The Mysterious Bell – Chapter 405
उस्ताद नौ बजकर पैंतालीस पर आए। साफ़ कपड़े पहने हुए, दाढ़ी कंघी किए हुए, और हाथ में एक कपड़े में लिपटा छोटा डब्बा। उन्होंने उसे सीने से सटाकर पकड़ा हुआ था, ऐसे जैसे कोई बच्चा हो।
"उस्ताद, वो क्या है?" टिंकू ने पूछा।
"सुई," उस्ताद ने कहा।
"सुई?"
"सिलाई मशीन की सुई," उस्ताद ने कहा। "नई। आज की। अगर कहीं सिलाई निकली, तो यहीं यहीं करेंगे। किसी और की मशीन से नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा कुछ नहीं कह रहा था। पर उनकी उम्र ने कह दिया था — वो आज सच का इंतज़ार नहीं कर रहे थे, वो आज उसका सामना करने की तैयारी कर रहे थे।
नौ बजकर पचपन पर रज़ा सलीम आया।
वो गली के मुँह से आया, अकेला। काले कपड़े, हाथ में मोटे भूरे कपड़े में लिपटा एक बड़ा-सा आयताकार बंडल। बंडल इतना बड़ा था कि उसे दोनों हाथों से सीने से लगाकर चलना पड़ रहा था। और उसके हाथ काँप रहे थे। सच में काँप रहे थे। मैंने देखा कि कपड़े का एक कोना उसकी पकड़ से छूटकर हवा में फड़फड़ा रहा था।
वो चबूतरी तक आया और रुक गया। उसकी आँखें लाल थीं। नींद की कमी से या रोने से, यह मैं नहीं बता सकता।
"रजिस्टर," उसने कहा। बस इतना। आवाज़ रूखी थी।
उस्ताद ने आगे हाथ बढ़ाया।
"मैं खुद दूँगा," रज़ा ने कहा। "सलीम साहब ने कहा है कि जिसे देना है, उसी के हाथ में देना।"
"किसे देना है?" उस्ताद ने पूछा।
रज़ा ने पहले उस्ताद को देखा, फिर मुझे। फिर चबूतरी पर रखे पत्थर को देखा।
"तीन लोगों को," उसने कहा। "उस्ताद अली बक्श। अंकुश यादव। और मुझे।"
उसने कहा और खुद ही हँसा। हँसी में कुछ नहीं था। जैसे हँसी बोलने का एक तरीक़ा भर हो, जिसका कोई मतलब न हो।
"तीन आदमी खोलेंगे," उस्ताद ने कहा।
"हाँ," रज़ा ने कहा। "सलीम साहब ने कहा है।"
"सलीम ने और क्या कहा है?"
रज़ा ने कपड़े में लिपटा बंडल मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। मैंने दोनों हाथों से थामा। भारी था, पर इतना नहीं जितना दिख रहा था। ज़्यादा भार कपड़े का था।
"सलीम साहब ने कहा है कि रजिस्टर खोलने के बाद जो होगा, उसका हिसाब वो नहीं रखेंगे," रज़ा ने कहा। "और उन्होंने यह भी कहा कि अगर अंकुश यादव गुस्सा करे, तो उससे कहना कि गुस्सा रजिस्टर पर मत निकालना। रजिस्टर सिर्फ़ काग़ज़ है। गुस्सा उस आदमी पर निकालना जिसने काग़ज़ पर हाथ रखा।"
मेरे हाथ रुक गए।
"वो जानते हैं कि रजिस्टर में क्या है?"
रज़ा ने कुछ नहीं कहा।
"रज़ा," मैंने कहा, "वो जानते हैं?"
"मुझे नहीं पता," रज़ा ने कहा। "उन्होंने रजिस्टर खोला नहीं। उस रात सलीम अहमद साहब के जाने के बाद से यह रजिस्टर बंद ही है। कपड़े में लिपटा था, ताले में था। मैंने आज सुबह ताला खोला।"
"ताले की चाबी किसके पास थी?"
