The Mysterious Bell – Chapter 411
"साजिद," मैंने कहा, "ये तराज़ू मैं आधे घंटे में ठीक कर सकता हूँ। पर तुम दोनों को कुछ करना पड़ेगा।"
"क्या?"
"एक-एक सच्ची बात। एक-दूसरे से। जो अंदर दबी है।"
साजिद हँसा। "ये कोई काम है? माँ से माफ़ी माँग लो और तराज़ू चल पड़ेगा?"
"माफ़ी नहीं," मैंने कहा। "सच। माफ़ी बाद में आएगी, पहले सच आता है।"
"बकवास है।"
"हो सकता है। पर तुम्हारी दुकान खुली है और वो सात टूटी चीज़ें बाहर मेज़ पर पड़ी हैं। मैं झूठ नहीं बोल रहा।"
नसीमा बाई उठीं। "मैं कुछ नहीं बोलूँगी," वो बोलीं। "मैंने बहुत बोला है। अब नहीं।"
"दीदी—"
"जो कहना है, ये कहे।" उन्होंने साजिद की तरफ़ देखा। "मैं सुन लूँगी।"
साजिद ने मुँह फेर लिया। "मुझे कुछ नहीं कहना।"
"ठीक है," मैंने कहा। "तो तराज़ू भी वैसा ही रहेगा।"
मैं उठने लगा। टिंकू ने टूलबॉक्स उठाया। साजिद ने कॉपी पकड़ी। नसीमा बाई ने एक कदम आगे बढ़ाया, फिर रुक गईं।
"दीदी, एक बात और," मैंने कहा। "आपने आज मुझे पलड़ा दिया, इसलिए मैं आपको एक बात देता हूँ। ये पलड़ा अकेला नहीं टूटा। आपकी तराज़ू का काँटा टेढ़ा है और आपके बेटे की जेब में एक सफ़ेद कार्ड है। दोनों एक ही आदमी के हैं, मुझे लगता है।"
नसीमा बाई ने साजिद की तरफ़ देखा। साजिद ने कॉपी के नीचे से कार्ड निकालकर जेब में डाल दिया।
"ये मेरा काम है," वो बोला।
"और ये मेरा काम है," मैंने कहा। "तुम दोनों का झगड़ा मैं नहीं सुलझाऊँगा। पर अगर तुम दोनों में से कोई भी आज एक सच्ची बात बोल दे, तो ये तराज़ू आधे घंटे में ठीक हो जाएगा।"
मैं दुकान से बाहर आया। धूप अब पीपल की जड़ तक पहुँच गई थी। बच्चे बाहर बैठे चुप थे। सानिया ने पूछा, "उस्ताद, झगड़ा हो गया?"
"थोड़ा," मैंने कहा।
"तराज़ू ठीक होगा?"
"देखते हैं।"
मैं पीपल के नीचे लौटा और मेज़ के पीछे बैठ गया। घंटी जेब में चुप थी, पर मुझे पता था वो सुन रही है।
मन में हिसाब चला। कुल अंक एक सौ अड़सठ थे। पतंग वाले जोड़ में दस कट गए। बचे एक सौ अठ्ठावन। छिपा दर्द देखने की शक्ति चालीस अंक की है। अगर मैं वो खर्च करूँ, तो एक सौ अठ्ठावन में से चालीस जाएँगे, एक सौ अठ्ठावन से उन्नीस निकलेंगे… मैंने गिनती को दिमाग़ में सीधा किया — एक सौ अठ्ठावन में से चालीस निकाले तो एक सौ अठ्ठावन में से एक सौ और अठ्ठावन निकले, यानी एक सौ अठ्ठावन में से चालीस कम, एक सौ अठ्ठावन में से… मैं उलझ गया। मैंने सिर हिलाया। मतलब साफ़ था — अंक कम हो जाएँगे। और कल बड़ी चीज़ें होने वाली थीं।
पर घंटी ने जो कहा था, वो मेरे अंदर चुभ रहा था।
तोलने वाला टूटा है।
मैं अपनी दुकान के उस पुराने तराज़ू के बारे में सोचने लगा जो पापा के औज़ारों के साथ पड़ा था। जब कभी वो ठीक करते थे, वो कहते थे, "काँटा टेढ़ा हो तो तोल कम दिखता है, और इंसान का दिल टेढ़ा हो तो हर बात कम दिखती है।"
मैंने जेब से घंटी निकाली। पीतल मेरी हथेली में ठंडा था।
"कितना?" मैंने धीरे से पूछा।
"चालीस अंक," घंटी ने कहा।
मैंने होंठ भींचे।
"पर सुन ले," घंटी ने कहा। आवाज़ अब साफ़ थी, जैसे कोई कान के पास नहीं, सीधे सिर के अंदर बोल रहा हो। "जो दर्द तू आज देखेगा, वो तेरे अंदर भी एक दरवाज़ा खोल देगा।"
मैंने घंटी को जेब में वापस रखा। दूर दुकान के आधे शटर से पीली रोशनी बाहर आ रही थी। साजिद की कॉपी उसी मेज़ पर खुली थी। नसीमा बाई बोरियों के पास खड़ी थीं। और बीच में वो टेढ़ा काँटा लटका था, जैसे कोई सवाल।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "उस्ताद, क्या करना है?"
