Spirit of a Fighter934 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 934

7 min read November 5, 2026

वो आकृति आग के पास से उठी। मैंने उसे देखा — लंबा, दुबला, सफ़ेद दाढ़ी बेतरतीब, एक कंधा झुका हुआ। उसके हाथ में एक छोटी घंटी थी जिसे वो धीरे-धीरे घुमा रहा था।

"तू कौन है?" मैंने पूछा।

"मैं वो हूँ जिसे तेरे बाप ने भुला दिया था," उसने कहा। "मैं वो हूँ जिसे भैरव ने बीस साल पहले यहाँ बाँधकर छोड़ दिया था।"

वो करीब आया। आग की रोशनी में उसका चेहरा दिखा। जली हुई खाल, दो जगह पर टाँके, और एक आँख जो दूसरी से छोटी थी।

मेरी साँस रुक गई।

"चंदन," मैंने कहा। "कालू काका का बेटा।"

"नहीं," उसने कहा। "चंदन तो मर गया। उसका जला हुआ शरीर अब यहाँ नहीं है। मैं वो हूँ जो उसके बाद बचा। मुझे कोई नाम नहीं मिला, तो मैंने खुद को उस्ताद कह लिया।"

कालू काका दरवाज़े पर पहुँच चुके थे। उन्होंने अंदर देखा और उनकी लाठी हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिरी।

"बेटा…" उनकी आवाज़ फूट गई।

उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा। उसकी आँख में कुछ बदला — एक पल के लिए। फिर वो ठंडी हो गई।

"बाप," उसने कहा। "तू बीस साल से ज़िंदा है, मैं बीस साल से ज़िंदा हूँ। फर्क बस इतना है कि मैं ज़िंदा हूँ और तू ज़िंदा नहीं।"

कालू काका उसकी तरफ़ एक कदम बढ़े।

"रुको," मैंने कहा। "कालू काका, रुकिए।" मैंने उनका हाथ पकड़ा। "वो चाहता है कि आप आगे आएँ।"

उस्ताद मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में दाँत कम थे।

"अरे वाह," उसने कहा। "तेरे बाप से ज़्यादा अक्ल है तुझमें।"

"तुम मेरे पापा को जानते थे?" मैंने पूछा।

"जानता था?" उसने कहा। "मैं उनका दोस्त था। मैं उनका सबसे अच्छा दोस्त था। और जब भैरव ने उन्हें ज़हर दिया, तो मैं वहीं था।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसकी।

"क्या?"

"मैं वहीं था," उसने दोहराया। "मैंने उन्हें बचाने की कोशिश की। इसीलिए मुझे यहाँ बाँधकर छोड़ दिया गया। इक्कीस दिन। पानी के बिना। और जब मैं मरा नहीं, तो भैरव ने मुझे यहाँ ज़िंदा छोड़ दिया — ताकि मैं हमेशा याद रखूँ कि बचाने की कोशिश करने का क्या अंजाम होता है।"

"तो फिर तूने माँ को क्यों बाँधा है?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी। "अगर तू मेरे पापा का दोस्त था, तो ये क्या कर रहा है?"

उसने घंटी बजाई। एक बार, धीरे।

"क्योंकि तेरे बाप ने मुझे भुला दिया," उसने कहा। "वो अखाड़े लौट गया। वो अपनी माँ को लेकर चला गया। और मैं यहाँ पड़ा रहा — ज़िंदा, जला हुआ, अंधेरे में।"

मीरा ने पीछे से कहा, "ये सच नहीं है।"

वो सबने मुड़कर उसकी तरफ़ देखा।

"क्या?" उस्ताद ने कहा।

"ये सच नहीं है," मीरा ने दोहराया। वो आगे आई, उसकी आँखें उस्ताद पर टिकी थीं। "मैंने आयुर्वेद में पढ़ा है। जो आदमी इक्कीस दिन भूखा-प्यासा रहता है, उसका गला सूख जाता है, उसकी आवाज़ जाती है। तेरी आवाज़ साफ़ है। तूने पानी पिया है — बीस साल तक।"

उस्ताद का चेहरा बदला।

"और तेरे टाँके," मीरा ने कहा। "वो नए हैं। जले हुए आदमी के टाँके इक्कीस दिन बाद नहीं लगाए जाते। वो उसी रात लगाए जाते हैं। इनमें से कुछ साल पुराने हैं, पर कुछ महीने पुराने भी हैं — मैं देख सकती हूँ।"

उस्ताद ने घंटी को पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ सफ़ेद हो गईं।

"तो तूने बीस साल पानी पीया," मीरा ने कहा। "तूने यहाँ अंदर ज़िंदगी जी। तेरे पास खाना था, पानी था, और वो काग़ज़ भी थे जो तूने मेरे हाथों में रखवाए। तू कैदी नहीं है। तू इस कोठे का मालिक है।"

"चुप रह!" उस्ताद चीखा।

"तूने मेरे पिता को ज़हर दिया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें ज़ोर था। "तूने वो काग़ज़ लिखवाया जो मुझे चक्कर में डालने के लिए था। तूने शेराज़ को भेजा। तूने माँ को उठवाया। तू यहाँ पीड़ित नहीं है — तू शिकारी है।"

