The Mysterious Bell1011 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1011

6 min read November 5, 2026

रास्ते में गुमटी पड़ती थी। शबनम आपा बाहर खड़ी थीं, हाथ में वो लोहे की चिमटी, और मेज़ पर एक काग़ज़ में लिपटी रोटी रखी थी।

"रोटी रख दी है," उन्होंने कहा, मेरी तरफ़ देखकर भी नहीं देखा। "जब लौटे, ठंडी हो जाएगी। ठंडी रोटी भी रोटी होती है, यह मत सोचना कि बेकार है।"

"आपा—"

"जा," उन्होंने कहा। "और सुन — अगर उस भवन में कोई तुझे रोके, तो उससे यह कहना कि तेरे पीछे पूरी साइकिल गली खड़ी है। ज़रूरी नहीं कि वो डरे, पर वो एक बार रुकेगा ज़रूर। और एक बार रुकना ही काफ़ी होता है।"

पीपल के पास पहुँचे तो दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे थे, नीली शर्ट पहने, हाथ में छड़ी। उन्होंने मुझे देखा और सिर हिलाया।

"जा रहे हो?" उन्होंने पूछा।

"जी।"

"रजिस्टर लेकर आना। काग़ज़ नहीं, रजिस्टर। काग़ज़ तो हर आदमी बना सकता है। रजिस्टर में जो लिखा होता है, वो मिटाने के लिए पूरा दफ़्तर चाहिए होता है।"

"अंकल, अगर कुछ हो जाए—"

"कुछ नहीं होगा," उन्होंने कहा। "और अगर हो जाए, तो मेरी उम्र का आदमी यहाँ बैठा है, तेरे पीछे। उसका मतलब समझता है?"

"समझता हूँ।"

आठ बजे हम गली के मुँह पर पहुँचे।

रात अंधेरी नहीं थी। शहर की रोशनी आसमान में चढ़कर वापस आती है, इसलिए ऐसी रातों में सब कुछ धुँधला-धुँधला दिखता है, जैसे किसी ने पूरी गली पर पुराना कपड़ा डाल दिया हो। सड़क सूनी थी, दूर कहीं एक ट्रक का हॉर्न बजा और फिर चुप हो गया।

हम रुके।

मैंने घंटी जेब से निकाली और उसे हथेली में रखा। वो ठंडी थी, पर बर्फ जैसी नहीं — नल के पानी जैसी।

तभी मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी।

"रुक।"

सामने, गली के मुँह से थोड़ा आगे, एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी।

हमने उसे पहले नहीं देखा था। वो शायद वहाँ पहले से थी, या हमारे आने से ठीक पहले आई थी। उसकी बत्तियाँ बुझी हुई थीं, पर अंदर हल्की रोशनी थी — जैसे कोई अंदर बैठकर कुछ पढ़ रहा हो।

हम साँस रोककर खड़े रहे।

फिर गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

बिना आवाज़ के। बिना हॉर्न के। बस इतना धीरे कि जैसे वो हमें दिखाना चाहती हो कि वो जा रही है, पर जल्दी में नहीं है। उसकी पिछली बत्ती लाल हुई, फिर और लाल, फिर वो मुड़ी और अंधेरे में घुल गई।

टिंकू ने साँस छोड़ी।

"वो हमें देख रही थी," उसने कहा।

"पता नहीं," मीरा ने कहा। "पर वो हमारा इंतज़ार कर रही थी, ये पक्का है।"

"कैसे?"

"क्योंकि सफ़ेद गाड़ी रात आठ बजे सूनी गली में खड़ी नहीं रहती," मीरा ने कहा। "वो यह देख रही थी कि हम आते हैं या नहीं।"

मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।

मैंने जेब से फ़ोन निकाला और बबलू का नंबर मिलाया।

घंटी बजी। एक। दो। तीन। पाँच। आठ।

फिर वो आवाज़ आई जो मुझे पसंद नहीं — "जिस नंबर पर आपने कॉल किया है, वो अभी बंद है।"

मैंने फ़ोन जेब में रखा।

"क्या हुआ?" काजल ने पूछा।

"बबलू का फ़ोन बंद है।"

"बंद?"

"बंद।"

चारों तरफ़ चुप्पी छा गई। टिंकू ने अपना थैला कसकर पकड़ा। मीरा ने कैमरा ऊपर उठाया और उसकी लाल बत्ती जल गई, छोटी सी, जैसे अंधेरे में कोई आँख खुली हो।

"अंकुश," मीरा ने कहा, "अगर बबलू का फ़ोन बंद है तो इसका मतलब या तो वो अंदर है, या वो किसी ऐसी जगह है जहाँ फ़ोन नहीं पहुँचता, या…"

"या उसने खुद बंद कर दिया," मैंने कहा।

"ये तीसरा वाला डरावना है," काजल ने कहा।

"हाँ," मैंने कहा।

मैंने पीछे मुड़कर गली को देखा। पीपल का पेड़ अंधेरे में एक बड़े आदमी जैसा खड़ा था। दुबे अंकल की कुर्सी दिख रही थी, पर वो खुद नहीं दिख रहे थे — शायद सो गए थे या कहीं गए थे। शबनम आपा की गुमटी पर एक छोटा दीया जल रहा था, जैसे किसी ने जान-बूझकर वहाँ रखा हो, ताकि हमें लौटते वक़्त रास्ता दिखे।