मैंने टूलबॉक्स उठाया।
"पहले देखना है," मैंने कहा। "कि इस तराज़ू में असली में क्या टूटा है।"
और मैं उस दुकान की तरफ़ बढ़ा, जहाँ एक औरत अपने बेटे से कह चुकी थी कि मुझे तेरी ज़रूरत नहीं, और एक लड़का अपनी माँ से कह चुका था कि मैं चला जाऊँगा।
दोनों झूठ बोल रहे थे। और दोनों को पता था।
॥
मैं दुकान के अंदर घुसा। पीछे वाले कमरे की तरफ़ बढ़ा, तो टिंकू मेरे पीछे आ गया। उसके हाथ में मेरा पुराना टूलबॉक्स था, जो उससे भारी था, इसलिए वो दोनों हाथों से उसे सीने से चिपकाए चल रहा था।
"उस्ताद, मैं अंदर आऊँ?"
"नहीं," मैंने कहा।
वो रुक गया। मैंने उसका चेहरा देखा। उसमें वो सवाल था जो उसने पूछा नहीं था — कि तुम मुझे अकेले क्यों छोड़ रहे हो।
"टिंकू," मैंने कहा, "तू बाहर बैठ। मेज़ के पास। धूप में। जो भी आए, कह देना उस्ताद अंदर काम में हैं। और किसी को अंदर मत आने देना।"
"नसीमा बाई आएँ तो?"
"ख़ास तौर पर उन्हें मत आने देना।"
टिंकू ने सिर हिलाया। उसने टूलबॉक्स ज़मीन पर रख दिया और पलटकर बाहर चला गया। मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद किया।
अंदर अंधेरा था। एक ही बल्ब जल रहा था, वो भी गुनगुनाता हुआ, जैसे बूढ़ा आदमी सोते-सोते कोई पुरानी ग़ज़ल गा रहा हो। मैंने चारपाई पर बैठकर जेब से घंटी निकाली।
पीतल हथेली में ठंडा था। मैंने उसे एक बार हिलाया।
घन।
आवाज़ छोटी थी, पर कमरे की दीवारों से टकराकर वापस आई और मेरे कानों में बैठ गई।
"कितना?" मैंने पूछा।
"चालीस अंक," घंटी ने कहा। "छिपा दर्द। देखेगा तो भूल नहीं पाएगा।"
"मुझे दिखाना है।"
"सोच ले।"
"मैंने सोच लिया।"
घंटी एक पल चुप रही। फिर बोली, "आँख बंद कर।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
पहले कुछ नहीं हुआ। सिर्फ़ अंधेरा, और बल्ब की गुनगुनाहट, और दूर कहीं गली में किसी बच्चे की हँसी। फिर अंधेरा गरम होने लगा। मेरे सिर के अंदर एक दरवाज़ा खुला, जिसकी आवाज़ मैंने सुनी — चरचराती, जैसे बरसों से कोई उसे नहीं खोलता हो।
और मैं अंदर चला गया।
पहला दृश्य।
रात। नसीमा बाई की दुकान। शटर आधा गिरा हुआ, अंदर एक पीली बत्ती जल रही है। दाल की बोरियाँ एक तरफ़ ढकी पड़ी हैं, गुड़ की टोकरी ऊपर रखी है। नसीमा बाई फ़र्श पर चटाई बिछाकर बैठी हैं। उनके सामने एक लोहे की छोटी स्टूल है, और उस स्टूल पर तस्वीर रखी है — काँच के फ्रेम में। एक आदमी है उसमें, मूँछ वाला, कंधे सीधे, आँखों में हल्की सी शर्म।
नसीमा बाई उस तस्वीर के सामने एक स्टील की थाली रखती हैं। उस पर दो रोटियाँ हैं, एक कटोरी में सब्ज़ी, और एक गिलास में पानी। फिर वो हाथ जोड़कर बैठ जाती हैं।
"आज दाल महँगी हो गई," वो कहती हैं। आवाज़ धीमी है, जैसे कोई बच्चे को सुलाने के बाद बात कर रहा हो। "पर तू चिंता मत कर। मैंने तेरे हिस्से की दाल अलग रख दी है। साजिद ने पूछा भी नहीं।"
वो चुप हो जाती हैं। तस्वीर देखती हैं।
"क्या करूँ, बता," वो कहती हैं। "वो कहता है शहर जाऊँगा। कहता है यहाँ कुछ नहीं है। और मैं सोचती हूँ — यहाँ क्या है? ये दुकान? ये तराज़ू? ये दाल की बोरी जिसमें चूहे घुस गए हैं?"
वो अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करती हैं। फिर धीरे से बोलती हैं —
"मुझे एक बात का डर है। ये तराज़ू का नहीं है। ये किसी को नहीं बताया।"
वो रुक जाती हैं।
"मुझे डर है कि बुढ़ापे में मेरा नाम भी कोई नहीं पूछेगा। कि किसी दिन मैं यहाँ बैठी मर जाऊँगी, और दो दिन तक किसी को पता नहीं चलेगा। साजिद शहर में होगा। वो मेरा नाम सुनकर भी नहीं लौटेगा, क्योंकि वो सोचेगा — अम्मी तो खुद ही कहती थीं, मुझे तेरी ज़रूरत नहीं।"
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