The Mysterious Bell – Chapter 420
मैंने उसे हथेली पर रखकर देखा।
"तू किससे टूटा है?" मैंने धीरे से पूछा। "लोहे से, या तोलने वाले के हाथ से?"
घंटी जेब में थी। वो खुद नहीं बजी। पर मुझे लगा जैसे उसने कुछ कहा हो, बिना आवाज़ के।
मैंने पलड़ा वापस रखा और चारपाई पर लेट गया।
छत पर पंखा नहीं था। बस एक पुराना बल्ब था, जो कभी तेज़, कभी धीमा होता था। और उसकी रोशनी में मुझे अपने हाथ दिख रहे थे — ग्रीस से भरे, उँगलियों के नाखूनों के नीचे काली लकीरें, और हथेली पर एक पुराना सफ़ेद निशान, जो पंद्रह साल पहले पीतल का टुकड़ा जोड़ने के बाद आया था।
मैंने हाथ बंद कर लिया।
सुबह मुझे नींद नहीं आई थी। पर जब आँख खुली, तो सूरज निकल चुका था और गली में बच्चों की आवाज़ें थीं।
टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था।
"उस्ताद! उठिए! नसीमा आंटी की दुकान पर आज सुबह कोई नहीं आया। साजिद कह रहा है कि दो बोरी आटा गीला हो गया।"
मैं उठा।
और मुझे पता था कि दिन शुरू हो गया है।
दिन भर मैंने जोड़ केंद्र नहीं खोला। टिंकू ने पूछा भी, पर मैंने कहा, "आज केंद्र नहीं। आज सिर्फ़ तैयारी।"
पीपल के नीचे मैंने खुद चबूतरी साफ़ की।
सानिया और रफ़ीक़ ने दीये लाकर रखे। गुड्डू ने पुरानी चटाई बिछाई। चिंटू ने शबनम आपा की गुमटी से एक बड़ी पीतल की थाली उठाई, जिसमें मैंने वो टूटा पलड़ा रख दिया। नसीमा बाई का पलड़ा।
और उसके पास, एक दूसरी थाली में, मैंने टूलकिट से वो सब निकालकर रखा जो उन्होंने कभी नहीं देखा था — छोटी रिंच, पेचकस, रेती, और एक मोटा बोल्ट।
टिंकू ने पूछा, "ये किसलिए?"
"ताकि तराज़ू देख सके कि हमारे पास क्या है," मैंने कहा।
वो समझ नहीं पाया।
"टिंकू," मैंने कहा, "जब कोई इंसान अपनी टूटी चीज़ लेकर आता है, तो वो सिर्फ़ चीज़ नहीं लाता। वो अपना सबसे बड़ा डर लाता है। और अगर हम उस डर को उसी वक़्त ठीक कर दें, तो वो इंसान फिर कभी सच नहीं बोलेगा।"
"तो क्या करना है?"
"उसे अपने हाथ से ठीक करने देना।"
टिंकू ने कुछ सोचा।
"मतलब आज मरम्मत मैं करूँगा?"
"नहीं। आज मरम्मत वो दोनों करेंगे। मैं सिर्फ़ हाथ बताऊँगा।"
शाम छह बजे पीपल के नीचे दीये जल उठे।
हवा थी, इसलिए सानिया ने दीयों के चारों तरफ़ मिट्टी की छोटी दीवार बनाई। गुड्डू ने पीछे से पुरानी चादर तान दी, ताकि हवा सीधी लौ पर न लगे। रफ़ीक़ ने एक तरफ़ बाल्टी में पानी भरकर रखी, "आग लगे तो", और चिंटू ने कहा कि पहले आग लगेगी तब पता चलेगा पानी कितना काम आता है।
बच्चे हँसे।
पर हँसी धीमी थी। सब जानते थे कि आज शाम कुछ और होने वाला है।
सात बजने से पहले नसीमा बाई आईं।
उनके हाथ में वो पुरानी लाल कवर वाली कॉपी थी, और कंधे पर एक मैला थैला। साजिद उनके पीछे था। उसने आज सफ़ेद कुर्ता पहना था, जो कहीं से धोकर सुखाया हुआ लग रहा था, और जेब पर एक छोटा सा काला धब्बा था, जो शायद स्याही का था।
वो आकर चबूतरी के किनारे खड़े रहे।
"बैठिए," मैंने कहा।
नसीमा बाई बैठीं। साजिद नहीं बैठा।
"बेटा," शबनम आपा ने गुमटी से आवाज़ दी, "बैठ जा। चाय ठंडी हो रही है।"
वो बैठ गया।
शबनम आपा आईं और दोनों के हाथ में कुल्हड़ पकड़ा दिए। फिर उस्ताद आए। वो चुपचाप एक कोने में बैठ गए। उन्होंने आज अपना मोटा चश्मा नहीं पहना था और आँखें थोड़ी लाल थीं।
मीरा अपने कैमरे के साथ आई, पर मैंने सिर हिलाकर मना कर दिया।
उसने कैमरा नीचे कर लिया।
"आज रिकॉर्डिंग नहीं," मैंने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि आज जो होगा, वो किसी को सुनाने के लिए नहीं होगा। आज जो होगा, वो बस ठीक होने के लिए होगा।"
उसने कैमरा बैग में रखा और चबूतरी की सीढ़ी पर बैठ गई।
