Spirit of a Fighter – Chapter 946
मीरा रुक गई। उसने ऊपर देखा, मेरी तरफ़। उसके होंठ खुले रह गए।
तालाब के उस पार से भैरव की हँसी आई। "पढ़ लिया? अब समझा, वीर? तेरा पूरा जीवन एक झूठ पर खड़ा है। तू जिस आदमी के पैरों पर गिरता है, वही तेरे पापा की लाश के ऊपर खड़ा है।"
मेरी छाती में कुछ बैठ गया। मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा — वो पानी में गर्दन तक डूबे, आँखें ऊपर, मेरी तरफ़। उनकी आँखों में डर नहीं था। शर्म थी।
बीस साल की शर्म।
"झूठ है," रणवीर सिंह ने पानी में से कहा। उनकी आवाज़ फटी थी। "वीर, ये झूठ है। मैंने भवानी को नहीं मारा।"
"तो सच क्या है?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी भी नहीं लग रही थी।
"सच ये है कि भवानी ने मुझे बचाया था," रणवीर सिंह ने कहा। "और ये चिट्ठी भैरव की लिखाई है, पर इसके शब्द नंदकिशोर के हैं। भैरव तो सिर्फ़ मुहर लगाता है।"
मैंने मीरा के हाथ से चिट्ठी ली। पलटी। उसके पीछे, छोटी लिखाई में, एक और लाइन थी — मैंने उसे किताब पकड़े हुए पढ़ा —
"और अगर मैं न पकड़ा जाऊँ, तो ये सब मेरे बेटे का होगा।"
मेरा हाथ रुक गया।
"भैरव का बेटा," मैंने धीरे से कहा। "कौन है?"
हरनाम ने सिर नीचा कर लिया।
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "मैंने कभी नहीं पूछा। पर… बस्ते के सबसे नीचे एक तस्वीर है। वो हर बार मेरे हाथ लगती है, और हर बार मैं उसे देखकर डर जाता हूँ।"
"निकालो उसे।"
हरनाम ने बस्ते के सबसे नीचे से एक फटी, मुड़ी हुई तस्वीर निकाली। सफ़ेद-काली, जिसके कोने जल चुके थे। उसने उसे मेरे हाथ में रख दिया।
तस्वीर में तीन लड़के खड़े थे — छोटे, स्कूल की वर्दी में, एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखे। बाएँ वाला मोटा, हँसता हुआ। दाएँ वाला लंबा, गंभीर। और बीच वाले का चेहरा… किसी ने सुई से खुरचकर मिटा दिया था। सिर्फ़ उसके कान दिख रहे थे, और गले में एक पतला धागा — जिसमें कोई चीज़ लटकी थी।
मैंने तस्वीर के पीछे देखा। वहाँ कोई लिखाई नहीं थी। बस एक छोटा-सा निशान — पीले रंग का धब्बा, जैसे किसी ने उँगली से शहद लगाकर छोड़ दिया हो।
"टिंकू," मैंने कहा। "ये तस्वीर देख।"
टिंकू ने पास आकर झुककर देखा। उसका चेहरा बदल गया।
"ये… ये वर्दी…" वो धीरे से बोला। "ये उसी स्कूल की वर्दी है, वीर। शहर के पुराने स्कूल की। जहाँ गोलू बंद है।"
मैंने तस्वीर को मशाल की रोशनी में ऊपर उठाया। तीन लड़के। तीन भाई। एक का चेहरा मिटाया हुआ।
"तीन भाई," मैंने धीरे से दोहराया। "एक ने दूसरे को मारा। तीसरा चुप रहा।"
और तभी मेरी नाक में एक गंध आई। तस्वीर से नहीं — हवा से। पूरब से, तालाब के उस पार से। तेल, पसीना, और पीली शीशी की वो कड़वाहट। पर उसमें कुछ और भी था — लोहे की स्याही, और… चूने की गंध। पुरानी दीवारों का चूना।
"वो स्कूल," मैंने कहा। "वो यहाँ से कितनी दूर है?"
"नहर के उस पार," हरनाम ने कहा। "पुराने रास्ते से… शहर के किनारे पर। पैदल डेढ़ घंटा।"
"और भैरव वहाँ से आया है," मैंने कहा। "मैं उसकी गंध पकड़ रहा हूँ। वो अभी-अभी वहाँ से आया है।"
सब चुप हो गए।
"तो गोलू अभी भी वहीं है," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो फ़ैसले से पहले आती है। "और अगर भैरव यहाँ है, तो उसके आदमी अकेले हैं।"
मैंने हरनाम की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखों में पहली बार कुछ और था — उम्मीद।
"तू मेरे साथ चलेगा?" मैंने पूछा।
"मैं… मैं डरता हूँ," उसने कहा।
"मैं भी," मैंने कहा। "पर तेरा बेटा तेरा इंतज़ार कर रहा है। वो कॉपी पर लिखता है — पापा, मैं फिर से इंतज़ार कर रहा हूँ। तू कब तक उसे इंतज़ार कराता रहेगा?"
