The Mysterious Bell – Chapter 1005
"आज रात," पापा ने कहा।
सबने उनकी तरफ़ देखा। यह पहली बार था कि उन्होंने इस कमरे में कुछ तय किया।
"पर वो हमारा काम नहीं है," उन्होंने कहा। "वो सलीम का काम है। रज़ा सलीम कल सुबह दस बजे रजिस्टर लाने वाला है।"
"पर कल सुबह सात बजे मशीन आएगी," मैंने कहा।
"तो मशीन रुकेगी," पापा ने कहा। "आज तक हर चीज़ रुकी है। मशीन भी रुकेगी।"
वो उठे और चलकर मेरे पास आए। उनका हाथ मेरे कंधे पर रखा — पहली बार, बहुत दिनों में, किसी डर या मजबूरी के बिना।
"तू सुन," उन्होंने कहा। "मैंने बाईस साल एक चीज़ नहीं कही, क्योंकि मुझे लगा कि चुप रहने से तेरा घर बचेगा। और उसी चुप्पी ने तेरा घर खोखला कर दिया। आज रात मैं चुप नहीं रहूँगा। पर तू भी एक वादा कर।"
"क्या?"
"अगर बात बिगड़े," उन्होंने कहा, "तो तू सबसे आख़िर में निकलेगा, सबसे पहले नहीं।"
मैं हँसा। "ये तो उल्टा है, पापा।"
"उल्टा सही है," उन्होंने कहा। "जो हाथ सबको निकालता है, वो आख़िर में निकलता है। यही तेरी माँ का हिसाब है — पहले सबको खिलाओ, फिर खुद खाओ।"
और मैंने सिर हिला दिया।
अब देखो, यही वो चीज़ है जो मुझे घंटी से मिली है और मैंने कभी किसी को नहीं बताया। मुझे सबसे ज़्यादा डर इस बात का नहीं था कि मैं हार जाऊँगा। डर इस बात का था कि मैं अकेला हार जाऊँगा। और यही डर — यही मुझे हर रात जगाता था।
पर आज, इस कमरे में, जब पापा ने मेरा कंधा पकड़ा, तो डर हल्का लगा। जैसे कोई बोझ दो लोगों ने मिलकर उठा लिया हो।
तभी संदूकची हिली।
नहीं, हिली नहीं। पूरी संदूकची नहीं हिली — उसके नीचे से कुछ खिसका।
धातु की आवाज़ आई। महीन, तेज़, और साफ़ — जैसे किसी पुराने लोहे का टुकड़ा लकड़ी के फ़र्श पर गिरा हो और फिसलकर रुक गया हो। मैंने सुना, सबने सुना, और सबकी गर्दन एक साथ नीचे झुक गई।
संदूकची के नीचे से, चारपाई की एक टाँग के पास से, एक चीज़ खिसककर आई।
एक चाबी।
मैंने उसे देखा।
बड़ी चाबी थी, जैसी पुरानी अलमारियों में लगती हैं — मोटा पीतल, लंबी डंडी, दाँते घिसे हुए, और छल्ले पर एक पीली पड़ी मोटी रस्सी बँधी थी। छल्ले पर थोड़ी ज़ंग थी, और दाँतों के बीच में कुछ जमा हुआ था, जैसे कोई पुराना तेल या लाह।
और मैंने चाबी देखी, और मैंने पापा को देखा।
पापा चाबी देखकर बेरंग हो गए।
बेरंग, सच में। चेहरे का लाल उड़ गया, होंठ पतले और सफ़ेद हो गए, और उनका हाथ जो मेरे कंधे पर था, वो पहले कस गया और फिर ढीला छूट गया, जैसे किसी ने हाथ से जान निकाल दी हो।
"पापा?" काजल ने कहा।
वो पीछे हटे एक कदम, फिर रुक गए। उन्होंने चाबी देखी, फिर दीवार की तरफ़ देखा, फिर चाबी।
माँ ने भी चाबी देखी, और उनके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने पहले देखा था — शर्म। पर अब वो शर्म उनकी अपनी नहीं थी; वो पापा के चेहरे की थी, जो उन्होंने सालों से उनको सिखाई थी।
"ये…" मैंने कहा। "ये किस चीज़ की है?"
पापा ने मुँह खोला, फिर बंद कर दिया।
रेहाना आपा ने झुककर चाबी उठानी चाही, पर मैंने हाथ आगे रखकर रोक दिया।
"नहीं," मैंने कहा। "आज कोई अकेले हाथ नहीं।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और मैंने अपना, और दोनों ने मिलकर चाबी उठाई।
हमारी उँगलियों में चाबी अचानक गरम लगी, और मुझे पता नहीं क्यों, मेरी पीठ पर ठंडी हवा फिर से चली।
और घंटी, जो अब भी संदूकची के ढक्कन पर रखी थी, एक बार फिर धीरे से बोली। इस बार पूरा वाक्य नहीं, सिर्फ़ दो शब्द।
"दो हाथ।"
मैंने चाबी उठाकर रोशनी में लाई। मैंने उसे अपनी आँखों के सामने किया और देखा — हाँ, छल्ले पर एक पतला सा निशान उभरा हुआ था। दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।
वही निशान। चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर। पुराने बिजलीघर के ताले पर। उस्ताद की घंटी के छल्ले पर। मंसूर चाचा के काग़ज़ पर।
"पापा," मैंने कहा। "ये चाबी कहाँ की है?"
और पापा ने, बहुत देर बाद, इतना कहा जो सब कुछ कह दिया।
"ये चाबी," उन्होंने कहा, "मैंने बाईस साल किसी और को छूने नहीं दी।"
कमरा चुप।
"और आज ये यहाँ से कैसे निकली?" मैंने कहा। "अगर आपने इसे संभाला था, तो ये चाबी संदूकची के नीचे कैसे आई?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो डर था जो मुझे अब पहचान हो गया था।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैंने ये चाबी इस घर में रखी थी, संदूकची में नहीं। और मैंने इसे आज सुबह देखा था।"
मीरा की साँस रुक गई।
"आज सुबह?" मैंने कहा।
"हाँ," पापा ने कहा। "फिर मैंने इसे औज़ारदान में रख दिया था, कमीज़ की जेब में, जैसे हमेशा रखता था।"
"और अब?" मैंने पूछा।
पापा ने अपनी जेब में हाथ डाला। उनका हाथ थोड़ी देर अंदर रहा, फिर बाहर आया, खाली।
"अब नहीं है," उन्होंने कहा।
और मुझे लगा, अब देखो, यही तो सबसे बड़ी बात है। संदूकची में जो काग़ज़ छिपा था, वो किसी और ने छिपाया था। घर में जो चाबी घूम रही है, वो किसी और के हाथ में है।
और मैंने घंटी की तरफ़ देखा। घंटी ने चारपाई पर, संदूकची के ढक्कन पर, चुपचाप पड़े-पड़े मुझे देखा। और मुझे लगा जैसे कोई बूढ़ा आदमी मेरी तरफ़ देखकर हल्का-सा सिर हिला रहा हो — जैसे कह रहा हो, लड़के, ये तो बस शुरुआत है।
॥
रात के उस पल में कमरे की हवा इतनी भारी हो गई थी कि साँस लेने के लिए भी ज़ोर लगाना पड़ रहा था।
पापा की जेब खाली थी।
वो अपना हाथ जेब में डाले हुए ही खड़े रहे, जैसे उम्मीद कर रहे हों कि चाबी शर्मिंदा होकर वापस आ जाएगी। मगर चाबी मेरी और मीरा की उँगलियों के बीच थी, और उसका गरम होना अब भी मेरी हथेली में चुभ रहा था।
"पापा," मैंने धीरे से कहा, "आपने चाबी औज़ारदान में रखी थी, कमीज़ की जेब में रखी थी। और वो अब संदूकची के नीचे से निकली। इसका मतलब साफ़ है।"
पापा ने होंठ सिकोड़े।
"मतलब?" काजल बोली। "मतलब ये कि कोई हमारे घर में घुसा है, पापा। हमारे घर में। जब हम सो रहे थे, या जब हम भवन के पीछे वाली गली में खड़े थे।"
माँ ने काजल का हाथ पकड़कर उसे थोड़ा पीछे खींचा, पर काजल ने हाथ नहीं छोड़ा। काजल जब गुस्से में आती है, तो उसकी आवाज़ ऊँची नहीं होती — बस पतली और सीधी हो जाती है, जैसे कोई काँच की सुई बोल रही हो।
"माँ," काजल ने कहा, "आप चुप क्यों हैं? आपकी संदूकची है। आपके मायके से आई है। आपको कुछ पता है न?"
माँ ने एक लंबी साँस ली। उनके माथे पर चंदन का टीका था, और पसीने से वो हल्का घुल गया था।
"मुझे इतना पता है," माँ ने कहा, "कि ये संदूकची मैंने ब्याह के बाद खोली थी और फिर बंद कर दी। उसके बाद इसका ताला कभी नहीं हिला। और अगर ताला नहीं हिला, तो जो अंदर गया, वो बाहर से नहीं गया।"
कमरा चुप हो गया।
रेहाना आपा, जो अब तक चारपाई के किनारे बैठी थीं, उठकर खड़ी हो गईं। उनके हाथ में अपनी पुरानी ड्यूटी डायरी थी, जिसकी लाल जिल्द किनारों से उखड़ रही थी।
"इस घर में," उन्होंने कहा, "एक दरवाज़ा है जो गली की तरफ़ नहीं खुलता।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"वो चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा," रेहाना आपा ने कहा। "जिसमें बाईस साल पुरानी चाबी लगी है। और जिसके पीछे से आज भी हवा आती है, जबकि वो बंद है।"
टिंकू, जो दरवाज़े की दरार से झाँक रहा था, अंदर आ गया। उसके हाथ में अब भी वो कार्डबोर्ड का माइक था जो उसने रिहर्सल के वक़्त बनाया था।
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