The Mysterious Bell – Chapter 1301
उस्ताद ने सिर हिलाया। धीरे से। जैसे अंदर ही अंदर कह रहे हों — यही तो पचास साल से मैं कहता आया हूँ।
"तो हम क्या करेंगे?" मीरा ने पूछा।
"हम कुछ नहीं करेंगे," मैंने कहा। "हम बस सच बोलेंगे। एक-एक आदमी। अपनी बात। अपनी ज़ुबान में। सभा में कोई नारा नहीं होगा। सबसे बड़ा नारा यही है कि मैंने ये किया, और मैं इसे छिपा रहा था।"
शबनम आपा ने कहा, "और जो लोग न बोलना चाहें?"
"तो न बोलें," मैंने कहा। "मैं किसी के मुँह में हाथ नहीं डालूँगा। माँ ने कहा था — सबसे ज़्यादा डरने वाली औरत पहले बोलती है। तो हम बस इंतज़ार करेंगे। मगर उस इंतज़ार में भी हमें पास बैठना होगा।"
तभी उस्ताद ने कुछ कहा। उन्होंने पहले अपनी कुर्सी पर से चाय का कुल्हड़ उठाया, एक घूँट लिया, और फिर कहा —
"एक बात याद रखना, अंकुश। वो सभा में कोई पुरानी बात उछालेगा।"
मैंने कहा, "कैसी पुरानी बात?"
"ऐसी बात जो सच होगी," उस्ताद ने कहा। "वो झूठ नहीं बोलेगा। वो कभी झूठ नहीं बोलता। वो सच को इस तरह उछालता है कि सच भी झूठ जैसा लगने लगे। कल वो तेरे पापा का अंगूठा उछालेगा, तेरी माँ की बीमारी उछालेगा, शायद तेरे दादा की आग वाली रात भी उछालेगा। और तुझे तैयार रहना होगा — कि जब वो कोई सच बोले, तो तू चुप न रहे। तू कहे — हाँ, ये हुआ था।"
मैंने कहा, "और अगर वो कुछ ऐसा उछाले जो मुझे खुद न पता हो?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक।
"तब," उन्होंने कहा, "तू उस वक़्त झूठ मत बोलना। तू बस इतना कहना — मुझे नहीं पता। और ये भी एक सच है।"
इलाही भाई ने पहली बार अपना सिर उठाया।
"और एक बात," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे पचास साल से किसी ने उसका इस्तेमाल न किया हो। "रणवीर का सबसे बड़ा हथियार उसकी मुस्कान है। वो गुस्सा नहीं करेगा। वो गाली नहीं देगा। वो तेरी तारीफ़ करेगा, तेरे पापा को भाई कहेगा, तेरी माँ के लिए दुआ भेजेगा, और उसी हँसी में सबको ज़मीन पर बैठा देगा। तू उसके सामने कभी गुस्सा मत दिखाना। क्योंकि गुस्सा दिखाया तो वो कहेगा — देखो, ये लड़का पागल है। और जब बड़ा आदमी छोटे आदमी को पागल कहे, तो बात खत्म हो जाती है।"
मैंने कहा, "तो मैं क्या करूँ?"
"तू मुस्कुराना," इलाही भाई ने कहा। "जब वो मुस्कुराए, तू भी मुस्कुराना। वो तेरे सामने मुस्कुराएगा ये सोचकर कि तू झुक जाएगा। और तू मुस्कुराएगा ये जानकर कि तू नहीं झुकेगा। और उस दिन उसकी मुस्कान पहली बार कमज़ोर पड़ेगी।"
चबूतरी पर सब चुप थे। कोहरा हट रहा था। सूरज पीपल के पत्तों में से झाँकने लगा था, और उसकी रोशनी चबूतरी पर गिर रही थी — टुकड़ों में, पत्तों की छाया के साथ।
मैंने चारों जासूसों की तरफ़ देखा।
"तुम चारों का काम सबसे ज़रूरी है," मैंने कहा।
सानिया ने कहा, "क्या?"
"तुम गली-गली घूमोगे। और जिस घर में जाओ, वहाँ से एक बात लेकर आओगे — उस घर का सच। कोई डरा हुआ है, कोई शर्मिंदा है, कोई बीमार है। तुम सबको नहीं मनाओगे। तुम सबको सिर्फ़ याद दिलाओगे कि सात बजे मैदान में कोई उनका नाम लेगा, और वो वहाँ होना चाहिए।"
चिंटू ने कहा, "और अगर कोई डाँटे?"
"तो भाग जाना," मैंने कहा। "पर भागने से पहले एक बात कहना — मेरा नाम भी उस काग़ज़ में है।"
टिंकू ने कहा, "और मैं?"
"तू मेरे साथ।"
उसकी आँखें चमक गईं।
"पर एक शर्त है," मैंने कहा। "आज कोई जासूसी नहीं। कोई छिपकर जाना नहीं। किसी की जेब नहीं, किसी की अलमारी नहीं। आज तुझे सीधा चलना है और जो पूछे उसे सच बताना है।"
"क्यों?"
