Spirit of a Fighter – Chapter 950
मैं उठा। "डिब्बा कहाँ है?"
रामदीन ने मुँह फेरा। "मैंने उसे यहाँ से हटा दिया था। भैरव के आदमी यहाँ आते हैं।
"कहाँ हटाया?" मैंने पूछा।
रामदीन ने कालू काका की तरफ़ देखा। कालू काका ने अपनी जेब से एक और चाबी निकाली — छोटी, ज़ंग लगी।
"मेरे पास," कालू काका ने धीरे से कहा। "पिछले साल जब भैरव के आदमी अखाड़े की तलाशी लेने आए थे, तब मैंने रातों-रात डिब्बा निकालकर अपने घर की छत के नीचे ईंटों में छिपा दिया।" उनकी आवाज़ में शर्म थी। "बीस साल मैं उसे खोलने से डरता रहा। भवानी की लिखाई पढ़ने से डरता रहा।"
"तो अब खोलेंगे," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो झुकती नहीं। "आज रात।"
कालू काका ने सिर हिलाया, पर उनके हाथ काँप रहे थे। रामदीन ने उनका कंधा थामा।
"बूढ़े, अब डर नहीं। अब वीर है। और ये लड़की है।" उसने मीरा की तरफ़ देखा और मुस्कुराया। "भवानी की आँखें तुझमें हैं, बेटी। उसी तरह सीधा देखती है।"
मीरा ने नज़र नहीं चुराई, पर उसके कान लाल हो गए।
तभी टिंकू कमरे में घुसा। उसकी जेब में कुछ था — मैंने देखा, काग़ज़ों की गड्डी। वो चुपचाप खाट के पास बैठ गया और एक-एक करके परचियाँ फैलाने लगा।
"ये सब भैरव के तहखाने की अलमारी से थीं," उसने कहा। "जो काग़ज़ मैं उठा लाया।" उसने एक परची उठाई। "ये रसीद है। बोर्डिंग स्कूल की फीस की।"
मीरा ने वो परची उसके हाथ से ली। उसकी आँखें सिकुड़ीं।
"नाम पर 'गोलू' लिखा है," वो बोली। "और नीचे वार्डन का नंबर — श्रीमती कपूर।" उसने पलटकर हरनाम की तरफ़ देखा, जो दरवाज़े के पास खड़ा हम सबको देख रहा था।
"हरनाम," मीरा की आवाज़ धीमी हुई, "तुम्हारे बेटे का नाम गोलू है ना?"
हरनाम का चेहरा वैसे ही रहा, पर उसकी साँस रुक गई।
"हाँ," वो बोला। "क्यों?"
मीरा ने परची उसकी तरफ़ बढ़ाई। "ये रसीद भैरव की अलमारी से निकली है। उसी स्कूल की है जहाँ भैरव का बेटा पढ़ता है। तुम्हारा बेटा उसी स्कूल में है।"
हरनाम ने परची नहीं ली। उसने बस देखा, और उसके होंठ हिले पर आवाज़ नहीं निकली।
"मैंने उसे वहाँ इसलिए भेजा था," वो फुसफुसाया, "कि वो भैरव से दूर रहे। अखाड़े से दूर। इस गाँव से दूर।" उसकी आवाज़ टूटी। "और वो उसी की छत के नीचे पढ़ रहा था?"
"भैरव के बेटे के साथ," मीरा ने कहा। "एक ही दालान में, शायद एक ही कमरे में।"
हरनाम दीवार से टिक गया। उसके हाथ उसके चेहरे पर गए और वो धीरे से बैठ गया, जैसे किसी ने उसकी टाँगें खींच ली हों।
"मैं साल में दो बार जाता था," वो बोला, आवाज़ दबी हुई। "वार्डन से मिलता, फीस देता, गोलू से बात करता — बस दस मिनट। वो कहता, 'पापा, मेरा एक दोस्त है, बहुत अच्छा लड़का है।' मैंने कभी नाम नहीं पूछा।" उसने अपनी हथेली अपनी आँखों पर रख ली। "मैंने कभी नहीं पूछा।"
कमरे में किसी ने कुछ नहीं कहा। रामदीन ने अपना सिर नीचा कर लिया।
टिंकू खड़ा हो गया। उसने अपनी जेब से रुमाल निकाला और हरनाम की तरफ़ बढ़ाया। फिर उसने अलमारी के पास रखी मिठाई की डिब्बी उठा ली — वही डिब्बी जो कालू काका ने कुछ देर पहले खोली थी।
"मैं चलता हूँ," उसने कहा। "मेरा प्लान है।"
"कौन-सा प्लान?" मैंने पूछा।
"मैं स्कूल जाऊँगा। वार्डन से मिलूँगा। मिठाई लेकर। बोलूँगा कि मैं गोलू के मामा हूँ, उसकी तबीयत ठीक नहीं, उसे घर ले जाना है।" उसने डिब्बी हिलाई। "वार्डन मिठाई खुशी से लेगी, और मैं लड़के को निकाल लाऊँगा।"
"और अगर उसने फ़ोन किया?" मीरा ने कहा। "भैरव से पूछने के लिए?"
