The Mysterious Bell1020 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1020

6 min read November 5, 2026

दरवाज़ा खुला रह गया।

बबलू वहीं खड़ा था, दीवार के सहारे, हाथ में वो पुराना पहचान कार्ड। उसने एक लंबी साँस छोड़ी, जैसे कई मिनट से रोक रखी हो।

"मैंने कहा था," वो बोला, बिना किसी की तरफ़ देखे, "भागो कहूँ तो भागना। तुम भागे नहीं।"

"तू भी नहीं भागा," मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ देखा। मोटा आदमी, जिसकी आँखें लाल थीं और जिसके होंठ हिल रहे थे।

"मैं तो बारह साल से भाग रहा हूँ," उसने कहा। "ये तेरा पहला दिन है।"

और वो भी निकल गया, भारी क़दमों से, सीढ़ी की तरफ़।

कमरा खाली हो गया।

मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे हाथ में पापा का पेचकस था — लकड़ी का चिकना हत्था, जिस पर छोटे-छोटे टेढ़े अक्षरों में पापा का नाम खुदा था, और आख़िरी सिरे पर बँधा वो लाल धागा, जो पुराना और फीका था, पर बँधा हुआ था।

मीरा ने कैमरा बंद नहीं किया।

"अभी भी चल रहा है," उसने धीरे से कहा, मेरी तरफ़ देखकर। "दो सौ से ज़्यादा लोग। कोई नहीं हटा।"

"बंद मत करना," मैंने कहा।

"नहीं करूँगी," उसने कहा।

तभी मेरी जेब में घंटी हिली।

बर्फ़ जैसी ठंडी घंटी, जो कई मिनट से चुप पड़ी थी, अचानक गरम होने लगी — जैसे किसी ने उसे हथेली में पकड़ लिया हो। और उसने एक ही शब्द कहा।

"नाम।"

मैंने आँखें बंद कीं।

"क्या नाम?" मैंने फुसफुसाकर पूछा।

पर घंटी चुप हो गई।

मैंने अलमारी की तरफ़ देखा। धूल में वो चौकोर निशान अब भी वहीं था — जहाँ रजिस्टर रखा था, या जहाँ वो बक्सा रखा था जिसे साहब ने बोरे में डलवाकर नीचे उतरवाया।

मैंने उस निशान के पास घुटने टेके और उँगली से धूल को हल्का सा छुआ।

और मैंने खुद से कहा — अंकुश, तेरे पास काग़ज़ नहीं है। तेरे पास स्याही नहीं है। तेरे पास मुहर नहीं है।

तेरे पास सिर्फ़ एक चीज़ है — तेरे हाथ।

और मैंने उसी वक़्त ठान लिया कि कल इसी वक़्त, जब वो मेरे बोर्ड पर अपना नाम लिखेगा, मैं वहाँ खड़ा होऊँगा। बोर्ड के नीचे नहीं। बोर्ड के सामने।

मीरा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।

"नीचे काजल है," उसने कहा। "कई मिनट से। गेट बंद था।"

मैं उठा।

और जब मैं दरवाज़े से बाहर निकला, तो गलियारे की पीली टॉर्च की रोशनी में मुझे धूल पर कुछ निशान दिखे — लकड़ी के जूतों के निशान, सीधे सीढ़ी की तरफ़ जाते हुए।

उनमें से एक निशान बाक़ी सबसे अलग था। छोटा। जैसे कोई बच्चा उनके साथ चला हो।

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

वो मेरे ठीक पीछे था, अपना कार्डबोर्ड माइक सीने से लगाए, आँखें नीची किए।

"टिंकू," मैंने कहा।

"हाँ उस्ताद।"

"तेरे जूते कहाँ हैं?"

उसने नीचे देखा। उसके पैरों में सिर्फ़ काले मोज़े थे।

"जूते…" उसने धीरे से कहा, "जूते मैंने सीढ़ी पर उतार दिए थे। आपने कहा था, आवाज़ न आए।"

मैंने गलियारे की धूल में पड़े उन छोटे निशानों को फिर देखा।

और मेरे पेट में कुछ ठंडा सा हिला।

क्योंकि वो निशान सीढ़ी की तरफ़ नहीं जा रहे थे।

वो निशान ऊपर से आ रहे थे।

नीचे से ऊपर। यानी कोई हमारे पीछे-पीछे इस मंज़िल तक आया था, और हमें पता भी नहीं चला।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा और बहुत धीरे कहा —

"कैमरा बंद मत करना। और अब एक बात याद रखना — जो आज रात के बाद होगा, वो सिर्फ़ हमारा नहीं होगा।"

वो समझ गई। उसने कुछ नहीं पूछा।

हम सीढ़ी की तरफ़ बढ़े, और पीछे वो खाली कमरा रह गया — खुली अलमारी, धूल का चौकोर निशान, दीवार पर कीलें, और हवा में अब भी हल्की-सी जले काग़ज़ की गंध।

