The Mysterious Bell – Chapter 534
आँगन में एक तरफ़ आसमान हल्का होने लगा था। सुबह के पाँच बजे वाली हवा में वो गंध होती है जो नए दिन का वादा करती है — घास, धुआँ, और ठंडी मिट्टी। मैंने वो गुनगुना गिलास उठाया। पानी उसमें से बहा दिया और गिलास वापस रख दिया।
पर इस बार मैंने उसे वहीं नहीं छोड़ा। मैंने उसे अपनी जेब में डाल लिया।
मीरा कमरे से बाहर आई।
"क्या बात हुई?"
"पापा जाग रहे थे।"
"और?"
"और उन्होंने सब बताया। बिना पूछे बताया। पहली बार।"
मीरा ने मेरे चेहरे को देखा।
"तू रो रहा है।"
"बकवास," मैंने कहा। "सुबह की हवा लगी है आँखों में।"
"अंकुश।"
"हाँ, ठीक है। थोड़ा।" मैंने हथेली से आँख पोंछी। "पर यह वाला अच्छा रोना है। तू समझेगी नहीं।"
"समझती हूँ," मीरा ने कहा। फिर उसने जेब से अपना मोबाइल निकाला। "मैंने उस नंबर पर ट्राई किया। बंद है। प्रीपेड नंबर था। जिस नाम पर खरीदा गया, वो भी नहीं मिला — सिर्फ़ एक पुराना पता है। पुराने बाज़ार के पास, जहाँ साइकिल की दुकानें थीं।"
मेरे कान में वो लाइन बजी।
रजिस्ट्री का आदमी।
पुराने बाज़ार।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू कुछ सोच रहा है।"
"सोच नहीं रहा," मैंने कहा। "गिन रहा हूँ।"
"क्या?"
"जो लोग मेरी ज़िंदगी में चुपचाप आ रहे हैं — वो सब एक ही बाज़ार से आते हैं। पुराना बाज़ार। पुरानी साइकिल की दुकानें। जहाँ से इलियास आया। जहाँ से सलीम आया। जहाँ से जंग लगी साइकिल आई। जहाँ दादा की दुकान थी।"
"मतलब तेरी कहानी के सारे सुराग़ एक ही गली से होकर आते हैं?"
"मतलब यह कि वहाँ ज़रूर कोई ऐसा आदमी बैठा है जो पचास साल से इस कहानी को जोड़ रहा है। और उसे मेरी ज़रूरत नहीं है पहले से जानने के लिए। वो बस गवाह है। और वो आज मुझे गवाही देने आया था।"
तभी माँ की आवाज़ आई।
"चूल्हे पर दो रोटियाँ पड़ी हैं, और यहाँ आँगन में दो जासूस खड़े हैं। यह क्या हो रहा है भगवान?"
मैं हँस पड़ा।
मैं आँगन में गया। माँ चूल्हे पर रोटी रख रही थीं। उनकी साड़ी का पल्लू आज कमर में नहीं था, बल्कि सिर से खिसककर बगल में आ गया था। बैसाखी उनके हाथ के पास टिकी थी।
"माँ," मैंने कहा। "कोई रात आया था।"
वो रुकीं।
"कौन?"
"एक बूढ़ा। लकड़ी के जूते। चाय पीकर गया।"
माँ ने चूल्हे की पहली रोटी पलट दी। एक पल सोचकर बोलीं, "तो फिर उसे चाय तो पूछनी चाहिए। किसी के घर में रात को कोई चुपचाप आए, तो चाय पूछने से घर बड़ा होता है, छोटा नहीं।"
मैं हँस पड़ा। ठीक वैसे ही जैसे बारह साल का लड़का हँसता है जब माँ उसके सामने कुछ ऐसा कह दे जो बिलकुल सीधी-सी बात हो पर सबसे चतुर दिमाग़ वाली बात हो।
"अगली बार," मैंने कहा, "अगली बार मैं खुद दरवाज़े पर खड़ा मिलूँगा। तब कोई चुपचाप नहीं आएगा।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो हर माँ की आँखों में होता है जब उसका बेटा दरवाज़े पर खड़ा होने की बात करता है।
"खड़ा रहेगा," उन्होंने कहा। "पर पहले नाश्ता कर।"
तभी हवा में कोई दौड़ता हुआ आया। साँस फूली हुई। पैर सड़क से जैसे अभी नहीं, बल्कि लुढ़कते हुए आए थे। मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
टिंकू था।
उसके घुटने पर पट्टी फिर से खुली थी, बाल हवा में उड़ रहे थे, और आँखें इतनी बड़ी हो गई थीं कि लग रहा था सारी दुनिया उनमें सिमट गई है।
उसने मुझे देखा। वो एक पल के लिए रुका — जैसे हाँफने के लिए या कुछ सोचने के लिए। फिर उसने पीपल की तरफ़ इशारा किया।
"उस्ताद," वो हाँफते हुए बोला।
मेरा पेट कस गया।
"क्या हुआ?"
"पीपल। चबूतरी।"
"कौन?"
"बबलू।"
मैं एक पल के लिए चुप हो गया।
"बबलू क्या कर रहा है चबूतरी पर?"
