The Mysterious Bell – Chapter 525
चाय हमने आँगन में बैठकर पी। पापा अंदर थे, बैठक में, औज़ार पोंछ रहे थे। उन्होंने बाहर नहीं झाँका। पर मैं जानता था कि वो सब सुन रहे हैं। पापा की एक आदत है — वो बाहर नहीं आते, पर दरवाज़े की तरफ़ कान रख देते हैं।
चाय खत्म करके मैं उठा।
"कहाँ जा रहा है?" माँ ने पूछा।
"दुकान।"
"कुछ ठीक नहीं है?"
माँ से कुछ छिपाना… इंसान घर में दो ही चीज़ें नहीं छिपा सकता। एक, चोट। दूसरी, भूख। बाकी सब छिप जाता है।
"ठीक है," मैंने कहा।
"झूठ बोल रहा है।"
"…हाँ।"
"तो जब बोल सके, बोल देना," उसने कहा और बैसाखी के सहारे अंदर चली गई। "और सुन — आज कुछ खाया नहीं तो मैं दुकान पर आ जाऊँगी। मुझे घसीटते हुए आने में शर्म नहीं आएगी।"
"आ गई तो मैं शटर बंद कर दूँगा।"
"कर लेना।"
यही मेरी माँ है।
दुकान का शटर उठाया तो सामने उस्ताद अली बक्श खड़े थे।
இतने सुबह? उनके हाथ में कैंची थी, चश्मा कान पर टिका था और सिलाई मशीन की टिक-टिक दुकान से आ रही थी — जैसे कोई बूढ़ा दिल धीरे-धीरे चल रहा हो।
"देर की," उन्होंने कहा।
"अभी सात भी नहीं बजे, उस्ताद।"
"मैं पाँच बजे से खड़ा हूँ।"
मैंने शटर पूरा उठाया। "अंदर आइए।"
वो अंदर आए, कुर्सी पर बैठे, कैंची मेज़ पर रखी। फिर बोले, "निकाल।"
"क्या?"
"जो जेब में है।"
मैंने धागा निकाला। दो खुली गाँठें, बीच में खाली जगह। उस्ताद ने उसे अपनी हथेली पर रखा, ध्यान से देखा जैसे कोई सिलाई की सीध नाप रहा हो।
"धागा सही है," उन्होंने कहा। "बँधा ठीक था।"
"मैं जानता हूँ।"
"तो फिर रो क्यों नहीं रहा?"
"रोने से घंटी लौटती है, उस्ताद?"
उन्होंने धागा वापस मेरी तरफ़ सरकाया। "नहीं। रोने से सिर्फ़ आँखें साफ़ होती हैं। कभी-कभी उससे ज़्यादा ज़रूरी चीज़ भी साफ़ हो जाती है।"
मैंने धागा गले में बाँध लिया। खाली धागा। कुछ लोग पहनते हैं सिक्का, कुछ पहनते हैं ताबीज़। मैंने खालीपन पहन लिया।
"उस्ताद," मैंने कहा, "एक बात सीधी पूछूँ? घंटी अगर किसी और के हाथ में हो, तो क्या वो कुछ कर सकती है?"
"कुछ नहीं।"
"और अगर वो उसे तोड़ दें?"
उस्ताद चुप रहे। मशीन की टिक-टिक रुक गई। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और मुझे लगा कि मैंने कोई बहुत बुरा सवाल पूछ लिया है।
"तोड़ने से कुछ नहीं होता," उन्होंने कहा। "घंटी पीतल की है। पीतल तोड़ी जा सकती है, जोड़ी जा सकती है। घंटी की भीतर वाली आवाज़ — वो तोड़ी नहीं जा सकती। वो सिर्फ़ सुनी जा सकती है, या अनसुनी कर दी जा सकती है।"
"और अनसुनी करने वाला?"
"अनसुनी करने वाला बहरा नहीं होता, बेटा। वो सिर्फ़ डरता है कि सुन लेगा तो क्या करना पड़ेगा।"
तभी दरवाज़े पर टिंकू आया, पीछे सानिया और गुड्डू। तीनों के चेहरे पर अलग-अलग तरह की घबराहट थी।
"उस्ताद," सानिया ने कहा, "गली के मुँह पर एक सफ़ेद कार आधे घंटे से खड़ी है।"
"कौन?"
"अंदर कोई बैठा है, बाहर कोई नहीं।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसने कहा, "तारीख़ वाली माचिस मेरे पास है।"
"अच्छा है, संभाल।"
"उस्ताद," सानिया फिर बोली, "एक बात और। सुबह छह बजे पीपल पर जो तीन अनजान बुज़ुर्ग बैठे थे, वो अब नहीं हैं। पर उनकी जगह पर पीपल के नीचे एक लिफ़ाफ़ा पड़ा है।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। "लिफ़ाफ़ा कोई अनजान नहीं छोड़ता," उन्होंने कहा। "लिफ़ाफ़ा हमेशा जानने वाले छोड़ते हैं।"
वो लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा था।
सादा, भूरा, बिना नाम। अंदर एक काग़ज़ — जिस पर सिर्फ़ एक लाइन।
"जो रविवार को अपनी याद लाएगा, वो बाक़ी सब खो देगा।"
मैंने उसे पढ़कर टिंकू को दिया। टिंकू ने पढ़ा, फिर सानिया को। सानिया ने पढ़ा, फिर चुपचाप वापस मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"डराने की कोशिश है," उस्ताद ने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "ये डराने की कोशिश नहीं है, उस्ताद। ये बताने की कोशिश है कि उन्हें पता है कि मैं क्या करने वाला हूँ।"
"और ये अच्छी बात है?"
