The Mysterious Bell399 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 399

6 min read November 5, 2026

सलीम हँसा।

नहीं, हँसा नहीं। उसके होंठ हिले, इतना ही।

"अच्छा सवाल है," उसने कहा। "सुशीला जी, ये सवाल तुमने बाईस साल पहले क्यों नहीं पूछा?"

"क्योंकि बाईस साल पहले मैं अस्पताल में थी," माँ ने कहा। "मेरी साँस ट्यूब से चल रही थी और मेरे पति फ़ाइल लिए किसी के दफ़्तर में खड़े थे। तब पूछने वाला कोई नहीं था। अब तुम्हारे सामने खड़ा है।"

सलीम ने एक पल के लिए माँ को देखा।

और उस एक पल में, मुझे यक़ीन हुआ कि ये आदमी खलनायक नहीं है। ये आदमी वो है जिसे भी किसी ने बाईस साल पहले रोका था और जो अब बोलने निकला है। वो मुस्कुराया, फिर सिर हिलाया, जैसे कोई अपने मन ही मन कोई हिसाब पूरा कर रहा हो।

"मैं आज कुछ और नहीं बोलूँगा," उसने कहा। "सुबह सब पता चलेगा। तुम्हारे बेटे को सुबह दस बजे पीपल के नीचे आना है। और हाँ, अकेले नहीं। ये गली है, इसमें अकेले कहानी नहीं बनती। सबको लेकर आना।"

वो मुड़ा।

उसके सफ़ेद जूतों ने गली की मिट्टी पर वो आवाज़ की जो धीमी होती है, जैसे कोई तेज़ चलने की कोशिश में रुक-रुककर चल रहा हो। मैंने उसे जाते देखा। उसका कुर्ता सफ़ेद था और उस पुरानी गली में सफ़ेद रंग उतना ही अलग लगता है जितना बारिश के दिन किसी छत पर सूखी जगह।

वो गली के मोड़ से मुड़ा और अंधेरे में मिल गया।

काजल ने साँस छोड़ी, इतनी ज़ोर से कि लगा लालटेन बुझ जाएगी।

"ये आदमी पागल है," उसने कहा।

"नहीं," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ पहली बार आई, और वो इतनी धीमी थी कि लगा किसी ने दूर से बोला हो। "ये पागल नहीं है। ये वही है जो पहले भी था।"

और तभी उस्ताद अली बक्श गली की दूसरी तरफ़ से आते दिखे।

वो कुर्सी से उठकर आ रहे थे — वो कुर्सी जिस पर वो अब तक बैठे थे। उनकी चाल धीमी थी। उनका मोटा चश्मा था और कान पर पेंसिल। और जब उन्होंने सलीम को मुड़ते देखा तो वो रुक गए।

रुके। और फिर मुड़कर मेरी तरफ़ आए।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"उस्ताद?"

"आज रात जो दरवाज़ा खुला," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे कान झुकाना पड़ा, "उसका सच अब पूरी गली को सुनना पड़ेगा।"

"उस्ताद, मैं समझा नहीं।"

"छुपाया हुआ सच भी एक दिन घर के बाहर आता है," उन्होंने कहा। "जिस दिन चाबी मिल जाए, उस दिन दरवाज़ा रोका नहीं जाता। तूने आज एक दरवाज़ा खोला है। अब उस दरवाज़े के अंदर जो भी है, अकेले तेरा नहीं है। पूरी गली का है।"

मैंने उनके चेहरे को देखा। उनकी सफ़ेद दाढ़ी थी और उनके होंठों पर वो आदतन चुप्पी थी जो उनके चेहरे पर पचास साल से जमी थी, जैसे दीवार पर पुराना पलस्तर।

"उस्ताद," मैंने कहा, "आप सलीम को जानते हैं?"

उन्होंने जवाब नहीं दिया।

"उस्ताद, मैंने पूछा—"

"चाय रखवा," उन्होंने कहा और मेरी बात काट दी।

तभी माँ ने कुर्सी की तरफ़ मुड़कर देखा, फिर मेरी तरफ़।

"उस्ताद जी," माँ ने कहा, "चाय पिएँगे? रात भर कब तक खड़े रहेंगे? काजल, चूल्हा जलाओ। और उसमें अदरक डालना, बाहर की हवा ठंडी है।"

माँ का ये तरीक़ा मुझे हमेशा से पसंद है। जब सब डर रहे होते हैं, तो उन्हें चाय की पड़ जाती है। पता नहीं ये बहादुरी है या आदत। शायद दोनों।

उस्ताद ने मुस्कुराने की कोशिश की।

"चाय रखो, बहू," उन्होंने कहा। "और तेरे बेटे को दो मिनट मेरे साथ अकेले बिठा दे।"

माँ ने उनकी तरफ़ गौर से देखा। फिर मेरी तरफ़।

"जाओ," उन्होंने कहा। "पर अंकुश, सुन ले। अगर उस्ताद आज कुछ बोलते हैं तो वो सच होगा। और सच सुनने से पहले एक बार घर की छत देख लेना।"

"छत क्यों, माँ?"

"क्योंकि कभी-कभी आदमी को ऊपर की तरफ़ देखते हुए कोई बात सुनना अच्छा लगता है," उन्होंने कहा। "नीचे देखते हुए सच बहुत भारी लगता है।"

मैं हँसा। मुझे खुद हैरानी हुई कि मैं हँस सका। उस वक़्त मेरे घर के पीछे वाला सबसे पुराना दरवाज़ा खुला था, अंदर के कमरे में लकड़ी का संदूक था जिसे मैंने अभी खोला भी नहीं था, और मेरी जेब में एक बोलती हुई घंटी थी। और मैं हँस रहा था। पता नहीं ये क्या था। शायद माँ की आवाज़ का असर।

मैंने जेब से घंटी निकाली।

वो गरम थी। इतनी गरम कि मुझे लगा उसे फेंक दूँ या पानी में डाल दूँ। उसका पीतल मेरे हाथ में जैसे लोहे की रेत से भरा हुआ लगा, हल्का-सा काँपता, जैसे अंदर कोई चीज़ बाहर आने की कोशिश कर रही हो।

"बोल," मैंने धीरे से कहा। "क्या है?"

और तंत्र ने कहा, अपनी उसी पुरानी रूखी आवाज़ में —

"अंक एक सौ अठ्ठावन। नए जोड़ बंद। दरवाज़ा फिर से बंद कर दो।"

"क्यों?" मैंने पूछा। "अभी तो खुला है।"

"आज रात और मेहमान बाक़ी हैं," घंटी ने कहा। "घर खुला छोड़ेगा तो कोई ऐसा घुस जाएगा जिसे बाहर ही रुकना चाहिए था।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

मैंने काजल की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया।

"बंद कर दे," काजल ने कहा। "मैं अंदर रहकर सब देख लूँगी।"

"तू अकेली?"

"मैं अकेली नहीं हूँ," काजल ने कहा और लालटेन उठा ली। "दादा की तस्वीर अंदर है न। और अब माँ भी सामने हैं। अकेले कौन है भाई?"

मैंने कुंडे की तरफ़ हाथ बढ़ाया…

और तभी उस्ताद ने कहा। मुझे नहीं पता कि वो कैसे कहा। शायद मेरी तरफ़ देखकर। शायद कुंडे की तरफ़ देखकर। शायद दरवाज़े के अंदर उस अंधेरे की तरफ़ देखकर जहाँ अभी भी लकड़ी का संदूक और टूटे काँच वाली वो तस्वीर पड़ी थी।

"वो जीभ," उस्ताद ने कहा।

वो रुके। गला साफ़ किया। उनकी सफ़ेद दाढ़ी काँपी।

"वो जीभ मैंने खुद अपने हाथ से तोड़ी थी, अंकुश।"

मैंने रुककर उनकी तरफ़ देखा।

वो अपनी कुर्सी की तरफ़ बढ़े और उसमें जैसे धँस गए। उनका हाथ कुर्सी की बाँह पर था और उनका चश्मा उनकी नाक पर सरक आया। उन्होंने उसे ठीक करने की कोशिश भी नहीं की। टिंकू ने पानी का गिलास उनकी तरफ़ बढ़ाया, पर उस्ताद ने हाथ से इस तरह हटा दिया जैसे वो गिलास नहीं, कोई सवाल हो।

"और आज तक किसी को नहीं बताया।"

॥

उस्ताद ने अपना गला साफ़ किया। उनके हाथ कुर्सी की बाँह पर इस तरह टिके थे जैसे किसी बहुत पुरानी दीवार से सहारा ले रहे हों, जो अब गिरने ही वाली हो।

"ये कब हुआ, उस्ताद?" काजल ने पूछा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर वो काँप नहीं रही थी। "आप बताइए, कब हुआ था ये?"

उस्ताद ने अपना चश्मा उतारा। उनकी आँखें बिना चश्मे के बहुत छोटी और बहुत थकी लग रही थीं, जैसे बहुत दूर से आ रही हों।

"पचास साल पहले," उन्होंने कहा। "ये कोई कल की बात नहीं है, बेटी। ये तब हुई थी जब मेरे हाथ अभी मज़बूत थे और मेरी सोच कमज़ोर थी।"

"पर आपने क्यों तोड़ी?" मैंने पूछा। "वो घंटी आपकी थी? वो आपके खानदान की थी?"

उस्ताद ने नहीं कहा कुछ। बस अपने चश्मे को उँगलियों के बीच घुमाते रहे, एक गोल घेरा बनाते हुए, फिर से बनाते हुए, जैसे उस घेरे में कोई जवाब छिपा हो और वो उसे ढूँढ रहे हों।

माँ आगे आईं। उन्होंने मेरे कंधे पर हल्का हाथ रखा। हल्का, पर ऐसा कि मैं टस से मस नहीं हुआ।

"उस्ताद जी," माँ ने कहा, "अभी रात है। चाय पी लीजिए। सुबह रज़ा सलीम रजिस्टर लेकर आएगा। तब सब खुलेगा। आप अभी क्यों अपना दर्द बाँट रहे हैं?"

उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा। फिर कुरसी से उठकर खड़े हुए।

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