Spirit of a Fighter – Chapter 890
कल सुबह अखाड़े में। मैं और वो। और मिट्टी।
पर उससे पहले एक रात थी, और वो रात किसी ने मेरे लिए बनाई थी — बिना नींद की।
चार बजे मेरी आँखें अपने आप खुल गईं। घर में चक्की की आवाज़ नहीं थी। न जाने कितने सालों में पहली बार मैंने ऐसी चुप्पी सुनी जिसमें चक्की नहीं थी। मुझे लगा सुबह नहीं हुई, फिर बाहर झाँका तो आसमान काला था पर आँगन में चूल्हे की लाल रोशनी नाच रही थी।
माँ चक्की पर नहीं थीं। माँ आँगन के कोने में बैठी थीं, और उनके सामने मिट्टी का छोटा चूल्हा जल रहा था। उस पर ताँबे का बर्तन रखा था, और उसमें हल्दी का पानी उबल रहा था। हल्दी की गंध पूरे आँगन में फैली थी, गरम, तीखी, और उसमें कुछ और भी था — गुड़ की मीठी बू।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रह गया।
माँ ने मेरी तरफ़ देखे बिना कहा, "आ जा। हाथ धो ले।"
"माँ, तू क्यों उठी? चक्की—"
"चक्की आज नहीं चलेगी।" उन्होंने लकड़ी से पानी हिलाया। "आज तेरे हाथ की चक्की है, बाकी सब कल।"
मैं पास गया। हल्दी का पानी भाप छोड़ रहा था। माँ ने उसमें से एक लोटा भरा और मेरे आगे रखा।
"पी।"
मैंने पिया। गला जल गया। माँ ने देखा और हँसी — बहुत दिनों बाद माँ की हँसी सुनी।
"जलता है ना? इसीलिए पीना पड़ता है। जो जलता है, वही तोड़ता है।"
मैंने लोटा नीचे रखा। मेरे हाथ काँप रहे थे — पानी से नहीं, उस चिट्ठी से जो मेरी जेब में रखी थी। माँ ने मेरे हाथ देखे। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर सहलाए।
उनके हाथों में चक्की की गंध थी, आटे की, और उँगलियों में हल्दी की पीली रेखाएँ बन गई थीं।
"माँ," मैंने कहा, "आज अगर मैं—"
"मत बोल।" उन्होंने मेरे हाथ दबा दिए। "आज कुछ मत बोल। आज बस मेरी बात सुन।"
"क्या?"
"आज अखाड़े में जब तू जाए, तो एक बात याद रखना। वो आदमी तेरे से नहीं लड़ेगा।"
मैं चौंका। "फिर किससे?"
"तेरे डर से।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में सुबह की पहली रोशनी आ गई थी। "वो बीस साल से तेरे डर से लड़ रहा है, वीर। तेरे पिता के नाम से, तेरी माँ के नाम से, तेरे खून से। आज अगर तू डर के आगे न झुका, तो वो अपने आप गिर जाएगा। उसे पछाड़ने की ज़रूरत नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। बूढ़ी औरत, सूखे हाथ, सफ़ेद चोटी, माथे पर हल्दी का टीका। मेरी माँ। जिन्होंने मेरे पूरे बचपन में एक बार भी अपनी तकलीफ़ का ज़िक्र नहीं किया, आज मेरे लिए हल्दी का पानी गरम कर रही थीं।
तभी बाहर दौड़ने की आवाज़ आई।
टिंकू आँगन में घुसा। उसकी टोपी टेढ़ी थी, साँस फूल रही थी, और हाथ में मिठाई की डिब्बी थी जो उसने किसी तरह पकड़ रखी थी।
"भाई! भाई!" वो रुका, झुका, घुटनों पर हाथ रखकर साँस ली। "अखाड़े के बाहर… पूरा इलाक़ा जुट रहा है… बैनर लग गया… भारत केसरी का बैनर!"
मेरा दिल धक्क से रह गया।
"कौन लगा रहा है?"
टिंकू ने डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई, फिर वापस खींच ली, फिर फिर बढ़ाई। "खा ले पहले। मैंने तेरे लिए बनाई है।"
"टिंकू—"
"खा ले भाई, प्लीज। मैंने रात भर जगकर बनाई है।"
मैंने डिब्बी खोली। लड्डू थे, बहुत गरम, घी की गंध से भरे। मैंने एक मुँह में रखा। मीठा था, और उसमें कुछ नमक भी था — टिंकू की आदत। मैं हँस पड़ा।
"तू कभी बदलेगा नहीं।"
"नहीं बदलूँगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ भर्रा गई। "भाई, मत जा।"
"क्या?"
"मत जा आज। वो जग्गा… वो आदमी दो बार का चैंपियन है। उसने पहलवान नहीं तोड़े, भाई, उसने उनकी हड्डियाँ तोड़ी हैं।" टिंकू की आँखें भर आईं। "मैंने आज सुबह सुना… बाहर खड़ा है अपने आदमियों के साथ, और तालियाँ बजवा रहा है। जान-बूझकर। ताकि तेरे तक आवाज़ पहुँचे।"
मैंने डिब्बी बंद की और माँ की तरफ़ देखा। माँ उठ चुकी थीं, चूल्हा बुझा रही थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखे बिना कहा, "टिंकू, तूने मिठाई में नमक क्यों डाला?"