नीचे काजल हमारा इंतज़ार कर रही थी।

और कल इसी वक़्त, उस आदमी ने कहा था, मेरे बोर्ड पर उसका नाम लिखा होगा।

मैंने जेब में घंटी को हाथ लगाया। वो अब भी गरम थी।

"नाम," मैंने खुद से कहा, बहुत धीरे। "अच्छा। नाम से ही शुरू करेंगे।"

॥

हम सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे। तीसरी मंज़िल की पीली टॉर्च की रोशनी पीछे छूट गई और आगे सिर्फ़ अंधेरा था — वो अंधेरा जो भवन की सीढ़ियों में बरसों से बैठा था और जिसे किसी ने नहीं पोंछा था।

टिंकू मेरे ठीक पीछे चल रहा था, काले मोज़ों में। उसकी साँस मेरी गर्दन पर लग रही थी, छोटी और तेज़, जैसे कोई दौड़कर आया हो और अब खड़ा न हो पा रहा हो।

"उस्ताद," उसने धीरे से कहा। "वो छोटे निशान…"

"चुप," मैंने कहा। "नीचे आते हैं।"

मीरा मेरे बाएँ थी, कैमरा अब भी उसके हाथ में, लाल बत्ती जल रही थी। उसका चेहरा उस रोशनी में लाल लग रहा था और आँखें, जो आम दिन झगड़ती रहती थीं, आज शांत थीं। बहुत शांत। जैसे वो भी अंदर से गिन रही हो — कितनी सीढ़ियाँ बची हैं।

दूसरी मंज़िल का गलियारा खाली था। दीवारों पर पुराने पोस्टर टँगे थे — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के, हाथ जोड़े रणवीर के, नीले सिरे वाले, धूल में हल्के पड़े। एक पोस्टर का कोना उखड़ा हुआ था और उसके नीचे से पुरानी पीली दीवार दिख रही थी, जैसे नई तस्वीर के नीचे कोई पुराना चेहरा छिपा हो।

नीचे से आवाज़ आई।

"भैया?"

काजल की आवाज़।

हम सीढ़ियों के आख़िरी मोड़ पर पहुँचे और वहाँ वो दीवार से सटकर खड़ी थी, दोनों हाथ सामने जुड़े, आँखें ऊपर उठाए। उसके हाथ में नर्सिंग की किताब दबी थी, जैसे ढाल पकड़ी हो।

"नीचे सब बंद है," उसने कहा, आवाज़ में कँपकँपी। "लोहे का गेट। बाहर से। मैंने खोलने की कोशिश की, हिला तक नहीं।"

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"अब खुलेगा," मैंने कहा। "चल।"

हम नीचे उतरे। ग्राउंड फ्लोर का हॉल बड़ा था, ऊँची छत वाला, बीच में एक मेज़ और पीछे काँच का दरवाज़ा, जिसके बाहर गली की रोशनी धुँधली-सी दिख रही थी। लोहे का गेट बंद था — मोटी सलाखों वाला, बाहर से ज़ंजीर और ताला।

पर हमारे सामने, हॉल के बीच में, तीन सिपाही खड़े थे।

और उनके आगे, हाथ में पीली फ़ाइल लिए, चंद्रेश सक्सेना।

वो मुस्कुरा रहा था। वही मुस्कान जो कभी नहीं बदलती — जैसे चेहरे पर चिपका हुआ काग़ज़ हो और किसी ने उसे उतारने की ज़हमत न की हो।

"अंकुश जी," उसने मीठी आवाज़ में कहा। "इतनी रात, इतनी सीढ़ियाँ, इतना सामान। मेहनत बहुत की आपने।"

"और आपने?" मैंने कहा। "इतनी रात, तीन सिपाही, एक वकील, एक बंद गेट। अच्छी तैयारी है।"

वो हँसा। हल्का, छोटा, बिल्कुल वैसे जैसे कोई बड़ा आदमी बच्चे की मासूम बात पर हँसता है।

"तैयारी तो आपने भी की है," उसने कहा और टिंकू के हाथ के कार्डबोर्ड माइक पर नज़र डाली। "ये क्या है? ये भी कोई काग़ज़ है?"

"ये माइक है," टिंकू ने कहा, बिना डरे, और मुझे अंदर से गर्व हुआ।

"माइक," चंद्रेश ने दोहराया, मानो नया शब्द सीख रहा हो। "अच्छा। और कैमरा? ये भी आपका है?"

"मेरा है," मीरा ने कहा। "और चल रहा है।"

चंद्रेश की आँखें कैमरे पर गईं। उसकी मुस्कान ज़रा सी कसी, फिर फिर से ढीली हो गई।

"चलने दीजिए," उसने कहा। "अदालत में भी तो कुछ देखा जाएगा।"

वो आगे बढ़ा और मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।

"अब जो आपके पास है, वो मुझे दीजिए," उसने कहा। "खाता, तस्वीर, काग़ज़ — जो भी है। ज़ब्ती का सामान है।"

मैंने हाथ पीछे नहीं खींचा। मैंने सीधे उसकी आँखों में देखा।

"आप किस हैसियत से माँग रहे हैं?" मैंने पूछा।

"वकील की हैसियत से," उसने कहा। "और गली के हित की हैसियत से।"

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