Spirit of a Fighter954 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 954

7 min read November 5, 2026

मैंने उन्हें अपनी छाती से लगा लिया। वो छोटे थे, मेरे कंधे तक भी नहीं आते थे। पर उस पल वो मुझसे बड़े लगे।

"काका," मैंने उनके कान के पास कहा, "ये काग़ज़ अब शर्त नहीं है। ये सबूत है।"

उनका शरीर मेरी बाँहों में हिला। मुझे लगा वो रो रहे हैं। पर जब वो अलग हुए, तो उनके चेहरे पर कुछ और था — एक अजीब सी शांति।

पीछे पैरों की आवाज़ आई। मीरा और टिंकू दौड़ते हुए आ रहे थे, और उनके पीछे हरनाम, जो अपने लाल बस्ते को सीने से लगाए हुए था।

"वीर!" मीरा की साँस फूल रही थी। "क्या हुआ? हमें तुम्हारी गंध… मतलब, तुम अचानक गायब हो गए।"

मैंने काग़ज़ उनकी तरफ़ बढ़ाया।

मीरा ने पढ़ा। उसका चेहरा सख़्त हो गया। उसने कालू काका की तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो नरमी आई जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।

"काका," वो बोली, "आपने ये कब उठाया?"

"रात के दूसरे पहर में," कालू काका ने कहा। "जब तुम सब बातें कर रहे थे।"

टिंकू ने अपनी टोपी पीछे की तरफ़ खिसका दी, जो वो हमेशा करता है जब वो घबराता है।

"तो जो बस्ता खिसका हुआ था," टिंकू ने धीरे से कहा, "वो इसलिए था क्योंकि काका ने उसे खोला था। शेराज़ ने नहीं।"

"शेराज़ आया था," मैंने कहा। "उसकी गंध साफ़ थी। वो बस्ते के पास खड़ा था। पर उसने कुछ नहीं लिया। वो सिर्फ़ देखने आया था — कि बस्ता कहाँ है, किसके पास है।"

हरनाम ने अपना बस्ता कसकर पकड़ा। "मतलब वो अंदर देखना चाहता था। उसे पता है ये बस्ता क्या है।"

"उसे पता है ये बस्ता किसके हाथ में है," मीरा ने कहा। "और उसे पता है कि अगर ये बस्ता पंचायत तक पहुँचा, तो भैरव का खेल ख़त्म।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "बेटा, एक बात और है।"

"क्या?"

"जब मैंने ये काग़ज़ निकाला, तो बस्ते में एक और चीज़ थी। नीचे, काग़ज़ों के बीच दबी हुई।" उन्होंने अपनी आवाज़ और धीमी की। "एक छोटी सी कॉपी। काली जिल्द। ऐसी कॉपी जिसमें मौतों का हिसाब होता है।"

मैंने हरनाम की तरफ़ देखा। उसका चेहरा पीला पड़ गया।

"काली जिल्द वाली कॉपी?" हरनाम ने धीरे से दोहराया। "पर वो… वो मेरी नहीं है।"

"तो किसकी है?" मीरा ने पूछा।

"मैंने वो कॉपी पहले कभी नहीं देखी," हरनाम ने कहा, और उसकी आवाज़ में घबराहट थी। "मैं क़सम खाता हूँ। मेरे बस्ते में सिर्फ़ काग़ज़ थे — काग़ज़ और हिसाब की परचियाँ। काली कॉपी मैंने नहीं रखी।"

मैंने हरनाम के हाथ से बस्ता लिया और उसे खोला। काग़ज़, परचियाँ, हिसाब की पर्चियाँ। और सबसे नीचे, एक पतली काली जिल्द वाली कॉपी, जो एक काग़ज़ से ढकी हुई थी।

मैंने उसे निकाला। जिल्द पुरानी थी, चमड़े जैसी। उसे खोलते ही एक गंध उठी — स्याही की, पर उसमें कुछ और मिला हुआ था। मैंने आँखें बंद करके सूँघा। कपूर। और उसके नीचे, बहुत हल्का — नील का तेल।

नील का तेल। वो गंध मैंने पहले कहीं सूँघी थी। पुराने नील के कोठे पर।

"ये कॉपी भैरव की है," मैंने कहा। "मैं इस पर क़सम खा सकता हूँ।"

मीरा ने कॉपी मेरे हाथ से ली और पहला पन्ना पलटा। उसका चेहरा गंभीर हो गया।

"वीर," वो बोली, "इसमें नाम हैं। तारीख़ें हैं। रकम हैं।" वो पन्ने पलटती गई। "ये… ये तो पूरा हिसाब है। किस पहलवान को कितने पैसे मिले, किसे कितनी खुराक दी गई, कौन कब बीमार पड़ा।"

"और ये?" टिंकू ने आगे झुककर पूछा। "ये आख़िरी पन्ने पर क्या लिखा है?"

