The Mysterious Bell – Chapter 356
"बी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूट रही थी, "मेरे पापा ने यह क्यों किया?"
"क्योंकि वो बाप हैं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में एक ममता थी जो माँ की होती है। "बाप अपना दर्द बेटे के हिस्से में नहीं डालता। वो अपना दर्द अपने सीने में दबाकर मर जाता है, पर बेटे को एक दिन चैन से सोने देता है। तेरे पापा ने भी वही किया।"
मैंने आँखें पोंछीं।
"अब सुन मेरी बात," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में फिर वो सख़्ती आ गई जो शुरू में थी। "यह काग़ज़ मैं तुझे नहीं दे रही। यह काग़ज़ तेरे पापा के पास है, और उनके पास रहेगा। यह मेरी शर्त है।"
"पर बी, अगर कल सुबह दस बजे बोर्ड लग गया —"
"बोर्ड लगने दो," उन्होंने कहा। "दीवार गिरने दो। मैंने उन चीज़ों से लड़ना नहीं छोड़ा। पर यह काग़ज़ — यह मेरा सलीम है। इसे मैं किसी के हाथ में नहीं दूँगी।"
वो उठीं।
"तू जा," उन्होंने कहा। "कल सुबह दस बजे की सभा में जा। और मेरी तरफ़ से यह कह — सकीना बी जानती है कि उस ज़मीन का काग़ज़ किसके पास है। और वो कल उस सभा में खुद आएँगी।"
मैं ठिठक गया।
"आप — आप आएँगी?"
"बाईस साल में पहली बार," उन्होंने कहा। "क्योंकि तेरे पापा ने आज मुझे यह नहीं कहा कि वो आज अंगूठा मिटाने की बात कर रहे हैं। उन्होंने सिर्फ़ यह कहा कि उन्होंने उस रात खुद को दोषी माना था।"
वो फिर कुर्सी पर बैठीं।
"बेटा, मुझे अब पता चला है कि तेरे पापा बाईस साल से उस काग़ज़ को सीने से लगाए हुए घूम रहे थे। यह मैंने नहीं पूछा था उनसे। कभी नहीं पूछा। मैंने उस रात उन्हें वो काग़ज़ दिया और भूल गई। पर वो भूल नहीं गए। वो याद रखे हुए थे, बरसों। और अब वो उसे सामने लाने वाले हैं। इसलिए जब वो लाएँ, तो मैं भी वहाँ होनी चाहिए।"
मैंने उनके हाथ चूमे।
"बी," मैंने कहा, "मेरे पापा ने उस रात आपका हाथ पकड़ा था।"
"हाँ।"
"तो कल सभा में मेरे पापा आपकी तरफ़ देखेंगे।"
"देखने दो," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में एक मुस्कान थी। "मैं भी उनकी तरफ़ देखूँगी।"
मैं उठा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
फिर रुका।
"बी," मैंने कहा, "एक बात। आपने पहले कहा कि उस रात सलीम भाई के साथ कोई चलने वाला था। क्या कोई और भी था — किसी और का नाम?"
"तेरे पापा ने एक नाम बताया था," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ एकदम सपाट हो गई। "वो नाम शायद अजीब लगे। उस रात के बाद तेरे पापा ने मुझे बताया कि उन्हें भारद्वाज के दफ़्तार में एक आदमी मिला था — जिसने कहा कि वो उन्हें बचाएगा। उस आदमी के हाथ में सिर्फ़ एक काग़ज़ था, जिस पर लाल निशान था।"
"कौन था वो?"
"नाम नहीं बताया।" उन्होंने कहा। "पर उस आदमी की उँगली में एक अंगूठी थी। काली। और वो अंगूठी अब तक —"
मेरे हाथ की मुट्ठी कस गई।
अंगूठी मरती नहीं। हाथ बदलती है।
मैंने दरवाज़ा खोला। शटर थोड़ा ऊपर किया। बाहर सड़क की हवा आई — ठंडी, नम, और किसी पुराने काग़ज़ जैसी बू आती हुई।
टिंकू चबूतरी से उछलकर आया।
"उस्ताद?"
"चल," मैंने कहा। "पहले घर।"
"कहाँ?"
