The Mysterious Bell – Chapter 359
"है। डॉक्टर साहब ने दी थी। दो जाँचें और बदली दवा।"
"फार्मेसी वाले काग़ज़ के बिना नहीं देंगे। और रणवीर का काग़ज़ यही है न — कि जो दवा नहीं मिलेगी, वो उसके दफ़्तार से मिलेगी?"
काजल ने होंठ भींच लिए। "हाँ। भैया, माँ की दवा कल रात तक खत्म हो जाएगी।"
मैंने एक पल सोचा। मैंने जेब में हाथ डाला और वो लिखा हुआ काग़ज़ का टुकड़ा निकाला जो मुझे चंद्रेश सक्सेना की फाइल से झलक में दिखा था — नहीं, वो मेरे पास नहीं था। मेरे पास सिर्फ़ वो बातें थीं जो सुनकर मैंने अपने दिमाग़ में रख ली थीं।
"काजल, अगर फार्मेसी काग़ज़ माँगे, तो बोल देना कि दवा का हिसाब मैं दूँगा। और अगर वो कहे कि भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का काग़ज़ चाहिए — तो पूछ लेना, धीरे से, मासूमियत से — 'क्या मरीज़ के इलाज के लिए अंगूठा ज़रूरी है?' और उसका जवाब खुद सुन लेना।"
"क्यों?"
"क्योंकि कल मैं वो जवाब सभा में सुनाना चाहता हूँ। मेरे पास बातें बहुत हैं, पर ज़ुबान किसी और की हो, तो बात दुगुनी लगती है।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर उसने कहा, "भैया, एक बात।"
"बोल।"
"गोविंद भाई।"
मैं रुक गया।
"क्या?"
"वो जो छोटा मुनीश है — जिसने पापा का अंगूठा लिया था। वो रोज़ सुबह अस्पताल के बाहर नींबू-मिर्ची का हार लेकर खड़ा रहता है। मैंने उसे तीन दिन से देखा है। मैंने पूछा, तो वो कुछ नहीं बोला। काग़ज़ दिखा। काग़ज़ पर लिखा था, 'यादव का अंगूठा।' और उसका हाथ काँप रहा था, भैया। इतना काँपता था कि हार गिर गया।"
मैं बैठा रहा।
गोविंद भाई।
जो हर सुबह नींबू-मिर्ची का हार लाता है — मतलब बुरी नज़र उतारने के लिए। कोई अपनी गली के बाहर नहीं, कोई अपने ही दरवाज़े पर आकर खड़ा होता है, और हार लेकर, और कुछ नहीं बोलकर, और काग़ज़ पर किसी का नाम लिखकर।
वो हार उसका अपना दोष उतार रहा था। और वो जानता है — जो पापा का अंगूठा ले गया, वो अपने ही घर में मर रहा है।
"काजल," मैंने कहा, "कल सुबह तू फार्मेसी के बाद उसे गुमटी पर ले आ। नहीं — नहीं, गुमटी पर नहीं। चबूतरी पर। और उससे कोई काग़ज़ मत माँगना। सिर्फ़ उससे कह देना कि उस्ताद तुझे याद कर रहे हैं।"
"क्या वो आएगा?"
"आएगा," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में एक अजीब सी पक्की बात थी। "जो आदमी रोज़ सुबह किसी के बाहर हार लेकर खड़ा हो, वो बस इंतज़ार कर रहा होता है कि कोई उसे बुला ले।"
और तभी बाहर आँगन में पैरों की आवाज़ आई। तेज़, बेतरतीब, फिसलती हुई। जैसे कोई दौड़कर आ रहा हो और रास्ता भूल गया हो।
दरवाज़े पर टिंकू खड़ा था।
उसका चेहरा सफ़ेद था। सफ़ेद नहीं — पीला। ऐसा पीला जैसे किसी ने उसका खून ज़रा देर के लिए उधार ले लिया हो। उसके हाथ में टॉर्च थी, और टॉर्च जल रही थी पर उसकी रोशनी काँप रही थी।
और टिंकू की साँस ऐसे चल रही थी जैसे वो बहुत दूर से भागकर आया हो।
मैं उठ खड़ा हुआ।
"टिंकू?"
"उस्ताद।"
"बोल, क्या हुआ?"
वो एक क़दम आगे आया, और फिर बोला — और उसकी आवाज़ इतनी छोटी थी कि कमरे में किसी ने पहली बार अपनी साँस रोक ली।
"दुकान का शटर उठा हुआ है," उसने कहा। "पीछे का कमरा खुला है। बत्ती जल रही है। और उस्ताद — पापा वहाँ नहीं हैं।"
काजल उठ खड़ी हुई। "कहाँ गए?"
"नहीं पता।" टिंकू की आवाज़ काँप गई। "पर उस्ताद, उस्ताद — तुम्हारे घर की तरफ़ से आते वक़्त, मैंने… मैंने वो संदूक देखा।"
मेरा सीना एक झटके में ठंडा हो गया।
"क्या देखा?"
