The Mysterious Bell – Chapter 391
मेरे पापा उसके सामने खड़े थे। सीना सीधा, आँखें नीची, और हाथ में वो भूरे कपड़े में लिपटी फाइल — सीने से चिपकाई हुई, जैसे कोई औरत अपने बच्चे को चिपकाकर खड़ी हो। उन्होंने सलीम को देखा और फिर मुझे देखा। मेरी तरफ़ देखकर उनकी आँखों में जो आया, वो डर नहीं था। वो शर्म थी। और शर्म, भाई, डर से ज़्यादा भारी चीज़ होती है। डर से आदमी भाग सकता है। शर्म से नहीं।
मैंने एक कदम आगे रखा।
"पापा।"
वो नहीं बोले।
सलीम मुस्कुराया और उसने अपना हाथ जेब से निकालकर सीढ़ी की तरफ़ फैलाया, जैसे कोई रास्ता दिखा रहा हो।
"बैठो, शंकर जी। सीढ़ी साफ़ है। रोज़ पोंछता हूँ।"
पापा नहीं बैठे। वो वहीं खड़े रहे। सलीम को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। उसने कंधे उचकाए और अपनी तरफ़ से बात शुरू की, जैसे कोई हिसाब की कॉपी खोल रहा हो।
"इस फाइल में दो चीज़ें हैं," उसने कहा। "एक, दान का काग़ज़। वही जिस पर सात नाम हैं, सात अंगूठे हैं, और आख़िर में तेरे दादा जगदीश यादव का हाथ है। और दूसरी चीज़ — एक पुरानी चिट्ठी। सलीम अहमद की लिखी हुई। तुम्हें पता है सलीम अहमद कौन था?"
मुझे पता था। डॉक्टर इसरानी का पुराना कंपाउंडर। वो आदमी जिसके नाम के आगे पुराने खाते में दो शब्द लिखे थे — कोई बाकी नहीं। मैंने कुछ नहीं कहा।
"अच्छा, नहीं पता," सलीम ने खुद ही जवाब दिया। "कोई बात नहीं। उस चिट्ठी में एक लाइन है, अंकुश। एक ही लाइन। और वो लाइन कहती है कि अस्पताल की ज़मीन वाले काग़ज़ों पर जो अंगूठे लगे, वो ख़ुशी से नहीं लगे। डर में लगे।"
वो रुका। मुझे लगा वो मुझे उस लाइन का मतलब खुद समझने दे रहा है, जैसे कोई बच्चे को पहेली देकर मुस्कुराता है।
"अब सोच," उसने कहा। "कल सुबह ये फाइल खुलती है। काग़ज़ सामने आता है। उस लाइन को कोई पढ़ता है जो काग़ज़ों का मतलब समझता है। फिर क्या होगा?"
"फिर पता चलेगा कि अंगूठा डर में लगा था," मैंने कहा। "और फिर पापा बेकसूर निकल जाएँगे। इससे बुरा क्या होगा तुम्हारे लिए?"
सलीम हँसा। धीरे से हँसा, जैसे कोई अच्छा मज़ाक सुन लिया हो।
"बेकसूर," उसने दोहराया। "अंकुश, तुम्हारी उम्र में मुझे भी लगता था कि सच्चाई एक तलवार है। काट देगी और काम ख़त्म। पर सच्चाई तलवार नहीं होती, बेटा। सच्चाई काग़ज़ होती है। और काग़ज़ जिसके हाथ में हो, वही तय करता है कि वो काटेगा या चिपकाएगा।"
उसने रेलिंग पर हाथ फेरा।
"कल अगर ये चिट्ठी खुली, तो शहर में ये नहीं लिखा जाएगा कि शंकर यादव डरा हुआ था। शहर में ये लिखा जाएगा कि शंकर यादव ने काग़ज़ पर अंगूठा लगाया, और जब पकड़ा गया तो बोला — मैं डरा हुआ था। एक आदमी अंगूठा लगाता है, पाँच साल चुप रहता है, और जब काग़ज़ उसके ख़िलाफ़ जाता है तब उसका डर याद आता है। कानून में इसका एक ही नाम है। और वो नाम मैं नहीं बोलूँगा, क्योंकि तेरे पापा के सामने बोलने की मुझे आदत नहीं है।"
मेरी मुट्ठी बंध गई।
"और फिर," सलीम ने अपनी आवाज़ थोड़ी और धीमी की, "जब अंगूठा झूठा साबित हो जाएगा, तो उसके साथ ये भी साबित हो जाएगा कि अस्पताल की ज़मीन का जो काग़ज़ आज चल रहा है, वो भी उसी डरे हुए अंगूठे की टेक पर खड़ा है। यानी ज़मीन का काग़ज़ कमज़ोर। कमज़ोर काग़ज़ का मतलब — नई कमेटी, नई जाँच, नई मोहर। और नई मोहर वाले जगह पर, अंकुश, आम तौर पर वही आदमी बैठता है जिसके पास पैसा और वकील दोनों हों।"
वो सीधा मेरी आँखों में देखकर बोला।
"तेरी माँ का इलाज इसी अस्पताल की ज़मीन के काग़ज़ पर टिका है। मुफ़्त इलाज, मुफ़्त दवा, वो सब उसी एक शर्त पर टिका है। काग़ज़ कमज़ोर हुआ तो इलाज की शर्त भी हवा में। डॉक्टर इसरानी साठ के पार हैं। काग़ज़ में गड़बड़ निकली तो उनका नाम भी उसी काग़ज़ के साथ जाएगा। और उनकी उम्र में नाम बचाना, इलाज से ज़्यादा मुश्किल होता है।"
