The Mysterious Bell1504 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1504

7 min read November 5, 2026

वो चुप रहता है। और उस चुप्पी में मैं सुनता हूँ कि उसका नाम वो चीज़ है जो मुझे नहीं बताया जा सकता, क्योंकि उसे कोई नाम दिया ही नहीं गया था। उसे किसी ने बनाया नहीं था। उसे किसी ने तोड़ा था।

“नाम की ज़रूरत नहीं,” वो आख़िर में कहता है। “जिसको लोग पुकार लें, वो नाम रखता है। अपने लोगों को पुकारना। बस।”

मैं हँस पड़ता हूँ। सच में हँसता हूँ। पेट से।

“ठीक है,” मैं कहता हूँ। “तू आराम कर।”

और मैं साइकिल आगे बढ़ा देता हूँ।

पीछे घंटी की आवाज़ धीमी होने लगती है। पर वो ऐसे धीमी नहीं होती जैसे कोई चीज़ खत्म हो रही हो। वो ऐसे धीमी होती है जैसे कोई चीज़ दूसरी चीज़ों में घुल रही हो — गुमटी में पानी की खदबद में, किसी के बर्तन धोने में, उस्ताद की मशीन की टिक-टिक में, बच्चों के पतंग वाली चिल्लाहट में, माँ के टिफ़िन की ढक्कन की खटक में।

और उसके बाद मुझे पता नहीं चलता कि घंटी कहाँ खत्म हुई और गली कहाँ शुरू।

मैं गली में चलता हूँ। मैं धीरे चलाता हूँ, क्योंकि जल्दी करने का कोई काम नहीं है। रोज़ जल्दी करता था, और मुझे पता है अब मुझे जल्दी नहीं करनी है।

मैं उस्ताद की दुकान के सामने से गुज़रता हूँ। दुकान के अंदर पुरानी सिलाई मशीन की टिक-टिक है। उस्ताद सिलाई कर रहे हैं और इलियास भाई उनके सामने बैठे हैं, और उनका चेहरा उस पीली रोशनी में बिल्कुल वैसा दिखता है जैसा किसी बच्चे का चेहरा होता है जिसे लौटकर कोई पुरानी चीज़ मिल गई हो।

गुमटी के पास रज़िया प्याली धो रही हैं और शबनम आपा किसी को डाँट रही हैं — पर वो डाँट अब किसी ऐसे को है जो उन्हें छेड़ रहा है, चाय के पैसे छोड़कर भाग रहा है। कटोरी में पैसा गिरता है और शबनम आपा उसे गिनती हैं और कहती हैं, “दो रुपये कम हैं, अगली बार पूरे लाना।” और वो लड़का हँसता है।

चबूतरी पर बुज़ुर्ग बैठे हैं। बंसी बाबा और रहमत बाबा आज एक ही तरफ़ बैठे हैं, कंधे से कंधा लगाकर, और उनके बीच में एक चाय का प्याला है। इब्राहीम चाचा अपनी तस्बीह घुमा रहे हैं और बृजमोहन बाबा अपनी लाठी के सहारे बैठे हैं, और मुझे लगता है कि उन दोनों की चुप्पी के चालीस साल आज एक-दूसरे से बातें कर रहे हैं।

मैं उन्हें देखकर अपने आप मुस्कुरा देता हूँ।

और फिर मैं गली के मोड़ की तरफ़ जाता हूँ, जहाँ से दूसरी गली शुरू होती है, जहाँ से स्कूल की छत दिखती है और जहाँ से अस्पताल की नई बगिया का किनारा।

और वहीं मुझे कोई पुकारता है।

“अंकुश यादव!”

आवाज़ अनजानी है। मर्द की है, पर बूढ़ी नहीं। मैं साइकिल रोकता हूँ। ब्रेक की तार चरचराती है, क्योंकि वो कभी ठीक नहीं की। मैं पलटता हूँ।

मोड़ पर एक आदमी खड़ा है।

उम्र पचास के आसपास होगी। कद मझोला। कपड़े सादे हैं और साफ़ हैं, पर वो ऐसे साफ़ हैं जैसे किसी ने उन्हें आज सुबह ही धोया हो, नए कपड़ों जैसे नहीं। उसके हाथ में एक चीज़ है। एक घड़ी।

टूटी घड़ी।

वो उसे दोनों हाथों से पकड़े खड़ा है, जैसे कोई पकड़े हुए हो किसी चिड़िया को जो उड़ जाने का डर दे रही हो। घड़ी का चमड़े का पट्टा टूटा हुआ है, काँच पर बाल जैसी दरार है, और उसके काँटे रुके हुए हैं।

वो मेरी तरफ़ देखता है।

मैं घंटी की तरफ़ नहीं देखता। मैं उसकी तरफ़ देखता हूँ।

“आपने मुझे पुकारा?” मैं पूछता हूँ।

“अंकुश यादव,” वो कहता है, और मेरा नाम फिर बोलता है, इस बार धीमे से, जैसे पहचान रहा हो। “तुम वही हो।”

“मैं वही हूँ,” मैं कहता हूँ। “अब आप कौन हैं?”