मैंने गहरी साँस ली।

"सुनो," मैंने कहा। "अगर बबलू नहीं आया, तो भी हमें जाना है। सात मिनट का हिसाब हमें घंटी ने नहीं दिया, बबलू ने दिया था। और घंटी ने सिर्फ़ एक बात कही थी — सात साल पुराना हिसाब। मतलब हिसाब हमें खुद देखना है।"

"पर अगर दरवाज़ा बंद हो गया और हम अंदर फँसे रहे?" टिंकू ने कहा।

"तब तुम वही करोगे जो तुमने पूरी रात सोचा है," मैंने कहा। "डोर खिड़की से लटकाओगे और शोर मचाओगे।"

वो थोड़ा सीधा खड़ा हो गया।

मैं आगे बढ़ा ही था कि टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ी।

उसकी पकड़ में कुछ था — न डर, न उत्साह, कुछ और। जैसे उसे कुछ दिखा हो और वो अपनी आँखों पर भरोसा न कर रहा हो।

"उस्ताद," उसने दबी आवाज़ में कहा।

"क्या?"

"वहाँ देखिए।"

हम सब उसकी उँगली की तरफ़ देखने लगे।

दूर, नई बस्ती की तरफ़, जहाँ भवन stood — नहीं, जहाँ भवन खड़ा था — वहाँ अंधेरे में एक इमारत का आकार दिख रहा था, जैसे कोई बड़ा जानवर सो रहा हो। बाकी सब खिड़कियाँ काली थीं।

सिवाय एक के।

तीसरी मंज़िल पर, बाईं तरफ़, आख़िरी खिड़की में रोशनी जल रही थी। पीली, धीमी, हिलती हुई — जैसे मोमबत्ती हो या कोई पुराना बल्ब जो बार-बार बुझने को हो।

टिंकू ने वो देखा और फिर मेरी तरफ़ देखा।

"तीसरी मंज़िल," उसने कहा। "वही मंज़िल।"

मेरी जेब में घंटी अचानक गरम हो गई।

बहुत गरम।

जैसे किसी ने उसे आग पर रख दिया हो।

और फिर मैंने सुना — बहुत धीमी, बहुत छोटी आवाज़ में, ऐसी आवाज़ जो पहले कभी नहीं सुनी थी, जैसे उस घंटी से नहीं, उसके पीछे किसी दूसरी चीज़ से आ रही हो —

"अब दो हाथ नहीं।"

मैं रुका।

"तीन।"

हवा चल रही थी, पर पीपल का पत्ता भी नहीं हिला।

और मैं वहीं खड़ा रहा, हाथ जेब में, घंटी की गरमाहट उँगलियों में उतरती हुई, और सामने वो छोटी पीली खिड़की जल रही थी — बिल्कुल वैसे ही, जैसे कोई अंदर बैठा हो, हमारा इंतज़ार कर रहा हो, और यह जानता हो कि हम देर नहीं करेंगे।

॥

मैंने हाथ जेब से बाहर निकाला। घंटी की गरमाहट उँगलियों पर चिपकी रह गई, जैसे किसी ने उसे छुआ हो और छोड़ा न हो।

“तीन?” काजल ने धीरे से दोहराया। “तीन हाथ? मतलब?”

“मतलब दो नहीं, तीन जने अंदर जाएँगे,” मैंने कहा।

“कौन तीन?”

“यही तो सवाल है।”

मीरा ने कैमरा नीचे किया। “मैं एक हूँ। तुम दो।”

“मैं नहीं,” काजल ने कहा। “मैं सीढ़ी पर रहूँगी। कोई आए तो आवाज़ दे दूँगी।”

“काजल…”

“अंकुश, मैं बहस नहीं कर रही। माँ ने तुझे जाने दिया है, मुझे नहीं। मैं चुपचाप साथ आई हूँ। मैं सीढ़ी से ऊपर नहीं जाऊँगी। पर मैं यहाँ भी नहीं रुकूँगी।”

मैंने उसकी तरफ़ देखा। अंधेरे में उसका चेहरा आधा दिख रहा था, आधा नहीं। पर आवाज़ में वो कड़कपन था जो माँ से आया है, पापा से नहीं।

“ठीक है,” मैंने कहा। “तू सीढ़ी के नीचे रहेगी। दरवाज़े के अंदर, बाहर नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि बाहर सफ़ेद गाड़ी घूम रही है और अंदर सीढ़ी एक ही है।”

वो एक पल चुप रही, फिर सिर हिलाया।

टिंकू ने अपना थैला सीने से लगाया हुआ था, जैसे उसमें कोई जानवर बैठा हो और उसे गर्मी लग रही हो।

“और मैं?” उसने पूछा।

“तू नुक्कड़ पर,” मैंने कहा। “जहाँ हमने कहा था। सात मिनट। अगर हम सात मिनट में न आएँ, तू शबनम आपा को बताएगा और फिर दुबे अंकल के पास जाएगा। समझा?”

“उस्ताद, मैं…”

“टिंकू।”

“हाँ उस्ताद।”

“तीसरा हाथ तू नहीं है। तू चौथा है। चौथा सबसे ज़रूरी होता है। जो बाहर खड़ा रहता है, वही सबको बचाता है।”

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