The Mysterious Bell – Chapter 380
"साहब," मैंने कहा, "मैं छोटा हूँ ही। मेरी दुकान छोटी है, मेरी साइकिल पुरानी है, मेरे जूते फटे हैं। मुझे छोटा होने की आदत है।" मैंने उसकी तरफ़ झुककर कहा, "आप बड़े हो। आपको छोटा होने में तकलीफ़ होगी।"
सलीम की मुस्कान एक पल के लिए रुकी।
बहुत छोटा सा पल। पर रुकी।
और मुझे लगा — शुक्र है, ये आदमी भी कहीं से इंसान है।
"तू बहुत बोलता है," उसने कहा।
"मेरी माँ कहती है," मैंने कहा, "दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं।"
उस्ताद ने दीवार से टिककर कहा, "बात छोड़, सलीम। बता, तू किस मुँह से अमानत की बात करता है? जिस घर की चीज़ तूने खुद बेची —"
"अली।"
सलीम की आवाज़ बदल गई।
वो अब मीठी नहीं थी। वो अब ठंडी थी। बर्फ़ जैसी नहीं, लोहे जैसी। जैसे सर्दियों में गली का पानी — न जमता है, न बहता है, बस खड़ा रहता है।
"तू उस रात की बात मत कर," सलीम ने कहा। "उस रात माँ की सिलाई की पेटी छत की कोठरी में बंद हुई। और तूने चाबी नहीं दी। तूने कहा, चाबी खो गई।"
उस्ताद की साँस लंबी हुई।
"मैंने चाबी नहीं दी," उस्ताद ने कहा, "क्योंकि तूने उस रात पैसा माँगा था। गिरवी रखने के लिए कुछ नहीं बचा था, इसलिए तूने माँ की पेटी चाही थी।"
सलीम उठ खड़ा हुआ।
और मैंने देखा — दीवार पर टँगी कैंचियों ने हवा में हल्का सा हिलकर आवाज़ की। ऐसे लगा कि कमरे ने साँस ली।
"मैं उस रात की बात आज नहीं करूँगा," सलीम ने कहा। "आज मैं एक और बात करने आया हूँ। और वो बात बड़ी है।"
उसने अपना कुर्ता सीधा किया। उसकी काली अंगूठी मेज़ के किनारे पर लगकर बजी — टक।
और वो आवाज़ मुझे जानी-पहचानी लगी। वैसी ही, जैसे बबलू की सोने की चेन में लटकता चौकोर लॉकेट टिक-टिक करता था। दो अलग आदमी, दो अलग अंगूठियाँ, पर आवाज़ एक — जैसे दोनों किसी एक ही दुकान से आए हों।
"आज अस्पताल में," सलीम ने कहा, "एक बूढ़ी माँ अपने बेटे से लड़ेगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"सुन ले," उसने कहा। "आज दोपहर के आस-पास। नूर अस्पताल के नीचे वाले कमरे के बाहर। एक बूढ़ी औरत, जिसके हाथ में पुरानी पर्ची है और जिसकी बहू का इलाज तीन महीने से वहीं चल रहा है। वो अपने बेटे से लड़ेगी। सबके सामने लड़ेगी। और उस लड़ाई में वो बात निकलेगी जो तीस साल से अस्पताल की दीवारों में चुनी हुई बैठी है।"
मैंने पूछा, "आपको कैसे पता?"
सलीम ने कहा, "क्योंकि जो लड़ाई आज होने वाली है, वो कल रात तय हुई है। और उस तय में मेरा हाथ है।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो गए।
"आप गली को क्यों बेचते हैं?" मैंने कहा। "आप इस गली के नहीं हो? आपकी माँ का यहीं क्या —"
"मेरी माँ की पेटी आज भी उस छत की कोठरी में बंद है," सलीम ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा आया जो मीठा नहीं था, ठंडा नहीं था — बस थका हुआ था। "और जब तक वो पेटी बंद है, मैं इस गली का नहीं। मैं किसी का नहीं।"
वो दरवाज़े की तरफ़ चला।
उस्ताद ने उसे जाने से नहीं रोका। पर जब वो उनके पास से गुज़रा, तब उस्ताद ने कहा, "सलीम।"
सलीम रुका।
"तेरी माँ की आवाज़," उस्ताद ने कहा, "अभी भी उस पेटी में है। मैंने उसे पचास साल से सुना नहीं। पर मुझे याद है जैसे कल की बात हो।"
सलीम ने कुछ नहीं कहा।
उसका कंधा थोड़ा सा झुका।
और फिर मैंने कुछ ऐसा देखा जो मुझे नहीं देखना चाहिए था — उस आदमी की आँख में पानी आया और वो तुरंत उलट गया, जैसे कोई गिलास ज़मीन पर रखने से पहले उसे पोंछ देता है।
वो दरवाज़े से बाहर निकला।
मैंने सुना, बाहर काली शर्ट वाले ने उससे कुछ कहा — बहुत धीमी आवाज़ में। सलीम ने बस "हाँ" कहा। और फिर दोनों जाने लगे।
मैं उस्ताद की तरफ़ मुड़ा।
"उस्ताद," मैंने कहा, "ये सब —"
और तभी सलीम दरवाज़े से लौटा।
वो दरवाज़े के चौखट पर खड़ा था। पीछे से सुबह की धूप उसके कुर्ते पर पड़ रही थी और वो पूरा सफ़ेद दिख रहा था। जैसे कोई काग़ज़ खड़ा हो।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"एक बात बाक़ी थी," उसने कहा। "अभी-अभी याद आई।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"आज अस्पताल में जो लड़ाई होगी," सलीम ने कहा, "उसमें एक चीज़ बिकने वाली है। एक औज़ार। छोटा सा। पुराना सा। जिसकी बोली दस-बारह साल में एक बार लगती है।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा फैला।
"और सुन ले," सलीम ने कहा, "उस औज़ार का नाम तेरे दादा जगदीश यादव के रजिस्टर में लिखा है। उसी रजिस्टर में, जिसकी एक लाइन आज भी खाली है।"
वो मुस्कुराया। इस बार मुस्कुराहट पूरी थी। जैसे कोई पूरा हिसाब करके कलम रख देता है।
"अब जाकर अपनी बहन को संभाल," उसने कहा, "वो अस्पताल में है न?"
