Spirit of a Fighter – Chapter 956
"जब भैरव पकड़ा जाए, तो मुझे उसके सामने खड़ा होने देना। और बस एक बात कहने देना — 'भवानी का हाथ आज भी मेरी पीठ पर है।'"
मैंने उसका हाथ फिर पकड़ा। "ये शर्त नहीं है," मैंने कहा। "ये हक़ है।"
तभी दूर से एक आवाज़ आई — भारी, धीमी, किसी पुराने इंजन की। सुबह की पहली बस। लाल डिब्बा। वो धूल उड़ाती हुई आ रही थी, और उसकी लाइटें अंधेरे में दो पीली आँखों की तरह चमक रही थीं।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। टिंकू ने डिब्बी कसकर पकड़ ली।
"बस आ गई," मीरा ने कहा। "पर पुल टूटा है।"
"तो बस शहर नहीं जाएगी," मैंने कहा। "पर बस स्टॉप तक तो आएगी। तुम बस में बैठ जाओ। अगर पुल टूटा है, तो बस वहीं रुक जाएगी, और तुम सबको साथ लेकर पैदल निकल जाओगी।"
"और सुरंग?"
"मैं सुरंग से जाऊँगा," मैंने कहा। "कालू काका और चिमन भाई मेरे साथ।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। बस पास आ रही थी, उसका इंजन गरज रहा था।
बस के दरवाज़े की चेन खड़खड़ाई। मीरा ने एक पैर सीढ़ी पर रखा और फिर पलटकर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो बात थी जो वो कभी ज़ुबान से नहीं कहती।
"तुम सुरंग से जाओगे," उसने कहा, "और मैं बस में बैठूँगी।"
"हाँ।"
"ये सही नहीं है।"
"प्लीज मीरा," मैंने कहा। "तुम्हारे पास काग़ज़ की कॉपी है। तुम्हारे पास मोबाइल है। तुम शहर पहुँचो, तब सब कुछ मायने रखेगा। मेरे पास सिर्फ़ गंध है।"
उसने होंठ कस लिए। फिर उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी-सी चीज़ निकालकर मेरी हथेली पर रख दी। एक चाँदी का टुकड़ा, पुराना, घिसा हुआ।
"मेरी माँ का है," वो बोली। "वो कहती थी — जब तक ये तुम्हारे पास है, तुम्हारा रास्ता भटकता नहीं।"
मेरी हथेली में वो ठंडा था। मैंने उसे जेब में रखा, शर्ट के ऊपर से दबाया, जैसे कोई दुआ।
टिंकू ने डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "इसमें मिठाई है," वो बोला, बहुत ज़ोर से, जैसे तोता रट रहा हो। "बस मिठाई। और कुछ नहीं।"
"टिंकू," मीरा ने धीरे से कहा, "चढ़ जा।"
बस का कंडक्टर सीटी बजा रहा था। मीरा चढ़ गई, टिंकू उसके पीछे। खिड़की से टिंकू का चेहरा दिखा — छोटा, गोल, और उसकी उँगली कान पर थी, जैसे वो बता रहा हो, मैं सुन रहा हूँ।
बस हिली। धुआँ उड़ा। और वो आगे बढ़ गई।
मैं पलटा। चिमन भाई मेरे पीछे खड़े थे, कमर झुकी, आँखें झुकी।
"रास्ता दिखाओ," मैंने कहा।
वो चले। उनके पैरों की आवाज़ धूल में दब रही थी। नहर के किनारे-किनारे पुराना नील का कोठा आया — बंद, टूटी छत, अंदर से गुड़ की बासी गंध। उसके पीछे एक पतला रास्ता था, झाड़ियों से ढका।
तभी चिमन भाई रुके। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं बीस साल चुप रहा। भवानी मेरे सामने मरा, और मैं चुप रहा। भैरव ने मेरे गाँव के लड़कों को पानी पिलाया, और मैं चुप रहा। मेरा अपना बेटा चंदन…" उनका गला रुका। "उस काग़ज़ में उसका नाम देखकर मेरे हाथ काँप गए थे। मैंने सोचा, अगर मैं बोलूँगा, तो वो चंदन को मार देगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर वो गिरा नहीं।
"अब नहीं रहूँगा," उन्होंने कहा। "बेटा, मैं बीस साल चुप रहा, अब नहीं रहूँगा।"
मैंने उन्हें सीने से लगा लिया। उनका शरीर पतला था, हड्डियाँ चुभ रही थीं, और उनकी साँस मेरे कंधे पर गरम पड़ रही थी। मेरी आँखें जल रही थीं, पर मैंने खुद को रोका। ये रोने का वक़्त नहीं था।
मैंने उन्हें छोड़ा और काग़ज़ उनकी जेब से निकाला। वो सिलवटों में दबा हुआ था, कोने से गीला। मैंने उसे खोला। उसमें सिर्फ़ एक लाइन थी, बड़े अक्षरों में — चंदन को ज़िंदा रखने की एक ही शर्त है: कालू खामोश रहे।
मैंने उसे तह किया और अपनी जेब में रख लिया।