टिंकू ने एक गहरी साँस ली।
"बैठा है," उसने कहा। "पान चबा रहा है। और, और उस्ताद—"
"बोल।"
"और उसके हाथ में हमारी घंटी है।"
यह शब्द मेरे कान में इतनी ज़ोर से गिरे कि मुझे लगा आसपास का सारा शोर एक साथ चुप हो गया है। माँ ने चूल्हे पर से हाथ नहीं हटाया, पर वो वहीं रुक गईं। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। और मैंने जेब में हाथ डाला — गरम पीतल का छोटा टुकड़ा वहीं था, गरम, बैचेन, जैसे वो भी सुन रहा हो।
"तूने देखा खुद?" मैंने पूछा।
"देखा। दूर से। वो चबूतरी पर बैठा है। दो आदमी साथ हैं। और उसके हाथ में—"
"वो पीतल की घंटी है?"
टिंकू ने सिर हिलाया। उसकी आँखें भरी हुई थीं। वो डर की वजह से नहीं भरी थीं। वो इसलिए भरी थीं कि वो गली का बच्चा है और उसने देखा कि उसके उस्ताद की चीज़ किसी और के हाथ में है — और वो चुप नहीं रह सका।
मैंने उसे कंधे से पकड़ा।
"टिंकू," मैंने कहा। "साँस ले। धीरे।"
"उस्ताद, वो—"
"साँस ले।"
वो एक लंबी साँस लेने लगा। मैंने उसे अपने सामने खड़ा रखा।
"अब बता," मैंने कहा। "कितनी दूर से देखा?"
"पीपल की जड़ के पास से। सानिया ने देखा पहले। सानिया दौड़कर मेरे पास आई। वो कह रही थी कि उसके हाथ में कुछ पीतल जैसा है। मैंने दौड़कर देखा।"
"कितने आदमी हैं?"
"तीन। बबलू और उसके साथ दो। एक लाठी वाला। एक काला बैग वाला। वही दो आदमी जो उसके साथ पहले भी आए थे।"
"कोई और?"
"चबूतरी के पीछे, पीपल की दूसरी तरफ़, एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी है। पर उसमें कोई नहीं दिख रहा।"
मैंने एक लंबी साँस ली।
अब यह साफ़ हो रहा था। यह कोई चोरी नहीं थी। यह कोई पुरानी बात नहीं थी। यह एक खुला न्योता था।
घंटी को जान-बूझकर, सरेआम, चबूतरी पर बैठकर हिलाना — इसका मतलब एक ही था। यह कह रहे थे — आ, ले जाकर दिखा हिम्मत है तो।
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
"मैं जा रहा हूँ।"
"जाना है तो जा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ज़ोर था जो अब कम नहीं होता। "पर वादा कर — जो हाथ मिले, उसे तू हाथ से नहीं, दिमाग़ से हराएगा। मैंने आज तक किसी को बाज़ू से नहीं जीता।"
मैंने सिर हिलाया।
उस पल मैंने पीछे मुड़कर पापा की खिड़की की तरफ़ देखा। परदा हट गया था। पापा खिड़की के पास खड़े थे — शर्ट पहने, चश्मा पहने, एक हाथ में वो पुरानी रिंच। उनके चेहरे पर कुछ नहीं था। पर उनका सिर एक बार ज़रा-सा ऊपर उठा, जैसे कह रहे हों — जा, मैं यहीं हूँ। तेरे पीछे नहीं, तेरे साथ हूँ, बस पीछे।
मैं आँगन से बाहर निकला।
मीरा पीछे थी।
टिंकू आगे।
और पीपल की तरफ़ जाती गली की हवा में कुछ था जो मुझे पहले से वाकिफ़ था — वो हवा जो चबूतरी के पास जाते वक़्त हमेशा होती है, जब कुछ होने वाला हो। पीपल के पत्तों की खड़खड़ जो अब तेज़ होने लगी थी। दूर किसी दरवाज़े का बंद होना। और नाली के किनारे किसी कुत्ते का भौंकना जो अचानक रुक गया।
हम तेज़ चल रहे थे।
मेरे जेब में गरम पीतल का टुकड़ा वो ठंडा नहीं हो रहा था। जैसे वो भी उस घंटी की तरफ़ खिंच रहा हो। जैसे वो भी जानता हो कि आज मंच पर नहीं, चबूतरी पर कुछ बड़ा होने वाला है।
मैंने टिंकू से पूछा, "क्या बबलू कुछ बोल रहा था?"
टिंकू ने साँस अंदर खींची।
"वो ज़ोर से हँस रहा था। और कह रहा था — आज यह घंटी अपने मालिक का इंतज़ार करेगी, पर मालिक को पता होगा कि यह उसकी नहीं, हमारी है।"
मैं रुका नहीं। चलता रहा। पर मेरे अंदर एक चीज़ सिकुड़ गई।
रजिस्ट्री का आदमी, वो बूढ़ा, उसने कहा था — घंटी उसी के पास है जो घर का सबसे पुराना दरवाज़ा जानता है। और वो दरवाज़ा तुझसे ज़्यादा उसका है।
यह सब जुड़ रहा था।
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