मैंने अपना कुल्हड़ उठाया और एक घूँट लिया। फिर मैंने पलड़ा उठाकर बीच में रखा।
"नसीमा बाई," मैंने कहा, "आज यहाँ कोई मंच नहीं है। कोई वकील नहीं है, कोई काग़ज़ नहीं है।"
"मैं देख रही हूँ," उन्होंने कहा।
"आज यहाँ एक माँ है," मैंने कहा, "और एक बेटा। और बीच में एक टूटा तराज़ू।"
साजिद ने मेरी तरफ़ देखा।
"और मैं आप दोनों से एक बात कहूँगा, जो शायद आपको बुरी लगे। आपकी दुकान का हिसाब कभी नहीं बिगड़ा। आपका तराज़ू कभी झूठा नहीं तोला। जो बिगड़ा है, वो बीच में है — दो लोगों के बीच, दो साँसों के बीच।"
नसीमा बाई ने अपना कुल्हड़ दोनों हाथों से पकड़ा।
"जो नहीं कहा गया है," मैंने कहा, "वही सबसे ज़्यादा तोलता है। आपकी दुकान में आठ हज़ार का घाटा दिख रहा है, नसीमा बाई। पर मुझे लगता है कि घाटा उससे बहुत बड़ा है, और काग़ज़ पर वो दिखता ही नहीं।"
कुछ देर चुप्पी रही।
दीये जल रहे थे। पीपल की पत्तियाँ हल्की-हल्की हिल रही थीं। मीरा की चप्पल सीढ़ी पर धीरे-धीरे ज़मीन को छू रही थी, जैसे वो भी बेचैन हो।
फिर नसीमा बाई ने कुल्हड़ नीचे रखा।
और उन्होंने कहा — "मुझे अकेलेपन से डर लगता है।"
बस। इतना।
कोई लंबा भाषण नहीं। कोई कहानी नहीं। बस एक लाइन, और वो लाइन सुनते ही उनकी आवाज़ टूट गई।
"रात को जब दुकान बंद करती हूँ," वो बोलीं, "तो कुर्सी पर बैठती हूँ। कुछ देर तक। खाली दुकान देखती हूँ। बोरियों पर रखी दालें, गुड़ की टोकरी, और वो तराज़ू, जो अब कोई नहीं देखता। फिर सोचती हूँ — सुबह उठकर किसके लिए छोटी रोटी बनाऊँगी? साजिद उठता है, अपना काम करता है, चला जाता है। और मैं… मैं रह जाती हूँ।"
उन्होंने साजिद की तरफ़ नहीं देखा।
"मैंने उससे कह दिया था कि मुझे तेरी ज़रूरत नहीं।"
साजिद का हाथ रुक गया।
"गुस्से में नहीं कहा था," वो बोलीं। "डर में कहा था। मैंने सोचा, अगर मैं कह दूँगी कि मुझे तेरी ज़रूरत नहीं, तो शायद जाने के वक़्त उसे कम तकलीफ़ होगी।"
उन्होंने लंबी साँस ली।
"जाने के वक़्त उससे ज़्यादा तकलीफ़ किसी को नहीं होती जो यहीं रह जाता है। और मैंने उसे यही नहीं बताया।"
अब साजिद ने कुल्हड़ रखा।
उसके हाथ काँप रहे थे। उसने एक बार शबनम आपा की तरफ़ देखा, फिर उस्ताद की तरफ़, फिर मेरी तरफ़।
"मैं बुरा बेटा नहीं बनना चाहता," उसने कहा।
आवाज़ पतली थी, टूटी हुई।
"मैं बुरा बेटा नहीं बनना चाहता, उस्ताद जी। सच कह रहा हूँ। रात को जब मैं कॉपी खोलता हूँ, तो हर महीने वही आता है — घाटा। और हर महीने वो थोड़ा बड़ा होता है। पहले दो हज़ार, फिर तीन, फिर आठ। और मैं बैठकर सोचता हूँ कि जो आदमी ठीक से तोल भी नहीं सकता, वो क्या कर सकता है? पढ़ाई में भी कमज़ोर हूँ। माँ कहती है दिमाग़ लगा। लगाता हूँ उस्ताद जी, सच में लगाता हूँ। पर हर महीने पेपर आता है और मेरा नाम नीचे होता है, और माँ की नज़र में वो अपमान मुझे ऐसे देखता है जैसे… जैसे मैंने जानबूझकर किया हो।"
उसने आँखें मसलीं।
"और फिर वो आदमी आया। मुस्कुराते हुए आया। उसने माँ की दवा के लिए पैसे दिए — बार-बार, तीन हिस्सों में — और एक बार भी ये नहीं कहा कि कब लौटाऊँगा। जब इंसान कुछ बिना शर्त देता है, तो मैं घबरा जाता हूँ। मुझे लगता है वो मुझसे कुछ ऐसा माँगेगा जो मैं नहीं दे सकूँगा। और वो सच में माँग रहा है ना? एक अंगूठा। बस एक अंगूठा।"
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"और मैं… मैं उस रात से सोच रहा हूँ कि अगर मैं शहर भाग जाऊँ, तो सब कुछ पीछे छूट जाएगा। घाटा, दुकान, माँ की नज़र, अपना नाम — सब। मुझे लगता है भाग जाना ही इकलौता रास्ता है।"
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