"ये काग़ज़ अब सबूत है," मैंने कहा। "शर्त नहीं।"
चिमन भाई ने सिर हिलाया। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
हम झाड़ियों के बीच से निकले। सामने बस स्टॉप था — टूटा शेड, एक बेंच, और उस पर कोई बैठा था। बस वहीं खड़ी थी, इंजन बंद, और मीरा और टिंकू उतर चुके थे। मीरा का बैग उसके हाथ में था, और वो उस आदमी से बात कर रही थी जो बेंच से उठा।
वो आदमी लंबा था, सफ़ेद कुर्ते में, और उसके हाथ में कुछ पीला चमक रहा था।
मैं दौड़ा।
"मैडम," वो कह रहा था, "शहर का रास्ता बंद है। कल से पुल टूटा हुआ है।"
मीरा उसकी तरफ़ मुड़ी। और उसी पल मैंने देखा — उस आदमी की उँगलियों में वही पीली शीशी थी। छोटी, चमकदार, और उसमें पानी हिल रहा था।
॥
शीशी उसकी उँगलियों में हिल रही थी, और उसका ढक्कन खुला था। पीला पानी धूप में सोने जैसा चमक रहा था।
मेरे पैर मेरे काबू में नहीं थे। मैं दौड़ा, और जब तक वो आदमी मीरा की तरफ़ हाथ बढ़ाता, मैं उसके सामने खड़ा था।
"हट जाओ," वो बोला, आवाज़ में वो मिठास जो भैरव की आवाज़ में होती थी।
मैंने शीशी की गंध ली। पानी में वो कड़वाहट थी, वो जली हुई लकड़ी, वो सड़ी हुई मिठास — जो मैंने लुट्टन के पसीने में पाई थी, जग्गा के शरीर में पाई थी। मेरा पेट मुड़ा।
"मीरा," मैंने कहा, बिना पलटे, "ये भैरव का आदमी है।"
वो एक कदम पीछे हटी। उसका बैग कंधे से खिसका, पर उसने उसे पकड़ लिया।
"पुल टूटा है," उस आदमी ने कहा, और मुस्कुराया। उसके दाँत पीले थे, और सामने का एक दाँत टूटा हुआ। "मैडम, मैं तो मदद कर रहा हूँ। पुल टूटा है तो क्या हुआ? वहाँ से नहर किनारे का पगडंडी रास्ता है। बड़ा साफ़ रास्ता है, आपको शहर पहुँचा दूँगा।"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा। और फिर उसने वो किया जो मैंने उससे उम्मीद की थी। उसने काँपती आवाज़ में नहीं, सीधे मुँह से कहा —
"हम वहीं से जाएँगे।" उसने अपना बैग ठीक किया। "पर तुम्हारे साथ नहीं। तुम्हारा रास्ता तुम जानो, हमारा हम।"
आदमी का चेहरा नहीं बदला। वो मुस्कुराता रहा, और मुस्कुराते हुए उसने शीशी को ऊपर उठाया।
"मैडम, आप गलत समझ रही हैं। ये शीशी तो…" उसने गला साफ़ किया, "ये तो दवा है। मेरी माँ की दवा।"
टिंकू आगे आया। उसके हाथ में वो डिब्बी थी, वही जिसमें मिठाई थी, और उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो मुझे बचपन से पता थी — वो मुस्कान जो खतरे में भी दुकानदारी की तरह चढ़ जाती थी।
"भाई साहब," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में मक्खन घुला था, "आप इतनी धूप में खड़े हैं। ये लड्डू खाओ। हमारी दुकान का है, टिंकू मिष्ठान भंडार। बिलकुल ताज़ा। आज सुबह का बना है।"
आदमी की आँखें डिब्बी पर गईं। उसका हाथ थोड़ा नीचे आया। भूख ऐसी चीज़ है जो शक को पीछे धकेल देती है।
"अरे, ये क्या बात है," वो बोला, और हाथ बढ़ाया।
जैसे ही उसकी उँगलियाँ डिब्बी को छूने लगीं, टिंकू ने उसे झटके से पीछे खींच लिया।
"अरे नहीं!" टिंकू चिल्लाया, इतनी ज़ोर से कि वो आदमी चौंका। "ये गलत डिब्बी थी। माफ़ करना भाई साहब, ये तो मैंने गलती से पकड़ ली। ये तो वो है जो…" उसने गला साफ़ किया, "जो घर ले जाने के लिए रखी थी।"
और फिर उसने दूसरी डिब्बी आगे बढ़ा दी।
वो आदमी आगे झुका, और उसके चेहरे की मुस्कान गलने लगी। डिब्बी खुली थी, और उसमें मिठाई नहीं थी। उसमें लड्डू की गोलियाँ रखी थीं, पर वो गोलियाँ हिल रही थीं। कीड़े। छोटे, सफ़ेद, काले सिर वाले कीड़े, जो लड्डू के रंग में मिलकर रेंग रहे थे, एक के ऊपर एक चढ़ रहे थे।
आदमी पीछे हटा। उसका पैर बेंच से टकराया और वो लड़खड़ाया। उसका चेहरा हरा पड़ गया, और उसने एक हाथ मुँह पर रख लिया।
"ये… ये क्या है?" वो बोला, आवाज़ बदली हुई।
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