"बहुत अच्छी। जो बंदा आपके अगले कदम का नाम पहले बता दे, वो आम तौर पर वो पहला कदम खुद ही नहीं रोक पाता।"
उस्ताद मुस्कुराए। बड़ी मुश्किल से, जैसे कोई पुरानी मशीन आवाज़ निकाले। "अब तू मेरे जैसा बोलने लगा।"
"आपके पास बैठकर क्या करूँगा।"
दस बजे से पहले गली में खबर फैल गई।
मैंने शटर खुला रखा और दुकान के सामने वही टूटी लकड़ी की मेज़ रखी, जिस पर जोड़ केंद्र का बोर्ड टिका था। आज बोर्ड नहीं था। आज मेज़ पर सिर्फ़ वो भूरा लिफ़ाफ़ा था।
लोग आते गए।
पहले भोला भाई आए, अपनी लाठी लेकर। फिर नसीमा बाई अपनी दुकान का ताला आधा लगाकर। फिर वो बूढ़ा जो रोज़ चबूतरी पर बैठता है और किसी से कुछ नहीं बोलता। फिर शबनम आपा, हाथ में चिमटी, चेहरे पर वो भाव जो कहता है — मुझसे उलझना मत।
"क्या हुआ?" शबनम आपा ने कहा। "सुबह-सुबह सारी गली में खबर है कि तेरी घंटी गई।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"सच है?"
"हाँ।"
"किसने ली?"
"अभी नहीं बताऊँगा।"
"तू बता, मैं उसकी गुमटी में चाय में नमक डाल दूँगी।"
भीड़ हँसी। मैं भी हँसा। कुछ हँसी ऐसी होती है जो दर्द को ढकने के लिए नहीं, दर्द के साथ चलने के लिए होती है।
फिर मीरा आई।
उसके हाथ में कैमरा था, कंधे पर फटा बैग, बाल उड़ रहे थे, और आँखों में वो चमक थी जो उसे देखकर मुझे हमेशा लगता है — ये औरत या तो कोई बहुत बड़ी खबर लाई है, या बहुत बड़ी मुसीबत।
"अंदर आ," मैंने कहा।
"सबके सामने दिखाऊँगी," उसने कहा। "सबको देखना चाहिए।"
उसने कैमरा मेज़ पर रखा और उसकी छोटी स्क्रीन घुमाई।
"कल के समारोह की रिकॉर्डिंग," उसने कहा। "मैंने मंच के सामने से नहीं, बगल से शूट किया था। पीछे से।"
स्क्रीन पर रणवीर भारद्वाज के सफ़ेद कपड़े, मंच, तालियाँ, और बीच में मैं — उनके गले लगा हुआ।
मीरा ने उँगली से स्क्रीन पर एक जगह दबाई और तस्वीर धीमी कर दी।
धीरे-धीरे, एक-एक फ़्रेम।
उनका हाथ मेरे कंधे पर।
फिर नीचे।
फिर मेरी जेब के पास।
फिर मेरी जेब के अंदर।
फिर बाहर।
और बाहर आते वक़्त उनकी उँगलियों के बीच कुछ था। छोटा। पीतल जैसा।
भीड़ में कोई बोला — "अरे…"
शबनम आपा ने चिमटी मेज़ पर पटक दी। "ये तो…"
"ये सबूत है," मीरा ने कहा, आवाज़ ऊँची, साफ़। "ये इल्ज़ाम नहीं है। ये सबूत है। मैं इसे आज शाम तक अपने चैनल पर डाल सकती हूँ।"
गली में सन्नाटा छा गया। ऐसा सन्नाटा जिसमें पंखे की आवाज़ भी बड़ी लगती है।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
और मैंने "नहीं" कहा।
"क्या?"
"नहीं डालोगी।"
वो पीछे हटी, जैसे मैंने उसे थप्पड़ मारा हो। "तू पागल है?"
"हो सकता है। पर सुन।"
"मैं सुनने नहीं आई, मैं करने आई हूँ। ये वीडियो मिल गया है अंकुश। मिल गया है। तुझे पता है इसका मतलब क्या है? पूरा शहर देखेगा कि—"
"पूरा शहर देखेगा कि रणवीर भारद्वाज ने एक साइकिल मरम्मत वाले के गले लगते वक़्त उसकी जेब से कुछ निकाला। और फिर?"
"फिर लोग सच जानेंगे!"
"नहीं। फिर लोग कहेंगे — दोनों में कुछ पुराना हिसाब है। आधे कहेंगे मैंने झूठ बोला, आधे कहेंगे रणवीर ने चोरी की, और दोनों आधे आपस में लड़ेंगे। मीरा, मैंने कल मंच पर कहा था कि मैं किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगाऊँगा। अगर आज मैं वही करूँ, तो कल की मेरी बात का कोई मोल नहीं बचेगा।"
"तो क्या करेगा? अपनी घंटी भूल जाएगा?"
"घंटी भूलने की चीज़ नहीं है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ पहली बार थोड़ी कड़ी हुई। "घंटी मेरे गले में है। खाली। और मैं उस खालीपन को दिखाकर सबको बुलाना चाहता हूँ, किसी को कटघरे में खड़ा करके नहीं।"
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