और वो चला गया।
धूप उसके पीछे से आई, कमरे में घुसी, और मशीन के पहिये पर रुक गई।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
वो कुर्सी पर बैठ गए। इतने धीरे से बैठे जैसे उनकी हड्डियाँ उनसे पूछ रही हों कि अब कितना और चलना है।
"उस्ताद," मैंने कहा, "कौन सा औज़ार?"
उस्ताद ने आँख बंद कर ली।
"रजिस्टर," वो बोले।
"रज़ा सलीम वाला रजिस्टर?"
"हाँ। सलीम का रजिस्टर। जिसमें हर मोहर का हिसाब है। और जिसमें तेरे दादा का नाम भी है।"
"और औज़ार?"
उस्ताद ने आँख खोली। उन्होंने मशीन की दराज़ की तरफ़ देखा, फिर अपनी मेज़ पर पड़े कपड़े के टुकड़ों की तरफ़, फिर मेरी तरफ़।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "उस औज़ार की बात मैं तुझे आज नहीं बताऊँगा। क्योंकि जिस दिन तू उसे जानेगा, उस दिन तेरे हाथ काँपेंगे। और आज तेरे हाथ नहीं काँपने चाहिए। आज तुझे गली में खड़ा होना है।"
मैंने जेब में हाथ डाला।
घंटी वहीं थी।
और अब, सलीम के जाने के बाद, बहुत धीरे से, बहुत मद्धम, उसने कहा —
"देखा?"
मैं रुका।
"क्या देखा?"
"मैं चुप रही," घंटी ने कहा। "क्योंकि जो बोलता है, वो हिसाब माँगता है। और मैं आज हिसाब नहीं माँग सकती थी।"
"क्यों?"
घंटी कुछ पल चुप रही। फिर बोली —
"क्योंकि आज जो हिसाब माँगा जाएगा, वो मेरा नहीं होगा। वो तेरे दादा का होगा।"
दरवाज़े पर टिंकू की आवाज़ आई।
"उस्ताद!" वो दौड़ता हुआ अंदर आया। उसका चेहरा लाल था, और साँस फूली हुई। "उस्ताद, मीरा दीदी मिल गईं!"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"कहाँ?"
"अस्पताल में," टिंकू ने कहा। "नीचे वाले कमरे के बाहर। बेंच पर। एक बूढ़ी औरत के पास बैठी हैं। और वो औरत —" वो रुका, साँस लेने के लिए। "उस्ताद, वो औरत अपने बेटे को गाली दे रही है। पूरी गली सुन रही है। काजल दीदी भी वहीं है।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद ने अपना चश्मा उतारा। उसे कपड़े से पोंछा। फिर बहुत धीरे से मेज़ पर रख दिया।
"जा," उन्होंने कहा। "और सुन ले — आज तू वहाँ पहुँचेगा, तो तीन चीज़ें एक साथ होंगी। एक लड़ाई, एक औज़ार, और एक रजिस्टर।"
"और आप?"
उस्ताद ने मशीन की दराज़ की तरफ़ देखा, जहाँ वो टूटी चेन की कड़ी रखी थी।
"मैं किसी और काम पर जा रहा हूँ," उन्होंने कहा। "आज मुझे अपने भाई की माँ का ताला नहीं खोलना। आज मुझे उस दरवाज़े पर जाना है, जो पचास साल से बंद है।"
मैंने पूछा, "अकेले?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराए — पहली बार उस सुबह।
"तू भी अकेले जा रहा है," उन्होंने कहा, "यही तो हमारी गलती है। चल, चार बजे तक मिलते हैं। उससे पहले दोनों अपने-अपने काम कर लें।"
मैं बाहर निकला।
गली में धूप दो कदम और आगे बढ़ आई थी। पीपल की छाया छोटी हो रही थी।
और पीछे, उस्ताद की बंद दुकान से, मुझे बहुत धीरे सिलाई मशीन की एक आवाज़ सुनाई दी — जैसे कोई पचास साल बाद पहली बार आँख खोलकर करवट बदल रहा हो।
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