The Mysterious Bell1438 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1438

7 min read November 5, 2026

"मैं गाँव तीन साल पहले गया था। तीन साल पहले की नाली का हिसाब आज दे रहा है?"

"और वो पीपल की जड़? वो जड़ मेरी दीवार उठा रही है। उसे काटना पड़ेगा।"

"पीपल काटेगा? पीपल? उस पीपल पर मेरे बाप की छाया है!"

"तेरे बाप की छाया मेरी दीवार में क्यों घुस रही है?"

और फिर दोनों एक साथ बोलने लगे। दीवार, ईंट, चूना, नाली, पुश्ता, जड़, पत्थर, तीन साल, बारह साल, "मैंने तो पहले ही कहा था", "तूने तो पत्थर भी नहीं दिया", "मैंने दिया था", "नहीं दिया था"।

मैं वहीं खड़ा रह गया।

मेरे हाथ में घंटी थी, जो पीतल से बनी थी और जिसने आज रात तक हज़ारों बातें कही थीं, और मेरे सामने दो आदमी एक दीवार के हिस्से बाँट रहे थे — जैसे पूरी गली का सच एक ईंट के नीचे दबा पड़ा हो।

मैंने सोचा, भाई, यहाँ पाँच साल का काग़ज़ बोला, बाईस साल का अंगूठा बोला, और तुम दोनों को दीवार की ज़मीन सूझ रही है?

मैंने मुँह खोला ही था कि बीच से एक आवाज़ आई।

"चाचा!"

टिंकू।

वो अपनी जगह से उठा और सीधा उन दोनों के बीच में जाकर खड़ा हो गया। उसके घुटने पर पट्टी बँधी थी, उसकी कमीज़ की जेब से कोई पेंच झाँक रहा था और उसकी आवाज़ में वो ढीठपन था जो सिर्फ़ तेरह साल की उम्र में आता है।

उसने एक हाथ सानिया के अब्बा की तरफ़ किया और एक हाथ गुड्डू के पापा की तरफ़।

"चाचा, वो दीवार तो मैंने गिराई थी।"

दोनों आदमी रुक गए।

"क्या?" सानिया के अब्बा ने कहा।

"मैंने," टिंकू ने कहा। "गेंद से। पिछले हफ़्ते। गली में क्रिकेट खेल रहे थे और मेरी गेंद सीधी उसी दीवार के ऊपर गई। ऊपर वाला हिस्सा गिर गया। और गेंद गई सीधी तेरे आँगन में, नीम के नीचे, टूटी बाल्टी के पीछे। वो अब भी वहीं पड़ी है, चाचा। तेरी अम्मी ने उसे उठाकर रख दिया, ये नहीं पता कि किसकी है।"

एक सेकंड का सन्नाटा।

फिर मैदान फट पड़ा।

हँसी ऐसी उठी जैसे दो सौ अठारह दीयों ने एक साथ हँसना शुरू कर दिया हो। पीछे बैठी कोई औरत इतनी ज़ोर से हँसी कि उसका दुपट्टा सिर से खिसककर आँगन में गिर गया। सानिया और रफ़ीक़ एक साथ चिल्लाए और चिंटू इतना हँसा कि वो बेंच से पीछे गिर गया — और गिरकर भी हँसता रहा, ज़मीन पर पड़ा-पड़ा, जैसे उसके पेट में कोई चीज़ फँस गई हो। गुड्डू अपने पापा की तरफ़ देखकर और ज़ोर से हँसा, और उसकी माँ ने उसे घूरकर चुप कराना चाहा, पर वो खुद हँस रही थी।

बबलू ने सबसे पहले ताली बजाई। फिर भोला भाई ने। फिर वो आवाज़ें आईं, "अरे, गेंद से!" — "गेंद से दीवार!" — "ये लड़का अगली बार बादल गिरा देगा!"

माँ कुर्सी पर हँसने लगीं और हँसते-हँसते खाँसने लगीं, और काजल उनकी पीठ थपथपाने लगी। माँ ने खाँसी के बीच ही कहा, "ये लड़का बड़ा होकर क्या करेगा — पता है न? ठीक वक़्त पर गेंद फेंकना।"

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा, पर उनका कंधा हिलने लगा और मैंने देखा कि वो मुस्कुरा रहे हैं — पहली बार उस पूरी शाम में। उनके चश्मे के पीछे उनकी आँखें भीगी थीं और वो मुस्कुरा रहे थे, और वो नज़ारा मुझे उस पूरे दिन में सबसे अच्छा लगा।

मैं भी हँसा।

मैंने भीड़ को देखा, दीयों को देखा, और मैंने सोचा — आज पूरे दिन मैं यही सोचता रहा कि सच बोलने के लिए लोगों को तैयार करना पड़ेगा। तैयारी की ज़रूरत ही नहीं थी। लोगों को सिर्फ़ एक बार हँसने की ज़रूरत थी, ताकि उनके अंदर का डर ढीला पड़ जाए। डर हड्डी जैसा होता है, भाई। एक बार हिल जाए तो फिर टूटता है।

सानिया के अब्बा और गुड्डू के पापा मैदान के बीच में खड़े थे, और दोनों के हाथ अब भी हवा में थे — जैसे कोई उन्हें बीच में पकड़कर रोक दे रहा हो। धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि पूरा मैदान उन्हीं को देखकर हँस रहा है।

सानिया के अब्बा ने अपना हाथ नीचे किया। गुड्डू के पापा ने भी।

दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

सानिया के अब्बा ने गर्दन के पीछे हाथ फेरा। गुड्डू के पापा ने अपने पैर की तरफ़ देखा, जहाँ चप्पल नहीं थी, और फिर उन्होंने जल्दी से चप्पल पहनी।

एक पल रुके।

फिर सानिया के अब्बा ने कहा, "अरे, तू… तू बोल क्यों रहा था?"