"मेरे पास," रज़ा ने कहा। "सलीम साहब ने मरने से पहले मेरी हथेली पर रखी थी। कहा था — जिस दिन यादव का लड़का आए, उस दिन खोलना।"
चबूतरी पर सन्नाटा छा गया। टिंकू ने अपनी चप्पल की आवाज़ भी बंद कर दी।
मैंने बंडल चबूतरी के बीच में रखा और कपड़ा खोला।
रजिस्टर मोटा था। लाल जिल्द, कोने उखड़े हुए, और ऊपर की तरफ़ किसी चीज़ ने पानी गिराया था जिससे जिल्द पर एक गोल धब्बा बन गया था। इतना बड़ा कि उस पर अंगूठा रखा जा सके।
तीनों ने हाथ बढ़ाए। उस्ताद ने ऊपर से, रज़ा ने बीच से, मैंने नीचे से। तीन जोड़े हाथों ने एक साथ जिल्द खोली और उसकी सीलन भरी गंध बाहर आई। पुराने काग़ज़ की गंध। मुझे वो गंध पसंद है, सच बताऊँ तो। पर उस दिन वो गंध ऐसी थी जैसे किसी पुराने आदमी के कपड़ों से आ रही हो, जो अब नहीं है।
रज़ा पन्ने पलटने लगा। धीरे-धीरे, उँगली से। पहला पन्ना — हिसाब। दूसरा — हिसाब। तीसरा — कोई साल, कोई तारीख़। पाँचवाँ, छठा, सातवाँ।
"यहाँ," उस्ताद ने कहा।
उनकी उँगली रुक गई।
"ज़मीन वाला हिसाब," उन्होंने कहा। "अस्पताल की ज़मीन। सात नाम। देखो।"
मैंने झुककर देखा।
उस पन्ने पर सात नामों की सूची थी। हर नाम के आगे एक अंगूठे का निशान। लाल स्याही जैसा, पर पुराना, फीका। कोई नाम साफ़ पढ़ा जा सकता था, कोई धुँधला था। पहला नाम — मंज़ूर हुसैन। दूसरा — बसंत राम। तीसरा — श्यामलाल। चौथा — नूर मोहम्मद। पाँचवाँ — रामकिशन। छठा — हाफ़िज़ निसार।
और सातवें नंबर पर…
मैंने उँगली रखी तो पता चला कि वहाँ काग़ज़ कटा हुआ है।
बिल्कुल साफ़ कटा हुआ। ब्लेड से, या किसी पतली चीज़ से, बिल्कुल सीधा। और उस कटी जगह पर एक दूसरा पन्ना सिल दिया गया था। सिलाई से। छोटे-छोटे टाँके, ज़मीन के रंग के धागे से, इतने बारीक कि अगर तुम उँगली फेरकर न देखो तो पता भी न चले।
उस सिले हुए पन्ने पर कुछ और लिखा था। कोई और हिसाब, कोई और साल, कुछ और नाम। सातवाँ नाम गायब था। जगदीश यादव गायब था।
मेरे अंदर कुछ टूटा।
मुझे नहीं पता कैसे बताऊँ। वो गुस्सा नहीं था, वो कुछ और था। जैसे तुम बरसों से एक दरवाज़े के पीछे खड़े हो और दरवाज़ा खुले और अंदर सिर्फ़ एक खाली कुर्सी हो। सारी मेहनत, सारा इंतज़ार, सारी उम्मीद — और सामने खाली जगह।
मैंने रज़ा का गिरेबान पकड़ लिया।
मुझे याद नहीं कि मैंने कब हाथ बढ़ाया। बस अगली चीज़ जो मुझे याद है, वो यह थी कि मेरी मुट्ठी में उसकी कमीज़ का कपड़ा था और वो मेरी तरफ़ झुक आया था, और उसकी आँखों में डर था। असली डर।
"तुम लोगों ने काट दिया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी नहीं लग रही थी। "तुमने दादा का नाम काट दिया। तुमने उसे रजिस्टर से निकाल दिया। और तुम आज सुबह मेरे सामने आकर—"
"अंकुश," उस्ताद ने कहा।
"उस्ताद, ये मेरे दादा का—"
"अंकुश।" उनकी आवाज़ ऊँची नहीं थी। बस थी। और वो इतनी थी कि मेरे हाथ खुद खुल गए।
मैंने रज़ा को छोड़ दिया। वो पीछे हटा, कमीज़ सीधी की, और उसकी साँस फूली हुई थी।
"मैंने नहीं काटा," उसने कहा। आवाज़ फटी हुई थी। "मैंने कसम खाई है, अंकुश यादव, मैंने नहीं काटा। मैंने तो इस रजिस्टर को आज सुबह पहली बार खोला। मुझे नहीं पता था कि इसके अंदर ऐसा है। मैं तो सिर्फ़ रजिस्टर लाया हूँ। मैं तो सिर्फ़ मुंशी हूँ।"
"फिर किसने काटा?"
रज़ा ने कोई जवाब नहीं दिया।
मैं मुड़ा। उस्ताद अब भी झुके हुए थे। उनका चश्मा नाक पर सरका हुआ था, पर उन्होंने उसे ठीक नहीं किया। उनकी उँगली उस सिलाई पर थी और वो उसे धीरे-धीरे सहला रहे थे, जैसे कोई आदमी किसी पुराने ज़ख़्म को छूता हो।
"उस्ताद?" मैंने कहा।
वो नहीं बोले।
"उस्ताद।"
उन्होंने चश्मा उतारा। धीरे से, दोनों हाथों से। और उसे अपनी कमीज़ की जेब में रख दिया।
"इलियास," उन्होंने कहा।
इलियास आगे आए।
"देख," उस्ताद ने कहा और उँगली सिलाई की तरफ़ बढ़ाई।
इलियास झुके। उन्होंने देखा। फिर वो सीधे हुए और उनका चेहरा बदल गया। ऐसे बदला जैसे किसी ने उनके सामने से कोई पर्दा हटा दिया हो।
"ये तो…" इलियास ने कहा।
"हाँ," उस्ताद ने कहा।
"भाई, ये तो—"
"हाँ," उस्ताद ने फिर कहा।
मैं उनके बीच में था और मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
"क्या है?" मैंने कहा। "उस्ताद, क्या है? बोलिए।"
उस्ताद ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।
उन्होंने अपना हाथ उस सिलाई पर रखा। उँगली से टाँके को छुआ, एक-एक करके, जैसे कोई अक्षर पढ़ रहे हों। उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
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