हरनाम ने अपनी आँखें मींच लीं। फिर उसने लंबी साँस खींची, और अपना टूटा चश्मा उतारकर जेब में रख दिया।
"चल," उसने कहा। "पर एक बात — अंदर घुसते ही मुझे आगे मत करना। मैं पीछे रहूँगा, और जब तेरा इशारा हो, तब अंदर आऊँगा।"
"हो गया," मैंने कहा।
मैं पलटा। तालाब के उस पार मशाल अब भी जल रही थी, पर भैरव की आवाज़ नहीं आ रही थी। मैंने गौर से देखा। मशाल का डंडा कीचड़ में धँसा था, और उसके नीचे पानी में… कोई नहीं था।
रणवीर सिंह पानी में नहीं थे।
रस्सी कटी हुई थी, और उसका एक सिरा पानी में तैर रहा था।
"भैरव भाग गया," मैंने कहा। "और रणवीर सिंह को भी साथ ले गया।"
"नहीं," टिंकू ने कहा। उसने तालाब के किनारे की झाड़ियों की तरफ़ इशारा किया।
वहाँ, झाड़ियों के बीच, गीले कपड़ों में, घुटनों के बल बैठे, रणवीर सिंह हाँफ रहे थे। उनके हाथ में रस्सी का टुकड़ा था, और उनकी आँखें बंद थीं। उनके पास ही एक पुरानी छुरी पड़ी थी — जिससे उन्होंने खुद को छुड़ाया था।
"मैंने कहा था न," वो हाँफते हुए बोले। "भवानी ने मुझे बचाया था। अपनी जान देकर बचाया था। अब मैं भी कुछ ऐसा करूँगा जो उसके लायक हो।"
मैंने उन्हें उठाया।
"आप मेरे साथ चलिए," मैंने कहा। "वो स्कूल दिखाना है।"
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर होंठ सख़्त थे।
"वो स्कूल तुझे दिखाना पड़ेगा," वो बोले। "क्योंकि मैं बीस साल से उस स्कूल के सपने से उठता हूँ।"
हम निकले। तालाब के किनारे-किनारे, फिर सूखी नहर, फिर पुराने रास्ते पर। रास्ते में हरनाम ने कुछ नहीं कहा, बस अपनी जेब में हाथ रखे चलता रहा — मुझे पता था, वो कॉपी को छू रहा था।
पौ फटने से पहले हम शहर के किनारे पहुँचे। और वहाँ, पीपल के पेड़ों के पीछे, वो दीवारें दिखीं — पीली, ऊँची, जगह-जगह से टूटी हुईं। ऊपर लोहे का फाटक, जिस पर जंग लगी थी और जिस पर कोई बच्चा बड़े अक्षरों में चाक से लिखकर चला गया था — "गोलू यहाँ है।"
हरनाम ने एक कदम आगे बढ़ाया। फिर ठिठक गया।
"दो आदमी," उसने धीरे से कहा। "एक मोटा, कान कटा। एक लंबा, तम्बाकू…"
"पता है," मैंने कहा। "मैं उनकी गंध पकड़ रहा हूँ। दोनों जाग रहे हैं। और एक को… पीली शीशी की गंध है।"
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी।
"वीर," उसने धीरे से कहा। "अगर अंदर गोलू के साथ भैरव का आदमी है और उसके हाथ में शीशी है…"
"तो हमें तेज़ होना पड़ेगा," मैंने कहा।
मैंने फाटक की तरफ़ देखा। वो खुला था। जैसे हमारा इंतज़ार कर रहा हो।
और फाटक के अंदर, दूर, चौथे कमरे की खिड़की पर, एक छोटा-सा हाथ लोहे की छड़ों के बीच से बाहर झाँक रहा था — किसी बच्चे का हाथ, जो किसी को देखकर हिल रहा था।
हरनाम ने वो हाथ देखा। और वो दौड़ पड़ा।
"गोलू!" वो चिल्लाया। "गोलू, पापा आ गया!"
और तभी चौथे कमरे से एक काग़ज़ हवा में उड़कर आया और मेरे पैरों के पास गिरा। मैंने उसे उठाया।
उस पर बच्चे की टेढ़ी लिखाई में लिखा था — "पापा, मत आना। वो कहता है कि जो अंदर आएगा, वो बाहर नहीं जाएगा।"
मेरी मुट्ठी भिंच गई। मैंने काग़ज़ मीरा के हाथ में दिया और फाटक की तरफ़ बढ़ा।
"हरनाम, रुक!" मैंने कहा। "ये जाल है।"
पर हरनाम रुक नहीं रहा था। वो फाटक के अंदर घुस चुका था, और उसकी आवाज़ दीवारों से टकरा रही थी — "गोलू! गोलू!"
और फिर फाटक अपने आप बंद हो गया। लोहे की चरचराहट के साथ, जैसे किसी ने उसे पीछे से धक्का दिया हो।
मैं दौड़ा। फाटक तक पहुँचा, और उसे खींचा। पर वो बाहर से नहीं, अंदर से बंद हो चुका था — और उसकी जंज़ीर पर एक ताज़ा ताला लटक रहा था, जिसकी चाबी किसी की कमर पर थी।
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