"पापा के पास।"
सकीना बी दरवाज़े तक आईं। उन्होंने मेरे हाथ में वो टिन का बक्सा थमा दिया, जिसमें वो छोटी कॉपी थी।
"यह ले जा," उन्होंने कहा। "कल सभा में तेरे पापा के हाथ में दे देना। और कहना — शंकर, तुमने कसम निभाई। अब मैं निभाऊँगी।"
मैंने बक्सा पकड़ा और सिर नीचा किया।
जब मैं साइकिल पर बैठा, तो घंटी फिर बजी।
टिन।
"क्या?" मैंने कहा।
"दस अंक," घंटी ने कहा। "काग़ज़ का दरवाज़ा जुड़ा। पर असली दरवाज़ा आज रात खुलेगा।"
मैंने हैंडल कसा और साइकिल आगे बढ़ा दी।
पीछे सकीना बी की दुकान का शटर धीरे से नीचे आया — पूरी तरह नहीं, थोड़ा-सा ऊपर रह गया। जैसे उन्होंने बाईस साल बाद पहली बार दरवाज़ा बंद किया हो, पर अंदर से सिर्फ़ आधा, इसलिए कि कल हो सकता है कोई आए।
पीपल की डाल पर कोई पक्षी एक बार बोला और चुप हो गया।
और मेरी जेब में घंटी गरम थी, ऐसे गरम जैसे सलीम अहमद का नाम अब भी किसी के दिल में बचा हो।
॥
साइकिल की चेन जब चलती है तो एक अजीब सी आवाज़ करती है। जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी चढ़ते वक़्त हाँफ रहा हो। मैंने उसे कभी ठीक नहीं किया। आज रात वो आवाज़ मुझे बुरी नहीं लग रही थी। क्योंकि इस वक़्त मेरे अंदर भी कुछ ऐसा ही चल रहा था। हाँफता हुआ, अटकता हुआ, और बंद न होता हुआ।
टिंकू पीछे बैठा था और हर दो मिनट में मेरी कमर में उँगली मारकर पूछ रहा था, "उस्ताद, वो बक्सा क्या है?"
"बक्सा है।"
"अंदर क्या है?"
"काग़ज़।"
"काग़ज़ में क्या लिखा है?"
"कुछ लिखा है।"
"क्या लिखा है?"
मैंने ब्रेक मारी। साइकिल रुकी। टिंकू का सिर मेरी पीठ से टकराया।
"टिंकू," मैंने कहा। "अगर तुझे सारे जवाब आज रात ही चाहिए, तो बड़ा होकर डॉक्टर मत बनना। पहले सीख कि सवाल कैसे पूछा जाता है।"
"मतलब?"
"मतलब यह कि हर सवाल का जवाब टटोलने से नहीं मिलता। कभी-कभी सवाल वो पूछना पड़ता है जिसे सामने वाला चुपचाप दबाए बैठा हो।"
टिंकू ने एक मिनट सोचा और बोला, "मतलब पापा से सीधे पूछना है?"
मैं हँस पड़ा। इस उम्र में और इतनी सीधी बात। मैंने उसका सिर खरोंचा और साइकिल आगे बढ़ा दी।
गली इतनी देर रात भी सोई नहीं थी। पीपल के नीचे एक चिमनी जल रही थी, दूर किसी दरवाज़े पर पीली बत्ती टिमटिमा रही थी, और अस्पताल के गेट के सामने सफ़ेद तंबू की जो खाली छड़ें खड़ी थीं, वो अंधेरे में किसी के पिंजरे जैसी लग रही थीं। ज़मीन पर कंबलों के फटे काग़ज़ पड़े थे। किसी ने पैर से कुचल दिए थे।
पीछे मेरे साथ सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू आ रहे थे। चारों साइकिलों पर नहीं थे, कभी दौड़ते, कभी हाँफते। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो सानिया मेरी तरफ़ इशारा कर रही थी कि चलो, चलो।
"तुम चारों घर जाओ," मैंने कहा। "आज रात काम खत्म।"
"नहीं," सानिया ने कहा। "हम उस्ताद को अकेले नहीं जाने देंगे।"
"मैं घर जा रहा हूँ, चोरी करने नहीं।"
"तो हम भी चलेंगे। घर में क्या है?"
"मेरी माँ है," मैंने कहा। "और एक पुराना संदूक।"
गुड्डू ने तुरंत बीच में आकर कहा, "संदूक में खज़ाना है?"
"हाँ," मैंने कहा। "बहुत बड़ा खज़ाना है। उसमें मेरे पापा की चुप्पी है। तोलकर देखोगे?"
बच्चे चुप हो गए। बच्चे जब चुप होते हैं, तो समझ लो कि बात उनके सिर से ऊपर निकल गई।
मैंने बच्चों से कहा कि गुमटी के पास वाली बेंच पर बैठो, शबनम आपा गरम दूध पिला देंगी, और आधे घंटे में मैं वापस आऊँगा — और मैंने वादा किया कि जो कुछ मिलेगा, सबको बताऊँगा। वादा करने की बुरी बात यह है कि तुम्हें उसे पूरा करना पड़ता है। और मैं जानता था कि शायद मैं पूरा न कर पाऊँ।
घर की गली में घुसते वक़्त साइकिल का टायर किसी कीले पर चढ़ा और घंटी अपने आप बज गई।
टिन।
मैं थोड़ा रुका।
"बोल।"
घंटी की आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे वो खुद ही थकी हुई हो। "घर में जो मिलेगा, वो तेरे पास नहीं रहेगा।"
"मतलब?"
"मतलब, आज रात कुछ बाहर जाएगा।"
मैंने साइकिल खड़ी की और हैंडल पर हाथ रखकर एक मिनट खड़ा रहा।
"कुछ बाहर जाएगा," मैंने दोहराया। "यह कैसी चेतावनी है? साफ़ बोल।"
घंटी चुप हो गई। तीन सवाल पूछने के बाद वो हमेशा ऐसे चुप होती है जैसे कोई बुज़ुर्ग कह दे — अब तू खुद सोच।
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