The Mysterious Bell – Chapter 1068
"तो फिर बात करना बंद कर," काजल ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "अंदर ले चलिए उन्हें।"
वार्ड के दरवाज़े पर सफ़ेद पट्टी लगी थी। उसे हटाने के लिए एक अफ़सर की मुहर चाहिए थी, और उस वक़्त वहाँ कोई अफ़सर नहीं था। पर डॉक्टर इसरानी ने अंदर से दरवाज़ा खोला — सिर्फ़ एक हाथ भर। और उस एक हाथ भर की दरार में मैंने देखा।
माँ।
वो पलंग पर लेटी थीं। उनका एक हाथ बाहर लटका हुआ था, उँगलियाँ ढीली। नाक में नली। सीने पर सफ़ेद पट्टी। और उनकी साँस — मैं उसे सुन नहीं रहा था, पर मुझे लगा कि मैं उसे गिन रहा हूँ, जैसे तीन साल का बच्चा गिनता है, बीच में भूल जाता है, फिर से शुरू करता है।
रेहाना आपा उस दरार के पास गईं। जाने से पहले उन्होंने मेरा सिर छुआ — ऐसे, जैसे कोई दुआ दे रहा हो, बिना शब्दों के।
"मैं अंदर हूँ," उन्होंने कहा। "और मैं बाहर आकर तुझे बताऊँगी कि तेरी माँ ने पानी पिया या नहीं। क्योंकि यही सबसे ज़रूरी खबर है। बाकी सब बाद में।"
फिर वो अंदर गईं और दरवाज़ा बंद हो गया और सफ़ेद पट्टी फिर से चिपक गई।
काजल फ़र्श पर बैठ गई और उसने अपना चेहरा अपने घुटनों में छिपा लिया। शबनम आपा उसके पास बैठीं और उन्होंने कुछ नहीं कहा — बस उनका सिर अपने कंधे पर टिकने दिया। मुझे लगा कि आज शबनम आपा ने अपनी सबसे तेज़ ज़ुबान को चुप रहने का हुक्म दे दिया है।
टिंकू मेरे पास आया और उसने मेरी जेब में कुछ डाल दिया।
"क्या है?"
"गुड़," उसने कहा। "मेरी अम्मी ने दिया था। कहा था कि जब उस्ताद का चेहरा उतर जाए, तब देना।"
मैंने उसे देखा। उसके घुटने पर पट्टी थी और उसकी जेब से चॉक का टुकड़ा बाहर झाँक रहा था।
"तू बहुत बड़ा आदमी बनेगा," मैंने कहा।
"मुझे पता है," उसने कहा, और वो अपनी जगह लौट गया।
मैं उठा। मेरे घुटने में दर्द हो रहा था, पीठ में भी, और जेब में घंटी अब भी बर्फ़ जैसी ठंडी थी। मैंने मीरा को इशारा किया कि वो यहाँ रहे, और मैं गलियारे से बाहर निकल गया।
सड़क पर हवा थी। गली के मोड़ पर सफ़ेद गाड़ी अब भी खड़ी थी। उसकी खिड़की बंद थी। और मैंने उसकी तरफ़ देखा तो मुझे लगा कि गाड़ी थोड़ी और आगे सरकी है — जैसे कोई अंदर से झाँककर सब गिन रहा हो।
मैं दुकान की तरफ़ चला।
दुकान का शटर आधा गिरा था और पीछे के कमरे की लाइट जल रही थी। मैंने शटर को और ऊपर उठाया और अंदर गया। औज़ारों के ट्रंक के पास, फ़र्श पर, पापा बैठे थे।
वो चारपाई पर नहीं बैठे थे। फ़र्श पर बैठे थे, ट्रंक से पीठ टिकाए। उनके हाथ में एक औज़ार था — कोई पुराना पेचकस — और वो उसे हिला रहे थे, घुमा रहे थे, पर कुछ कर नहीं रहे थे। उनका चश्मा कान पर टेप से बँधा था और टेप की एक लकीर खुल गई थी, जिससे चश्मा तिरछा लटक रहा था।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैं उनके पास बैठ गया। बैठते वक़्त मेरे घुटने ने आवाज़ की और पापा ने सिर उठाया।
"अंदर क्या हाल है?" उन्होंने पूछा।
"नर्स अंदर गई है," मैंने कहा। "रेहाना आपा। चार घंटे की इजाज़त है।"
उन्होंने सिर हिलाया। फिर वो फिर चुप हो गए।
बहुत देर तक कुछ नहीं बोले। बल्ब गुनगुना रहा था। कमरे में ग्रीस और लोहे की गंध थी। मुझे लगा कि वो कुछ कहेंगे नहीं और मैं उठ जाऊँगा।
फिर उन्होंने कहा — बिना मेरी तरफ़ देखे, बिना आवाज़ उठाए —
"मैंने अंगूठा लगाया था।"
कमरे में हवा भी रुक गई।
"पापा—"
"सुन ले," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे किसी ने गला साफ़ नहीं किया हो। "आज तक मैंने किसी को पूरी बात नहीं बताई। तेरी माँ को भी नहीं। तेरी माँ को सिर्फ़ इतना पता है कि मैं गया था। क्यों गया था, यह मैंने आज तक अपने अंदर रखा।"
मैंने उनकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। उनका हाथ ठंडा था और उँगलियों में पुरानी ग्रीस की कालिख भरी थी, जो कभी नहीं जाती।
"उस रात," उन्होंने कहा, "तेरी माँ की जाँच का काग़ज़ आया था। डॉक्टर ने कहा था कि इलाज लंबा चलेगा। और मेरी जेब में उस वक़्त कुछ नहीं था।" उन्होंने रुककर साँस ली। "तभी एक आदमी आया। मीठी जुबान। सफ़ेद कुर्ता। उसने कहा कि साहब तुम्हारी मदद करना चाहते हैं। मुफ़्त इलाज। मुफ़्त दवा। सिर्फ़ एक काग़ज़ है, अंगूठा लगा दो।"
"और तूने लगा दिया।"
"मैंने दो दिन तक मना किया," उन्होंने कहा। "दो दिन। फिर तेरी माँ की साँस फूलने लगी और मैं उस दफ़्तार में गया।" उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ा। "वो दफ़्तार नए बाज़ार की दूसरी मंज़िल पर था। बड़ी मेज़। कम रोशनी। काग़ज़ों का ढेर।"
"और उस काग़ज़ पर क्या लिखा था?"
