The Mysterious Bell1014 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1014

7 min read November 5, 2026

बबलू ने पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर दरवाज़े की तरफ़। उसका पान चबाना बंद हो गया था। उसने कुछ कहना चाहा, पर सिर्फ़ होंठ हिले, आवाज़ नहीं निकली।

दरवाज़े के फ्रेम में एक आदमी दिखा। खाकी कमीज़, आधी आस्तीन फटी हुई, कंधे पर टेप से बँधी पुरानी टॉर्च, और पैरों में वो मोटे जूते जिनकी नोक पर लोहा लगा था।

वही जूते। वही आवाज़।

मैं हँस पड़ा — नहीं, हँसना नहीं था, पर डर जब हद से ज़्यादा हो जाता है तो आदमी हँसता है। मेरा गला सूखा था, आवाज़ कर्कश निकली।

"अरे भोला भाई… तू है?"

वह अंदर आया, पर आधा कदम ही। जैसे दहलीज़ पर खड़ा आदमी कह रहा हो कि मैं अंदर नहीं, बाहर हूँ, मुझे गिनो मत।

टॉर्च उसके हाथ में काँप रही थी। उसकी रोशनी मेरे चेहरे से फिसलकर दीवार पर पड़ी, जहाँ चार खाली कीलें थीं।

"भैया, मुझे माफ़ कर दो," उसने कहा। "मैं जानता हूँ तुम यहाँ हो। मैं सीढ़ी चढ़ते वक़्त सुन रहा था। मुझे साहब ने कहा था कि आज रात कोई नहीं आएगा, तो अगर कोई आए तो बता देना। और मैंने… मैंने नहीं बताया।"

बबलू ने एक कदम आगे बढ़कर उसका कंधा पकड़ा।

"तू क्या कर रहा है भोला?" बबलू की आवाज़ दबी थी, पर उसमें वो गुस्सा था जो डर से पैदा होता है। "तुझे पता है साहब क्या करेंगे?"

"जानता हूँ," भोला ने कहा। "और साहब ने जो करना था, वो कर दिया बबलू भाई। शाम सात बजे।"

कमरा चुप हो गया।

"क्या कहा?" मैंने पूछा।

"नौकरी से निकाल दिया।" भोला ने टॉर्च नीचे की। "कहा — तेरा काम खत्म। दो सौ रुपये गिनकर हाथ में रखे, टॉर्च वापस माँगी, कहा चौकी की चाबी रख और निकल जा। ग्यारह साल, भैया। ग्यारह साल इस दरवाज़े पर खड़ा रहा, एक बार भी किसी की चीज़ नहीं छुई, और आज वो कह रहे हैं कि मैंने कुछ किया है।"

"क्या किया?" मीरा ने पूछा। उसने कैमरा नीचे कर लिया था, पर उँगली बटन पर थी।

"मैंने कुछ नहीं किया," भोला ने कहा। "मैंने बस एक बात से इनकार किया। साहब ने कहा था — कल सुबह जब सर्वे की टीम आए, तो तुम गवाही देना कि इस भवन की ज़मीन पर पहले कोई झोपड़ी नहीं थी। बस इतना। एक लाइन। और मैंने कह दिया — साहब, यहाँ झोपड़ी थी। मेरे पापा के ज़माने की। मैं झूठ नहीं बोल सकता।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

भोला की उम्र पचास के आसपास थी। दुबला, पसली दिखती हुई, गाल धँसे हुए। कमीज़ की जेब पर एक पुराना धब्बा था — चाय का, या दवा का। उसकी आँखों में वो डर था जो आदमी को छोटा नहीं करता, जो आदमी को इंसान बनाता है।

"तेरी बच्ची?" मैंने पूछा।

उसका मुँह खुला रह गया।

"तू… तुझे याद है?"

"आरज़ू," मैंने कहा। "आठ साल की। जिसे रात में दौरे पड़ते हैं। तू उसे दो महीने पहले दुकान पर लाया था, साइकिल के पीछे बैठाकर, क्योंकि उस दिन वो ठीक थी और तू उसे बाहर घुमाना चाहता था। और मैंने उसकी साइकिल की घंटी ठीक की थी, और तूने दस रुपये दिए थे, और मैंने नहीं लिए थे।"

भोला की आँखें भर आईं।

"तूने नहीं लिए थे," उसने कहा। "और उस रात आरज़ू ने कहा था — भैया की दुकान की घंटी सबसे अच्छी बजती है।"

मेरा गला भर गया। तुम सोच रहे होगे कि ये सब कहाँ जा रहा है, इतनी जल्दी में ये पुरानी बातें क्यों। तो सुनो — यही वजह है कि भोला आज रात यहाँ खड़ा था। डर के मारे नहीं। दवा के लिए।

"आरज़ू की दवा भवन के दवाखाने से आती थी," भोला ने कहा। "साहब के ट्रस्ट का मुफ़्त इलाज। हर महीने की पहली तारीख़ को दो पत्ते मिलते थे, बिल्कुल मुफ़्त। जिस दिन नौकरी गई, उसी शाम दवा की खिड़की पर लड़का बोला — तुम्हारा नाम कट गया। मैंने कहा, दवा बंद नहीं हो सकती, बच्ची को दौरे पड़ते हैं। वो बोला — साहब का हुक्म है।"