"क्योंकि कल सभा में जब सब बोलेंगे, तो जिसने छिपकर काम किया होगा, उसकी बात कमज़ोर लगेगी। और जिसने खुलकर किया होगा, उसकी बात पत्थर जैसी लगेगी।"
टिंकू ने सिर हिलाया। सीरियस। बहुत सीरियस, जैसे वो सत्रह साल का नहीं, पचास का हो।
मैंने बबलू की तरफ़ देखा। वो अब भी खड़ा था।
"बबलू भाई," मैंने कहा।
वो सीधा हो गया। उसके कंधे कस गए, जैसे उसे लगा कि अब कोई ताना आएगा, कोई हिसाब होगा।
मैंने कहा, "आपको एक काम देना है।"
उसने कहा, "क्या?"
"आप उन सबको बुलाना जिन्हें मैं नहीं बुला सकता। जो मेरा नाम सुनकर दरवाज़ा बंद कर देते हैं। जो मेरे पास आते हैं तो चाय लिए बिना चले जाते हैं। क्योंकि वो मुझसे डरते हैं, और आपसे डरते थे। आप जाइए। कहिए — भाई, मैंने अपना सच बोल दिया। अब तेरी बारी है।"
बबलू ने बहुत देर तक मुझे देखा। फिर वो बोला, "और जो मुझे भी दरवाज़ा बंद कर दें?"
"तो आप दरवाज़े के बाहर बैठ जाइए। बस। कुछ मत कहिए। कुछ देर बैठिए। लोग बाहर बैठे आदमी को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाते।"
वो हँसा। एक छोटी सी हँसी, जिसमें कोई मज़ाक नहीं था, सिर्फ़ थकान। और उस थकान में एक चीज़ और थी जो मैंने पहले उसके चेहरे पर नहीं देखी थी — शायद राहत।
फिर मैंने सबसे आख़िरी बात कही।
"एक बात साफ़ कर दूँ," मैंने कहा। "कल मेरे साथ मंच पर कोई नहीं खड़ा होगा।"
सब एक साथ बोल पड़े।
मैंने हाथ उठाया।
"सुनो पहले। मंच पर सिर्फ़ मैं और मेरे पापा होंगे। और घंटी।" मैंने जेब से घंटी निकालकर दिखाई। "तुम सब अपनी जगह से बोलोगे। शबनम आपा — गुमटी से। उनकी गुमटी मैदान के रास्ते पर है, वहाँ से गली का हर आदमी गुज़रता है। उस्ताद — दुकान से। इलाही भाई — अपने दरवाज़े से। गोविंद भाई — मंच के सामने की मेज़ से, जहाँ सब काग़ज़ रखे जाएँगे। मीरा — कैमरे के पीछे से। बच्चे — भीड़ के बीच से। और टिंकू — बस मेरे पास से।"
मैंने चारों तरफ़ देखा।
"क्योंकि कल की सभा में अगर मंच पर पूरी गली खड़ी दिखेगी, तो लोग कहेंगे — अरे, ये तो गुट है। गुट का मुकाबला गुट से होता है। पर अगर एक लड़का मंच पर अकेला खड़ा हो, और पीछे-पीछे गली अपनी-अपनी जगह से बोल उठे — तो उसका नाम गुट नहीं होगा। उसका नाम गली होगा।"
कोहरा पूरा हट चुका था।
सूरज पीपल पर आ गया था और चबूतरी के पत्थर पर उसकी रोशनी ऐसी पड़ रही थी जैसे कोई किसी पुराने काग़ज़ को सामने खोलकर रख रहा हो।
सब उठे। टिंकू ने मेरे हाथ से एक कुल्हड़ लिया। शबनम आपा ने कुल्हड़ उठाते वक़्त कहा, "अंकुश, सात बजे से पहले मैं चूल्हा बंद करके आऊँगी। और अगर मुझे रोकने कोई आया, तो उसके मुँह पर चिमटी रख दूँगी — ठंडी नहीं, गरम।"
उस्ताद ने जाते वक़्त मेरे कंधे पर हाथ रखा। कुछ नहीं बोले। पर उनके हाथ में जो ज़ोर था, वो किसी वादे से कम नहीं था।
दिन भर मैंने कुछ और नहीं किया। बस गली में घूमता रहा। किसी की दुकान के बाहर खड़ा होता रहा। किसी की छत पर बैठा रहा। किसी के दरवाज़े पर चुपचाप।
कोई मुझसे बात करता तो मैं कहता — सात बजे, मैदान। और आगे कुछ नहीं कहता। मैंने ये सीखा था कि ज़्यादा कहने से लोग कम सुनते हैं, और कम कहने से सुनकर भी सुनते हैं।
शाम को, सूरज ढलने के वक़्त, मैं दुकान की पीछे वाली छत पर बैठा था।
वो छोटी छत — आधी ईंट, आधी टीन। जहाँ से पूरी गली दिखती है। पीपल, चबूतरी, उस्ताद की दुकान, शबनम आपा की गुमटी, नाली पर पड़ा पत्थर का पुल, और आगे मुहाने पर नूर अस्पताल के पीले बोर्ड तक।
मैंने घंटी निकाली। हाथ में रखी।
वो हल्की गरम थी। बहुत हल्की। जैसे किसी ने उसे बहुत देर पहले हाथ में पकड़ा हो और उसकी गरमाहट अब बस याद बनकर बची हो।
मैंने कहा, "घंटी।"
कोई जवाब नहीं।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno