Spirit of a Fighter973 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 973

7 min read November 5, 2026

और मैंने छलाँग लगाई।

शिला उसके हाथ से फिसल रही थी। मैंने अपनी दोनों बाहें ऊपर कीं और उसका बोझ अपने कंधों पर लिया। मेरे घुटनों में झनझनाहट दौड़ गई। मेरे हाथों की चमड़ी जल रही थी, पर मैंने शिला को एक तरफ़ धकेला और वो गुड़िया के बगल से फिसलकर नीचे गिर गई।

गुड़िया मेरी गोद में आ गिरी।

"भैया!" वो रो रही थी। "माँ… माँ को पता नहीं… वो बेहोश है… वो…"

"शांत," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी ही नहीं लग रही थी। "माँ कहाँ है?"

उसने उँगली से पीछे इशारा किया। तहखाने के दूसरे हिस्से की तरफ़। जहाँ आग नहीं पहुँची थी, पर धुआँ भर रहा था।

"वहाँ… एक बूढ़ा है ना… वो… वो माँ को…"

मैंने उसे नीचे उतारा।

"तू ऐसे ही रुक। ज़मीन के पास साँस ले।"

"पर भैया—"

"गुड़िया।" मैंने उसका चेहरा पकड़ा। मेरे हाथ जल रहे थे, पर मैंने महसूस नहीं किया। "मैं तुझे छोड़कर कहीं नहीं जा रहा। पर मुझे पहले माँ के पास जाना है। तू यहीं रुक। साँस ले। समझी?"

उसने सिर हिलाया। आँसू उसके गालों पर जले हुए थे।

मैं उस दूसरे हिस्से की तरफ़ भागा।

धुआँ गाढ़ा था। मैंने अपनी धोती का पल्लू मुँह पर रखा और झुककर दौड़ा।

और फिर मैंने उसे देखा।

माँ।

वो ज़मीन पर पड़ी थी। उसका सिर एक पुराने खंभे के सहारे था। उसके बाल खुले थे। माथे पर हल्दी का टीका अब भी था, पर उसकी आँखें बंद थीं।

और उसके बगल में एक बूढ़ा आदमी बैठा था।

बहुत बूढ़ा। इतना बूढ़ा कि उसकी हड्डियाँ चमड़ी से बाहर दिख रही थीं। उसकी आँखें… उसकी आँखों की जगह दो काली गड्ढे थीं। जली हुई। उसके हाथ काँप रहे थे, और वो माँ की कलाई पकड़े बैठा था।

"तू आ गया," उसने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "मैंने सुना। तेरे पैरों की आवाज़।"

"तू कौन है?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ में गरज थी जो मैंने खुद नहीं सुनी थी।

"मैंने ही तो तुझे बुलाया था," उसने कहा। "घंटा बजाकर। मैं जानता था तू आएगा। भवानी का बेटा।"

मैंने माँ की कलाई छुड़ाई और उनका सिर अपनी गोद में लिया।

"माँ…"

उनकी साँस चल रही थी। धीमी। पर चल रही थी।

"वो ज़िंदा है," बूढ़े ने कहा। "मैंने उसे बचाया। आग लगी तो मैं उसे यहाँ खींच लाया। ये जगह सबसे नीची है। धुआँ यहाँ कम है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर जले के निशान थे। पुराने थे, कुछ साल पुराने। पर उसकी आँखों की जगह जो गड्ढे थे, वो नए थे। बहुत नए।

"तेरी आँखें…"

"आज सुबह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई दुख नहीं था। बस एक थकान थी। "जब उसे पता चला कि मैं बोलने वाला हूँ। भैरव ने नहीं… उसने किया। जो बाहर खड़ा है।"

"जगत सिंह?"

बूढ़ा हँसा। एक सूखी हँसी। जैसे कोई पुराना काग़ज़ फट रहा हो।

"मैं जगत सिंह हूँ, बेटा," उसने कहा। "जगत सिंह। तेरे पापा का गुरु।"

मेरे हाथ रुक गए।

"पर… पर तू तो मरा हुआ था।"

"मरने को तो मैं अब भी मरा हुआ हूँ," उसने कहा। "इन बीस सालों में मैंने कभी सूरज नहीं देखा। भैरव ने मुझे यहाँ बंद कर रखा था। ऊपर वाला आदमी मरा हुआ है। मैं ज़िंदा। पर मैं जानता हूँ कि बाहर वाले ने मेरा नाम इस्तेमाल किया। मेरा नाम। ताकि तेरा भरोसा मेरे नाम पर न जाए।"

मेरा दिमाग़ चकरा रहा था।

"तो बाहर वाला कौन है?"

