वो भर्ती हैं। उनका नाम भी उस सूची में है।
मेरे पीछे किसी ने साँस खींची। बबलू था।
"अरे — " वो धीरे बोला।
डॉक्टर इसरानी मेरे पास आए। उनका चेहरा — उनके चेहरे पर मैंने पहले कभी वैसा कुछ नहीं देखा था। वो कभी घबराते नहीं। कभी। पर आज उनके होठ काँप रहे थे, सफ़ेद मूँछों के नीचे।
"तीस साल," उन्होंने धीरे से कहा। "तीस साल से ये अस्पताल चल रहा है। मेरी बीवी — " वो रुके। उन्होंने गला साफ़ किया। "मेरी बीवी यहाँ नर्स थी। इन वार्डों में, इन बिस्तरों के बीच, उसने अपनी आधी उम्र बिताई। और आज ये — "
वो दीवार की तरफ़ देखते रहे।
"डॉक्टर साहब," उस्ताद ने धीरे से कहा। "चौबीस घंटे का मतलब चौबीस घंटे नहीं है।"
डॉक्टर इसरानी ने उनकी तरफ़ देखा।
"मतलब?"
"मतलब ये सूचना एक चाल है," उस्ताद ने कहा। "जब आदमी को जगह खाली करनी होती है, वो पहले सूचना लगाता है, फिर धीरे-धीरे दबाव बनाता है, फिर चीज़ें बदलनी शुरू करता है। अगर इन चौबीस घंटों में एक भी मरीज़ यहाँ से चला गया — तो ज़मीन खाली मान ली जाएगी। और खाली ज़मीन पर — " वो रुके। "खाली ज़मीन पर कुछ भी बन सकता है।"
मीरा मेरे पास आई।
"मैंने इसे रिकॉर्ड किया है," उसने धीरे से कहा। "दोनों आदमियों की आवाज़। काग़ज़ पढ़ने की। पर — "
"पर क्या?"
"पर कैमरा चल नहीं रहा," उसने कहा। "बैटरी है, स्टोरेज है, पर कुछ नहीं हो रहा। जैसे — जैसे कोई बाहर से बंद कर रहा हो।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी वहीं थी। पर वो हिल नहीं रही थी। चुप थी। ठंडी थी।
मैंने उसे उँगली से छुआ।
घंटी ने धीरे से कहा —
"यह काग़ज़ नहीं।"
मैं रुक गया।
"क्या?" मैंने बिना आवाज़ के कहा।
"यह काग़ज़ नहीं," घंटी ने दोहराया। "यह आवाज़ है। इसे काग़ज़ से नहीं, लोगों से हटाया जा सकता है।"
मैंने पीछे देखा। पूरी गली — जो सुबह की सभा में जमा थी — अब भी आँगन में खड़ी थी। लेकिन अब उनके चेहरे कुछ और थे। कोई डरा हुआ, कोई गुस्से में, कोई औरत अपने बच्चे को सीने से लगाए खड़ी थी।
बूढ़ी औरत — वही जो सीढ़ी पर बैठी थी, जिसका बेटा उसके पति के औज़ार बेचना चाहता था — बीच में खड़ी थी, और उसके हाथों में वो ज़ंग लगा बक्सा था जो उसके सीने से चिपका था।
वो मेरी तरफ़ देख रही थी।
मैंने उसकी आँखों में देखा।
और उस पल मुझे लगा कि वो बक्सा — बूढ़ी औरत का बक्सा, जिसमें उसके पति के बारह औज़ार थे और तेरहवीं चीज़ का राज़ — वो बक्सा अभी मेरे सामने खुला पड़ा है और मैं अंदर झाँक नहीं रहा।
"अंकुश।"
मैंने पलटकर देखा। उस्ताद थे।
"अंदर चल," उन्होंने धीरे से कहा। "ये सूचना बाहर की लड़ाई है। पर असली लड़ाई अंदर है, अभी।"
"क्या मतलब?"
उन्होंने मेरी तरफ़ एक टक देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "बबलू ने तुझे कुछ बताया। नहीं?"
मैंने सिर हिलाया।
"तो — " उन्होंने अपनी लाठी पर हाथ रखा। "उस बात को अंदर लेकर चल। अभी। क्योंकि ये सूचना आज नहीं लगी। ये सूचना आज सुबह लगी है। और आज सुबह — " उन्होंने पीली दीवार की तरफ़ देखा। "सुबह हम सब यहाँ थे। इसका मतलब जो आदमी ये सूचना भिजवा रहा है, वो जानता है कि हम यहाँ हैं, वो जानता है कि हम क्या कर रहे हैं, और वो जानता है कि हम अभी रुके हुए हैं।"
"और बक्सा?"
उस्ताद ने मेरी आँखों में देखा।
"और बक्सा," उन्होंने कहा, "वहीं है जहाँ ये सूचना चिपकी है।"
मेरी जेब में घंटी ज़ोर से बजी।
इस बार पूरी तरह।
दीवार पर ब्रश रखकर दुबला आदमी पीछे हट गया था। और उस नए लिखे अक्षरों के नीचे एक हस्ताक्षर थे — नीली स्याही में, बड़ी नीची लकीर के साथ। मैंने उसे पहचानने की कोशिश की — "चंद्रेश" तक पढ़ा और फिर आँख आगे नहीं जा पाई।
पर उससे ज़्यादा मुझे वो चीज़ खींच रही थी जो उस सूचना के ठीक ऊपर थी।
दो पंक्तियाँ पहले से दीवार पर थीं — पुरानी, मिटी हुई, "जोड़ना बंद करो"।
और उसी के नीचे, नई सूचना।
जैसे किसी ने जान-बूझकर पुराने संदेश को नए काग़ज़ से ढक दिया हो।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "वो सूचना जो जगह है — उसके पीछे क्या है?"
उसने पलक झपकाई।
"क्या मतलब?"
"जब कोई काग़ज़ चिपकाता है, वो किसी चीज़ को ढकने के लिए चिपकाता है। वो चीज़ ढकी हुई है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर दीवार की तरफ़। उसकी आँखें फैलीं।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "तू ये कहना चाहता है कि — "
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno