The Mysterious Bell6 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 6

7 min read November 5, 2026

गर्मी है। बस गर्मी है। आज दिन भर धूप में रहा हूँ। मेले में धूल खाई है, सिर पर तेज़ धूप पड़ी है, पानी भी ठीक से नहीं पिया। बस इसीलिए कान में बज रहा है।

हाँ, यही बात है। कान में बजना आम बात है। किसी को भूख लगती है, किसी को चक्कर आता है, और किसी के कान में बजता है। मेरे कान में बजा। बस इतनी सी बात।

मैंने घंटी को देखा।

"तू ऐसा मत कर," मैंने धीरे से कहा, जैसे घंटी को डाँट रहा हूँ। "समझ गया, तू कुछ बोलती है। पर मैं आज नहीं सुनूँगा। आज मैं थका हुआ हूँ।"

घंटी चुप रही। पीतल पर चाँद की रोशनी पड़ रही थी, और अंदर कहीं एक बहुत छोटी सी झलक थी, जैसे अंधेरे में किसी सिक्के का कोना।

मैंने घंटी जेब में रखी और साइकिल का हैंडल पकड़ा। इस बार साइकिल भारी नहीं थी। या शायद थी, पर मैंने ध्यान नहीं दिया। मैं चल पड़ा।

गली के मोहाने तक पहुँचा तो मुझे प्यास लगी। सच में लगी। गला सूख रहा था, जैसे मेले की धूल अब तक हलक में बैठी हो।

मोहाने वाले मोड़ पर पुराना नल है, पत्थर के टैंक के पास, जहाँ सुबह-शाम लोग पानी भरते हैं। रात में वहाँ कोई नहीं होता। मैंने साइकिल खड़ी की और नल खोला। पानी गरम था, क्योंकि पाइप धूप में पड़ा था। फिर ठंडा आया।

मैंने मुँह में पानी डाला। दो घूँट। फिर तीन। फिर पूरा हाथ भर कर पीया।

और फिर मैंने दोनों हाथों में पानी लेकर अपना मुँह धोया। पानी गर्दन से नीचे बह गया, कमीज़ भीग गई।

मैंने अपना चेहरा टैंक के ऊपर की तरफ़ देखा। पानी में मेरा चेहरा हिल रहा था, टूट रहा था, फिर जुड़ रहा था।

"देखा," मैंने अपने आप से कहा। "सब ठीक है। तू थका है, बस।"

मैंने मुँह पोंछा। गीली कलाई से बाल पीछे किए।

और फिर मैंने जेब से घंटी निकाली।

क्योंकि मुझे अंदर से एक बात साल रही थी। जो आदमी शक करता है, वो दोबारा परखता है। मैं साइकिल मिस्त्री हूँ। मैंने ज़िंदगी में हज़ार चीज़ें ठीक की हैं, और मैंने एक बात सीखी है — अगर कोई चीज़ एक बार अजीब करे, तो उसे दोबारा करके देखो। अगर दोबारा वही हो, तो वो अजीब नहीं है, वो सच है। अगर दोबारा कुछ न हो, तो तेरा दिमाग ख़राब है, और तू सो जा।

मैंने घंटी को दूर से देखा। फिर करीब से। फिर मैंने उसे उँगली से हल्का सा छुआ।

कुछ नहीं हुआ।

मैंने हिम्मत की और अँगूठे से दबा दिया।

घंटी बजी। इस बार भी वो वैसे ही बजी — बाहर से नहीं, अंदर से, जैसे किसी ने उसे अंदर से पकड़कर हिलाया हो। हथेली में वो झनझनाहट फिर फैली, कलाई तक।

और फिर आवाज़ आई।

"सुन, मैं बुखार नहीं हूँ।"

मैंने घंटी को गिराते-गिराते बचाया। हाथ काँप रहा था।

"मैंने कहा था न," आवाज़ फिर बोली, धीमी, रूखी, जैसे कोई बहुत सालों से न बोला हो और आवाज़ को अभी आदत न हो। "अब मत बजाना।"

मैं कुछ नहीं बोल पाया।

"तू सोचेगा कि गर्मी है, धूप है, सिर में चक्कर है," आवाज़ ने कहा। "पर तू सिर्फ़ एक चीज़ से बच रहा है — ये मानने से कि मैं हूँ।"

मैंने पानी की तरफ़ देखा, टैंक की तरफ़, पेड़ की तरफ़। मेरे होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

"तू डर गया," आवाज़ ने कहा। इसमें कोई मज़ाक नहीं था। कोई तरस भी नहीं। बस एक ठंडा सच। "डरना बंद करने के लिए मुझे दोबारा बजाया। अब पता चला तो फिर डर गया। सुन, ये आगे भी ऐसे ही चलेगा अगर तू समझ नहीं रहा।"

मैंने घंटी को देखा और मेरे मुँह से निकला, "तू है कौन?"

घंटी चुप हो गई।

"अरे, बोल ना," मैंने कहा। "मैंने पूछा तू कौन है?"

चुप।

"देख," मैंने कहा, थोड़ा गुस्से में। "तू मेरी जेब में है। मेरी घंटी है तू। और जो मेरी चीज़ हो और मेरे सवाल का जवाब न दे, उसका रखना बेकार है।"

इस बार जवाब आया। पर वो जवाब नहीं था जो मैं चाहता था।

"तू मुझे मेरी जेब से निकाल सकता है," आवाज़ ने कहा। "निकाल। रख दे उस साइकिल के ब्रैकेट पर। और चला जा।"

मैं रुक गया।

क्योंकि ये बात मुझे चुभ गई। जैसे किसी ने मुझे कह दिया हो — जा, भाग जा। और मुझे भागना पसंद नहीं है। कभी नहीं था।

"नहीं," मैंने कहा। "मैं नहीं जाऊँगा।"

"तो सीधा खड़ा हो," आवाज़ ने कहा। "काँपना बंद कर।"

और फिर वो चुप हो गई।

मैं वहीं खड़ा रहा। पानी टपक रहा था, नल से, टैंक से, मेरे हाथ से। मेरा दिल धड़क रहा था, और मुझे लग रहा था कि मेरी हड्डियों में कुछ ठंडा बह रहा है।

और फिर, किसी अजीब वजह से, मुझे हँसी आ गई।

सच में। मैं वहीं खड़ा हँसने लगा। रात के ग्यारह बजे, खाली नल के पास, हाथ में पुरानी पीतल की घंटी, और मैं हँस रहा हूँ।

क्योंकि मेरे दिमाग़ में एक ही बात आ रही थी — मेला आज, दो सौ रुपये, जंग लगी साइकिल, और उसमें एक बातूनी घंटी फ्री। कबाड़ी बूढ़े ने मुझे ठगा नहीं, उसने मुझे पूरा पैकेज दिया।

"अच्छा," मैंने घंटी को जेब में डालते हुए कहा। "तो तू बोलती है। ठीक है। कोई और होता तो डर के मारे साइकिल छोड़कर भाग जाता। पर मैं डरता नहीं।"

मैंने साइकिल का हैंडल पकड़ा।

"मैं सिर्फ़ थोड़ा सा डरता हूँ," मैंने कबूल किया, क्योंकि मेरी आदत है सच बोलने की, चाहे अपने आप से ही। "पर तू जान ले — जो डरता है, वो भागता है। जो डरता है और भागता नहीं, वो मज़बूत होता है। और मैं आज किसी के आगे नहीं भागने वाला।"

मैंने साइकिल घसीटी, और आगे बढ़ा।

उस वक़्त मुझे लगा कि बात ख़त्म हो गई। मैंने घंटी से बात कर ली, घंटी ने मुझे जवाब दे दिया, अब सब ठीक है। आम आदमी का दिमाग़ ऐसे ही काम करता है — जो डरावनी चीज़ सामने आ जाए, उससे बात कर लो, फिर लगता है कि बात ख़त्म।

पर घंटी ने मेरे बारे में कुछ जान लिया था। वो जान गई थी कि मैं भाग सकता हूँ। और उसने मेरा इम्तिहान लिया।

मैं गली के बीच में पहुँचा था, पीपल के पेड़ से करीब पचास कदम आगे। साइकिल घसीट रहा था, जंग लगी, टायर खाली, पहिया रगड़ खा रहा था। रात की चुप्पी में वो आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी — जैसे कोई पुरानी चीज़ ज़मीन पर अपना पेट घसीट रही हो।

और फिर मेरे अंदर एक सोच आई। बहुत बुरी सोच।

अगर घंटी बोलती है, तो घंटी चीज़ है। और अगर घंटी चीज़ है, तो वो मेरी नहीं हो सकती। मैंने उस घंटी को कबाड़ी से खरीदा नहीं। मैंने साइकिल खरीदी थी। घंटी अलग से मिली थी। किसी और की चीज़ मेरे पास है।

और जो चीज़ किसी और की हो और बोलती हो, उससे मैं दूरी रखना चाहता हूँ। अभी मेरे पास माँ की पर्ची है, पापा की चुप्पी है, काजल की भरी आँखें हैं, और भारद्वाज कंस्ट्रक्शन पीछे मिट्टी डाल रहा है। मुझे एक बोलती घंटी की नहीं, सोचने के लिए एक रात की ज़रूरत है।

मैंने साइकिल हैंडल से छोड़ दी।

वो ढह गई, थोड़ी कटी, कटकर सड़क पर पड़ गई। जैसे कोई थका हुआ जानवर लेट जाए।

और मैं मुड़कर तेज़ कदमों से घर की तरफ़ चल पड़ा।

तेज़ कदम। बहुत तेज़।

इतने तेज़ कि मुझे खुद पर शर्म आ रही थी, पर मैं रुका नहीं। मेरी पीठ पर एक एहसास था जैसे उस साइकिल के ब्रैकेट से कोई देख रहा हो। ब्रैकेट खाली था, मुझे पता था, पर मैं मुड़कर देखना नहीं चाहता था। मुड़कर न देखना ही बहादुरी है, यही मैं अपने आप को बता रहा था। ये भी एक झूठ ही था, पर उस वक़्त वो झूठ ज़रूरी लग रहा था।

मैं गली के आख़िरी मोड़ पर पहुँचा, जहाँ से मेरा घर दिखता है।

और तभी जेब में घंटी बजी।

अपने आप। मैंने उसे छुआ भी नहीं। मेरे हाथ जेब से बाहर थे, मैं तेज़ चल रहा था।

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