मीरा ने आख़िरी पन्ना पलटा। उसकी उँगली एक लाइन पर रुकी, और उसकी साँस रुक गई।

"क्या है?" मैंने पूछा।

वो बोली नहीं। उसने कॉपी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

आख़िरी पन्ने पर सिर्फ़ दो लाइनें थीं, बड़े अक्षरों में, जैसे कोई दीवार पर लिखता है:

जो मेरे हाथ से खेलेगा, वो मेरा। जो मेरे खिलाफ़ खेलेगा, वो मिट्टी। और मिट्टी का हिसाब मैं खुद रखता हूँ।

उसके नीचे एक तारीख़ थी — बीस साल पुरानी — और उस तारीख़ के आगे एक नाम, जो किसी और की लिखाई में जोड़ा गया था। भवानी सिंह।

मेरे हाथ काँपने लगे।

"वो मेरे पिता का नाम है," मैंने कहा। "उसकी लिखाई में।"

कालू काका मेरे पास आए और उन्होंने कॉपी में झाँका। उनकी आँखें भर आईं।

"ये कॉपी," उन्होंने धीरे से कहा, "मैंने बीस साल पहले भैरव की अलमारी में देखी थी। मुझे लगा वो जल गई।"

"नहीं जली," मैंने कहा। "वो इसे अपने साथ रखता है। जैसे कोई शिकारी अपने शिकार की हड्डियाँ रखता है।"

हरनाम ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया। "तो ये कॉपी… ये मेरे बस्ते में कैसे आई?"

"वो तुम्हें फँसा रहा है," मीरा ने कहा। "भैरव ने ये कॉपी तुम्हारे बस्ते में रख दी। अगर ये कॉपी पकड़ी जाती, तो इल्ज़ाम तुम पर आता। तुम्हें फाँसी पर लटकाया जाता और वो साफ़ बच जाता।"

हरनाम की आँखों में आँसू आ गए। "मैंने उसके लिए बीस साल काम किया। बीस साल। और वो मुझे फाँसी पर चढ़ाना चाहता था।"

टिंकू ने उसके कंधे पर हाथ रखा। टिंकू की आदत है — जब कोई टूटता है, तो वो चुपचाप हाथ रख देता है। कुछ नहीं कहता। बस हाथ रख देता है।

"तो अब क्या?" टिंकू ने पूछा।

मैंने काग़ज़ अपनी जेब में रखा और कॉपी अपने हाथ में ली। मैंने सबकी तरफ़ देखा — कालू काका, जिनकी आँखें अब डर से खाली थीं और कुछ और भरा हुआ था। मीरा, जिसके होंठ सख़्त थे और आँखें चमक रही थीं। टिंकू, जिसका हाथ हरनाम के कंधे पर था। हरनाम, जो अब टूटा हुआ था और शायद इसीलिए अब सच्चा था।

"अब हम शहर जाएँगे," मैंने कहा। "ये कॉपी, ये काग़ज़, और ये बस्ता — सब पंचायत के सामने, और उसके बाद पुलिस के सामने। भैरव ने बीस साल में जो किया, उसका पूरा हिसाब इस कॉपी में है।"

"पर शहर जाने का रास्ता?" हरनाम ने कहा। "वो तो बंद है।"

"कौन कहता है?" मैंने पूछा।

"वो… वो कहता था। भैरव।" हरनाम ने धीरे से कहा। "उसने कहा था कि अगर मैंने कुछ किया, तो रास्ते बंद हो जाएँगे।"

मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन गई। "रास्ते बंद करने का मतलब?"

"मतलब… पुल। नहर का पुल।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

"वीर," वो बोली, "अगर पुल टूटा हुआ है, तो हमें शहर जाने का दूसरा रास्ता चाहिए।"

"है," मैंने कहा। "तहखाने से। वो सुरंग नहर के नीचे से जाती है। मैंने खुद देखा है।"

कालू काका ने कुछ कहना चाहा, पर रुक गए।

"क्या?" मैंने पूछा।

"वो सुरंग," उन्होंने कहा, "बीस साल में एक बार भी पूरी नहीं खोली गई। उसमें हवा है या नहीं, किसी को पता नहीं।"

"तो आज पता चल जाएगा," मैंने कहा।

हम आँगन में लौटे। आसमान में हल्की रोशनी फैल रही थी, पूरब की तरफ़ एक पतली पीली लकीर। सुबह होने में ज़्यादा देर नहीं थी।

मीरा ने अपना बैग उठाया और उसमें काग़ज़ों की कॉपी रखी। मैंने उसे देखा — वो जल्दी में थी, पर उसके हाथ स्थिर थे।

"मैं तुम्हारे साथ चलूँगी," वो बोली।

"नहीं," मैंने कहा।

उसने सिर उठाया। "क्या?"

"तुम शहर जाओगी," मैंने कहा। "टिंकू के साथ। बस पकड़ोगी। ये काग़ज़ और ये कॉपी लेकर। तुम वहाँ पहुँचकर पंचायत के आदमी और पुलिस, दोनों को लाओगी।"

"और तुम?"

"मैं सुरंग से जाऊँगा। अगर वहाँ कुछ हुआ, तो कम से कम एक रास्ता तो खुला रहे।"

मीरा ने अपना बैग नीचे रखा और मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी आँखें मेरी आँखों से टकराईं।

"तुम मुझे भेज रहे हो ताकि मैं सुरक्षित रहूँ," वो बोली। "ये मुझे पसंद नहीं आया।"

"मैं तुम्हें भेज रहा हूँ," मैंने कहा, "क्योंकि तुम्हारे पास दिमाग़ है। और मेरे पास सिर्फ़ नाक।"

वो हँसी — एक छोटी, थकी हुई हँसी। "तुम बेवकूफ़ हो, वीर सिंह।"

"पता है।"

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