वो चुप हो गए।
"पापा।"
"उस काग़ज़ पर दो नाम थे," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ ऐसे टूटी जैसे कोई पुरानी रस्सी टूटती है। "ऊपर मेरा नाम। नीचे तेरा।"
मेरा हाथ ठंडा हो गया।
"मेरा?"
"तेरा नाम," उन्होंने कहा। "अंकुश यादव। तेरे नाम के आगे भी अंगूठे की जगह बनी थी। और मैंने उस रात सिर्फ़ अपना अंगूठा लगाया। तेरी लकीर आज भी खाली है।"
मैं कुछ देर बोल नहीं पाया। मेरे अंदर कई चीज़ें एक साथ उठीं — गुस्सा, डर, और एक अजीब सी चीज़ जिसका नाम मुझे नहीं पता। मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा। मैंने उसे और कसकर पकड़ा।
"तूने मेरा नाम बचाया," मैंने कहा।
"नहीं," पापा ने कहा, और उन्होंने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें लाल थीं और चश्मे के पीछे छोटी हो गई थीं। "मैंने तेरा नाम नहीं बचाया। मैंने खुद को बचाया। मैं डर गया था, अंकुश। इतना डर गया था कि उस रात मैं लिखकर भी नहीं सोच पाया कि अगर तेरी लकीर पर कल कोई और अंगूठा लग गया तो क्या होगा।"
मैंने सिर झुकाया।
कमरे में बहुत देर तक कुछ नहीं हुआ। बाहर से किसी साइकिल की घंटी बजी, दूर, गली के मोड़ पर। और फिर मेरी जेब में घंटी हिली — बहुत धीमे, जैसे कोई करवट बदल रहा हो।
"पापा," मैंने कहा, "उस कमरे में और कौन था?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"एक आदमी," उन्होंने कहा। "कोने में बैठा था। अंधेरे में। उसने एक शब्द नहीं बोला। पर उसके जूते चमक रहे थे। इतने चमकते थे कि उस अंधेरे कमरे में भी दिख रहे थे।"
"और उसके हाथ में?"
"उसकी उँगली में एक काली अंगूठी थी," पापा ने कहा। "और जब मैंने अंगूठा लगाया, तो उसने एक ही बात कही।"
"क्या?"
"उसने कहा — अंगूठा लग गया। अब नाम भूल जाओ।"
मैंने आँखें बंद कीं। जूते। चमकते जूते। काली अंगूठी। यह वही आदमी है जो बार-बार मेरे रास्ते में आ रहा है, जिसका चेहरा नहीं दिखता, जो हर जगह पहले पहुँच जाता है। पाँच साल पहले भी वो वहाँ था और आज भी वो कहीं है।
"पापा," मैंने कहा। "डर से लिया गया अंगूठा भी सच बोलकर ही धुलता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"इसलिए नहीं कि तू उसे मिटा देगा," मैंने कहा। "इसलिए कि जब तक वो तेरे अंदर है, वो तुझे हर रात उठाकर पूछेगा कि तूने क्या किया था। और तू हर रात वही जवाब देगा — कुछ नहीं। इसलिए कल सुबह सबके सामने बोलना पड़ेगा।"
"मैं बोलूँगा," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मैंने पच्चीस साल में कभी नहीं सुनी थी — न हिम्मत, न डर। बस एक थकी हुई पक्की बात।
"और एक बात," मैंने कहा। "तूने मेरा नाम क्यों नहीं लिखा, यह मुझे आज पता चला। पर तूने मुझे बताया क्यों नहीं?"
वो चुप रहे।
"क्योंकि मैं डरता था," उन्होंने कहा, "कि तू मुझसे नफ़रत करेगा।"
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