मेरे पीछे सीढ़ियों पर मेरी साँस सुनाई दे रही थी। पापा अब भी नहीं बोले थे। एक शब्द नहीं। वो बस फाइल पकड़े खड़े थे, और उनकी उँगलियाँ कपड़े पर इतनी कसी हुई थीं कि मुझे लगा कपड़ा नहीं, उनके ही हाथ की नसें दिख रही हैं।
मुझे गुस्सा आया। और मेरा गुस्सा जब आता है तो मेरी ज़ुबान पहले बोलती है, दिमाग़ बाद में आता है। आज भी वही हुआ।
"सलीम भाई," मैंने कहा, "आपने अभी इतनी बड़ी बात कह दी, डर, काग़ज़, जाँच, इलाज — इतनी बात कह दी और एक कुर्सी भी नहीं दी। ये आपकी सलाह का बिल पिछले हफ़्ते का भी बाकी है, आज का अलग।"
सलीम के चेहरे पर वो मुस्कान आई जो उसे खुद भी पसंद है। मुझे पता है वो इसीलिए मुस्कुराया कि वो समझ गया कि मैंने मज़ाक से अपनी आवाज़ को सँभालने की कोशिश की है। मज़ाक मेरी ढाल है, भाई। जब अंदर कुछ टूटने लगता है, मैं हँस देता हूँ। सबको लगता है अंकुश को फ़र्क़ नहीं पड़ता। फ़र्क़ पड़ता है। बहुत पड़ता है।
"पर एक बात सुन लो," मैंने कहा, और इस बार मेरी आवाज़ से मज़ाक खिसक गया। "जो सच डर में लिखा गया हो, उसे तुम अपने फ़ायदे का काग़ज़ मत बनाओ। अगर उस चिट्ठी में लिखा है कि अंगूठा डर में लगा, तो उस चिट्ठी का काम ये नहीं कि तुम उसे काटने के लिए इस्तेमाल करो। उसका काम ये है कि जिसने डर दिया, उसका नाम सामने आए।"
"और वो नाम क्या मेरा है?" सलीम ने पूछा। बड़े आराम से पूछा।
"तुम्हारा नहीं," मैंने कहा। "पर तुम उस नाम का दरवाज़ा ज़रूर हो। और दरवाज़े भी कभी-कभी गिरते हैं।"
सलीम कुछ कहता, उससे पहले ही सीढ़ी के नीचे से एक आवाज़ आई। ऐसी आवाज़ जो अस्पताल में बहुत कम सुनाई देती है, पर जब सुनाई देती है तो सब रुक जाते हैं।
पहिये की आवाज़।
लोहे का पहिया, पुराना, ज़ंग खाया, जिसे मैंने और टिंकू ने पिछले कुछ घंटों में अपने हाथों से चलाया था। वो पहिया अब अस्पताल के फ़र्श पर चल रहा था, और हर घूमने पर ज़रा-सा चरचरा रहा था।
मैंने पीछे देखा।
काजल व्हीलचेयर के हैंडल पर हाथ रखे खड़ी थी। उसका चेहरा लाल था, साँस फूली हुई थी, और स्कूल की सीढ़ियों से कोई उतरकर नहीं आ रहा था — वो इमारत की ओर से नहीं, गेट की ओर से आई थी। उसने माँ को पूरे रास्ते धक्का देकर लाया था। अकेले।
और कुर्सी पर माँ बैठी थीं।
गुलाबी साड़ी, माथे पर चंदन, पल्लू कमर में खोंसा हुआ, हाथ में कोई कॉपी नहीं — आज हाथ खाली थे। वो सीधी बैठी थीं। बीमार आदमी सीधा नहीं बैठता, भाई। बीमार आदमी थोड़ा झुक ही जाता है। पर आज माँ नहीं झुकी थीं। माँ ने पीठ ऐसी सीधी रखी थी जैसे किसी ने उनकी रीढ़ में तार खींच दिया हो।
काजल की आँखें भरी हुई थीं। उसने मेरी तरफ़ देखा और होंठ हिलाए, बिना आवाज़ — "रोक नहीं पाई।"
मैंने सिर हिलाया। मैं जानता था। माँ को कोई नहीं रोक सकता। माँ को रोकने की कोशिश करने वाला आदमी आज तक कोई नहीं है जो जीत गया हो।
सलीम ने मुड़कर देखा। उसकी मुस्कान ज़रा-सी कम हुई, पर मिटी नहीं। वो आगे बढ़ा, जैसे कोई मेज़बान देर से आए मेहमान का स्वागत करने जा रहा हो।
"सुशीला जी," उसने कहा। "आपको तकलीफ़ नहीं उठानी थी। इतनी रात, इतनी सीढ़ी—"
"तकलीफ़?" माँ ने कहा। उनकी आवाज़ नीची थी, पर साफ़। "जिस आदमी के अंगूठे की बात हो रही है, साहब, वो मेरा आदमी है। उसके अंगूठे को कोई काग़ज़ बताए और मैं घर में बैठी रहूँ, ऐसा मेरे यहाँ नहीं होता।"
सीढ़ी पर सन्नाटा हो गया। अस्पताल की आवाज़ें भी जैसे दूर चली गईं। कहीं कोई बच्चा खाँस रहा था, वो भी रुक गया।
"मैं सिर्फ़ एक बात कहने आई हूँ," माँ ने कहा, और अब उन्होंने सलीम को नहीं, सीढ़ी के नीचे खड़े पापा को देखा। "मेरे पति का अंगूठा झूठा नहीं है। मजबूर था।"
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