जगत सिंह ने अपना बूढ़ा हाथ उठाया।

"पहले मुझे तुझे महसूस करने दे," उसने कहा। "मेरी आँखें गई हैं। पर मेरे हाथ नहीं गए।"

और उसने मेरा चेहरा टटोला।

उसकी उँगलियाँ मेरे माथे पर फिरीं। मेरी भौंहों पर। मेरी ठुड्डी पर। उसका चेहरा करीब आया। मुझे उसकी साँस की गंध आई — पुरानी, सीलन वाली, पर कहीं उसमें मिट्टी की गंध थी। अखाड़े की लाल मिट्टी।

"तेरे हाथ भवानी जैसे हैं," उसने धीरे से कहा।

मैं चुप रहा।

"तेरा ठुड्डी का कोना। तेरे माथे की चौड़ाई। तू उसी का बेटा है।"

उसकी आवाज़ भर आई। उसने अपनी हथेली मेरे सिर पर रखी।

"मैंने सोचा था," उसने कहा, "कि मैं मरने से पहले तुझे कभी नहीं छू पाऊँगा। पर देख, भगवान ने मुझे आँखें नहीं दीं, पर हाथ दिए। आज ये हाथ काम आए।"

मेरा गला भर आया।

मैं कुछ नहीं बोल पाया।

"पर तेरे हाथ जले हैं," जगत सिंह ने कहा। "मैं महसूस कर सकता हूँ। चमड़ी उतर रही है। तेरे पापा के भी ऐसे ही जले थे। उस रात।"

"कौन सी रात?"

"वही रात," उसने कहा। "जिस रात उन्होंने मुझे बचाया। उन्होंने भैरव की आग से मुझे निकाला था। और बदले में—" उसने रुककर साँस ली, "—बदले में उन्हीं के हाथ जल गए थे।"

ऊपर से एक ज़ोर की आवाज़ आई।

"भाई! सीढ़ियाँ गिर रही हैं!"

टिंकू।

"बाहर निकलना है," मैंने कहा और माँ को गोद में उठाया। "तू… तू मेरे कंधे पर आ जा।"

"मैं चल सकता हूँ," जगत सिंह ने कहा।

"तू अंधा है।"

"मैं बीस साल से अंधेरे में हूँ, बेटा। एक आग और क्या बिगाड़ेगी?"

पर मैंने उसका हाथ अपने कंधे पर रख दिया। वो भारी था। हड्डियों का बोझ, पर भारी।

"चल," मैंने कहा।

हम तीन — मैं, गोद में माँ, कंधे पर एक बूढ़ा अंधा आदमी — और सामने से गुड़िया दौड़कर आई।

"भैया!"

"आगे चल," मैंने कहा। "रास्ता दिखा। सीढ़ियों तक।"

वो भागी। मैं उसके पीछे। धुआँ इतना गाढ़ा था कि मुझे अपने ही पैर नहीं दिख रहे थे। मैंने सिर्फ़ गुड़िया की आवाज़ पकड़ी। "यहाँ से! बाएँ मुड़!"

सीढ़ियाँ आईं। कुछ टूटी थीं। मैंने माँ को कसकर पकड़ा और एक-एक कदम चढ़ा।

मेरे घुटने काँप रहे थे। मेरे हाथों से चमड़ी उतर रही थी।

पर मैं चढ़ता गया।

और फिर ऊपर की हवा मेरे चेहरे पर लगी।

"यहाँ!" टिंकू चिल्लाया। "भाई, यहाँ!"

मैंने अपना हाथ बढ़ाया और मैंने उसकी उँगलियाँ पकड़ीं। उसने मुझे खींचा। मैं बाहर गिरा। माँ मेरी गोद में। जगत सिंह मेरे कंधे से फिसलकर ज़मीन पर आ गए।

"पानी!" टिंकू चिल्लाया। "बाल्टी!"

मीरा कहीं से दौड़कर आई। उसके हाथ में मरहम की एक डिब्बी थी। उसने मेरे हाथ देखे और उसकी आँखें भर आईं।

"वीर…"

"माँ को देख," मैंने कहा। "पहले माँ को।"

"तेरे हाथ हैं ये!" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "ये सबसे पहले।"

"मीरा—"

"चुप!" वो चिल्लाई। और मैं चुप हो गया।

उसने मेरे हाथों पर ठंडा पानी डाला। मेरी चमड़ी उतर रही थी। मैंने दाँत भींचे।

"दर्द होगा," उसने कहा।

"होने दे।"

उसने मरहम लगाया। उसकी उँगलियाँ हल्की थीं। बहुत हल्की। पर मेरे हाथ जल रहे थे।

"तू पागल है," वो फुसफुसाई। "बिलकुल पागल। तूने सोचा भी कैसे—"

"गुड़िया ऊपर थी," मैंने कहा। "क्या करता?"

"मर जाता।"

"पर मैं मरा नहीं।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था। और गुस्सा। और कुछ और भी। कुछ जो मैं नाम नहीं दे सकता था।

"अगली बार," उसने कहा, "मैं तेरे साथ जाऊँगी।"

"मीरा—"

"मैं तेरे साथ जाऊँगी, वीर। मुझे मरना है तो साथ मरूँगी। तू अकेला नहीं जाएगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

और मैं कुछ नहीं बोला।

क्योंकि उस पल, मेरे हाथ जल रहे थे, मेरी बहन काँप रही थी, और मेरी माँ बेहोश थी — पर मैंने पहली बार सुना कि कोई मेरे लिए इतनी आसानी से मरने की बात कर रहा है। और मुझे अच्छा लगा। और यही सबसे डरावना था।

पीछे, टिंकू पानी की बाल्टियाँ फेंक रहा था। "ये ले! और ये ले!" और फिर एक बाल्टी उसके अपने पैर पर गिर गई।

"आईश!" वो चिल्लाया और उछला। एक पैर पकड़कर वो गिर पड़ा।

कालू काका पीछे से दौड़े आए, हाथ में गीला बोरा। "उठ! उठ!" और टिंकू को उठाते हुए वो खुद लड़खड़ा गए।

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