"मैं?" गुड्डू के पापा ने कहा। "तू बोल रहा था।"

"मैं तो… मैं तो बस…"

और फिर दोनों ने एक ही साँस में कहा, "माफ़ कर।"

एक साथ।

इतना एक साथ कि चिंटू ने फिर से हँसी शुरू कर दी और भीड़ में एक और लहर उठी — पर इस बार वो लहर हँसी से ज़्यादा राहत जैसी थी। दोनों आदमी एक-दूसरे की तरफ़ बढ़े और उन्होंने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा। पहले हाथ, फिर कंधा, फिर दोनों ने एक-दूसरे को ऐसे खींचा जैसे बरसों बाद मिले हों। सानिया की अम्मी ने आँचल से मुँह ढक लिया और गुड्डू के पापा की बीवी ने ज़ोर से एक लंबी साँस छोड़ी जो पूरी गली ने सुनी।

और मेरी जेब में घंटी गरम हुई।

धीरे से। बिना बजे। बस एक हल्की गरमाहट, जैसे किसी ने दूर से नई सिलाई का धागा खींचा हो और वो मेरे पीतल तक आ पहुँचा हो।

फिर वो बोली।

"एक और तार जुड़ गया।"

बस इतना। कोई लंबा भाषण नहीं, कोई जादू नहीं। एक और तार। और मैंने अपनी जेब में हाथ डालकर घंटी को छुआ, और मुझे लगा मेरे हाथ की खाल के नीचे कोई पतली सी लकीर बन रही है।

मैंने मन में कहा — अंकुश, याद रखना। ये जोड़ दीवार नहीं जोड़ता, भाई। ये जोड़ शर्म जोड़ता है। एक आदमी जब अपनी ही बात पर शर्मिंदा होकर दूसरे से माफ़ी माँगता है, तो उन दोनों के बीच पड़ी दीवार — असली दीवार — अपने आप गिर जाती है। ईंटों वाली दीवार तो टिंकू ने गिराई थी। असली दीवार आज इन दोनों ने गिराई थी।

मैं मुस्कुराया और मैंने माँ की तरफ़ देखा।

माँ ने मेरी तरफ़ देखकर होंठ हिलाए — "देखा, मैंने कहा था न।"

मैंने सिर हिलाया।

और फिर वो आवाज़ आई।

ठक।

मैदान में सब रुक गए।

ठक।

कोई लाठी ज़मीन पर पड़ रही थी। धीरे। बराबर अंतर पर। चलने की आवाज़ नहीं — जान-बूझकर पटकी जा रही लाठी। जैसे कोई कहे, रास्ता दो, और ज़ोर लगाकर कहे।

ठक।

भीड़ हिली और भीड़ के बीच से एक रास्ता बनने लगा — जैसे पानी के बीच से कोई नाव निकल रही हो। लोग एक-एक करके किनारे हो रहे थे, और उस रास्ते के आख़िर से दो आदमी आगे आ रहे थे।

खाकी पैंट। खाकी कमीज़। कमर पर बेल्ट, कमर के पास लटकती लाठी। दोनों के चेहरे सपाट, दोनों की नज़र सामने, दोनों के जूते उसी लय में उठते-गिरते जैसे कोई ताल हो।

और उनके पीछे — चंद्रेश सक्सेना।

सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद घड़ी। चमकते जूते। हाथ में मोटा रजिस्टर, जिसके कोने पर पीतल की पत्ती चढ़ी थी और जिस पर नीली गोल मुहर ऐसे चमक रही थी जैसे अभी लगाई गई हो। वो मुस्कुरा रहे थे। वो हमेशा मुस्कुराते हैं। उनकी मुस्कान में कभी गुस्सा नहीं होता, इसीलिए वो सबसे खतरनाक है।

वो आगे आए, दोनों सिपाहियों के बीच में रुके, और उन्होंने रजिस्टर खोला।

धीरे। जान-बूझकर धीरे। पन्ने का आवाज़ पूरे मैदान ने सुना — फर्र।

"बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो मिठास थी जो मुझे बचपन से चिढ़ाती है, "मैं आप सबका वक़्त नहीं लूँगा।"

उन्होंने रजिस्टर के पहले पन्ने पर उँगली रखी।

"ये सभा दर्ज है। इसकी इजाज़त है। और इसके साथ एक सूची भी जमा हुई है — जिनके नाम इस सूची में हैं, वही बोलेंगे।"

उन्होंने रुककर मैदान को देखा।

"जिसका नाम इस रजिस्टर में नहीं है, उसकी गवाही दर्ज नहीं होगी।"

किसी ने कुछ नहीं कहा।

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