वो कुछ नहीं कहता। बस घड़ी आगे बढ़ा देता है।

मैं साइकिल से उतरता हूँ। साइकिल को स्टैंड पर लगाता हूँ। मैं उसके पास जाता हूँ और घड़ी की तरफ़ देखता हूँ।

“घड़ी ठीक करवानी है?” मैं पूछता हूँ।

“हाँ,” वो कहता है।

“काफ़ी पुरानी है।”

“बहुत पुरानी है। दो दिन से बंद है।”

मैं उसकी तरफ़ देखता हूँ। उसकी आँखों में कुछ है जो डर नहीं है। कुछ और है — कुछ ऐसा जो इंतज़ार का बहुत लंबा हो चुका है और अब थक गया है।

“दो दिन?” मैं कहता हूँ। “घड़ी बंद होने की तारीख़ भी आदमी को याद रहती है।”

वो हल्का मुस्कुराता है। वो मुस्कान पुरानी है, पर किसी की नकल जैसी नहीं लगती। जैसे कोई बरसों बाद मुस्कुराया हो, और याद न हो कि कैसे मुस्कुराते हैं।

“मेरे बाप की घड़ी है,” वो कहता है। “वो इसे नहीं ठीक करवाते। उन्होंने कहा कर दिया था कि जब रुके, तो समझ लेना कि वक़्त यहीं रुका है।”

“और आपने आज इसे ठीक करवाने की सोची?”

“मैंने सोची नहीं,” वो कहता है। “मुझे रास्ता भेज दिया गया।”

“कौन?”

वो मेरी आँखों में देखता है। फिर वो अपना हाथ उठाता है — धीरे से, बिना झटके — और अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाता है, जैसे मुझे कुछ दिखाना हो। उसकी हथेली पर कुछ नहीं है। बस उँगलियों के जोड़ पर एक बहुत हल्का, पीला सा निशान है, जो पुरानी जले हुए निशान जैसा लगता है।

और मुझे यह कहने की ज़रूरत नहीं कि मेरे अंदर घंटी नहीं बजी। घंटी चुप रही। और मुझे समझ आ गया कि यह आख़िरी बात है जो घंटी ने कही थी — “अब तुम्हारा काम मुझसे नहीं, लोगों से चलेगा”। असली बात यही थी।

मैं घड़ी लेता हूँ। मैं उसे उलटता-पलटता हूँ। पट्टा टूटा है, काँच में दरार है, पर सबसे बड़ी बात — उसके काँटे रुके हुए हैं और उसका छोटा काँटा दस पर अटका है।

“लाइए,” मैं कहता हूँ। “देखते हैं क्या टूटा है।”

वो नहीं हँसता, पर उसकी आँखें हल्की हो जाती हैं।

“तुम जानते हो मैं कौन हूँ?” वो पूछता है।

“नहीं,” मैं सच कहता हूँ। “पर आपने मुझे नाम से पुकारा। इसका मतलब आप मुझे जानते हैं। और जो मुझे जानता है और नाम से पुकारता है, वो आम आदमी नहीं होता।”

वो कुछ देर मुझे देखता रहता है।

“मुझे तुम्हारे पास एक काम से आना था,” वो कहता है।

“क्या काम?”

“तुम्हारे पास एक काग़ज़ है,” वो कहता है। “किसी दराज़ में। जिस पर इलियास की बात लिखी है।”

मेरा हाथ रुक जाता है। घड़ी मेरी हथेली में है और उसका पीतल ठंडा है, एकदम ठंडा, बर्फ जैसा।

“आपको यह कैसे पता?” मैं पूछता हूँ।

“क्योंकि,” वो कहता है, “वो काग़ज़ मेरे पास भी है। और मेरे वाले काग़ज़ पर इलियास की वो बात नहीं लिखी है। मेरे वाले पर लिखा है कि तीसरा आदमी कौन था।”

सड़क पर से कोई साइकिल घंटी बजाकर निकल जाता है। दूर कहीं बच्चा हँसता है। गुमटी से शबनम आपा की आवाज़ आती है — “एक और चाय!” और सब कुछ इतना सामान्य है कि मुझे अपने कानों पर शक होने लगता है।

“आप कौन हैं?” मैं दोबारा पूछता हूँ। इस बार आवाज़ में वो हल्कापन नहीं है।

वो मेरी ओर हाथ बढ़ाता है — नहीं, घड़ी की ओर — और अपनी उँगली घड़ी के टूटे काँच पर रखता है।

“मैं वो आदमी हूँ,” वो कहता है, “जो बाईस साल पहले तुम्हारे पापा को उलटी तरफ़ से मिला था।”

मैं साँस लेना भूल जाता हूँ।

“और मैं,” वो कहता है, “वो आदमी हूँ जिसे तुम्हारे पापा ने अपना बड़ा भाई समझा।”

और तभी दूर, बहुत दूर, जैसे पुराने बिजलीघर के छह बक्सों वाली तरफ़ से, एक आवाज़ आती है — धीमी, चटकने जैसी, पर बहुत छोटी।

मैं घड़ी को हथेली में कसकर पकड़ लेता हूँ।

“अंदर चलिए,” मैं कहता हूँ। “चाय पीते हैं। और फिर आप वो बताइए जो आप बताने आए हैं।”

वो सिर हिलाता है।

मैं साइकिल का हैंडल पकड़कर मुड़ता हूँ, और मेरे पीछे वो चलता है, और मुझे लगता है कि आज गली में जो नया हुआ है, वो किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा जाएगा।

कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो सिर्फ़ चलकर ही पता चलती हैं।

और हम चले।

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