"तो मैं उससे पहले निकल जाऊँगा।" टिंकू ने कंधे उठाए। "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं ज़िंदा हूँ।"
हरनाम ने अपने हाथ नीचे किए। उसकी आँखें लाल थीं, पर आवाज़ साफ़।
"टिंकू," वो बोला, "गोलू से कहना — उसका पापा सोच रहा है। पहली बार ठीक से सोच रहा है।"
टिंकू ने सिर हिलाया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
वो दो कदम भी नहीं चला था कि बाहर से कुछ आवाज़ आई — एक तेज़ सनसनाहट, फिर दीवार पर ज़ोर की थाप। मिट्टी का धूल कमरे में फैल गया।
हम सब ठिठक गए।
दीवार पर एक पत्थर लगा था, और उससे लिपटा काग़ज़ खुल रहा था, हवा से काँपता हुआ। मीरा दौड़ी, काग़ज़ खोला, और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
मैंने उसके हाथ से काग़ज़ लिया। बड़े-बड़े अक्षरों में सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी:
हरनाम, अपना मुँह बंद रख, वरना गोलू कल सुबह स्कूल की छत से नीचे मिलेगा।
॥
हरनाम ने वो काग़ज़ पढ़ा और उसके हाथ से काग़ज़ छूट गया। फिर उसके घुटने टूट गए। वो ज़मीन पर गिरा, दोनों हाथ ज़मीन पर टिकाए, और उसकी साँस ऐसी चली जैसे कोई दौड़कर आया हो।
"देखा?" उसने छत की तरफ़ देखकर कहा। आवाज़ ऐसी जैसे किसी और से बात कर रहा हो। "मैंने कहा था न! मैंने कहा था कि जिस दिन मैं मुँह खोलूँगा, वो मेरे बच्चे को नहीं छोड़ेगा।"
वो अपने ही हाथों को देखने लगा, जैसे उनसे नफ़रत हो रही हो।
"बीस साल," वो बोला, "मैंने हिसाब लिखा। मौतें गिनीं। काग़ज़ भरे। और जब मेरा बेटा उसकी छत के नीचे सो रहा था, तब मैं उसके लिए चप्पल भी नहीं ले गया।"
मैं उसके पास गया और उसकी बाँह पकड़कर खींचा। उसका शरीर भारी था, जैसे कोई थैला गीली मिट्टी से भरा हो।
"उठो," मैंने कहा। "आज से इस घर में फ़ैसला तुम नहीं लोगे। न मैं लूँगा। हम लेंगे।"
हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो इंसान के बच्चे के लिए होता है — माँ के हाथ से छूटे बच्चे वाला डर।
"तुम नहीं समझोगे, वीर," वो बोला। "तुम्हारा कोई बच्चा नहीं है।"
"नहीं है," मैंने कहा। "पर मेरी एक माँ है, और एक बहन है, और वो दोनों कल इसी आदमी के हाथ में थीं। तुम्हारा बेटा भी मेरा ही है अब। उठो।"
कमरे में चुप्पी छा गई। रामदीन ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और धीरे से कुछ बुदबुदाया, जो मैं सुन नहीं पाया।
मीरा पहले से ही उस काग़ज़ को उठा चुकी थी। वो उसे रोशनी में पकड़कर देख रही थी, और उसके होंठ हिल रहे थे — जैसे वो अंदर ही अंदर कोई हिसाब लगा रही हो।
"ये लिखाई," वो बोली, "भैरव की है। मैं इसे पहचानती हूँ। उसने मेरे पापा के काग़ज़ात पर अपने दस्तख़त ऐसे ही किए थे — काँपते हाथ, तिरछे अक्षर, और हर सिरे पर ज़ोर।"
"पर भैरव तो पकड़ा गया था?" टिंकू ने पूछा। "इंस्पेक्टर ने उसे ले जाने को कहा था।"
"पकड़ा गया था," कालू काका ने धीमी आवाज़ में कहा। "पर तुमने उसे आख़िरी बार कब देखा था? तहखाने में? उसके बाद?"
मैंने सोचा। तहखाने के बाद मैंने भैरव को देखा ही नहीं था। उसका नाम लिया गया, उसकी बातें हुईं, पर वो खुद मेरी आँखों के सामने नहीं आया। मैं उसकी मौजूदगी मानता रहा, बिना उसे देखे।
"वो बाहर है," मैंने कहा। "आज़ाद घूम रहा है, और हमें पता भी नहीं चला।"
"नहीं," मीरा ने कहा। उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "देखो, काग़ज़ की गंध।"
मैंने काग़ज़ अपनी नाक के पास लिया और गहरी साँस खींची। काग़ज़ पर स्याही की गंध थी, और उसके नीचे — गीली मिट्टी, और उसके भी नीचे — कुछ भारी, मीठा-सा।
"ये काग़ज़ आज सुबह लिखा गया है," मैंने कहा। "स्याही अभी सूखी नहीं है। और इसमें वही मिट्टी है जो अखाड़े की दीवार पर लगी है।" मैंने उसे सूँघा। "लाल मिट्टी। अखाड़े की।"
कमरे में सब एक-दूसरे को देखने लगे।
"तो वो अखाड़े में है," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ में वो डर नहीं था जो तहखाने में था। अब उसमें कुछ और था। "अपने ही अखाड़े में छिपा बैठा है। जहाँ उसने बीस साल राज किया।"
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