"उसका ताला खुला पड़ा है," टिंकू ने कहा। "और रस्सी कटी हुई है। किसी ने काटी है, उस्ताद। धागे अभी भी ज़मीन पर पड़े हैं। और अंदर से कुछ निकाला गया है — इसकी जगह खाली है, धूल में एक चौकोर साफ़ निशान बन गया है।"
माँ ने मेरी कलाई पकड़ ली। उनकी पकड़ में ताक़त नहीं थी, पर बहुत कुछ था।
और मेरी जेब में घंटी गरम हो गई, और उसने सिर्फ़ तीन शब्द कहे — "अब देर नहीं।"
॥
रात के उस हिस्से में गली इतनी चुप थी कि मुझे अपने ही पैरों की आवाज़ बड़ी लग रही थी।
टिंकू आगे भाग रहा था, और मैं उसके पीछे। माँ काजल के सहारे चल रही थीं, पर चल रही थीं। उन्होंने मेरी बात नहीं मानी कि आप अस्पताल में रुक जाइए। उन्होंने बस इतना कहा कि मेरे घर का ताला खुला है, तो मैं वहाँ नहीं बैठ सकती।
दुकान का शटर आधा उठा था।
आधा नहीं — चार अंगुल जितना। इतना कि कोई साइड से झुककर अंदर जा सके। और बगल में उन्नीस नंबर की दुकान का शटर, जो महीने भर से बंद था, वो भी उसी हद तक उठा था।
मैं रुक गया।
टिंकू ने पीछे से कहा, "उस्ताद, मैंने ऐसे ही देखा था। मैंने छुआ नहीं।"
"तूने ठीक किया। बाहर खड़ा रह।"
"मैं अंदर आऊँगा।"
"टिंकू —"
"मैं अंदर आऊँगा," उसने दोहराया, और उसकी आवाज़ डर रही थी, पर पीछे नहीं। "अकेले मत जाइए।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ में टॉर्च थी, और टॉर्च की रोशनी में उसकी आँखें चमक रही थीं। उम्र तेरह साल, कद मेरे कंधे तक, और ज़िद एक पहाड़ जैसी।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर मेरे पीछे। और जो दिखे, वो ज़ुबान से पहले मुझे आँख से बताना।"
वो सिर हिलाकर पीछे आ गया।
मैंने शटर उठाया। उसमें से आवाज़ आई — वो खड़खड़ाहट जो मैं सालों से सुनता आया हूँ, पर आज वो किसी की खाँसी जैसी लगी।
अंदर घुसा।
पीछे का कमरा खुला था, और बत्ती जल रही थी। वो पुराना बल्ब, जो हमेशा गुनगुनाता है। आज वो भी धीमा गुनगुना रहा था, जैसे किसी ने उसका गला दबा दिया हो।
मेरी नज़र पहले औज़ारों के ट्रंक पर गई। खुला था। और उसके अंदर सब कुछ बिखरा पड़ा था — पेचकस, रिंच, प्लायर, वो पुराना हथौड़ा जिसका दस्ता मैंने खुद लगाया था। कोई कुछ लेकर नहीं गया था। सब वहीं था। बस फेंका हुआ था।
फिर गिरी हुई स्टूल। फिर मेज़ पर उलटा पड़ा स्टील का गिलास। फिर दीवार पर टेढ़ा टँगा वो कैलेंडर, जो हमेशा टेढ़ा ही रहता है।
और गल्ले का डिब्बा।
मैंने उसे खोला। उसमें वही था जो कल शाम था। एक भी रुपया कम नहीं।
मैं वहीं खड़ा रह गया, और मेरे अंदर एक बात ठंडी होकर बैठ गई — चोर पैसा नहीं लेता, तो चोर नहीं था। कोई और था। कोई ऐसा, जिसे सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए थी।
"भैया," काजल ने बाहर से आवाज़ दी। "पापा के चप्पल यहीं हैं।"
मैं बाहर आया। दरवाज़े के पास, दोनों चप्पल, जोड़ी में रखे हुए। यानी पापा ने चप्पल पहनकर नहीं — यहाँ से उतारकर रखे थे। पर चप्पल उतारकर कोई बाहर नहीं जाता, अगर जाना अपनी मर्ज़ी से हो।
माँ ने उन चप्पलों को देखा और उनका चेहरा वो हो गया, जो मैंने बहुत कम देखा है।
"सुशीला," मैंने धीरे कहा, पर वो मेरी तरफ़ नहीं देखीं। वो उन चप्पलों को ऐसे देख रही थीं जैसे कोई उन्हें लेकर चला गया हो।
तभी मुझे एक गंध आई।
ट्रंक के पास, बत्ती की गरमी में, हल्की सी गंध — साबुन और धूप की। वो गंध, जो उन लिफ़ाफ़ों से आती थी। वो गंध, जो उस्ताद ने उस बैग में सूँघी थी, जो सफ़ेद कुर्ते वाला दुकान की मेज़ पर छोड़ गया था।
मैंने कुछ नहीं कहा।
घंटी ने कहा — "महक बोलती है। पर गवाही नहीं देती।"
और मुझे लगा कि आज घंटी भी मेरे जितनी ही अंधेरे में है।
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घर पहुँचे तो आँगन का दरवाज़ा खुला था।
अंदर अंधेरा था, पर उस अंधेरे में भी मैंने वो जगह देख ली जहाँ संदूक रखा था। कोना खाली लग रहा था, जैसे कमरा भी जान गया हो कि उसका एक कोना कट गया है।
माँ पहले अंदर गईं।
उन्होंने लाइट जलाई। और जो दिखा, उस पर किसी ने एक शब्द नहीं कहा।
संदूक खुला था।
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