उस्ताद ने घंटी फेंक दी। वो दीवार से टकराई और बजी।

"और तेरे बाप?" उसने कहा। "तेरे बाप ने मुझे यहाँ छोड़ा था।"

"मेरे बाप ने तुझे छोड़ा नहीं था," कालू काका ने कहा।

सब रुक गए।

कालू काका आगे आए। उनकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ में ज़ोर।

"मैंने तुझे ढूँढा था," उन्होंने कहा। "बीस साल। मैंने हर कोठा छाना। मैंने भैरव से पूछा तो उसने कहा तू मर गया। मैंने तेरी माँ को बताया तो वो रोई और बेहोश हो गई। और मैं — मैं तेरे बाप हूँ, फिर भी मैं तुझे ढूँढ नहीं पाया।"

"तो तूने मुझे क्यों नहीं बचाया?" उस्ताद की आवाज़ फटी। वो पहली बार काँपा।

"क्योंकि मैं डर गया था," कालू काका ने कहा। "मैं डर गया था कि अगर मैंने भैरव का खेल खोला, तो वो तेरे साथ क्या करेगा। मैं चुप रहा।"

उस्ताद ने अपना मुँह हाथों से ढक लिया।

कोठे में सिर्फ़ आग की चटक सुनाई दी।

मैंने मौका देखा और माँ की चारपाई की तरफ़ बढ़ा। मैंने उनके हाथों की रस्सी खोली। मैंने गुड़िया के मुँह का कपड़ा हटाया। वो मेरे गले से लिपट गई और रोने लगी।

"भैया," वो रोई। "मैंने डर के मारे लिखा था कि मत आना। सॉरी।"

"चुप हो जा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ भी फट रही थी। "तूने सही किया। तू बहादुर है।"

माँ की आँखें खुलीं। उन्होंने मुझे देखा और उनके होठ हिले। "वीर…"

"मैं यहाँ हूँ, माँ," मैंने कहा। "आप सो जाओ। सब ठीक हो गया।"

पर मैं झूठ बोल रहा था और मुझे पता था।

क्योंकि जब मैंने पलटकर देखा, उस्ताद ने अपनी कमर से एक छुरी निकाली थी, और वो कालू काका की तरफ़ बढ़ रहा था।

"बाप," उसने कहा। "अगर तू मुझे नहीं बचा सका, तो मैं भी तुझे नहीं बचाऊँगा।"

मैंने गुड़िया को छोड़ा और दौड़ा।

पर मीरा पहले पहुँची।

वो उस्ताद के और कालू काका के बीच आ गई और उसने अपना बैग आगे कर दिया। छुरी बैग में धँसी और उसमें से अदरक, तुलसी और काली मिर्च की गंध फूट पड़ी।

उस्ताद चौंका। उसने छुरी खींचनी चाही, पर मैं पीछे से पहुँच चुका था। मैंने उसकी कलाई पकड़ी और उसे मरोड़ दिया। छुरी ज़मीन पर गिरी।

"बस," मैंने कहा। "अब बहुत हुआ।"

मैंने उसे दीवार से लगा दिया। वो मेरी पकड़ में फड़फड़ाया, पर उसमें ताकत नहीं थी। उसका शरीर हड्डियों का ढाँचा भर था।

"तू मुझे मार," उसने कहा। "मुझे ज़िंदा रखने का कोई मतलब नहीं।"

"मैं नहीं मारूँगा," मैंने कहा। "तू पुलिस के पास जाएगा। तू गवाही देगा। तू बताएगा कि भैरव ने बीस साल क्या-क्या किया।"

उसने मेरी आँखों में देखा। "और मैं?"

"तू जो किया, उसका हिसाब देगा," मैंने कहा। "पर तेरे बाप को तेरी ज़रूरत है। और तेरे गाँव को तेरी ज़रूरत है। तू चंदन है। तू वो लड़का है जिसे सबने मरा समझा। तेरे ज़िंदा होने से भैरव का सबसे बड़ा झूठ टूटेगा।"

उसकी आँखों में पानी आया।

"मैं चंदन नहीं हूँ," उसने धीरे से कहा। "चंदन मर गया। मैं सिर्फ़ उसका जला हुआ हिस्सा हूँ।"

कालू काका उसके पास आए और उन्होंने उसका चेहरा दोनों हाथों में पकड़ लिया।

"बेटा," उन्होंने कहा। "तू चंदन है। तेरी माँ तेरे लिए रोज़ दीया जलाती है। वो आज भी तेरे आने की राह देखती है।"

उस्ताद ने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। वो कालू काका के कंधे पर सिर रखकर रोया।

मैंने उन्हें छोड़ दिया।

मीरा ने अपना बैग उठाया, छुरी निकाली और बाहर फेंक दी। फिर वो मेरे पास आई और उसने मेरी तरफ़ देखा।

"तूने कैसे जाना?" मैंने पूछा। "कि वो झूठ बोल रहा है?"

"नहीं जाना," उसने कहा। "मैंने तो बस अंदाज़ा लगाया। हम सब डर के मारे उसी की बातें सुन रहे थे। मुझे लगा — अगर ये सच बोल रहा होता, तो इतनी देर में अपनी बात कह चुका होता। पर ये बस गिनती कर रहा था। गिनती करने वाला सच नहीं बोलता — वो सिर्फ़ डराता है।"

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