मीरा ने एक लंबी साँस ली।

"कितने दिन की दवा बची है?" उसने पूछा।

"आज रात की।" भोला ने होंठ काटे। "कल सुबह की नहीं है।"

फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाला।

उसका हाथ काँप रहा था। वो हाथ जो ग्यारह साल टॉर्च पकड़ता रहा, जो कभी किसी चीज़ पर नहीं काँपा, आज काँप रहा था।

"मेरे पास यह है," उसने कहा। "और मैं जानता हूँ, यह मेरे पास नहीं होना चाहिए। पर मैं झूठ नहीं बोलूँगा। मुझे बस मेरी बच्ची की दवा चाहिए।"

उसने मेरी तरफ़ एक चीज़ बढ़ाई।

फटा हुआ खाता। मोटा, भूरे रंग की जिल्द वाला, बीच से आधा फटा, और किनारों से जला हुआ। जलने की गंध अब भी उसमें बसी थी — वो गंध जो किसी काग़ज़ को आग से बचाकर दूर रखने पर भी नहीं जाती।

मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा।

पन्ने खुरदुरे थे, जैसे पानी में भीगकर सूखे हों। ऊपर के पन्ने पीले पड़ चुके थे, कुछ पर नीली स्याही उड़ गई थी, कुछ पर मोटी काली लकीरें खिंची थीं।

मैंने पहला पन्ना पलटा।

खाने। नाम। रकम। तारीख़। सब हाथ से लिखा, किसी पुराने मुनीम की तरह, सीधी लकीरों में।

दूसरा पन्ना। वही। नाम, रकम, नीचे अंगूठे का निशान।

तीसरा पन्ना आधा जला था। उसका ऊपरी कोना गायब था, और नीचे का कोना मुड़ा हुआ था, जैसे किसी ने आग बुझाते वक़्त उसे मुट्ठी में दबाया हो।

और उस पन्ने के बीच में, एक खाने में, नीली स्याही से लिखा था।

शंकर यादव।

नीचे तारीख़ थी — पाँच साल पहले की। और उसके नीचे, लाल स्याही का अंगूठा। आधा जल चुका था, पर उसका निचला हिस्सा बचा था — वो चपटा किनारा, वो घिसा हुआ मोड़, जो मैंने इक्यावन बार देखा था, हर महीने की पहली तारीख़ को, पापा के हाथ में।

मेरे हाथ काँपने लगे।

"अंकुश?" मीरा ने कहा।

मैंने जवाब नहीं दिया। मैं उस अंगूठे को देख रहा था। आदमी का अंगूठा उसकी आवाज़ जैसा होता है — हर आदमी की आवाज़ अलग, हर आदमी का अंगूठा अलग। पापा के अंगूठे का बायाँ किनारा थोड़ा टेढ़ा चलता है, क्योंकि उन्होंने जवानी में एक बार औज़ार से उँगली काट ली थी।

वो टेढ़ापन वहाँ था।

काग़ज़ पर।

लाल स्याही में।

मैंने खाते को दोनों हाथों से सीने से लगा लिया। पीछे से टिंकू की आवाज़ आई।

"उस्ताद?"

"रुक," मैंने कहा। "ज़रा रुक।"

और मैं बैठ गया — वहीं फ़र्श पर, चार खाली कीलों वाली दीवार के नीचे, उस अलमारी के सामने जो खाली थी।

मीरा मेरे पास बैठ गई। उसने कुछ नहीं पूछा। उसने सिर्फ़ खाते की तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़, और मैंने उसकी आँखों में वो बात देखी जो आज तक किसी ने मेरे लिए नहीं देखी थी — वो मुझ पर तरस नहीं खा रही थी, वो मुझसे कह रही थी कि मैं तेरे साथ हूँ।

"यही है," मैंने कहा। "यही वो काग़ज़ है जो उसने पाँच साल पहले अंगूठे के नीचे रखा था।"

"पर यह वो काग़ज़ नहीं है," मीरा ने धीरे से कहा। "यह खाता है। इसमें और भी नाम हैं।"

मैंने पन्ना उलटा।

और मुझे वो मिला जो मुझे उम्मीद नहीं थी।

एक लंबी सूची। नाम, और हर नाम के आगे रकम, और हर रकम के आगे एक शब्द।

किशनलाल — चना — भरा हुआ।

नसीमा बाई — आटा — भरा हुआ।

भोला प्रसाद — चौकीदारी — बाक़ी।

रमेश भाई — नल — भरा हुआ।

उस्ताद अली बक्श — सिलाई — भरा हुआ।

मेरे पापा का नाम उसी सूची में था, और उनके आगे लिखा था — दुकान सात — बाक़ी।

"बाक़ी," मैंने ज़ोर से पढ़ा। "मतलब?"

भोला ने हाथ जोड़ लिए।

"मैं सच बोलूँगा भैया। यह खाता उनका नहीं है जो दुकान में बैठता है। यह उनका है जो मेज़ के पीछे बैठकर काग़ज़ बनाता है। और यह सूची उन लोगों की है जिन्हें बताया गया कि तुम्हारा हिसाब चुक गया, जबकि सच यह है कि तुम्हारा हिसाब उन्होंने कभी चुकाया ही नहीं।"

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