टिंकू रो पड़ा। "माँ, आप भी ना—"
"रो मत।" माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा। "आज रोने का दिन नहीं। आज देखने का दिन है।"
हम निकले। बाहर हवा ठंडी थी और उसमें धुएँ की गंध थी — कहीं से अलाव जल रहे थे। रास्ते में सुक्खी बुआ मिलीं। वो अपनी चमकीली साड़ी में, पान का बीड़ा हाथ में लिए, हमारी तरफ़ दौड़ीं और सीधे मेरे गले पड़ गईं।
"बेटा! बेटा मत जा!" वो रो रही थीं, और उनका रोना असली था — पहली बार मैंने सुक्खी बुआ को सच में रोते देखा। "वो आदमी दो बार का चैंपियन है। दो बार! मैंने सुना है उसने एक आदमी का हाथ—"
"बुआ—"
"अरे मैंने तो सुना है," और अचानक उनका रोना बंद, और आवाज़ में वो पुरानी चुगली लौट आई, "कि उस जग्गा ने कल रात ठाकुर के घर में खाना खाया और उसके बाद ठाकुर के तीन आदमी बीमार पड़ गए। ज़हर की बात कर रहे हैं लोग! और एक बात और — मैंने सुना है कि भैरव ने आज के मुकाबले में एक बड़ी शर्त लगाई है—"
"बुआ!" मैं गरजा।
वो चुप हुईं। फिर फुसफुसाईं, "एक बात कहूँ, बेटा? आज अगर तू जीता, तो भैरव का जो गुस्सा है ना…" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, और उनकी पकड़ ढीली नहीं थी, "वो गुस्सा सब पर गिरेगा। गाँव पर भी।"
मैंने उनका हाथ धीरे से छुड़ाया।
"बुआ, वो गुस्सा बीस साल से गिर रहा है। बस आज उसका रास्ता बदल रहा है।"
सुक्खी बुआ चुप खड़ी रहीं। फिर उन्होंने अपना पान का बीड़ा मुँह में डाला और कुछ नहीं बोलीं।
अखाड़े का फाटक दूर से दिख गया। और मैं रुक गया।
फाटक के बाहर आदमी खड़े थे — दर्जनों, सैकड़ों नहीं, पर इतने कि पूरा रास्ता भर जाए। कुछ गाँव के थे, कुछ बाहर के। कुछ के हाथ में लाठी थी, कोई मिठाई की डिब्बी लिए था। और सबसे ऊपर, अखाड़े की दीवार पर, एक लाल कपड़े का बैनर लहरा रहा था — मोटे सफ़ेद अक्षरों में कुछ लिखा था। मैंने पढ़ने की कोशिश की पर दूर था।
और उस भीड़ के किनारे, एक ऊँचे पत्थर पर चढ़कर, जग्गा खड़ा था। उसने अपने आदमियों से तालियाँ बजवाईं। तालियों की आवाज़ मेरे कानों तक आई, धीमी, ठंडी, और उसमें एक हँसी थी जो मुझे जानी-पहचानी लगी — भैरव की हँसी, जग्गा के गले से निकली।
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा। "भाई, तेरे हाथ ठंडे हैं।"
"हाँ," मैंने कहा। "पर पसीना नहीं।"
हम आगे बढ़े। फाटक के पास कालू काका खड़े थे। उन्होंने मुझे देखा, और उनकी आँखों में वो धुँधलापन नहीं था जो हमेशा रहता था। आज उनकी आँखें साफ़ थीं, जैसे बरसों बाद किसी ने उन्हें पोंछ दिया हो।
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी पकड़ कठोर थी, किसान की पकड़।
"अंदर जाने से पहले," उन्होंने कहा, "मिट्टी छू ले।"
"काका—"
"चुप।" उन्होंने मुझे फाटक के किनारे खींचा, जहाँ मिट्टी का ढेर था — वो लाल मिट्टी जिसे रोज़ सींचा जाता है, जिसे पहलवान अपने पैरों से गूंधते हैं। "मिट्टी छू ले। वो तुझे पहचान लेगी।"
मैं घुटनों के बल बैठा। मेरे घुटने मिट्टी में धँसे। मैंने दोनों हाथ मिट्टी पर रखे।
और मैंने सुना — नहीं, मैंने महसूस किया। मिट्टी गरम थी। सुबह की ठंड में भी गरम। जैसे किसी ने उसे अभी छोड़ा हो। जैसे कोई उसके नीचे से साँस ले रहा हो।
मैंने मिट्टी उठाई और अपने माथे से लगाई। मेरी आँखें बंद हो गईं।
"पिताजी," मैंने फुसफुसाया। "आज तुम्हारा नाम लौटाने आया हूँ।"
मेरी आवाज़ काँपी। मेरे हाथ काँपे। मेरी आँखों के पीछे कुछ गरम हुआ। मैंने उसे रोका नहीं। मिट्टी ने उसे सोख लिया।
और तभी पीछे से आवाज़ आई।
"मैं भी चलूँगी।"
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